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बुधवार, 21 मई, 2008

७ जीवन शैली

गोरेपन का गोरख धंधा
डॉ. अरविंद गुप्त्े
लंदन के हैमरस्मिथ अस्पताल में गंभीर रुप से बीमार एक अश्वेत महिला का विवरण पिछले दिनों प्रकाशित हुआ था । किसी का गंभीर रुप से बीमार होना अपने आप में समाचार नहीं बनता, किन्तु इस महिला की बीमारी विशेष प्रकार की थी । उसकी त्वचा पर गहरे और हल्के रंग के चकत्ते उभर आए थे वह बहुत अधिक मोटापे से ग्रस्त हो गई थी और मासिक धर्म नियमित होने के बावजूद वह गर्भ धारण नहीं कर पा रही थी । पहले तो डॉक्टरों को शक हुआ कि ये लक्षण एड्रीनल ग्रंथि या पिट्यूटरी ग्रंथि की किसी बीमारी के कारण दिखाई दे रहे है । मगर परीक्षणों से पता चला कि उसकी इन ग्रंथियो में कोई खराबी नही थी काफी पुछताछ के बाद उस महिला ने बताया कि वह पिछले सात वर्षो से गोरेपन की एक क्रीम का बहुत अधिक इस्तेमाल कर रही थी । एक सप्तह में दो ट्यूब (६० ग्राम) क्रीम वह अपने पूरे शरीर पर मलती थी । इस क्रीम में क्लोबेटसॉल नामक एक कॉर्टिकोस्ट्ररॉअड था । इसका उपयोेग आम तौर पर एक्ज़िमा ओर सोरिएसिस नामक त्वचा की बीमारियों के उपचार में किया जाता है । हैमरस्मिथ अस्पताल के चिकित्सकोंने इस केस की जानकारी ब्रिटिश मेडिकल जर्नल में प्रकाशित की और डॉक्टरों से आग्रह किया कि ये गोरेपन की दवाईयों के खतरों के प्रति सचेत रहें। केवल इंग्लैण्ड में ही इन दवाइयों का व्यापार करोड़ों पाउंड का है । इस प्रकार की कई क्रीमों में पारा हाईड्रोक्निोन और स्टेरॉइड जैसे विषैले पदार्थ होते है, किन्तु आम जनता इन खतरोंसे अनभिज्ञ होती है। त्वचा के रंग को हल्का करने की दवाइयों के उपयोग की सलाह स्वयं डॉक्टरो द्वारा उन मरीजों को दो जाती है जिनकी त्वचा पर किन्ही कारणें से काले रंग के चकत्ते या दाग उभर आते हैं । एशिया, अफ्रीका और मध्य पूर्व के कई देशोंमें गोरेपन को सुंदरता का पर्याय मान लिया गया है । इन देशों में गोरेपन की दवाईयों की बिक्री धड़ल्ले से होती है । इन दवाइयों का प्रचार-प्रसार करते समय कई बार सामाजिक मूल्यों और सत्य की बलि भी चढ़ा दी जाती है । इस प्रकार के दुष्प्रचार का एक ज्वलंत उदाहरण कुछ समय पहले तक भारत में दिखाए जा रहे एक टीवी विज्ञापन का है । इसमेें यह दिखाया गया था कि सांवले रंग की एक लड़की साधारण नौकरी के चलते अपने बूढ़े बाप को कॉफी नहीं पिला पाती है और उसका बाप अपनी पत्नी से कहता है कि काश हमारे एक बेटा होता तो आज यह दिन नहीं देखना पड़ता । बेटी अपने बाप की यह बात सुन लेती है । और उदास हो जाती है । तभी उनके कान में एक फुसफसाहट होती है (शायद भगवान इसी तरह लोगों को सलाह देते होंगे) कि तू फलानी क्रीम लगा कर गोरी बन जाएगी तो तेरे सारे दुख दूर हो जाएेंगे । लड़की तुरंत इस सलाह पर अमल करती है और आनन-फानन में गोरी हो जाती है । उसे बढ़िया नौकरी मिल जाती है और बाप को पीने के लिए कॉफी । देखिए, इस विज्ञापन के माध्यम से कौन-कौन से संदेश दिए जा रहे हैं। सबसे पहला यह कि यदि आपका रंग गोरा नहीं है तो आपको अच्छी नौकरी नहीं मिल सकती । दूसरे शब्दों में, आप सामाजिक दृष्टि से निचले दर्जे के व्यक्ति हैं । दूसरे, आप यदि गोरेपन की इस क्रीम को अपने चेहरे पर पोतेंगे तो आप कुछ ही दिनों में इतने गोरे हो जाएंगे कि आपको अच्छी नौकरी मिल जाएगी । तीसरे, बेटी की तुलना में बेटा माता-पिता की अधिक अच्छी देखभाल कर सकता है (चाहे वह कमाऊ हो या न हो), और अंत में माता-पिता अपनी संतान का मूल्यांकन इस आधार पर करते हैं कि वह उनकी छोटी-छोटी ख्वाहिशें पूरी कर सकती है या नहीं। इस संदर्भ में क्रीम निर्माता के प्रतिनिधि ने सफाई दी थी कि ``इस विज्ञापन का उद्देश्य यह दिखाना कतई नहीं था कि गोरापन सुंदरता का प्रतीक है । यह तो व्यक्ति के शिक्षा के स्तर और सामाजिक पृष्ठभूमि पर निर्भर है कि वह विज्ञापन का क्या मतलब निकालता है ।'' निर्माता का यह भी दावा है कि ``नब्बे प्रतिशत भारतीय महिलाएं गोरापन चाहती हैं और इसलिए गोरेपन की क्रीम से उनकी एक आकांक्षा पूरी होती है और उन्हें समाज में अधिक ऊंचा स्थान मिलता है ।'' मलेशिया में टीवी पर गोरेपन की क्रीम के एक विज्ञापन में यह दिखाया जाता था कि एक छात्र अपने साथ पढ़ने वाली आकर्षक किन्तु सांवले रंग की छात्रा के बारे में यह कहता है, ``वह दिखने में सुंदर तो है, लेकिन ...'' । जब वही छात्रा गोरेपन की क्रीम लगाकर गोरी हो जाती है । तब वह कहता है, ``मेरा ध्यान उसकी ओर क्यों नहीं गया ?'' कुछ निर्माताआें ने हाल में एक नया शगूफा छोड़ा है । उनका दावा है कि लड़कियों वाली गोरेपन की क्रीम लगाना मर्दोंा की शान के खिलाफ है । अत: उन्होंने मर्दोंा के लिए गोरेपन की अलग क्रीम बाजार में उतार दी है । ये दवाइयां किस प्रकार काम करती हैं यह जानने से पता चल जाएगा कि क्या महिलाआें और पुरूषों के लिए अलग-अलग क्रीम हो सकती है । मनुष्य की त्वचा की ऊपरी परतो में मेलानोसाइट नामक कोशिकाएं होती हैं । इन कोशिकाआें में मेलानोसोम नामक कण पाए जाते हैं जिनमें मेलानीन नामक काले रंग का पदार्थ भरा होता है । मेलानोसोम नामक काले रंग का पदार्थ भरा होता है। मेलानीन का काम है धूप में मौजूद घातक पराबैंगनी किरणों से शरीर की रक्षा करना । स्वाभाविक है कि संसार के जिन भागों में धूप अधिक तेज होती है वहां रहने वालों की त्वचा में अधिक मेलानीन पाया जाता है । इसके विपरीत, ठंडेे प्रदेशों में रहने वाले लोगों को कम मेलानीन की आवश्यकता होती है और उनका रंग गोरा होता है । शरीर में पाए जाने वाले टायरोसिन नामक अमीनो अम्ल को मेलानीन में बदलने का काम टायरोसिनेज नामक एन्जाइम करता है । गोरेपन की दवाइयों में पाए जाने वाले तत्व केवल मेलानोसोम्स को नष्ट ही नहीं करते, वे टायरोसिनेज की क्रिया को भी रोकते हैं । यानी मेलानीन के निर्माण की प्रक्रिया में अड़ंगा डालते हैं । किन्तु यह शरीर के लिए हानिकारक हो सकता है । यदि मेलानीन नष्ट होता है तो सूर्य से निकलने वाली पराबैंगनी किरणे शरीर को हानि पहुंचा सकती हैं और इनमें त्वचा कैंसर का खतरा बढ़ जाता है । यह सोचने की बात है कि क्या महिलाआें और पुरूषों मेंं मेलानीन निर्माण की प्रक्रिया अलग-अलग हो सकती है? आइए, अब देखें कि गोरेपन की दवाइयों में कौन से रसायन होते हैं । कई दवाईयों में मात्र सनस्क्रीनयानी वे रसायन होते हैं जो त्वचा को धूप से बचाते हैं । ये रसायन हानिरहित होते हैं । किन्तु कई दवाईयों में ऐसे रसायन होते हैं जो निश्चित रूप से हानिकारक होते हैं । गोरेपन की कुछ दवाइयों में मुलेठी के रस का उपयोग किया जाता है । संवेदनशील त्वचा के लिए यह सबसे अच्छा विकल्प है । किन्तु परिणाम उतने अच्छे नहीं होते जितने हानिकारक दवाआें के होते हैं। विटामिन सी यानी एस्कार्बिक एसिड को क्रीम या पावडर के रूप में त्वचा पर लगाने पर यह मेलानीन के निर्माण को रोकता है । आर्बुटिन कुछ विशेष प्रकार के फलों में पाया जाने वाला प्राकृतिक पदार्थ है । यह मेलानीन के निर्माण को रोकता है । अल्फा हाइड्रॉक्सी अम्ल ऐसे रसायनों का समूह है जो मेलानीन के निर्माण को रोकते हैं । ये बीमार और बदरंग मेलानोसाट कोशिकाआें को हटाते हैं । त्वचा रोग विशेषज्ञ इनका उपयोग त्वचा के धब्बे और कील-मुंहासे हटाने के लिए करते हैं। इनका उपयोग प्रशिक्षित डॉक्टरों की देखरेख में करना ही सुरक्षित होता है । सूखी और संवेदनशील त्वचा पर इन्हें लगाना हानिकारक हो सकता है । कोजिल अम्ल के प्रयोग से त्वचा का रंग हल्का होता है, किन्तु इसकी सुरक्षितता को लेकर सवाल उठते रहते हैं । जापान में चावल से साकी नामक शराब बनाई जाती है । इस प्रक्रिया में कोजिल अम्ल एक बाय-प्रोजेक्ट के रूप में बनता है । हाइड्रोक्विनोन, गोरेपन की दवाइयों में पाया वाला एक अत्याधिक हानिकारक रसायन है । कई देशो ने गोरेपन की ऐसी दवाइयों पर प्रतिबंध लगा दिया है जिनमें हाइड्रोक्विनोन और पारे का उपयोग किया जाता है । चूहों पर किए गए प्रयोगों से ऐसे संकेत मिले हैं कि हाइड्रोक्विनोन त्वचा का कैंसर पैदा कर सकता है, यद्यपि मनुष्य में इस प्रकार के प्रभाव की पुष्टि नही हुई है । अलबत्ता, यह साबित हो चुका है कि हाइड्रोक्विनोन के उपयोग से ओक्रोनोसिस नामक रोग हो जाता है जिसमें त्वचा पर काले और मोटे चकत्ते बन जाते हैं । डॉक्टरों को यह भी शक है कि हाइड्रोक्विनोन से लिवर और थायरॉयड ग्रंथि पर विपरीत प्रभाव पड़ता है । साथ ही, यह गर्भ में पल रहे और मां का दूध पी रहे बच्च्े के लिए भी हानिकारक है । शरीर में अधिक मात्रा में हाइड्रोक्विनोन प्रवेश करने पर मितली, सांस में रूकावट और सन्निपात जैसे लक्षण उभर सकते हैंै । इस लेख के आरंभ में एक महिला रोगी का विवरण दिया गया है जिसने स्टेरॉइड युक्त गोरेपन की क्रीम का उपयोग किया था । हालांकि स्टेरॉइड कुछ चर्म रोगों के इलाज में काफी फायदेमंद हैं, किन्तु इनके अत्यधिक उपयोग से कैंसर का खतरा हो सकता है । आजकल भारत में महिलाआें में, खासकर युवतियों में, बिना डॉक्टर की सलाह के स्टेरॉइड युक्त क्रीमों के उपयोग का चलन बढ़ता जा रहा है । साधारण कील-मुंहासों के लिए भी ऐसी दवाइयां अनियंत्रित मात्रा में प्रयोग की जाती है । लंबे समय तक इनका उपयोग बहुत खतरनाक हो सकता है । गोरेपन की दवाइयों में पाया जाने वाला सबसे खतरनाक रसायन पारा है । संसार के अधिकांश देश गोरेपन की पारायुक्त दवाइयों पर प्रतिबंध लगा चुके हैं, किन्तु इनका चोरी-छिपे निर्माण और बिक्री बड़े पैमाने पर हो रहे हैं । पारा एक ऐसा घातक विष है जो तंत्रिका तंत्र को सीधे प्रभावित करता है । इसके कारण किडनी खराब हो जाने, सुनने व बोलने पर विपरीत प्रभाव पड़ने और पागलपन के दौरे पड़ने का खतरा होता है । भारत जैसे विकासशील देशों में जागरूकता के अभाव और भ्रष्टाचार के कारण किसी भी प्रकार की हानिकारक दवा पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाना लगभग असंभव होता है । यद्यपि दवाइयों पर उनमें शामिल अवयवों की जानकारी देना अनिवार्य है, किन्तु संभव है कि कई उत्पादक गोरेपन की दवाइयों के हानिकारक अवयवों की जानकारी छुपा लेते हैं । सबसे अच्छा उपाय यही है कि लोग जागरूक हो जाएं और विज्ञापनों के मायाजाल में उलझ कर अपने स्वास्थ्य को खतरे में न डालें । हमारे देश के अधिकांश भागों में लगभग पूरे वर्ष धूप उपलब्ध होती है । यह एक बड़ा वरदान हैं । धूप से बचाव के लिए अधिकांश भारतीयों को प्रकृति ने मेलानीन का कवच प्रदान किया है । यह प्राकृतिक सांवलापन कोई अभिशाप या लज्जा की बात नहीं है । दरअसल, कृत्रिम उपायों से मेलानीन को नष्ट करके गोरेपन का दिखावा करना एक भयंकर भूल है । विकासशील देशों पर लंबे समय तक गोरे लोगों का कब्जा रहा है । शायद इसीलिए इन देशों के निवासियों में यह भावना घर कर गई है कि गोरे लोग भूरे और काले रंग के लोगों से श्रेष्ठ होते हैं। किन्तु पिछले वर्षो में विकासशील देशों, विशेष रूप से एशियाई देशों, ने सभी क्षेत्रों में जिस प्रकार उन्नति की है उसने गोरी नस्ल के बेहतर होने का तिरस्कार करने का हमारे लिए कोई कारण ही नहीं है; आवश्यकता है अपनी मानसिकता को बदलने की । यदि गोरेपन की दवा का उपयोग करने के अलावा कोई चारा न हो तो बिना प्रशिक्षित डॉक्टर की सलाह से दवा न खरीदें ।***

सोमवार, 20 अगस्त, 2007

१ जीवन शैली

आधुनिक यंत्र और लाचार होता मनुष्य
सुश्री रेशमा भारती
विकास का सूचक और अर्थव्यवस्था का आधार बना तेजी से बढ़ता मशीनीकरण आज आधुनिक जीवन के हर क्षेत्र को संचालित कर रहा है । आधुनिक जीवन मशीनों पर इस कदर निर्भर है कि इसके बिना कई काम रूक जाते हैं । इंटरनेट और मोबाइल भी दूरी व समय की सीमाआे को लांघ कर सारी दुनिया को अपने में समेटने का दावा करते हैं । इस यंत्र युग में सारी दुनिया में हिंसा, शोषण, विषमता और बेरोजगारी भी बढ़ रही है । स्वास्थ्य समस्याएँ और पर्यावरण विनाश भी अपने चरम पर हैं । दौड़ती-भागती जिंदगी में समय का अभाव प्राय: आम शिकायत रहती है । रिश्तों में कृत्रिमता और दूरियाँ बढ़ रही हैं। कई लोग स्वयं को बेहद अकेला महसूस करने लगे हैं । बढ़ती मशीनों ने मनुष्य की शारीरिक श्रम की आदत को कम करके स्वास्थ्य समस्याआें का आधार तैयार किया है । दूरदर्शी गांधीजी ने चेताया था - ''अगर मशीनीकरण की यह सनक जारी रही, तो काफी संभावना है कि एक समय ऐसा आएगा जब हम इतने असमर्थ और लाचार हो जाएेंगे कि अपने को ही यह कोसने लगेंगे कि हम भगवान द्वारा दी गई शरीर रूपी मशीन का इस्तेमाल करना क्यों भूल गए'' (अनुवादित यंग इंडिया, २ जुलाई १९३१) । स्वास्थ्य का आधार तो बिगड़ा ही, साथ ही आधुनिकतम मशीनों ने शरीर और मस्तिष्क संबंधी कई नए किस्म के विकार भी पैदा किए हैं । शारीरिक श्रम करके आजीविका जुटाने वाले अनेक मेहनतकशों के लिए अंधाधुंध बढ़ता मशीनीकरण बेराजगारी, शोषण और भेदभाव की संभावनाएं बढ़ता है । तेजी से बढ़ते मशीनीकरण ने विभिन्न कार्यक्षेत्रों में श्रम का अवमूल्यन और बेरोजगारी की स्थितियां पैदा कर दी हैं । पहले से कमजोर आर्थिक स्थिति वाले कई मेहनतकश इस तथाकथित तरक्की में और लाचार होते जा रहे हैं । उदाहरण के लिए कृषि में कम्बाइन हारवेस्टर मशीन का बढ़ता हुआ उपयोग कटाई के दौरान खेतीहर मजदूरों को मिलने वाली आजीविका का परंपरागत आधार छीन रहा है । गांधीजी ने मशीनों से आने वाली बेकारी पर विशेष चिंता प्रकट की थी, उन्होंने लिखा था, ''मुझे आपत्ति स्वयं मशीनों पर नहीं, बल्कि उनके लिए पागल बनने पर है । यह पागलपन श्रम बचाने वाले यंत्रों के लिए है । लोग श्रम बचाने में लगे रहते हैं । यहां तक कि हजारों लोगों को बेकार करके भूख से मरने के लिए खुली सड़कों पर छोड़ दिया जाता है ।'' (यंग इंडिया, १३.११.१९२४)। बढ़ता मशीनीकरण उपभोक्तावाद को बढ़ावा देकर समाज में विषमता की नींव को पुख्ता करता आया है । एक औद्योगिककृत अर्थव्यवस्था में अंधाधुंध बढ़ता मशीनीकरण वस्तुत: स्थानीय जरूरतों व सीमाआे को लांघकर व्यापक स्तर पर वस्तुआे के उत्पादन, बिक्री या खपत को बढ़ाने की महत्वाकांक्षाआे से प्रेरित होता है । ये महत्वाकांक्षाएं और उनसे बढ़ते उत्पादन का दबाव कच्च्े माल, सस्ते श्रम और बाजार की लालचपूर्ण तलाश को जन्म देता है । यह अंतहीन प्रतिस्पर्धा, शोषण, संसाधनों की लूट, आधिपत्य और साम्राज्यवादी प्रवृत्तियों का आधार तैयार करती है । 'हिंसा' इस प्रक्रियाकी स्वाभाविक परिणति होती है । गांधीजी ने भी यंत्रों के इस शोषणपूर्ण चरित्र का विरोध करते हुए कहा था, ''यंत्रों के मेरे बुनियादी विरोध का आधार यह सत्य है कि यंत्रों ने ही कुछ राष्ट्रों को दूसरे राष्ट्रों का शोषण करने की शक्ति दी है ।'' (यंग इण्डिया, २२ अक्टूबर १९३१) । अधिकतम मुनाफे और बाजार पर छाने की महत्वाकांक्षाआे से प्रेरित बेलगाम मशीनीकरण वाली औद्योगिक अर्थव्यवस्था वास्तव में मजदूरों के शोषण और प्राकृतिक संसाधनों के दोहन पर फलती आई है । जो आधुनिक मशीनें ''मुट्ठी भर लोगों को करोड़ों की पीठ पर सवार होने में मदद करती हैं ।'' गांधीजी उसके विरूद्ध संघर्षरत थे । सन् १९८८ में किशन पटनायक ने भी यंत्रों के चरित्र पर कुछ ऐसे ही बुनियादी सवाल उठाए थे । इस ऐतिहासिक सत्य को हम कैसे भुला सकते हैं कि आधुनिक टेक्नालॉजी को उन्हीं शक्तियों ने विकसित करवाया है जिनका निहित स्वार्थ साम्राज्यवादी संपर्कों को दृढ़ करना था । अरबों डॉलर लगाकर सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिकों को पैसे और प्रतिष्ठा के जरिए प्रलोभित कर जो कंपनियाँया सरकारें दिन-ब-दिन यंत्रों को अधिक क्षमताआे से लैस करा रही हैं क्या उनके सामाजिक चरित्र का पुट इन यंत्रों में प्रकट नहीं हो जाता ? बेलगाम बढ़ती मशीनें ऊर्जा व इंर्धन की खपत बेइंतहा बढ़ाकर पर्यावरण पर भी बोझ डाल रही है और प्रदूषण फैलाकर ग्लोबल वार्मिंग की स्थितियों को और भी विकट बना रही हैं । मशीनों का बढ़ता कचरा पर्यावरण को असीम और स्थायी क्षति पहँुचा रहा है । यंत्रों का बुरा उपयोग आसानी से कर लिया जाता है । यह भी गांधीजी की यंत्रों पर एक प्रमुख आपत्ति थी । इस विरोध की प्रासंगिकता आज और भी बढ़ गई है जब हम देखते हैं कि टीवी, इंटरनेट, मोबाइल आदि कैसे हिंसा व अश्लीलता के प्रचार-प्रसार का प्रमुख माध्यम बन गए हैं । हिंसक, आक्रामक व आतंकवादी शक्तियाँ भी अपने संकीर्ण व विनाशकारी लक्ष्यों की पूर्ति के लिए मशीनों का भरपूर इस्तेमाल कर रही हैं । हथियारों का उद्योग निरन्तर फल-फूल रहा है । इंटरनेट जैसी आधुनिक प्रौद्योगिकी में अंतर्निहित खामियों व खतरों को रेखांकित करते हुए किशन पटनायक ने अपने एक लेख में चेताया था ''आधुनिक साम्राज्यवादी टेक्नालॉजी में पैदा करने की क्षमता नहीं है सिर्फ एकत्रित करने की क्षमता है । आधुनिक विज्ञान का चमत्कार एक तरफ तो एकत्रीकरण का चमत्कार है और दूसरी तरफ ध्वंस का चमत्कार । इंटरनेट और वैश्विक शहर (ग्लोबल विलेज) की परिकलपना ही भयावह है । यह दुनिया के एक फीसदी लोगोे को विश्व श्हरी बनाकर बाकी लोगो को साधनविहीन बना देने का षड़यंत्र है । वैश्विक शहर इंटरनेट ज्ञान की विविधता को नष्ट करने का षड़यंत्र है । ज्ञान का स्थान सूचना ले लेगी और सूचनाआें का काफी हिस्सा गलत तथा अधूरा भी हो सकता है ।'' मशीनों से जिंदगी में आयी तेजी और यांत्रिकता कहीं न कहीं व्यक्ति के व्यवहार व रिश्तों में भी अधीरता, संवेदनहीनता व कृत्रिमता का प्रभाव छोड़ सकती है । मौलिक सोच-विचार की क्षमता और जीवंत अहसास से उत्पन्न संवेदनशीलता का अभाव भी ऐसे समाज में देखा जा सकता है जिस पर मशीनें हावी हों । इस सबके बावजूद हम यह नहीं भूल सकते कि मशीनों के जरूरी व सार्थक उपयोगों की भी कई संभावनाएं मौजूद हैं, बशर्ते कि किसी सार्थक उद्देश्य की पूर्ति का इन्हें ही एकमात्र या प्रमुख साधन न बना लिया जाए । गांधीजी ने यंत्रों के उपयोग पर सीमाएं लगाने पर बल दिया था और विध्वंसक व शोषणकारी यंत्रों का विरोध किया था । ``मैं यंत्र मात्र के विरूद्ब नहीं हूं । मैं यंत्रों की विवेकहीन वृद्धि के खिलाफ हूं । मैं यंत्रों की बाहरी विजय से प्रभावित होने से इंकार करता हूं । मैं तमाम नाशकारी यंत्रों का कट्टर विरोधी हूं । यंत्रों का अधिक से अधिक उपयोग करने के बजाय हमें उनका कम से कम उपयोग करके काम चलाना चाहिए और इसी में समाज की सच्ची सुरक्षा और आत्मरक्षा निहित हैं ।''

सोमवार, 23 जुलाई, 2007

३ जीवन शैली

पारंपरिक खाद्य तेल और सेहत
विभा वार्ष्णेय/सौरव मिश्रा
यंत्रीकृत खाद्य तेल उद्योग घी, मक्खन और सरसों के तेल जैसे पारंपरिक खाद्य तेलों पर श्रेष्ठता दर्शाने के लिए विभिन्न तकनीकी शब्दावलियों का इस्तेमाल किया जाता है । जैसे - सेचुरेटेड फैट्स (संतृप्त् वसीय अम्ल), अनसेचुरेटेड फैट्स (असंतृप्त् वसीय अम्ल), ट्रांसफेटी ऐस्डि्स आदि । हमें यह बताया जाता है कि वनस्पति तेल कोलेस्ट्रॉल के स्तर को कम कर दिल की सुरक्षा करते हैं लेकिन वैज्ञानिक सर्वसम्मति से इस निष्कर्ष पर पहुँच रहे हैं कि ये दावे अत्यंत ही भ्रामक हैं । उनकी राय है कि भोजन में केवल पौष्टिक तेलों का उपयोग किया जाना चाहिए । खाद्य तेल मुख्यत: तीन प्रकार के वसीय अम्लों से निर्मित होते हैं - सेचुरेटेड फैटी एसिड्स (एसएफए), मोनोअनसेचुरेटेड फैटी एसिड्स (एमयूएफए) और पॉलीअनसेचुरेटेड फैटी एसिड्स । इन वसाआं और तेलों की यह विशेषता श्रृंखलाबद्ब अनिश्चित कार्बन परमाणुआ के बीच बनने वाले बंध के कारण होती हैं। सेचुरेटेड फैटी एसिड्स में निकटतम कार्बन परमाणुआ के बीच एकल बंध होता है । एमयूएफए में एकल दोहरा बंध होता है । जबकि पीयूएफए के कार्बन परमाणुआ के बीच एकल बंध होता है । कुछ अम्लीय श्रृंखलाआं जैसे पार्निटिक अम्ल एलडीएल (एक प्रकार का हानिकारक कोलेस्ट्रॉल) के स्तर को बढ़ाता है । ओमेगा ३ और ओमेगा ६ जैसे अम्ल ह्रदय के लिए अच्छे और प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने वाले होते हैं । पारंपरिक भारतीय खाद्य तेल जैसे सरसों और नारियल के तेल में यह गुण भरपूर है । खाद्य तेल उद्योग द्वारा किए जा रहे आक्रामक विज्ञापन के कारण पारंपरिक तेलों का भविष्य खतरे में हैं । १९७० के आरंभ में एसएफए से भरपूर पाम ऑइल को पारंपरिक तेलों के सस्ते विकल्प के रूप में प्रोत्साहित किया गया था और फिर ८० के दशक में असंतृप्त् वसा युक्त कुछ तेलों के प्रति उद्योगों का रूझान बढ़ा । इस बात का जबरदस्त प्रचार किया गया कि केनोला तेल ह्रदय के लिए लाभदायक है इसके पक्ष में यह दलील दी गई कि यह तेल जैतून केतेल के समान है । इन दोनों में एमयूएफए अत्यधिक मात्रा में होता है । जैतून तेल में ह्रदय के लिए मौजूद स्वास्थ्यवर्धक गुणों की जानकारी रखने वाले लोगों को इस पक्ष ने काफी आकर्षित किया । इसके बाद पीयूएफए से भरपूर सूरजमुखी और सोयाबीन तेलों को ह्रदय के लिए सेहतमंद बताया गया । लेकिन वैज्ञानिक समुदाय इन तर्कोंा की तह तक पहुँच चुका है । उदाहरण के लिए, अमेरिकन जर्नल ऑफ न्यूट्रिशियन के १९९७ के अंक में प्रकाशित लेख में, अमेरिकी शोधकर्ता हेनड्रिक, व्हाइट और कुक ने यह दर्शाया कि सोयाबीन तेल का सेवन मानव शरीर के अच्छे कोलेस्ट्राल के उच्च् घनत्व वाले लिपोप्रोटिन (एचडीएल) स्तर को घटता है । यह भी प्रतिपादित किया गया कि सोयाबीन तेल में मौजूद कार्बन गंध पीयूएफए युक्त तेलों को सेचुरेटेड तेलों की तुलना में अधिक क्रियाशील बनाती है । अत: ये वसा ऊतकों में जमा होकर उनके कार्यो को बाधित कर सकती है । केनोला जैसे एमयूएफए युक्त अपारंपरिक तेलों के पक्षकारों के लिए भी यह एक बुरी खबर थी । वर्ष १९९१ में अमेरिका स्थित बॉस्टन युनिवर्सिटी ऑफ पब्लिक हेल्थ के शोधकर्ताआें ने यह प्रमाणित किया कि इस तेल का अत्यधिक उपयोग दिल की बीमारी का कारण है । संसाधित भोज्य पदार्थो में इन नए असंतृप्त् वसा युक्त तेलों का उपयोग इसके दुष्पभावों को कई गुना बढ़ता है । वास्तव में इन तेलों का उपयोग संसाधित भोजन निर्माण के लिए अनुकूल नहीं है । लेकिन अधिकांश असंतृप्त् वसा युक्त तेलों के संतृप्त् वसा युक्त तेलों से कई गुना सस्ते होने के कारण संसाधित खाद्य उद्योग के बजट में आसानी से समा जाते हैं। लेकिन वास्तव में असंतृप्त् वसा युक्त तेलों को हाइड्रोजिनेशन प्रक्रिया के द्वारा खाने योग्य बनाया जाता है । इस प्रक्रिया में हाईड्रोजन के द्वारा असंतृप्त् वसा के दोहरे कार्बन बंध को तोड़ दिया जाता है । इससे रासायनिक युक्त ट्रांसफेटी एस्डि्स बनते हैं जिनके कई दुष्प्रभाव हैं । वे मानव शरीर के प्रतिरोधक प्रणाली को बाधित करते हैं,ऊर्जा चयापचय को कम करते हैं और इंसुलियन के स्तर में वृद्धि करते हैं । ये ट्रांसफैट्स उच्च् घनत्व वाले कोलेस्ट्रॉल के स्तर में भी बढ़ोतरी करते हैं । सामान्यत एमयूएफए एचडीएल के निम्न स्तर को बढ़ाते हैं लेकिन हाइड्रोजिनेशन से एमयूएफए युक्त तेलों का यह गुण नष्ट हो जाता है। निष्कर्षण तकनीकों से भी खाद्य तेलों की गुणवत्ता प्रभावित होती हैं । आमतौर पर खाद्य उद्योग द्वारा बीजों में से तेल निकालने के लिए हेक्सजेन जैसे सॉलवेंट्स का इस्तेमाल किया जाता है । यह तकनीक सस्ती है, उत्पादकता और संग्रहित करके रखे जा सकते की अवधि को बढ़ाती है और उसमें से सभी प्रकार की गंध और स्वाद को भी खत्म कर देती है लेकिन तेल को उबालकर सॉल्वेंट को निष्कासित करना आवश्यक हैं । इससे सभी पौष्टिक तत्व भी नष्ट हो जाते हैं । इसके विपरीत पारंपरिक तेल पीसकर निकाले जाते हैं । ऐसे तेलों में खूशबु और पौष्टिकता बनी रहती है । तेल निकालने की विधियों और उनके घटकों से खाद्य तेलों की गुणवत्ता प्रभावित होती है इस बारे में जागरूकता विकसित देशों में तेजी से बढ़ रही है । मसलन, अमेरिकी नागरिकों के लिए जारी भोजन संबंधी नवीनतम दिशानिर्देशों के अनुसार ट्रांसफैटी एसिड्स देशों में इस विषय में जागरूकता अधिक नहीं है । भारत में आहार शारीरिक गतिविधियों और स्वास्थ्य संबंधी विश्व स्वास्थ्य संगठन की भू-मण्डलीय नीति पर विमर्श हेतु २६ अप्रैल ०६ को नई दिल्ली मं संपन्न सम्मेलन में सरकार को स्वास्थ्य संगठन की भोजन, शारीरिक गतिविधि और स्वास्थ्य पर अंतर्राष्ट्रीय नीति पर संपन्न सम्मेलन में सरकार को स्वास्थ्यकर खाद्य तेलों के प्रति जागरूकता पैदा करने और उन्हें अधिक किफायती बनाने की सलाह दी गई थी । क्या सरकार इसके लिए तैयार है ?