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बुधवार, 21 मई, 2008

६ आवरण कथा

खतरे में है कोरल भित्ति
डॉ. चन्द्रशीला गुप्त
कोरल, प्रवाल या मंूगे को अधिकांशत: आभूषण के रूप में ही जाना जाता है और लोगों को इसे खनिज समझने के लिए माफ करना ही उचित होगा । उन्हें भी माफ किया जा सकता है जो कोरल को प्राकृतिक रूप में देखकर पौधा समझ बैठते हैं । वास्तव में सन् १७२३ तक तो इसे पौधा ही माना जाता था । आगे चलकर फ्रांसीसी वैज्ञानिक जीन-एण्ड्रे पैसोनेल ने यह स्पष्ट किया कि यह छोटे-छोटे प्राणियों का कैल्शियम आधारित आवास है । कोरल दरअसल छोटी-छोटी रचनाआें-पॉलिप- के बने होते हैं जो एक खनिजयुक्त पदार्थ का स्त्राव करते हैं। इस पदार्थ से ऐसी कंकालीय रचनाएं तैयार होती है जिनमें पॉलिप रहते हैं और प्रजनन करते हैं । नए पैदा हुए पॉलिप इसी कंकाल के ऊपर अपना घर बनाते जाते हैं और धीरे-धीरे यह बढ़ता जाता है व खूबसूरत आकार ले लेता है । बढ़ते-बढ़ते यह एक दीवार यानी भित्ति या टीले का रूप ले लेता है । इसी को कोरल भित्ति कहते हैं । वैसे तो कोरल भित्तियां सभी ऊष्ण कटिबंधीय समुद्रों में पाई जाती है लेकिन हिन्द प्रशांत क्षेत्र में ज्यादा पाई जाती हैं । ये मुख्यत: अफ्रीका के पूर्वी तटों, मध्य अमेरिका, दक्षिण पूर्वी एशिया व ऑस्ट्रेलिया के उत्तर-पूर्वी तटों पर पाई जाती हैं । प्रशांत सागर को प्रवाल सागर भी कहा जाता है । कोरल नरम व कठोर दोनों प्रकार के होते हैं । कोरल भित्ति बनाने का कार्य वास्तविक हार्नी कोरल के अलावा दो अन्य समूह भी करते हैं । ये कठोर कोरल सीलेन्ट्रेटा समुदाय के वर्ग हाइड्रोजाआ के सदस्य है । इनका कंकाल गुलाबी या जामुनी रंग का होता हे । इनका एक श्वेत वर्णीय सदस्य मिलियोपोरा जिसे डंक मारने वाला कोरल भी कहते हैं, कोरल भित्ति का मुख्य घटक है । नरम कोरलों में लाल ऑर्गन-पाइप कोरल ट्यूबीपोरा व नीला हेलियोपोस आदि शामिल है । वैसे तो वास्तविक कोरल को अनेक कुलों में बांटा गया है लेकिन महत्वपूर्ण वर्गीकरण अभित्तिकारी व भित्तिकारी कोरल का है । भित्तिकारी कोरल गर्म पानी में ही पनपते हैं व ८५ मीटर से ज्यादा गहराई पर नहीं पाए जाते क्योंकि इसके नीचे तापमान बहुत कम हो जाते है । दूसरी ओर अभित्रिकारी कोरल पूरे विश्व के समुद्रों में व हर गहराई पर पाए जाते है । सामान्यत: भित्तिकारी कोरल का कंकाल बड़ा व पॉलिस सदस्यों का घनत्व ज्यादा होता है अन्य कोई प्रकार अंतर नहीं होता। और तो और, एक ही कुल के कुछ सदस्य भित्तिकारी होते है व कुछ अभित्तिकारी । मददगार वनस्पतियां :- भित्तिकारी व अभित्तिकारी कोरलों के ऊतकोंके बीच एक-कोशिकीय, भूरे रंग की गोलाकार वनस्पति पाई जाती है, जिसे जू-एंथेली कहते है । कोरल और यें वनस्पति प्लवक एक दूसरे के लिए लाभकारी होते हैं । वनस्पति को कोरल से सुरक्षा के साथ-साथ अकार्बनिक पोषण व कार्बन हाईऑक्साइड व साथ में अमोनिया व फास्फेट आदि प्राप्त् होते है । दूसरी ओर यह स्पष्ट नहीं है कि कोरल के लिए वनस्पति का क्या महत्व है । वनस्पतिहीन कोरल्स का काम भी चल ही जाता है । कई वैज्ञानिक मानते हैं कि वनस्पति कोरल के लिए उत्सर्जी कार्य करती है । इसके अभाव में उत्सर्जीं पदार्थो का विसरण अच्छी तरह नहीं हो पाता । भित्तिकारी कोरल के कंकाल निर्माण की तीव्र गति को देखते हुए लगता है कि वनस्पतियां कोरल के लिए लाभकारी है । वनस्पतियोंकी प्रकाश संश्लेषण की क्रिया के फलस्वरुप कोरल को अपने भीतर पर्याप्त् ऑक्सीजन उपलब्ध हो जाती है । इस प्रकार ये वनस्पतियां कोरल की किडनी ही नहीं वरन फेफड़ो का भी काम भी करती है । यह भी माना जाता है कि इन वनस्पतियों से कोरल को कुछ विटामिन व खनिज प्राप्त् होंगे । लगता है कि इन सहजीवी वनस्पतियों की उपस्थिति से कोरलों के लिए इतनी विशाल भित्तियां बनाना संभव हुआ होगा । वनस्पतियों के लिए प्रकाश आवश्यक है । यही वजह है भित्तियों का विकास प्रकाशमय पानी में ही संभव है । कैल्शियमयुक्त कोरल व अन्य भित्तिकारी कोरल प्राथमिक भित्ति के ढाचों का निर्माण करते है । आगे चलकर इनमें अन्य कोरल तथा कंकाल निर्माता जंतु आकर बसेरा कर लेते है । इनमें प्रोटोज़ोआ और विकसित जंतु शामिल हैं । निचले, शांत जल में कोरल प्रजतियां, खासकर अटलांटिक भित्तियों में सी-फैन या गार्गोनिया के बड़े जंगल होते है । जैव विविधता का भण्डार :- समुद्री जैव तंत्रो में सार्वधिक जैव विविधता कोरल भित्ति में ही पाई जाती है । भूरे, हरी एवं लाल कैल्शियमयुक्त समुद्री शैवाल भित्ति बनाने में मदद करती है । साथ ही ट्राइडेक्ना नामक विशाल सीप जैसे अकशेरुकी जीव और कंकालयुक्त फोरामिनाफोरा, प्रोटोजोआ भी यही कार्य करते है । ये भित्तियां चमकदार रंगीन मछलियां तो कोरलों का भक्षण करती है या अपने पैने दांतों से सतह को खुरचती है । कोरल भित्ति के पनपने में प्रकाश व तलछट की मात्रा बहुत महत्वपूर्ण कारक है । साथ ही भित्ति पर कोरलों के वितरण पर छाया व प्रकाश का प्रभाव पड़ता है। प्रकाशमय भाग में पाए जाने वाले कोरल स्थूल होते हैं । इनके आधारीय जोड़ चौड़े होते हैं जो निरन्तर आघात करती समुद्री लहरों को झेलने मेंं समर्थ होते है । नीचे के शांत, कम रोशन इलाके में पतले शाखादार कोरल होते है । दरअसल पानी की हलचल से कोरलों की वृद्धि प्रभावित होती है । यही वजह है कि सतह पर गोलाकार मोटे कोरल गहराई ने चपटे व संकरे हो जाते है क्योंकि रोशन व पादप क्रियाएं कम हो जाने से कैल्सिकरण कम हो पाता है । विश्व का आश्चर्य :- भित्तिय मुख्यत: झालरदार, बैरीयर व ऍटाल किस्म की होती हैं । झालरदार भित्तिय किनारों या चट्टानों अथवा ज्वालामुखी द्वीपों से आगे लटकी रहती है। इनकी लंबाई कुछ किलोमीटर से ज्यादा नहीं होती है । बैरीयर भित्ति ज़मीन से अवश्य जुड़ी होती है और करीब १६० कि.मी. तक लंबी हो सकती है । इनमें बीच में ६० मीटर तक की एक नाल होती है । सबसे प्रसिद्ध बैरीयर रीफ ऑस्टे्रलिया की ग्रेट बैरीयर रीफ है जो २१०० कि.मी. लंबी है और ऑस्ट्रेलिया के पूर्वी तट से न्यू गिनी के दक्षिणी तट तक फैली है । एटॉल समुद्र के बीच में होती है । यह सागर के पेंदे से शुरु होकर गोल या अंडाकार आक़ृति में विकसित होती है । ये खास तौर पर मध्य प्रशांत सागर में पाई जाती है । झालरदार भित्ति के निर्माण का रहस्य नही है । कोरल साथ के अन्य प्राणी उथले पानी में स्थापित होकर धीरे-धीरे पनपते जाते है व भित्ति समुद्र में आगे की ओर बढ़ती जाती है । लेकिन बैरीयर व एटॉल भित्ति की बात अलग है । डारविन ने अपनी यात्राआें (१८३२-३६) के दौरान पाया था कि जमीन धंस जाने या बढ़ती हुई भित्ति के पृथक हो जाने से झालरदार भित्ति में बदल सकती है । और यदि भित्ति किसी ज्वालामुखी द्वीप के चारोंओर बनी है तो द्वीप के निरन्तर नीचे धंसते जाने से द्वीप लुप्त् हो जाता है तब एटॉल का निर्माण होता है । कुछ अन्य वैज्ञानिकों के अनुसार उथले किनारे तलछट जमने से ऊपर आ जाते है । एक मान्यता के अनुसार हिमयुग के दौरान इन हिस्सों में बर्फ जमने से महासागरों में जलस्तर नीचे हो गया था, जिसकी वजह से किनारे ऊंचे हो गए थे । बाद में जब समुद्र का जलस्तर बढ़ा तो ऐसी जगहों पर कोरल विकसित हुए । वर्तमान की सभी कोरल भित्तियां अंतिम हिमयुग के बाद ही बनी हैं । अमेरिका के आणविक उर्जा प्राधिकरण ने प्रशांत महासागर में ड्रिलिंग करके पता लगाया है कि डार्विन का सिद्धांत ही अनेक जगहों पर सही सिद्ध हो रहा है । करीब १३०० मीटर गहरे ज्वालामुखी द्वीप की कार्बन से पता चला है कि ये द्वीप इओसीन युग के हैं व करीब ५ करोड़ वर्ष पूर्व डूबे थे । कोरल पर खतरा :- जहां कोरल्स की करीब २५०० जीवित प्रजातियां हैं, वहीं ५००० प्रजातियां विलुप्त् हो चुकी हैं । अत: वैज्ञानिक शंका जता रहे हैं इन जन्तुआें का अस्तित्व घटता जा रहा है । वर्तमान में एक विशाल कांटेदार स्टार फिश से खतरा पैदा हो गया है जो जीवित कोरल खाने के लिए मशहूर है । लेकिन पहले इनकी संख्या बहुत ही कम होती थी। वह अभी तक समझ से बाहर है कि इनकी संख्या इतनी कैसे बढ़ रही है । लेकिन ये फिजी, गुआना व माइक्रोरेशिया के पास ग्रेट बैरीयर रीफ को धड़ल्ले से चट कर रही हैं । कोरल भित्तियां अनेको प्रकार से महत्वपूर्ण है । इनकी उपस्थिति से इनके नीचे पेट्रोलियम भण्डार होने के सूचना मिलती है । कुछ कोरल भित्तियां सजावटी उपयोग की होती है । कोरोलियम रुब्रम अति मूल्यवान कोरल है । भारत समेत अनेक देशों में यह महंगे रत्नों में शुमार किया गया है । कोरल भित्ति समुद्री तल के उतार-चढ़ाव को समझने में भी मदद करती है । ये तेल पर चिपककर समुद्री सतह तक ही वृद्धि करती है और जब कभी जल सतह ऊपर चढ़ती है तो रुकी हुई वृद्धि पुन: शुरु हो जाती है । इस प्रकार कोरल भित्ति में एक के ऊपर एक जमी हुई पॉलिपा की अलग-अलग पीढ़ियों की मदद से भित्ति के आयु निकाली गई है जिससे हिमयुग के बाद की अनेेक समुद्रीय व स्थलीय जानकारियां हासिल हुई हैं । ***

मंगलवार, 15 अप्रैल, 2008

७ आवरण कथा

विकल्पहीन नहीं है खेती
डॉ. आर.एस. धनोतिया
मजबूत अर्थव्यवस्था ही सर्वांगीण विकास का परिचायक है । या यों कहें मजबूत अर्थव्यवस्था एवं सर्वांगीण विकास एक दूसरे के पूरक ही हैं । मजबूत अर्थव्यवस्था के लिए अर्थशास्त्री एवं चिंतक अपने-अपने सुझाव एवं विकास का मॉडल प्रस्तुत करते रहे हैं । सरकारें उन पर अमल भी करती हैं और कुछ ही सालों में उस मॉडल के तथाकथित `विकास' हमारे सामने आने लगते हैं । विस्तार में जाने से पूर्व विवेकानंद के विचारों पर ध्यान देना समीचीन होगा, `नया भारत किसानों के हल, मजदूरों की भट्टी, झोपड़ियों, जंगलों, किसानों और मजदूरी से जन्म लेगा ।' किंतु वर्तमान में इसके विपरीत ही हो रहा है । किसानों के हल की जगह ट्रेक्टर ले रहे हैं, मजदूरों की भट्टी को बड़ी-बड़ी मशीनें विस्थापित कर रही है, जंगल नष्ट हो रहे हैं और मजदूर भूखे पेट सो रहे हैं। ऐसे में नया भारत कैसे जन्म लेगा ? हरे-भरे जंगल सीमेंट कांक्रीट के जंगलों में तब्दील हो रहे हैं । फूलों की महक का स्थान चिमनियों के धुएं एवं रसायनों की गंध ने ले लिया है । एकतरफा फसल उत्पादन की ओर भागता किसान न केवल फसल का उचित मूल्य प्राप्त् करने से चूक रहा है बल्कि अपना अस्तित्व ही मिटाता जा रहा है । बहुआयामी चुनौतियों का सामना करता ऋणग्रस्त किसान आखिर मनुष्य ही है । मुसीबत में वह बहुराष्ट्रीय कंपनियों के भुलावे में फंस जाता है । ऊपर से वोट बैंक की तरह भी उसका इस्तेमाल भी होता आया है । किसान इन परिस्थितियों में रेडिमेड कृषि संसाधनों जैसे रासायनिक खाद, तथाकथित उन्नत बीज, कीटनाशकों और यहां तक कि ग्रोथ प्रमोटर एवं अधिक उत्पादन दिलाने वाले कई उत्पादों के चक्कर में फंस जाता है, परिणाम हमारे सामने है । कृषि पर लागत अनाप-शनाप बढ़ती गई एवं कर्ज में डूबते किसान सामाजिक पारिवारिक जिल्लतों को न झेल पाने के कारण आत्महत्या जैसा जघन्य मानवीय अपराध करने लगे । देश को विकसित करने के लिए जरूरी है कि गांवों का भी विकास हो । देश को विकसित राष्ट्र की पंक्ति में खड़ा करने के हमारे प्रयासों का केन्द्र बिंदु ये गांव ही होने चाहिए । अधिकांश गांवों में मूलभूत सुविधांए उपलब्ध नहीं है । जंगलों के कट जाने तथ अत्यधिक कुपोषण के चलते आदिवासी तो पलायन कर गुलामों जैसा स्थिति में काम कररने पर मजबूर हैं लेकिन क्या गांवो को मूलभूत सुविधाएं जैसे पक्के मकान, पक्की सड़कें उपलब्ध करा देने मात्र से गा्रमीणो के जीवन स्तर में आमूल चूल परिवर्तन आना संभव है? समय-समय पर विचारक व चिंतक समस्याआें से रुबरु कराते हुए विकल्प भी प्रस्तुत करते हैं । किंतु यंे सब एकांगी या आंशिक विकास को प्रतिपादित करते हैं । सर्वप्रथम हमें विकास को देश, काल एवं परिस्थितियों के अनुरुप सही स्वरुप में परिभाषित करने की पुरजोर आवश्यकता है । हम जब तक एकात्म विकास को नही समझेंगे, स्वीकार नहीं करेंगे एवं अपनाएेंगे नहीं तब तक सर्वागीण विकास नही होगा । एकात्म विकास वस्तुत: सर्वागीण विकास ही है । ग्रामीण विकास पर आर्थिक विश्लेषकों, चिंतको, चिंतको, समाजिक कार्यकर्ताआें व राजनेताआें द्वारा अपने-अपने स्तर पर एवं समय-समय पर चिंतन प्रस्तुत किए गए । प्रथम हरित क्रांति का असर अब लगभग समाप्त् सा हो गया है और रासायनिक उर्वरकों के साथ कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग की वजह से हाल ही के वर्षो में भूमि की उर्वरा शक्ति अत्यधिक क्षीण होने से गेहूं उत्पादन और उत्पादकता दोनों में भारी कमी आ गई है। दूसरे हरित क्रंति के बीजों की तलाश शुरु हो गई है । सिंचित क्षेत्रों के साथ कृषि ऋणों का दायरा बढ़ाने पर भी जोर दिया जाने लगा है । कृषि ऋण ही तो किसान को पथभ्रष्ट कर रहे हैं और यें ही आत्महत्या के लिए उत्तरदायी भी हैं । बीटी कपास एंव बीटी धान की तरह ही गेहूं में भी ऐसा ही कोई प्रयोग करने की वकालत की जाने लगी है । किंतु बीटी प्रजाति अथवा जीएम प्रजाति से आसन्न खतरों की ओर या तो किसी का ध्यान नहीं जा रहा है या इस तरफ से जान बूझकर आँखें मूंद ली गई है । मर्ज कुछ और है और दवा कुछ और दी जा रही हैं । वस्तुत: इस विकराल समस्या का हल सिंचित कृषि क्षेत्र बढ़ाना, कृषि ऋण का दायरा बढ़ाना, बीटी प्रजाति, मेक्सिकन ड्वार्फ वेराईटी गेंहू अथवा रासायनिक उर्वरकों के चलन को बढ़ाना बिल्कुल नहीं है । ये सभी विकल्प तो इस समस्या को बढ़ाएेंगे ही । साथ ही इससे कभी न सुलझाने वाली समस्या का जन्म होगा । मेरे विचार से इस समस्या का एक हल है। नेच्युको कृषि । गेंहू की जिन प्रजातियों से हरित क्रांति संभव हुई है वह भरपूर पेट्रोलियम ऊर्जा, पानी, रासायनिक खाद एवं विद्युत आपूर्ति पर निभर है । एक बार में ही मिट्टी की समूची ऊर्जा का दोहन कर मिट्टी को निर्जीव बना डालने के बाद हमें यह सफलता प्राप्त् हुई है। हरित क्रंाति के चमत्कारिक परिणामों, मशीनीकरण एवं रासायनिक खेती से जितना आर्थिक लाभ किसान को मिला उससे कहीं अधिक उसने खोया है । इतना ही नहीं किसान ने इस दौरान अपनी संवेदनशीलता भी खोई है । कृषि को आत्मनिर्भर बनाने के लिए एक नए वैज्ञानिक चिंतन की आवश्यकता है जिसमें जीवन के मूलभूत सिद्धांतोंकी अवहेलना न हो । स्थायित्व देने वाली सदाबहार कृषि क्रांति की बात हम तभी कर सकते हैं जब किसानों का संसाधनों, ऊर्जा भंडारण एवं बाजार पर नियंत्रण हो और यह तभी संभव हो सकता है जब प्रोज्यूमर (उत्पादक - उपभोक्ता) सोसायटी अस्तित्व में आ जाए । प्रथम हरित क्रांति के चालीस साल बाद आज भारतीय खेती विचित्र संकट के दौर से गुजर रही है । हरित क्रांति के सभी व्यावहारिक उद्देश्य आज ध्वस्त हो चुके है । एक ओर किसानो द्वारा आत्महत्याआें का दौर जारी है वहीं योजनाकार और कृषि वैज्ञानिक दूसरी हरित क्रांति की नीव रखने में व्यस्त हैं । लेकिन यह नींव किस और कैसी जमीन पर रखी जा रही है ? नींव रखने के संसाधनों की रुपरेखा में वही तत्व निहित हैं जो प्रथम हरित क्रांति में थे । बल्कि वे तत्व अब ओैर अधिक विराट रुप में सामने आने वाले हैं । हमारे देश में एक ओर कृषि भूमि को बचांए रखना मुश्किल होता जा रहा है, वही सबसे बड़ी चुनौती यह है कि छोटे और सीमांत किसानों के लिए कृषि के कैसे ज्यादा से ज्यादा आकर्षक बनाया जाए ताकि उनका रुझान खेती की ओर बढ़े । भारत के संदर्भ मेंयह एक सर्वमान्य तथ्य है कि कृषि पर बाजार कभी हावी नहीं रहा । ऐसे में कृषि पर नियंत्रण हासिल करे के लिए जैव तकनीक का सहारा लिया गया । जैव तकनीक अब बहुत तेजी से कृषि का बाजारीकरण तो कर ही रही है परंतु अतिरिक्त चिंताजनक तथ्य यह है कि इससे संपूर्ण मानवता पर ही संकट छा रहा है । तथ्यों के विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि हमारी अर्थव्यवस्था के स्त्रोत एवं दृंढ़ स्तंभ कृषि एवं काश्तकार दोनों का ही अस्त्वि खतरे में है । हमारी कृषि एवं कृषि संस्कृति पर आधुनिक रासायनिक खेती का बहुराष्ट्रीय कंपनियों के माध्यम से जो हमला हुआ है, का सामना करने के लिए हमें बाहरी विशेषज्ञों की कतई आवश्यकता नहीं है । जो घातक तत्व इस हमले में सम्मिलित हो गए हैं उन्हें हम अपने स्तर पर ही नेच्युको कल्चर संस्कृति के विकास , सामग्री चेतना एवं जनजागृति के द्वारा बिना विशेष प्रयासों एंव निवेश के दूर कर सकते है। किसानों को बहुराष्ट्रीय कंपनियों के प्रलोभनों से बचकर रहने की आवश्यकता है । क्योंकि जब एक बार निर्जीव मिट्टी सजीव को जाएगी तो निश्चित है उत्पादन एवं उत्पादक्ता बढ़ने के साथ किसानो की समृद्धि भी बढ़ेगी ही । नेच्यूको कल्चर से न केवल रसायनोंपर होने वाला व्यय एवं ऊर्जा का अपव्यय बचेगा, बल्कि कई बहुआयामी लाभ, जैसे मानव स्वास्थ्य के लिए उत्तम कृषि उत्पाद, फल, सब्जियाँ आदि प्राप्त् होगी जिससे मानव में रोग प्रतिरोध क्षमता भी निश्चित ही बढ़ेगी । औषधियों पर खर्च में कमी आएगी साथ ही बायो एनर्जी का सदुपयोग मिट्टी की सजीवता के लिए संजीवनी सिद्ध होगा । इन सबसे सर्वोपरि कृषि लागत में कमी किसानों के लिए सुकून से जीने का सबब होगा । किसानों के पन में यह आशंका है कि इससे उत्पादन घट जायेगा । यदि हम इसे पूर्ण मनोयोग से करें तो यह आशंका निर्मूल सिद्ध होगी । यहां तक कि वर्तमान बोये जाने वाल रकबे से भी कम में हमारी खाद्य पूर्ति न हो सकती है । यह प्रश्न उठता है क्या इतना अधिक बिगाड़ हो जाने के बाद भी नेच्यूको कल्चर की कल्पना क्या प्रासंगिक एवं व्यवहारिक है ? उत्तर निश्चित ही हां में है । आवश्यकता है दृढ़ इच्छाशक्ति की । इस महायज्ञ में सामाजिक कार्यकर्ता, गैर सरकारी संगठन आगे आएं एवं सरकारी सहायता का मुंह न देखें । खेतो को ही प्रयोगशाला बना कर नूतन प्रयोगों से एक एकड़ जमीन से बोवाई के तीन से चार माह बाद ४० क्विंटल ज्वार या प्रतिवर्ष प्रति एकड़ १६ टन अंगूर का उत्पादन किसान कैसे लेंजैसे सफल प्रयोग करने की आवश्यकता है । ***