भारतीय महानता का भूगोल
डॉ. सुनील अग्रवाल
मेरा भारत महान है तभी तो हम कहते हैं -``सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा'' । कुछ खास तो हममें है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी । यह खास बात है भारत भूमि का पृथ्वी के पार्थिव भाग के मध्य स्थान से ताल्लुक रखना । पृथ्वी में स्थलमण्डल, जलमण्डलऔर वायुमण्डल है । कार्बोनीफेरस युग में पृथ्वी का समस्त पार्थिव भाग परस्पर जुड़ा हुआ था जिसे पेंजिया कहा जाता है । `पेंजिया' ग्रीक भाषा का शब्द है जिसे पृथ्वी की सम्पूर्णता के अर्थ में देखा जाता है । लड्डू सदृश प्रारम्भिक पार्थिव आबद्ध स्थिति को ही पेंजिया कहा जाता है । भोगोलिक एंव पौराणिक साक्ष्यों के आलोक में परिकल्पित रुप से मेरा यह मानना है कि पेंजिया के मध्य स्थित रहा था, स्थलखण्ड जिसे हम अपने राष्ट्र भारत वर्ष के रूप में जानते हैं । मेरी मान्यता है कि यह मध्यमानता ही भारत की महानता के मूल में है । हमारा देश भारत अपनी विशिष्ट गुरुता को निभाता है, और आगे भी निभायेगा, तभी तो पृथ्वी के अस्तित्व को लेकर उद्वेलित एवं चिंतित हो उठते हैंहम लोग । एक और अपनी गुरुता के बल पर ही विश्व की सर्वाधिक जनसंख्या वाला महाशक्ति पूर्ण सम्पन्न समृद्ध एवं अति विशिष्ट राष्ट्र बनने जा रहा है भारत वर्ष । भारत की ऋतुपरता एंव जैविक विविधता तथा अपार प्राकृत एवं भौतिक खनिज सम्पदा पर हमें गर्व है । भारत की की सम्पदा को अनेक बार आक्रांताओ ने लूटा किन्तु फिर भी भारत के पास वह सबकुछ है जिस पर हमें सदा नाज रहा है। भारत में भगवान नरनारायण रुप धारण करके संयमशील पुरुषों पर अनुग्रह करने के लिए अव्यक्त रुप में कल्प के अन्त तक तप करते रहते है । उनकी यह तपस्या ऐसी है कि जिससे धर्म, ज्ञान, वैराग्य ऐश्वर्य, शांति और वृद्धि होकर अन्त में आत्म स्वरुप की उपलब्धि हो सकती है-भारतेडपि वर्षे भगवान्नरनारायणाख्या-आकल्पान्तमुपचित धर्मज्ञान वैराग्यै श्वयौ पश्मो-परमात्मोपल म्भनमनुग्रहायात्मवता मनुकम्पयातपोडव्यक्त गति श्चरति । श्रीमद्भागवत महापुराण (५-१९-९) लगभग दो सौ करोड़ वर्ष पूर्व पृथ्वी के जन्म के पश्चात महासागर एवं महाद्वीपों की उत्पत्ति हुई । धरती में विभंजन एवं विस्थापन हुआ । विविध भूदृश्यावलियाँ अस्तित्व में आई तथा ध्वस एवं सृजन के बीज जीवन की उत्पत्ति एवं परिवर्तन हुआ तथा आदि अनादि काल से पृथ्वी पर यह सृष्टि विवर्तन आज भी जारी है । सम्पूर्ण ग्लोब पर महाद्वीप एवं महासागरीय ध्रुवस्थ स्थिति सुनिश्चित है । उत्तरी ध्रुव आर्कटिक महासागर पर तथा दक्षिणी ध्रुव अन्टार्कटिक महाद्वीप पर स्थित है । पेंजिया में विभंजन एवं महाद्वीपीय विस्थापन के अनेक सिद्धान्त प्रकाश में आये है । जर्मन विद्वान वेगनर के द्वारा प्रतिपादित सिद्घान्त को आधार बनाकर भारत भूमि की महत्ता एवं महानता को प्रतिबिम्बत करने का मैने किंचित प्रयास किया है । वेगनर ने यह माना है कि कार्बोनीफेरस युग मे सभी स्थल खण्ड परस्पर एक थे। पृथ्वी में सम्पूर्ण पार्थिव एकता थी, इसी सम्पूर्णता एवं पार्थिव एक्यता को पेंजिया कहा गया । कुछ शक्तियों के सम्मिलित प्रभाव के फल स्वरुप परस्पर पृथक होकर स्थानान्तरित हुए जिसके फलस्वरुप महाद्वीप एवं महासागरों का विवर्तन हुआ । जिन पर पल्लवित पुष्पित होकर प्रकृति का नर्तन हुआ और संसार की माया सामने आई । वेगनर के अनुसार दो शक्तियाँ प्रमुख रहीं जिनमें पहली शक्ति भुमध्य रेखीय विस्थापन हेतु विभेदक गुरुत्वाकर्षण बल (डिफ्रेन्शयल ग्रेविटेशनल फोर्स) तथा प्लवनशीलता का बल (फोर्स ऑफ वुयान्सी) था । ज्ञातव्य है कि उक्त दोनो बलों की परिणामी दिशा विपरीत रहती है। दूसरी शक्ति के रुप में महाद्वीपों के पश्चित दिशा की और प्रवाह एवं विस्थापन का कारण बना था सूर्य एवं चन्द्र का ज्वारीय बल (टाइडल फोर्स) । साथ ही पृथ्वी अपने अक्ष पर घूमती भी है अत: ज्वारीय रगड़ (टाइडल फ्रिक्शन) ने भी अवश्य ही अपनी भूमिक निभाई होगी । जिसके परिणामस्वरुप महाद्वीप पीछे छूट गये और धरती पर पश्चिम विस्थापन हुआ तथा ध्रुवों का पलायन (वान्डरिंग ऑफ पोल्स) का प्रभाव परिलक्षित हुआ । विभिन्न युगो से भूमध्य रेखीय एवं ध्रुवीय परिवर्तन होते रहे है जो आज भी जारी है । उल्लेखनीय बात यह है कि यदि हम विभंजन एवं विस्थापन के पेटर्न को देखें तो स्पष्ट आभाष होता है कि पेंजिया का मध्य स्थल ही हमारी भारत भूमि के रुप में विद्यमान है अपनी इस केन्द्रस्थ स्थिति के कारण ही भारत भूमि विशिष्ट है। पुराण वर्णित तथ्य है कि कल्प-कल्पांतरों में पृथ्वी पर सृजन एवं ध्वंस का विस्तार एकान्तर क्रम में होता रहा है । प्रलय काल के बाद स्वयम्भुव मनु के ज्येष्ठ पुत्र प्रियव्रत ने रात्रिबेला में ज्योर्तिमय रथ पर सवार होकर पेंजिया की परिक्रमा की। परिक्रमा के समय रथ की लीक-लाँक से जो सात मण्डलाकार गड़ढे बने वे ही सप्त् सिंधु रुप में दृश्यमान हुए । सप्त् सिंधु के अर्न्तवर्ती सात ही महाद्वीप निर्मित हुए जो क्रमश : जम्बूद्वीप, प्लक्ष द्वीप, शाल्मलिद्वीप, कुशद्वीप, कौंच द्वीप, शाक द्वीप और पुष्कर द्वीप के नाम से विख्यात हुए । यह द्वीप क्रमश अपने आकार में बढ़ते गए अर्थात दूर हटते गए । जम्बू द्वीप सबके मध्यस्थ है - जम्बूद्वीप समस्तानामेतेषा मध्य संस्थित: । (ब्रह्मापुराण १८/१३) जम्बुद्वीप में भी भारत वर्ष सर्वश्रेष्ठ है - अन्नापि भारतं श्रेष्ठं जम्बूद्वीप महामुने । (ब्रह्मा महापुरण १९/२३ तथा विष्णुमहोपुराण २/३/२२) । श्रीमद् भगवत महापुराण (१८/३/०८) में भी दृष्टान्त आता है कि दितिपुत्र हिरण्याक्ष ने धरती को सागर में निमग्न कर दिया तब धरती के जीवों के उद्घार हेतु ब्रह्म ने वराह अवतार लिया और धरती को सुरक्षित रुप से जल के ऊपर व्यवहार योग्य स्थान पर अवस्थित कर दिया । धरती में अपनी आधार शक्ति का संचार किया तथा आततायी हिरण्याक्ष का बध किया । सत्य तो यह है कि ईश्वरीय अलौकिक शक्तियों को कोई भी पूर्णता से नहीं जान पाया है । इसीलिए आज के सम्मुनत वैज्ञानिक एवं प्रोद्यौगिकी युग में भी ब्रह्मांण के अनंत विस्तार की अनंतता अनहुई ही है । मेरा यह मानना है कि कल्पनामय मिथकों के आसपास से ही यथार्थ है । यूँ भी वेद पुरणों में बहुत बातें बिम्ब-प्रतीक रुपों के साथ-साथ रुपकमयी शैली में कही गई है उनके उपभ्रंगण की आवश्यक्ता है । धरती पर जीवन उत्पत्ति के अनन्तर, लाखों जीव-जंतु अस्तित्व मान है जिनके वितरण के आधार पर पर्यावरण विदों ने छ: भू-भौगोलिक परिमण्डल (जियोज्योग्राफिकल रीलम) निर्धारित किये हुए हैं हमारा वृहत्तर भारत, प्राच्य परिमण्डल अर्थात ओरियन्टल रीलम के अन्तर्गत है जो अपनी विशिष्ट जैव विविधता, जीवन दर्शन एवं शैली के लिए विख्यात है । संसार में भारत का आदर यहाँ के दया, धर्म, प्रेम, त्याग, स्वाभिमान के साथ-साथ बौद्धिक, नैतिक एवं आध्यात्मिक समृद्धि के कारण है । महान दिव्य विभूतियाँ भारत भूमि पर अवतरित होती रही हैं । अपनी देव संस्कृति और आध्यात्मिक शक्ति के बल पर भारत विश्वगुरू के पद पर आसीन है । यहाँ की विलक्षण संत परम्परा एंव स्वस्ति वाङ्गमय भारतीय श्रेयसता का साक्षी है । हमारा कर्तव्य है कि हम अपने गुरूत्व को अक्षुण्य रखें । भारतीय श्रेष्ठता की परिकल्पना की पुष्टि में वराह-मिहिर के ज्योतिष शास्त्र का उल्लेख भी किया जा सकता है । भारत देश उज्जयिनी नामक पावस स्थल है जिसके ठीक मस्तक पर सूर्य देव रहते हैं । सम्पूर्ण विश्व में केवल इसी स्थान और अक्षांश को यह गौरव मिला हुआ है । यह ब्राह्म निवर्तित प्रकृति की अलौकिक एवं भौगोलिक घटना है । विद्वानों के अनुसार उत्तरी ध्रुव की स्थिति पर २१ मार्च से ६ माह अवधि का दिन होने लगता है । इस प्रकार षटमासी दिन के ३ माह व्यतीत हो जाने पर सूर्य देव दक्षिण में क्षितिज से अनंत दूर चले जाते हैं । यह दिन २१ जून का होता है । तब अक्षांश और सूर्य की परम कांति २४ अंश हो जाती है । ज्ञातव्य है कि उज्जयिनी में ही मानक काल प्रामणिक होता है तभी तो उज्जयिनी `ग्रीनविच' कहलाती है । धरती के अक्ष पर श्री महाकालेश्वर ज्योर्लिंग अधिष्ठित एवं प्रतिष्ठित है । ईश्वर की सृष्टि और सत्ता को सम्पूर्णता से कोई भी नहीं समझ सका है । पूर्ण को केवल पूर्ण ही जान सकता है हम तो केवल उस पूर्ण का अल्पांश है । इसीलिए हम अतीन्द्रिय तथ्यों से आज भी अनजान है । हाँ हम इतना अवश्य ही स्वाभिमान के साथ कह सकते हैं कि मेरा भारत महान है । ***