ज्ञान विज्ञान लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएँ
ज्ञान विज्ञान लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएँ

बुधवार, 2 जुलाई, 2008

११ ज्ञान विज्ञान

सिंथेटिक बॉयोलॉजी से `जैविक आतंक'

लंदन में नाटिंघम विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने चेताया है कि सिंथेटिक बॉयोलॉजी के फायदों को देखते हुए यह संभावना बढ़ गई है कि आंतकवादी इसका प्रयोग पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने के लिए कर सकते हैं । उल्लेखनीय है कि सिंथेटिक बॉयोलॉजी एक ऐसी तकनीक है जिससे कृत्रिम जीवन पैदा किया जा सकता है । इसमें कृत्रिम इंजीनियरिंग अंगों का उपयोग किया जाता है । विवि के बॉयोटेक्नोलॉजी एंड बॉयोलॉजिकल साइंसेज काउंसिल ने अध्ययन कर पता लगाया है कि ऐसी तकनीक समाज के लिए अहितकारी हो सकती है अगर वह गलत हाथों में चली जाए । इस तकनीक से जैविक आतंकवाद इस तरह से संभव है कि अगर मानव को ऐसे अंगों का सामना करना पड़े जो उसके लिए मुफीद नहीं हैं तो वह निश्चित ही तकलीफ में पड़ सकता है । इस रिपोर्ट को लिखने वाले वैज्ञानिक एंड्रयू बामर और प्रो. पॉल मार्टिन ने कहा कि हमें डर है कि आतंकी कहीं इस तकनीक को गैरेज बॉयोलॉजी न बनाकर रख दें । इसका मतलब है कि कहीं इस त्तकनीक से संबंधित प्रयोग घरों में न होने लगें जो बहुत ही अनिष्टकारी है । इस रिपोर्ट जिसका शीर्षक है - सिंथेटिक बॉयोलॉजी: सोशल एंड इथिकल चेंजेज में यह चिंता भी जताई गई है कि कहीं कृत्रिम अंगो को वातावरण में खुला नहीं छोड़ दिया जाए, क्योंकि ऐसी हालत में भी वह घातक ही साबित होंगे । अध्ययन के स्त्रोत रहे नार्टिघम विवि ने अंदेशा जताया है कि किसी भी प्रकार की जैविक मशीनें अगर वातावरण में खुली छोड़ी जाती हैं तो वो निश्चित ही उसे नुकसान पहुँचा सकती है और यह किसी आतंकवादी घटना से कम बात नहीं है । वैज्ञानिकों ने कहा है कि अगर ऐसा होता है तो यह भगवान के साथ खिलवाड़ करने जैसा ही है, क्योंकि इसका नतीजा फिर कुछ भी हो सकता है । उन्होंने इस तकनीक को बेहद सुरक्षित बनाए जाने की बात कही ।
मुश्किल में है गांगेय डॉल्फिन

असम सरकार द्वारा ब्रह्मपुत्र नदी की डॉल्फिन को संकटग्रस्त प्राणी घोषित किए जाने के बावजूद वहाँ इनके लुप्त् होने का खतरा बढ़ रहा है । डॉल्फिन से निकलने वाले स्वास्थ्यवर्धक तेल के लिए होने वाला उनका शिकार, दुर्घटनावश मृत्यु और हैबिटाट के खत्म होने से प्रदेश में उनकी संख्या सिकुड़कर २५० रह गई है । अब असम सरकार ने इन्हें बचाने के लिए एक अन्य तरीका खोज निकाला है । असम से होकर बहने वाली ब्रह्मपुत्र नदी और उसके बेसिनों में मीठे पानी यानी नदी जल की डॉल्फिनें पाई जाती है । भारत में डॉल्फिन की इस प्रजाति को `गांगेय डॉल्फिन' कहा जाता है । इनका यह नाम प्रसिद्ध नदीं गंगा में पाए जाने के कारण पड़ा है । वैसे डॉल्फिन की यह प्रजाति उत्तर भारत तथा उत्तर पूर्व की कई सारी नदियों में पाई जाती है । असम में इन्हें `शिहू' कहा जाता है । इस महत्वपूर्ण जलचर को बचाने के लिए राज्य की तरूण गगोई सरकार ने इस डॉल्फिन को `एक्वेटिक स्टेट एनिमल' (प्रादेशिक जलचर प्राणी) घोषित किया है । सरकार का सोचना है कि उसके इस कदम से इस अदभुत प्राणी के अवैध शिकार पर लगाम लगेगी । अब सरकार कह रही है कि वह नदियों के उन क्षेत्रों को जहाँ ये डॉल्फिन पाई जाती है, संरक्षित करेगी ताकि उनकी संख्या में इजाफा हो सके । डॉल्फिन की संख्या कम होने की मुख्य वजह शिकार ही है जिस पर अभी तक काबू नहीं पाया जा सका है । वैसे कई बार यह मछली अनचाहे मछुआरों के जाल में फँस जाती है जबकि मछुआरे उसे पकड़ना नहीं चाहते हैं । लेकिन इस चूक से भी आखिर डॉल्फिन को तो जान से हाथ धोना ही पड़ता है । डॉल्फिन फाउंडेशन के सुजीत बैरागी लंबे समय से डॉल्फिन को बचाने के लिए अभियान चला रहे हैं । उनकी माँग हैं कि इस जीव की जब तक अच्छे तरीके से मॉनीटरिंग नहीं होती तब तक इसे बचाए रखना मुश्किल है इसलिए सरकार को इसकी मॉनिटरिंग के व्यापक इंतजाम करने चाहिए ।
अम्लीय पानी से होगा समुद्री जीवों को नुकसान

वैज्ञानिकों ने दुनिया को चेताया है कि सन् २१०० तक दुनिया के महासागर ज्यादा अम्लीय हो जाएँगे और उससे समुद्रों में पाया जाने वाला कोरल इको सिस्टम नष्ट हो जाएगा । ये तथ्य वैज्ञानिकों द्वारा किए गए एक नए अध्ययन में सामने आए है । `न्यू साइंटिस्ट' में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार संसार के महासागरों की संरचना में परिवर्तन आ रहा है । इटली के समुद्री तट से उथले मेडिटेरियन समुद्री पानी की जाँच के बाद पाया गया कि इस पानी का अम्लीकरण हो रहा है । यह अम्लीकरण मुख्य रूप से समुद्र में कार्बनडाइ ऑक्साइड के घुलने की वजह से हुआ है । इसी कारण समुद्री पानी का पीएच पहले के मुकाबले कम हो रहा है। सन् १९०० मेंजहाँ यह पीएच ८.२ था, वहीं सन् २१०० में इसके ७.८ होने की संभावना है । अध्ययन के अनुसार जब पानी का अम्लीयकरण बढ़ेगा तो पानी में रहने वाले खोल वाले जीव जंतु संकट में आ जाएँगे, क्योंकि इससे उनके खोल धीरे-धीरे समुद्र में घुलने लगेंगे । ब्रिटेन के प्लेमाउथ विश्वविद्यालय के जेसन हॉल-स्पेंसर ने इस विषय पर प्रयोग के लिए दक्षिणी इटली के इशचिया द्वीप को चुना, जहाँ प्राकृतिक तौर पर समुद्री कार्बन -डाइआक्साइड घुल रही थी । उन्होंने सबसे पहले गहरे समुद्री पानी का पीएच मापा जो ८.२ था और इसके बाद उस तटीय क्षेत्र के पानी का पीएच मापा जो गिरकर ७.४ तक आ गया था । उस क्षेत्र में कोरेलीन एलगी, मूंगा चट्टानें और प्रवाल भित्तियाँ पानी में चूर-चूर हो रही थीं । श्री स्पेंसर के अनुसार अम्लीय पानी में जीवन जीना एक मुश्किल काम है, खासतौर से खोल वाले नाजुक जीवों के लिए । वैज्ञानिकों के अनुसार ऐसे पानी में कठोर खोल वाले जीव ही जीवन जी सकते हैं लेकिन उनको ऐसी जगह लाकर बसाया कैसे जा सकता है ? वर्तमान में इस पानी में जो जीव रह रहे हैं, उनके खोल तो इतने नर्म हैं कि आप अपने अँगूठे से भी उनके खोल को दबा सकते हैं ।

और अब बारिश का बैक्टीरिया

क्या बारिश बैक्टीरिया के कारण होती है ? लगता है कि ऐसा ही है । दरअसल लग तो यह रहा है कि बारिश वह तरीका है जिससे बैक्टीरिया वापिस धरती पर पहुंचते हैं । यह निष्कर्ष निकला है दुनियाभर में गिरने वाली बर्फ के विश्लेषण से । इन नमूनों की जांच से पता चला है कि बारिश के बैक्टीरिया दुनिया भर में पाए जाते हैं । दरअसल हवा में जब जल वाष्प की मात्रा बढ़ जाती है, तो वह संघनित होकर पानी या बर्फ के रूप में गिरती है। मगर संसाधन के लिए जरूरी होता है कि हवा में कुछ कण मौजूद हो, जिनके आसपास जल वाष्प के कण इकट्ठे हो सकें । इसीलिए कृत्रिम बारिश लाने के लिए सिल्वर आयोडाइड या शुष्क बर्फ के कण हवा में बिखराएं जाते हैं । यह भी काफी समय से पता है कि हवा में तैरते बैक्टीरिया भी इस तरह की भूमिका निभा सकते हैं । लुइसियाना राज्य विश्वविद्यालय के ब्रेन्ट क्राइसनर का मत है कि यह बरसाती भूमिका वे बैक्टीरिया निभाते हैं जिनकी बाहरी सतह पर कुछ खास किस्म के प्रोटीन होते हैं -इन्हें बर्फ संग्राहक प्रोटीन कहते हैं। मसलन, स्यूडोमोनास सिरिंजे नामक बैक्टीरिया की बाहरी सतह पर एक प्रोटीन होता है जो पानी के अणुआें को इस तरह बांधने में मदद करता है कि वे बर्फ के क्रिस्टल जैसे बन जाते हैं । जब ये क्रिस्टल भारी होकर गिरते हैं तो वर्षा होती है । श्री क्राइसनर और उनके साथियों ने पाया है कि हिमपात के बाद इकट्ठी की गई बर्फ में अधिकांश बर्फ संग्राहक प्रोटीन जैविक स्त्रोतों से आए थे । यदि उनका विचार सही है तो इन बैक्टीरिया अथवा ऐसे प्रोटीन्स का उपयोग कृत्रिम बारिश करवाने में किया जा सकेगा । जैसे स्यूडोमोनास जैसे बैक्टीरिया वनस्पति पर बसते हैं । सूखे की परिस्थिति से निपटने के लिए क्षेत्र में ऐसे पौधे लगाए जा सकते हैं, जिस पर ये बैक्टीरिया पलते हैं । बहरहाल, ऐसी संभावनाआे को साकार करने से पहले काफी अनुसंधान की जरूरत होगी । ***

मंगलवार, 3 जून, 2008

११ ज्ञान विज्ञान

मानव की तरह चलेगा रोबोट


नीदरलैंड के डल्फ्ट तकनीकी विश्वविद्यालय के शोधार्थी ने एक ऐसा रोबोट बनाया है, जो हूबहू मानव की तरह चलता है । डान होबेलिन नामक इस छात्र ने ३० मई को अपनी पीएच-डी पूरी की और इसमें उसने पहली बार खोज कर बताया है कि कि रोबोट ऊर्जा बचाने वाले और स्थायित्व वाले हो सकते हैं । होबेलिन ने इस विषय पर अपने लेखों मेें कहा है कि उन्होने कम्प्यूटर और रोबोट के ऊपर इस तकनीक को आजमाने से पूर्व मानव के चलने के तरीकों का गहन अध्ययन किया था । इन सब बातों का ध्यान उन्होने अपने रोबोट के लिए तकनीक विकसित करने में लगाया उन्होने कहा कि उनका रोबोट उन सभी तरीकों को अपनाता है , जो मानव के है । इस तकनीक से उसकी चाल में सुधार हुआ है और वह मानव की तरह ही चलता है । उन्होने अपने रोबोट का नाम फ्लेम रखा है जिसमें सात मोटर संतुलन के एक विशेष अंग और स्थायित्व कें लिए जोड़-तोड़ किए गए है । अपने इस विशेष अंग के कारण यह चलते समय अपना पूरा संतुलन बनाए रखता है और इस वजह से इसके गिरने के मौके खत्म हो जाते है। होबेलिन के अनुसार फ्लेम दुनिया का एकमात्र ऐसा रोबोट है, जो हूबहू मानव की तरह चलता है । डेल्फ्ट विवि अपनी इस सफलता के बाद अब एक ऐसा रोबोट बनाने की सोच रहा है जो मानव की तरह दौ़़ड और सोच भी सके । वह रोबोट इतना आधुनिक हो कि फुटबॉल भी खेल सके । मानव की तरह चलने वाले रोबोट का प्रदर्शन विवि इंटरनेशनल डायनेमिक वाकिंग २००८ सम्मेलन में भी करेगा ।
करोड़ों साल पहले पृथ्वी के पास थे कई चाँद




वैज्ञनिकों द्वारा ब्राह्माण्ड के पुराने स्वरुप खोजने और उस पर मॉडल बनाए जाने की प्रक्रिया से पता चला है कि करोड़ साल पहले पृथ्वी पर कई चंद्रमाआें के अस्तित्व की संभावना थी । वैज्ञानिकों के अनुसार वह समय पृथ्वी पर कई प्राकृतिक उपग्रहों का था और इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि उस समय पृथ्वी से कई चाँद नजर आते होंगे । न्यू साइंटिस्ट पत्रिका में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार उस समय पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति जिस तरह की थी, उससे तो यहीं प्रतीत होता है कि पृथ्वी के लिए एक से ज्यादा चाँद उपलब्ध होंगे। इस बारे में नासा केेलिफोर्निया स्थित रिसर्च सेंटर के अध्ययन दल के सदस्य जैक लेसर बताते हैं कि यह स्थति लैगरेनगियन कहलाती है जिसमें गुरुत्वाकर्षण शक्ति के बल से कई ग्रह और उपग्रह आपस में जुड़े होते है । ये सभी जिन बिन्दुआे पर एक दूसरे से जुड़ते हैं, उन्हें ट्रोजन कहा जाता है और अगर उस गुरुत्वाकर्षण में कोई छेड़छाड़ नहीं हो तो यह स्थिति लंबे समय तक जस की तस बनी रह सकती है । उस समय पृथ्वी के साथ भी कुछ ऐसी ही स्थित के साथ भी कुछ ऐसी ही स्थिति बनी होगी । अगर कोई अन्य उपग्रह पृथ्वी की कक्षा में उस दौरान आया होगा और ट्रोजन बिंदु पर जम गया होगा तो उस स्थिति में वह उपग्र्रह १०० करोड़ साल तक पृथ्वी के लिए प्राकृतिक उपग्रह की भूमिका निभाता रहा होगा, ठीक उसी तरह जैसे कि आज चन्द्रमा निभा रहा है । बाद में जब उस स्थिमि में कोई बदलाव आया होगा तब वह उपग्रह या तो पृथ्वी की कक्षा से बाहर हो गया होगा या फिर पृथ्वी पर गिरकर नष्ट हो गया होगा । वैज्ञानिकों ने ऐसे उपग्रहों को `ट्रोजन सेटेलाइट' नाम दिया है । वैज्ञानिकों के अनुसार वह स्थिति बहुत रोचक रही होगी, क्योंकि तब ये उपग्रह पृथ्वी के आस-पास ठीक वैसे ही दिखते होंगे जैसे कि वर्तमान में जूपीटर और वीनस ग्रहों के उपग्रह दिखते हैं । वैज्ञानिकों ने इस रिपोर्ट में कहा है कि हो सकता है कि उन उपग्रहों ने पृथ्वी की कक्षा में अरबों साल तक चक्कर लगाए हों और बाद में वे सब लापता हो गए हों ।
सबसे बुर्जुग गोरिल्ला ने ५५वाँ जन्मदिन मनाया

पिछले दिनों अमेरिका में डलास के चिड़ियाघर में रहने वाली दुनिया की सबसे बुर्जुग गोरिल्ला जेनी ने अपना ५५वाँ जन्मदिन मनाया । जंगल में रहने वाले गोरिल्ला की उम्र ३०-३५ वर्ष तक होती है । पालतू प्राणियों या चिड़ियाघर के पिंजरे में बंद जानवरों की उम्र तो सही-सही बताई जा सकती है, परंतु जो जंगल में आजाद रहते हैं उनकी उम्र गिनना आसान नहीं है । इतना तय है कि मनुष्य के साथ पालतू बन कर रहने वालों की उम्र उनके वनवासी भाई-बहनों की तुलना में ज्यादा रहती है । कारण उनकी देखभाल और बेहतर खाने से है । वैज्ञानिकों ने जंगली जानवरों की उम्र का अंदाज ठीक-ठीक लगाने के तरीके खोज निकाले हैं। ये उनकी हडि्डयाँ, दाँत वगैरह को बारीकी से जाँचने के हैं। जिस तरह पेड़ के तने में हर वर्ष एक छल्ला बढ़ता है और सूखे या अच्छे साल के अनुसार छल्ला पतला-मोटा बनता है, प्राणियों की उम्र नापने का तरीका भी यही है ।

कीटनाशक बन सकते हैं कैंसर का कारण
पंजाब में हुए एक शोध के मुताबिक खेती में कीटनाशकों के इस्तेमाल से लोगों के डीएनए को नुकसान पहँच सकता है । शोध के मुताबिक खेत में काम कर रहे मजदूरों में कैंसर का कारण भी यही कीटनाशक हो सकते हैं । पटियाला विश्वविद्यालय के इस शोध में मजदूरों पर महीनों तक अध्ययन किया गया । यही कारण है कि इस शोध को अन्य अध्ययनों से बेहतर माना जा रहा है । कई वर्षो से इस बात पर चिंता जताई जाती रही है कि खेतों में इस्तेमाल होने वाले कीटनाशकों से कैंसर जैसे रोग हो सकते हैं । इस नए अध्ययन में पंजाब के किसानों के डीएनए में परिवर्तन पाया गया जिससे उन्हें कैंसर होने की संभावना बढ़ जाती है । विश्वविद्यालय की प्रोफेसर सतबीर कौर के मुताबिक इस शोध मेंपाया गया कि किसानों की उम्र, उनका शराब या सिगरेट का सेवन करना, इन सब बातों का डीएनए में होने वाले बदलाव से कोई ताल्लुक नहीं है । प्रोफेसर कौर कहती है कि डीएनए में होने वाले परिवर्तन का सबसे संभावित कारण खेतों में कीटनाशकों का छिड़काव ही है । उधर क्रॉप केयर एसोसिएशन के सलिल सहगल का कहना है कि किसानों को होने वाले कैंसर का खेतों में कीटनाशकों के इस्तेमाल से कोई ताल्लुक नहीं हैं । वे कहते हैं -`आज की तारीख में खेतों में ऐसा कोई भी कीटनाशक इस्तेमाल नहीं होता है जिससे कैंसर हो सकता हो ।' श्री सहगल कहते हैं कि किसान कीटनाशक का इस्तेमाल हर सत्र में कुछ ही बार करते हैं, लेकिन किसान का कहना है कि उन्हें कीटनाशकों का इस्तेमाल बहुत ज्यादा बार करना पड़ता है ताकि फसल को नुकसान नहीं पहुँचे । ऐसे वक्त जब खाद्य वस्तुआें की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं और नई फसलों की किस्मों से जिस पैदावार की उम्मीदें लगाई जा रही थीं, वे उम्मीदें पूरी नहीं हो पाई हैं, उस वक्त इस शोध का निष्कर्ष चिंता का विषय है । पटियाला विश्वविद्यालय के इस शोध से सवाल भी खड़े हुए हैं कि क्या गहन खेती ज्यादा दिनों तक चल सकती है ? ***

बुधवार, 21 मई, 2008

१० ज्ञान विज्ञान

वैज्ञानिकों ने खोजा `सबसे बूढ़ा पेड़'
'स्वीडन में करीब दस हजार साल पुराना देवदार का एक पेड़ मिला है जिसके बारे में वैज्ञानिकों का कहना है कि यह दुनिया का सबसे बुजुर्ग पेड़ है । कार्बन डेटिंग पद्धति से गणना के बाद वैज्ञानिकों ने इसे धरती का सबसे पुराना पेड़ कहा है । यूमेआ यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों को दलारना प्रांत की फुलु पहाड़ियों में यह पेड़ वर्ष २००४ में मिला था । उस समय वैज्ञानिक पेड़-पौधों की प्रजातियों की गिनती में लगे हुए थे । फ्लोरिडा के मियामी की एक प्रयोगशाला में कुछ दिनों पहले ही कार्बन डेटिंग पद्धति की मदद से इस पेड़ के आनुवांशिक तत्वों का अध्ययन किया गया है । वैज्ञानिक इससे पहले तक उत्तरी अमेरिका में मिले चार हजार साल पुराने देवदार के ही एक पेड़ को दुनिया का सबसे पुराना पेड़ मानते थे । गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्डस के मुताबिक अभी तक का सबसे पुराना पेड़ कैलिफोर्निया की सफेद पहाड़ियों में है जिसकी उम्र ४,७६८ साल आँकी गई है। माना जा रहा है कि वर्ल्ड रिकॉर्ड अपने नाम करने का दावेदार यह पेड़ हिमयुग के तुरंत बाद का है । फुलु की पहाड़ियों में ९१० मीटर की ऊँचाई पर यह पेड़ जहाँ पर मिला है, उसके आसपास कोणीय पत्तियों वाले लगभग २० और पेड़ों के समूह पाए गए हैं । वैज्ञानिकों का कहना है कि बाकी पेड़ भी आठ हजार साल से ज्यादा पुराने हैं । यूमोआ यूनिवर्सिटी का कहना है कि इन पेड़ों का बाहरी हिस्सा तो अपेक्षाकृत नया है लेकिन पत्तियों और शाखाआें की चार पीढ़ियों का विश्लेषण करने से पता चलता है कि इनकी जड़ें ९,५५० साल पुरानी हैं । यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर लेफ कुलमैन कहते हैं कि इनके तने का जीवन लगभग ६०० साल का होता है लेकिन एक की मौत के बाद जड़ से दूसरा `क्लोन' तना निकल सकता है । कुलमैन कहते हैं कि हर साल बर्फबारी के बाद जब कुछ तने नीचे झुक जाते हैं तो वे जड़ पकड़ लेते हैं । वैज्ञानिक इस खोज से खासे चकित हैं क्योंकि अभी तक कोणीय पत्तों वाले पौधों की इस नस्लों को अपेक्षाकृत नया माना जाता था । कुलमैन कहते हैं, `परिणामों ने बिल्कुल उल्टे नतीजे दिए हैं, कोणीय पत्तों वाले पेड़ पहाड़ियों में सबसे पुराने ज्ञात पौधों में एक हैं ।' उन्होंने कहा कि इन पौधों के मिलने से अनुमान है कि उस समय यह इलाका आज की तुलना में ज्यादा गर्म रहा होगा ।
गिलहरी में दिमाग होता
गिलहरियों को हमेशा ऐसा महसूस होता है कि कोई उन्हें देख रहा है । यह बात तब उजागर होती है जब वे अपना बचा-खुचा भोजन छुपाती हैं । क्योंकि जब वे अपना भोजन छुपाती हैं तो कई बार सिर्फ छुपाने का नाटक करती हैं । ऐसा क्यों करती हैं वे ? गिलहरियां जब भी अपना भोजन छुपाती है, तो हर बार अलग-अलग जगहों पर गड्ढा खोदती हैं। मगर कई बार तो वे यह सब नाटक के तौर पर करती हैं लगभग २० प्रतिशत । यह कहना है माइकल स्टेली का । गिलहरियां जमीन में गड्ढा खोदती हैं जो कि भोजन छुपाने के लिए होता है। भोजन रखने के बाद वे गड्ढे को मिट्टी या पत्तो से ढक देती हैं । वे ऐसा इसलिए करती हैं कि कहीं कोई उनका भोजन चुरा न लें । रोचक बात यह है कि कई बार उन गड्ढों में कुछ नहीं होता है । यानी गिलहरी गड्ढा खोदती है, उसमें कुछ रखने का नाटक करती है, और उसे मिट्टी पत्तों से ढंक भी देती हैं । गिलहरियां इस प्रकार की प्रक्रिया बेवकूफ बनाने के लिए करती हैं । स्टेली का विचार है कि गिलहरी को लगता है कि भोजन छुपाते समय कोई उन्हें देख लेगा । इसलिए वे देखने वाले का ध्यान बंटाने के लिए एक नहीं कई जगह भोजन छुपाने का नाटक करती हैं । इस प्रक्रिया को समझने के लिए स्टेली और उनकी टीम ने गिलहरियों पर निगरानी की गई तब देखा कि गिलहरियों का यह खेल और अधिक बढ़ गया । वह शायद इसलिए क्योंकि उन्हें ऐसा लग रहा था कि कोई उन्हें देख रहा है और उनका भोजन चोरी हो जाएगा । गिलहरियों पर शोध कर रही एक अन्य जीव वैज्ञानिक लिसा लीवर का कहना है कि इस अवलोकन से लगता है कि गिलहरियों के पास `सोचने की शक्ति' और `अस्तित्व का भान' करने की दक्षता होती हैं । वे कहती हैं यह कहना जल्दबाजी होगा लेकिन ऐसा हो सकता हैं ।
जीवन के विवरण का पहला
`जीवन कोश' यानी एन्सायक्लोपीडिया ऑफ लाइफ (ईओएल) का पहला वेब पृष्ठ प्रकाशित हो गया है । महत्वाकांक्षी ईओएल योजना यह हैं कि एक वेब साईट तैयार की जाए जहां दुनिया की जैव विविधता की पूरी जानकारी मिल सके अर्थात धरती की हर प्रजाति को एक-एक पन्न मिल सके । इस वेब साइट की संकल्पना २००३ में जीव वैज्ञानिक एडवर्ड विल्सन द्वारा लिखे गए एक आलेख में प्रस्तुत हुई थी और तब से कुछ लोग इसे साकार करने में लगे हुए हैं । वेबसाइड हींींि://शश्रि.िसी में अंतत: कुल १८ लाख प्रजातियों के बारे में विस्तृत जानकारी होगी और सबसे बड़ी बात यह है कि वेबसाइड सार्वजनिक होगी । इस वेबसाइट को बनाने में दुनिया भर की कई प्राकृतिक इतिहास संस्थाएं भाग ले रही हैं । अब तक कुल ३०,००० पन्ने तैयार हुए हैं, जिन पर प्रत्येक प्रजाति के लिए अन्य वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी की कड़ियां दी गई हैं । इसके अलावा कुछ पन्ने उदाहरण स्वरूप पूरे तैयार किए गए हैं जिन्हें देखकर अंदाज लगाया जा सकता है कि पूरा होने पर यह जीवन कोश कैसा दिखेगा । इस तरह की परियोजना के सामने सबसे बड़ी समस्या तो धन की है । फिलहाल यह अल्फ्रेड पी. स्लोअन फाउण्डेशन और मैकआर्थर फाउण्डेशन के अनुदान से चल रही है । मगर इसके आयोजकों को ज्यादा चिंता इस बात की है कि इस पूरे प्रयास को लंबे समय तक कैसे चलाया जाएगा । आलोचकों का विचार है कि इस तरह की परियोजना में सबसे बड़ी दिक्कत यही होती है कि कुछ समय बाद वित्त दाताआें की रूचि खत्म हो जाती है, शुरूआती रोमांच समाप्त् हो जाता है और फिर इसे चलाए रखना असंभव हो जाता है । आयोजकों की दूसरी चिंता यह है कि वैज्ञानिक समुदाय को इसमें भागीदारी के लिए कैसे प्रेरित किया जाए । परियोजना के कार्यकारी निदेशक जेम्स एडवर्ड इसे सबसे बड़ी चुनौती मानते हैं । आयोजकों को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि जो वैज्ञानिक इसे बनाने में सहभागी होते हैं उन्हें अपने योगदान का उचित श्रेय मिले । बहरहाल, आगे जो भी हो, इस वेब साइट के प्रथम पृष्ठों का लोकार्पण कैलिफोर्निया में टेक्नॉलॉजी, मनोरंजन व डिजाइन सम्मेलन में फरवरी में कर दिया गया है । जैव विविधता संरक्षण की दिशा में यह एक मील का पत्थर साबित होगी।
डॉल्फिन के पास भी शब्द हैं

जब आप डॉल्फिनों की सीटियों को ध्यान से सुनेंगे तो आपको लगेगा कि वे आपस में बातें कर रही हैं । हाल ही में एक प्रोजेक्ट में डॉल्फिनों की सीटियों का बारीकी से अध्ययन के दौरान उनकी सीटियों के प्रकार और व्यवहार में संबंध भी देखा गया है । ऑस्ट्रेलिया के न्यू साउथ वेल्स में स्थित साउथ क्रॉस विश्वविद्यालय के व्हेल रिसर्च सेंटर की लिज हॉकिन्स ने यह अध्ययन बॉटलनोज डॉल्फिनों पर किया । इसके लिए उन्होंने ऑस्ट्रेलिया के पश्चिमी तट की डॉल्फिनों के जीवन में तांक-झांक की । तीन साल की खोज के बाद उन्होंने पाया कि डॉल्फिनों का संवाद बहुत ही पेचीदा होता है, जिसकी वजह से इसे एक मायने में भाषा की संज्ञा दी जा सकती है। हॉकिन्स ने अपने निष्कर्ष साउथ अफ्रीका में केपटाउन स्थित मेरीन मेमोलॉजी सोसायटी में प्रस्तुत किए । डॉल्फिन अपनी भाषा के रूप में सीटियों का इस्तेमाल करती हैं । सभी डॉल्फिनों की अपनी एक विशेष सीटी होती है, जिनके द्वारा उनकी पहचान होती है । इन्हें हम उनके हस्ताक्षर कह सकते हैं । लेकिन जो दूसरे प्रकार की सीटियां हैं वे अभी तक हमारे लिए राज बनी हुई हैं । हॉकिन्स ने बैरन बे में ५१ समूहों में रहने वाली डॉल्फिनों की १६४७ सीटियों को रिकॉर्ड किया । उन्होंने इन सीटियों की प्रारंभिक आवृत्ति, कुल अवधि और अंतिम आवृत्ति पर ध्यान दिया । १८६ विभिन्न प्रकार की सीटियां पहचानी, जिनमें कम से कम २० किस्में ज्यादा आम थीं। इसके बाद उन्होंने सारी सीटियों को ५ टोनल वर्गो (स्वर समूहों) में बांट दिया । अब उन्होंने यह देखना शुरू किया कि किस व्यवहार के साथ डॉल्फिन किस स्वर समूह की सीटी बजाती है । हॉकिन्स ने क्वीन्सलैंड के मोरीटोन द्वीप में रहने वाली डॉल्फिनों के झुंड का भी अध्ययन किया । उन्होंने पाया कि अकेले पड़ जाने पर डॉल्फिन जो सीटियां निकालती हैं, वे एक अलग ही प्रकार ही होती हैं । हॉकिन्स को लगता है कि शायद डॉल्फिन अपनी भाषा में कहती हैं: मैं यहां हँू, बाकी सब कहां हैं ?***


मंगलवार, 15 अप्रैल, 2008

१० ज्ञान विज्ञान

प्लास्टिक के कचरे से सड़क बनेगी


देश के राज्यों में सड़को की खस्ता हालत किसी से छुपी नहीं है । इसके लिए अक्सर किसी स्थान हालत किसी स्थान की भौगोलिक स्थिति और खराब कंस्ट्रक्शन को जिम्मेदारी ठहराया जाता है । लेकिन अब इसका हल खोज लिया गया है । केरल मेंे प्लास्टिक के कचरे से सड़क बनाने का प्रयोग किया गया है । इससे बनी सड़के न सिर्फ टिकाऊ होंगी बल्कि पर्यावरण संरक्षण में भी मददगार साबित होंगी । कोझीकोड स्थित नेशनल ट्रांसपोर्टेशन प्लानिंग एंड रिसर्च सेंटर (एनएटीपीएसी) ने प्रायोगिक तौर पर वतकारा कस्बे में प्लास्टिक के कचरे से ४०० मीटर सड़क तैयार की है । हालांकि यह प्रयोग पड़ोसी राज्यों तमिलानांडु समेत कुछ अन्य राज्यों में पहले ही किया जा चुका है, लेकिन केरल की पर्यावरणीय और मिट्टी की भिन्नता कारण यह प्रयोग सफल नहीं हो सका था । इस पर रिसर्च सेंटर के शौधकर्ताआें ने दोबारा काम शुरू किया और माना जा रहा है कि अब यह प्रयोग सफल हो गया है । केरल मेंे प्लास्टिक का कचरा बहुतायत मेंे निकलता है, जिसके निपटान की पूरी व्यवस्था नहीं होने से यह पर्यावरण के लिए बेहद नूकसानदायक साबित हो रहा है । सड़क निर्माण में कचरे का उपयोग हो जाने से पर्यावरण संरक्षरण की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम बढ़ाया जा सकेगा और साथ ही सस्ती व टिकाऊ सड़क बनाना आसान हो जाएगा । एनएटीपीएसी के कोऑर्डिनेटर एन विजयकुमार कहते हैं कि थिरूवनंतरपुरम की हाइवे इंजीनियरिंग लैब में डेढ़ साल तक प्लास्टिक के कचरे से सड़क निर्माण के फार्मूले पर परीक्षण किया गया और अब प्रायोगिक तौर पर सड़क बना भी ली गई है । उम्मीद है प्रयोग सफल रहेगा ।वे कहते हैं कि केरल की जलवायु और मिट्टी में काफी भिन्नता होने के कारण एक फार्मूले को सभी जगह अमल में लाना संभव नहीं था, लेकिन अब सभी जगह के लिए यह प्रयोग सफलतापूर्वक कर लिया गया है । श्री विजयकुमार का कहना है कि प्लास्टिक के कचरे से सड़क बनाने पर १० प्रतिशत तक डामर की बचत होगी । एकटन प्लास्टिक कचरे से साढ़े तीन मीटर चौड़ी एक किलोमीटर सड़क बनाई जा सकती है । इसमेंे खर्चा भी पारंपरिक डामर की सड़कों की तुलना में काफी कम आता है । इस प्रक्रिया मेंे प्लास्टिक के टुकड़ों को पिघलाकर गिट्टी के साथ मिलाया जाता है । इसमें ध्यान रखने वाली बात यह है कि तापमान १६० से १७० डिग्री सेल्सियस के बीच ही होना चाहिए वरना मिश्रण के चिपकने की क्षमता प्रभावित होती है । केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण मंडल भी इस तकनीक को पर्यावरण हितैषी घोषित कर चुका है
धरती को रूला सकती है हँसाने वाली गैस


वैज्ञानिकों का कहना है कि `लाफिंग गैस' यानी हँसाने वाली गैस के नाम से मशहुर नाइट्रस ऑक्साइड जीवाणुआें की विभिन्न प्रजातियों द्वारा वातावरण में फैलाई जा रही है । वैज्ञानिक कार्बन मोना ऑक्साइड और मीथेन को तो ग्रीन हाउस गैसों में प्रमुख रूप से शुमार करते हैं, लेकिन लाफिंग गैस के खतरों की ओर ध्यान कम ही है । वैज्ञानिकों का कहना है कि जीवाणुआें की अनेक प्रजातियाँ नाइट्रस ऑक्साइड का प्रमुख स्त्रोत हैं । ये ऐसे जीवाणु होते है जो ऑक्सीजन की कमी होने पर नाइट्रोजन का उपयोग शुरू कर देते है । नाइट्रेट्स इन जीवाणुआें में श्वसन तंत्र के अनुकूल हो सकते हैं, और इस तरह जीवाणु एक विशेष प्रक्रिया के जरिए ऊर्जा हासिल करते हैं । इस प्रक्रिया को `डिनाइट्रिफिकेशन' और `अमोनिफिकेशन' कहा जाता है । जब जीवाणु ऐसा करते हैं तो वातावरण में नाइट्रस ऑक्साइड उत्सर्जित करते हैं । ब्रिटेन में नार्विच की ईस्ट एंग्लिया यूनिवर्सिटी के प्रो. डेविड रिचर्डसन का कहना है कि अन्य गैसों की तुलना में नाइट्रस ऑक्साइड को ज्यादा गंभीरता से लिया जाना चाहिए । प्रो. रिचर्डसन के मुताबिक यह वातावरण में उत्सर्जित कुल ग्रीन हाउस गैसों में नाइट्रस ऑक्साइड ९ प्रतिशत होती है, लेकिन कार्बन डायआक्साइड की तुलना मेंे यह ग्लोबल वार्मिंग की ३०० गुना अधिक क्षमता रखती है । यह वातावरण में १५० साल तक टिकी रह सकती है और क्योटो संधि में इसे उन प्रमुख गैसों की सूची में रखा गया था, जिन्हें नियंत्रित रखा जाना जरूरी है । यह गैस मुख्यत: कचरा प्रसंस्करण संयंत्रों और खेती से उत्सर्जित होती है । इसका उत्सर्जन प्रतिवर्ष ५० अंश प्रति अरब (पीपीबी) या ०.२५ प्रश की दर स बढ़ रहा है । प्रो. रिचर्डसन का कहना है कि ग्लोबल वार्मिंग हर किसी को प्रभावित करती है और नाइट्रस ऑक्साइड के उत्सर्जन का जीव विज्ञान समझना ग्लोबल वार्मिंग के दुष्प्रभाव से निपटने की दिशा में पहला कदम होगा ।


बायोडीजल से अस्थमा का खतरा
पेट्रोल-डीजल, घासलेट, सीनजी आदि ईधन, जो गाड़ियों में प्रयुक्त होते हैं, उनसे पर्यावरण को नुकसान होता है । इसी गरज को बायो ईधन निकाले गए,जो पर्यावरण के मित्र कहे जा सकते हैं । परंतु अब विशेषज्ञों ने बायो इंर्धन पर भी आशंका जताई है । अब आदमी करे तो क्या करे । ब्रिटेन में सरकार बायो इंर्धन को सुरक्षित मान रही है, जबकि वैज्ञानिक इसे घातक बता रहे हैं । यहाँ तक कि इसके घातक होने की मोहर एक नोबल पुरस्कार विजेता भी लगा चुके हैं । ब्रिटेन में स्कूल बसों में पर्यावरण हितैषी इंर्धन का इस्तेमाल किया जाता है । परंतु विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह के इंर्धन से बच्चे मेंे अस्थमा की शिकायत बढ़ सकती है । अमेरिका के विशेषज्ञों का कहना है कि बायो इंर्धन जो मक्का, गन्ने या रैपसीड के बने हो, सामान्य ईधन से ज्यादा नुकसान पहुँचाते हैं । उनका कहना है कि सकूल बसों में जब डीजल के साथ बायो ईधन मिलाया जाता है तो हवा में खतरनाक कण जाते हैं, जो सामान्य से ८० प्रश ज्यादा घातक होते हैं । इस वजह से अस्थमा होने की आशंका बढ़ती है । दूषित या खराब हवा के चलते स्वास्थ्य बुरी तरह से प्रभावित होता है । लंदन के मिरर के मुताबिक पर्यावरण संरक्षा समूह लेकॉर्स ने इस संबंध में पहल की है । सरकार में बैठे मंत्रियों से भी पत्र व्यवहार करते हुए कहा कि बायो ईधन से बच्चें का स्वास्थ्य खराब हो सकता है । दूसरी ओर सरकार का दावा यह है कि बायो इंर्धन के कारण प्रदूषण ५० प्रश तक कम हो जाता है । दूसरी ओर एक नोबल पुरस्कार विजेता पॉल क्रजन का कहना कुछ और ही है । १९९५ में नोबल पुरस्कार जीतने वाले इस वायुमंडल के जनकार केमिस्ट का कहना है कि बायो इंर्धन बनाने की चाह में उत्तरी अमेरिका और योरप में जो फसलें बोई जा रही है, वे धरती के लिए ज्यादा घातक है और इससे ग्लाबल वार्मिंग और बढ़ जाएगी । उन्होंने रेपसीड से बनने वाले इंर्धन के प्रति विशेष रूप से सजग किया । अध्ययन कहता है कि कुछ बायो इंर्धन वास्तव में ज्यादा ग्रीनहाउस गैंसे छोड़ते हैं । इसका खास कारण है खेती के दौरान प्रयुक्त उर्वरक । इन्होंने भी जैव-ईधन की विश्वसनीयता पर आशंका व्यक्त की है । उनका कहना है कि रेपसीड से बनने वाला बायो डीजल परंपरागत डीजल के मुकाबले १ से १.७ गुना ज्यादा ग्रीनहाउस गैसे छोड़ेगा । जहाँ तक मक्के की बात है तो वह परंपागत गैसोलीन के मुकाबले १.५ गुना ज्यादा ग्लोबल वार्मिंग करेगा ।


चमकते उद्यागों के काले पहलू

करियर और वेतन के लिहाज के आकर्षक माने जाने वाले बीपीओ, आईआी और इलेक्ट्रोनिक मीडिया जैसे नए क्षेत्र स्वास्थ्य के लिहाज से खतरनाक साबित हो रहे हैं । लेकिन अब इन चमकते उद्योगों के काले पहलू भी सामने आने लगे है । इन उद्योगो में कार्य के घंटे लंबे होते हैं, रात की शिफ्त लंबी अवधि तक चलती है , लक्ष्य कठिन होते हैं, अपनी होते हैं, अपनी पहचान स्थपित करने की कड़ी प्रतिस्पर्धा और नौकरी पर हमेशा असुरक्षा के बादल मँडराते रहते हैं । ये सभी पहलू यहाँ काम करने वालों को दिल के दौरे, हृदय रोग, पाचन की गड़बड़ियाँ, मोटापा, डिपे्रशन, तनाव, अनिद्र और जोड़ो में दर्द शारीरिक एवं मनोवैज्ञानिक सामस्याआें के शिकार बना रहे हैं । एक अनुमान के अनुसार बीपीओ उद्योग में १६ लाख युवा कार्यरत है । करीब इतने ही लोग आईटी एवं इलेक्ट्रोनिक मीडिया में काम कर रहे हैं । विशषज्ञों का कहना है कि इन उद्योगों में काम करने वाले युवाआें की स्थूल जीवन शैली, काम की लंबी अवधि, तनावपूर्ण कार्य स्थितियाँ और तीव्र प्रतिस्पर्धा के कारण इनमें उम्र में ही गंभीर बीमारियाँ पैदा हो रही है । मेट्रो हॉस्पिटल एवं हार्ट इंस्टीट्यूट के निदेशक हृदय रोग विशषज्ञ डॉ. पुरुषोत्तम लाल ने बताया कि लंबे समय तक तनाव में रहने अथवा लंबे समय तक विपरीत एंव तनावपूर्ण कार्य स्थितियों मेंकार्य करने के कारण रक्तचाप ब़़ढने, हृदय की रक्त नलियों में रक्त के थक्के बनने और दिल के दौरे पड़ने के खतरे बढ़ जाते है। उन्होने कहा कि पिछले कुछ वर्षो में पेशेगत कार्यो से संबंधित तनाव, काय्र के घंटे बढ़ने और गलत-गलत रहन-सहन एवं खान-पान, धुम्रपान फास्ट फूड और व्यायाम नहीं करने जैसे कारणों से युवाआें में दिल के दोरे एंव हृदय रोगों का प्रकोप तेजी से बढ़ रहा है । ***

सोमवार, 14 अप्रैल, 2008

१० ज्ञान विज्ञान

सूर्य निगल जाएगा पृथ्वी को !
अंतरिक्ष वैज्ञानिकों ने भविष्यवाणी की है कि सूर्य ७ अरब ६० करोड़ वर्ष बाद पृथ्वी को निगल जाएगा । अखबार `डेली मिरर' ने ससेक्स