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मंगलवार, 3 जून, 2008

४ सामयिक

आलू : अतीत से अब तक
डॉ. किशोर पंवार
राष्ट्र संघ के खाद्य एवं कृषि संगठन ने वर्ष २००८ को अंतराष्ट्रीय आलू वर्ष घोषित किया है । आलू आम व खास सभी के लिए महत्वपूर्ण पोषक पदार्थ है। घरों से लेकर उद्योगों तक आलू की पैठ है । आज जिस आलू के बिना हमारा काम नहीं चलता उसे एक जमाने में जहरीला पौधा समझा जाता था । कई बार उसे कैदियों को जबरन खिलाया गया । कुछ लोगों को उसके फूल इतने पसंद आए कि उन्होने इन्हें कोट के बटन में टांक लिया । आज आलू पूरी दुनिया में एक महत्वपूर्ण खाद्य फसल के रुप में स्थापित हो चुका है । आलू बड़ा पाव, बटाटा राइस, आलू इन समोसा , आलू की चिप्स वगैरह, आज हर तरफ आलू है । आइए अंतर्राष्ट्रीय आलू वर्ष पर आलू से जुड़ी कुछ व्यावहारिक बातें की जाएं । कहां से आया आलू : यद्यपि आलू को आयरिश पोटेटो कहा जाता है मगर टिटिकाका झील के पठारी क्षेत्रों में (जो समुद्र तल से ३१२ मीटर ऊंचाई पर स्थित है ) आलू इनका लोगों द्वारा मक्का के साथ उगाया जाता था । ये उनके प्रमुख भोज्य पदार्थ थे । तब से यह कंद आज तक दक्षिणी अमेरिका के एनुडिअन क्षेत्र के लोगों के जीवन का प्रमुख हिस्सा है। वहां खुदाई से प्राप्त् बर्तनों पर इनकी आकृतियां इसका प्रमाण है । इन बर्तनों का काल ८०० से १५०० ईसा पूर्व निर्धारित किया गया है । आलू की खेती से सम्बंधित कई बातेंं इन बर्तनों पर उकेरी गई हैं । पुरानी दुनिया में १६ वीं शताब्दी के पूर्व तक आलू को कोई नहीं जानता था । यहां तक कि कोलम्बस द्वारा अमेरिका की खोज के समय तक यह उत्तरी और मध्य अमेरिका में भी यह अनजाना था । अत: स्पेनिश विजेताआें ने ही आलू को यूरोप में प्रसारित किया, आयरिश लोगों ने नहीं जैसी कि मान्यता है । भारत में आलू : भारत में इसे पुर्तगाली लोगों द्वारा १७ वीं शताब्दी में लाया गया परंतु इसकी खेती बहुत धीरे-धीरे बढ़ी । सम्भवत: आयरिश लोगो ने ही आलू के महत्व को मुख्य खाद्य पदार्थ के रुप में पहचाना और इसे एक फसल के रुप में १७ वीं शताब्दी में उगाना शुरु किया । इसका उपयोग १८ वीं शताब्दी में धीरे-धीरे फैलने लगा । हालांकि यूरोप के कुछ हिस्सों में इसका तीव्र विरोध भी हुआ, क्योंकि यह पौधा और इसके अन्य सदस्य जैसे धतूरा, चिरकोटी आदि ज़हरीले कुल सोलेनेसी के सदस्य हैं । अलबत्ता १८ वीं शताब्दी के अंतिम वर्षो में इसे एक महत्वपूर्ण व्यापारिक फसल का दर्जा प्राप्त् हो चुका था । खाद्य पदार्थ के रुप में इसके महत्व को देखते हुए जर्मनी और स्वीडन में इसे उगाने के लिए शाही आदेश दिए गए थे।आलू और अकाल आयरलैंड में आलू को मुख्य भोजन के रुप मेें विशेषकर गरीब लोगों द्वारा अपनाया गया । वहां के लोग १८४५-४६ तक मुख्य रूप से इसी पर निर्भर रहे । इसी समय आलू पर पोटेटो ब्लाइट नामक बीमारी का आक्रमण हुआ जो एक फफूंद से होती थी । उसके प्रकोप से पूरे यूरोप में आलू की फसल चौपट हो गई । इस तरह इतिहास का एक बहुत ही बुरा अकाल देखने में आया । जिसे दी ग्रेट आयरिश पोटेटो फेमीन कहा जाता है । इस अकाल के कारण हजारों लोगों को देश भी छोड़ना पड़ा ।आलू चीज़ क्या है ? तो देखें कि सबकी पसंदीदा सदाबहार सब्जी आलू है क्या ? वनस्पति विज्ञान की दृष्टि से आलू तना है । यह रूपांतरित तना जड़ की तरह जमीन में रहता है और जड़ की ही तरह भूरा मटमैला होता है । आलू तना है, इसके पक्ष में कई प्रमाण है । मसलन आलू पर गठानों का पाया जाना और इस पर `आंखे' होना। आलू की सतह पर यहां-वहां दिखाई देने वाले छोटे-छोटे गढ्ढे जिन्हें बोलचाल में आंखें कहते हैं वास्तव में तने पर पाई जाने वाली कलियां है । एक आंख में प्राय: ऐसी तीन कलियां होती हैं । कली की उपस्थिति तने पर गठान (पर्व संधि) की मौजूदगी दर्शाती है । दो आंखों के बीच की जगह को पर्व कहते हैं । आलू (सोलेनम ट्यूबरोसम) का पौधा एक बहुवर्षीय शाक है जिसे खेती के तहत एक वर्षीय बना दिया गया है । इसके मुख्य तने के आधार से कई शाखाएं निकलती हैं जो मिट्टी के अंदर सतह के समानांतर आगे बढ़ती हैं । कुछ ही समय बाद इन शाखाआेंकी आगे की वृद्धि रूक जाती है परंतु पत्तियों में बन रहे भोजन का नीचे की ओर प्रवाह बना रहता है । इस अतिरिक्त भोजन के कारण इनका आगे का भाग भोजन संग्रह के कारण धीरे-धीरे फूलता जाता है और आलू के रूप में हमारे सामने आता है । तो आलू एक फूला हुआ तना है जो जमीन के अंदर रहता है और इसे ट्यूबर (कंद) कहते हैं। यह कंद सफेद, लाल, जामुनी और पीला भी होता है । यानी आलू का रंग पीला, सफेद ही नहीं लाल, नीला भी होता है। आलू की बाहरी सतह में ही प्रोटीन, खनिज लवण, टेनिन और रंजक पाए जाते हैं । अत: आलू को ज्यादा छीलना उचित नहीं होता क्योंकि इसी पर्त में प्रमुख पोषक पदार्थ रहते हैं । आलू की कुछ किस्मों में फूल आते हैं, कुछ में नहीं । फूल आने पर फल बने यह भी जरूरी नहीं । फूल बैंगन, टमाटर जैसे ही होते हैं क्योंकि ये भी सोलेनेसी कुल के सदस्य हैं । आलू के फल गोल १.२ से २.५ से.मी. व्यास के कच्च्े रहे होते हैं और पकने पर पीले, जामुनी या काले होते हैं । प्रत्येक फल में लगभग २०० बीज होते हैं ।पोषण मान आलू का हमारे यहां सब्जी के रूप में ही उपयोग किया जाता है या पोटेटो चिप्स के रूप में जो एक फलता-फूलता व्यवसाय है । आलू में लगभग ७८ प्रतिशत पानी, १८ प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट, २ प्रतिशत प्रोटीन, ०.१ प्रतिशत वसा और लगभग १ प्रतिशत पोटेशियम होता है । आलू विटामिन सी और खनिज लवणों, विशेषकर पोटेशियम, फास्फोरस, लोह और मैंगनीज़ जैसे तत्वों का एक अच्छा स्त्रतोत है । हरे या उगते हुए आलू खाने से बचना चाहिए क्योंकि इनमें एक जहरीला पदार्थ सोलेनिन होता है। ज्यादा मात्रा में उपयोग करने पर यह जानलेवा हो सकता है ।आलू की आंख आलू की खेती भी बड़ी रोचक है । अन्य फसलों और सब्जियों की तरह आलू के बीज नहीं बोये जाते । ऐसा नहीं है कि आलू में बीज बनते ही नहीं है । परंतु आलू की खेती के लिए इसके बीजों का नहीं इसकी आंखों का प्रयोग किया जाता है । आलू की आंखों को ही बीजों की तरह प्रयोग करते हैं । आलू के तीन-चार टुकड़े करके उन्हें जमीन में गाड़ा जाता है। इस बात का ध्यान रखा जाता है कि उस टुकड़े के कम से कम दो-तीन आंखे जरूर हों । ऐसे आंख दार आलू को जब हम बोते हैं और वे नई-नई शाखाआें को जन्म देती है । परंतु आलू को शीत गृह में रखने पर ये लंबे समय तक सुप्त् रखने के लिए नेफ्थलीक ऐसीटिक अम्ल का घोल भी छिड़का जाता है । जब आलुआें का प्रयोग बीज के रूप में करना होता है तब इन्हें शीतग्रहों से निकालकर २ प्रतिशत अमोनियम थायोसायनिक अम्ल से उपचारित करते हैं । आलू को इथीलीन क्लोरोहायड्रिन की वाष्प में २४ घंटे रखने से भी उनकी नींद उड़ जाती है और ये अंकुरित हो उठते हैं ।किचन से प्रयोगशाला तक दुनिया की अर्थव्यवस्था में आलू का बड़ा महत्व है । ताजी सब्जी के रूप में आलू को उबालकर, भूनकर, तलकर कई तरीकों से खाया जाता है । किचन में तो आलू एक आवश्यक सब्जी के रूप में रहता है कि अन्य कोई सब्जी न हो तो आलू-प्याज ही बना लो । दोनों की विशेषता है लंबे समय तक बिना किसी सुरक्षा के खराब ना होना । हमारे देश में भी जब से आलू आया है तब से नई-नई डिश हमारे खाने में जुड़ गई है । जैसे बटाटा भात, आलू की कचोरी व समोसे । समोसे तो बिना आलू के बन ही नहीं सकते । आलू का आटा भी बनाया जाता है । इससे रूसी शराब वोदका बनाई जाती है । छोटे कंद पालतू जानवरों को खिलाए जाते हैं । इससे स्टार्च, अल्कोहल, लेक्टिक अम्ल बनाया जाता है । आलू का उपयोग प्रयोगशालाआें में भी होता है । बिना आलू के जीव विज्ञान की प्रयोगशाला पूरी नहीं होती । परासरण क्रिया का प्रदर्शन करने के लिए आलू को काटकर उससे पोटेटो ऑस्मोस्कोप बनाया जाता है । विज्ञान की पुरानी शाखा मार्फोलॉजी से लेकर बायोटेक्नोलाजी तक आलू का प्रयोग होता है । सूक्ष्मजीवियों अथवा कोशिकाआें को कृत्रिम पोषक माध्यम में उगाने के लिए इससे पी.डी.ए. माध्यम बनाया जाता है जिस पर सूक्ष्मजीवियों को कांच के बर्तनों में उगाया जाता है । निश्चित रूप से वह आलू ही था जिसने जर्मनी को दो विश्वयुद्धों के दौरान जीवित रखा । क्योंकि दुश्मन अन्य फसलों की तरह इसे जला या नष्ट नहीं कर पाते थे । हमारे देश में आलू की जो किस्में लोकप्रिय हैं उनमें कुफ्री अलंकार, कुफ्री ज्योति एवं कुफ्री शीतमान । ये शब्द कुफ्री शिमला के पास कुफ्री स्थित पोटेटो रिर्सच इन्टीट्यूट का है जहां आलू की नई-नई किस्में बनाई जाती हैं । ***

बुधवार, 21 मई, 2008

२ सामयिक

अब क्यों नहीं बौराता वसन्त ?

डॉ. सुनील कुमार अग्रवाल

यजुर्वेद (१३/२५) में चैत्र और वैशाख के दो माह को वसन्त बतलाया गया है । इन दोनों महीनों को क्रमश: मधुमास और माधववास भी कहा है - `मधुश्च माधवश्च वासन्तिकावृत ।' किन्तु सृष्टि की प्रकृति में वसंत अपनी निर्धारित तिथि से ४० दिन पूर्व ही आ जाता है तभी तो यह ऋृतुराज कहलाता है । धरा धाम पर वसन्तागमन चैत्र कृष्ण प्रथमा के स्थान पर माघ शुक्ल पंचमी को ही हो जाता है । जिसे वसन्त पंचमी कहा जाता है । इस दिन वाग्देवी सरस्वती का विधिवत पूजन होता है । यजुर्वेद (१३/२७-२९) में यह भी कहा गया है कि वसन्त ऋतु में मधुर वायु ऐसे प्रवाहित होती है जैसे जल की धारा रूप सलिलाएं कोमल कांत गति से धरती पर मचलती हुई समुद्र की ओर चलती है । औषधियाँ वनस्पतियाँ, दिन और रात, सूर्य एवं द्युलोक सभी सुखकारक होते हैं । कहने का भाव यह है कि वसन्त हमारी वैदिक परम्परा से जुड़ा हुआ उत्सव है जिसमें जीवन स्पंदन का उत्स है (उत् =ऊपर की ओर, सव = बहना) वसन्त केवल एक बदली हुई ऋतु का नाम नहीं है । वह कंपकंपाती सर्दी के बाद केवल गुनगुनी धूप का ही मौसम नहीं है वरन् पल्लव हीन पेड़ों पर कोमल पत्तियों का, खिलते-मुस्कराते और अंगड़ाई भरते फूलों का, आम के पेड़ों पर बौरों के लगने का, मदमाती मस्त हवाआें के बहने का और कोयल के कूकने का मौसम है । जाड़े की जड़ता भरी ठिठुरन के खात्मे के बाद प्रकृति स्वयं सजती-सवरती है । इसीलिए तो अपनी यांत्रिक जिन्दगी जीते हुए भी हम वसन्त का स्वागत उत्सुकता से करना चाहते हैं । वसन्त की महत्ता को प्रतिपादित करते हुए भगवान श्री कृष्ण ने गीता में स्वयं कहा है - ``मासानां मार्ग शीर्षो%स्मि ऋृतूनां कुसुमाकर:'' (गीता १०/३५) अर्थात ऋृतुआें में मैं श्रेष्ठ कुसुमाकर अर्थात् वसन्त हँू । ऋृतवद्ध रूपमती षडऋतु दर्शना प्रकृति में पर्वोत्सव परम्पराएं है हमारे सभी क्रियाकलाप ऋृतुचक्र पर आधारित हैं । यूं तो सभी ऋतुआें का अपना विशिष्ट एवं चिरंतन महत्व है किन्तु वसन्त ऋृतु के आते ही पेड़-पौधे सुवासित फूलों से लद जाते हैं, सरोवर कमल दलों से सज जाते हैं । रमणियाँ प्रेम में पग जाती हैं, वायु सुगन्धित हो जाती है । संध्या काल सुहाता और लुभाता है । प्रकृति का जर्रा-जर्रा सुन्दरता से भर जाता है । महाकवि कालिदास ने लिखा है - ``दु्रमा: सपुष्पा: सलिलं सपदमंस्त्रिय: सकामा: पवन: सुगन्धि: । सुखा: प्रदोषा दिवसाश्च रम्या: सर्व प्रिये चारूतरं वसन्ते ।।''(ऋतुसंहार ६/२) महाकवि ने प्रकृति के प्रति अपने अनुराग तथा ऋृतु फाग को व्यक्त करते हुए लिखा है कि प्रदीप्त् अग्नि के समान वर्ण वाली, वायु द्वारा हिलाये जाते हुए, किंशुक फूलों से लदे हुए पेड़ों से सजी धरती ऐसे लगती है जैसे लाल चुनरिया ओढ़ें हुए कोई नई नवेली दुल्हन हो - `आदीप्त्वहि्वसहशैर्मरूतावधूतै: सर्वत्र किंशुकवनै: कुसुमावनम्रै: । सद्यो वसन्तसमये हि समाचितेयं रक्तांशुका नवधूरिव भाति भूमि ।।'' (ऋतुसंहार ६/१९) वसन्त ने सदैव मेरे भी अर्न्तमन को आह्लादित किया है । अपने द्वितीय प्रकाशित काव्य संकलन `वृक्षमित्र' (रूचिका कृति प्रकाशन, कोलकाता) में मैंने भी आत्मानुभूति तथा प्रकृति प्रणय के भाव को सहजता से व्यक्त करने का प्रयास किया है -
यौवन वसन्त के आते ही दुल्हन सी सजती हरियाली। बँधती प्रगाढ़ आलिंगन में कौमार्य लुटाती हर डाली ।
विविध रूप-रस-गंध पुष्प सजते उपवन सोपान भंवरे कीट पतंगे खिंच करते मधुरस पान ।
पहुँचाते पराग वर्तिकाग्र पर तब ही करते विश्राम । प्रकृति की नैसर्गिक यह परागण क्रिया महान ।
नर पराग नलिका करती मादा अण्डाशय का भंजन। होता तब नर मादा युग्मक का मधुर मिलन ।
कहलाती यह क्रिया निषेचन फल बंदित आवरण मंडित बीजो का होता सृजन ।
ऐसा है सृजनशील हमारा पर्यावरण । किन्तु अब तो चारों तरफ से प्रकृति एवं पर्यावरण पर खतरा मंडरा रहा है । ग्लोबल कल्चर डेवलप हुआ है तो वसन्त की परवाह भी किसे है । मौसम के नैसर्गिक परिवर्तन की सराहना करने वाले दुर्लभ होते जा रहे है क्योंकि हम स्वयं को ही प्रकृति से दूर पा रहे हैं किन्तु पर्यावरण के लिए अत्यधिक घातक है हमारा प्रकृति विमोह । जिस बनावटी संस्कृति में हम जी रहे हैं उसमें मौसम की मिजाजपुर्सी करने का वक्त कहाँ ? क्योंकि प्रकृति पर अपनी निर्भरता को हम पहले जैसा नहीं पा रहे हैं । हम अप्राकृतिक होते जा रहे हैं। वातानुकूलित घर, और ऑफिस हमें फूलों और उनकी खुशबुआें से दूर किये रहते हैं । हम तो धनांधता में ही मदहोश रहते हैं । हमारे पास गरमी सर्दी और बरसात का सुखद एहसास फटकने भी नहीं पाता है । किन्तु यह कथाकथित सुविधा भोगी सम्पन्नत भी तो सबको समान रूप से सुलभ नहीं है । क्या है इस भोगवाद का सच ? यह विचारणीय प्रश्न है । दरअसल इसी बढ़ते भोगवाद की भावना हमको प्रकृति से दूर करती हैं ,हमें वसंत के उल्लास से महरूम करती हैं । वसन्त आता है और चला जाता है किन्तु हम उसका कदाचित अनुभव भी नहीं कर पाते हैं । गरीब तो गरीब है ही किन्तु गर हम मालदार भी हैं तो सुरम्यता से वंचित हम भी गरीब रह जाते हैं । हम बनावटी जिन्दगी जीते हैं इसीलिए गरमी के बाद सर्दी और सर्दी के बाद गर्मी के सुखद एहसास से वंचित है । मौसम की हमें परवाह नहीं है इसलिए अब मौसम भी हमें नहीं हुलसाता है और बिना बौराये ही वसन्त बीत जाता है । माना तो यह जाता है कि वसन्त ऋतु वाह्यांतर रूप से हमको तेजस्वी बनाती है । अग्नि को प्रदीप्त् करती है और ओज को बढ़ाती है । ऋतु का प्रभाव वनस्पतियों एवं जीव-जन्तुआें पर भी पड़ता है । जीवन में नव-उमंग और उल्लास बढ़ता है । अपने खेतों में लहलहाती फसल देखकर हम आनंदित होते हैं और राग रंग फाग की मस्ती में डूब कर वसन्तोत्सव मनाते हैं । किन्तु अब वसन्त भी पहले की तरह खुशियाँ मनाने का अवसर नहीं रहा । किसान आत्महत्या कर रहे हैं । अन्नदाता ही भूखे मर रहे हैं । कृषि अब घाटे का सौदा हो गया है । आदमी उपभोक्तावाद में खो गया है । कोई भी शख्स अब प्रकृति के पास नहीं जाता है । कोई भी अन्तर्गत से मदनोत्सव नहीं मनाता है । एक निरंकुश तनाव में जी रहा है आदमी। जाहिर है अभाव और तनाव में उत्सव धर्मी नहीं रहा जा सकता है किन्तु वसन्त में इतना इतना उल्लास भरा होता है कि वह छिपाये भी नहीं छिप पाता है, प्रकट हो ही जाता है किन्तु फिर भी आई किंचित भी कमी को रेखांकित करना हमारा धर्म है । क्या हमने यह जानने की कोशिश की कि अब क्यों नहीं बौराता वसन्त ? अब क्यों नहीं सुरभित बयार बहती है । चिड़ियाँ चहचहा कर हमसे कुछ क्यों नहीं कहती है । अब खेत-खलिहानों एवं बाग-बगानों के बीच पगडंडियों से गुजरते हुए फूलों की सुगंध का वह सुखद एहसास क्यों नहीं होता है जो पहले होता था । दरअसल परिवेशगत प्रदूषण ने अपनी कुत्साआें के इतने अधिक अवरोध खड़े किये है कि सुगंध को दुर्गन्ध ने कैद कर लिया है । औद्योगिक इकाइयों से निकलता हुआ दुर्गन्ध युक्त वाहित जल और धुआँ उगलति चिमनिया हमारे वातावरण को गंदा करती है । हमने स्वयं अपनी जिन्दगी को नर्क बना डाला है । प्रदूषण से समस्त जीवोें का जीवन प्रभावित हो रहा है । तथा जीवनकाल भी क्षर रहा है । फूलों मंे वह गंध नहीं, मकरंद नहीं स्वाद नही तथा पोषण भी नही है । क्यों कि हमने प्राकृतिक निधि को समाप्त् कर डाला है । प्रकृति बड़ी ही भावनात्मक एंव संवेदनशील होती है । आधुनिक शोधों से ज्ञात हुआ है कि अब फूलों की खुशबु दूर तलक नहीं जाती है । वर्जीनिया विश्वविद्यालय के शोध के अनुसार जिन फूलों की गंध १००० मीटर से १२०० मीटर तक जाती थी, अब वह केवल २०० से ३०० मीटर दूर तक ही विस्तारित हो पाती है । गंध की तीव्रता भी घटी है। जिससे भंवरे कीट आदि आकर्षित होकर उन तक नही पहुँचने जिससे परागण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है । फूल फल ही नही अनाजों की पैदावार भी अप्रत्याशित रुप से घटी है । कीटनाशको ने न केवल गंध चुराई है वरन लाभ दायक कीटों के जीवन से भी खिलवाड़ किया है । इसीलिए तो वसन्त नहीं बौराता है । मौसम भी स्वयं को असहाय पाता है । प्रकृति क्या थी और हमने क्या से क्या कर डाला है? अब भी वक्त है कि हम संभल जायें ताकि वसन्त बौराये और हम भी मीठे फल बोयें, जिससे समाज के सभी व्यक्तियों को प्रकृति के उपहार का आनंद मिल सके ।***

मंगलवार, 15 अप्रैल, 2008

१ सामयिक

रोजगार गांरटी कानून और पर्यावरण
सुश्री सुनीता नारायण
राष्ट्रीय रोजगार गारंटी कानून १ अप्रैल ०८ से पूरे देश में लागू हो गया है इसे लागू किए जाने के साथ ही इसके अंतर्गत होने वाले कार्योंा की उपयोगिता का मूल्यांकन भी जरूरी है । महाराष्ट्र जो कि इस नई रोजगार योजना का आधार रहा है, के दर्शन का समावेश भी कार्ययोजना मेे होना चाहिए । साथ ही चुनी हुई पंचायती राज संस्थाआें की भूमिका में भी स्पष्टता होनी चाहिए । अस्सी के दशक के मध्य पर्यावरणविद अनिल अग्रवाल जब महाराष्ट्र की रोजगार ग्यारंटी योजना के सूत्रधार की खोज में निकले तो मैं भी उनके साथ हो ली । इस खोज में हमने स्वयं को सचिवालय में फाइलों से अटे धूलभरे दफ्तर में पाया । वहां हमारी मुलाकात वी.एस.पागे से हुई, वे छोटी कद-काठी के बहुत ही मृदुभाषी इंसान थे । उन्होंने हमें बताया कि सन् १९७२ में जब राज्य में भीषण सूखा पड़ा था और लोग पलायन पर मजबूर थे तब यहां एक ऐसी कार्ययोजना तैयार की गई जिसकी मूल भावना थी ग्रामीण इलाकों मेंे रोजगार पैदाकर भुगतान के लिए बड़े शहरों के व्यवसाइयों पर दायित्व डालना । ये रोजगार कानूनन ग्यारंटी से युक्त थे । यह पहल गरीबी को हटाने के ध्येय को लेकर निर्मित रोजगार अधिकार सम्पन्नता की और पहला कदम थी । चूंकि काम स्थानीय स्तर पर ही उपलब्ध था अत: लोगों को रोजगार की तलाश में शहरों की ओर नहीं भागना पड़ा । संकट के ऐसे दौर मेंरोजगार निर्माण की इस पहल से तो अनिल न केवल उत्साहित थे ही बल्कि एक और बड़ा पर्यावरण पुननिर्माण का लाभ वे इसमें देख पा रहे थे । इसी दौरान हम अण्णा हजारे से मिलने रालेगांव सिद्धि गए थे । वहां उनके निर्देशन मेंे पहाड़ियों की परिधियों में पानी रोकने और जमीनी जल पुर्नभरण के उद्देश्य से छोटी खाईयां निर्मित की जा रही थीं । वहां हमें प्याज की भरपूर पैदावार देखने को मिली इसकी वजह थी सिंचाई की बढ़ी हुई मात्रा । पागे साहब भी अनिल के इसमें निहित पर्यावरण लाभ के विचार से सहमत तो थे किंतु उन्होंने बताया कि चूंकि योजना संकट के दौर का सामना करने के लिए बनाई गई थी, अत: जिला प्रशासन ने ज्यादातर मामलों मेें पत्थर तोड़ने, सड़कें बनाने और सार्वजनिक निर्माण के कार्य करवाकर अपना कर्तव्य पूरा कर लिया । अगले कुछ वर्षोंा में इस श्रमधन का उपयोग प्राकृतिक आस्तियो के निर्माण में किए जाने के विचार ने महाराष्ट्र में जोर पकड़ा, अब मिट्टी और पानी को बचाने की ओर ध्यान केन्द्रित हुआ । इस दिशा में चेक डेम निर्माण खेतों में मिट्टी उपचार, पहाड़ियों में खाई रचना और पौधारोपण के कार्य होने लगे । महाराष्ट्र रोजगार योजना की तर्ज पर बनाए गए केन्द्रीय रोजगार कार्यक्रम ने भी अनुसरण करते हुए कुछ मामलों में पर्यावरण पुननिर्माण की गरज से एक न्यूनतम प्रतिशत पौधारोपण पर ही खर्च करने की व्यवस्था अनिवार्य कर दी । इसी दौर में देश ने जीवित वाले सार्थक पौधारोपण या ऐसे तालाब निर्मित करने का कौशल भी सीखा जो हर बारिश में गाद से न भर जाएं । प्रशासक एन.सी. सक्सेना ने आकलन किया कि रोपा गया हर पौधा अगर जीवित रह पाए तो हर गांव मेें इतने पेड़ होंगे कि प्रत्येक गांव के नजदीक एक अच्छा खासा जंगल होगा, जो कि अब तक वास्तव में सिर्फ कागजों तक ही सीमित था । अनिल ने बाद में लिखा भी था कि ये सब किस तरह अनुत्पादक रोजगार निर्माण में सिद्धहस्त हो चुके हैं, जिसके अंतर्गत हर वर्ष सिर्फ पौधरोपण जो कि प्रतिवर्ष रोपों के पशुआें द्वारा खा लिए जाने या मर जाने के कारण उन्हीं गढ्ढों को बार-बार खुदवाए जाने से शाश्वत होता जा रहा था । इस प्रशासकीय खेल ने ग्रामवासियों को नई चेतना दी और उन्होंने नाजुक प्रकृति की सुरक्षा का जिम्मा खुद उठाने का प्रण लिया । स्थानीय लोगो की राय ली जाने लगी । इसके फलस्वरूप उन्हें इसके सीधे फायदे भी मिलने लगे । चरनोई पेेड़-पौधे, जल स्त्रोत आदि पुनर्जीवित हुए । प्रशासकीय अमला वन-विभाग, कृषि विभाग सिंचाई विभाग गांवों के लिए जो योजनाएं बनाता था वे उतनी उपयोगी नहीं होती थीं । यह वह दौर था जब विकास के लिए प्रयोगधर्मिता की शुरूआत हुई । मध्यप्रदेश में गांवों में वाटर शेड्स बनाने के लिए मात्र एक एजेंसी को माध्यम बनाने का प्रयोग हुआ । इस दौर के ही अध्ययनों से खुलासा हुआ कि भूमि और जल स्त्रोत के बेहतर उपयोग के द्वारा गांवों में आर्थिक उन्नति के द्वार खुल सकते है । लेकिन मैं आज इन बातो को फिर क्यों याद कर रही हूँ ? सीधी सी बात है । राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी भी इसी भवन में तैयार की गई है और इसमें पिछली योजनाआें की अपेक्षा बेहतर प्रावधान किए गए हैं जैसे प्राकृतिक आस्तियों के निर्माण (मिट्टी और जल के बचाव) पर खर्च के महत्व को प्रतिपादित किया जाना और इस हेतु ग्रामीण स्तर पर योजना बनाने को अनिवार्य किया जाना एवं चुनी हुई पंचायतों को लोक निर्माण कार्योंा के लिए शासकीय विभागों से वरीयता देते हुए उत्तरदायी बनाना । लेकिन योजना प्रारंभ होने के बाद भी एक सवाल मुंह बाए खड़ा है । क्या इससे स्थितियों में वास्तव में कोई परिवर्तन हुआ है ? तपती गर्मी के मौसम में राजस्थान प्रवास के दौरान मैंने महिलाआें के एक झुण्ड को ग्रामीण सौ दिनी योजना (स्थानीय लोग इसे यही कहते है) के अंतर्गत कार्य पर लगे पाया । वे तपते सूरज के नीचे तालाब की खुदाई कर रहीं थीं । देखरेख कर रहे इंजीनियर ने बताया कि पंचायत की सलाह पर तालाब मेें जमा मिट्टी को हटाकर दिवारों का निर्माण किया जाना है । हर महिला एक चौकोर गढ्ढा खोद रही थी । कारण पूछने पर सुपरवाईजर ने बताया कि इसी तरह से खुदाई के निर्देश मिले है । इसके पीछे कारण है एक वैज्ञानिक अध्ययन, जिसके मुताबिक एक व्यक्ति एक दिन में कितने क्यूबिक मीटर खोदता है इसका अंदाजा हो जाता हैै । उन महिलाआें को चौकोर गढ्ढे का लक्ष्य दे दिया जाता है और काम और मजदूरी का हिसाब उसी के द्वारा लगाया जाता है । मौके पर मौजूद मजदूर महिलाआें का कहना था कि इस कवायद का मकसद सिर्फ यह है कि हमें सप्तह या पंद्रह दिनों की अपनी मजदूरी का अंदाजा न लग पाए क्योंकि कार्य का आकलन व्यक्ति के रूप से किया जाएगा। मैंने महसूस किया कि दिल्ली में बैठे आका अकर्मण्यता और भ्रष्टाचार से निपटने के चक्कर में व्यावहारिकता को भूल जाते हैं । किसी के पास इस सवाल की जवाब नही था कि इन चौकोर गढ्ढों से क्या तालाब बन पाएगा ? किसी को इस बात की फिक्र नहीं थी कि तालाब तक पानी लाने वाली नहरों की गाद निकाली भी गई है या नहीं । या कि इस सौ दिनी योजना में काम पूरा हो भी पाएगा या नहीं । इसी दौरान मैंने सुंदरवन शेर अभ्यारण्य के नजदीक स्थित एक गांव में देखा कि रा.ग्रा.रो.गा. योजना के अंतर्गत खोदी जा रही एक नहर के ग्रामीण अर्थव्यवस्था का किस तरह प्रभावित किया है । स्थानीय मछुआरों को अब मछली पकड़ने के लिए अवैध तरीकों पर निर्भर नही रहना पड़ रहा था । इसकी वजह से अब कृषक भी एक अतिरिक्त फसल ले पा रहे थे । योजना की इस उपादेयत से उत्साहित हेाकर मैंने पूछा कि क्या इसकी रूपरेखा पंचायत ने बनाई थी ? जवाब नकारात्मक था । स्थानीय निवासियों का कहना था कि अगर पंचायत के द्वारा काम हो रहा होता ता हमें भुगतान मिलने में कठिनाई होती क्योंकि पंचायतों के लिए भुगतान को जिला अधिकारियों द्वारा स्वीकृत करवाया जाना आवश्यक है । जिसके लिए अधिकारी कार्य पूर्णता का विस्तृत सबूत चाहते हैं । यह कार्यवाही इतनी जटिल है कि या तो भुगतान प्राप्त् ही नहीं होता या होता भी तो बहुत कम । इस कार्य को वन विभाग के माध्यम से सम्पन्न करवाया जा रहा है जिसके पास योजना बनाने और उसे सम्पन्न कराने के अधिकार हैं । राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना की मूल भावना में कोई कमी नहीं है । लेकिन कार्य सम्पादन के स्तर पर इसमें कमी है । इसे अतिशीघ्र ठीक किए जाने की आवश्यकता है । पर्यावरणीय पुनर्चक्रीकरण के देवता भी यही चाहते हैं कि विस्तृत कार्ययोजना बने । ***

सोमवार, 11 फ़रवरी, 2008

२ सामयिक

नदियों की जिंदगी का सवाल
प्रमोद भार्गव
जीवनदायनी नदियां हमारी सांस्कृतिक धरोहर हैं। नदियों के किनारे ही सभी आधुनिकतम सभ्यताएं विकसित हुई हैं । जिन पर हम गर्व कर सकते हैं । सिंधु घाटी और सारस्वत (सरस्वती) सभ्यताएं इसके उदाहरण हैं । भारत के सांस्कृतिक उन्नयन के नायकोंमें भागीरथ, राम और कृष्ण का नदियों से गहरा संबंध रहा है । भारतीय वांगमय में इन्द्र विपुल जल राशि के प्राचीनतम वैज्ञानिक प्रबंधक रहे हैं । भारत भू-खंड में आग, हवा और पानी को सर्वसुलभ नियामत माना गया है। हवा और पानी की शुद्धता व सहज उपलब्धता नदियों से है । आज नदियों के जल बंटवारे को लेकर राज्यों में परस्पर विवाद हैं । दूसरे औद्योगिक कचरे शहरी मल-मूत्र बहा देने का क्रम जारी रहने से नदियां प्रदूषित होकर अपना अस्तित्व ही खो रही हैं । ऐसे में केन्द्रीय जलसंसाधन मंत्री सैफुद्दीन सोज का यह सुझाव कि देश की प्रमुख नदियों को राष्ट्रीय नदियां और राष्ट्रीय संपत्ति घोषित कर भारत सरकार अपने अधिकार में ले, स्वागत योग्य है । यह जलसंकट के भयावह दौर से गुजर रहे राष्ट्र को जल समस्या से किसी हद तक निजात दिलाने का ठोस उपाय बन सकता है । जरुरत है हठधर्मिता छोड़ सम्यक, समन्वयवादी रवैया अपनाने और सर्वागीण विकासोन्मुखी दृष्टिकोण प्रचलन में लाने की । होने को तो दुनिया के महासागरों, हिमखंडो, नदियों और बड़े जलाशयों में अकूत जल भंडार हैं । लकिन मानव के लिए उपयोगी जीवनदायी जल और बढ़ती आबादी के बीच जल की उपलब्धता का बिगड़ता अनुपात चिंता का बड़ा कारण बना हुआ है । ऐसे मेें बढ़ते तापमान के कारण हिमखंडो के पिघलने और अवर्षा के चलते जल स्त्रोतों के सूखने का सिलसिला जारी है । वर्तमान में जल की खपत कृषि, उद्योग, विद्युत और पेयजल के रुप में सर्वधिक हो रही है । हालांकि पेयजल की खपत मात्र आठ फीसदी है । जिसका मुख्य स्त्रोत नदियां और भू-जल हैं । औद्योगिकीकरण, शहरीकरण और बढ़ती आबादी के दबाव के चलते एक ओर तो नदियां सिकुड़ रही हैं दूसरी ओर औद्योगिक कचरा और मल मूत्र बहाने का सिलसिला जारी रहने से गंगा और यमुना जैसी नदियां इतनी प्रदूषित हो गई हैं कि एक पर्यावरण संस्था ने यमुना को मरी हुई नदी तक घोषित कर दिया । मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित प्रख्यात जलविद् राजेन्द्र सिंह ने यमुना के किनारे राष्ट्रमंडल खेलों और मेट्रो को इस जीवनदायी नदी की मौत बताते हुए इन प्रस्तावों के विरुद्ध संघर्ष ही छेड़ा हुआ है । यह सही भी है यदि यमुना के जल-भरण वाले चार से पांच किलोमीटर चौड़े तटांे पर स्थायी सीमेंट-कांक्रीट के जंगल खड़े किए जाते हैं तो नदी की जल संग्रहण क्षमता निर्विवाद रुप से प्रभावित होगी । अक्षरधाम मंदिर का विशाल परिसर इस नदी के तट पर पहले ही खड़ा किया जा चुका है । राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में ४० प्रतिशत जल की आपूर्ति यमुना से ही होती है । गंगा, यमुना वाले पूरे दोआब क्षेत्र में जल का विशालतम भंडार है जो इंद्रप्रस्थ (दिल्ली) के भू-जल से अंत: सलिला के रुप में जु़़डा है । भू-जल के इन भंडारों का विस्तार हस्तिनापुर तक है। यमुना के जिन तटों पर खेल परिसर, पंचतारा होटल और सड़कों के निर्माण प्रस्तावित हैं, यदि वे आकार लेते हैं तो निश्चित ही उपरोक्त जल भंडारों में प्राकृतिक तौर से जारी जल पुनर्भरण की प्रक्रिया बाधित होगी । केन्द्रीय बोर्ड भी कहता है कि खुले मैदानों में जल पुर्नभरण की गतिविधियां तेजी से चलती हैं । एक तरफ तो दिल्ली सरकार हस्तिनापुर के भू-जल भंडारों से दिल्ली की प्यास बुझाने की कोशिश में लगी है । वहीं दूसरी तरफ यमुना के विशाल तटों को सीमेंट-कांक्रीट से पाटकर हस्तिनापुर के भूजल भंडारो के पुर्नभरण में अवरोध करने के प्रस्ताव ला रही है । वर्तमान हालातोंमें वैसे भी यमुना बाईस किलोमीटर लंबे नाले में तब्दील हो चुकी है । इसे प्रदूषण मुक्त बनाए रखने के लिए दो हजार करोड़ रुपए खर्च किए जा चुके हैं, लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात ही रहा बल्कि इसके उलट प्रदूषण दो गुना तक बढ़ गया है । नदियों में प्रतिदिन औद्योगिक अवशेष और मानव उत्सर्जन के रुप में तीन सौ करोड़ लीटर गंदा पानी छोड़ा जा रहा है । ८० प्रतिशत गंदा पानी शहरों से निकलता है । नदियों की प्रदूषण ग्रहण करने की स्वाभाविक क्षमता सेे यह गंदा पानी कई गुना अधिक है । इसलिए नदियों का जल मनुष्य और जलीय जीवों के लिए रोगजन्य साबित हो रहा है । हाल ही में चंबल नदी में ३१ घड़ियाल मरे पाए गए। वन विशेषज्ञों ने दावा किया है कि ये घड़ियाल चंबल का पानी जहरीला हो जाने के कारण लीवर सिरोसिस की बीमारी से मरे । अब तक यह बीमारी मनुष्यों में ही रेखांकित की गई थी । शायद ऐसे ही हालातों के संदर्भ में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को अंतत: यह कहना पड़ रहा है कि नदियों कि प्रदूषित होने के कारण सकल घरेलू उत्पाद में चार प्रतिशत का घाटा उठाना पड़ रहा है । केन्द्रीय भू-जल बोर्ड ने राष्ट्र के लगभग ८०० ऐसे भू-खंड को चिन्हित किया है, जिनमें भू-जल का स्तर निरंतर घट रहा है । ये भू-खंड दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, मध्यप्रदेश, बिहार, गुजरात और तमिलनाडु में हैं । यदि भू-जल स्तर के गिरावट में निरंतरता बनी रहती है तो भविष्य में भयावह जल संकट तो पैदा होगा ही भारत का पारिस्थितिकी तंत्र भी गड़बड़ा जाएगा । केन्द्र सरकार ने ४३ भू-खंडो से जल निकासी पर प्रतिबंध लगा दिया है। भू-जल संवर्धन की दृष्टि से यह एक कारगर पहल है । केन्द्रीय जल संसाधन मंत्री ने फिलहाल १२ नदियों को राष्ट्रीय संपत्ति घोषित करने का सुझाव दिया है । १३५०० किलोमीटर लंबी ये नदियां भारत के संपूर्ण मैदानी क्षेत्रों में अठखेलियां करती हुई मनुष्य और जीव-जगत के लिए प्रकृति का अनूठा और बहुमूल्य वरदान बनी हुई हैं । २५२८ लाख हेक्टेयर भू-खंड़ों और वन प्रांतरों में प्रवाहित इन नदियों में प्रति व्यक्ति ६९० घनमीटर जल है । कृषि योग्य कुल १४११ लाख हेक्टेयर भूमि में से ५४६ लाख हेक्टेयर भूमि इन्हीं नदियों की बदौलत प्रतिवर्ष सिंचित की जाकर फसलों को लहलहाती है । वैसे `पानी' हमारे संविधान में राज्यों के क्षेत्राधिकार में आता है । परंतु जो नदियों एक से अधिक राज्यों में बहती हैं उन्हें संपत्ति घोषित किए जाने में राज्यों को आपत्ति नहीं होनी चाहिए । हालांकि कावेरी जल विवाद पिछले १७ साल से उलझन में है । चंबल सिंचाई हेतु जल को लेकर भी राजस्थान और मध्यप्रदेश में हर साल विवाद छिड़ता है । वहीं महानदी और ब्रह्मपुत्र अंतर्राष्ट्रीय विवाद का कारण भी बनती हैं । इन विवादों का राष्ट्रीय स्तर पर निपटारा गंगा, यमुना, कृष्णा, कावेरी, नर्मदा, चंबल, सिंधु, महानदी, ब्रह्मपुत्र, ताप्ती, दामोदर, सतलज, झेलम और साबरमती नदियों को राष्ट्रीय संपत्ति घोषित कर किया जा सकता है । दरअसल हमारे देश में बड़ी और राष्ट्रीय मुश्किल यह है कि सरकारी क्षेत्र में जल, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी समस्याएं न तो राष्ट्रीयता को बोध कराने वाली प्राथमिक सूची में है । ***

शनिवार, 12 जनवरी, 2008

२ सामयिक

जलाशयों की जीवंत विरासत
बिपिनचंद्र चतुर्वेदी
प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग, संरक्षण एवं विनाश के सन्दर्भ में हमें तीन प्रमुख वैश्विक प्रवृत्तियां नजर आती हैं । पहली, जो उपयोग से ज्यादा संरक्षण पर ध्यान देती है । दूसरी, जो प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग के साथ-साथ उनकी समािप्त् से पहले सचेत होकर संरक्षण के लिए जुट जाती है । तीसरी, जो उपयोग तो विनाशक स्तर तक करती है लेकिन संरक्षण बिल्कुल नहीं करती । आज के परिवेश में ज्यादातर लोग तीसरी प्रवृत्ति के पोषक नजर आते हैं, इसीलिए जनोपयोगी प्राकृतिक संसाधनों का धीरे-धीरे विलोप हो रहा है । यह बात जगजाहिर है कि भारत में प्राचीन तालाबों, जोहड़ों व कुण्डों की मौजूदा हालात बहुत ही दयनीय है एवं उचित संरक्षण के अभाव में यह और भी बिगड़ती जा रही है । विभिन्न क्षेत्रों के तालाबों व कुण्डों की जानकारी समेटने की महत्वूपर्ण कोशिश कई अलग-अलग लोगों ने की है । लेकिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जलाशयों की ऐतिहासिक विरासत को दस्तावेजों में समेटने का संगठित प्रयास मेरठ स्थित ``जनहित फाउंडेशन'' द्वारा किया गया है । इस शोध कार्य को अंजाम देने वाले हरिशंकर शर्मा के अनुसार उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती यह आई कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जलाशयों पर छोटी-बड़ी कोई भी पुस्तक उपलब्ध नहीं थी । वैसे नई दिल्ली स्थित सेन्टर फॉर साइंस एंड इनवायमेंट (सीएसई) ने सन् १९९७ में प्रकाशित ``डाइंग विजडम'' में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ प्रमुख तालाबों का वर्णन मिलता है । इसके बावजूद यह नवीनतम दस्तावेज इस क्षेत्र में तालाब व अन्य जल स्त्रोतों की जानकारी प्राप्त् करने का अच्छा माध्यम है । ``पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जलाशय: ऐतिहासिक विरासत'' नामक पुस्तक में उन्होंने तालाबों व कुण्डों की प्रमुख जानकारी जुटाने के साथ-साथ उनके ऐतिहासिक सरोकारों को प्राचीन धर्मग्रंथों से खोजने की जहमत भी उठाई है । मेरठ जिले का ``सूरज कुण्ड'' अत्यधिक महत्वपूर्ण तालाब था, जो अब पूर्ण रूप से सूख चुका है । एक मील क्षेत्र में फैले इस तालाब का अस्तित्व गंगनहर बनने के बाद तक तो कायम था । आबू नाला बनने के बाद शहर का गंदा पानी आने से इस तालाब की मौत हो गई । सन् १९८० ई. में बना ``श्री राम ताल'' ४० वर्ष पूर्व तक गंग नहर से भरे जाने तक तो जीवित था, लेकिन बाद में जब इसे नलकूपों से भरा जाने लगा तो यह तालाब सूख गया । मध्य काल में मेरठ से गढ़मुक्तेश्वर मार्ग पर किठौर कस्बे के चारों और ``किठौर के तालाब'' काफी प्रसिद्ध थे । अब सिर्फ उत्तर व दक्षिण के तालाब ही शेष बचे हैं और दक्षिण तालाब १२५ एकड़ से सिकुड़ कर सिर्फ ४० एकड़ में ही रह गया है । मोदीनगर के समीप ढिडाला गांव में करीब ४० बीघे में फैले ``प्राकृतिक झील'' के आस-पास जाड़े के मौसम में प्रवासी पक्षी भोजन के तलाश में आज भी यहां आते हैं । इस तरह मेरठ जिले में ही पिल