शनिवार, 16 दिसंबर, 2006

कविता - प्रकृति के उपकार, जीवन के आधार

कविता

प्रकृति के उपकार, जीवन के आधार

भगवन्त राव गाजरे

वनस्पति और वृक्षों से नित , होता धरती का श्रृंगार

प्रकृति के उपकार अनेकों, बनते जीवन के आधार ।।

माटी की महिमा को समझें, कण-कण में हरिया छाई ।

जड़ी-बूटी, फल-फूल सदा ही, करते प्रमुदित सबको भाई ।।

मानव की उत्पत्ति से ही, पेड़-पौधे सब पालनकर्त्ता ।

भविष्य पुराण में ऋषियों ने तो, माना इनको कर्त्ता-धर्त्ता ।।

अशोक वृक्ष नित शोक हर्ता, बिल्व दीर्घायु देता है

जामुन को धन-दाता मानों, बकुल पाप को हर लेता है ।।

आम मनोरथ पूर्ण करता, कदम्ब लक्ष्मी-दाता सब जाना ।

वेद-पुराण भी युगों-युगों से , वृक्षारोपण-महत्व माना ।

सप्त-शती औषध के ज्ञाता, भिषक बन चिकित्सा करते ।

औषधि के माध्यम से ही वे , सदा तन का रोग हरते ।।

लक्ष्मी-ब्रह्मा कमलोद्भव हैं, दुर्गा से गणेश प्रसन्न हैं ।

बेल-पत्र से शिव की पूजा, पादपों का देव - सम्बन्ध है ।।

पीपल तले बोध बुद्ध को, अशोक तले सीता रहती थीं।

नारियल का नाम श्रीफल, लक्ष्मी नित उसमें बहती थी ।।

वन ने जन को नहीं भुलाया, जन दे वन को नित सत्कार ।।

बनें परस्पर हम सहयोगी, केसर की होगी भरमार ।।

तीज-त्यौहार सब पेड़-पौधांे से , तब क्यांे इनको काटे-छांटे ।

गाजरे का यही निवेदन, सुख-दुख इनका मिलकर बांटे ।।

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