इलाज करेगी एक विषैली गैस
कार्बन मोनोऑक्साइड का नाम तो आपने सुना ही होगा । यह गैस शरीर में पहुंच जाए, तो जानलेवा हो सकती है । खून में कार्बन मोनोऑक्साइड पहुंच जाए, तो यह ऑक्सीजन का स्थान ले लेती है, तब खून शरीर के अंगोंको ऑक्सीजन नहीं पहुंचा पाता। मगर अब कुछ वैज्ञानिक कह रहे हैं कि यही कार्बन मोनोऑक्साइड कुछ रोगों में दवा का काम कर सकती है । हाल में किए गए कुछ प्रयासों से पता चला है कि फेफड़ों के रोग (क्रॉनिक ऑब्स्ट्रक्टिव रोग) से ग्रस्त लोगों को कार्बन मोनोऑक्साइड देने पर उनकी हालत में सुधार होता है । इसके अलावा ऐसे भी संकेत मिले हैं कि यह गैस जीर्ण सूजन के मामलों में भी उपयोगी हो सकती है । जंतुआें पर किए गए प्रयोग दर्शाते हैं कि थोड़ी मात्रा में कार्बन मोनोऑक्साइड सूजन कम कर सकती है और ऊतकों को ऑक्सीजन से होने वाले नुकसान से बचा सकती है । वैसे यह बात काफी समय से पता रही है कि जब ऊतकों में सूजन होती है तो खून में ऑक्सीजन रोधी पदार्थ उत्पन्न होते हैं और इसी प्रक्रिया में कार्बन मोनोऑक्साइड भी बनती है । पहले यह सोचा जाता था कि यह उस प्रक्रिया का एक फालतू गौण उत्पाद है । मगर अब लगता है कि यही गैस सूजन को कम करने का काम कर सकती है । कुछ शोधकर्ता कार्बन मोनोऑक्साइड की जांच गठिया व दमा जैसे रोगों के संदर्भ में भी कर रहे हैं । ये ऐसे जीर्ण रोग हैं जिनमें ऊतकों में लगातार सूजन बनी रहती है । कुछ अन्य शोधकर्ता गुर्दा प्रत्यारोपण में भी कार्बन मोनोऑक्साइड की भूमिका पर प्रयोग कर रहे हैं । आम तौर पर प्रत्यारोपण से पहले गुर्दा ऑक्सीजन विहीन परिस्थिति में रखा जाता है । जब इसे प्राप्त्कर्ता के रक्त संचार से जोड़ते हैं, तो ऑक्सीजन इसे नुकसान पहुंचा सकती है । शोधकर्ता जानना चाहते हैं कि क्या कार्बन मोनोऑक्साइड इस क्षति को रोक सकती है । तो इस विषैली गैस के कई चिकित्सकीय उपयोग सामने आने की उम्मीद है, और शायद जल्दी ही सिलेंडरों में कार्बन मोनोऑक्साइड मिलने भी लगे । मगर कुछ अन्य शोधकर्ता ऐसे पदार्थो की खोज कर रहे हैं जिनके सेवन के बाद शरीर में धीरे-धीरे कार्बन मोनोऑक्साइड निकलती रहेगी ताकि उसे सूंघने की जरूरत नहीं पड़ेगी ।***
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बुधवार, 2 जुलाई, 2008
मंगलवार, 3 जून, 2008
प्रसंगवश
पत्र, एक पर्यावरण प्रेमी का
नर्मदा का गिरता जल स्तर
निरंतर गिरते जल स्तर, सतत दोहन, कम होती जल आवक से नर्मदा थम सी गई है । जगह-जगह पत्थर निकल आने से इसका स्थूल रूप बिगड़ गया है । शिव का प्रवाहमान स्वरूप नर्मदा का छरहरापन चौंकने नहीं, चिंतन का विषय है । स्वार्थ और सुविधा के लिए नर्मदा के अत्यधिक दोहन, जिसे शोषण ही कहना अधिक उपयुक्त होगा, की तो परिणति है वर्तमान स्थिति । अमरकंटक से खंभात की खाड़ी तक १३२६ किमी की दूरी तय करने वाली नर्मदा जिन किनारों से साँस लेती है, वे आज प्रदूषण के अड्ढे बनकर रह गए हैं । जिस सतपुड़ा-विंध्याचल-मैकल पर्वतों का पानी पीकर यह सदानीरा रहती है; वे आज वृक्षों से विहीन होते जा रहे हैं । फलत: वहाँ से रिसने वाले जल की आवक में पिछले १५ वर्षो में ५० फीसदी की कमी आ गई है । यही सब जारी रहा तो इतने नहीं, इससे भी कम वर्षो बाद, नर्मदा की क्या हालत होगी, सोचकर ही कलेजा काँप जाता है। यह विडम्बना नहीं तो क्या है, गत ६० वर्षो से इससे `पानी' लेने के `विचार' पर हमने जितना खर्च किया है, उसका ५ प्रतिशत भी इसके रखरखाव पर नहीं लगाया है । इससे नहरें निकालने वाला मनुष्य ही इसमें गंदे नाले बहाकर कृतघ्नता की पराकाष्ठा पार कर रहा है । नर्मदा के जल से खेत और पेटे की आग बुझाने वालों ने ही तो इसके जलग्रहण क्षेत्र में आने वाले वृक्षों को निर्ममता से काट मारा है । एक समय था, जब इसमें समाने वाली ३९ सहायक नदियाँ बारह महीने ही बह कर अपने साथ इसे भी लबालब रखती थीं । स्थिति बदल गई है । अब ये नदियाँ नवंबर, दिसंबर महीने तक ही साथ देती हैं । बाकी ६-७ महीनों तक (वर्षा होने तक) नर्मदा अपने अंत: स्त्रोतों के सहारे ही प्रवाहमान रहती है । कम होती बरसात एवं जल के निरंतर दोहन के चलते ये आंतरिक स्व प्रवाह कब तक साथ देंगे, कहा नहीं जा सकता है । नर्मदा का अखिल सौंदर्य अनंत वैभव लौटाने के लिए जल-जंगल किनारे, प्रदूषण भू-गर्भ की जलग्रहण रचना पर विचार करना होगा । नए सिरे से, अनुसंधान करना होगा, जिससे अपने परिणामों को हम जल्दी और ज्यादा प्रमाण से प्राप्त् कर सके । नर का मद हरने वाली नर्मदा, हमारी मदांधता से किसी दिन धरती से ही हर ली जाएगी, जिसकी दोषी, समस्त नर्मदा संतति ही होगी जगदीश गुरूजी,
घरोंदा, नेमावर(देवास) म.प्र.
स्तम्भ:
प्रसंगवश
बुधवार, 21 मई, 2008
प्रसंगवश
रंग क्यों बदलता है गिरगिट
कई बार प्रकृति की किसी बात की वजह इतनी स्पष्ट रूप से `समझ' में आती है कि हम उस पर दोबारा विचार करने की जरूरत तक नहीं समझते । आम तौर पर जीव-जंतुआें के व्यवहार के बारे में ऐसा ही होता है । जैसे गिरगिट का रंग बदलना । सब लोग फौरन सहमत हो जाते हैं कि गिरगिट अपने परिवेश में घुल-मिल जाने और छिपने के लिए रंग बदलता है । जैसे परिवेश में वह बैठा होगा, वैसा ही उसका रंग हो जाएगा । यह हमें इतना `स्पष्ट' लगता है कि न तो हम अवलोकन की कोई जरूरत समझते हैं, न ही इस `कारण' की जांच पड़ता की । अरस्तू का विचार था कि गिरगिट डर के मारे रंग बदलता है और हम मानते हैं कि वह परिवेश में घुल-मिल जाने यानी कैमोफ्लाज के लिए ऐसा करता है । बहरहाल, हाल में दक्षिण अफ्रीका के गिरगिटोंपर किए गए प्रयोग एकदम उल्टी कहानी कहते हैं । दक्षिण अफ्रीका में बौने गिरगिट की १४ प्रजातियां पाई जाती हैं । इनमें कई उप-प्रजातियां भी हैं । इन सब में रंग बदलने की अदभुत क्षमता पाई जाती है । वैसे इनकी इस क्षमता में काफी विविधता है । ये गिरगिट विभिन्न परिवेश में रहते हैं । कुछ घास के मैदानों में तो कुछ बरसाती जंगलों में । ये अपने बाजू की चमड़ी का रंग बदलते हैं जिसके अलग-अलग कारण होते हैं । जैसे कुछ नर गिरगिट मादा को इशारा करने के लिए रंग बदलते हैं, तो कुछ गिरगिट अपनी आक्रामकता को प्रदर्शित करने के लिए । सवाल यह है कि रंग परिवर्तन का प्रमुख कारण क्या है - छिपना या ज्यादा नजर आना ? ऑस्ट्रेलिया के मेलबोर्न विश्वविद्यालय के डेवी स्टुअर्ट फॉक्स और अदनान मौसाल्ली ने २१ अलग-अलग उप-प्रजातियों के नर गिरगिटों का अध्ययन किया । अध्ययन के लिए उन्होंने इन अलग-अलग समूहों के नरों की भिड़ंत करवाई । उन्होंने यह भी ध्यान दिया कि प्रत्येक गिरगिट किस परिवेश में रहता है और रंग बदलने में किस तरह के रंग अपनाता है । देखा गया कि जो गिरगिट ज्यादा रंग-बिरंगे विविधतापूर्ण परिवेश से आए थे उनमें रंग परिवर्तन में बहुत विविधता नहीं थी । यदि वे इन रंगों का उपयोग परिवेश में छिपने के लिए करते होते, तो उनमें रंग परिवर्तन में भी काफी विविधता होनी चाहिए थी । यह भी देखा गया कि सबसे ज्यादा रंग परिवर्तन करने वाली प्रजातियां परिवेश में घुलने-मिलने की बजाय ज्यादा अलग नजर आती है । तो इन अवलोकनों के आधार पर समूह का निष्कर्ष है कि गिरगिट रंग परिवर्तन का उपयोग सिर्फ छिपने के लिए नहीं करते । कभी-कभी रंग परिवर्तन परिवेश से अलग दिखने के लिए भी किया जाता है । ***
स्तम्भ:
प्रसंगवश
मंगलवार, 15 अप्रैल, 2008
प्रसंगवश
दाँतों के दुश्मन है शीतल पेय
ऊर्जा और ताजगी के लिए पीया जाने वाला एनर्जी ड्रिंक आपके दाँतों को नुकसान पहुँचा सकता है । एक नए अध्ययन में दंत चिकित्सकों ने यह बात कही है । अध्ययन के दौरान बाजार में उपलब्ध पाँच ड्रिंक्स में एसिड के स्तर का परीक्षण भी किया गया । इसमें पाया गया कि हाई एनर्जी और स्पोर्ट्स ड्रिंक में सबसे ज्यादा एसिड की मात्रा होती है, जो दाँतों को खराब करने के लिए काफी है । उल्लेखनीय है कि सॉफ्ट ड्रिंक इन दिनों युवाआें और किशोरों के बीच काफी लोकप्रिय हैं । यही कारण है कि इस उम्र के लोगों में दाँतों की समस्या सबसे ज्यादा सामने आ रही है । अतिरिक्त ऊर्जा के लिए लोग अक्सर कोई न कोई एनर्जी ड्रिंक पीते हैं । ऐसे डिं्रक शरीर में ऊर्जा तो भर देते हैं लेकिन ये दाँतों को बेहद नुकसान पहुँचाते हैं । यहाँ तक कि दाँत कमजोर और खराब होकर निकल तक जाते हैं । इससे पहले के शोध भी यह चेतावनी देते आए हैं कि सोडा या अन्य एनर्जी ड्रिंक का पीएच स्तर दाँतों के लिए घातक है । ऐसे डिं्रक में मौजूद एसिड दाँतों की संरचना बिगाड़ सकते हैं और दाँतों में सड़न लगने लगती है । अध्ययन कहता है कि आइस टी, रूट बीयर ही नहीं बल्कि कुछ खाद्य पदार्थ जिनमें एसिड होता है भी हर दिन दाँतों को किसी न किसी रूप में नुकसान पहुँचाते हैं । हालाँकि अध्ययन की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि दाँतों में खराबी के लिए सिर्फ सॉफ्ट ड्रिंक के पीएच स्तर को ही जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है । बल्कि ड्रिंक के एसिड को पचाने की क्षमता भी दाँतों के सड़न में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। अमेरिकन डेंटल एसोसिएशन के प्रवक्ता रेमंड मार्टिन कहते हैं कि सोडा, स्पोर्ट्स डिं्रक और एनर्जी ड्रिंक्स से दाँतों में होने वाली सड़न का इलाज जल्द से जल्द करवाना चाहिए वरना बड़ी समस्या पैदा हो सकती है । इसके लिए सबसे पहले जरूरी है कि सॉफ्ट ड्रिंक वगैरह से दूरी बना ली जाए । यह शोध जनरल डेंटिस्ट्री, एकेडमी ऑफ जनरल डेंटिस्ट्री के ताजा अंक में प्रकाशित हुआ है । ***
स्तम्भ:
प्रसंगवश
सोमवार, 11 फ़रवरी, 2008
प्रसंगवश
सही जानकारी
भारत में सिंचाई क्षेत्र की क्षमता में लगातार वृद्धि
पर्यावरण डाइजेस्ट के दिसम्बर ०७ अंक में प्रकाशित संपादकीय सामग्री में सिंचित क्षेत्र मेंकमी के आंकड़ों पर कुछ जागरूक पाठको ने हमारा ध्यान आकर्षित किया है । वास्तव में यह सामग्री सर्वोदय प्रेस सर्विस (सप्रेस) के १९ अक्टूबर ०७ के बुलेटिन से ली गयी थी । सप्रेस ने इसे बांधों, नदियों एवं लोगों का दक्षिण एशिया नेटवर्क द्वारा जारी विज्ञिप्त् एवं रिपोर्ट के आधार पर जारी किया था । हम अपने पाठकों को सही जानकारी मिल सके इस हेतु भारत सरकार द्वारा जारी आंकड़े सविस्तार दे रहे हैं । भारत सरकार के एक दस्तावेज में कहा गया है कि मौजूद प्रणालियों को सुदृढ़ करने के साथ-साथ सिंचाई सुविधाआे का विस्तार खाद्यान उत्पादन बढ़ाने की रणनीति का एक प्रमुख हिस्सा रहा है । सिंचाई सुविधा के प्रणालीबद्ध विकास के साथ बड़ी मध्यम और छोटी सिंचाई परियोजनाआे की कुल क्षमता १९५१ में २२.६ मिलियन हेक्टेयर (एम.एच.ए.) से बढ़कर वर्ष २००४-०५ के अंत तक लगभग ९८.८४ मिलियन हेक्टेयर हो गयी है । इसमें २००० में १०,००० हेक्टेयर के बीच के क्षेत्र मध्यम परियोजना और १०,००० हेक्टेयर से ऊपर के क्षेत्र बड़ी परियोजनाआे के अंतर्गत आते है । दसवींयोजना की शुरूआत में १६२ बड़ी परियोजनायें थी जिन पर कुल व्यय १४०९६८.७९ करोड़ रूपये अनुमानित था, जबकि २२१ मध्यम परियोजनाआे पर १२७६८.७७ करोड़ रूपये व्यय तथा ८५ विस्तार नवीनीकरण और आधुनिकीकरण परियोजनाआेपर २१२५६.५० करोड़ रूपये कुल व्यय होने का अनुमान था ।
आशा है हमारे पाठकों को इससे सही जानकारी प्राप्त् हो गयी होगी । इसी प्रकार जागरूक पाठकों से पत्रिका की संपादकीय सामग्री पर उनके विचार आमंत्रित है ।-प्र. संपादक
स्तम्भ:
प्रसंगवश
शनिवार, 12 जनवरी, 2008
प्रसंगवश
नदी को राष्ट्रीय संपत्ति क्यों नहीं माना जाता?
पिछले दिनोंकेंद्रीय जल संसाधन मंत्री सैफुद्दीन सोज ने यह सुझाव दिया कि देश की प्रमुख नदियों को राष्ट्रीय नदियाँ और राष्ट्रीय संपत्ति घोषित कर केंद्रीय शासन के क्षेत्राधिकार में शामिल किया जाना चाहिए । केन्द्रीय जल संसाधन मंत्री ने ऐसी बारह नदियों को `राष्ट्रीय' घोषित करने का सुझाव दिया है । ये नदियाँ हिमालय व काराकोरम, विंध्य, सतपुड़ा, छोटा नागपुर, सह्यादि व पश्चिमी घाट पर्वत श्रृंखलाआे से निकलती हैं और अरब सागर व बंगाल की खाड़ी में गिरती हैं । गंगा, सिंधु, नर्मदा, कावेरी, महानदी, ब्रह्मपुत्र, कृष्णा, ताप्ती, दामोदर, यमुना, सतलज, चंबल, झेलम आदि नाम अत्यंत श्रृद्धा एवं प्रेम से लिए जाते हैं । देश में १३५०० किलोमीटर लंबी नदियों की अनेक सहायक नदियाँ और शाखाएँ भी हैं । नदियाँ प्रकृति की देन हैं और मानव जाति के विकास, समृद्धि एवं कल्याण की आधार हैं । नदियाँ मानव-सभ्यता के विकास का स्त्रोत रही हैं । उनसे जो जल प्राप्त् होता है, वह पीने के पानी के अलावा मानवीय स्वास्थ्य, कृषि, उद्योग, व्यवसाय, परिवहन, निर्माण कार्य, सफाई और बिजली उत्पादन के लिए भी काम आता है । सिंचाई और विद्युत के लिए इतनी खास जरूरत है । मगर इन नदियों पर किसी खास स्थान, क्षेत्र, राज्य का आधिपत्य स्वीकार कर हम दूसरे राज्य के लोगों को नदी के कारण मिलने वाले लाभों से वंचित कर देते हैं । भारतीय संविधान में `जल' को राज्यों के क्षेत्राधिकार वाली सूची में रखा गया है। इसलिए नदी के जल को लेकर अनेक मौकों पर विभिन्न राज्यों में परस्पर विवाद चलते रहते हैं । कम से कम उन नदियों को जो एक से अधिक राज्यों के क्षेत्र में बहती है, राष्ट्रीय नदी घोषित करना चाहिए और अंतरराज्यीय विवादों से मुक्त कर देना चाहिए । भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची की ५६वीं प्रविष्टि में केन्द्र को अधिकार दिया गया है कि वह अंतरराज्यीय नदी विवादों का निराकरण कर सकता है । मगर नदी का उद्गम, प्रवाह क्षेत्र और निस्तार अलग-अलग राज्यों में हो और प्रत्येक राज्य उसके जल पर अपना दावा करें और क्षेत्रीय तत्व अपना प्रभुत्व दिखलाना चाहे तो विकास का सिलसिला धीमा होना स्वाभाविक है । आखिर नदी तो प्रकृति की देन है और जल का निर्माण मनुष्य या राज्य नहीं करता है । जैसे देश की धरती पूरे देश की है, वैसे नदी भी पूरे देश की है, यह मानने में किसी को आपत्ति क्यों होनी चाहिए ? नदी किसी एक स्थान या क्षेत्र की नहीं हो सकती है ।इस भावना से नदी विवादों को सुलझाया जाना चाहिये । ***
स्तम्भ:
प्रसंगवश
शनिवार, 15 दिसंबर, 2007
प्रसंगवश
क्या इन्सान को अंतरिक्ष में भेजना ज़रूरी है ?
कई अंतरिक्ष वैज्ञानिक यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या मानव को अंतरिक्ष में भेजकर हम कोई ऐसा ज्ञान प्राप्त् कर पाते हैं तो मानवरहित अभियानों से प्राप्त् नहीं किया जा सकता। अंतरिक्ष वैज्ञानिक फिलिप बॉल को लगता है कि मानवरहित अंतरिक्ष अभियानों से ऐसी कोई जानकारी नहीं मिलती जो तत्काल जरूरी हो या जिससे विज्ञान छलांग लगाने लगे । खासकर यह बात तब ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है जब मानवरहित अंतरिक्ष अभियान के सस्ते विकल्प मौजूद हैं । जैसे हाल ही में युरोपियन स्पेस एजेंसी का फोटॉन-३ मिशन सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। इस अभियान की खास बात यह थी कि युरोप के करीब ४५० छात्रों ने इसमें भाग लिया और कई महत्वपूर्ण प्रयोग किए गए । जैसे, इस अभियान के दौरान यह समझने के प्रयास किए गए कि अंतरिक्ष से बैक्टीरियानुमा जीव के पृथ्वी पर पहुंचने की कितनी संभावना है । वैसे इनमें से कोई भी प्रयोग ऐसा नहीं था जिससे विज्ञान में किसी नाटकीय प्रगति की अपेक्षा की जाए मगर मानवसहित अभियानों में भी तो यही स्थिति होती है । मानवसहित अंतरिक्ष अभियान कम से कम दस गुना महंगे होने के अलावा खतरों से भरे भी होते हैं । अंतत: अधिकांश वैज्ञानिक शोध धीमे-धीमे क्रमश: ही होता है और छात्रों का जुड़ाव फोटॉन-३ मिशन का अतिरिक्त लाभ था । फोटॉन-३ मिशन पूरी तरह यंत्रचालित था । अत: यह सवाल उठ रहा है कि जब यह संभव है तो मानव मिशन भेजे ही क्यों जाएं । जैसे यदि यह देखना है कि शून्य गुरूत्व की स्थिति में अंतरिक्ष यात्रियों की हडि्डयों की वृद्धि पर क्या असर पड़ता है, तो पहली बात तो यह है कि आप यह क्यों देखना चाहते हैं ? बताया जाता है कि इससे भविष्य में अंतरिक्ष यात्रियों को बेहतर तैयारी के साथ भेजा जा सकेगा । मगर यदि रोबोट्स वही काम कर देते हैं तो इन्सानों को वहां भेजना ही नहीं पड़ेगा । दूसरी बात यह है कि ऐसे ही अध्ययन जंतुआे के ऊतकों की मदद से भी किए जा सकते है । फोटॉन-३ मिशन में ऐसा एक प्रयोग किया भी गया है । दूसरी ओर, रॉयल एस्ट्रॉनॉमिकल सोसायटी ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि मानव अभियान बहुत जरूरी हैं क्योंकि इनसे हमें चिकित्सा संबंधी विशिष्ट जानकारी मिलती है । वैसे सोसायटी ने स्पष्ट नहीं किया है कि यह `विशिष्ट' जानकारी क्या है । लगता है मानवसहित अंतरिक्ष अभियानों का ग्मैलर ही उनकी शक्ति है ।
स्तम्भ:
प्रसंगवश
गुरुवार, 8 नवंबर, 2007
पुण्य स्मरण
पर्यावरण प्रेमी पत्रकार सुदेश पौराणिक का निधन
वन्यजीव सुरक्षा एवं पर्यावरण संरक्षण से जुड़े बालाघाट म.प्र. के युवा पत्रकार सुदेश पौराणिक का १४ अक्टूबर ०७ को हृदयाघात से निधन हो गया । ४८ वर्षीय श्री पौराणिक एक समर्पित वन्य जीव प्रेमी एवं कुशल वन्य जीव छायाकार रहे हैं । पिछले एक दशक से वे मध्यप्रदेश में वन्य प्राणी संरक्षण के क्षेत्र में एक सक्रिय कार्यकर्ता के रूप में कार्य कर रहे थे । डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय सागर से स्नातक एवं बरकतउल्ला विश्वविद्यालय भोपाल से फोटोग्राफी कर पत्रोपाधि प्राप्त् करने के उपरांत वे १९८४ से देश के प्रमुख राष्ट्रीय उद्यानों एवं अभ्यारण्यों में वन्य जीवन छायांकन करने के साथ ग्रीन जर्नलिज्म से भी जुड़े रहे । उन्होंने वन्य जीव एवं पर्यावरण संरक्षण पर सैकड़ों आलेख लिखे जो अनेक प्रतिष्ठित समाचार पत्रों एवं पत्रिकाआे मंे प्रकाशित हुए । पर्यावरण डाइजेस्ट में उनके अनेक लेख प्रकाशित हुए हैं । माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय भोपाल से ग्रामीण पत्रकारिता का प्रशिक्षण प्राप्त् श्री पौराणिक ने प्रदेश के कुछ प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में समाचार सम्पादक एवं संवाददाता के रूप में भी कार्य किया । विश्व विख्यात कान्हा राष्ट्रीय वन उद्यान से वन्य जीवन छायांकन एवं संरक्षण का सफर प्राप्त् करने वाले वाईल्डलाईफ जर्नस्टि श्री पौराणिक वर्तमान में सतपुड़ा वन्य जीवन संरक्षण समिति नामक स्वयं सेवाी संस्था के माध्यम से वन्य जीवन एवं पर्यावरण संरक्षण के कार्य में जुटे थे । श्री पौराणिक को ५ जून २००३ को विश्व पर्यावरण दिवस पर नई दिल्ली में एक समारोह में तत्कालीन उपराष्ट्रपति भैरोसिंह शेखावत द्वारा मेदिनी पुरस्कार दिया गया । श्री पौराणिक के निधन पर म.प्र. के जनसम्पर्क एवं संस्कृति मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा ने अपने शोक संदेश में कहा है कि श्री पौराणिक के निधन से प्रदेश के पत्रकार जगत को अपूर्णीय क्षति पहुंची है । उनके द्वारा वन्य प्राणी संरक्षण एवं पर्यावरण संरक्षण में दिये गये योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकेगा । म.प्र. के लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी मंत्री तथा जिले के प्रभारी मंत्री चौधरी चंद्रभान सिंह ने श्री पौराणिक के निधन पर शोक व्यक्त करते हुए कहा कि बहुमुखी प्रतिभा के धनी श्री पौराणिक के निधन से जिले एवं प्रदेश ने एक वन्य जीव प्रेमी पत्रकार खो दिया है । पर्यावरण डाइजेस्ट परिवार भी अपने सहयोगी के निधन पर श्रृद्धांजलि अर्पित करता है ।
स्तम्भ:
प्रसंगवश
शुक्रवार, 7 सितंबर, 2007
प्रसंगवश
सन् २०२५ तक चाँद पर इंसान भेजेगा रूस
रूस २०२५ तक चाँद पर इंसान उतारने की योजना बना रहा है । इसके तुरंत बाद उसका इरादा वहां स्थायी बेस बनाने का भी है । गौरतलब है कि अभी तक एक बार ही इंसान चाँद पर उतरा है , वह था नासा का १९६८ में किया गया अपोलो अभियान। रूसी स्पेस एजेंसी रॉसकॉसमॉस ने आगामी ३ दशकों की अपनी योजनाआे की जानकारी दी । स्पेस एजेंसी के प्रमुख अनातोली परमिनोव ने योजनाआें का जिक्र करतेहुए कहा कि अनुमान है कि हम २०२५ तक चाँद पर इंसान भेजने के लिए तैयार होंगें । इतना ही नहंी २०२७ से २०३२ के बीच हम वहाँ अंतरिक्ष यात्रियों के रहने के लिए स्टेशन भी बना सकेंगें । श्री परमिनोव ने यह भी साफ किया कि अमेरिकी स्पेस प्रोग्राम को होने वाली फंडिंग की तुलना में हमें १० फीसदी से भी कम मिलता है, फिर भी हमारे इरादे बुलंद है । हम अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (आईएसएस) में अपने हिस्से के सेक्शन का काम हर हाल में २०१५ तक पूरा कर लेंगें, जिससे कि स्टेशन पूरी तरह काम कर सके। इसके अलावा स्पेस स्टेशन तक लोगों और सामान को ले जाने में इस्तेमाल होने वाले सोयूज स्पेसक्राप्ट में भी बड़े बदलाव की योजना है । इसे और हाईटेक किया जाएगा । चंद्र अभियान के बाद हमारा जोर मंगल पर होगा । हमें उम्मीद है कि २०३५ के बाद हम वहाँ भी इंसान भेजने में सक्षम होगें । उनके मुताबिक, ग्रहों का बहुत मुश्किल वातावरण भविष्य के अभियानों के लिए सबसे बड़ी चुनौती है । हालिया स्पेसक्रॉप्ट भी अभियानों के बाद धरती की और लौटने के लिए अंतरिक्ष यात्रियों की जरूरत के मुताबिक सुरक्षा में सक्षम नहीं हैं । इन यानों में स्टोरेज स्पेस की कमी और अंतरिक्ष यात्रियों में तनाव जैसी मुश्किलें अलग हैं । इन सभी समस्याआे को ध्यान में रखकर तैयारी की जा रही है । ***
स्तम्भ:
प्रसंगवश
सोमवार, 20 अगस्त, 2007
प्रसंगवश स्वतंत्रता दिवस
गांधीजकी की दृष्टि में भारतीय लोकतंत्र
सर्वोच्च् कोटि की स्वतंत्रता के साथ सर्वोच्च् कोटि का अनुशासन और विनय होता है । अनुशासन और विनय से मिलने वाली स्वतंत्रता को कोई छीन नहीं सकता । संयमहीन स्वच्छंदता, संस्कारहीनता की द्योतक है, उससे व्यक्ति की अपनी और पड़ोसियों की भी हानि होती है । यंग इंडिया, ३-६-२६ कोई भी मनुष्य की बनाई हुई संस्था ऐसी नहीं है, जिसमें खतरा न हो । संस्था जितनी बड़ी होगी, उसके दुरूपयोग की संभावनाएं भी उतनी ही बड़ी होगी । लोकतंत्र एक बड़ी संस्था हैं, इसलिए उसका दुरूपयोग भी बहुत हो सकता है, लेकिन उसका इलाज लोकतंत्र से बचना नहीं, बल्कि दुरूपयोग की संभावना को कम से कम करना है ।यंग इंडिया ७-५-३१ जनता की राय के अनुसार चलने वाला राज्य जनमत से आगे बढ़कर कोई काम नहीं कर सकता । यदि वह जनमत के खिलाफ जाएगा तो नष्ट हो जाएगा । अनुशासन और विवेकयुक्त जनतंत्र दुनिया की सबसे सुन्दर वस्तु है, लेकिन राग-द्वेष, अज्ञान और अंधविश्वास आदि दुर्गुणों से ग्रस्त जनतंत्र अराजकात के गड्डे में गिरता है और अपना नाश खुद कर डालता हैं ।यंग इंडिया, ३०-७-३१ प्रजातंत्र का सार ही यह है कि उसमें हर व्यक्ति उन विविध स्वार्थो का प्रतिनिधित्व करता है, जिनसे राष्ट्र बनता है । यह सच है कि इसका यह मतलब नहीं कि विशेष स्वार्थो के विशेष प्रतिनिधियों का प्रतिनिधित्व करने से रोक दिया जाये, लेकिन ऐसा प्रतिनिधित्व उनकी कसौटी नहीं है । यह उसकी अपूर्णता की एक निशानी है ।हरिजन सेवक २२.४.३९ आजाद प्रजातांत्रिक भारत आक्रमण के खिलाफ पारस्परिक रक्षण और आर्थिक सहकार के लिये दूसरे आजाद देशों के साथ खुशी से सहयोग करेगा । वह आजादी और जनतंत्र पर आधारित ऐसी विश्व व्यवस्था की स्थापना के लिये काम करेगा, जो मानव जाति की प्रगति और विकास के लिये दुनिया के समूचे ज्ञान और उसकी समूची साधन सम्पत्ति का उपयोग करेगा ।
हरिजन २३.९.२९
स्तम्भ:
प्रसंगवश
सोमवार, 23 जुलाई, 2007
प्रसंगवश
जलवायु को थामना आसान नहीं
जलवायु परिवर्तन संबंधी अंतर्सरकारी पैनल यानी आई. पी. सी. सी. की ताजा रिपोर्ट के अनुसार ग्रीन हाऊस गैसों के उत्सर्जन को सीमित करना जरूरी है और यह काफी कम लागत में संभव भी है । यू.एस.ए. जैसे कुछ देशों का कहना है कि इन गैसों, खासकर कार्बन डाईऑक्साइड के उत्सर्जन पर बहुत कठोर प्रतिबंध लगाने की कोशिश की गई, तो विश्व में आर्थिक मंदी आएगी । आई. पी. सी. सी. के कार्यकारी समूह की रिपोर्ट में कहा गया है कि वैश्विक तापमान वृद्धि के भयंकरतम प्रभावों से बचने के लिए ग्रीन हाऊस गैसों को जिस सीमा तक कम करना होगा उसमें वर्ष २०३० तक विश्व के कु ल आर्थिक उत्पादन का ३ प्रतिशत खर्च होगा - यानी प्रति वर्ष करीब ०.१२ प्रतिशत । पहले जो अनुमान लगाए गए थे, उनकी तुलना में यह बहुत सस्ता है । मगर इसमें कई अगर-मगर हैं । जैसे यू.एस. अधिकारियों का मत है कि इतने से भी दुनिया में आर्थिक मंदी आएगी । इसलिए ग्रीन हाऊस गैसों की सीमा थोड़ी बढ़ाकर तय करना बेहतर होगा । आई. पी. सी. सी. की उपरोक्त रिपोर्ट में मानकर चला गया है कि यदि हम वैश्विक तापमान में वृद्धि को २ डिग्री सेल्सियस से कम रख सकें तो इसके असर बहुत खतरनाक नहीं होंगे । इसके लिए वायुमण्डल में ग्रीनहाऊस गैसों की मात्रा को ४५०-५०० पी. पी. एम. के बीच स्थिर करना होगा । फिलहाल वायुमण्डल में इन गैसों की मात्रा ४३० पी. पी. एम. के तुल्य है और इसमें प्रतिवर्ष २ पी. पी. एम. की वृद्धि हो रही है । यदि हम ५३५ पी. पी. एम. पर टिकना चाहते हैं, तो इस सदी के मध्य तक ग्रीनहाऊस गैसों के उत्सर्जन में ५०-८५ प्रतिशत की कटौती करनी होगी । इसके लिए ऊर्जा का अधिक कार्यकुशल उपयोग और वैकल्पिक ऊर्जा स्त्रोतों का उपयोग करना ही पर्याप्त् होगा। अलबत्ता यदि हम थोड़ी ढील दें और कोशिश करें कि ग्रीनहाऊस गैसों की मात्रा को ५३५-५९० के बीच स्थिर हो तो खर्च और भी कम होगा । तब हमें २०३० तक विश्व के आर्थिक उत्पादन का मात्र ०.२-२.५ प्रतिशत खर्च करना होगा । यदि ग्रीनहाऊस गैसों और तापमान को थोड़ा और ऊपर जाने दें तो ऊर्जा के कार्यक्षम उपयोग से दुनिया के सकल घरेलू उत्पाद के ०.६ प्रतिशत के बराबर लाभ भी संभव है ।
स्तम्भ:
प्रसंगवश
मंगलवार, 26 जून, 2007
प्रसंगवश
भारत अखबारों का दूसरा बड़ा बाजार
न्यूज चैनलों और मोबाईल पर खबरों की भरमार के बावजूद भारत में अखबारों की प्रसार संख्या २००६ में करीब १३ फीसदी बढ़ी है । खासकर जब पूरी दुनिया में अखबारों की प्रसार संख्या २.३ फीसदी बढ़ी । इसमें भी चीन और भारत का बड़ा योगदान है। अखबारों के बाजार में चीन के बाद भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा बाजार बन गया है ।
यह रोचक तथ्य वर्ल्ड ऐसासिएशन ऑफ न्यूजपेपर्स (वान) के एक अध्ययन में उभरकर आया है । अखबारों की प्रसार संख्या एशिया , यूरोप , अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका में बढ़ी है । केवल उत्तरी अमेरिका में अखबारों की प्रसार संख्या घटी है ।खरीदे जाने वाले अखबारों में विज्ञापन से आय भी पिछले साल ३.७७ फीसदी बढ़ी ह्ै । चीन , जापान और भारत को जोड़ दिया जाए तो दुनिया के सौ सबसे ज्यादा बिकने वाले अखबारों में ६० इन तीनों देशों में हैं । पांच बड़े बाजारों में चीन, भारत,जापान, अमेरिका, जर्मनी है । अखबार खरीदने के मामले में जापानी अब भी दुनिया में सबसे आगे है।
* २९ मई १८२६ को कलकत्ता से
पं. युगल किशोर शुक्ल के सम्पादन में
साप्तहिक उदंत मार्तण्ड
का प्रकाशन हुआ था ।
इसलिए २९ मई के दिन को
देश में हिन्दी पत्रकारिता दिवस के रूप में
मनाया जाता है ।
मुफ्त में बंटने वाले अखबारों को खरीदे जाने वाले अखबारों की संख्या में जोड़ दिया जाए तो अंतराष्ट्रीय प्रसार संख्या में ४.६१ फीसदी का इजाफा हुआ है । मुफ्त बंटने वाले दैनिकों की प्रसार संख्या दुनियाभर में केवल ८ फीसदी है। वान की रिपोर्ट के बारे में सीईओ तिमोेती बाल्डिंग का कहना है कि नतीजे उम्मीद से बेहतर आए हैं बल्कि इंटरनेट के विस्तार का ज्यादा फर्क नहीं पड़ता है । ज्यादातर पाठक आज भी सबसे पहले अखबार पढ़ना पसंद करते हैं । बाल्डिंग का कहना है कि डिजिटल वितरण की सुविधा का लाभ अखबार बखूबी ले रहे हैं ।
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