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बुधवार, 2 जुलाई, 2008

१२ कविता

आंगणे रो दरखत
छोगसिंह राजपुरोहित `पथिक'
आंगणे रो दरखत बूढ़ो व्है गयो,
पानड़ा खिर गया अर ठूंठ रेह गयो,
पण थे इणने काटो मत,
आ थारी ओळखाण है
फूलीया फळीया परवार री निसाण है ।
एक दिन ओ दरखतकांची कूंळी कूपल थी,
आंगणा री तुलसी
अर ओखद री जड़ी बूटी थी
घणा लाड़ कोड़ा सू उच्छैर्यो,
हालरीयो गायो थो,
काजळ, टीकी अर गोरबन्द
सघला रो टोटको ताण्यो थो,
रातां री नींद बिगाड़ी,
भूखा रैय इणने धंपायो,
तद ओ दरखत बण्यो
टेम रे सागे फूल फळ लागा,
डाला फूटा रूवाळा जागा,
बेलड़ीया लिपटी,
तितलिया फरूकी,
भंवरा री गंुजन,
गिरजड़ा री धमकार,
सावण री रिमझिम,
काळजो धूजावतो मावठो,
बळती लू री रणकार,
इण सघला रे पाछै,
मन मोवणो बसंत आयो,
फरज निभायोअर आसरो बण्यो,
सबरो आम
किणिरो नी खास
पण अबै अवस्था पाकी
गौरी चामड़ी व्है गी खाकी
बंद ढीला अर जड़ा कमजोर
कुदरत रे आगे चाले नी जोर ।
इण रूखड़ा को मरम
नि:स्वार्थ साधना बिन नी जाण सके
गैरी छाया रो महेत्तव
लू में पतीयोड़ा पथिक जाण सके,
जीवता माईतां रो कोई महेत्तव नी,
माईता रो महेत्तव तो
बिन माईत रे बाळ री
सूनी आख्यां ईज बता सके
पण चेतजा मानखा
थारी अर दरखत री सरखामणी एक है
तू चाल फिर सकेअर ओ अडिग है
ओ हळ हालरीयो वळो बणैला,
म्यांळ बण कणी रो भार झेलेला,
ओ आसी खूंटा रे काम
थू सोवेला खूंटी ताण
पण कुदरत सू मत जाजे उब
जुवानी में मत जाजे डूब
आगे पाछे रो ध्यान कर
थारो कांई होवेला जतन कर
काया रो मद
अर माया रो घमण्ड
दौन्यू उतर जावेला
`पथिक' थूं याद राख,
रूखड़ा अर माईत सरीखा है
भले बूढ़ा व्है जावे तो
गरड़ा गहरणा सरीखा है । ***

मंगलवार, 3 जून, 2008

१२ कविता

इस मिट्टी का कर्ज चुकाये
किशोर पारीक



हर बेटे से हर बेटी से, मेरा एक सवाल है,
इस मिट्टी का कर्ज चुकायें, वो ही मां का लाल है ।
छेद हुआ ओजोन परत में, वह जमीन को भारी है,
अंबर से भू पर तेजाबी, बरखा की तैयार है ।
कोई गन्दे नालों से, मां गंगा दूषित करता है,
चिमनी के धुएं से कोई, गगन कलुषित करती है ।
श्याम चिरैया, सोन चिरैया, ना गौरेया गाती है,
अमराई सूनी उदास है, कोयल ना इठलाती है ।
तिनका तिनका चुनकर पंछी बेमन नीड़ बनाते है,
फूलों के बिन तितली मधुकर, सब गुमसुम हो जाते हैं।
मन मोहक झरने केवल अब, चित्रों में बच पाये हैं,
मानव से स्वार्थ के खातिर, जंगल भी कटवाये हैं ।
नदिया कूप बावड़ी सूने, पानी गया पातालों में,
मीलों से जल लाती वधू के चरण भरे है छालों में ।
इस पीड़ा को कोई ना जाने, यही किशोर मलाल है,
आँखें खोलेगा जो जग की, सोई मां का लाल है ।
मौसम हमसे रूठ गये हैं तापमान भी ज्यादा है,
और सुनामी बाढ़े आने को, कितनी आमादा है ।
आये दिन अति वृष्टि कहीं तो, पड़ता कहीं अकाल है,
इस मिट्टी का कर्ज चुकाये, वो ही मां का लालहै।
पेड़ झाड़ियां ढूंढ बेलड़ी, गली सूखे सब कटते,
अपने अपने रूतबे माफिक, ऊपर तक हिस्से बँटते ।
कानन का आनन मुरझाया, ना चुग्गा है ना पानी,
गिद्ध हो गया गुम, बहुत सी नसलें, भी है गुम जानी ।
भूल गये तुम खेजड़ली की अदभुद सी कुरबानी को,
शीश कटा कर पेड़ बचाया, ऐसी अदभुद रानी को ।
मूक जानवर किससे बोलें अपने मन की लाचारी,
सलमान सरीखे भोले चेहरे उन पर पड़ते है भारी ।
कहां गई गोड़ावन अपनी, केहरी हुवा हलाल है,
इस संकट से हमें बचाए कोई मां को लाल है ।
हर बेटे से हर बेटी से, मेरा एक सवाल है,
इस मिट्टी का कर्ज चुकाये, वो ही मां का लाल है ।
* * *

बुधवार, 21 मई, 2008

९ कविता

पर्यावरण विकास मंत्र
नागेन्द्र दत्त शर्मा
खाली जमीन पर हर जगह पेड़ लगाते चलो ।
पर्यावरण को प्रदूषण से यूंही बचाते चलो ।।
जहां पर भी मिले तुम्हें कहीं भी नग्न धरती ।
वहां जलवायु के हिसाब से पेड़ लगाते चलो ।।
जड़े वृक्षों की रोकती है, पानी-मिट्टी वर्षात में ।
इसलिये नियमित रूप से वृक्ष लगाते चलो ।।
पेड़ हैं जंगल में जो, केवल सूखे और उखड़े ।
उनको नियम से कटाकर, काम में लाते चलो ।।
पहले करते थे लोग, श्रमदान से वृक्षारोपण ।
अब तुम भी इस नियम को, अपनाते चलो ।।
जंगल में न करो, भूलकर भी कभी `स्मोकिंग' ।
लगे कभी आग तो मिलकर इसे बुझाते चलो ।।
कारखानों से निकलने वाले प्रदूषित जल को ।
नदी के पेयजल से अलग करके बहाते चलो ।।
कारखाने होने चाहिए सदा आबादी से बाहर ।
सभी लोगों को प्रेम से ये संदेश देते चलो ।।
खेती में रसायनों का प्रयोग हो पूरी तरह बंद ।
कुदरती खाद से फसलें हमेशा उगाते चलो ।।
जहां पर मिले प्लास्टिक का कचरा कहीं भी ।
ऐसे कचरे को पूरा उस जगह से हटाते चलो ।।
कोशिश हो न छोड़े वाहन तुम्हारा ज्यादा धुंआ ।
नहीं तो, वाहन की ट्यूनिंग सही कराते चलो ।।
जुड़े लोग तुम्हें देख कर, पर्यावरण -विकास में ।
कुछ ऐसी जानदार रिवायत ``नागेन्द्र'' बनाते चलो ।।
भावी पीढ़ी भी समझे पर्यावरण की भरपूर महत्ता ।
कर शिक्षित उसे पर्यावरण विकास मंत्र पढ़ाते चलो ।।
* * *

मंगलवार, 15 अप्रैल, 2008

११ कविता

वृक्ष बोलते हैं

प्रेम वल्लभ पुरोहित

`राही' वृक्ष बोेलते हैं

इतिहास रचा है इन्हांने

माँ कहती-कहती थक गयी

कि जन्म से मरण तक का

साथ रहा है

रहता है

मनुष्य से इनका ।

नाता ऐसा जुड़ा है

फिर भी नातेदार

थमाली कुल्हाड़ी से काटता है इन्हें

जन्म से आजीवन तक की सेवा

क्या-क्या कहें

अपने मुख से अपनी बड़ाई

अच्छी लगती नहीं

मृत्यु के दिन भी

घाट तक की यात्रा मेंे साथ रहते हैं

वृक्ष (लकड़िया)

यही नहीं -

पंचतात्विक शरीर को

भस्मकर मुक्ति देते हैं

स्वर्ग देते हैं ये वृक्ष

ऐसा नाता

जीवन मरण तक

साथ निभाता है जो विस्मयकारी है ।

मानव,

धरती माता को नग्न न रहने दो

लहलहाते हरित वृक्षों से करते श्रृंगार

धरती माता का ।***

सोमवार, 14 अप्रैल, 2008

८ कविता

बाबा आमटे की
कविताएंजब आ रही है लौटने की
मैंने नर्मदा से उत्कट प्रेम किया
उसने मुझे लपक कर भींच लिया
और बना लिया अपना
उसे छूकर आती वायु- लहरी
मेरे आकुल उर को बंधाती है ढाढस
उसके प्रवाह में सुर है मेरे जीव का
ताल है, बेसुधी है मेरी और उन्माद
तट पर उसके मैंने देखा है
धरा और व्योम का आलिंगन
यही, करते हुए सुखद सुधियों का पारायण
बना है मेरा और उसका संवाद
जैसे शिशु कोई छोड़ता है मां की गोद
अनिच्छा और अपरिभाषित कृतज्ञता
के साथ नर्मदा से लूंगा
मैं विदा, भारी मन
एक कुम्हलाते फूल का उच्छ्वास
मैं सतासी का हँू
एक रीढ़हीन व्यक्ति जो बैठ नहीं पाता
मुरझा रहा हँू मैं पंखुरी-ब-पंखुरी
लेकिन, क्या तुम नहीं देखते
मेरा रक्तस्त्रावी पराग ?
मैं निश्चयी हूंू, मगर ईश्वर मदद करे मेरी
कि रत रहा आऊं मैं गहरी हमदर्दी में
जो आदिवासियों की बेहाली से है
वंचित विपन्न आदिवासियों की व्यथा का
किसी भी सत्ता द्वारा अपमान
अश्लील है, और अमानवीय सतासी पर
उम्र मुझे बांधे है दासतो में
मैं पा चुका हँू असह्य आमंत्रण अपने
आखिरी सफर का
फिर भी मैं डटा हूं !
पाठकों, मत लगाआें अवरोधक अपने
आवेग पर
कोई नहीं विजेता
सब के सब आहत हैं, आहत !
एक फूल की इस आह को कान दो !!

सोमवार, 11 फ़रवरी, 2008

१२ कविता

`प्रकृति एवं पर्यावरण पर हाइकु'
राजीव नामदेव `राना लिधौरी'
पर्यावरण,
की उथल-पुथल ।
महा विनाश ।।
जल के स्त्रोत,

जंगल औ बादल ।
जीवन ज्योति ।।
साफ जंगल,

नदिया प्रदूषित ।
कैसे मंगल ।।
जीवन दवा,

जल,जमीन, हवा ।
बिकने लगी ।।
टेढ़ी नज़र,

जब प्रकृति की होती ।
सब रोते हैं ।।
जाड़े के दिन,
ये कुनकुनी धूप ।
हमें सुहाती ।।
फागुन आया,

फूली है कचनार ।
आम बौराया ।।
आकाश पाना,

चाहता हँू मैं तो हँू,
धरा की धूल ।।
उड़ान भरी,

कि आसमां छू ले देखा ।
जमीं अंदर ।।
जीवन यात्रा,

अहसास की राहें ।
पथरीली है ।।
***

शनिवार, 12 जनवरी, 2008

११ कविता

वनों में वसन्त
गिरधारी लाल मौर्य
आली री वसुन्धरा के वसन बसन्ती भये,
फूले तरू पात प्रीत लेली अगड़ाई है ।
गन्ध मकरन्द मिले पौन पुरूवाई चले,
कानन में मुध, ऋतु आज मुसकाई है ।
लाल-लाल टेसू फूले भृंग डाल-डाल झूले,
अम्बर में इन्द्र-चाप मानो उगि आई है ।
महुआ मदाये आम मञ्जरी गादाये सखि,
ऐसेहँू में आली `गिरधारी' सुधि आई है ।।
फूले हैं रसाल, ताल विकसे जलज वृन्द,
मन्द-मन्द मारूत अजीर में डोलै लगी ।
कुञ्ज-वन-बागन में आयो ऋतुराज सखि,
सौरभ समीर अंग-अंग में चलै लगी ।
कली मुसुकाये इतराये अली डाल-डाल
पातन छिपाये पिक राग में बोलै लगी ।
ढोल और मृदंग तान, नाहीं देत बनै कान,
`गिरधारी' फागुनी-बयार है चलै लगी ।।
दारू से सदन, तृन-पात से वसन मञ्जु,
फल-फूल मूल जन-जन को लुटाती हो ।
व्याधि जो असाधि वसुधा को कहँु घेरती जो,
मूरि बन मातु सन्जीवनी पिलाती हो ।
तीन गुन प्राकृत में कौतुकी कृपा है तेरी,
प्राण-वायु देके जीव-जन्तु को जिलाती हो ।
कहें गिरधारी, धन्य धन्य है तुम्हारी दृष्टि
सृष्टि से अनिष्ट वनदेवी तँू मिटाती हो ।।
* * *

शनिवार, 15 दिसंबर, 2007

७ कविता

बोधिसत्व
डॉ. किशोरीलाल व्यास
वासंती पातों के
यौवन भरे रहित रूधिर-सा
ऊर्जा-पूरित, जिजीविषा के उत्स-सा
पत्ते-पत्ते की धमनियों में
मैं बहना चाहता हँू ।
सूरज की संजीवनी ऊर्जा को
मेरे अन्तस्थल में
हरे वृक्षों की तरह समेट लँू
ऊपर से तपूँ
भीतर से धरा से जुड़ जाऊं
रूप-रस-गंध का
आत्मीयता से युक्त-पय
मेरी माता से
कण-कण पाऊं
मृत-मृत्तिका से
प्राण-मय हो जाऊं ।
जुड़ जाऊं सारे चर-अचर से
पर्वतों से, काननों से
झर झर झरते झरनों से
सरसराती गंध पगी मलय पवनों से
नील-उन्मुक्त गगन से
पशु-पक्षियों से,
कण-कण से,
क्षण-क्षण से
और अद्वैत हो जाऊं ।
पेड़ों का मौन-प्रणव-नाद
गुंजायमान हो मेरी चेतना में
अनहद - नाद-सा
ओर मैं बोधिसत्व हो जाऊं !

गुरुवार, 8 नवंबर, 2007

११ कविता

जल है एक उपहार
राधेलाल `नवचक्र'
जल है तो जीवन सखा, वरना मृत्यु समान,
कितने दिन टिक सकोगे, बिन इसके श्रीमान ।
मंडरा रहा है भूपर, जल संकट सुबह शाम,
ऐसी नौबत क्यों आई, कुछ तो कह गुलफाम ।
क्या नहीं मालूम तुझे, जल है एक उपहार,
दिया है प्रकृति ने हमें, किया बड़ा उपकार ।
कभी सचेत नहीं रहे, हरदम लापरवाह,
इसीलिए आया संकट, अब क्यों करते आह,
की प्रकृति से छेड़-छाड़, होना था गुमराह ।
संकट और घिरा जल का, नहीं सूझती राह,
जल संरक्षण हेतु हमने, तनिक न दिया ध्यान ।
ना अचरज कुछ भी जरा, जल बिन निकले प्राण,
गलती अपनी मानकर, करें उसका सुधार ।
बिगड़ी बात बन सकती, बचा यही आधार,
हम अपने दायित्व को, कभी न भूलें यार ।
जल की महत्ता को समझ, कर उससे भी प्यार,
जा देख नई टिहरी, कैसेलड़ते लोग ।
पानी के बाल्टियां, झगड़ा करते लोग,
ऐसा भी था समय कभी, टिहरी के ही लोग,
सुबह भागीरथी में नहा, रहते मुक्त हो रोग ।
कैसा दुर्दिन आएगा, सब मिल करो विचार,
निज कंपनी के हाथों, चली जाए जल धार ।
लगा बिकने पानी अब, बन कंपनी कसाई,
कैसा समय आया है, सोचो सब मिल भाई ।
***

शुक्रवार, 7 सितंबर, 2007

१० कविता

तृिप्त् देता जल
डॉ.वी.पी.शर्मा/पंकज प्रसून
सागर में गहरे भूतल में,
क्षितिज मेघ में पलता है ।
जीव जगत को तृिप्त् देता,
जल कलयुग में जलता है ।।

सोच रहे द्वापर के मोहन,
मानव क्यूँ करता जल दोहन ।
जल जीवन की दे दो दीक्षा,
विद्यालय में हो जल-शिक्षा ।

मत खोलो नल रोको अपव्यय,
हर घर में होवे जल संचय ।
मरे मवेशी हुए पलायन,
तालाबों में बढ़ते आयन ।

क्लोरीनेशन, अधिशोषण से,
भूजल शोधन चलता है ।

जिनसे जल-विषधारा निकली,
चीनी, कागज, कपड़ा, बिजली ।
उड़न राख फैला सिलिकोसिस,
हुआ असाध्य आज फलुओरोसिस ।

रसायन मीलों से रिसता,
विक्षिप्त् होती जैव विविधता ।
पानी फेंक मनुज सुख पाता,
भू-जल स्तर स्तर नीचे जाता ।

मानव यह व्यवहार तुम्हारा,
मानवता को खलता है ।
शहरीकरण बढ़ा संदूषण,
अकार्बन, कार्बनिक प्रदूषण ।
जल-जीवों को नित प्रति क्षरती,
जब इसमें बीओडी बढ़ती ।

जल में कुछ मेटल भी मिलते,
उपापचय को प्रभावित करते ।
इनसे खतरे में जल का अणु,
जीवाणु फंगस वीषाणु ।

मानव जनित प्रदूषण,
प्रकृति के अवयव को छलता है ।

महसूस करें जल-पीड़ा,
मिलकर आज उठायें बीड़ा ।
वन उन्मूलन यदि रूक जाये,
जल संरक्षण खुद हो जाये ।

अब हो नव संकल्प हमारा,
आओ बदलें अपना नारा ।
गर जल है जीवन मुसकाये,
जल जाये तो जीवन जाये ।

जाने क्यँू अभियान हमारा,
धीरे धीरे चलता है ।
जीव जगत को तृिप्त् देता,
जल कलयुग में जलता है ।।

***

सोमवार, 20 अगस्त, 2007

१० कविता

मेरा देश जल रहा, कोई नहीं बुझानेवाला
डॉ. शिवमंगल सिंह
सुमनघर-आंगन सब में आग लग रही ।
सुलग रहे वन -उपवन,
दर दीवारें चटख रही हैं
जलते छप्पर- छाजन ।
तन जलता है , मन जलता है
जलता जन-धन-जीवन,
एक नहीं जलते सदियों से
जकड़े गर्हित बंधन ।
दूर बैठकर ताप रहा है, आग लगानेवाला,
मेरा देश जल रहा, कोई नहीं बुझानेवाला।
भाई की गर्दन पर
भाई का तन गया दुधारा
सब झगड़े की जड़ है
पुरखों के घर का बँटवारा
एक अकड़कर कहता
अपने मन का हक ले लेंगें,
और दूसरा कहता तिल
भर भूमि न बँटने देंगें ।
पंच बना बैठा है घर में,
फूट डालनेवाला,
मेरा देश जल रहा,
कोई नहीं बुझानेवाला ।

दोनों के नेतागण बनते
अधिकारों के हामी,
किंतु एक दिन को भी
हमको अखरी नहीं गुलामी ।
दानों को मोहताज हो गए
दर-दर बने भिखारी,
भूख, अकाल, महामारी से
दोनों की लाचारी ।
आज धार्मिक बना,
धर्म का नाम मिटानेवाला
मेरा देश जल रहा,
कोई नहीं बुझानेवाला ।

होकर बड़े लड़ेंगें यों
यदि कहीं जान मैं लेती,
कुल-कलंक-संतान
सौर में गला घोंट मैं देती ।
लोग निपूती कहते पर
यह दिन न देखना पड़ता,
मैं न बंधनों में सड़ती
छाती में शूल न गढ़ता ।
बैठी यही बिसूर रही माँ,
नीचों ने घर घाला,
मेरा देश जल रहा,
कोई नहीं बुझानेवाला ।

भगतसिंह, अशफाक,
लालमोहन, गणेश बलिदानी,
सोच रहें होंगें, हम सबकी
व्यर्थ गई कुरबानी
जिस धरती को तन की
देकर खाद खून से सींचा ,
अंकुर लेते समय उसी पर
किसने जहर उलीचा ।
हरी भरी खेती पर ओले गिरे,
पड़ गया पाला,
मेरा देश जल रहा,
कोई नहीं बुझानेवाला ।

जब भूखा बंगाल,
तड़पमर गया ठोककर किस्मत,
बीच हाट में बिकी
तुम्हारी माँ - बहनों की अस्मत।
जब कुत्तों की मौत मर गए
बिलख-बिलख नर-नारी ,
कहाँ कई थी भाग उस समय
मरदानगी तुम्हारी ।
तब अन्यायी का गढ़ तुमने
क्यों न चूर कर डाला,
मेरा देश जल रहा,
कोई नहीं बुझानेवाला।
पुरखों का अभिमान तुम्हारा
और वीरता देखी,
राम - मुहम्मद की संतानों !
व्यर्थ न मारो शेखी ।
सर्वनाश की लपटों में
सुख-शांति झोंकनेवालों !
भोले बच्चें, अबलाआे के
छुरा भोंकनेवालों !
ऐसी बर्बरता का
इतिहासों में नहीं हवाला,
मेरा देश जल रहा,
कोई नहीं बुझानेवाला ।

घर-घर माँ की कलख
पिता की आह, बहन का कंरदन,
हाय , दूधमुँहे बच्च्े भी
हो गए तुम्हारे दुश्मन ?
इस दिन की खातिर ही थी
शमशीर तुम्हारी प्यासी ?
मुँह दिखलाने योग्य कहीं भी
रहे न भारतवासी।
हँसते हैं सब देख गुलामों का यह ढंग निराला ।
मेरा देश जल रहा,
कोई नहीं बुझानेवाला।
जाति-धर्म गृह-हीन
युगों का नंगा-भूखा-प्यासा,
आज सर्वहारा तू ही है
एक हमारी आशा ।
ये छल छंद शोषकों के हैं
कुत्सित, ओछे, गंदे,
तेरा खून चूसने को ही
ये दंगों के फंदे ।
तेरा एका गुमराहों को
राह दिखानेवाला ,
मेरा देश जल रहा,
कोई नहीं बुझानेवाला ।

शनिवार, 21 जुलाई, 2007

१२ कविता

१२ कविता
जल
कुंवर कुसुमेश
विषमय हो जा रहा, सरिताआं का नीर ।
लेकिन सुनता नहीं, कोई इनकी पीर ।।

नदियां पर्वत की बहें, हर पल सिल्ट समेट ।
यहां सिल्ट का अर्थ है, पत्थर, बजरी, रेत ।।

यही सिल्ट मैदान में, बाधित करे बहाव ।
दूषित जल का मुख्य है, कारण जल ठहराव ।।

दूषित जल से यदि मरे, नित्य समुद्री जीव ।
पूरे पर्यावरण की, हिल जायेगी नींव ।।

झीलों, नदियों, सागरों, का लेकर आकार ।
इकहत्तर प्रतिशत दिखे, भू पर जल-विस्तार ।।

धरती से जल वाष्प बन, चले गगन की ओर ।
फिर वर्षा के रूप में, छुए धरा का छोर ।।

कहीं पड़ा सूखा कभी, कहीं आ गई बाढ़ ।
ज़रा सोचिए प्रकृति क्यों, करती ये खिलवाड़ ।

भारी वर्षा तो कहीं, भीषण है तूफान ।
अरबों की सम्पत्ति को, पहुंचाये नुकसान ।।

जलाभाव से मच रहा, चहुं दिशि हाहाकार ।
लगातार घटने लगा, भू का जल भंडार ।।

* * *

मंगलवार, 26 जून, 2007

१२ कविता

१२ कविता
प्रार्थना के स्वर
शिवकुमार दीक्षित
अब वहाँ,
कुल जमा चार ही पेड थे
एम नीम, एक पीपल,
एक आम, एक बरगद ।
मैंने पूछा - तुम्हें भनक हैं ?
वे आ रहे हैं,
लपक कर तुम्हारी ही ओर
और चन्द मिनटों में तुम सब भी
नाम शेष रह जाओगे ?
कैसे करोगे उनका मुकाबला ?
भाग जाओगे ?, हल्ला मचाओगे ?
किसी थाने में जाओगे ?
नेताजी की अगुवाई में जुलूस बनाओगे ?
नारे लगाओगे ?,नगर बन्द करवाओगे ?
नीम बोला - नहीं, नहीं,
मैं ऐसा कुछ नहीं करूंगा,
मुझे मत भगाओ,
मैं तो अश्विनी हँू उनका,
अपने लिए नहीं, उन्हीं के लिए जीता हँू,
पल-पल उन्हीं की राह तकता हँू ।
फिर भी वे मुझे न चाहें, न चाहें,
वे स्वतंत्र हैं ।
पीपल बोला - मुझे भी मत उकसाओ,
उनके खिलाफ खडा हो जाने वाला खूनमेरी रंगों में नहीं है ।
मैं भी नीम का समर्थन करता हँू ।
जीवन हँू उनका, उन्हीं के लिए जीता हँू
मरते दम तक हर श्वास,उन्हीं के लिए भरता हँू ।
आम बोला - मुझे भी मत बहकाओ,बसन्त को नोतने जाना,
कोयल की तान सुनाना,मेरा फलना और गदराना,
सब उन्हीं के लिए हैं ।
उनकी राजी में, मेरी भी राजी है ।
बरगद बोला - मुझे भी मत फिसलाओ,
सभी की शोभा धर्म का धुरन्धर,
अक्षय, प्रेम से लबालब ज्ञानी हँू मैं ।
मेरी यह सबल काया,
सभी को लुभाती सघन छाया,
सब उन्हीं की है ।
वे जो भी करेंगे, मुझे मन्जूर है ।
थोडी देर बाद, मर्मान्तक आघातों के बीच,
उनकी समवेत प्रार्थना के अंतिम स्वर सुनाई दिये,
हे परम पिता ! इन्हें क्षमा करना,
ये नहीं जानते, ये क्या कर रहे हैं ।
और हो सके तो, ऐसा कुछ करना,
ऐसा कुछ करना, कि ये बिना अश्विनी,
बिना जीवन, बिना बसन्त, बिना ज्ञान,
और हम सबकी पोषक, त्रिविध ताप की शोषक,
बिना वर्षा के भी जिन्दा रह सके,जिन्दा रह सके !
आमीन !
***

शनिवार, 31 मार्च, 2007

कविता

9 कविता