नदियों के अस्तित्व पर मंडराता खतरा
नदियां हमारे देश में प्राचीन सभ्यता और लोक संस्कृतियों के विकास की वाहक रही है । यह प्रकृति की अनमोल रचना होने से कई विशिष्टताआें के साथ जनजीवन में रची बसी हुई है । लेकिन अब ये नदियां अपने संघर्ष के दौर से गुजर रही हैं, आज बढ़ते उपभोक्तावाद के कारण नदियों का स्वास्थ्य लगातार गिरता जा रहा है । हमारी भारतीय संस्कृति में गंगा, यमुना, कावेरी, गोदावरी, ब्रह्मपुत्र और नर्मदा आज भी धार्मिक आस्था की केन्द्र हैं, जहां बड़े तपस्वी, ऋषि मुनि, योगी, धर्मात्मा और श्रृद्धालुआें को इनके तटों पर आसानी से देखा जा सकता है । किन्तु पिछली एक शताब्दी से मानव ने प्रकृति की इस सुरम्य रचना का अविवेकपूर्ण ढंग से दोहन कर लालची प्रवृत्ति के चलते वह इसे अपनी स्वार्थसिद्धी का माध्यम मानता आ रहा है, उसने नदियों के जल को रोका है, जिसमें चाहे बड़े-बड़े बांध बनाना हो, नदियों की धाराएं मोड़ना और विद्युत उत्पादन करना आदि कृत्यों से इन पवित्र नदियों के स्वरूप पर ग्रहण लगता दिखाई दे रहा है । कहा जाता है कि मानवीय दखल से नदियों का ८३ प्रतिशत बहाव प्रभावित होता है । प्रकृति और नदियों के साथ छेड़खानी के कारण मछलियों और जलीय जीवों के जीवन पर भी असर पड़ रहा हैं । तेजी से बढ़ते उद्योग, रासायनिक खेती, शहरी गंदगी, अतिक्रमण और जलग्रहण क्षेत्रों में जंगलों के कटने से नदियां सिकुड़ती जा रही है । इसी का परिणाम है कि नदियों का जल अब मनुष्य और जलीयजीवों के लिए रोगजन्य साबित हो रहा है । जिससे पर्यावरण अब विनाश के मुहाने पर पहुंचता जा रहा है । विश्व प्रकृति निधि द्वारा दुनियाभर की २२५ नदियों पर लगभग २००० शोधकर्ताआें की रिपोर्ट में नदियों पर मंडराते गंभीरत खतरों की चेतावनी दी गई हैं । भारत में नदी संरक्षण के नाम पर ५१६६ करोड़ की योजना को मंजूरी मिलने के बाद भी परिणाम संतोषजनक नहीं है । नदियों को लेकर बना केन्द्रीय प्राधिकरण भी पिछले बीस वर्षो से दो ही बैठकें कर पाया है । तापमान की बढ़ोत्तरी, हिमखंडो के पिघलने व अवर्षा के चलते सूखे की स्थिति ने अपना प्रभाव दिखाना शुरू कर दिया है । शहरीकरण और औद्योगिकरण के चलते अतिक्रमण नदियों की गोद में पसरता जा रहा है, जिससे नदियां सिकुड़ती लगी है । वर्तमान समय में जिस तरह भू-जल स्तर में गिरावट आ रही है, उससे आने वाले समय में जलसंकट के साथ खाद्यान्न संकट भी गहरा सकता है । क्योंकि जब पानी का संकट होगा तो खेतों की सिंचाई कैसे होगी, लोग पानी के अभाव में क्या करेंगे, इस पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है । अगर समय रहते नदियों के संरक्षण पर ध्यान नहीं दिया गया तो वह दिन दूर नहीं जब हमें इस स्थिति का सामना करना पड़ सकता है । मानवीय प्रवृत्तियों और स्वार्थ के वशीभूत हमने नदियों को बीमार, अपाहिज और लाचार बना दिया है । अब ऐसी स्थिति में नदियों के किनारे जमीन और जलग्रहण क्षेत्रों को कैसे बचाया जाए ? कैसे अकाल मौत का शिकार हो रही नदियों को पुर्नजीवित किया जाए ? नदियों का घटता जलस्तर कैसे बढ़ाया जाए ऐसे कई प्रश्न है जिन पर आज गंभीरता से विचार करने की जरूरत है ।
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बुधवार, 2 जुलाई, 2008
मंगलवार, 3 जून, 2008
संपादकीय
२१ सितम्बर, भारत का पर्यावरण दिवस हो
भारतीय जनमानस में पर्यावरण संरक्षण की चेतना और पर्यावरण संरक्षण के प्रयासों की परम्परा सदियों पुरानी है । हमारे धर्मग्रंथ, हमारी सामाजिक कथायें और हमारी जातीय परम्परायें हमें प्रकृति से जोड़ती है । प्रकृति संरक्षण हमारी जीवन शैली में सर्वोच्च् प्राथमिकता का विषय रहा है । प्रकृति संरक्षण के लिये प्राणोत्सर्ग कर देने की घटनाआें ने समूचे विश्व में भारत के प्रकृति प्रेम का परचम फहराया है । अमृता देवी और पर्यावरण रक्षक बिश्नोई समाज की प्रकृति प्रेम की एक घटना हमारे राष्ट्रीय इतिहास में स्वर्णिम पृष्ठों में अंकित है । सन् १७३० में राजस्थान के जोधपुर राज्य में छोटे से गांव खेजड़ली में घटित इस घटना का विश्व इतिहास में कोई सानी नहीं है । खेजड़ली में राजा के कर्मचारी जब अमृता देवी के आंगन में लगे खेजड़ी के पेड़ को काटने आये तो अमृता देवी ने उन्हें रोका और कहा कि ``यह खेजड़ी का पेड़ हमारे घर का सदस्य है यह मेरा भाई है इसे मैंने राखी बांधी है, इसे मैं नहीं काटने दूंगी ।'' अमृता देवी और गांव के लोगों ने अपना संकल्प घोषित किया ``सिर साटे रूख रहे तो सस्तो जाण'' अर्थात् हमारा सिर देने के बदले यह पेड़ जिंदा रहता है तो हम इसके लिये तैयार है । कुछ दिन बाद राजा के कर्मचारी पूरी तैयारी से आये और अमृता के आंगन के पेड़ को काटने लगे तो गुरू जंभोजी महाराज की जय बोलते हुए सबसे पहले अमृता देवी पेड़ से लिपट गयी क्षणभर में उनकी गर्दन धड़ से अलग हो गयी, फिर उनके पति, तीन लड़किया और ८४ गावों के कुल ३६३ बिश्नोईयों (६९ महिलायें और २९४ पुरूष) ने पेड़ की रक्षा में अपने प्राणों की आहूति दे दी, खेजड़ली की धरती बिश्नोईयों के बलिदानी रक्त से लाल हो गयी । यह गुरूवार २१ सितम्बर १७३० (भाद्रपद शुक्ल दशमी, विक्रम संवत १७८७) का ऐतिहासिक दिन विश्व इतिहास में इस अनूठी घटना के लिये हमेशा याद किया जायेगा । समूचे विश्व में पेड़ रक्षा में अपने प्राणों को उत्सर्ग कर देने की ऐसी कोई दूसरी घटना का विवरण नहीं मिलता है । बिश्नोई समाज का यह बलिदानी कार्य आने वाली अनेक शताब्दियों तक पूरी दुनिया में प्रकृति प्रेमियों में नयी प्रेरणा और उत्साह का संचार करता रहेगा । हमारे देश में केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय तथा सभी राज्य सरकारों द्वारा पर्यावरण एवं वन्यजीवों के संरक्षण के लिये अनेक कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं । हमारे यहां प्रतिवर्ष ५ जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है । केन्द्रीय पर्यावरण मंत्रालय के तत्वावधान में एक माह की अवधि का राष्ट्रीय पर्यावरण जागरूकता अभियान भी चलाया जाता है । यह विडम्बना ही कही जायेगी कि हमारे सरकारी लोक चेतना प्रसायों को इस महान घटना से कहीं भी नही जोड़ा गया है । हमारे यहां राष्ट्रीय पर्यावरण दिवस के लिये इस महान दिन से उपयुक्त कोई दूसरा दिन कैसे हो सकता है ? आज सबसे पहली आवश्यकता इस बात की है कि २१ सितम्बर के दिन को भारत का पर्यावरण दिवस घोषित किया जाये यह पर्यावरण शहीदों के प्रति कृतज्ञ राष्ट्र की सच्ची श्रृद्धांजलि होगी और इससे प्रकृति संरक्षण की जातीय चेतना का विस्तार हमारी राष्ट्रीय चेतना तक होगा, जिससे हमारा पर्यावरण समृद्ध हो सकेगा ।
स्तम्भ:
संपादकीय
बुधवार, 21 मई, 2008
संपादकीय
औषधि परीक्षण में पारदर्शिता का सवाल
पिछले दिनों एक अध्ययन की खबर ने औषधि अनुसंधान के क्षेत्र में हलचल पैदा कर दी । यह अध्ययन दवाइयों के परीक्षणों को लेकर था । मीडिया ने इस अध्ययन को अपनी चिर-परिचित सनसनीखेज शैली में प्रस्तुत किया । यह कहा गया कि उक्त अध्ययन से पता चला है कि दवाइयां असरदार नहीं होती । अलबत्ता, यह अध्ययन कहीं अधिक गंभीर मुद्दे उठाता है । इस अध्ययन को करने वाले शोधकर्ता पिछले वर्षो में किए गए दवा परीक्षणों के आंकड़ों का विश्लेषण करना चाहते थे । वे यह देखना चाहते थे कि दवाइयों के परीक्षणों के आंकड़े उनकी प्रभाविता के बारे में क्या कहते हैं । उन्होंने कुछ दवाइयों को चुना था । अंतत: शोधकर्ताआें को यू.एस. खाद्य व औषधि प्रशासन से यह जानकारी सूचना के अधिकार का उपयोग करके प्राप्त् करनी पड़ी थी । यह अपने आप में चिंता का विषय है । जब यह जानकारी प्राप्त् हुई, जो काफी आधी-अधूरी थी । इन गुमशुदा आंकड़ों के चलते उन्हें अपना अध्ययन सीमित करना पड़ा था । बहरहाल, जो आंकड़े प्राप्त् हुए, उनसे पता चला है कि दवाइयों के कई क्लिनिकल परीक्षण शुरू तो किए जाते हैं, मगर नकारात्मक परिणाम मिलने पर उन्हें प्रकाशित ही नहीं किया जाता । परिणाम यह होता है कि दवाई को मंजूरी दिलवाने के लिए मात्र सकारात्मक परिणाम ही प्रस्तुत किए जाते हैं । इससे औषधि विज्ञान का काफी नुकसान होता है और दवाइयों का सही आकलन भी नहीं हो पाता । यह मांग काफी समय से की जाती रही है कि सारे क्लिनिकल परीक्षण के आंकड़े प्रकाशित किए जाएं मगर ऐसा होता नहीं है । इसे सुनिश्चित करने के उपाय कुछ हद तक ही सफलहुए हैं । जैसे चिकित्सा पत्रिकाआें के संपादकोंकी एक अंतर्राष्ट्रीय समिति ने यह मांग की थी कि शोधकर्ता सारे क्लिनिकल परीक्षणों का ब्यौरा अनिवार्य रूप से रजिस्टर में दर्ज करें । इसके बाद एक महीने में यू.एस. नेशनल इंस्टीटयूट ऑफ हेल्थ में दर्ज क्लिनिकल परीक्षणों की संख्या लगभग दुगुनी हो गई थी । इसी प्रकार से विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी समस्त क्लिनिकल परीक्षणों का पंजीकरण `वैज्ञानिक व नैतिक दायित्व' घोषित किया है । इन प्रयासों के बावजूद स्थिति में बहुत सुधार नहीं हुआ है । आज भी क्लिनिकल परीक्षण पर शोध करने वालों को खोज-खोज कर ऐसे परीक्षणों के आंकड़े इकट्ठे करने पड़ते हैं । उपरोक्त सीमित सफलता के मद्दे नजर अब यह मांग उठ रही है कि यह भी अनिवार्य होना चाहिए कि सारे क्लिनिकल परीक्षणों के परिणाम भी प्रकाशित हों ।
स्तम्भ:
संपादकीय
मंगलवार, 15 अप्रैल, 2008
सम्पादकीय
ग्लोबल वार्मिंग और हमारे प्रयास
विश्व के सबसे ठण्डे निवास स्थल अंटार्किटा में बर्फ तेजी से पिघल रही है । पृथ्वी के तापमान में आये इस बदलाव का कारण पिछले कुछ वर्षोंा से अत्यधिक ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन माना जा रहा है । जो सौर ऊर्जा को परावर्तित कर वातावरण को गर्म कर देता है । ग्लोबल वार्मिंग की बढ़ रही इस समस्या से पूरी दुनिया चिंतित है । प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिंग को सबसे बड़ा खतरा मानने वाले देश इससे निपटने के लिये स्वयं की जिम्मेदारी नहंी मानकर दूसरे देशों पर डाल रहे हैं । वर्ष २००४ के आंकड़ों के अनुसार विश्व भर में ग्रीन हाउस गैसों में से एक कार्बनडाय आक्साइड का २७ अरब टन उत्सर्जन किया गया , जिसमें से ५.९ अरब टन तो केवल अमेरिका ने ही किया । इसके बाद ४.७ अरब टन का उत्सर्जन कर चीन दूसरे रूस १.७ और जापान १.३ अरब टन पर तीसरे स्थान पर है । भारत भी १.१ अरब टन कार्बन डाई ऑक्साईड ग्लोबल वार्मिक के लिये अहम जिम्मेदार माना गया । इसमें दूसरा पहलू यह भी है कि १९९७ में जिन ३८ औद्योगिक देशों ने ग्लोबल वार्मिंग के निराकरण के लिये क्योटो प्रॉटोकोल पर हस्ताक्षर किये थे उनमें से ५५ प्रतिशत देश ग्रीन हाउस गैसों को वातावरण में ज्यादा मात्रा में उत्सर्जित करने के लिए जिम्मेदार माने गये । सन् २००१ में हुए एक अध्ययन के अनुसार लगातार हो रहे इस वातावरण परिवर्तन के कारण तापमान औसतन ०.६ डिग्री बढ़ता जा रहा है । इसी वजह से आकर्टिंका की बर्फ तेजी से पिघल रही है । इसके साथ ही मुख्य नदियों के ग्लेशियर भी खत्म होते जा रहे हैं । विशेषज्ञ मानते हें कि असन्तुलित वर्षा और चक्रवाती तूफानों की तीव्रता में वृद्धि भी ग्लोबल वार्मिंग का ही परिणाम है । सन् २००७ में संयुक्त राष्ट्र के इंटर गर्व्हमेंट पैनल के अनुसार २१०० तक पृथ्वी की सतह का तापमान बढ़कर ३.२ से ७.२ तक फेरनहाइट हो सकता है । इस रिपोर्ट के अनुसार जलवाष्प, कार्बन डाइ ऑक्साइड, मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड और ओजोन ग्लोबल वार्मिंग के लिये जिम्मेदार है । इनका ६० प्रतिशत उत्सर्जन मानवीय क्रियाआें के कारण होता है । वैज्ञानिकों के अनुसार ग्लोबल वार्मिंग से बचाने के कुछ कृत्रिम उपाय किये जाये तो कुछ हद तक इस पर रोक लगायी जा सकती है । उनके अनुसार ग्लोबल वार्मिंग के कारण बाधितप्रकाश संश्लेषण की क्रिया में इजाफा करने के लिये यदि समुद्र में लौह तत्व की मात्रा कृत्रिम रूप से बढ़ा दी जाये तो इससे समुद्री शैवाल को पोषण मिलेगा साथ ही उनकी उत्पत्ति बढ़ने से प्रकाश संश्लेषण की क्रिया में वृद्धि होगी वैज्ञानिकों का कहना है कि प्रकाश संश्लेषण की क्रिया में पौधे कार्बनडाइ आक्साइड ग्रहण करते हैं और ऑक्सीजन बाहर निकालते हैं । इसलिए ऐसा करने पर काफी हद तक वातावरण की कार्बन डाई आक्साइड को कम किया जा सकता है ।***
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संपादकीय
सोमवार, 14 अप्रैल, 2008
संपादकीय
आकाशगंगा में पृथ्वी जैसे और ग्रह
एक नए शोध के मुताबिक जिस आकाश गंगा में पृथ्वी है उसमें कई और ऐसे ग्रह हैं जिनमें जीवन के लिए अनुकूल परिस्थितियां है । अंतरिक्ष वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि पृथ्वी के सौर मंडल के बाहर पृथ्वी की ही तरह कई और ग्रह भी हो सकते है । सौर मंडल में लगातार खोज-बीन कर रहे वैज्ञानिकों ने बॉस्टन के अमेरिकन एसोसिएशन फॉर द एडवांसमेंट ऑफ साइंस यानी `एएएएस' में अपनी इस खोज के तथ्य पेश किए हैं । इस रिपोर्ट में कहा गया है कि धरती के इस सौर मंडल के बाहर सैकड़ों ऐसे सूर्य हैं और उनके साथ उनका खुद का पूरा-पूरा सौर मंडल भी मौजूद है । वैज्ञानिकों का कहना है `इस खोज से हमें ये समझने में आसानी होगी कि पृथ्वी और दूसरे तमाम ग्रह किस तरह वजूद में आए ।' कुछ अंतरिक्ष वैज्ञानिक ये भी मानते हैं, `सौर मंडल के भीतर ही किसी कोने में पृथ्वी की तरह की सैकड़ों पृथ्वियां मौजूद हैं लेकिन ये बर्फ की तरह जमी हुई है ।' वैज्ञानिक हमारे सौर मंडल के `क्यूपर बैल्ट जोन' में ही प्लूटो के आकार के हजारों ग्रह होने का दावा कर चुके हैं । अमेरिका की एरिजोना विश्वविद्यालय के अंतरिक्ष वैज्ञानिक माइकल मेयर भी मानते हैं कि हमारे सौर मंडल में सूर्य की तरह के कई और तारे भी मौजूद हो सकते हैं । मेयर कहते हैं, `इस खोज के जरिए हम इस रहस्य से पर्दा उठा सकते हैं कि ब्रह्मांड में मौजूद तमाम ग्रह और हमारी पृथ्वी किस तरह बनी होगी ।' दरअसल, विज्ञान की भाषा में सूर्य को तारा कहा जाता है । मेयर और उनकी पूरी टीम ने अमेरिका अंतरिक्ष एजेंसी स्पिटजर स्पेस टेलिस्कोप की मदद से इस तरह के तारों को देखा है । अमेरिका की अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने भी इस तरह की दूसरी पृथ्वियां खोजने के लिए एक पूरा अभियान चलाया हुआ है जैसे `कैपलर मिशन' के नाम से जाना जाता है । कैलीफोर्निया की सैन फ्रांसिस्को स्टेट यूनिवर्सिटी के काम कर रही वैज्ञानिक डेबरा फिश्वर कहती है, हमारे सौर मंडल के गोल्डीलाक्स जोन में कई ग्रहों के देखे जाने से भी वैज्ञानिक काफी उत्साहित हैं । नासा के वैज्ञानिक एलन स्टर्न कहते हैं हमें उम्मीद हैं कि हम बड़ी संख्या में ग्रहों को खोज लेंगे । स्टर्न ये भी कहते हैं कि हमारे सौर मंडल के एक कोने पर धुंए की तरह के मौजूद बादल ऊर्ट क्लाउड में पृथ्वी के द्रव्यमान के बराबर के ग्रह देखे गए हैं लेकिन ये बेहद दूर होने की वजह से जमे हुए हैं । पृथ्वी की तरह के इन ग्रहों और सूर्य की तरह के तारों की खोज से वैज्ञानिक काफी उत्साहित हैं । उनका मानना है कि इन ग्रहों पर धरती की ही तरह जीवन हो सकता है ।
स्तम्भ:
संपादकीय
सोमवार, 11 फ़रवरी, 2008
संपादकीय
कान्हा में पर्यटको की बढ़ती संख्या से जुड़े सवाल
विश्वविख्यात कान्हा टाईगर रिजर्व इस वर्ष भी पर्यटकों को भी आकर्षित करने में सफल रहा है। पर्यटन वर्ष २००६-०७ में देशी सैलानियों की संख्या में पिछले वर्ष की तुलना में लगभग दो गुना वृद्धि दर्ज की गयी है । जबकि विदेशी पर्यटकों की संख्या लगभग बराबर रही है । देश के २८ टाईगर रिजर्व में सर्वश्रेष्ठ कान्हा टाईगर रिजर्व में पर्यटकों की बढ़ती संख्या से भविष्य में होने वाले नुकसान को भी अनदेखा नहीं किया जाना चाहिये । देश के हृदय स्थल मध्यप्रदेश में लगभग १९४७ वर्ग किलोमीटर में फेलायह वन्य जीवन संरक्षित क्षेत्र एशिया का सर्वश्रेष्ठ पर्यटन स्थल है । जैव विविधता से परिपूर्ण इस टाईगर रिजर्व में स्तनधारियों की ४० तथा पक्षियों की ३०० से अधिक प्रजातियां पायी जाती है । बाघ दर्शन के लिए प्रसिद्ध इस टाईगर रिजर्व की प्रमुख विशेषता है विश्व में अन्यत्र कहीं नहीं पाया जाने वाली अतिसंकटग्रस्त वन्यजीव प्रजाति का दलदली हिरण, बारहसिंघा विलुप्त् होने की कगार पर खड़ी इस ब्रेडरी उपप्रजाति के बारहसिंगों की संख्या कान्हा में ३०० के आसपास है । बाघों के दर्शन के लिए प्रसिद्ध इस टाईगर रिजर्व में बाघों की संख्या ९० तथा गुलबाघों की संख्या ९८ है । पर्यटन वर्ष २००६-०७ में ९५,६४६ घरेलू तथा १०,६५१ विदेशी यानि कुल १,०६,२९७ पर्यटकों ने कान्हा टाईगर रिजर्व का भ्रमण किया है । कान्हा टाईगर रिजर्व में पर्यटकों की संख्या में लगातार वृद्धि राजस्व प्रािप्त् की दृष्टि से यह एक अच्छी खबर हो सकती है लेकिन वन्यजीव विशेषज्ञ और वन्य जीव प्रेमी इस खबर से ज्यादा हर्षित नहीं है । वर्षो से जैविक दबाव झेल रहा कान्हा टाईगर रिजर्व पर्यटकों के इस बढ़ते दबाव को किस हद तक सहन कर पायेगा यह देखा जाना जरूरी है । रिजर्व का छोटा पर्यटन जोन तथा इको पर्यटन की सीमित सुविधाएं इस तरह से बढ़ती पर्यटकों की भीड़ को सम्हालने में असमर्थ दिखायी देते है । यद्यपि कान्हा उद्यान प्रबंधन पर्यटकों की इस भीड़ को नियंत्रित करने की दिशा में समुचित प्रयास कर रहा है लेकिन इको पर्यटन की अवधारणा को लेकर आगे आये पर्यटन व्यवसायियों की भागीदारी इस दिशा में शून्य है । एक सीमित वन क्षेत्र में तेजी से बढ़ रही पर्यटन गतिविधियों से वन्यजीवों के प्राकृतिक रहवास पर तो असर पड़ेगा ही वन्यजीव भी सुरक्षित नहीं रह पायेंगे। वन्य जीवन के प्रति बढ़ती जनजागरूकता व रूचि के कारण आगामी वर्षो में पर्यटकों की संख्या में और भी वृद्धि होने की संभावना है । विश्व के पर्यटन मानचित्र पर तेजी से एक वन्यजीव पर्यटन स्थल के रूप में स्थान बना रहे कान्हा टाईगर रिजर्व में भारतीय भौगोलिक परिस्थितियों के अनुकूल विश्वस्तरीय पर्यटन सुविधाएं विकसित करना आवश्यक है । यद्यपि किसी भी वन्यजीव संरक्षित क्षेत्र का उद्देश्य पर्यटन से राजस्व की प्राप्त् न होकर जैवविधिता का संरक्षण करना है लेकिन वन्य प्राणियों और इंसान के बीच प्रेम पूर्ण रिश्ता कायम कर इस प्राकृतिक सम्पदा के संरक्षण के साथ राजस्व प्रािप्त् भी की जा सकती है ।
स्तम्भ:
संपादकीय
शनिवार, 12 जनवरी, 2008
संपादकीय
गण तन्त्र से मुक्त कब होगा ?
२६ जनवरी १९५० को हमारे देश में संवैधानिक सरकार की शुरूआत हुई । इसी दिन से प्रत्येक वर्ष २६ जनवरी गणतन्त्र दिवस के रूप में मनाया जाता है । एक सम्पूर्ण प्रभुत्व लोकतन्त्रात्मक गणराज्य का आदर्श हमारा लक्ष्य है । देश के सभी नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार अभिव्यक्ति , विश्वास, निष्ठा और पूजा की स्वतंत्रता, सामाजिक स्तर और अवसर की समानता होगी, ऐसा संविधान में कहा गया है । यह देश का दुर्भाग्य ही है कि स्वतंत्रता के समय सत्ता में जन तो परिवर्तित हो गया लेकिन तंत्र वहीं रहा । अंग्रेजी साम्राज्यवाद में अंग्रेजों ने अपने सत्ता केन्द्रों की सुरक्षा के लिए जिस तंत्र और तंत्रज्ञों का जाल बुना था दुर्भाग्य से हमने जनतंत्र के रूप में इसे ऐसा ही स्वीकार कर लिया यही कारण हुआ कि पुराने नौकरशाह स्वतंत्रता के बाद राजनीतिज्ञो के सेवक या सलाहकार के स्थान पर उनके मालिक हो गए । नौकरशाही के गलत रवैये के कारण ही आज स्थिति यह है कि आम आदमी को उसको सही, जरूरी और सम्भव सहायता नौकरशाहों की दया पर निर्भर है, पटवारी से मुख्य सचिव तक हमारे नौकरशाह सही मालिक होने का अभिनय बखूबी कर रहे हैं और मालिक होने का भ्रम पाले गणदेवता (नागरिक) बेचारा हाथ जोड़कर याचक की भूमिका से अब तक ऊपर नहीं उठ सका है । यह गणतंत्र के नाम पर छलावा नहीं तो क्या है ? सेवा भावना से गरीब के दर्द को समझकर काम कर सकने की भावना किसी भी प्रशासक में नहीं है । आदमी की औकात उनके सामने आंकड़ों के रूप में है कि इतनों की इतनी सहायता देनी है व्यक्ति नहीं लक्ष्य प्रमुख हैं इसलिए रोज लक्ष्यपूर्ति के दावे किये जाते हैं । व्यक्ति की अस्मिता जहां गोण हो जाए इससे ज्यादा दुभाग्यपूर्ण क्षण और क्या हो सकता है ? समाज परिवर्तन में हमारे प्रयास और सरकारी नीतियां इसीलिए असफल हो रही है कि अधिकारियों के मन में आम आदमी के प्रति प्रेम श्रद्धा या आदर का कोई स्थान नहीं है, आम आदमी को अधिकारीगण हिकारत की दृष्टि से देखते है । आज सही गणतंत्र में नागरिक सुविधाआे की दृष्टि से जरूरी हो गया है कि `गण' को तंत्र से जितना सम्भव हो सके मुक्ति को दिशा में ले जाया जाए, तंत्र से पूर्ण मुक्ति ही सच्च्े गणतंत्र की स्थापना में सहायक होगी, जब तक तो गणतंत्र के नाम पर तंत्र वालों की मौज चलती रहेगी । ***
स्तम्भ:
संपादकीय
शनिवार, 15 दिसंबर, 2007
संपादकीय
एक लाख करोड़ खर्च के बाद भी सिंचित क्षेत्र में कमी
केन्द्रीय कृषि मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार सन् १९९१-९२ से २००३-०४ तक नहरों से शुद्ध सिंचित इलाकों में कोई बढ़ोत्तरी नहीं हुई हैं । जबकि इस अवधि में देश ने नहर आधारित सिंचित इलाकों में बढ़ोत्तरी के उद्देश्य से बड़ी व मध्यम सिंचाई परियोजनाआे में रूपये ९९६१० करोड़ व्यय किये हैं । इस पूरे व्यय से पिछले १२ सालों में देश के बड़े बांधों की नहरों द्वारा शुद्ध सिंचित इलाके में एक भी एकड़ की बढ़ोत्तरी नहीं हुई है । यह बहुत गंभीर चिंता का कारण होना चाहिए । सन् १९९१-९२ में पूरे देश में नहर द्वारा शुद्ध सिंचित इलाका १७७.९ लाख हेक्टेयर था । उसके बाद २००३-०४ तक जिसके आंकड़े मौजूद हैं के सभी सालों में नहरों द्वारा शुद्ध सिंचित इलाका १७७.९ लाख हेक्टेयर से कम रहा है यानि वह लगातार कम हो रहा है । जल संसाधन मंत्रालय ने ११वीं योजना में प्रस्ताव किया है कि बड़ी एवं मध्यम सिंचाई परियोजनाआे के लिए १६५९०० करोड़ रूपयों का आवंटन किया जाये । अब तक उपलब्ध तथ्य दिखाते हैं कि इससे सार्वजनिक धन की पूरी तरह बर्बादी ही होगी । सिंचित क्षेत्र में कमी के अनेक कारण है । विश्व बैंक की २००५ की रिपोर्ट `इंडियाज वाटर इकॉनामी : ब्रैसिंग फॉर ए ट्रबूलेंट फ्यूचर' यह दिखाती है कि भारत के सिंचाई ढांचों के रख-रखाव के लिए सालाना वित्तीय आवश्यकता १७००० करोड़ रूपयों की है लेकिन इस हेतु आवश्यकता से १० प्रतिशत से भी कम राशि उपलब्ध होती है एवं इनमें से ज्यादातर ढांचो के भौतिक रख-रखाव में इस्तेमाल नहीं होती है । इन आंकड़ों से साफ पता चलता है कि देश में प्रति वर्ष बड़ी सिंचाई परियोजनाआे पर व्यय होने वाले हजारों करोड़ की राशि से कोई अतिरिक्त सिंचित इलाका विकसित नहीं हो रहा है । सिंचित इलाके में वास्तविक बढ़ोत्तरी पूरी तरह भू-जल सिंचाई से हो रही है । वास्तव में ९९६१० करोड़ रू. के अफलदायी निवेश द्वारा सिंचाई में कोई बढ़ोत्तरी नहीं होना पिछले दशक में भारत की घटती कृषि विकास दर का प्रमुख कारण है । बताया जा रहा है कि त्वरित सिंचाई लाभ कार्यक्रम (ए.आई.बी.पी.) में अप्रैल १९९६ से मार्च २००४ तक व्यय किये गये १४६६९ करोड़ रू. से कोई अतिरिक्त सिंचित इलाका नहीं जुड़ा है । इस तरह जल संसाधन मंत्रालय का यह दावा कि उपरोक्त अवधि में ए.आई.बी.पी. से २६.६० लाख हेक्टेयर अतिरिक्त सिंचित इलाका जुड़ा है सही नहीं है । इससे जवाबदेही के कई मुद्दे उठते हैं एवं इसके लिए जल संसाधन मंत्रालय, योजना आयोग एवं राज्यों में जो जिम्मेदार अधिकारी हैं उनको ढेर सारे सवालों का जवाब जनता को देना होगा ।
स्तम्भ:
संपादकीय
गुरुवार, 8 नवंबर, 2007
संपादकीय
ग्लोबल फेस्टिवल दीपावली
आजकल दीपावली ग्लोबल फेस्टिवल है । दीपावली रोम से लेकर यूनान और लंदन से लेकर न्यूयार्क तक में मनायी जा रही है । इसकी वजह यह है कि धन दुनिया के हर इंसान को प्रिय होता है फिर चाहे वह जिस धर्म या समाज से रिश्ता रखता हो । दीपावली मेंधन की देवी लक्ष्मी की पूजा होती है जो इंसान की स्वाभाविक चेतना का हिस्सा है, इसलिए यह लक्ष्मी सिर्फ हमारी ही देवी या आराध्या नहीं है बल्कि अलग-अलग नामों से धन की देवी की आराधना सभी धर्मो और समाजों में होती है । यही कारण है कि भारत की ही तरह रोम में भी दीपज्योति जलाकर देवी लक्ष्मी की पूजा की जाती है । हालांकि दोनों में फर्क भी हैं, हम भारत में जिसे लक्ष्मी कहते हैं रोम में उसे ज्योति की देवी वेस्ता कहते हैं । रोम की ही तरह यूनान भी प्राचीन सभ्यता व संस्कृति का केन्द्र है । यहां भी लक्ष्मी की पूजा होती है । यहां लक्ष्मी को कृषि एवं सामाजिक संपन्नता की देवी री के रूप में जाना जाता है । री देवी की पूजा धूमधाम से की जाती है तथा इस रात यहां भी चारों और दीपावली के समान ही दीपों को जलाया जाता है । भारत की लक्ष्मी और एथेंस की देवी एथेना में तो इतनी साम्यता है कि लगता है जैसे लक्ष्मी का ही व्यापक संस्करण एथेना है । एथेना प्राचीन यूनान की महालक्ष्मी के रूप में प्रतिष्ठित है । भारत की लक्ष्मी की ही तरह एथेना का वाहन भी उल्लू है । यहां की महिलाएं महालक्ष्मी एथेना की उपासना करती हैं । वे मंदिरों में जाकर दीप जलाती है तथा लिली के पीले फूल चढ़ाती है । कंबोडिया में अंकोरवाट के विशालकाय विष्णु मंदिर में लोग दीपावली की तरह जीवन ज्योति देवी की पूजा दीप जलाकर करते हैं । मान्यता है कि जीवन ज्योति की पूजा करने वाला अभवग्रस्त नही रहता । इसके अलावा इंडोनेशिया के बाली द्वीप में लक्ष्मी की पूजा धान पैदा करने वाली देवी के रूप में की जाती है । भारत के पड़ोसी श्रीलंका में वहां के लोग देवी लंकिनी की पूजा करते हैं । देवी लंकिनी को भी वैभव एवं ऐश्वर्य की देवी मानकर पूजा की जाती है । सूडान यूं तो इस्लामी देश है लेकिन वहां भी दीपावली में देवी मूर्तिजा की पूजा की परंपरा है । इसके अलावा नेपाल, थाइलैंड, जावा, सुमात्रा, मारीशस, गुयाना, दक्षिण अफ्रीका और जापान आदि देशों में भी अनेक रूपों में लक्ष्मी की पूजा की जाती हैं ।
स्तम्भ:
संपादकीय
शुक्रवार, 7 सितंबर, 2007
संपादकीय
जंतुऔ को परीक्षण से राहत मिलेगी
हम जिन सौंदर्य प्रसाधनों का उपयोग करते है, उनकी जांच के लिए हजारों खरगोश और चूहों को यातनाएं झेलनी पड़ती है । अब उन्हें इससे थोड़ी राहत मिली है। आम तौर पर सौंदर्य प्रसाधन कम्पनियां यह जांचने के लिए इन जंतुआे का उपयोग करती हैं कि उनके द्वारा बनाए गए प्रसाधन कहीं आंखों में जलन या चमड़ी पर एलर्जी तो पैदा नहीं करते हैं । कोई नई सामग्री बाज़ार में उतारने से पहले ऐसी जांच की जाती है । अलबत्ता इसी वर्ष से यूरोप में इनमें से कई परीक्षणों पर प्रतिबंध लगा दिया गया है । वैकल्पिक विधियों के प्रमाणीकरण के लिए इटली मेंएक केंद्र है । इस केंद्र ने पांच परीक्षणों के विकल्प सुझाए हैं और विकल्प उपलब्ध हो जाने पर पूर्व में की जाने वाली जांच पर प्रतिबंध लगा दिया गया है । केंद्र ने जो वैकल्पिक परीक्षण सुझाए हैं उनमें से दो ऐसे हैं जिनके लिए जीवित जंतु की बजाए बूचड़खाने से प्राप्त् ऊतक से काम चल जाएगा । ये परीक्षण उन रसायनों के लिए हैं जिनमें आंखों में जलन पैदा करने वाले रसायनों की जांच की जाती है । दो ऐसे वैकल्पिक परीक्षण सुझाए गए हैं जिनमें प्रयोगशाला में संवर्धित कोशिकाआे से काम चलाया जा सकेगा । ये मूलत: त्वचा को उत्तेजित करने वाले रसायनों के लिए हैं । यूरोप में हर साल २०,००० जंतुआे पर ये परीक्षण किए जाते थे । एक अन्य परीक्षण एलर्जी से संबंधित था । इसका विकल्प मिल जाने से भी हजारों जंतु बच जाएेंगें । वैसे तो उपरोक्त पांचों वैकल्पिक परीक्षण बरसों से उपलब्ध रहे हैं मगर कम्पनियां इनका उपयोग नही करती थीं क्योंकि इनका प्रमाणीकरण नही हुआ था । दरअसल इटली के उक्त केंद्र ने प्रयोग करके प्रमाणित कर दिया है कि ये वैकल्पिक परीक्षण पूर्व के परीक्षणों से बेहतर ही हैं । आम तौर पर वैज्ञानिक समुदाय में जीवित जंतुआे पर प्रयोग करने के मामले में जागरूकता बढ़ रही है और इसी के परिणाम स्वरूप विकल्पों की खोज में तेजी आई है । वैसे अभी भी स्थिति यह है कि कम्पनियों को कुछ ऐसे परीक्षण करने की छूट रहेगी । मगर यूरोपीय संघ ने तय किया है कि विकल्प हों या न हों, वर्ष २००९ तक ऐसे सारे परीक्षण बंद कर दिए जाएेगें ।
स्तम्भ:
संपादकीय
सोमवार, 20 अगस्त, 2007
सम्पादकीय
कचरे से बढ़ता प्रदूषण खतरनाक
इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के अनुपयोगी हो जाने से इकट्ठा हो रहे कचरे का निपटान ढंग से नहीं हो पाने के कारण पर्यावरण केखतरे बढ़ रहे है । एक अध्ययन के अनुसार भारत में प्रतिवर्ष डेढ़ लाख टन ई-वेस्ट या इलेक्ट्रॉनिक कचरा बढ़ रहा है । इसमें देश में बाहर से आने वाले कबाड़ को जोड़ दिया जाए तो न केवल कबाड़ की मात्रा दुगुनी हो जाएगी, वरन् पर्यावरण के खतरों और संभावित दुष्परिणामों का सही अनुमान नहीं लगाया जा सकेगा । प्रतिवर्ष भारत में बीस लाख कम्प्यूटर अनुपयोगी हो जाते हैं । इनके अलावा हजारों की तादाद में प्रिंटर, फोन, मोबाईल, मॉनीटर, टीवी, रेडियो, ओवन, रेफ्रिजरेटर, टोस्टर, वेक्यूम क्लीनर, वाशिंग मशीन, एयर कंडीशनर, पंखे, कूलर, सीडी व डीवीडी प्येयर, वीडियो गेम, सीडी, कैसेट, खिलौने, फ्लोरेसेंट, ट्यूब, ड्रिलिंग मशीन, मेडिकल इंस्टूमेंट, थर्मामीटर और मशीनें भी बेकार हो जाते हैं । जब उनका उपयोग नहीं हो सकता तो ऐसा कचरा खाली भूमि पर इकट्ठा होता रहता है, इसका अधिकांश हिस्सा जहरीला और प्राणीमात्र के स्वास्थ्य के लिए खतरनाक होता है । कुछ दिनों पहले इस तरह के कचरे में खतरनाक हथियार व विस्फोटक सामगी भी पाई गई थी । इनमें धातुआे व रासायनिक सामग्री की भी काफी मात्रा होती है जो संपर्क में आने वाले लोगों की सेहत के लिए खतरनाक होती है । लेड, केडमियम, मरक्यूरी, एक्बेस्टस, क्रोमियम, बेरियम, बेेटीलियम, बैटरी आदि यकृत, फेफड़े, दिल व त्वचा की अनेक बीमारियों का कारण बनते हैं । अनुमान है कि यह कचरा एक करोड़ से अधिक लोगों को बीमार करता है । इनमें से ज्यादातर गरीब, महिलाएँ व बच्च्े होते हैं । इस दिशा में गंभीरता से कार्रवाई होना जरूरी है । महाराष्ट्र, गुजरात, पंजाब, आंध्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, उत्तरप्रदेश, पश्चिमी बंगाल व मध्यप्रदेश में इस कचरे की मात्रा बढ़ती जा रही है । मुंबई, दिल्ली, बंगलोर, चेन्नई, कोलकाता, अहमदाबाद, हैदराबाद, पुणे, सूरत, नागपुर इसके बड़े केंद्र है । ये सब बारूद के ढेर पर बसे हैं । मेनन कमेटी की सिफारिश पर इसके लिए नियम भी बनाए गए थे, उनमें हर वर्ष सुधार भी होता रहा है । मगर देश के लोगों की मानसिकता अभी कबाड़ संभालने व कचरे से सोना निकालने की बनी हुई है । इस कारण कचरे से पर्यावरण प्रदूषण