आरक्षण एक दुधारी तलवार
कमलेश कुमार दीवान
स्वतंत्रता प्रािप्त् के पश्चात भारतीय संविधान में अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए एक सीमा में निश्चित अवधि हेतु आरक्षण की व्यवस्था
की गई थी । जाहिर है मंशा यही रही होगी कि एक अवधि के बाद मूल्यांकन कर निश्चित किया जा सकता था कि इसे आगे बढ़ाने की आवश्यकता है या नहीं। सन् १९५५ में काका कालेलकर समिति द्वारा नौकरी के साथ-साथ तकनीकी और पेशागत पढ़ाई में २३९९ पिछड़ी जातियों को सत्तर प्रतिशत आरक्षण देने की अनुशंसाा कर दी गई । सन् १९९१ में मंडल आयोग ने पिछड़ों के लिए केन्द्र सरकार की नौकरियों में २७ प्रतिशत आरक्षण देने का निर्णय लिया तब शैक्षणिक संस्थाआें में सरकार के प्रावधान लागू नहीं हो पाए थे आज उन संवैधानिक प्रावधानों को लागू करने हेतु पुख्ता इंतजाम किए जा रहे हैं, किंतु प्रावधानों से हुए लाभों का मूल्यांकन करने हेतु शायद ही कोई आयोग बनाए जाने की बात करता हो । जिन मौलिक संवैधानिक प्रावधानों का संपूर्ण फायदा अनुसूचित जाति और जनजातिय वर्ग को दिया जाना था उसमें सभी पिछड़ी जातियों को शामिल कर आरक्षण नीतियों को मूल्यांकन और उनके विकास की जवाबदेही से मुक्त कर दिया है। केन्द्र सरकार द्वारा सभी सरकारी, गैर सरकारी और निजी क्षेत्रों में आरक्षण के प्रावधान हेतु पुन: दबाव बनाया जा रहा है। शैक्षिक एवं तकनीकी संस्थानों में आरक्षण प्रदाय करने हेतु सरकारी निर्णय की सुप्रीम कोर्ट ने पुष्टि करते हुए क्रीमीलेयर को पृथक रखने का निर्णय दिया । जिसका देश भर में स्वागत हुआ परंतु विरोध के स्वर भी उभरे । अब यह तैयारी हो रही है कि मलाईदार परत का स्वाद दे रहे लोगों को भी इन संवैधानिक प्रावधानों का फायदा देने हेतु संशोधन लाया जाए । आरक्षण संवैधानिक प्रावधानों से प्राप्त् हो रहा व्यक्तिगत लाभ है और इस लाभ को एक व्यक्ति को कितनी बार दिया जावे यह सुनिश्चित करना कठिन है । आरक्षण से कहीं अधिक इसे लागू करने के तौर तरीके विवादास्पद हैं जिसमें पढ़ाई, नौकरी, पदोन्नति आदि सभी क्षेत्रों में एक ही व्यक्ति को लाभ मिलते रहने वाला है। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाए कि यह लाभ किस स्तर तक दिया जाना है । सवाल यह है कि समाज को आरक्षण से क्या प्राप्त् हो रहा है ? कोई कहता है कि आरक्षित वर्गो का चहुॅमुखी विकास हो रहा है ? किसी से यह सुनना पड़ता है कि इस व्यवस्था से हमारे संवैधानिक अधिकारों को नुकसान पहंुचाया है । एक वर्ग का यह भी मानना है कि आरक्षण के प्रावधानों से लाभ लेने की मंशा रखने वाला समाज अपने लिए एक नया हाशिया बनवाना चाहता है जिससे उसकी धन और शक्ति हासिल करने की आकांक्षाएं पूर्ण हो सकें । तर्क से तो भारतीय समाज के समूचे ताने-बाने को पिछड़ा ठहराया जा सकता है । कोई दूर दराज गांवों में निवास के कारण पिछड़ रहा है, कोई पुश्तैनी काम धंधों के कारण पीछे रह गया है, कोई आय के संसाधनों का विकास नहीं हो पाने के कारण असुरक्षित रह गया । एक वर्ग यह भी मानता है कि हम गलत तरीकों से लोगों को विकसित करने की कोशिश कर रहे हैं । दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश का मानव संसाधन विकास मंत्रालय राज्यों के साथ मिलकर पाठ्यक्रमों की असमानताआें को दूर कर उच्च् शिक्षा संस्थानों में प्रवेश पाने की योग्यताआें का विकास करने में असफल रहा है । ज्ञातव्य है कि सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले के तहत शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण को अनुचित करार देने के बाद सरकार को संविधान में १०४वां संशोधन लाना पड़ा था जिससे इस मुहिम को आगे बढ़ाने के रास्ते मिले थे । केन्द्रीय सेवाआें में पिछड़ों की स्थिति के बारे में यह बताया जाता है कि आई.ए.एस. और आई.पी.एस. में ७.०२ प्रतिशत और भारतीय विदेश सेवा में ७.७४ प्रतिशत हिस्सा हैं किंतु राज्यों की प्रशासनिक सेवाआें को मिलाकर यदि आकलन किया जाए तब यह कहीं अधिक होगा । दलित आदिवासियों जिनके लिए आरक्षण के प्रावधान पहले से लागू हैं उनका प्रतिशत कम ही रहा है । कमजोरी कहां है यह तलाशना चाहिए । शैक्षणिक उन्नति हेतु देश के आर्थिक संस्थाआें द्वारा इन वर्गो के लिए काफी धन खर्च किया जा रहा है । लेकिन उनकी प्रगति की रफ्तार धीमी क्यों है ? ऐसा शायद इसलिए है कि व्यय के अनुपात में प्रगति के मूल्यांकन हेतु कोई संवैधानिक प्रावधान नहीं किए गए हैं । यदि शैक्षणिक ढांचों को जवाबदेह बनाया जाता तब सुखद परिणाम सामने आते । आज जब हम आरक्षण के पक्ष में तर्क देते हैं जब यह जरूर बताते हैं कि केन्द्रीय सेवाआें में पिछड़ों की स्थिति दयनीय हैं । आई.ए.एस. और आई.पी.एस. में और भारतीय विदेश सेवा में कुछ प्रतिशत ही स्थान है । आश्चर्य तब होता है कि जब हम पिछड़ेपन का पैमाना केवल सरकारी नौकरियों को मानते हैं । शिक्षा के क्षेत्र में शहरों से कस्बे और कस्बों से गांव पिछड़े हैं । क्या उसकी दशा ठीक करने और दिशाएं सही रखने के उपक्रम किए जा रहे हैं ? निश्चित ही नहीं । यदि ऐसा होता तब पाठ्यक्रमोंमें बहुआयामी असमानताएं नहीं होती । एक सवाल यह भी है कि क्या आई.आई.टी., आई.आई.एम. जैसे उच्च् प्रौद्योगिकी एवं व्यावसायिक पढ़ाई वाले संस्थाआें में पिछड़ों के आरक्षण से उन जातियों का पिछड़ापन दूर हो सकता है? दरअसल पिछड़ेपन का वास्तविक कारण शिक्षा है । इसमें भी बड़ी बुराई शिक्षा का निजीकरण है, जो गरीबों, पिछड़ों, दलितों, शोषितों और समाज के हर वर्ग का नुकसान करते हुए श्रेष्ठी के हित साधन का जरिया बन रही है । जिस देश में पढ़ाई और नौकरी की तैयारी करवाने वाले संस्थान बड़े पैमाने पर बगैर किसी जवाबदेही के फल-फूल रहे हों वहां शैक्षिक असमानता व्यापती है, जो उच्च् (सवर्ण) वर्ग को भी पछाड़ कर पीछे की पंक्ति में खिसका देती है । पाठ्यक्रम में असमानताएं है एवं उनमें भविष्य के प्रति दृष्टिकोण का अभाव भी है । परिणामत: भारतीय समाज में हर वर्ग के विद्यार्थी पिछड़ते रहे हैं । इस कठिनाई को दूर करने के प्रयास का व्यापक स्वागत होगा । निष्कर्ष यही है कि सरकारी नौकरियां की कमी और निजी क्षेत्र में बड़ी-बड़ी तनख्वाह के साथ अपरिमित सुविधाएं सामाजिक मूल्यों को दरका चुकी हैं जो एक मायने में संविधान में वर्णित शोषण के विरूद्ध अधिकारों का खुला उल्लंघन भी है । वेतन पैकेज की वसूली उत्पादित वस्तुआें के मूल्यों में जोड़कर उपभोक्ताआें से की जाती है अर्थात नौकरियों से धन प्राप्त् करने की सीमाएं निर्धारित होनी चाहिए जो महामहिम राष्ट्रपति के वेतन और सुविधाआें से २५ प्रतिशत कम हों । सरकार को उच्च् प्रौद्योगिकी संस्थानों की संख्या बढ़ाना चाहिए । आरक्षण से कहीं अधिक इसके लागू करने के तौर-तरीकों से सामान्य वर्ग परेशान हो रहा है । एक सुझाव यह भी है कि किसी एक स्तर पर ही इसका फायदा दिया जाए और यह भी देखा जाए कि अपने जीवन स्तर में सुधार के बाद पुन: उसी परिवार को आरक्षण का लाभ क्यों दिया जा रहा है । स्पष्ट है कि हमें आरक्षण की व्यवस्था को नया स्वरूप देने के पूर्व यह ध्यान में रखना होगा कि उसके प्रावधान सभी वर्गो की भावनाआें के अनुरूप हों, उसकी सीमाएं निश्चित करनी होगी और उससे प्राप्त् लाभ की परिभाषा देनी होगी । पढ़ाई के हर स्तर पर समानता लाने हेतु प्रयासों के साथ पाठ्यक्रम का समन्वय करना होगा ताकि ग्रामीण परिवेश में पिछड़ती ऐसी प्रतिभाएं भी विकास कर सकें जिसे प्राप्त् अवसरों में संवेधानिक असमानताएं हैं । सर्वप्रथम हमें समान शैक्षिक उन्नति हेतु एक समदर्शी वातावरण का सृजन करना चाहिए । ***