शनिवार, 12 जनवरी, 2008

६ पशुपालन

पशुधन सहेजने की अनिवार्यता
निलेश देसाई
`सर, आप कहते हो कि हम पशुपालन के लिए ऋण देंगे लेकिन हमारे गांव में न पशुआे के निकलने की जगह है और न ही चराने की और बीमार पशु का इलाज करने के लिए भी २० कि.मी. तक कोई व्यवस्था नहीं है ।' यह व्यथा है सिरमोर ब्लॉक सीधी की कमला बाई, निवास डिंडोरी के गणेश, बिछुआ छिन्दवाड़ा के शंकरसिंह एवं पेटलावद झाबुआ के रामचन्द्र एवं हरिराम भाई जैसे प्रदेश के हजारों पशुपालकों की । विगत दिनों भोपाल में प्रदेश भर के पशुपालकों का सम्मेलन हुआ जिसमें प्रदेश भर के पशुपालकों ने पशुपालन के क्षेत्र की समस्याआें पर चर्चा करने का प्रदेश स्तर पर यह संभवत: पहला अवसर था । जहां सुदूर गांव के पशुपालकों से लेकर पशुपालन एवं ग्रामीण विकास विभाग के आला अफसर, सामाजिक संगठन एवं राजनेता एक साथ बैठे थे । प्रदेश की सकल आय में पशुधन का योगदान १२ प्रतिशत होने एवं राज्य के ७० प्रतिशत किसानों के दूध व्यवसाय पर निर्भर होने के बावजूद प्रदेश में पशुधन की कोई ठोस नीति नहीं हैं । प्रदेश की अर्थव्यवस्था में, कृषि की तुलना में पशुधन का योगदान लगातार बढ़ा है । पशुपालन व्यवसाय में जानवरों के खानपान पर बहुत कम खर्च होता है और परम्परागत अनुभव के कारण यह व्यवसाय ग्रामीण समाज के लिए सहज ही अपनाने योग्य व्यवसाय है । इस सेक्टर के विकास के लिए जरूरी मूलभूत सुविधाएं यथा भोजन, पानी और स्वास्थ्य तथा उन्हें सुनिश्चित करने वाले प्राकृतिक संसाधन एवं संसाधनों से संबंधित उचित नीतिगत आधार उपलब्ध कराने की बुनियादी जरूरत है । इस सेक्टर को सहयोग प्रदान कर तथा उपयुक्त नीति के माध्यम से हमे समाज के लिए अधिकाधिक उपयोगी बनाया जा सकता है । अनुभव बताता है कि दुग्ध उत्पादकता, मुर्गी पालन और सुअर पालन जैसी गतिविधियों में सभी वर्ग के लिए आय कि बेहतर सम्भावनाएं हैं । अत: पशु-पक्षी पालन एवं संरक्षण के काम को नीतिगत महत्व देना चाहिए । पशुधन भारत के किसानों की आजीविका का एक महत्वपूर्ण परम्परागत स्त्रोत है । गरीबी कम करने में पशुधन का जो योगदान है उसे अब अच्छी तरह समझा जाने लगा है, खासकर अर्द्धशुष्क और शुष्क इलाकों में जहां खेती सीमित होती है वहां पशुधन आजीविका का खास धान होता है । भारत में दुनिया के पशुधन का पांचवा हिस्सा है । भारत के करीब ४५ करोड़ छोटे-बड़े मवेशी हरे चारे के सीमित क्षेत्र पर निर्भर हैं । देश में बहुत ज्यादा मवेशी होने के कारण उपलब्ध जमीन पर उनका दबाव बढ़ गया है । किसान अपने मवेशी चराने के लिए मुख्यत: गांव में चारागाह के रूप में चिन्हित सार्वजनिक स्थानों का उपयोग करते हैं । जनसंख्या और मवेशियों की आबादी बढ़ने के कारण और कुछ गैर टिकाऊ तरीके अपनाये जाने के कारण प्राकृतिक रूप से विकसित इन सार्वजनिक चारागाहों में तेजी से कमी आई है और इससे गरीब, सीमान्त तथा भूमिहीन किसानों, खासकर महिलाआें पर गंभीर असर पड़ा है, क्योंकि वे सदियों से अपने मवेशियों और अपनी आजीविका के लिए इन संसाधनों पर निर्भर रहते रहे हैं । मध्यप्रदेश में पशुधन से संबंधित समस्याआे, पशुधन के विकास की सम्भावनाआे और आय के वैकल्पिक साधन के रूप में पशुधन से जुड़े मुद्दों को नीतिगत स्तर पर पर्याप्त् महत्व दिये जाने की अत्यधिक आवश्यकता है । यहां अभी तक पशुधन के समग्र विकास के लिए कोई नीति ही नहीं है । आज की स्थिति में राजस्व नीति, जल नीति, वन नीति, कृषि नीति, पर्यावरण नीति एवं पुनर्वास नीति में पशुधन के विकास की संभावनाआें की अपेक्षा चुनौतियां ज्यादा मौजूद हैं । प्रदेश में राजस्व नीति में वर्णित प्रावधानों, कार्यक्रमों और कदमों के कारण चारागाह की भूमि जो पूर्व में गांव की सकल भूमि का लगभग १० से १२ प्रतिशत के आस-पास या उससे अधिक होती थी वर्तमान में घटकर १.५ से २ प्रतिशत रह गई है । कहीं-कहीं तो यह मात्र रेकार्ड में दर्ज है । मध्यप्रदेश का लगभग एक तिहाई हिस्सा वन क्षेत्र है । इस क्षेत्र पर चारागाह विकास हेतु सघन योजना न होने के कारण चारे का सही उत्पादन नहीं हो रहा है । यदि गुजरात की तर्ज पर पशुचारे की मांग के आधार पर वन क्षेत्रों में चारागाह विकास हेतु सघन योजना बनाई जाये तो चारे की समस्या को काफी हद तक कम किया सकता है । देशभर में रतनजोत की खेती को बढ़ावा देने के कारण चारा पैदा करने वाले इलाके में और कमी होगी एवं भविष्य में कम चारा पैदा होगा । ऐसी स्थिति में पहले से ही चारागाह की समस्या वाले क्षेत्रों में चारे की दिक्कत और बढ़ेगी जिसका असर पशुपालन पर पड़े बगैर नहीं रहेगा । इसी प्रकार कृषि क्षेत्र में हो रहे अनेक बदलाव भी पशुपालकों के लिए चुनौतियां बढ़ा रहे हैं । कपास के बढ़ते रकबे ने एवं हार्वेस्टर से गेहूं की कटाई ने पशु चारे की उपलब्धता को घटाया है । इसके अलावा सरकार द्वारा बी.टी. काटन या अन्य जैव संशोधित (जी.एम.) फसलों को प्रोत्साहन देकर पशुपालन क्षेत्र में नई दिक्कतों को आमंत्रित किया जा रहा है । ज्ञातव्य है कि विगत दिनों आंध्र प्रदेश में बीटी कपास के पौधे खाने से १६०० भेड़ों की मृत्यु होने की पुष्टि हुई है । अत: हानिकारक कृषि तकनीकों एवं पशुआें के लिए हानिकारक फसलों की खेती प्रतिबंधित की जानी चाहिए । इस सब परिस्थितियों के चलते पशुपालन की लागत बढ़ी है । जिसके कारण अल्प आय या कम पूंजी वाले पशुपालकों की इस काम में रूचि कम हुई है । प्रदेश में पशु उत्पाद महंगे हुए हैं तथा विदेशी बाजार एवं बड़े पूंजीपति हावी हुए है । प्रदेश में पशु चिकित्सा की चिन्ताजनक स्थिति ने भी पशुपालन के विस्तार को सीमित किया है । शासकीय पशु चिकित्सा तंत्र की व्यवस्था व उपलब्धता पशुआें की संख्या के अनुपात में बहुत कम है । वर्तमान में प्रदेश में २२ हजार पशुआें पर एक चिकित्सक उपलब्ध है । जबकि शासकीय मापदण्ड के अनुसार ५ हजार पशुआें पर एक चिकित्सक होना चाहिए । जो चिकित्साकर्मी उपलब्ध भी हैं वे भी सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में रहकर पशुधन की चिकित्सा करने के प्रति प्रतिबद्ध नहीं हैं । शासन द्वारा प्रत्येक गांव में ``गो-सेवक'' योजना अवश्य प्रारंभ की है, लेकिन प्रशिक्षण के पश्चात् इन लोगों को किसी भी प्रकार की मान्यता न दिये जाने के कारण यह तंत्र प्रभावी भूमिका नहीं निभा पा रहा है । प्रदेश के अनेक क्षेत्रों में, गांव में परम्परागत दवाआें के जानकार हैं, जो पशु चिकित्सा को कुशलता पूर्वक जानते हैं, लेकिन शासकीय मान्यता नहीं मिलने के कारण इनके विस्तार में बाधा हो रही है । यदि इन्हें प्रोत्साहित किया जाए तो ये पारम्परित जानकार पशु चिकित्सा के क्षेत्र में बहुत उपयोगी साबित हो सकते हैं । झाबुआ जिले में सम्पर्क संस्था ने ऐसे पारम्परिक जानकारों को प्रशिक्षण देकर उन्हें चिकित्सा किट प्रदान किये हैं । जो पशु चिकित्सा के लिए उपयोगी भी साबित हो रहे हैं । संस्था के इस प्रयोग को विस्तारित किया जा सकता है तथा पशु चिकित्सा के क्षेत्र में पारंपरिक ज्ञान का उपयोग प्रदेश के पशुधन को स्वस्थ व लाभकारी बनाने में किया जा सकता है। पशुधन विकास के लिए प्रदेश में पशु नस्ल सुधार के नाम पर बड़े स्तर पर विदेशी नस्लों का प्रयोग हुआ है । इसके बावजूद सफलता बहुत सीमित रही है । अत: देशी नस्लों के संवर्धन पर ज्यादा ध्यान देने की आवश्यकता है । आर्थिक उदारीकरण के इस दौर में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के बढ़ते प्रभाव के कारण गरीबों की आजीविका के मुख्य साधन पशुधन पर सामुदायिक नियंत्रण को सुनिश्चित करना बहुत आवश्यक है । प्रदेश में लघु, सीमान्त किसानों और भूमिहीन परिवारों की सालाना आय का लगभग ५० प्रतिशत भाग मुर्गी व दुग्ध व्यवसाय से प्राप्त् होता है । इस व्यवसाय से लगभग २० लाख लोगों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार मिलता है । ये वे लोग हैं जिसमें अधिकांश गरीब और कम पड़े लिखे लोग हैं । अत: २० लाख लोगों की माली हालत को सुधारने की क्षमता रखने वाले इस सेक्टर के सर्वांगीण विकास तथा जन अपेक्षाआे पर खरा उतरने के लिए उपयुक्त नीति और नीति आधारित ऐसे कार्यक्रमों का होना अति आवश्यक है जिसमें कि पशुधन विकास की ज्यादा से ज्यादा सम्भावनाएं हों । ***

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