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मंगलवार, 15 अप्रैल, 2008

४ जनजीवन

नर्मदा घाटी में विस्थापन और पुनर्वास
रामास्वामी अय्यर
मेरी स्मृति में सन् १९५० की एक फिल्म `विनस्लो बाय' में राबर्ट डोनाट द्वारा ब्रिटिश न्याय इतिहास के गुंजायमान शब्द `उचित को होने दिया जाए' अभी तक प्रतिध्वनित होती रहते हैं । १० मार्च ०८ को मैं सर्वोच्च् न्यायालय में बैठा सुनवाई की लम्बी श्रृंखला में अपने कानो पर जोर देकर वहां के वातावरण में फैले शब्दों को पहचानने का प्रयास कर रहा था । मैं बहुत ही मुश्किल से हल्का-सा कुछ सुन पा रहा था । हालांकि न्यायालय न केवल बहुत ही प्रभावित कर रहा था बल्कि इससे मुझे विस्मयकारी प्रेरणा भी मिल रही थीं और मैं इस पर गर्व महससू कर रहा था कि मैं भारत के उच्च्तम न्यायालय में बैठा हँू । इसी के साथ मैं बहुत ही परेशानी का अनुभव करते हुए एवं हतोत्साहित होते हुए स्पष्ट तौर यह नहीं सोच पा रहा था कि कहां पर क्या गलत है । उस दिन न्यायालय के सामने नर्मदा घाटी में पुनर्वास के मोर्चे पर असफलता की दर्दनाक कहानी थी । याचिकाकर्ता कई बातों की ओर ध्यान आकर्षित कर रहे थे, जैसे कि बांध की पूर्व निर्मित ऊँचाई पर भी अभी तक पुनर्वास नहीं हुआ है । बिना पूर्व निपटारा किए विस्थापितों की संख्या में बढ़ोत्तरी, तथाकथित विशेष पुनर्वास पैकेज या एस.आर.पी. यानि भूमि के बदले नकद की अवैधानिक व बाध्यता हेतु बलप्रयोग की चर्चा जिसके अंतर्गत परियोजना प्रभावित परिवारों (पी.ए.एफ.) से कहा गया कि वे एस.आर.पी. के अंतर्गत सरकारी बंजर भूमि, असिंचित भूमि और नकद मेंसे चुनाव करें, इतना ही नहीं योजना का भ्रष्टाचार व नकली पंजीकरण से अनिष्टकारी होना, आदिवासी समुदाय से छलकपट, आदि-आदि । यह याचिका संविधान के अनुच्छेद-२१ के अंतर्गत प्रदत्त न्याय और मौलिक अधिकारों की प्रािप्त् हेतु दायर की गई थी । इसके पूर्व ८ जुलाई ०६ को प्रधानमंत्री ने अपनी पूरी सद्इच्छा से शुंगलू समिति की रिपोर्ट में पुनर्वास की स्थिति को तथ्यात्मक रूप से ठीक मानते हुए इस सद्इच्छा से वशीभूत होकर आगे की कार्यवाही की ओर संभवत: यह सोचते हुए कदम बढ़ाया था कि जो कुछ बाकी रह गया है वह मानसून के अगले उन तीन महीनों में पूरा कर लिया जाएगा, जिस दौरान परियोजना का निर्माण कार्य निलंबित रहता है । प्रधानमंत्री को दी गई जानकारियां त्रुटिपूर्ण थीं । थोड़े ही समय में यह स्पष्ट हो गया कि शुंगलू कमेटी की रिपोर्ट बुरी तरह से दोषपूर्ण है । इसमें कुछ सच तो है परंतु गलतियों की भी भरमार है । जहां तक पुनर्वास में पिछड़ने की बात है तो इस संदर्भ में यही कहा जा सकता है कि यहां इस मसले को तीन महीने में निपटाने की बात कही जा रही थी वहां दो साल बाद भी इसका निपटारा तो नहीं हुआ है बल्कि संभवत: इसमें वृद्धि ही हुई है । यहां तक तर्क दिया जा सकता है कि इस संबंध में दो विचार हैं, एक है याचिकाकर्ता का । यह पक्ष कहता है कि पुनर्वास का कार्य स्तरहीन और अधूरा है। वहीं दूसरा पक्ष मध्यप्रदेश सरकार का है, जो कहता है कि यह कार्य पूर्ण हो चुका है । अतएव न्यायालय के लिए यह तय कर पाना आसान नहीं है कि दोनों में से कौन सही है । वैसे इस संबंध में कुछ स्वतंत्र रिपोर्ट भी हैं । २००६ में ही जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, काउंसिल फार सोशल स्टडीज एवं कुछ अन्य संस्थानों के बुद्धिजीवियों के एक जांच दल ने अध्ययन के बाद जो रिपोर्ट दी थी उसमें और शुंगलू रिपोर्ट में काफी विसंगतियां पाई गई थीं । हाल ही में अन्ना हजारे, अरविंद केजरीवाल, स्वामी अग्निवेश व अन्य द्वारा जारी रिपोर्ट के बारे में कम से कम इतना तो कहा ही जा सकता है कि ये अत्यधिक विचलित करती हैं । अब कहीं पुनर्वास की स्थिति को लेकर कोई विवाद है तो वह केवल उसकी असफलता की सीमा को लेकर है एवं संख्या को लेकर है । इस मामले को संबंधित ग्राम सभाआें के माध्मय से सुलझाया जा सकता है और इसे इसी माध्यम से ही अनिवार्य रूप से सुलझाया भी जाना चाहिए । इसे चाहे जैसे समझा जाए पर दो बातें एकदम स्पष्ट है कि पुनर्वास का कार्य बुरी तरह से पिछड़ा हुआ है एवं एस.आर.पी. जैसी पूरक व्यवस्था ट्रिब्यूनल के फैसले और सर्वोच्च् न्यायालय के स्वयं के पूर्व फैसलेे से विचलन है । यह एक गैर कानूनी कार्य है जिस हेतु न तो कोई प्रयत्न ही किया जाना चाहिए था ना ही उसे प्रोत्साहित किया जाना था । ऐसे में क्या किया जाना चाहिए? सर्वप्रथम इससे संबंधित सरकारों को यह मानना होगा कि सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है । साथ ही यह कि अधिकारों का (विस्थापितों के) उल्लंघन हुआ है एवं ट्रिब्यूनल के अवार्ड एवं न्यायिक आदेशों के पालन में भी चूक हुई है । दूसरा, सरकारों को इन गलतियों को ठीक करना होगा । संक्षेप में कहें जो आगे का निर्माण कार्य प्रारंभ होने के पूर्व पहले की सभी गड़बड़ियों को दूर कर लिया जाए । जब तक पूर्व का बकाया पुनर्वास पूर्ण रूप से न हो जाए तब तक डूब क्षेत्र में व विस्थापन में कोई वृद्धि न की जाए । हालांकि न्यायालय में हमने जो कुछ सुना उसमें इस तरह की भावना परिलिक्षित नहीं हो रही थी । वहां की फिजां में क्लांति, अधीरता और चिड़चिड़ाहट का आभास हो रहा था । यह भावना भी उभर रही थी कि पुनरावर्ती हो रही है एवं यही सब कुछ बार-बार कहा जा चुका है । परंतु न्यायालय में बिंदुआें की पुनरावर्ती से यह साफ-साफ नजर आ रहा है कि जमीनी हकीकत यही है कि अभी भी गलत हो रहा है । ये सर्वोच्च् न्यायालय में न्याय की आकांक्षा के लिए आए हैं । शासकीय अधिवक्ता द्वारा अपीलकर्ताआें के प्रति की गई टिप्पणी कि ये तो लगातार एक ही बिंदु पर `राग अलापते' रहते हैं एवं `विकास' के रास्ते में रोड़ा बनकर खड़े हैं, सरकार की अधीरता ही दिखाई है । ऐसा मालूम पड़ रहा है कि न्यायमूर्ति भी इस मामले को निपटाने हेतु चिंतित हैं । वे भी न्याय व अधिकारों संबंधित अमूर्त अनुनय विनय से अधीर हो चुके है और सहज ही यह पूछने लगे हैं कि इस गतिरोध को ताे़डने के लिए आपके पास क्या व्यावहारिक समाधान है ? सुनने में यह बहुत ही यथोचित जान पड़ता है । परंतु वास्तव में क्या यह उन परियोजना प्रभावित परिवारों जिनमें से अधिकांश आदिवासी हैं और जो इस भूमि की सबसे बड़ी अदालत में न्याय व अधिकारों के लिए आए हैं के प्रति समुचित विचार का क्या कोई निष्कर्ष नहीं निकलेगा ? क्या उच्च्तम न्यायालय की मुख्य आकांक्षा बजाय न्याय देने के लिए समस्या की व्यावहारिक निष्पत्ति है ? इस अवसर पर कोई अंतिम निर्णय पारित नहीं किया गया । मध्यप्रदेश सरकार से एक रिपोर्ट मांगी गई है और मसला अंतिम सुनवाई के लिए आगे बढ़ा दिया गया है । अपीलकर्ता की न्याय के प्रति उम्मीद अभी भी देदीप्यमान है । हालांकि प्रक्रिया की मुख्य उद्विग्नता न्याय पर अवलम्बित उम्मीद है न कि व्यावहारिकता । ***

सोमवार, 11 फ़रवरी, 2008

५ जन जीवनवन

अधिकार कानून : अभी तो अंगड़ाई है
राजु कुमार
एक लंबे अंतराल के बाद आखिरकार केन्द्र सरकार को इस बात की चिंता हुई कि आदिवासियों एवं अन्य जंगलवासियों के साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय से उन्हें मुक्ति दिलाने और जंगल पर उनके अधिकरों को मान्यता देने के लिए संसद ने दिसम्बर, २००६ में जिस कानून अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, २००६ का पारित कर दिया था, उसे अंतत: लागू कर दिया जाए। १ जनवरी २००८ से यह कानून लागू हो गया है । निश्चय ही यह कहा जा सकता है कि पीढ़ियों से अपने अधिकारों के लिए संघर्षरत जंगल में निवासरत समुदाय को कानूनी रुप मे पहली बार कुछ हासिल हुआ है । इस तरह देखा जाए तो आदिवासियों एवं अन्य जंगलवासियों को यह आस जगी है कि अब उन्हें न सिर्फ वन विभाग और वन माफिया के अत्याचारोंसे मुक्ति मिलेगी बल्कि वे जंगल का उपयोग भी अपने जीविकोपार्जन के लिए कर सकेंगे । कानून के लागु हो जाने के बाद भी कई ऐसी बातें हैं, जिस पर बहस चलाए जाने की जरुरत है । सबसे बड़ी बात तो यह है कि क्या वास्तव में सरकार की यह मंशा रही है कि आदिवासियों एवं अन्य जंगलवासियों को जंगल पर अधिकार मिल जाएं ? या फिर विभिन्न दबावों के कारण सरकार ने इस कानून के मार्फत बीच का रास्ता निकालने का प्रयास किया है ? जंगल में रहने वालों और उस पर आश्रितों को लगभग पिछली दो सदियों से बड़े पैमाने पर अत्याचारों का सामना करना पड़ा है । जंगल के संसाधनों का दोहन कानूनी और गैर कानूनी रुप से सैकड़ो सालों से होता रहा है । यह दोहन तथाकथित मुख्यधारा के लोग करते रहे हैं और खमियाजा आदिवासियों एवं अन्य जंगलवासियों को भुगतान पड़ता रहा है । हालात कुछ ऐसे हुए कि विकास के नाम पर कुछ लोगों की कुर्बानी की जायज ठहराये जाने की स्वीकार्यता बढ़ाने में शासन एवं प्रशासन दोनों ने प्रमुख भूमिका निभाई । इसके बावजूद इस तथ्य को छिपाना किसी के लिए भी आसान नहीं रहा कि विकास के नाम पर जिनसे कुर्बानी की अपेक्षा की जाती रही है या फिर जिन्हें कुर्बान होना पड़ा है, उनमें से ९० फीसदी आदिवासी एवं अन्य जंगलवासी हैं । यह आश्चर्य की बात है कि एक ओर विकास एवं औद्योगिकीकरण की प्रक्रिया तेज की जा रही है और इसके लिए जंगल और जमीनों के अधिग्रहण किए जा रहे हैं और दूसरी ओर इस कानून के माध्यम से आदिवासियों एवं अन्य जंगलवासियों को अधिकार संपन्न बनाया जा रहा है । इन पहलुआें को देखते हुए इस कानून के लागू हो जाने के बाद भी यह शंका बरकरार रह जाती है कि क्या आदिवासियों एवं अन्य जंगलवासियों को वांस्तविक रुप में जंगल पर अधिकार मिला पाएगा ? कानून के संसद से पारित होने के बाद से इसे लागू करने के बीच के अंतराल को यदि देखा जाए, ता भी बात को बल मिलता है । संसद ने इस कानून को दिसंबर, २००६ में ही पारित कर दिया था । लम्बे समय तक सरकार ने न तो इस कानून को अधिसूचित किया और न ही इसके क्रियान्वन हेतु नियमों को बनाया । ऐसी परिस्थिति में जंगलों में निवासरत लाखों-लाख लोगों को कानून बन जाने के बाद भी अपने अधिकारों से वंचित रहना पड़ा, साथ ही वे पहले की तुलना में इन दिनों वन अधिकारियों से ज्यादा प्रताड़ित हुए । जन संगठनों ने साफ तौर से इस बात को रेखांकित किया है कि इस कानून को लागू करने में सरकार जान बूझकर लेटलतीफी कर रही थी पर विभिन्न जन संगठनों के दबाव के बाद उसके लिए और देर करना संभव नहीं रह गया था । इसके पहले भी सरकार ने घोषणा की थी कि कानून को २ अक्टूबर को अधिसूचित कर दिया जाएगा पर ऐसा नही हो पाया था । कानून बन जाने के बाद इतने दिनों तक उसे अधिसूचित नहीं कर करने और नियम नहीं बनाने के पीछे की कहानी की ओर इशारा करते हुए विभिन्न आदिवासी संगठनों का कहना है कि कानून में संरक्षित क्षेत्र के निवासियों को जो अधिकार हैं उन्हें कमजोर करने के लिए प्रस्तावित नियमों में प्रावधान करने के प्रयास किए जाने के कारण ही इस कानून को लागू करने में सरकार देर करती रही । साथ ही नियमो में ग्राम सभा के अधिकारों को सीमित कर अफसरशाही को बढ़ावा देने का प्रयास भी किया गया है । पिछले दिनों मध्यप्रदेश में कई ऐसी घटनाएं हुई हैं जो यह साबित करती हैं कि कानून बन जाने के बाद भी उसके अधिसूचित नहीं होने और नियम नहीं बन पाने के कारण बीच की अवधि में आदिवासियों पर व्यापक अत्याचार हुए हैं। ऐसा इसलिए किया गया ताकि कानून के अधिसूचित होने से पहले ही जंगल के दावेदारोंको जंगल से खदेड़ दिया जाए और जब उन्हें अधिकार मिले, तब वे दावा करने के लिए जंगल में ही न हों । यानी कानून लागू होने के बाद उन्हें अधिकार तो मिल जाए पर दावेदारी नहीं रहे, क्योंकि तब वे जंगलो में निवासरत ही नहीं माने जाएंगे । यह आशंका इसलिए जाहिर की जाती रही है कि वन विभाग ने नियमों के बनने तक इंतजार करने के बजाय आदिवासियों को जंगल से खदेड़ने में ही रुचि दिखाई है । हाल ही में म.प्र. के बुरहानपुर जिले की नेपानगर तहसील के विभिन्न गांवोंमें निवासरत आदिवासियों एवं अन्य जंगलवासियों पर वन विभाग के हमले ने क्रूर अत्याचार कर आदिवासियों को जंगल से बेदखल कर दिया था, जिसकी व्यापक भर्त्सना हुई । इस तरह की घटनाएं अन्य जगहों पर भी हुई हैं । आदिवासियों एवं अन्य जंगलवासियों को जंगल पर वास्तविक अधिकार मिल जाने से सबसे ज्यादा नुकसान वन माफिया, खदान माफिया और भू-माफिया का होगा, साथ ही वन आधिकारियो की मानमानियों पर भी अंकुश लग जाएगा । इन्हीं कारणों से कानून को कमजोर करने का प्रयास किया जाता रहा है , साथ ही अदिवासियों एवं अन्य जंगलवासियों को जंगल से खदेड़ने के लिए उनके ऊपर वन विभाग द्वारा कई झूठे मुकदमे लगाए जाते रहे हैं। १ जनवरी २००८ को जारी हुए नियमों में यह कहा गया है कि ग्रामसभा गांव के लोगों के अधिकारों की पहचान करेगी । कई आदिवासी समुदाय खासतौर से सहरिया, सामान्य गांव में एक बस्ती के सीमित दायरे में रहते हैं । परंतु अपनी जीविका के लिए पूर्णत: वनों पर आश्रित हैं । साथ ही यह ध्यान देने योग्य है कि इन्हें पूर्व में वनों से विस्थपित किया जा चुका है । ऐसे में इन्हें इस कानून का लाभ कैसे मिल पाएगा? यह सवाल बरकरार है। क्योंकि इस कानून में वनवासियों की पृथक बस्ती, फलिया, टोला या मजरा को इकाई के रुप में मान्यता नहीं दी गई है । संयुक्त संसदीय समिति ने भी कहा था कि आदिवासियों की बस्ती को इस कानून में मान्यता दी जाये,पर ऐसा नही हुआ । कानून के नियमों में ग्राम सभा को जमीनों पर अधिकारों की सूची बनाने का दायित्व तो मिला है किन्तु गांव में कितनी जमीन पर अधिकार बांटे जायेंगे, इसकी जानकारी और नक्शे उपलब्ध करवाने का जिम्मा विभाग के पास है । उल्लेखनीय है कि वर्तमान में अनेकों राज्यों में राज्य स्तर पर जंगल के क्षेत्र की सीमाआे (क्षेत्रफल) के बारे में पुख्ता और विश्वसनीय आंकड़े उपलब्ध नहीं है। अन्य सवाल जो आदिवासियों की भावी पीढ़ियों के अधिकार से जुड़ा हुआ है वह यह है कि इस कानून के अनुसार जंगल में निवास कर रहे निवासियों को चार हैक्टेयर तक की जमीन पर अधिकार मिल जायेगा । पर अधिकांश आदिवासियों के पास इतनी जमीनें नहीं है और यदि अधिकतम सीमा के आधार पर जिन आदिवासियों को इतनी जमीनें मिल भी जाएं, तो क्या उनकी भावी पीढ़ियों के लिए उतनी जमीन पर्याप्त् होगी? इस तरह से जंगल पर सीमित संख्या में आदिवासियों को अधिकार मिल पाएगा और उनका बड़े पैमाने पर पलायन तो जारी रहेगा साथ में उन पर शोषण करना भी आसान होगा । उपरोक्त परिस्थितियों को देखते हुए कहना मुश्किल है कि आदिवासियों एवं अन्य जंगलवासियों के साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय से यह कानून मुक्ति दिला सकता है । अब देखना तो यह है कि राज्य सरकारें जंगल के दावेदारों की वाजिब हक दिलाने कि दिशा में किस तरह से अपने प्रदेशो में इस कानून का लागू करती हैं, क्योंकि कानून को लागू करने का जिम्मा राज्य सरकारों के ऊपर ही है । यह भी देखना जरुरी है कि राज्य सरकारें अपने राज्य के हितग्राहियों के हितों की रक्षा किस तरह करती हैं और अपने-अपने राज्यों में वन माफिया एवं खदान माफिया पर अंकुश लगाने के लिए क्या ठोस प्रयास करती हैं? राज्य सरकारों को एक महत्वपूर्ण काम यह भी करना होगा कि कानून बननेे के बाद से अब तक जिन आदिवासियों को जंगल से बेदखल किया गया है, उन्हें भी उनके परंपरागत निवास स्थान पर बसाने के लिए गंभीर प्रयास करें। फिलहाल यह आशा ही की जा सकती है कि इस कानून का समुचित लाभ अधिकतम लागों को मिलेगा । वैसे इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि इस अधिनियम के लागू हो जाने के बाद वन विभाग द्वारा किए जाने वाले रोज-रोज के अत्याचारों से आदिवासियों एवं अन्य जंगलवासियों को कुछ मुक्ति मिल पाएगी । ***

शनिवार, 12 जनवरी, 2008

४ जनजीवन

धारावी : वैधानिक लूट का नया औजार
निधि जामवाल/मौरीन नन्दिनी/रावलीन कौर
दक्षिणी मुम्बई के उत्तरी किनारे पर स्थित एशिया की सबसे बड़ी गंदी बस्ती `धारावी' आजकल बिल्डरों की आंख का तारा बनी हुई है । बांद्रा और वर्ली जैसे पाश इलाके से जुड़ी इस बस्ती ने न केवल हजारों व्यक्ति निवास करते हैं बल्कि यहां से अपना रोजगार भी संचालित करते हैं । गंदी बस्ती पुर्नवास प्राधिकरण का कहना है कि विकसित होने के बाद १४००४ करोड़ रू. के अनुमानित मूल्य में बिकने वाली इस संपत्ति से भवन निर्माताआे (बिल्डरों) के करीब ४७५४ करोड़ रू. का लाभ प्राप्त् होगा । वहीं विशेषज्ञों का मानना है कि लाभ इससे कई गुना अधिक होगा । महाराष्ट्र गृह एवं क्षेत्र विकास प्राधिकरण (एम.एच.ए.डी.) के पूर्व अध्यक्ष चन्द्रशेखर प्रभु की गणना के अनुसार बिल्डरों को करीब २१००० करोड़ रू. प्राप्त् होंगे । २२३ हेक्टेयर में फैलेइस भूखंड में से १४४ हेक्टेयर को १ जून २००७ को हथिया लिया गया है। ९२५० करोड़ रू. के धारावी पुनर्विकास परियोजना के लिये महाराष्ट्र सरकार ने हितग्राहियों से प्रस्ताव भी आमंत्रित कर लिए हैं । इस योजना में औसत सरकारी आंकड़ों के हिसाब से ५७००० परिवारों का पुनर्वास होना है । ४० हेक्टेयर में ७ करोड़ वर्ग फिट निर्माण हेतु १०० से अधिक कंपनियों ने रूचि दिखाई है । मुंबई स्थित एमएम कन्सलटेंट के मुकेश मेहता द्वारा १९९५ में कल्पित इस योजना को बस्ती निवासियों के लिए ऐसा सुनहरा अवसर बताया गया है जिसके अंतर्गत उन्हें बहुमंजिला भवनों में २२५ स्के. फीट के फ्लेट मुफ्त में मिल जाएंगे और बाकी की जमीन बेच दी जाएगी । इन भवनों का प्रथम १५ वर्ष तक रखरखाव भी बिल्डर को ही करना होगा । परंतु यहां ध्यान देने योग्य बात यह है कि एक कार की पार्किंग हेतु २४८ स्के. फीट स्थान की आवश्यकता होती है और यहां एक पूरे परिवार को मात्र २२५ स्के. फीट स्थान उपलब्ध करवाया जा रहा है । एक महत्वपूर्ण तथ्य जिसे सरकार नजरअंदाज कर रही है वह यह है कि यह सिर्फ रहवासी क्षेत्रभर नहीं है अपने आप में यह एक `विशेष आर्थिक क्षेत्र' भी है। यहां पर रिसायकलिंग से लेकर मिट्टी के बर्तन बनाने, खाद्य प्रसंस्करण व चमड़ा उद्योग तक हैं । यहां के निवासियों का कहना है कि वे धारावी के विकास का भी समर्थन तो करते हैं परंतु उस तरह से नहीं जिस तरीके से सरकार ने सोचा है । हाल फिलहाल यहां १५० स्के. फीट से लेकर १००० स्के. फीट तक की करीब ५००० खाद्य प्रसंस्करण इकाईयां कार्यरत हैं । ये चकली, फरसान, नमकीन व चिप्स जैसे नामचीन उत्पादों का निर्माणकरती हैं । साथ ही यहां २० चमड़ा शोधन इकाईयों भी कार्यरत हैं जिनका सालाना कारोबार ८० करोड़ रू. से अधिक का है । नए धारावी में इनके लिए कोई जगह नहीं होगी क्योंकि इन्हें प्रदूषण फैलाने वाला माना जाता है । वहीं यहां ४ से ५ हजार इकाईयां पुर्नसंचरण (रिसायकलिंग) का कार्य करती हैं, जिनका प्रतिदिन का लेनदेन १ करोड़ रू. से ज्यादा का होता है । वहीं ये प्रतिदिन ४ हजार टन से जयादा कबाड़ का पुनर्चक्रण भी करती हैं । इन्हीं सबके बीच `कुम्हारवाड़ा' स्थित है जो कि ५ हेक्टेयर (१७ एकड़) में फैला है एवं २००० परिवारों की जीविका इस व्यवस्था पर निर्भर है । ये सभी बहुत ही सुंदर पारंपरिक व डिजायनर मिट्टी बर्तन बनाते हैं । उनका कहना है कि अचानक बाहरी लोग आकर हमारी जमीन और हमारी खुशहाली में रूचि लेने लग गए हैं। स्थानीय कुम्हारों का कहना है कि हमारी जमीन व जीविका को छीनने के किसी भी प्रयत्न का पुरजोर विरोध किया जाएगा। वैसे कुम्हारों ने योजना के विरूद्ध बम्बई उच्च् न्यायालय वृहत मुम्बई नगर निगम, और एमएचएडीए में अपील दायर कर दी हैं । दिल्ली स्थित शहर नियोजक ए.जी.के. मेनन का कहना है कि `योजना व्यक्तियों से संबंधित होना चाहिए न कि धन से । धारावी योजना पूर्णतया पूंजी आधारित रणनीति पर निर्भर है । आकल्पक इस भूमि को मात्र एक आर्थिक संसाधन के रूप में देख रहे हैं और उसे अधिकतम भी करना चाहते हैं ।' धारावी की यह योजना पूर्णतया बिल्डर समुदाय के हित को ध्यान में रखकर बनाई गई है । गंदी बस्ती पुनर्वास प्राधिकरण की वर्तमान प्रचलित नीति में बिल्डर को उसके द्वारा विकसित प्रत्येक एक फुट भूमि के बदले ०.७५ स्के. फीट भूमि की पात्रता है । परंतु धारावी के मामले में यह अनुपात बदल दिया गया है । यहां पर पुनर्वास हेतु २२५ स्के. फीट के फ्लेट के बदले बिल्डर को ३०० स्के. फीट का फ्लेट मिलेगा । शहरी भूमि सीलिंग अधिकार व नियम, सन् १९७६ के अंतर्गत सरकार सिर्फ गरीबों को घर उपलब्ध करवाने के लिए ही भूमि का अधिग्रहण करा सकती है । परंतु सरकार बजाय यह करने के कह रही है कि वह जवाहरलाल नेहरू शहरी नवीनीकरण मिशन के अंतर्गत ऋण प्राप्त् करने की पूर्व शर्त को पूरा करने के लिए इस कानून मेंही परिवर्तन कर देगी । शहरी सीलिंग कानून के अनुसार मुम्बई में निजी अधिपत्य हेतु ५०० वर्ग मीटर से बड़े भूखंड की पात्रता नहीं है । अतिरिक्त भूमि सरकार को वापस करनी होगी । इस नियम के तहत पिछले २६ वर्षो में सरकार केवल ४० हेक्टेयर भूमि ही अधिग्रहित कर पाई है । वहीं मुम्बई स्थित बिल्डर हीरानंदानी कंसट्रक्शन ने इस कानून का उल्लंघन करते हुए मुम्बई और थाणे में २०० हेक्टेयर उस भूमि का दुरूपयोग किया जिसके अंतर्गत १४० हेक्टेयर भूमि का आबंटन कमजोर वर्गो को एक कमरे के आवास उपलब्ध करवाने हेतु किया गया था । यहां पर उनके लिए एक कमरा भी नहीं बना । मुम्बई की १.२० करोड़ की आबादी में से आधी गंदी बस्तियों में रहती है । बैंगलोर स्थित आल्टरनेटिव ला फोरम का अध्ययन बतलाता है कि मुम्बई के ६० लाख गंदी बस्ती निवासियों के पास यहां की कुल भूमि का मात्र १२.५ प्रतिशत क्षेत्र ही है । जिसका मूल्य ८०००० करोड़ रू. है । परंतु सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि जहां एक ओर हजारों हजार लोग बेघर हैं वहीं एक लाख से ज्यादा फ्लेट खाली पड़े हुए हैं । शहरीकरण हेतु राष्ट्रीय आयोग का कहना है कि मुम्बई की खाली पड़ी भूमि में से ५५ प्रतिशत सिर्फ ९१ व्यक्तियों के स्वामित्व में है । इस स्वामित्व को सरकार और प्रशासन दोनों ही मान्यता प्रदान कर रहे हैं। महाराष्ट्र के आवास विभाग के मुख्य सचिव एस.एस.क्षत्रिय का कहना है कि `ऐसा नहीं है कि मुम्बई में आवास उपलब्ध नहीं हैं। परंतु ये गरीबों की पहुंच से बाहर हैं । बहुत थोड़े से बिल्डर मुम्बई के आवास क्षेत्र पर नियंत्रण किए हुए हैं। इस गठजोड़ को तोड़कर आवास क्षेत्र के विनियमन करने की आवश्यकता है ।' वैसे सरकार ने बस्ती निवासियों के लिए एक फार्मूला भी बनाया है । इसके अंतर्गत जिनके पास २५१ स्के. फीट से लेकर १००० स्के. फीट तक के आवास है उन्हें २२५ स्के. फीट नि:शुल्क (छोटे घरवालों की तरह) दिया जाएगा और अतिरिक्त ६७५ स्के. फीट उसे बिल्डर से कमेटी द्वारा तय किये गए मूल्य पर खरीदना होगा । स्थानीय जनता का कहना है कि पहली बात तो यह है कि सरकार हमसे हमारी भूमि लेकर यह कह रही है कि अब हम उसे बिल्डर से बाजार मूल्य पर पुन: खरीदें । दूसरा सरकार ने अभी तक उस समिति को अंतिम रूप नही दिया है जो कि यह बताएगी कि अतिरिक्त स्थान खरीदने की दर क्या होगी और यह भी नहीं बताया कि इसका बाजार मूल्य क्या होगा ? इस योजना के अंतर्गत ८५ प्रतिशत भूमि रहवासी और १५ प्रतिशत व्यावसायिक होगी । स्थानीय निवासियेां का कहना है कि हमोर लिए तो सब कुछ व्यावसायिक जैसा ही है । अभी जबकि योजना ने मूर्त रूप लेना भी प्रारंभ नहीं किया है तभी इस सम्पत्ति के भाव आसमान छूने लगे हैं । यहां पर व्यावसायिक सम्पत्ति का भाव २५ से ३०००० रू. प्रति स्के. फीट और रहवासी का ५ हजार रू. हो गया है । योजना के चलते इसके और भी बढ़ने की आशंका है क्योंकि पास के ही बांद्रा-कुर्ला काम्प्लेक्स में हाल फिलहाल के भाव ५०००० रू. स्के. फीट हैं । धारावी बचाआे समिति के अध्यक्ष राजू कोरडे का कहना है कि योजना निर्माण हेतु बुलाई गई निविदाएं गैर कानूनी हैं और वे इसके खिलाफ न्यायालय में जाएंगे । केन्द्र सरकार ने गंदी बस्तियों के लिए एक नीति का प्रारूप तैयार किया था पंरतु वह अभी तक प्रारूप रूप में ही है। इस प्रारूप नीति का भी विरोध हो रहा है क्योंकि यह निजी व सार्वजनिक भागीदारी पर आधारित है । साथ ही यह गरीबों के भूमि अधिकार की बात भी नहीं करती । अन्य नीतियों की तरह यह भी विश्व बैंक की निजी-सार्वजनिक भागीदारी नीति पर आधारित है । अनेक संगठनों का मानना है कि जबकि वे भूमि का पूरा मूल्य गरीबों से ही वसूल कर लेना चाहते हैं तो इसमें सामाजिक कल्याण की बात कहां आती हैं ? इस समस्या के समाधान को लेकर विचार सामने आ रहे हैं । इस बात में कोई मतभेद नहीं है कि गरीबों के लिए आवास की नीति कल्याणकारी होनी चाहिए साथ ही इसमें सुरक्षा की गारंटी भी होनी चाहिए । इस संबंध में एक मत इस हेतु स्वतंत्र नियामक की नियुक्ति की बात करता है जिससे कि संबंधित नियम बनाए जा सकें । वहीं दूसरा वित्तिय अनुशंसाआें की बात करता है । वैसे इस संबंध में केन्द्रीय शहरी विकास मंत्रालय की प्रतिक्रिया का सभी को इंतजार है । परंतु इस दिशा में सर्वप्रथम कदम एक कार्यान्वित हो सकने वाली `राष्ट्रीय गंदी बस्ती नीति' का निर्माण ही है । ***

शुक्रवार, 7 सितंबर, 2007

१२ जन जीवन

दिल्ली में निजी कारों पर पाबन्दी क्यों न हो ?
सुनील
इन दिनों दिल्ली की सड़को पर दिखाई देती हैं कारें ही कारें, नए-नए मॉडलों की अनगिनत कारें । बसों, ऑटो, रिक्शों आदि के मुकाबले उनकी संख्या तेज़ी से बढ़ी है । साइकिलें और दुपहिया स्कूटर-मोटर साइकिलें तो अब कम ही दिखाई देती हैं । गाड़ियों के इस विशाल हुजूम में अब ऐसे वाहन चलाना खतरे से खाली भी नहीं है । तांगे, साइकिल रिक्शे, बैलगाड़ियां, हाथ ठेले तो अब लुप्त् हो रहे हैं । इस `कार-क्रांति' को वैश्वीकरण के युग की देन माना जा सकता है । दिल्ली में पंजीकृत वाहनों की संख्या ४० लाख है, जिनमें कारों की संख्या लगभग १५ लाख है । एक जानकारी के मुताबिक वर्ष १९९४-९५ से २००३-०४ के बीच दिल्ली में छोटी चार पहिए वाली गाड़ियों की संख्या में ९.२७ प्रतिशत वार्षिक का इज़ाफा हुआ है । हाल के वर्षो में यह वृद्धि दर दुगनी हो गई होगी । यानी दिल्ली में कारों की संख्या में विस्फोट हो रहा है। हम अक्सर जनसंख्या विस्फोट की चर्चा व चिंता करते हैं, किन्तु उससे बड़ा यह `कार-विस्फोट' है, जो दिल्ली व देश के अन्य महानगरों में घटित हो रहा है । इस कार-क्रांति पर आज चाहे कोई इतरा ले, लेकिन दिल्लीवासियों के लिए यह गले की हड्डी बन गई है । गाड़ियों की संख्या में इतनी तेज़ी से वृद्धि होने से दिल्ली की यातायात व्यवस्था ध्वस्त हो गई है । ट्राफिक जाम होना आम बात है और उसमें फंसना एक यातना से कम नहीं होता । दिल्ली में कारों का यह विशाल रेला कई बार चींटियों की चाल से चलता है और एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचने में घंटो लग जाते हैं । यातायात को सुगम बनाने के लिए सड़के लगातार चौड़ी की जा रही हैं, सैकड़ो फ्लाई ओवर और पुल बनते जा रहे हैं । इन फ्लाई ओवरों से दिल्ली अब वैसा ही बन गया है, जैसा कुछ साल पहले लन्दन व न्यूयॉर्क के चित्रों को हम हैरानी से देखते थे । चौराहों, ट्राफिक बत्तियों, सबवे आदि का भी लगातार आधुनिकीकरण और विकास हो रहा है । लेकिन यातायात की समस्या सुरसा-मुख की तरह बढ़ती जा रही है । सड़को पर दुर्घटनाएं भी बढ़ती जा रही हैं । मोटरगाड़ियो से वायु प्रदूषण और शोर प्रदूषण दिल्ली में चरम पर पहुंच रहा है । लाखों कारों की यह विशाल संख्या जब चलती हैं, तब तो सड़कों को जाम करती ही है, जब खड़ी रहती है, तब भी समस्या बनती है । दिल्ली की सबसे महंगी जमीन पर बहुत सारे बड़े-बड़े (अब बहुमंजिले) पार्किंग स्थल बनाने पर भी समस्या बढ़ती जा रही है । बहुमंजिला आवासीय इमारतों तथा हाउसिंग सोसायटियों में भी कारों की नित बढ़ती भीड़ के कारण रात को कार खड़ी करना और सुबह निकालना एक बड़ा सिरदर्द हैं। कई परिवारों में अब दो-दो कारें है । दिल्ली की गंभीर यातायात समस्या को सुलझाने के लिए सुझाव दिए जा रहे हैं, अध्ययन और सर्वेक्षण हो रहे हैं, कदम उठाए जा रहे हैं । कई बार ये कदम व सुझाव गरीब विरोधी होते हैं, जैसे तांगे व साइकिल-रिक्शे बंद करना, खोमचे वालों को हटाना, झुग्गियों को हटाकर सड़कों को चौड़ी करना या पार्किग स्थल बनाना आदि । मानों दिल्ली में सिर्फ कारवालों को ही रहने व जीने का हक हो । लेकिन गरीबों पर अत्याचारों और देश का पैसा खर्च करने के बाद भी दिल्लीकी यातायात समस्या हल नहीं हो रही है । इस सुरसा-मुखी समस्या का एकमात्र हनुमान रूपी समाधान है कि कारों के स्थान पर परिवहन के सार्वजनिक साधनों को सुलभ व बेहतर बनाया जाए । ज्यादा व अच्छी बसे चले, टैक्सियों व रिक्शों की सेवाआे को सुधारा जाए । दिल्ली में मेट्रो रेल का विस्तार तो हो ही रहा है । जिसको लंबी दूरी की यात्रा करना है, वह सार्वजनिक साधनों से जाए । जिसे नजदीक जाना है, वह पैदल, साइकिल या मोटर साइकिल से जाए । यदि ऐसा कर दिया जाए तो इससे कई फायदे होंगे । दिल्ली की सड़कों पर वाहनों में एक तिहाई कमी हो जाएगी । ट्राफिक जाम लगभग खत्म हो जाएंगे । दिल्ली में आने-जाने का समय भी बचेगा। दिल्लीवासियों के स्वास्थ्य को दोहरा फायदा होगा । प्रदूषण तो कम होगा ही, लोग ज्यादा पैदल या साइकिलों पर चलेंगे, जिससे उनकी शारीरिक कसरत होगी । उन्हें अलग से जिम, व्यायाम शाला, मोटापा कम करने वाले केन्द्रो और सुबह शाम भ्रमण हेतु पार्को में जाने की जरूरत भी कम होगी । एक सर्वेक्षण के मुताबिक दिल्ली की ५७ प्रतिशत यात्राएं ५ कि.मी. से कम की होती हैं । अर्थात प्रतिदिन ४५ लाख यात्राओ की दूरी ५ कि.मी. से कम होती है । ये यात्राएं साइकिलों से आसानी से की जा सकती है, जिसमें धन, समय व स्वास्थ्य तीनों की बचत होगी । निजी कारों पर पाबन्दी लगाने से दिल्ली में साइकिलों की संख्या में भारी वृद्धि होगी। `कार-क्रांति' का स्थान `साइकिल-क्रांति' ले लेगी । इसके लिए यातायात व्यवस्था में कुछ बदलाव करना होगा । कारों से खाली हुई सड़को पर पैदल व साइकिलों की लिए अलग से सुरक्षित लेन बनानी होगी । निजी कारों पर पाबन्दी लगाने से इंर्धन की काफी बचत होगी । हमें पेट्रोल व गैस विदेशों से आयात करना पड़ता है, जिसे संतुलित करने के लिए देश को निर्यात पर बहुत जोर देना पड़ता है । निर्यात के लिए अनुदान व करों में छूट दी जाती है । इंर्धन बचने से ग्रीनहाउस गैसों को कम करने और ग्लोबल वार्मिग का खतरा टालने में भी दिल्ली अपना योगदान कर सकेगा । कारें बंद होने से दिल्ली में नए पार्किंग स्थल नहीं बनाने पड़ेंगे और सड़कों को और चौड़ी करने की जरूरत भी कम हो जाएगी । कई पार्किंग स्थलों को छोटा या खत्म भी किया जा सकता है । इससे जो जगह बचेगी, वहां बच्चें के लिए खेलने के मैदान, पार्क, अस्पताल, वृद्धाश्रम, रैन बसेरे आदि बनाए जा सकते हैं। यातायात की समस्या हल हो जाने से अपने कार्यस्थल तक आने-जाने में बचा समय दिल्ली के नागरिक अपने बच्चें व परिवार के साथ बिता सकेंगे तथा रचनात्मक गतिविधियों में ज्यादा समय दे सकेंगे । कुल मिलाकर दिल्ली का जीवन बेहतर बनेगा । सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि दिल्ली के अमीरों और गरीबों में बढ़ती दूरी तथा सामाजिक भेदभाव कम होगा । गरीब मजदूर और करोड़पति दोनों सार्वजनिक साधनों से यात्रा करेंगे । इससे यातायात के सार्वजनिक साधनों से यात्रा करने की सेवाएं सुधारने की ओर समाज के प्रभावशाली तबके का ध्यान अपने आप जाएगा । आज अपनी वातानुकूलित कारों में यात्रा करने के कारण वे कभी बसों या रेल के बारे में सोचते भी नहीं है। समानता की दिशा में दूसरा फायदा यह होगा कि दिल्ली की सड़को, पुलों, फ्लाई ओवरों, पार्किंग स्थलों आदि को विकसित करने में इस गरीब देश के संसाधनोंका जो गैर अनुपातिक हिस्सा खर्च हो रहा है, उसमें भी कमी आएगी । गांधी के इस देश में सादगी और वैकल्पिक जीवन शैली की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण प्रयोग होगा। दिल्ली की सीमा में निजी कारों को बंद करने वाला यह प्रस्ताव कई लोगों को काफी क्रांतिकारी, अटपटा व अस्वीकार्य लग सकता है । विशेषकर निजी गाड़ी में आने-जाने के अभ्यस्त हो गए अमीर एवं मध्यम वर्ग को यह बात आसानी से नहीं पचेगी । लेकिन इसके अलवा कोई विकल्प नहीं है । दिल्ली के बिगड़ते हालात का और कोई समाधान नहीं है । कुछ लोग कह सकते हैं कि यह अव्यावहारिक है, इससे असुविधा होगी और इसें कैसे लागू किया जाएगा? किंतु यह वैसा ही है, जैसे महानगरों की कई सड़को पर दिन में भारी वाहन आने पर प्रतिबंध लगा दिया जाता हे या कई स्थानों पर पार्किग या यू-टर्न प्रतिबंधित कर दिया जाता है । यूरोप के कई शहरों में पहले से कुछ घने इलाकों में वाहनों पर प्रतिबंध है और लोग वाहन खड़ाकरके वहां पैदल जाते हैं । सिंगापुर में भी कारों पर कुछ रोक लगाई गई है । यह उसकी तरह का थोड़ा प्रतिबंध है । सार्वजनिक हित में कुछ असुविधा तो उठानी होगी । नहीं तो भविष्य में असुविधा सबको होगी और भयानक रूप ले लेगी । कुछ लोग सुझाव दे सकते है कि निजी कारें प्रतिबंधित करने की बजाए उन्हें महंगा कर दिया जाए, जिससे उनकी संख्या कम हो जाएगी । जैसे पार्किंग शुल्क बढ़ा दिए जाएं । किंतु इस सुझाव की खामी यह है कि जो ज्यादा अमीर होंगे, वे निजी गाड़ियों का उपयोग पूर्ववत करते रहेंगे । एक अन्य सुझाव है कि गाड़ियोंके नंबर अंतिम अंक के आधार पर उन्हें समाप्त् के अलग-अलग दिन चलने की अनुमति दी जाए । किंतु इसकी निगरानी दिल्ली जैसे विशाल महानगर में काफी मुश्किल होगी । फिर, इन आंशिक उपायों से दिल्ली की यातायात समस्या का पूरा समाधान भी नहीं निकलेगा । कुछ लोगों को निजी कारों को बंद करने का यह प्रस्ताव एक प्रकार की तानाशाही भरा कदम लग सकता है । लेकिन जनहित में कड़े निर्णय तो लोकतंत्र में भी लेने पड़ते हैं । दिल्ली में ही पर्यावरण को बचाने के लिए प्रदूषणकारी उद्योगों को दिल्ली से बाहर करने तथा पेट्रोल-डीजल चालित बसों, आटो रिक्शा व टैक्सियों को बंद करने के कड़े आदेश क्रियान्वित भी किए जा चुके हैं । इस मामले में भी सवाल पर्यावरण और जनहित का ही है । पिछली बार सार्वजनिक वाहनों पर जिम्मेदारी डाली गई थी, किंतु उनमें डीजल-पेट्रोल की जगह सी.एन.जी. उपयोग करने से प्रदूषण की समस्या हल नहीं हुई । समस्या का प्रमुख स्त्रोत निजी कारें है, जिन्हें प्रतिबंधित किए बगैर काम नहीं चलेगा । वास्तव में ठंडे दिमाग से, ध्यान से सोचा जाए तो इस प्रस्ताव में सबको फायदा ही है । इसमें नुकसान सिर्फ कारें बनाने और बेचने वाली कंपनियों का होगा और विरोध भी उनकी तरफ से ही सबसे ज्यादा होगा । कारें बनाने वाली देशी और विदेशी कंपनियों की यह लॉबी इतनी ताकतवर है कि वह भारत सरकार की नीतियों को भी प्रभावित करती है । इसलिए इस प्रस्ताव को लागू करने के लिए काफी राजनैतिक इच्छा शक्ति की जरूरत होगी, जिसकी काफी कमी वर्तमान सरकारों में दिखाई देती है । इसलिए दिल्ली की जनता को इस मांग को एक जन-आंदोलन का रूप देना होगा । बिजली और पानी के निजीकरण के खिलाफ दिल्ली के कॉलोनी वासियों ने जिस जागरूकता का परिचय दिया है, उसी तर्ज पर, किंतु उससे ज्यादा सामूहिक व संगठित प्रयास और आंदोलन की जरूरत होगी । एम.सी. मेहता, अनुपम मिश्र और सुनीता नारायण जैसे पर्यावरणविद, अरूंधती राय और अरविन्द केजरीवाल जैसे सामाजिक कार्यकर्ता, प्रभाष जोशी, कुलदीप नैय्यर और राजिन्दर सच्च्र जैसे बुद्धिजीवी इस मामले में महत्वपूर्ण पहल कर सकते हैं । भारत की राजधानी, ढाई हजार साल पुरानी इस ऐतिहासिक नगरी, दिल्ली के बाशिंदे के सामने दो ही विकल्प है । एक साहसिक फैसला लेकर न केवल अपनी यातायात समस्या को हल करें, बल्कि देश व दुनिया के अन्य महानगरों के सामने एक अनुकरणीय मिसाल पेश करें । अपने शहर को भी जीने लायक बनाएं और ग्लोबल वì