शनिवार, 12 जनवरी, 2008

इस अंक में

पर्यावरण डाइजेस्ट इस अंक से अपने प्रकाशन के २२वें वर्ष में प्रवेश कर रही है । विगत २१वर्षो की प्रकाशन यात्रा में हमें हमारे पाठकों, लेखकों और शुभचिंतकों का सहयोग मिला, सहयोग की इसी शक्ति से हम पत्रिका की नियमितता बनाये रख सके । इस अवसर पर हम अपने पाठकों, लेखकों एवं शुभचिंतकों के प्रति हार्दिक कृतज्ञता ज्ञापित करते हैं ।
पत्रिका के इस अंक की शुरूआत वरिष्ठ पत्रकार भारत डोगरा के लेख गणदेवता के सपने अभी भी अधूरे से कर रहे हैं । गणतंत्र दिवस के अवसर पर आम आदमी (गणदेवता) की हालत क्या है इस पर इस लेख में विस्तार से वर्णन है । बांधों, नदियों एवं लोगों के दक्षिण एशिया नेटवर्क (सेन्ट्रल) से जुड़े लेखक बिपिनचंद्र चतुर्वेदी के लेख जलाशयों की जीवंत परमम्परा में प्राकृतिक जल संसाधनों से जुड़े लेखक कनग राजा के लेख भूख से भरती कार की टंकी में कहा गया है कि जैविक इंर्धन हेतु खाद्यान्न का प्रयोग भूख और कुपोषण की समस्या को दुगना कर देगा । चंदौसी उ.प्र. के प्रसिद्ध लेखक डॉ. सुनील कुमार अग्रवाल के लेख वन रहवास और वनवासी में इस बात पर जोर दिया गया है कि हमारा उद्देश्य प्रकृति को, वनों को और वन्य जंतुआे को संभालना है न कि प्रकृति से जुड़े जीवन को उजाड़ना । डॉ. खुशालसिंह पुरोहित के लेख रामचरित मानस में पर्यावरण चेतना में मानस में प्रकृति वर्णन और पर्यावरण चेतना के बिंदुआे की चर्चा की गई है । झाबुआ के प्रसिद्ध समाजकर्मी निलेश देसाई के लेख पशुधन सहेजने की आवश्यकता युवा लेखक जे. सकलेचा के लेख ग्लोबन वार्मिंग : जिम्मेदारी से भागता अमेरिका और दिल्ली की लेखिका निधि जामवाल, मौरीन नन्दिनी और रावलीन कौर के लेख धारावी : वैधानिक लूट का नया औजार भी आप पढ़ेंगे। पत्रिका के स्थायी स्तम्भ पर्यावरण परिक्रमा, ज्ञान-विज्ञान और पर्यावरण समाचार में पर्यावरण जगत मे हो रही नित-नयी हलचलों से आप रुबरु होते हैं । पत्रिका के बारे में अपने विचारों से हमें अवगत करायें ।
:: गणतंत्र दिवस के शुभ अवसर पर हार्दिक शुभकामनाएँ ::
- कुमार सिद्धार्थ

0 टिप्पणियाँ: