बुधवार, 21 मई, 2008

इस अंक में

पर्यावरण डाइजेस्ट के इस लोक चेतना विशेषांक में पर्यावरण से जुड़े विभिन्न विषयों पर केन्द्रित लोकचेतनापरक सामग्री दी गयी है ।
इंदौर के प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता अनिल त्रिवेदी के लेख इतिहास बनते मेहनतकश में उन मेहनतकशों को श्रृद्धांजलि है, जिन्होंने मनुष्य के जीवन की गरिमा हेतु अपने प्राणों की आहुति दी थी । पर्यावरण लेखक सेव्वी सौम्य मिश्र ने अपने लेख आटे दाल के भाव में खाद्यान्न मूल्य वृद्धि व इसकी कमी की वास्तविकता को उजागर किया है । चंदौसी (उ.प्र.) के सुप्रसिद्ध लेखक/प्राध्यापक डा. सुनील कुमार अग्रवाल के लेख अब क्यों नहीं बौराता बसंत? में प्रकृतिऔर मनुष्य के संबंधों में आ रही गिरावट और इसके दुष्परिणामोंकी चर्चा की गयी है । सुप्रसिद्ध विज्ञान लेखक डा. अरविंद गुप्त्े ने अपने लेख गोरेपन का गोरख धंधा में कहा है कि विकासशील देशों में लंबे समय से गोरे लोगों का कब्जा रहने से यहां के लोग यह मानने लग गये है कि गोरे लोग काले रंगवालों से श्रेष्ठ हैं, जबकि यह मिथ्या विश्वास है । इसी प्रकार बिमल श्रीवास्तव के लेख पालतू पशु जो अब जंगली बन चुके हैं में फेरलपशुआें की विस्तार से जानकारी दी गयी है । प्रदेश चर्चा में आप म.प्र. के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान का लेख म.प्र.: खाद्य सुरक्षा पर `न्यू डील' पढेंगे, जिसमें मुख्यमंत्री अन्नपूर्णा योजना और खाद्य सुरक्षा पर विस्तार से जानकारी दी गयी है । कविता में इस बार उत्तराचंल के प्रसिद्ध साहित्यकार नागेन्द्र दत्त शर्मा की कविता पर्यावरण विकास मंत्र दी गयी है, जो आपको रूचिकर लगेगी । पत्रिका के स्थायी स्तम्भ पर्यावरण परिक्रमा, ज्ञान-विज्ञान और पर्यावरण समाचार मंे पर्यावरण जगत मे हो रही नित-नयी हलचलों से आप रुबरु होते हैं । पत्रिका के बारे में अपने विचारों से हमें अवगत करायें ।
- कुमार सिद्धार्थ

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