शनिवार, 12 जनवरी, 2008

३ हमारा भूमण्डल

भूख से भरती कार की टंकी
कनग राजा
`वैश्विक स्तर पर भूख की समस्या में लगातार वृद्धि होती जा रही है । आज भूख से पीड़ित व्यक्तियों की संख्या ८५ करोड़ से अधिक हो गई है । साथ ही १९९६ से इसमें लगातार वृद्धि भी हो रही है ।' ये कथन संयुक्त राष्ट्र संघ के भोजन के अधिकार संबंधी विशेष दूत जीन जिगलर के हैं । न्यूयार्क में संयुक्त राष्ट्र संघ महासभा के अक्टूबर में सम्पन्न ६२वें अधिवेशन में प्रस्तुत एक रिपोर्ट (ए/६२/२८९) में अधिकार विशेषज्ञों ने स्पष्ट तौर पर कहा है कि १९९६ में हुए पहले विश्व खाद्य सम्मेलन और शताब्दी सम्मेलन २००० में सरकारों द्वारा भूख घटाने के वादे के बावजूद इस दिशा में कोई प्रगति नहीं हुई हैं । जीन जिगलर का कहना है कि `प्रतिवर्ष ६० लाख से अधिक बच्च्े पांच वर्ष की उम्र के पूर्व ही भूख या भूख संबंधित बीमारियों की वजह से असमय मौत का शिकार हो जाते हैं ।' अपनी बात को विस्तार देते हुए उन्होंने कहा है कि `यह स्थिति पूर्णतया अस्वीकार्य है । सभी मनुष्यों को गरिमामय, स्वतंत्र व भूख रहित जीवन जीने का अधिकार है । भोजन का अधिकार एक मानवाधिकार ही है ।' स्थितियों पर खेद व्यक्त करते हुए वे कहते हैं कि अपने सात साल के कार्यकाल के बावजूद वे भोजन के अधिकार से वंचित व्यक्तियों की संख्या में कमी अपनी रिपोर्ट में नहीं दर्शा पाए हैं । बल्कि इसके ठीक विपरीत चीन, भारत, दक्षिण अफ्रीका और अनेक लेटिन अमेरिकी और केरेबिन देशों में वास्तविक उन्नति के बावजूद भूख और कुपोषण से पीड़ितों की संख्या में न्यूनतम कमी ही आई है । अधिकार विशेषज्ञों का कहना है कि भूख और अकाल अपरिहार्य नहीं है। ख़ाद्य एवं कृषि संगठन (एफ.ए.ओ.) के अनुसार विश्व पूर्व से ही इतने खाद्यान्न का उत्पादन करता है जो न केवल प्रत्येक बच्च्े, महिला व पुरूष की भूख शांत कर सकता है बल्कि इससे १२ अरब लोगों को भोजन मुहैया करवाया जा सकता है जो कि विश्व की वर्तमान जनसंख्या से दुगनी बैठती है । उनका प्रश्न यह है कि `हमारा विश्व आज पहले के मुकाबले अधिक संपन्न है, इसलिए प्रतिवर्ष ६०लाख बच्चेंका भूख और उससे संबंधित बीमारियों से प्राण त्यागने को कैसे स्वीकार्य किया जा सकता है ?' अपनी रिपोर्ट में उन्होंने महासभा का ध्यान दो उभरते हुए मुद्दों पर खींचा है। पहला है जैविक इंर्धन की वजह से भोजन के अधिकार पर पड़ने वाला जबरदस्त नकारात्मक प्रभाव और दूसरा उन्होंने भूख, अकाल और उपवास के कारण अपना देश छोड़कर विकसित देशों में शरण ले रहे व्यक्तियों के मानवाधिकारों के हनन के संबंध में तुरंत हस्तक्षेप की आवश्यकता । अपने निष्कर्ष और अनुशंसाआे में उन्होंने कहा है कि सभी राष्ट्रों को यह स्वीकारोक्ति करते हुए कि उनके प्रत्येक नागरिक को भोजन का अधिकार है, इस दिशा में तुरंत कार्यवाही करना चाहिए । साथ ही सभी राष्ट्रों को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि उनकी अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक और आर्थिक नीतियां जिनमें कि अंतर्राष्ट्रीय व्यापार समझौते भी सम्मिलित हैं, से अन्य देशों के भोजन के अधिकार पर नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए । इस संदर्भ में जिगलर का कहना है कि यूरोपियन यूनियन सरकारें, अफ्रीकी, केरेबियन व पेसिफिक देशों से आर्थिक साझेदारी समझौते के तहत यह सुनिश्चित करें कि इन समझौतों से उनकी खाद्य असुरक्षा और भूख में वृद्धि न हो । विशेष दूत ने अपनी रिपोर्ट में साधारण सभा का ध्यान हाल ही में भोजन अधिकार से संबंधित कुछ अत्यंत सकारात्मक बिंदुआे की ओर खींचा है । ये हैं :-१. छ: अफ्रीकी देशों और संयुक्त राष्ट्र संघ ने मिलकर एक योजना तैयार की है जिसमें अफ्रीका में भूख की बढ़ती मूलभूत समस्या से निपटने का प्रयास किया गया है ।२. बोलिविया की सरकार ने एक ऐसा शून्य कुपोषण कार्यक्रम प्रारंभ किया है जिसके अंतर्गत बोलिविया के तेल और गैस के उत्पादन पर लगा अतिरिक्त कर सीधे शून्य कुपोषण कार्यक्रम को जाएगा ।३. लेटिन अमेरिकी और केरेबियन अंचल ने एक ऐसा आंचलिक कार्यक्रम अपनाया है जिसके अंतर्गत सामूहिक रूप से भूख को समाप्त् करने और खाद्य सुरक्षा प्रदान की जाएगी । इन शक्तिशाली प्रयत्नों में प्रत्येक को भरपूर खाद्य की भावना भी सन्निहित है । विशेष दूत ने यूरोपियन यूनियन और अफ्रीकी, केरेबियन व पेसेफिक देशों (ए.सी.पी.) के साथ हुए आर्थिक समझौतों पर विशेष टिप्पणी करते हुए सभी देशों खासकर यूरोपियन यूनियन का ध्यान इस ओर दिलाया है कि इससे विकासशील विश्व के गरीब किसानों के भोजन के अधिकार पर विपरीत प्रभाव न पड़े । अत्यधिक व्यापारिक खुलेपन से भी वे काफी चिंतित दिखे । उनका सोचना है कि इन ए.सी.पी. देशों के किसान किस प्रकार यूरोपियन यूनियन द्वारा अनैतिक रूप से दी जा रही अत्यधिक सब्सिडी का मुकाबला कर पाएंगे ? उनका कहना थ कि इन देशों में ८० प्रतिशत लोग कृषि पर आश्रित हैं और जहां रोजगार के वैकल्पिक साधन भी नहीं है वहां यह अन्यायी प्रतिस्पर्धा तो बर्बादी ही लाएगी । इसके अतिरिक्त इन नए आर्थिक साझेदारी अनुबंधों से ए.सी.पी. देशों की सरकारों के वाणिज्य में भी जबरदस्त कमी आएगी जो कि काफी हद तक आयात शुल्क पर निर्भर हैं । जैसे ही यूरोपियन यूनियन के देशोंके लिए शुल्क में कमी होगी वैसे ही इन देशों को अपने सामाजिक कल्याण के कार्यक्रमों में कटौती करना पड़ेगी । विशेष दूत ने भूख के संदर्भ में जैविक इंर्धन पर गहरी चिंता दर्शाई है । उनका कहना है कि खाद्य फसलें जैसे मक्का, गेहूं, शक्कर, पाम आईल को बिना वैश्विक भूख को दृष्टिगत रखते हुए कार इत्यादि के इंर्धन के तौर पर इस्तेमाल करने के विनाशकारी परिणाम निकल सकते हैं। एक अनुमान के अनुसार कार की टंकी को भरने के लिए आवश्यक जैविक इंर्धन (५० लीटर) हेतु २०० किलो मक्का की आवश्यकता पड़ेगी जो कि एक व्यक्ति का वर्षभर का भोजन है । जैविक इंर्धन से जहां जलवायु परिवर्तन और विकासशील देशों के किसानों की आर्थिक देशों में सकारात्मक लाभ होगा पर इसी के साथ यह अध्ययन भी आवश्यक है कि इससे भोजन के अधिकार पर क्या प्रभाव पड़ेगा ? विशेष दूत ने वर्तमान पद्धतियों के तहत जैविक इंर्धन के उत्पादन पर पांच वर्षो के लिए अनिवार्य रोक लगाने का आग्रह किया है जिससे कि नई तकनीकें इजाद करने का समय मिल सकें और पर्यावरण, सामाजिक व मानवाधिकारों पर विपरीत प्रभाव पड़ने को रोका जा सके । इन प्रयत्नों के अंतर्गत विश्व के कुल ऊर्जा उपभोग में कमी, ऊर्जा की कार्यक्षमता में वृद्धि, जैविक इंर्धन के उत्पादन हेतु `दूसरी पीढ़ी' की तकनीकों का विकास जिससे कि खाद्य और इंर्धन के बीच की प्रतिस्पर्धा को कम किया जा सके, ऐसी तकनीकों को अपनाना जिसमें अखाद्य फसलों का प्रयोग किया जा सके और असिंचित व बंजर क्षेत्रों में विकसित हो सकें । साथ ही उनका सुझाव है कि जैविक इंर्धन का उत्पादन पारिवारिक स्तर पर होन कि औद्योगिक पैमाने पर । ग्रामीण क्षेत्रों में गरीब किसानों को बजाय प्रतिस्पर्धा के, अवसर उपलब्ध करवाना भी उनकी अनुशंसाआे में सम्मिलित है । ***

0 टिप्पणियाँ: