शनिवार, 16 दिसंबर, 2006

पर्यावरण समाचार

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सूरज की तर्ज पर ऊर्जा हासिल करने की कवायद

भारत और छ: अन्य देशों के बीच पेरिस में पिछले दिनों एक ऐतिहासिक समझौते ने आकार लिया है। इसके तहत प्रायोगिक तौर पर एक ऐसा रिएक्टर लगाया जाएगा, जो सूर्य के नाभिकीय संलयन की तर्ज पर बिजली बनाएगा। समझौते पर हस्ताक्षर करने वाले अन्य देश है - चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, रुस और अमेरिका व योरपीय यूनियन। लगभग एक दशक की चर्चा के बाद १२.८ अरब डॉलर की लागत से यह रिएक्टर स्थापित किया जाएगा।

भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष अनिल काकोड़कर ने किया। समारोह एलिसी पैलसे में हुआ। इसका आयोजन फ्रांस के राष्ट्रपति जेक शिराक और योरपीय यूनियन के अध्यक्ष एम.जोस मेन्यूल डूरो बारोसो ने किया। मूलत: इस परियोजना का नाम अंतरराष्ट्रीय ताप परमाणु प्रायोगिक रिएक्टर है, लेकिन अब इसे इसके नाम के पहले अक्षरों के आधार पर आईटीईआर नाम से जाना जाएगा। यह परियोजना वर्ष २००८ से लगभग एक दशक में फ्रांस के दक्षिण में स्थित काडराशे नामक स्थान पर आकार लेगी। इस रिएक्टर में नाभिकीय संलयन के लिए जीवाश्म इंर्धन का विकल्प तलाशने की कवायद की जाएगी।

मौजूदा परमाणु संयंत्रों में नाभिकीय विखंडन की तकनीक इस्तेमाल की जाती है। उसकी जगह सूर्य की तरह नाभिकीय संलयन प्रक्रिया को अपनाया जाएगा। श्री काकोड़कर के अनुसार अगर यह परियोजना सफल रही तो व्यावसायिक उत्पादन के लिए एक प्रोटोटाइप बनाया जाएगा। फिर दुनिया के सभी रिएक्टरों में संलयन विधि अपनाई जाने लगेगी। श्री काकोड़कर ने ऋग्वेद के एक श्लोक का उल्लेख करते हुए कहा - हमारे पूर्वज सूर्य की महत्ता को अच्छी तरह जानते थे कि पृथ्वी पर जीवन सूर्य की वजह से ही है।

वे शायद यह नहीं जानते थे कि एक दिन उनके उत्तराधिकारी अपनी ऊर्जा संबंधी जरुरतें पूरी करने के लिए पृथ्वी पर सूर्य की ही नकल उतारेंगे। भारत को इस बात पर गर्व है कि दुनिया के इस आम लक्ष्य में वह भी एक भागीदार बना है। पौराणिक मान्यताआें के अनुसार सूर्य भगवान के रथ को सात अश्व खींचते हैं। इस परियोजना में भी सात देश शामिल हैं जो सात अश्वों के समान हैं।

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