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शनिवार, 28 अप्रैल, 2007

वृक्ष : जीवंत परंपरा के संवाहक

वानिकी जगत

वृक्ष : जीवंत परंपरा के संवाहक

डॉ. खुशालसिंह पुरोहित

वृक्षों का मनुष्य से अलग अपना कोई इतिहास नहीं है। वृक्षों की पूजा दरअसल एक मायने में अपने पूर्वजों को आदर प्रकट करने का माध्यम है, जिसकी वजह से आज तक प्रकृति का संतुलन बना रहा है। आज समाज सिर्फ भविष्य की ओर देख रहा है, परन्तु वह यह भूल रहा है कि अंतत: यह प्रकृति ही है जो उसे जिंदा रखेगी।

मानव जीवन के तीन बुनियादी आधार शुद्ध हवा, ताजा पानी और उपजाऊ मिट्टी मुख्य रुप से वनों पर ही आधारित है। इसके साथ ही वनों से कई अप्रत्यक्ष लाभ भी है जिनमें खाद्य पदार्थ, औषधियां, फल-फूल, इंर्धन, पशु आहार, इमारती लकड़ी, वर्षा संतुलन, भूजल संरक्षण और मिट्टी की उर्वरता आदि प्रमुख है।

जिस पर्यावरण चेतना की बात विकसित देश अब कर रहे है, वह आदिकाल से भारतीय मनीषा का मूल आधार रही है। भारतीय संस्कृति वृक्ष पूजक संस्कृति है। हमारे देश में वृक्षों में देवत्व की अवधारणा और उसकी पूजा की परम्परा प्राचीनकाल से रही है। जहां तक वनस्पतियों के महत्व का प्रश्न है, भारतीय प्राचीन ग्रंथ इनकी महिमा से भरे पड़े है। वृक्षों के प्रति ऐसा प्रेम शायद ही किसी देश की संस्कृति में हो, जहां वृक्ष को मनुष्य से भी ऊंचा स्थान दिया जाता है एवं उनकी पूजा कर सुख और समृद्धि की कामना की जाती है। हमारी वैदिक संस्कृति में पौधारोपण व वृक्ष पूजन की सुदीर्घ परम्परा रही है। प्रयाग का अक्षयवट, अवंतिका का सिद्धवट, नासिक का पंचवट (पंचवटी) गया का बोधिवृक्ष, वृंदावन का वंशीवट जैसे वृक्ष केन्द्रित श्रद्धा के केन्द्रो की परम्परा अनेक शताब्दियों पुरानी है।

वैदिक काल में प्रकृति के आराधक भारतीय मनीषी अपने अनुष्ठानों में वनस्पतियों को विशेष महत्व देते थे। वेदों और आरण्यक ग्रंथों में प्रकृति की महिमा का सर्वाधिक गुणगान है, उस काल में वृक्षों को लोकदेवता की मान्यता दी गयी। वृक्षों में देवत्व की अवधारणा का उल्लेख वेदों के अतिरिक्त प्रमुख रुप से मत्स्यपुराण, अग्निपुराण, भविष्यपुराण, पद्मपुराण, नारदपुराण, रामायण, भगवद्गीता और शतपथब्राह्मण आदि ग्रंथो में मिलता है। मोटे रुप में देखे तो वेद, पुराण, संस्कृत और सूफी साहित्य, आगम, पंचतंत्र, जातक कथाएं, कुरान, बाईबिल, गुरुग्रंथ साहब हो या अन्य कोई ग्रंथ होसभी में प्रकृति के लोकमंगलकारी स्वरुप का वर्णन है। पर्यावरण के प्रति सामाजिक सजगता और पौधारोपण के प्रति सतर्कता हमारे ऋषियों ने निर्मित की थी, पौधारोपण कब, कहां और कैसे किया जाये उसका लाभ और वृक्ष काटे जाने से होने वाली हानि का विस्तारपूर्वक वर्णन हमारे सभी धर्मो के ग्रंथो में है।

दुनिया में सभी प्राचीन सभ्यताआें का आधार मनुष्य का प्रकृति के प्रति प्रेम और आदर का रिश्ता है। इसी में पेड़, पहाड़ और नदी का अवतार के रुप में मनुष्यों, प्राणियों की पूजा की परम्परा का प्रचलन हुआ। मोहनजोदड़ों और हड़प्पा की खुदाई से मिले अवशेषों से पता चलता है कि उस समय समाज में मूर्ति पूजा के साथ ही पेड़-पौधों एवं जीव-जन्तुआें की पूजा की परम्परा भी विद्यमान थी। भारतीय साहित्य, चित्रकला और वास्तुकला में वृक्ष पूजा के अनेक प्रसंग मिलते है। अजंता के गुफाचित्रों और सांची के तोरण स्तंभों की आकृतियों में वृक्ष पूजा के दृश्य है। जैन और बौद्ध साहित्य में वृक्ष पूजा का विशेष स्थान रहा है। पालि साहित्य में विवरण है कि बोधिसत्व ने रुक्ख देवता बनकर जन्म लिया था।

हमारे सबसे प्राचीन ग्रंथ वेदों में प्रकृति की परमात्मा स्वरुप में स्तुति है। इसके साथ ही वाल्मिकी रामायण, महाभारत और मनुस्मृति में वृक्ष पूजा की विविध विधियों का विस्तार से वर्णन है। नारद संहिता में २७ नक्षत्रों की नक्षत्र वनस्पति की जानकारी दी गयी है। हर व्यक्ति के जन्म नक्षत्र का वृक्ष उसका कुल वृक्ष है, यही उसके लिये कल्पवृक्ष है, जिसकी आराधना कर मनोवांछित फल प्राप्त किया जा सकता है। सभी धार्मिक आयोजनों एवं पूजापाठ में पीपल, गुलर, पलाश, आम और वट वृक्ष के पत्ते (पंच पल्लव) की उपस्थिति अनिवार्य होती है। नवग्रह पूजा अर्चना के लिये नवग्रह वनस्पतियों की सूची है जिसके अनुसार उन वृक्षों की पूजा-प्रार्थना से ग्रह शांति का लाभ मिल सकता है।

हमारे प्राचीन साहित्य में जिन पवित्र और अलौकिक वृक्षों का उल्लेख है उनमें कल्पवृक्ष प्रमुख है। कल्पवृक्ष को देवताआें का वृक्ष कहा गया है, इसे मनोवांछित फल देने वाला नंदन वृक्ष भी माना जाता है। भारत में बंबोकेसी कल के अड़नसोनिया डिजिटेटा को कल्पवृक्ष कहा जाता है। इसको फ्रंासीसी वैज्ञानिक माइकल अडनसन ने १७५४ में अफ्रीका में सेनेगल में सर्वप्रथम देखा था, इसी आधार पर इसका नाम अड़नसोनिया डिजिटेटा रखा गया। नश्वर जगत का कोई भी वृक्ष इसकी विशालता, दीर्घजीविता और आराध्यता में बराबरी नहीं कर सकता है। यह धीरे-धीरे बढ़ता है और सैकड़ो वर्षो तक जिंदा रहता है। भारत में समुद्रतटीय प्रदेशों गुजरात, महाराष्ट्र और केरल में कल्पवृक्ष बहुतायत से मिलते है। देश के कुछ चर्चित कल्पवृक्षों में हिमालय में जोशीमठ, राजस्थान में मांगलियावास, बालुन्दा और बांसवाड़ा के कल्पवृक्ष प्रमुख है।

पौराणिक ग्रंथ स्कंदपुराण के हेमाद्रि खंड के अनुसार पांच पवित्र छायादार वृक्षों के समूह को पंचवटी कहा गया है, जिसमें पीपल, बेल, बरगद, आवंला व अशोक शामिल है। पुराणों में दो प्रकार की पंचवटी का वर्णन किया गया हैं। प्रत्येक में इन पांच प्रजातियों की स्थापना विधि, एक नियत दिशा, क्रम व अंतर के स्पष्ट निर्देश है।

भगवान बुद्ध के जीवन की सभी घटनाये वृक्षों की छाया में घटी। आपका जन्म सालवन में एक वृक्ष की छाया में हुआ। इसके बाद प्रथम समाधि जामुन वृक्ष की छाया में, बोधि प्राप्ति पीपल वृक्ष की छाया में ओर महानिर्वाण साल वृक्ष की छाया में हुआ। भगवान बुद्ध ने भ्रमणकाल में अनेको वनों एवं बागो में प्रवास किया था। इनमें वैशाली की आम्रपाली का आम्रवन, पिपिला का सखादेव आम्रवन, नांलदा का पुरवारीक आम्रवन व अनुप्रिय का आम्रवन के नाम उल्लेखनीय है। उसके अतिरिक्त राजाग्रह निम्बिला और कंजगलके वेणु वनों का संबंध भी भगवान बुद्ध से आया है। जैन धर्म में जैन शब्द जिन से बना है, इसका अर्थ है समस्त मानवीय वासनाआें पर विजय करने वाला। तीर्थ का शाब्दिक अर्थ है नदी पार कराने का स्थान अर्थात घाट। धर्मरुपी तीर्थ का जो प्रवर्तन करते है वे तीर्थंकर कहलाते है। तपस्या के रुप में सभी तीर्थकरों को विशुद्ध ज्ञान (कैवल्य ज्ञान) की प्राप्ति किसी न किसी वृक्ष की छाया में हुई थी, इन वृक्षों को कैवली वृक्ष कहा जाता है।

सिख धर्म में वृक्षों का अत्यधिक महत्व है। वृक्ष को देवता रुप में देखा गया हैं गुरुकार्य में उपयोग आने वाले धर्मस्थल के पास स्थित वृक्ष समूह को गुरु के बाग कहा जाता है। इनमें गुरु से जुड़े कुछ वृक्ष निम्न है - नानकमता का पीपल वृक्ष, रीठा साहब का रीठा वृक्ष, टाली साहब का शीशम, और बेर साहब प्रमुख है। इसके साथ ही कुछ बेर वृक्ष भी पूजनीय और प्रसिद्ध है। इनमें दुखभंजनी बेरी, बाबा की बेरी और मेहताबसिंह की बेरी के वृक्ष शामिल है।

पृथ्वी पर पाये जाने वाले जिन पेड़-पौधों का नाम कुरान-मजीद में आया है, उन पेड़ों को पूजनीय माना गया है। इन पवित्र पेड़ों में खजूर, बेरी, पीलू, मेहंदी, जैतून, अनार, अंजीर, बबूल, अंगुर और तुलसी मुख्य है। इनमें कुछ पेड़-पौधों का वर्णन मोहम्मद साहब (रहमतुल्लाह अलैहे) ने कुरान मजीद में किया हैं इस कारण इन पेड़ पौधों का महत्व और भी बढ़ जाता है। हम सभी धर्मग्रंथ पेड़-पौधों के प्रति प्रेम और आदर का पाठ पढ़ाते है। इसी प्रेम और आदरभाव से वृक्षों की सुरक्षा कर हम अपने जीवन में सुख, समृद्धि प्राप्त कर सकते है।

आज की सबसे बड़ी समस्या वनों के अस्तित्व की है। भोगवादी सभ्यता के पक्षधर सारी दुनिया में पेड़ को पैसे के पर्याय के रुप में देखते है, यही कारण है कि दुनिया का कोई हिस्सा ऐसा नहीं बचा है जहां वृक्ष हत्या का दौर नहीं चल रहा हो। हमारे यहां सुखद बात यह है कि भारतीय संस्कृति की परंपरा वृक्षों के साथ सहजीवन की रही है। पेड़ संस्कृति के वाहक है। यहां प्रकृति की सुरक्षा से ही संस्कृति की सुरक्षा हो सकती है। इस कारण यहां जंभोजी महाराज की सीख है जिसमें कहा गया है कि सिर साटे रुख रहे तो सस्तो जाण, इसी क्रम में धराड़ी और ओरण जैसी परम्पराआें ने जातीय चेतना को प्रकृति चेतना से आत्मसात कर वृक्ष पूजा और वृक्ष रक्षा से जीवन में सुख-समृद्धि की कामना की है। आज इसी भावना को विस्तारित कर हम अपने भविष्य को सुरक्षित रख सकते है।

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मंगलवार, 27 फ़रवरी, 2007

टेडी बेयर कोआला

प्राणी जगत


डॉ. चंद्रशीला गुप्ता

कोआला को अक्सर ऑस्ट्रेलियाई भालू समझ लिया जाता है। जबकि यह भालू न होकर कंगारु समूह यानी मार्सूपीलिया का सदस्य है।

वैज्ञानिक इसे फेस्कोलेक्टस सिनेरियस कहते हैं। इसका ठिगना, गठीला शरीर स्लेटी रंग के फर से ढंका रहता है। तकरीबन 10-12 किलोग्राम के बिना पूंछ वाले इस जंतु के गोल चेहरे पर हास्यापद नाक व 2 बड़े-बड़े कान होते हैं। यह कोई जीवित प्राणी नहीं बल्कि टेडी बियर ही दिखाई देता है।

एक समय यह पूर्वी ऑस्ट्रेलिया में लाखों की तादाद में पाया जाता था क्योंकि स्थानीय निवासी धार्मिक विश्वासों के चलते कोआला का शिकार नहीं करते थे। लेकिन उन्नीसवीं शताब्दी में जब सभ्य समाज को इसके फर का महत्व पता चला, तो सामूहिक संहार होने लगा। शिकारी कुत्तों द्वारा पहले इन्हें जंगल से मैदानों की तरफ खदेड़ा जाता था, जहां शिकारी इनका काम तमाम कर देते थे। जैसे इतना ही काफी नहीं तो प्राकृतिक प्रकोप भी इन नन्हें प्राणियों पर टूटा और एक महामारी ने इन्हें विलुप्ति की कगार पर ला खड़ा किया।

बाद में विभिन्न संरक्षण योजनाओं व सख्त नियमों की वजह से ये बचे। बीसवीं शताब्दी में इन्हें एक फ्रांसीसी द्वीप पर ले जाया गया। बेरोक वृध्दि से वहां इनकी संख्या इतनी ज्यादा हो गई कि वहा अनेक वृक्ष खत्म होते नज़र आने लगे। तब वहां से इन्हें आस-पास के टापुओं व मुख्य द्वीप पर स्थानांतरित किया गया।

पहले इनका भोजन युकेलिप्टस की पत्तियां एवं कलियां माना गया था लेकिन बाद में ज्ञात हुआ कि इस वंश की अन्य प्रजातियां भी इनके भोज्य वृक्षों में शामिल है। अपने पैने नाखूनों की मदद से ये आसानी से पेड़ों पर चढ़ जाते हैं और मौसम के अनुसार श्रेष्ठ पत्तियां या कलियां चुनकर खाते हैं।

युकेलिप्टस की पत्तियों में एक तीखी गंध वाला तेल होता है जो इनकी आंतों में अवशोषित होकर रक्त द्वारा गंध पैदा होती है। यह गंध परजीवियों को विकर्षित करती है। कोआला मूत्र में ग्लूकोरोनिक अम्ल की काफी मात्रा उत्सर्जित करता है। वैज्ञानिक मानते हैं कि यह युकेलिप्टस के तेल को निर्विष करने के दौरान पैदा होता है।

कोआला एक ऑस्ट्रेलियाई जनजातीय शब्द है जिसका अर्थ जल विहिन होता है जो इसके पानी न पीने की आदत की तरफ इंगित करता है। दरअसल इसकी खाद्य पत्तियों में पर्याप्त मात्रा में पानी होता है। अतः इसे पानी पीने की जरुरत नहीं होती है। वैसे कोआला एक अच्छा तैराक है और पानी में जाता रहता है और पानी से निकलने के बाद यह फर में लगा पानी चाटता है। कभी-कभी यह वर्षा के बाद पोखरों में जमा पानी पीते भी देखा गया है।

मार्सूपीलिया समूह का होने के कारण इसमें भी कंगारु जैसी बच्चे पालने वाली थैली यानी मार्सूपियम पाई जाती है। कोआला का गर्भकाल छोटा (30-35 दिन का) होता है। जन्म के समय शिशु मात्र 5 ग्राम का व कुछ से.मी. लम्बा होता है। यह इतना अपरिपक्व होता है कि यदि इसे थैली में पहुंचने में घण्टा भर देरी हो जाए तो यह जीवित नहीं रह पाता है। लेकिन ऐसा होता नहीं है, यह जन्म स्थान से फर में रेंगता हुआ तुरंत थैली में पहुंच जाता है जो मात्र कुछ से.मी. की दूरी पर स्थित होती हैं।

कोआला की थैली विशिष्ट होती है, कंगारु से ठीक उलट इसका मुंह नीचे की ओर होता है। बच्चा इसमें से गिरता नहीं है क्योंकि मां बहुत सावधान रहती है और पैरों पर झुकते हुए चलती है। करीब 4-5 माह यह इस थैली (प्राकृतिक इन्क्यूबेटर) में रहता है व 450 ग्राम का हो जाता है। इसके बाद भी यह मां का दूध पीने थैली में आता-जाता रहता है। शेष समय मां की पीठ पर लदा रहता है। शिशुओं को मां के मलद्वार से निकलते द्रव को चाटते भी देखा गया है। इस द्रव की संरचना मल से भिन्न होती है, इसमें पत्तियों के पेप्टोन्स पाए गए हैं। एक वर्ष की आयु से पहले यह पेड़ पर नहीं चढ़ते हैं। करीब 4 वर्ष में शिशु प्रजनन के काबिल हो जाते हैं और इनकी औसत आयु लगभग 20 वर्ष है।

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शनिवार, 16 दिसंबर, 2006

बाघ और पर्यटन में क्या हो प्राथमिकता ?

वन्य जीवन

बाघ और पर्यटन में क्या हो प्राथमिकता ?

- नंदलालसिंह

विश्व प्रसिद्ध बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व अनियंत्रित पर्यटन वन्य एवं वन्य जीवों के संरक्षण तथा वन्य जीवों एवं वनवासियों के बीच सहजीवी रिश्ते को लेकर एक बार फिट विराट प्रश्नों के सामने खड़ा है।

टाइगर रिजर्व के अधिकारियों के अरण्य संस्कृति विरोधी अड़ियल रवैये के कारण जहां एक तरफ यह सारी परियोजना जहाँ खतरे में पड़ गई है, वहीं आसपास के क्षेत्रों में भय, आशंका एवं क्रोध व्याप्त है। गत अगस्त माह से टाइगर रिजर्व के पनपथा अभ्यारण्य वाले हिस्से में रहने वाले बाघ बाघिनों ने पालतु पशुआें एवं चरवाहों पर हमला शुरु किया। अब तक १०० पशुआें तथा २ चरवाहों को वह मार चुका है। बाघ-बाघिनों के व्यवहार में आये इस परिवर्तन की जिम्मेवारी टाइगर रिजर्व प्रशासन चरवाहों पर डालकर अपना अपराध छिपाने की नाकाम कोशिश कर रहा है, जबकि लोकजीवन एवं मीडिया इसके लिए प्रशासन को दोषी मान रहा है। टाइगर रिजर्व प्रशासन ने एक बाघिन को पकड़कर भोपाल के वनविहार में भेज दिया है, किंतु गांव वालों का कहना है कि वह आक्रमण करने वाली बाघिन नहीं है। इस विश्वास के कारण ग्रामीणजन भय, आशंका एवं आक्रोश से भरे हुए हैं।

बाँधवगढ़ इतिहास एवं पुरातत्व की दृष्टि से भी अति महत्वपूर्ण स्थान है। बाँधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान के बीचो बीच स्थित बाँधव पहाड़ पर स्थित किला अनेक ऐतिहासिक घटनाआें का मौन साक्षी रहा है। अब यह पार्क पर्यटन के नाम हो रही विनाशलीला का गवाह बन रहा है। मध्यप्रदेश सरकार ने ३ जनवरी ९३ को बाँधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान एवं पनपथा अभ्यारण्य को मिलाकर इसे बाँधवगढ़ टाइगर रिजर्व घोषित किया था। बाँधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान एवं पनपथा अभ्यारण्य मिलाकर इसका क्षेत्रफल ६९४.६८ वर्ग किलोमीटर है। वर्ष १९९८ की वन्य पशुगणना के अनुसार इस टाइगर रिजर्व में बाघों की संख्या ५०-५७ तक थी।

एक अध्ययन में पाया गया है कि अनियंत्रित पार्क पर्यटन का भारी दुष्प्रभाव वन्यजीवन, पर्यावरण तथा स्थानीय आबादी पर पड़ रहा है। अध्ययन में पाया गया कि पर्यटन के लिए पशुआें को विशेष कर बाघों को परेशान किया जाता है। हाथी एवं जिप्सी से उसका पीछा किया जाता है उनका रास्ता रोका जाता है। शिकार करते समय एवं शिकार खाते समय व्यवधान डाला जाता है। जानवरों को खड़े होने, चलने के लिए बाध्य किया जाता है, इसके लिए उन पर पत्थर फेंके जाते हैं एवं डरावनी आवाजें निकाली जाती हैं। बेहतर फोटोग्राफिक स्थिति में लाने के लिए भी यही बस गैर कानूनी हरकतें की जाती हैं। निर्धारित सड़क से हटकर वाहन चलाने, नये सड़कों के निर्माण, पर्यटन के लिए रखे गये हथियों द्वारा वनों का विनाश होता है। पर्यटकों के द्वारा बाघ को देखने के जितने मामले का अध्ययन किया गया, उसमें से ४२.०९ प्रतिशत मामलों में बाघ ने शिकार खाना छोड़ दिया। इसका कारण संभवत: उसके आसपास हथियों एवं पर्यटकों की उपस्थिति थी।

एक अन्य महत्वपूर्ण समस्या है पार्क के टाइगर जोन में पर्यटकों का भारी दबाव। ६६ प्रतिशत बाघ दर्शन मात्र २ स्थानों पर किया गया। इसके कारण पार्क के अन्य स्थानों का भ्रमण छूट जाता है। गाइड मैप के आधार पर जो आंकड़े इकट्ठे किये गये, उससे पता चला कि पार्क ६५ प्रतिशत हिस्से में पर्यटन नहीं होता।

बाघ केन्द्रित पर्यटन के कारण उसके शिकार करने तथा जीवित रहने के अवसरों पर भारी विपरीत प्रभाव पड़ रहा है। विशेष रुप से इसका प्रभाव बाघ के बच्चों पर पड़ता है क्योंकि वे अपने क्षेत्र के निर्धारण तथा वहां बसने की प्रक्रिया से गुजर रहे होते हैं। पनपथा अभ्यारण्य के आसपास जो कुछ हो रहा है, वह सब उपरोक्त कारणों से ही हो रहा प्रतीत होता है। इस बारे में समाचार पत्रों में प्रकाशित खबरों एवं गांव वालों के कथन पर विश्वास किया जाए तो एक बड़े होटल समूह के लोगो ने बंद पार्क में घूमने की अनुमति प्राप्त कर ली तथा सारे नियमों को बलाए-ताक रखते हुए बाघों को तरह-तरह से परेशान किया।

एक अध्ययन में यह बात आई है कि औसत प्रतिदिन २ से ३ महत्वपूर्ण व्यक्ति पार्क में भ्रमण के लिए आते हैं और उनके लिए पार्क के सारे नियमों को शिथिल कर दिया जाता है। इससे सामान्य पर्यटकों को भी हौसला बढ़ता है और वे टिप एवं रिश्वत देकर अनेक तरह की छूट प्राप्त कर लेते हैं।

पार्क पर्यटन का उद्देश्य यह है कि पर्यटकों को संरक्षणवादी विचारों से अवगत कराए जाए तथा उनके अंदर यह संस्कार मजबूत किया जाए। इस प्रयास का यहां नितांत अभाव है। पार्क के १० किलोमीटर की यात्रा, हाथी की सवारी और मात्र २ मिनिट बाघ का दर्शन कर बाहर निकल आने से यह उद्देश्य पूरा नहीं होता।

इको डेवलपमेंट कार्यक्रम को ठीक तरीके से लागू न करने के कारण गांव वालों का पार्क से दुराव हो गया है। उनका निस्तार रोका गया है जबकि बाहरी लोग पार्क का भ्रमण करते हैं। इसके कारण भी उनके मन में पार्क प्रशासन के प्रति विरोध का भाव है। पार्क पर्यटन से होने वाली अधिकांश आय बाहरी लोग ले जाते हैं। इसका लाभ स्थानीय लोगों को नहीं मिलता।

भारतीय वन नीति में इस तथ्य को रेखांकित किया गया है कि वन्य प्राणियों एवं आदिवासियों के बीच एक सहजीवी रिश्ता है, पर पार्क प्रशासन उन्हें दुश्मन मानता है। उन्हें विश्वास में लेना एवं उनसे संवाद करना अपनी तौहीन समझता है। पार्क की स्थापना के क्षेत्र के ग्रामीण अनेकों कठिन समस्याआें से जूझ रहे हैं। उनके मवेशियों का चरने का क्षेत्र सीमित होता जा रहा है, वे विस्थापन झेल रहे हैं, उनके आम निस्तार पर रोक लग गयी है, वे वनोपज संकलन नहीं कर सकते, पार्क के अंदर की पट्टे आराजी की जमीन का न मुआवजा मिला न उसके बदले जमीन। काबिज लोगों का व्यवस्थापन नहीं हुआ। जंगली जानवर पालतू जानवरों को मार डालते हैं साथ ही उनकी फसलों को नष्ट करते है।

इसके कारण उन्हें पूरी रात जागकर शोर मचाते रहना पड़ता हैइससे उनकी जीवनशैली बदल गई है। उनकी सांस्कृतिक गतिविधियों पर रोक लगा दी गई है। उनको अवैध शिकार के झूठे प्रकरणों में फंसाया जाता हैं । उनकी जमीनों को गलत तरीके से हथिया कर उसे पर बड़े-बड़े होटल एवं रिसोर्ट बन रहे हैं तथा वन ग्रामों में कोई शासकीय सुविधा नहीं है। वही चराई का क्षेत्र सिकुड़ते जाने से २६००० पालतु पशुआें का जीवन भी दूभर होता जा रहा है।

पार्क पर्यटन की वर्तमान अनियंत्रित स्थिति तथा पार्क अधिकारियों के रवैये से वन को, वन्य जीवों को, आसपास के ग्रामीणों को एवं संपूर्ण अरण्य संस्कृति को खतरा है। लाभ में है तो मात्र पार्क के अधिकारी और बड़े-बड़े होटल व्यवसायी। पार्क अधिकारी अपनी सारी असफलताआें को गलतबयानियों से ढकते हैं। जब स्थिति बिगड़ती है तो कुछ आदिवासियों या वनवासियों के विरुद्ध झूठे मामले बनाकर, उन्हें भारी यंत्रणा देकर, जेल में डाल देते हैं। उनकी यंत्रणा से हुई ग्रामीण की मृत्यु के कारण पार्क के कुछ अधिकारी जेल की हवा भी खा चुके हैं।

पर्यटन नीति में आमूल चूल परिवर्तन के बिना, उस लक्ष्य की प्राप्त नहीं किया जा सकता, जिसको लेकर इस पार्क की स्थापना की गई थी।

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