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बुधवार, 2 जुलाई, 2008

६ विरासत

भारतीय महानता का भूगोल
डॉ. सुनील अग्रवाल
मेरा भारत महान है तभी तो हम कहते हैं -``सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा'' । कुछ खास तो हममें है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी । यह खास बात है भारत भूमि का पृथ्वी के पार्थिव भाग के मध्य स्थान से ताल्लुक रखना । पृथ्वी में स्थलमण्डल, जलमण्डलऔर वायुमण्डल है । कार्बोनीफेरस युग में पृथ्वी का समस्त पार्थिव भाग परस्पर जुड़ा हुआ था जिसे पेंजिया कहा जाता है । `पेंजिया' ग्रीक भाषा का शब्द है जिसे पृथ्वी की सम्पूर्णता के अर्थ में देखा जाता है । लड्डू सदृश प्रारम्भिक पार्थिव आबद्ध स्थिति को ही पेंजिया कहा जाता है । भोगोलिक एंव पौराणिक साक्ष्यों के आलोक में परिकल्पित रुप से मेरा यह मानना है कि पेंजिया के मध्य स्थित रहा था, स्थलखण्ड जिसे हम अपने राष्ट्र भारत वर्ष के रूप में जानते हैं । मेरी मान्यता है कि यह मध्यमानता ही भारत की महानता के मूल में है । हमारा देश भारत अपनी विशिष्ट गुरुता को निभाता है, और आगे भी निभायेगा, तभी तो पृथ्वी के अस्तित्व को लेकर उद्वेलित एवं चिंतित हो उठते हैंहम लोग । एक और अपनी गुरुता के बल पर ही विश्व की सर्वाधिक जनसंख्या वाला महाशक्ति पूर्ण सम्पन्न समृद्ध एवं अति विशिष्ट राष्ट्र बनने जा रहा है भारत वर्ष । भारत की ऋतुपरता एंव जैविक विविधता तथा अपार प्राकृत एवं भौतिक खनिज सम्पदा पर हमें गर्व है । भारत की की सम्पदा को अनेक बार आक्रांताओ ने लूटा किन्तु फिर भी भारत के पास वह सबकुछ है जिस पर हमें सदा नाज रहा है। भारत में भगवान नरनारायण रुप धारण करके संयमशील पुरुषों पर अनुग्रह करने के लिए अव्यक्त रुप में कल्प के अन्त तक तप करते रहते है । उनकी यह तपस्या ऐसी है कि जिससे धर्म, ज्ञान, वैराग्य ऐश्वर्य, शांति और वृद्धि होकर अन्त में आत्म स्वरुप की उपलब्धि हो सकती है-भारतेडपि वर्षे भगवान्नरनारायणाख्या-आकल्पान्तमुपचित धर्मज्ञान वैराग्यै श्वयौ पश्मो-परमात्मोपल म्भनमनुग्रहायात्मवता मनुकम्पयातपोडव्यक्त गति श्चरति । श्रीमद्भागवत महापुराण (५-१९-९) लगभग दो सौ करोड़ वर्ष पूर्व पृथ्वी के जन्म के पश्चात महासागर एवं महाद्वीपों की उत्पत्ति हुई । धरती में विभंजन एवं विस्थापन हुआ । विविध भूदृश्यावलियाँ अस्तित्व में आई तथा ध्वस एवं सृजन के बीज जीवन की उत्पत्ति एवं परिवर्तन हुआ तथा आदि अनादि काल से पृथ्वी पर यह सृष्टि विवर्तन आज भी जारी है । सम्पूर्ण ग्लोब पर महाद्वीप एवं महासागरीय ध्रुवस्थ स्थिति सुनिश्चित है । उत्तरी ध्रुव आर्कटिक महासागर पर तथा दक्षिणी ध्रुव अन्टार्कटिक महाद्वीप पर स्थित है । पेंजिया में विभंजन एवं महाद्वीपीय विस्थापन के अनेक सिद्धान्त प्रकाश में आये है । जर्मन विद्वान वेगनर के द्वारा प्रतिपादित सिद्घान्त को आधार बनाकर भारत भूमि की महत्ता एवं महानता को प्रतिबिम्बत करने का मैने किंचित प्रयास किया है । वेगनर ने यह माना है कि कार्बोनीफेरस युग मे सभी स्थल खण्ड परस्पर एक थे। पृथ्वी में सम्पूर्ण पार्थिव एकता थी, इसी सम्पूर्णता एवं पार्थिव एक्यता को पेंजिया कहा गया । कुछ शक्तियों के सम्मिलित प्रभाव के फल स्वरुप परस्पर पृथक होकर स्थानान्तरित हुए जिसके फलस्वरुप महाद्वीप एवं महासागरों का विवर्तन हुआ । जिन पर पल्लवित पुष्पित होकर प्रकृति का नर्तन हुआ और संसार की माया सामने आई । वेगनर के अनुसार दो शक्तियाँ प्रमुख रहीं जिनमें पहली शक्ति भुमध्य रेखीय विस्थापन हेतु विभेदक गुरुत्वाकर्षण बल (डिफ्रेन्शयल ग्रेविटेशनल फोर्स) तथा प्लवनशीलता का बल (फोर्स ऑफ वुयान्सी) था । ज्ञातव्य है कि उक्त दोनो बलों की परिणामी दिशा विपरीत रहती है। दूसरी शक्ति के रुप में महाद्वीपों के पश्चित दिशा की और प्रवाह एवं विस्थापन का कारण बना था सूर्य एवं चन्द्र का ज्वारीय बल (टाइडल फोर्स) । साथ ही पृथ्वी अपने अक्ष पर घूमती भी है अत: ज्वारीय रगड़ (टाइडल फ्रिक्शन) ने भी अवश्य ही अपनी भूमिक निभाई होगी । जिसके परिणामस्वरुप महाद्वीप पीछे छूट गये और धरती पर पश्चिम विस्थापन हुआ तथा ध्रुवों का पलायन (वान्डरिंग ऑफ पोल्स) का प्रभाव परिलक्षित हुआ । विभिन्न युगो से भूमध्य रेखीय एवं ध्रुवीय परिवर्तन होते रहे है जो आज भी जारी है । उल्लेखनीय बात यह है कि यदि हम विभंजन एवं विस्थापन के पेटर्न को देखें तो स्पष्ट आभाष होता है कि पेंजिया का मध्य स्थल ही हमारी भारत भूमि के रुप में विद्यमान है अपनी इस केन्द्रस्थ स्थिति के कारण ही भारत भूमि विशिष्ट है। पुराण वर्णित तथ्य है कि कल्प-कल्पांतरों में पृथ्वी पर सृजन एवं ध्वंस का विस्तार एकान्तर क्रम में होता रहा है । प्रलय काल के बाद स्वयम्भुव मनु के ज्येष्ठ पुत्र प्रियव्रत ने रात्रिबेला में ज्योर्तिमय रथ पर सवार होकर पेंजिया की परिक्रमा की। परिक्रमा के समय रथ की लीक-लाँक से जो सात मण्डलाकार गड़ढे बने वे ही सप्त् सिंधु रुप में दृश्यमान हुए । सप्त् सिंधु के अर्न्तवर्ती सात ही महाद्वीप निर्मित हुए जो क्रमश : जम्बूद्वीप, प्लक्ष द्वीप, शाल्मलिद्वीप, कुशद्वीप, कौंच द्वीप, शाक द्वीप और पुष्कर द्वीप के नाम से विख्यात हुए । यह द्वीप क्रमश अपने आकार में बढ़ते गए अर्थात दूर हटते गए । जम्बू द्वीप सबके मध्यस्थ है - जम्बूद्वीप समस्तानामेतेषा मध्य संस्थित: । (ब्रह्मापुराण १८/१३) जम्बुद्वीप में भी भारत वर्ष सर्वश्रेष्ठ है - अन्नापि भारतं श्रेष्ठं जम्बूद्वीप महामुने । (ब्रह्मा महापुरण १९/२३ तथा विष्णुमहोपुराण २/३/२२) । श्रीमद् भगवत महापुराण (१८/३/०८) में भी दृष्टान्त आता है कि दितिपुत्र हिरण्याक्ष ने धरती को सागर में निमग्न कर दिया तब धरती के जीवों के उद्घार हेतु ब्रह्म ने वराह अवतार लिया और धरती को सुरक्षित रुप से जल के ऊपर व्यवहार योग्य स्थान पर अवस्थित कर दिया । धरती में अपनी आधार शक्ति का संचार किया तथा आततायी हिरण्याक्ष का बध किया । सत्य तो यह है कि ईश्वरीय अलौकिक शक्तियों को कोई भी पूर्णता से नहीं जान पाया है । इसीलिए आज के सम्मुनत वैज्ञानिक एवं प्रोद्यौगिकी युग में भी ब्रह्मांण के अनंत विस्तार की अनंतता अनहुई ही है । मेरा यह मानना है कि कल्पनामय मिथकों के आसपास से ही यथार्थ है । यूँ भी वेद पुरणों में बहुत बातें बिम्ब-प्रतीक रुपों के साथ-साथ रुपकमयी शैली में कही गई है उनके उपभ्रंगण की आवश्यक्ता है । धरती पर जीवन उत्पत्ति के अनन्तर, लाखों जीव-जंतु अस्तित्व मान है जिनके वितरण के आधार पर पर्यावरण विदों ने छ: भू-भौगोलिक परिमण्डल (जियोज्योग्राफिकल रीलम) निर्धारित किये हुए हैं हमारा वृहत्तर भारत, प्राच्य परिमण्डल अर्थात ओरियन्टल रीलम के अन्तर्गत है जो अपनी विशिष्ट जैव विविधता, जीवन दर्शन एवं शैली के लिए विख्यात है । संसार में भारत का आदर यहाँ के दया, धर्म, प्रेम, त्याग, स्वाभिमान के साथ-साथ बौद्धिक, नैतिक एवं आध्यात्मिक समृद्धि के कारण है । महान दिव्य विभूतियाँ भारत भूमि पर अवतरित होती रही हैं । अपनी देव संस्कृति और आध्यात्मिक शक्ति के बल पर भारत विश्वगुरू के पद पर आसीन है । यहाँ की विलक्षण संत परम्परा एंव स्वस्ति वाङ्गमय भारतीय श्रेयसता का साक्षी है । हमारा कर्तव्य है कि हम अपने गुरूत्व को अक्षुण्य रखें । भारतीय श्रेष्ठता की परिकल्पना की पुष्टि में वराह-मिहिर के ज्योतिष शास्त्र का उल्लेख भी किया जा सकता है । भारत देश उज्जयिनी नामक पावस स्थल है जिसके ठीक मस्तक पर सूर्य देव रहते हैं । सम्पूर्ण विश्व में केवल इसी स्थान और अक्षांश को यह गौरव मिला हुआ है । यह ब्राह्म निवर्तित प्रकृति की अलौकिक एवं भौगोलिक घटना है । विद्वानों के अनुसार उत्तरी ध्रुव की स्थिति पर २१ मार्च से ६ माह अवधि का दिन होने लगता है । इस प्रकार षटमासी दिन के ३ माह व्यतीत हो जाने पर सूर्य देव दक्षिण में क्षितिज से अनंत दूर चले जाते हैं । यह दिन २१ जून का होता है । तब अक्षांश और सूर्य की परम कांति २४ अंश हो जाती है । ज्ञातव्य है कि उज्जयिनी में ही मानक काल प्रामणिक होता है तभी तो उज्जयिनी `ग्रीनविच' कहलाती है । धरती के अक्ष पर श्री महाकालेश्वर ज्योर्लिंग अधिष्ठित एवं प्रतिष्ठित है । ईश्वर की सृष्टि और सत्ता को सम्पूर्णता से कोई भी नहीं समझ सका है । पूर्ण को केवल पूर्ण ही जान सकता है हम तो केवल उस पूर्ण का अल्पांश है । इसीलिए हम अतीन्द्रिय तथ्यों से आज भी अनजान है । हाँ हम इतना अवश्य ही स्वाभिमान के साथ कह सकते हैं कि मेरा भारत महान है । ***

मंगलवार, 3 जून, 2008

३ विरासत

संजीवनी का सच क्या है ?
डॉ ओ. पी. जोशी/डॉ. जयश्री सिक्का
पौराणिक कथा के अनुसार त्रेतायुग में राम-रावण युद्ध के दौरान घायल लक्ष्मण की बेहोशी दूर करने हेतु संजीवनी बूटी का उपयोग किया गया था जिसे हनुमान हिमालय पर्वत से लाए थे । हनुमान को प्रसिद्ध वेद्य सुषेण ने बताया था कि रात्रि में जिस पौधें से प्रकाश निकले वही संजीवनी बूंटी है । महर्षि वाल्मिकी ने लगभग २०० प्रकार की वनस्पतियों का वर्णन किया है जिसमें से कुछ आज भी पाई जाती है एवं औषधि के रुप में उपयोग है । कुछ वनस्पतियां ऐसी भी हैं जिनके सही पर्याय नहीं मिलते है यानी या तो वे विलुप्त् हो गई या उनके सही नामों को भुला दिया गया । इन कारणो से उन वनस्पतियों की पहचान आज भी मुश्किल है । इन वनस्पतियों मेें सजीवनी, विशल्यकारणी, संधानकरणी एवं सवर्णकरणी आदि प्रमुख हैं । संजीवनी एवं संधानकरणी का अंतिम विवरण राजकवि बलाल ने १० वीं सदी में अपने ग्रंथ भोज प्रबंध में दिया था । इसमें बताया गया है कि राजा भोज के सिर की शल्य क्रिया करके कोई गठान निकाली गई थी और संधानकरणी से घाव ठीक करके संजीवनी की मदद से उन्हें होश में लाया गया था । लक्ष्मण के इलाज हेतु चार प्रकार की वनस्पतियों के उपयोग का ज़िक्र है । प्रथम वे वनस्पतियोंे थीं जो मांसपेशियोंको शिथिल कर देती हैं ताकि लगा हुआ तीर आसानी से निकाला जा सके । दूसरी वे वनस्पतियाँ थी जो तीर निकलने के बाद घाव के निशान को मिटाएं । तीसरी वे थी जो जल्दी घाव भरने में सहायक हों एवं चौथी वे जो मूर्छा या बेहोशी को हटाएं । संभवत: यह चौथी प्रकार की वनस्पति ही संजीवनी थी । संजीवनी की खोज में वैज्ञानिकांे एवं वनस्पतिज्ञों की काफी रुचि रही है एवं समय-समय पर इसकी खोज के दावे भी किए गए हैं । लगभग १८-१९ वर्ष पूर्व १९८९ में बैतूल निवासी डॉ जान वेसली मकबूल ने गांव बोरादेही से दूर जंगलों में घूमते समय एक पौधा देखा जो चमक रहा था। पौधे के चमकने की यह क्रिया लगभग २-३ घंटे तक जारी रही । डॉ. मकबूल को आश्चर्य हुआ । जहां चमकता पौधा दिखाई दिया था वहां उन्होने एक निशानी रख दी ताकि पौधे को भविष्य में भी पहचानने में भूल न हो । अगस्त एवं सितम्बर माह की रात्रि में जाकर डॉ. मकबूल ने इस पौधे का अवलोकन अपनी रखी निशानी के आधार पर लगातार किया। चमकने वाले कुछ पौधे निशानी के आसपास भी देखे गए । अक्टूबर माह में डॉ. मकबूल ने अपने अवलोकन की जानकारी बैतूल एवं छिंदवा़़डा के कलेक्टरों को दी एंव तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी को भी पत्र लिखकर भेजी । छिंदवाड़ा कलेक्टर के आदेश पर डॉ मकबूल इस पौधे का नमूना लेकर आए एवं स्थानीय वन अधिकारी एंव पत्रकारों को बताया । डॉ.मकबूल के अवलोकन के अनुसार इस पौधे से प्रकाश निकलकर चमकने की प्रक्रिया केवल अगस्त, सितंबर एवं अक्टूबर में ही होती है, बाद में धीरे-धीरे कम होकर समाप्त् हो जाती है । कुछ राष्ट्रीय समाचार पत्रों एंव पत्रिकाआें में यह घटना उस समय सुर्खिया में प्रकाशित की गई । लेकिन फिर यह बात आई-गई हो गई । उस समय इतने टीवी चैलन नहीं थे अन्यथा कोई-न-कोई चैनल इसका लाईव प्रसारण करता एवं देश-विदेश में वैज्ञानिक एवं वनस्पतिज्ञ इसे देख पाते एवं सही पहचान का प्रयास करते।यदि चमकना ही संजीवनी का प्रमुख गुण माना जाए तो उत्तराखंड में पाई जाने वाली कुछ घांस की जड़े भी अंधेरे में रेडियम की भांति चमकती हैं । घास की इन प्रजातियों को स्थानीय भाषा में गुड़िया, महवलिया एवं तुअड़िया आदि कहते हैं । हाल ही में लखनऊ स्थित राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों ने बताया है कि संजीवनी पौधे की यह विशेषता होती है कि वह सूखने पर भी नहीं मरता एवं थोड़ी-सी नमी मिलने पर फिर तरोताज़ा होकर जीवन यापन करने लगता है । संजीवनी के इस गुण को महत्ता देकर चमकने वाली बात भुला दी गई । वनस्पति शास्त्र की पुस्तकों में दिए वर्णन के अनुसार सिलोजिनेला दुनिया भर में पाया जाता है एवं इसकी लगभग ७५० प्रजातियां है । ज़्यादातर प्रजातियां पर नम एंव छायादार स्थानों पर पाई जाती है । कुछ प्रजातियां सुखे स्थानों पर भी पाई जाती हैं जिन्हे मरुद्भिद कहते है । इनमें सिलेजिनेला लेपिडोफीला एवं सिलेजिनेला रुपेस्ट्रीस प्रमुख हैं । ये प्रजातियां शुष्क अवस्था में सिमटकर एक छोटी गेंद या गोली के समान हो जाती है किंतु नमी के सम्पर्क में आने पर फैलकर पूर्वावस्था प्राप्त् कर लेती है । राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान के वैज्ञानिक इन प्रजातियों के ही संजीवनी मान रहे हैं । सिलोजिनेला में कोई चमक नहीं होती है, जैसा संजीवनी के बारे में बताया जाता है । इसके अलावा वनस्पति शास्त्र की किसी भी उपलब्ध पुस्तक में सिलेजिनेला के किसी औषधि गुण का उल्लेख नहीं है । राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिक सिलेजिनेला की इन्हीं प्रजातियों का अध्ययन एक पंचवर्षीय योजना बनाकर इस आधार पर कर रहे हैं कि इन प्रजापतियों को पुनर्जीवित होने की क्षमता अनुवंशिक आधार पर किसी जीन से नियंत्रित होगी । इस जिन को पृथक कर यदि अन्य पौधे में डाला जाये तो उनमें भी पुनर्जीवित होने की क्षमता आ सकती है । इस जीन को यदि गेहूं एवं धान के पौधे में डाला जाए तो वे सूखा प्रतिरोधी बन सकते है । संजीवनी का पौधा चाहे जो रहा हो परंतु यदि सिलेजिनेला की प्रजापियों से पुनर्जीवित क्षमता का जीन पृथक कर अन्य उपयोगी फसलों में सफलता पूर्वक डाला जा सके तो निश्चित ही भारतीय खेती के लिए यह किसी संजीवनी से कम नहीं होगा । भोपाल स्थित राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय भी संजीवनी पर अनुसंधान कर रहा है । इसके जल्दी ही परिणाम की उम्मीद है । ***

बुधवार, 21 मई, 2008

४ विरासत

कहानी कहते पत्थर
सुश्री नंदिता छिब्बर
मध्यप्रदेश के मुरैना जिले की चंबल घाटी में स्थित पुरातन मंदिर श्रृंखला के अवशेषों तक पहुंचने पर भारतीय पुरातत्व विभाग के अधीक्षक के.के. मुहम्मद ने एक आदमी को वहां धूम्रपान करते पाया तो उन्हें बड़ा धक्का लगा । रोकने पर उस आदमी ने रूखे स्वर में कहा सदियों से ये मंदिर हमारे रहे हैं और यहां हमारी मर्जी चलती है । उनके सहायक ने सलाह दी कि यह आदमी कुख्यात डकैत निर्भय सिंह गुर्जर हैं अत: हमें किसी तरह का झंझट मोल नहीं लेना चाहिए । श्री मुहम्म्द के लिए तो यह एक अच्छा मौका था उन्होंने गुर्जर से कहा देखों हमें पुलिस या उसके मुखबिर मत समझो । हम भारतीय पुरातत्व विभाग से आए हैं और इस मंदिर श्रृंखला का जीर्णोद्धार करना चाहते हैं । काफी समझाने पर गुर्जर मान गया और उसने जीर्णोद्धार के लिए सहमति और सहयोग का आश्वासन भी दिया । बटेश्वर मंदिर के ये पुरावशेष डकैतों के लिए पीढ़ियों से छुपने का स्थान रहे हैं । पुरातत्व विभाग द्वारा सन् १९२० में ही इसे सुरक्षित स्थान घोषित किया जा चुका था । किंतु जीर्णोद्धार की शुरूआत जनवरी २००५ में जाकर हो पाई । इससे पहले के सभी प्रयास डकैतों ने निष्फल कर लिए थे । लेकिन मुहम्मद का मानना है कि डकैतों की वजह से इस जगह को एक तरह से संरक्षण ही मिला और महत्वपूर्ण चीजें इधर-उधर न होने से बच गई । एक समय इन्हें भूतेश्वर मंदिर भी कहा जाता था । पुरा विभाग के अनुसार आठवीं सदी में बने इन मंदिरों मंे से ज्यादातर शिव मंदिर हैं । इसके अवशेष चम्बल नदी के नजदीक लगभग एक वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले हैं । इन मंदिरों के खंडित होने के बारे में विभाग के पास दो तर्क हैं एक तो यह कि ये प्राकृतिक आपदा से क्षतिग्रस्त हुए और दूसरे कि चम्बल नदी ने अपना रूख बदला इस वजह से इसका कुछ हिस्सा डूब में आ गया । लेकिन वस्तुत: विभाग के पास दोनों ही तर्को के पक्ष में कोई ठोस सबूत नहीं है । सन् २००५ में जीर्णोद्धार शुरू करते समय माना जा रहा था कि यहां १०८ मंदिर थे लेकिन खुदाई करने पर पुराविदों को पता चला कि यहां लगभग ३०० से ४०० मंदिर मौजूद रहे होंगे । एक-एक मंदिर को फिर से ठीक हपने वाली शक्ल देना किसी (जिग-सा) पहले को हल करने जैसा ही था, मुहम्मद का कहना था फिर हमारे पास कोई पुराना नक्शा या चित्र भी नहीं था इसलिए हर पत्थर को नक्काशी के आधार पर ही फिर जोड़ा गया । उन्होंने आगे बताया कि इस तरह से एक-एक पत्थर ढूंढ-ढूंढकर जोड़ना बहुत श्रमसाध्य कार्य था लेकिन पुराविदों का मानना है कि इसके बावजूद किसी एक मंदिर का पत्थर दूसरे में लग जाने की संभावना बिल्कुल नहीं है । डकैतों ने भी जीर्णोद्धार के दौरान न सिर्फ परहेदारी की बल्कि कभी-कभी तो काम में भी हाथ बंटाया । उन्हीं की वजह से खनन माफिया भी कोई हरकत नहीं कर पाया । लेकिन ऐसा नवम्बर २००६ तक ही चल पाया क्योंकि तभी उत्तरप्रदेश की स्पेशल फोर्स ने गुर्जर को मार गिराया। इसके बाद बलुआ पत्थर के अवैध उत्खनन का काम पुन: शुरू हो गया (एक सरकारी आकलन के आकलन के अनुसार इस अवैध कारोबार का आकार १००० करोड़ रूपए का है) उत्खनन के धमाकों की वजह से पैदा कंपन से नवनिर्मित मंदिरों को बहुत क्षति पहुुंची । चिंचित श्री मुहम्मद ने मध्यप्रदेश की तत्कालीन पर्यटन मंत्री यशोधरा राजे सिंधिया को जानकारी दी तो उन्होंने खनन पर तत्काल रोक लगवाई। परंतु कुछ समय में इन खनन माफियों को फिर से मौका मिल गया । श्री मुहम्मद ने पुन: राज्य के खनिज मंत्री, जिला कलेक्टर एवं राज्य के पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री से रोक की गुहाई लगाई लेकिन खनन माफिया अपने धन और बाहुबल के दम पर सन् २००७ में पूरे वर्ष पुरातत्व विभाग को रोके रखने में सफल रहा । अंत में हताश होकर श्री मुहम्मद ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख के.सी. सुदर्शन के यहां गुहार लगाई । इसका अपेक्षित परिणाम भी मिला, राज्य सरकार ने क्षेत्र में अवैध खनन रूकवा दिया । पुरातत्व विभाग ने अपने मुख्यालय को जीर्णोद्धार कार्य के बारे में शुरूआत से लेकर वर्तमान तक की स्थिति की विस्तृत रपट भेजी जो केन्द्रीय पर्यटन मंत्री अम्बिका सोनी के समक्ष भी रखी गई । श्रीमती सोनी ने मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान को यह कहते हुए एक पत्र लिखा कि आपको बटेश्वर मंदिर श्रृंखला इलाके में चल रहे अवैध उत्खनन के बारे में जानकारी है साथ ही साथ आपको यह भी ज्ञात है कि इसकी वजह से मंदिरों को नुकसान पहुंच रहा है । इस बारे में राज्य सरकार को इसके सचिव, कलेक्टर और पुलिस विभाग के माध्मय से बार-बार सूचित करने के बावजूद उत्खनन जारी है । श्रीमती यशोधरा राजे हालांकि एक बार इसे कुछ समय के लिए बंद करवा चुकी हैं लेकिन यह पुन: प्रारंभ हो गया । पुरातत्व विभाग की ओर से उत्खनन माफिया द्वारा बाहुबल के इस्तेमाल की शिकायतें प्राप्त् हुई हैं । अब तक बटेश्वर मंदिर श्रृंखला के पच्चीस मंदिरों का पुननिर्माण सम्पन्न हो चुका है । इसमें सरकार को चालीस लाख रूपये की लागत आई है । पुरातत्व विभाग १०८ मंदिरों के जीर्णोद्धार की मंशा रखता है किंतु इसमें धन की कमी आड़े आ रही है । भारत सरकार के पर्यटन मंत्रालय ने क्षेत्र में आधारभूत सुविधाआें हेतु २ करोड़ रूपए मंजूर किए हैं । श्री मुहम्मद ने मंत्रालय के विशेष पर्यटन कोष से एक करोड़ रूपए की अतिरिक्त मांग की है । पुरातत्व विभाग के अधिकारियों का अनुमान है कि कार्य पूरी तरह समाप्त् करने में अभी पांच वर्ष और लगेंगे । पुरातन मंदिरों के जीर्णोद्धार मुहम्मद इन मंदिरों को दिल्ली, आगरा, ग्वालियर पर्यटन मानचित्र में एक महत्वपूर्ण तीर्थ पर्यटन स्थल के रूप में देखते हैं । ***

शनिवार, 12 जनवरी, 2008

८ विरासत

रामचरित मानस में पर्यावरण चेतना
डॉ. खुशालसिंह पुरोहित
मानव सभ्यता के विकास के प्रारम्भिक काल से आज तक जितने भी लोकनायक हुए हैं राम इन सभी में महानायक हैं । लोकदृष्टा तुलसीदास का मानना है कि सभी प्राणियों में साक्षात् राम आत्मवत् हैं वहीं जीवन के केन्द्र में है , सारा संसार उनकी रचनात्मक चेतना का प्रतिबिम्ब है ।
सिया राम मय सब जानी ।
करौं प्रणाम जोरि जुग जानी ।।
गोस्वामी तुलसीदास का समय भारतीय समाज व्यवस्था का ऐसा आदर्श काल था, जिससे समाज को सदैव नयी चेतना और नयी प्रेरणा मिलती है । इस काल की समृद्ध प्रकृति और सुखी समाज व्यवस्था हजारों वर्षोंा से जन सामान्य को प्रभावित और आकर्षित करती रही है । इसलिये रामराज्य हमारा सांस्कृतिक लक्ष्य रहा है । रामचरितमानस में भारतीय समाज के गौरवशाली अतीत की मधुर स्मृतियाँ संजोयी गयी हैं । देश की श्रेष्ठ पर्यावरणीय विरासत के प्रति समाज में जागरूकता पैदा करना भी मानसकार का लक्ष्य रहा होगा । मानसकार ने यह बताने का प्रयास किया है कि रामायणकालीन भारत में समाज में पेड़-पौधो,नदी नालों, व जलाशयों के प्रति लोगों में जैव सत्ता का भाव था । यही कारण है कि प्रकृति के अवयवों जैसे - नदी, पर्वत, पेड़-पौधें, जीव-जन्तुआे सभी का व्यापक वर्णन मानस में सर्वत्र मिलता है ।
नदी पर्यावरण का प्रमुख घटक है । दुनिया की सभी प्राचीन सभ्यताआे का विकास प्राय: नदियों के तट पर हुआ था । हमारे देश में काशी, मथुरा, प्रयाग, उज्जैन और अयोध्या जैसे आध्यात्मिक नगर नदियों के तट पर स्थित है । गंगा हमारे देश में प्राचीनकाल से पूज्य रही है, गोस्वामीजी लिखते है गंगा का पवित्र जल पथ की थकान को दूर कर सुख प्रदान करने वाला हैं।
गंगा सकल मुद मूला ।
सब सुख करिन हरनि सब सूला ।।
इसलिए ईश्वर के स्वरूप श्रीरामचन्द्रजी स्वयं गंगा को प्रणाम करते हैं तथा अन्य से भी वैसा ही कराते हैं ।
उतरे राम देवसरि देखी ।
कीन्ह दंडवत हरषु विसैषी ।।
लखन सचिव सियँ किए प्रनामा ।
सबहि सहित सुखु पायउ रामा ।।
मानस में गंगा यमुना तथा संगम के चित्रण के अतिरिक्त सरयू नदी का विवरण भी है । सरयू का निर्मल जल आसपास के वायु मण्डल को भी शुद्ध किए हुए है
बहइ सुहावन त्रिविध समीरा ।
भइ सरजू अति निर्मल नीरा ।।
इसके अतिरिक्त स्थान स्थान पर सई, गोदावरी, मन्दाकिनी आदि नदियों का वर्णन रामचरितमानस में आया है उस समय की सभी नदियाँ स्वच्छ एवं पवित्र जल से परिपूर्ण थी
सरिता सब पुनीत जलु बहहीं ।
पर्वत प्रकृति के महत्वपूर्ण अवयव हैं । पर्वतराज, हिमालय भारतमाता के मुकुट के रूप में प्राचीन काल से ही प्रतिष्ठित है। हिमालय के अतिरिक्त चित्रकूट पर्वत का चित्रण रामचरितमानस में विस्तृत रूप से आया है । पर्वत पर हरियाली थी एवं वन्य जीव ऋषि मुनियों के स्वाभाविक मित्र के रूप में आश्रमों में निवास करते थे ।
जहँ जहँ मुनिन्ह सुआश्रम कीन्हे ।
उचित बास हिं मधुर दीन्हें ।
चित्रकुट गिरि करहु निवासु ।
तहँ तुम्हार सब भाँति सुपासू ।।
सैलु सुहावन कानन चारू ।
करि केहरि मृग विहग बिहारू ।।
मानस के अरण्य काण्ड में पम्पा सरोवर का वर्णन अत्यन्त मनोहारी हैं ।
प्रकृति के साथ छेड़छाड़ करने से अनेक विकृतियाँ उत्पन्न होती है । प्रकृति के सानिध्य में न रहने वाले जीव जंतुआें का अस्तित्व संकटग्रस्त हो जाता है । जब श्री रामचन्द्रजी की प्रार्थना पर समुद्र ध्यान नहीं देता है, तो वे क्रोधयुक्त होकर धनुष बाण उठाते हैं जिससे समस्त जलचर व्यथित हो उठते हैं -
संधोनेउ प्रभु बिसिव कराला ।
उठी उदधि उर अंतर ज्वाला ।
मकर उरग झष गन अकुलाने ।
जरत जंतु जलनिधि जब जाने ।।
वास्तव में प्रकृति हमें स्वाभाविक रूप से अपने उपहार देती है । कृतज्ञ भाव से बिना छेड़छाड़ किये उन्हें ग्रहण करना चाहिए। असीमित स्वार्थ विकृति उत्पन्न करता है, जो अन्तत: प्रलयकारी है । प्रकृति की इस प्रवृत्ति को समुद्र के माध्यम से मानस में अभिव्यक्ति मिली है
सागर निज मरजादा रहही ।
डारहिं रत्नहिं नर लहहीं ।।
मानसकार ने दोहे व चौपाइयों के माध्यम से हमें पर्यावरण एवं प्रकृति के विविध अवयवों से परिचित कराया है । मानस में इस काल के स्वाभाविक प्रकृति चित्रण ने मनोहारी हरी भरी धरती और वन्य-जीवन के प्रति प्रेममूलक संबंधों एवं पर्यावरण के संरक्षण में समाज के अंतिम व्यक्ति तक को भागीदार बनाये जाने का आदर्श समाज के सामने उपस्थित किया है। इस प्रकार प्रकृति के संतुलन में संस्कृति की शाश्वतता का युग संदेश हमारे लिये इस काल की महत्वपूर्ण विरासत है ।
मानसकार तुलसी ने मानस में पृथ्वी से लेकर आकाश तक सृष्टि के पाँचों तत्वों की विस्तृत चर्चा की है। भारतीय मनीषा की यह मान्यता रही है कि मनुष्य शरीर मिट्टी, अग्नि, जल, वायु और आकाश इन्हीं पाँच तत्वों से मिलकर बना है । इसका दूसरा आशय यह भी है कि प्रकृति निर्मल और पवित्र रहने पर प्राणीमात्र के लिये फलदायी और सुखदायी होती है ।
छिती जल पावक गगन समीरा ।
पंच रचित अति अधम सरीरा ।।
इस काल में पर्यावरण इतना संतुलित था कि कृषि, पशुपालन और अन्य कार्येंा में कभी कोई बाधा नहंी आती थी। इस समय समाज में धन-धान्य की किसी भी प्रकार की कमी नहीं थी । एक जगह वर्णन है :-
विंधु मय पुरखनहि रवि तप जेतनेहि काज ।
मांगत वारिद जल देत श्रीरामचंद्र के राज ।।
इस प्रकार सर्दी-गर्मी और बरसात का मौसम चक्र अपनी संतुलित गति से चलता था । उस समय में न बाढ़ का संकट था, न ही सूखे का संकट होता था इस प्रकार प्रकृति के समन्वयकारी सहयोग में समाज की स्थिति कैसी थी इस पर तुलसी लिखते हैं -
दैहिक दैविक भौतिक तापा ।
राम राज नहीं काहुहि व्यापा ।।
इस आधार पर कहा जा सकता है कि समाज के अंतिम व्यक्ति तक को सुख, संतोष और आनंद उपलब्ध था अर्थात् सर्वत्र शान्तिपूर्ण मंगलमय वातावरण था । इसके साथ ही राम , लक्ष्मण और सीताजी वन में भी आनंदित और प्रसन्नचित थे । मानस में एक प्रसंग में कहा गया है कि -``वन में खाने के लिए फल हैं, सोने के लिए धरती माँ का आंचल है और धूप से बचने के लिये छाया देने वाले वृक्ष हैं , ऐसे में खड़ाऊ पहनकर चलने की क्या जरूरत है ? वहां धरती की हरी-हरी दूब नंगे पांवों को स्वत: ही सुखद लगती थी ।
बिनु पानी ही गमन,
फल भोजन, भूमि शयन तरू छांहि ।
भरत - मिलन के समय के आत्मीय क्षणों में सत्कार के लिए राम कहते हैं कि जाओ कंद मूल फूल ले आओ-
चाहिए कीन्ह भरत पहुनाई
कंद मूल फल आनहू जाई ।
अयोध्या नगरी से प्रारंभ हुई पुरूषोत्तम राम की संस्कृति चेतना यात्रा में प्रकृति का भरपूर योगदान रहा है। यह लोक जागरण यात्रा कई नदियों के किनारे विभिन्न भाषी-भाषी अनेक जातियों को जोड़ती हुई, अनेक पर्वतमालाआे और गंगा यमुना के मैदानों से गुजरती हुई विंध्याचल , दण्डकारण्य, पंचवटी, किष्किंधा और रामेश्वर होती हुई श्रीलंका पहुंचती है । इसमें लोक जीवन, लोक संस्कृति और प्रकृति के प्रसाद का त्रिवेणी संगम है । इस संस्कृति यात्रा में राज सत्ता पर लोकजीवन का प्रभाव स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है । यहां प्रकृति के साथ पारिवारिक रिश्तों का लंबा सिलसिला चलता है । वनवास काल में पेड़, पहाड़, नदियाँ और वन्य प्राणी सभी सीता एवं राम के सहयोगी बनते हैं । ये सभी उस विराट् परिवार के सदस्य हैं , जिसके मुखिया स्वयं राम हैं । इसलिये यहाँ राम एवं सीता का सख्य भाव केवल शबरी, गिद्ध, जटायु या वानरों तक ही सीमित नहीं है वह तो सरयू, गंगा और गोदावरी जैसी नदियों, जलाशयों और वृक्षों से लेकर व्यापक वन-सौंदर्य तक फैला हुआ है ।
वन्य जीवन से जुड़े अनेक प्रसंगों का मानस में सुन्दर वर्णन है । राम जब वनवास में जा रहे थे उस समय का विवरण है कि राम के वनगमन मार्ग में अनेक पर्वत प्रदेश, घने जंगल , रम्य नदियाँ और उनके किनारों पर रमण करते हुए सारस और अन्य पक्षीगण, खिले -खिले कमल दल वाले जलाशय और उनके अपने जलचर हैं , इतना ही नहीं उनके पास ही झ्रुंड के झुंड हिरण, मदमस्त गेंडे, भैंसे और हाथी सभी मौज में घूम रहे हैं, इन्हें न तो सुरक्षा की चिंता है और न ही कोई किसी से भयभीत है । इस प्रकार का नैसर्गिक परिदृश्य राम को जगह-जगह दिखाई देता है । वृक्षों एवं वन्य जीवों के प्रति राम एवम् सीता का लगाव भी कम नहीं है । पशुआे से वे इस प्रकार का व्यवहार करते हैं मानों वे उनके परिवार के सदस्य हों। मानस में कहा गया है कि वनवास में सीताजी जंगल में हिरणों को नित्यप्रति हरी घास खिलाती थी ।
इस प्रकार अनेक प्रसंग हैं, उनमें से कुछ का प्रतीकात्मक उल्लेख किया गया जो वर्तमान में भी प्रासंगिक हैं, देखा जाय तो इन प्रसंग और संदर्भोंा की चर्चा आज ज्यादा जरूरी हो गयी है । प्रकृति प्रेमी राम को अपना आदर्श मानने वाले समाज की आज की स्थिति क्या है ? वन, उपवन और उद्यानों को छोड़ दें तो आजकल तुलसी का पौधा भी घरों से गायब होता जा रहा है । प्राय: बड़े घरों के लॉन एवम् गमलों में केक्टस दिखाई देता है । घर में भीतरी सजावट में भी ज्यादातर लोगों का प्रकृति प्रेम प्लास्टिक के फूल पत्तों के माध्यम से अभिव्यक्त होता है । अधिकतर घरों में कांच के गमलों में प्लास्टिक के फूल पौधे बैठक कक्ष की अलमारी या टी.वी. टेबल की शोभावृद्धि करते हैं । आज हम जितने सभ्य और सुसंस्कृत समाज में जी रहे हैं, उतने ही प्रकृति से दूर होते जा रहे हैं ।
यहां यह स्मरण करना अप्रासंगिक नहीं होगा कि हम प्रकृति से जुड़कर ही प्रकृति पुरूष राम से जुड़ पाएेगें । क्या हमारे प्रकृतिउन्मुख क्रियाकलापों की स्थिति और उसका स्तर हमारे लोकजीवन के आदर्श श्री राम के रिश्ते को परिभाषित करने की कोई कसौटी हो सकती है ? ***