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मंगलवार, 3 जून, 2008

१० सामाजिक पर्यावरण

आरक्षण एक दुधारी तलवार

कमलेश कुमार दीवान

स्वतंत्रता प्रािप्त् के पश्चात भारतीय संविधान में अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए एक सीमा में निश्चित अवधि हेतु आरक्षण की व्यवस्था की गई थी । जाहिर है मंशा यही रही होगी कि एक अवधि के बाद मूल्यांकन कर निश्चित किया जा सकता था कि इसे आगे बढ़ाने की आवश्यकता है या नहीं। सन् १९५५ में काका कालेलकर समिति द्वारा नौकरी के साथ-साथ तकनीकी और पेशागत पढ़ाई में २३९९ पिछड़ी जातियों को सत्तर प्रतिशत आरक्षण देने की अनुशंसाा कर दी गई । सन् १९९१ में मंडल आयोग ने पिछड़ों के लिए केन्द्र सरकार की नौकरियों में २७ प्रतिशत आरक्षण देने का निर्णय लिया तब शैक्षणिक संस्थाआें में सरकार के प्रावधान लागू नहीं हो पाए थे आज उन संवैधानिक प्रावधानों को लागू करने हेतु पुख्ता इंतजाम किए जा रहे हैं, किंतु प्रावधानों से हुए लाभों का मूल्यांकन करने हेतु शायद ही कोई आयोग बनाए जाने की बात करता हो । जिन मौलिक संवैधानिक प्रावधानों का संपूर्ण फायदा अनुसूचित जाति और जनजातिय वर्ग को दिया जाना था उसमें सभी पिछड़ी जातियों को शामिल कर आरक्षण नीतियों को मूल्यांकन और उनके विकास की जवाबदेही से मुक्त कर दिया है। केन्द्र सरकार द्वारा सभी सरकारी, गैर सरकारी और निजी क्षेत्रों में आरक्षण के प्रावधान हेतु पुन: दबाव बनाया जा रहा है। शैक्षिक एवं तकनीकी संस्थानों में आरक्षण प्रदाय करने हेतु सरकारी निर्णय की सुप्रीम कोर्ट ने पुष्टि करते हुए क्रीमीलेयर को पृथक रखने का निर्णय दिया । जिसका देश भर में स्वागत हुआ परंतु विरोध के स्वर भी उभरे । अब यह तैयारी हो रही है कि मलाईदार परत का स्वाद दे रहे लोगों को भी इन संवैधानिक प्रावधानों का फायदा देने हेतु संशोधन लाया जाए । आरक्षण संवैधानिक प्रावधानों से प्राप्त् हो रहा व्यक्तिगत लाभ है और इस लाभ को एक व्यक्ति को कितनी बार दिया जावे यह सुनिश्चित करना कठिन है । आरक्षण से कहीं अधिक इसे लागू करने के तौर तरीके विवादास्पद हैं जिसमें पढ़ाई, नौकरी, पदोन्नति आदि सभी क्षेत्रों में एक ही व्यक्ति को लाभ मिलते रहने वाला है। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाए कि यह लाभ किस स्तर तक दिया जाना है । सवाल यह है कि समाज को आरक्षण से क्या प्राप्त् हो रहा है ? कोई कहता है कि आरक्षित वर्गो का चहुॅमुखी विकास हो रहा है ? किसी से यह सुनना पड़ता है कि इस व्यवस्था से हमारे संवैधानिक अधिकारों को नुकसान पहंुचाया है । एक वर्ग का यह भी मानना है कि आरक्षण के प्रावधानों से लाभ लेने की मंशा रखने वाला समाज अपने लिए एक नया हाशिया बनवाना चाहता है जिससे उसकी धन और शक्ति हासिल करने की आकांक्षाएं पूर्ण हो सकें । तर्क से तो भारतीय समाज के समूचे ताने-बाने को पिछड़ा ठहराया जा सकता है । कोई दूर दराज गांवों में निवास के कारण पिछड़ रहा है, कोई पुश्तैनी काम धंधों के कारण पीछे रह गया है, कोई आय के संसाधनों का विकास नहीं हो पाने के कारण असुरक्षित रह गया । एक वर्ग यह भी मानता है कि हम गलत तरीकों से लोगों को विकसित करने की कोशिश कर रहे हैं । दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश का मानव संसाधन विकास मंत्रालय राज्यों के साथ मिलकर पाठ्यक्रमों की असमानताआें को दूर कर उच्च् शिक्षा संस्थानों में प्रवेश पाने की योग्यताआें का विकास करने में असफल रहा है । ज्ञातव्य है कि सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले के तहत शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण को अनुचित करार देने के बाद सरकार को संविधान में १०४वां संशोधन लाना पड़ा था जिससे इस मुहिम को आगे बढ़ाने के रास्ते मिले थे । केन्द्रीय सेवाआें में पिछड़ों की स्थिति के बारे में यह बताया जाता है कि आई.ए.एस. और आई.पी.एस. में ७.०२ प्रतिशत और भारतीय विदेश सेवा में ७.७४ प्रतिशत हिस्सा हैं किंतु राज्यों की प्रशासनिक सेवाआें को मिलाकर यदि आकलन किया जाए तब यह कहीं अधिक होगा । दलित आदिवासियों जिनके लिए आरक्षण के प्रावधान पहले से लागू हैं उनका प्रतिशत कम ही रहा है । कमजोरी कहां है यह तलाशना चाहिए । शैक्षणिक उन्नति हेतु देश के आर्थिक संस्थाआें द्वारा इन वर्गो के लिए काफी धन खर्च किया जा रहा है । लेकिन उनकी प्रगति की रफ्तार धीमी क्यों है ? ऐसा शायद इसलिए है कि व्यय के अनुपात में प्रगति के मूल्यांकन हेतु कोई संवैधानिक प्रावधान नहीं किए गए हैं । यदि शैक्षणिक ढांचों को जवाबदेह बनाया जाता तब सुखद परिणाम सामने आते । आज जब हम आरक्षण के पक्ष में तर्क देते हैं जब यह जरूर बताते हैं कि केन्द्रीय सेवाआें में पिछड़ों की स्थिति दयनीय हैं । आई.ए.एस. और आई.पी.एस. में और भारतीय विदेश सेवा में कुछ प्रतिशत ही स्थान है । आश्चर्य तब होता है कि जब हम पिछड़ेपन का पैमाना केवल सरकारी नौकरियों को मानते हैं । शिक्षा के क्षेत्र में शहरों से कस्बे और कस्बों से गांव पिछड़े हैं । क्या उसकी दशा ठीक करने और दिशाएं सही रखने के उपक्रम किए जा रहे हैं ? निश्चित ही नहीं । यदि ऐसा होता तब पाठ्यक्रमोंमें बहुआयामी असमानताएं नहीं होती । एक सवाल यह भी है कि क्या आई.आई.टी., आई.आई.एम. जैसे उच्च् प्रौद्योगिकी एवं व्यावसायिक पढ़ाई वाले संस्थाआें में पिछड़ों के आरक्षण से उन जातियों का पिछड़ापन दूर हो सकता है? दरअसल पिछड़ेपन का वास्तविक कारण शिक्षा है । इसमें भी बड़ी बुराई शिक्षा का निजीकरण है, जो गरीबों, पिछड़ों, दलितों, शोषितों और समाज के हर वर्ग का नुकसान करते हुए श्रेष्ठी के हित साधन का जरिया बन रही है । जिस देश में पढ़ाई और नौकरी की तैयारी करवाने वाले संस्थान बड़े पैमाने पर बगैर किसी जवाबदेही के फल-फूल रहे हों वहां शैक्षिक असमानता व्यापती है, जो उच्च् (सवर्ण) वर्ग को भी पछाड़ कर पीछे की पंक्ति में खिसका देती है । पाठ्यक्रम में असमानताएं है एवं उनमें भविष्य के प्रति दृष्टिकोण का अभाव भी है । परिणामत: भारतीय समाज में हर वर्ग के विद्यार्थी पिछड़ते रहे हैं । इस कठिनाई को दूर करने के प्रयास का व्यापक स्वागत होगा । निष्कर्ष यही है कि सरकारी नौकरियां की कमी और निजी क्षेत्र में बड़ी-बड़ी तनख्वाह के साथ अपरिमित सुविधाएं सामाजिक मूल्यों को दरका चुकी हैं जो एक मायने में संविधान में वर्णित शोषण के विरूद्ध अधिकारों का खुला उल्लंघन भी है । वेतन पैकेज की वसूली उत्पादित वस्तुआें के मूल्यों में जोड़कर उपभोक्ताआें से की जाती है अर्थात नौकरियों से धन प्राप्त् करने की सीमाएं निर्धारित होनी चाहिए जो महामहिम राष्ट्रपति के वेतन और सुविधाआें से २५ प्रतिशत कम हों । सरकार को उच्च् प्रौद्योगिकी संस्थानों की संख्या बढ़ाना चाहिए । आरक्षण से कहीं अधिक इसके लागू करने के तौर-तरीकों से सामान्य वर्ग परेशान हो रहा है । एक सुझाव यह भी है कि किसी एक स्तर पर ही इसका फायदा दिया जाए और यह भी देखा जाए कि अपने जीवन स्तर में सुधार के बाद पुन: उसी परिवार को आरक्षण का लाभ क्यों दिया जा रहा है । स्पष्ट है कि हमें आरक्षण की व्यवस्था को नया स्वरूप देने के पूर्व यह ध्यान में रखना होगा कि उसके प्रावधान सभी वर्गो की भावनाआें के अनुरूप हों, उसकी सीमाएं निश्चित करनी होगी और उससे प्राप्त् लाभ की परिभाषा देनी होगी । पढ़ाई के हर स्तर पर समानता लाने हेतु प्रयासों के साथ पाठ्यक्रम का समन्वय करना होगा ताकि ग्रामीण परिवेश में पिछड़ती ऐसी प्रतिभाएं भी विकास कर सकें जिसे प्राप्त् अवसरों में संवेधानिक असमानताएं हैं । सर्वप्रथम हमें समान शैक्षिक उन्नति हेतु एक समदर्शी वातावरण का सृजन करना चाहिए । ***

सोमवार, 11 फ़रवरी, 2008

८ सामाजिक पर्यावरण

दूध-दही की नदियों वाले देश में बिकता पानी
जगदीश प्रसाद शर्मा
कम आबादी के कारण प्राचीन भारत वन बाहुल्य था । भारतीय संस्कृति में वनस्पति को सजीव माना है, जिस कारण हमारी संस्कृति में वृक्षों और वनों को संरक्षण दिया गया है । इसीलिए प्राचीन भारत देश का ५० प्रतिशत से अधिक भू-भाग हमेशा वनाच्छादित रहा है । हरे-भरे वनों के कारण ही इस देश में भरपूर वर्षा होती थी, बारहमासी नदी-नाले और झरने पूरे देश में मौजूद थे, भू-जल का कोई अभाव नहीं था, जिस कारण भरपूर कृषि उत्पादन होता था। कृषि एवं वन क्षेत्रों में पशुआें के लिए पर्याप्त् चारा उपलब्ध होने के कारण दूध-दही का भी भरपूर उत्पादन होता था । शायद यही कारण था कि प्राचीन भारत में दूध-दही की नदियां बहने की कहावत चरितार्थ हुई । आज से ५० साल पूर्व तक भी खेती को ही उत्तम कर्म माना जाता था। हरियाणा और पंजाब जैसे कृषि प्रधान प्रांतों में वन भूमि नहीं के बराबर है, क्योंकि यहां बहुत पहले वनों का सफाया करके वन भूमि को कृषि भूमि में बदल लिया गया है । आज जिन प्रांतों में वन बचे हैं, वहां बढ़ती आबादी एवं निजी तथा राजस्व भूमि की अनुपलब्धता के कारण वन भूमि पर लोगों की गिद्धदृष्टि हमेशा बनी रहती है । परिवार बढ़ने के कारण अब प्राय: प्रति परिवार (पति, पत्नि और उसके बच्च्े) आधा हेक्टेयर भूमि भी नहीं रही है। ऐसे में गरीब परिवारों की गुजर-बसर के लिये वन भूमि पर किये गये अतिक्रमण का समय-समय पर व्यवस्थापन करना एक मानवीय आवश्यकता महसूस की जाती रही है । अधिकतर लोगों की धारणा है कि शायद इसीलिए ``अनुसूचित जनजाति और अन्य परम्परागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, २००६'' दिनांक ३१ दिसम्बर २००७ से प्रभावशील हुआ है । वर्तमान में देश का लगभग २३ प्रतिशत भू-भाग ही संरक्षित एवं आरक्षित वन घोषित है, जिसका लगभग दो तिहाई भाग ही वन आच्छादित है, जबकि पर्यावरण सुरक्षा हेतु राष्ट्रीय वन नीति के अनुसार देश का ३३ प्रतिशत भू-भाग वन आच्छादित होना चाहिए । उपरोक्त परिस्थितियों में यह लक्ष्य शायद ही कभी प्राप्त् हो सके । यह सभी जानते हैं कि वनों के नष्ट होने के कारण हमारे वातावरण में परिवर्तन आ रहा है । वर्षा कम हो गई है और अनियमित भी हो गई है । हमारे बारहमासी जल स्त्रोत सूख रहे हैं । सर्दी के दिनों में आने वाली बरसात नहीं के बराबर हो गई है, जिस कारण जहां पहले रबी की फसल थोड़ी सी सिंचाई से हो जाती थी, अब उनमें ज्यादा सिंचाई करनी पड़ती है । इस तरह बरसात की कमी तथा भू- जल का अनियंत्रित एवं अंधाधुंध दोहन होने से भू-जल स्तर गिरता जा रहा है । देश के हर शहर में प्रति लीटर के माप से प्लास्टिक की बोतलों में पीने का पानी बिक रहा है । हरियाणा के जिन गांवो में बच्च्े कभी कुआे मंे छलांग लगाकर नहाते थे, आज वहां पीने के पानी का गंभीर संकट पैदा होने के कारण गांव खाली करने का भय लोगों को सता रहा है, क्योंकि वहां का भू-जल स्तर ४०० से ५०० फुट नीचे खिसक गया है और पानी की उपलब्ध मात्रा भी कम हो गयी है, जिस कारण रहट, ढेकली और चरस जैसे सिंचाई के पुराने साधनों का स्थान अब सबमर्सिबल पम्पस ने ले लिया है । अगर कुछ दिनों के लिए इन गांवों में बिजली नहीं आये तो फसलों की सिंचाई करना तो दूर रहा, पीने का पानी भी उपलब्ध नहीं हो सकेगा, क्योंकि बिजली के बिना सबमर्सिबल पम्पस नहीं चल पायेंगे । यह हैरानी की बात है कि जहां गांवों में दूध बेचना पुत्र बेचने के समान मानते थे, बिना पैसे लिए एक-दूसरे को दूध दे देते थे और राहगीरों हेतु पीने के पानी की धमार्थ प्याऊ लगाते थे, अब वहां भी ऊंटगाड़ियों और बैलगाड़ियों से पीने का पानी बिक रहा है । इसके आगे क्या होगा, भगवान ही जाने । वन वास्तव में धरती माता के केश हैं, ठीक किसी महिला के केश की तरह । वनों के नष्ट होने से बरसात का पानी जमीन में पहले की तरह पर्याप्त् मात्रा में नहीं समा पाता और ऊपरी सतह को ही गीला करते हुए बहकर चला जाता है, ठीक उसी तरह जैसे किसी गंजे व्यक्ति के सिर पर डाला हुआ सारा पानी सिर को गीला करते हुए फिसल जाता है, जबकि केश वाले सिर में कुछ पानी रूक जाता है और केश जितने घने होते हैं, सिर में उतना ही ज्यादा पानी रूकता है । यही कारण है कि घने वनों से बाहरमासी झरनो, नालों और नदियों का उद्गम होता है और इसीलिये विख्यात पर्यावरणविद् सुन्दरलाल बहुगुणा ने वनों को जिन्दा जलाशय की उपमा दी है । खेती करने हेतु जब से ट्रेक्टरों ने बैलों का स्थान लिया है, तब से निजी कृषि भूमि में भी वृक्षों की संख्या काफी घट गई है । इस तरह धरती पर वृक्षों के अभाव में एक तो वर्षा कम हो रही है, दूसरा भूमि में पानी कम मात्रा में समा रहा है तथा तीसरा फसलों की सिंचाई के लिए मशीनों से अधिक मात्रा में भू-जल निकाला जा रहा है, जिस कारण भू-जल स्तर गिरता जा रहा है और झरने तथा नदी-नाले सूखते जा रहे हैं । मध्यप्रदेश के मालवा क्षेत्र के संबंध में कहावत रही है, ``मालवा की धरती, गहन गंभीर । पग-पग रोटी, डग-डग नीर ।।'' वनों के घटते क्षेत्रफल एवं घनत्व के कारण पैदा हुए पानी के अभाव में अब यह कहावत झूठी पड़ चुकी है और भगवान महाकाल एवं राजा विक्रमादित्य की पवित्र नगरी उज्जैन से गुजरने वाली कभी बारहमासी रही क्षिप्रा नदी भी सूख गई है । इस कारण अब उज्जैन में कुंभ मेले के आयोजन के समय क्षिप्रा नदी में श्रद्धालुआे के स्नान हेतु मानव निर्मित जलाशयों से पानी छोड़ने की व्यवस्था करनी पड़ती है । मध्यप्रदेश का उज्जैन जिला कृषि प्रधान होने के कारण हरियाणा और पंजाब की तरह यहां के वन भी बढ़ती आबादी के कारण कई वर्ष पहले ही कट चुके हैं और इस जिले में आज केवल ०.५१ प्रतिशत वन भूमि है और वह भी वृक्षाच्छादित नहीं है । आज से ६०-७० वर्ष पूर्व मध्यप्रदेश में वन बाहुल्य रहे बड़वानी जिले में जो नाले बारहमासी थे, वे अब वनों के घटने से सूख चुके हैं तथा वर्षा ऋतु में कभी-कभी ही बहते हैं । इस कारण पानी के अभाव में कृषि उत्पादन घट गया है तथा वन आवरण हटने से भूक्षरण के कारण मिट्टी के बह जाने से वन विहीन पहाड़ियां अब वृक्षारोपण के लायक भी नहीं रह गई है अर्थात सारे सोने के अंडे एक साथ पाने के लिये मुर्गी का पेट काट डाला, जिस कारण अब न तो मुर्गी रही और न ही सोने का अंडा । मध्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ़ प्रांतों के खरगोन, बड़वानी, मंडला शहडोल, बालाघाट, सरगुजा, बस्तर आदि वन बाहुल्य जिलों में वनों के घटने के कारण अनेक झरनों और नदी-नालों के सूखने की वहां के वनवासियों के मुख से आंखों देखी बातें सुनने से उक्त तथ्यों की पुष्टि भी होती है । यही हाल देश के अन्य क्षेत्रों में भी है । अगर वनों के घटने एवं नष्ट होने का सिलसिला ऐसे ही जारी रहा तो देश के वनों से निकलने वाली सभी नदियों सूख जाएंगी । पवित्र मानी जाने वाली नदियों में से मध्यप्रदेश की जीवनदायिनी नर्मदा नदी, जिसका उद्गम धार्मिक स्थल अमरकंटक की साल वनों से आच्छादित पहाड़ियों से होता है भी एक दिन सूख जाएगी, जिसके फलस्वरूप इस नदी का पानी पीने वाले कई शहर और गांव प्यास से तड़पने लगेंगे, सिंचाई के अभाव में अन्न उत्पादन में गिरावट आयेगी, पन-बिजली उत्पादन बंद हो जायेगा, जिससे मध्यप्रदेश में आर्थिक विकास की गति अवरूद्ध होगी । भारत वर्ष के मेघालय प्रांत में स्थित दुनिया के सबसे अधिक वर्षा वाले क्षेत्र चेरापंूजी के निवासी वनों की अंधाधुंध कटाई के कारण पीने के पानी के लिए तरस रहे हैं । इस क्षेत्र के लोगों की प्यास बुझाने के लिए अब बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण कर पुन: वन लगाने और इजराइली तकनीक से वर्षा के पानी को भंडारित करने के प्रयास प्रारंभ कर दिए गए है । वर्ष २००७ में नोबल शांति पुरस्कार प्राप्त् करने वाली संस्था यू.एन.आई. पी.सी.सी. (यूनाइटेड नेशन्स इंटर गवर्नमेन्टल पैनल ऑफ क्लाइमेट चेंज) के अध्यक्ष एवं भारतीय वैज्ञानिक डॉ. राजेन्द्र पचौरी का मानना है कि ``ग्लोबल वार्मिंग'' के कारण दुनिया का तापमान बढ़ जाने से वातावरण में बड़ा परिवर्तन आयेगा । बर्फ के पहाड़ों पर स्थित ग्लेशियर्स से निकलने वाली बाहरमासी सतलुज, गंगा और यमुना जैसी नदियां सूख जाएंगी और इन नदियों पर बने बांध सूखने से उत्तर भारत में नहरों द्वारा सिंचाई व्यवस्था और शहरों की पेयजल व्यवस्था ठप्प हो जायेगी तथा पन-बिजली उत्पादन बंद होने से देश में आर्थिक विकास की गति अवरूद्ध होगी । बर्फ पिघलने से समुद्रों का जल स्तर बढ़ेगा, जिससे समुद्रों के किनारे बसे मुम्बई, चेन्नई, कोलकाता और विशाखापट्टनम जैसे कई शहर जलमग्न हो जाएंगे । उल्लेखनीय है कि वातावरण में अन्य गैसों के साथ-साथ मुख्य रूप से कार्बन डाय आक्साइड गैस बढ़ने से ग्रीन हाउस प्रभाव के कारण ``ग्लोबल वार्मिंग'' होती है । कार्बन डाय आक्साइड गैस कम करने में वनों का सबसे बड़ा योगदान रहता है । इसीलिये बर्फीले पहाड़ों पर स्थित ग्लेशियर्स से निकलने वाली बारहमासी नदियों के अस्तित्व और समुद्रतटीय क्षेत्रों को जल मग्न होने से बचाने के लिए पृथ्वी पर वनों का बना रहना अति आवश्यक है। जिन वन बाहुल्य क्षेत्रों में गर्मियों में कभी पंखे चलाने की आवश्यकता नहीं होती थी, आज वहां वनों के कटने से तापमान इतना बढ़ गया है कि उन क्षेत्रों में एयर कूलर्स और एयर कंडिशनर्स चल रहे हैं । धरती से अनाज पैदा करने के लिए पानी भी आवश्यक है । इसीलिये गुरू ग्रन्थ साहिब में धरती को बड़ी माता और पानी को पिता की उपाधि दी गई है। अगर थोड़ी देर के लिये यह मान लिया जाए कि देश को भुखमरी से बचाने के लिये पूरे जंगल की जमीन गरीबों में खेती करने के लिए बांट दी जाए तो क्या देश में भुखमरी और गरीबी दूर हो सकेगी । वनों के कटने से बारहमासी झरनें तथा नदी-नाले, चाहे उनका उद्गम वनों से हो या फिर ग्लेशियर से हो, सूख जाएंगे, भू-जल स्तर धीरे-धीरे नीचे खिसक जायेगा तथा वर्षा और जलवायु भी अनियमित हो जायेंगी, सिंचाई के लिए बिजली उपलब्ध नहीं होगी, जिस कारण देश में जितना अनाज आज पैदा होता है, उतना भी पैदा नहीं हो पायेगा । इससे स्पष्ट है कि वन भूमि को कृषि भूमि में बदलने से भुखमरी मिटेगी नहीं, बल्कि बढ़ेगी । न केवल भुखमरी बढ़ेगी नदी-नालों के सूख जाने और भू-जल स्तर में भारी गिरावट आने और बिजली उपलब्ध न होने से पीने के पानी का भी उपलब्ध नहीं हो सकेगा, जिस कारण भविष्य में शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों में भूख से होने वाली मौतों के साथ-साथ प्यास से भी मौतें होने लगेंगी । समुद्रों का जल स्तर बढ़ने से तटीय शहरों की आबादी जलमग्न होकर खत्म हो जायेगी । जब ऐसी स्थिति है तो क्या वनों को अच्छी तरह समझ लिया है, जिस कारण वहां आबादी पर सफल एवं प्रभावी नियंत्रण के साथ-साथ वृक्षों और वनों को इतनी सुरक्षा प्रदान की गई है कि पशु अवरोधक खन्ती तथा चेनलिंग या कांटेदार तार की बागड़ के बिना ही सफलतापूर्वक वृक्षारोपण किए जा रहे हैं, जबकि भारत में आबादी और पशु संख्या के दबाव के कारण अनेक तरीके अपनाने के बाद भी वृक्षारोपणों को सफल बनाना एक टेढ़ी खीर बनी हुई है । जब चीन ऐसा कर सकता है तो सारे जहां से अच्छा हमारा हिन्दुस्तान क्यों नहीं कर सकता ? कमी कहां है ? ऐसी स्थिति में देश की इस समस्या का समाधान क्या है ? अगर इस ओर गहराई से सोच-विचार किया जाए तो हमें कहीं दूर झाकने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि अपने पड़ौस में ही इसका समाधान साफ नजर आ रहा है । जिस तरह चीन ने इस समस्या पर काबू पाया है, दुनिया के दूसरे सबसे अधिक आबादी वाले देश भारत वर्ष को भी इसी रास्ते पर चलना होगा तथा धर्म, जाति सम्प्रदाय आदि को भुलाकर केवल राष्ट्र धर्म को सर्वोपरि रखते हुए आबादी नियंत्रण और वन क्षेत्र बढ़ाने हेतु कानून बनाना होगा । अन्यथा जिस तरह आज की पीढ़ी के लिए यह आश्चर्य है कि प्राचीन भारत में दूध-दही की नदियां कैसे बहती थी, उसी तरह आने वाली पीढ़ियां भी यह विश्वास नहीं कर पाएंगी कि इस देश की धरती पर कभी पानी की नदियां भी बहती थी । आज तो पानी बिक रहा है, लेकिन भविष्य में खरीदने के लिए रूपए लेकर घूमते रहेंगे तो पीने के लिए भी पानी नहीं मिलेगा । आजकल नगर पालका और नगर निगम के नलों पर पीने के पानी के लिए झगड़ों में मौतें होना आम बात हो गई है । नवम्बर २००७ में मध्यप्रदेश के बुन्देलखण्ड के किसानों ने हथियारों से लैस होकर उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती महोबा जिले में स्थित उर्मिल बाँध से पानी लूट लिया । इन सब परिस्थितियों को देखा जाए तो शायद यह सच ही है कि अगर इस धरती पर तीसरा विश्वयुद्ध हुआ तो वह पानी के लिए ही लड़ा जायेगा । कुछ अमीर और प्रभावशील लोग तो जिंदा रहने के लिए शायद किसी समृद्ध देश में चले जायें, लेकिन गरीबों और आम जनता को तो उक्त परिस्थितियों में लकड़ी के अभाव में यही दफन होना पड़ेगा । इसलिए सकारात्मक परिवर्तन लाने और इस देश की धरती को प्राचीन भारत की तरह पुन: खुशहाली से जीने लायक बनाने के लिए जनता को ही जल, जंगल और जमीन को बचाने की पहल करनी होगी । अत: यह पहल आज से ही क्यों न प्रारंभ कर दें और फिर से इस भारत देश को सबसे अच्छा देश बना दें । ***

गुरुवार, 31 मई, 2007

आदिवासियों की अस्मिता का प्रश्न

सामाजिक पर्यावरण

आदिवासियों की अस्मिता का प्रश्न

शंकर तड़वाल

आदिवासियों के कल्याण को लेकर आजकल बड़ी-बड़ी बातें की जा रही हैं। इसी के साथ यह भी प्रयत्न किया जा रहा है कि उन्हें मुख्यधारा में लाने के नाम पर उन्हें उनकी संस्कृति से ही वंचित कर दिया जाए। आदिवासी समाज धर्म के नाम पर अंधविश्वास फैलाने वाले धर्म गुरुआें की जकड़ में जा रहा है। आदिवासियों के आत्मसम्मान, स्वयंनिर्णय, स्वावलम्बन, मानवप्रतिष्ठा, संस्कृति एवं मानवीय मूल्यों का क्षरण हो रहा है। आजादी मिलने के बाद पूंजीवादी विकास मॉडल के तहत् शहर के चंद लोगों के लिए जल, जंगल, जमीन व खनिज स्त्रोतों को सीमित लोगों के लिए लुटाया जा रहा है।

हम भारत के लोग ...... भारत को एक संपूर्ण, प्रभुत्व सम्पन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, सामाजिक, आर्थित और राजनैतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता जैसे उसूलों को सही रूप से लागू करने में देश की सरकारें नाकामयाब रही हैं। व्यक्ति की गरिमा और बंधुता बढ़ाने के भारतीय संविधान के आश्वासन के मुताबिक देश नहीं चल रहा है। आदिवासी अपने आप को गुलाम महसूस करते हैं। उनके साथ अपने ही देश में नस्लभेद और भेदभाव का बर्ताव किया जा रहा है। देश में दस करोड़ आदिवासियों का अपना कोई संगठन नहीं है।

भारत के लोगों को बहुत कम जानकारी है कि आखिरकार ये आदिवासी लोग कौन हैं ? सन् १८९१ की जनगणना रिपोर्ट में जनसंख्या आयुक्त जे.ए.बेन्स ने आदिवासयिों का कृषक व चरवाहा जनजाति के नाम से पृथक उप-शीर्षक बनाया था। सन् १९०१ की जनसंख्या रिपोर्ट में उन्हें प्रकृतिवादी कहा गया। सन् १९११ में उन्हें जनजातीय प्रकृतिवादी अथवा जनजातीय धर्म को मानने वाले लोग कहा गया। सन् १९२१ में उन्हें पहाड़ी व वन्य जनजाति नाम दिया गया। सन् १९३१ में उन्हें आदिम जनजातीय कहा गया। सन् १९३१ तक जनगणना रिपोर्ट में भी प्रकृतिपूजक एवं एनिमिस्ट धर्म लिखा गया था।

जनजाति शब्द का अर्थ व्युत्पत्ति शास्त्र के अनुसार अंग्रेजी शब्द ट्राइब त्रिभुज शब्द से माना जाता है। जिसका अर्थ तीन अंग है। यानी राजा, रक्षा तथा हस्त-कलाकार। किसी निश्चित भू-क्षेत्र विशेष पर किसी जनजाति का स्थायी निवास उसका भौगोलिक परिचय देता था। मानव शास्त्रियों तथा समाजशास्त्रियों ने ऐसे किसी निश्चित सीमा के अन्दर निवास करने वाले लोगों की प्रजाति को जनजाति माना है। किसी भी समुदाय को अनुसूचित जनजाति में शामिल करने के लिए निम्नलिखित मापदण्ड निश्चित किये गये हैं।

१. विशिष्ठ संस्कृति जिसमें जनजाति जीवनयापन का चित्रण जैसे भाषा, परम्पराएं, धार्मिक विश्वास, कला व दस्तकारी आदि शामिल हैं।

२. किसी निश्चित भौगोलिक क्षेत्र पर पारम्परिक अधिकार।

३. व्यावसायिक ढांचा, आर्थिक व्यवस्था आदि को दर्शाने वाली आदिकालीन विशेषता।

४. शैक्षिक तकनीकी व आर्थिक विकास की कमी।

आदिवासी समाज के धर्म के मामले में जानकर आपको ताज्जुब होगा। भारत के संविधान ने आदिवासियों के धर्म संबंधी मामलों में बहुत ही संवैदनशीलता दिखाई हैं। आदिवासियों के धर्म को लेकर कोई कठोर कानूनी या संवैधानिक प्रावधान नहीं हैं। वैसे हर नागरिक को संविधान की धारा २५ के तहत् अपना धर्म मानने व पालन करने की स्वतंत्रता है। संविधान की धारा २९ में संस्कृति को बनाये रखने की स्वतंत्रता भी है। आदिवासियों द्वारा धर्म अपनाने में कोई कठोर प्रतिबंध नहीं है। आदिवासी हिन्दु, सिक्ख, बौद्ध, ईसाई, मुसलमान में भी हैं तथा एक मायने में वह स्वतंत्र जनजातीय धर्म का भी है। अर्थात वह चाहे तो हिन्दु, सिक्ख, बौद्ध, ईसाई, मुसलमान भी नहीं है। देश की सर्वोच्च न्यायालय भी आदिवासियों को हिन्दु नहीं मानती। शादी, विवाह के मामले में आदिवासियों को किसी अन्य धर्म के कानून के सहारे की जरूरत नहीं है। इस हेतु स्वतंत्र आदिवासी कानून संविधान में विद्यमान हैं।

आदिवासी बार-बार दुनिया के वृहद समाज वालों को कहता है कि प्रकृति ही परमेश्वर है। आज दुनिया में जितने भी अनाज के बीज जो प्रकृति ने बनाये थे, वह विलुप्त हो रहे हैं। चांवल, उड़द, बाजरा, मक्का जैसे अनेक अन्न तथा अन्य सब्जियों एवं फसलों के परम्परागत बीजों की हजारों प्रजातियां हमेशा-हमेशा के लिए विलुप्त कर दी गई हैं। उधर जड़ी बूटियों के पौधों की प्रजातिया भी धरती से विलुप्त हो रही हैं। समुद्र की मछलियों से लेकर पृथ्वी पर से चिड़िया व जंगली जानवरों की जातियां विलुप्त होने के कगार पर हैं। इधर धरती के हमारे पेट्रोलियम जैसे प्राकृतिक संसाधन सात पीढ़ियों के पहले ही खत्म हो जाने वाले हैं। कारखानों एवं वाहनों के धुआें के बढ़ोत्तरी के फलस्वरूप ओजोन परत के अप-क्षरण से माता आग को गोला बनने की ओर अग्रसर है। धरती पर कूलर का काम रकने वाले उत्तरी ध्रुव पर लाखों वर्षो से जमी हुई बर्फ पिघलने की गति प्रतिवर्ष तेज हो रही है।

इस संबंध में आज एक वैचारिक आंदोलन की आवश्यकता है। आंदोलन केवल आदिवासियों के अस्तित्व टिकाने का नहीं बल्कि पूरी मानव सभ्यता के अस्तित्व को बचाने का हैं देश-देश, धर्म-धर्म, जात-जात, वर्ग-वर्ग के टकराव के स्थान पर समन्वय बिठाने एवं संघर्ष टालने के लिए यह आंदोलन आवश्यक है। देश में विषम परिस्थितियां निर्मित हो रही हैं। देश दो भागों में बटता जा रहा है। पहला अमीर भारत एवं दूसरा रोजगारहीन, आवासहीन, कुपोषित, सिकलसेल एनीमिया, कारखाना जन्य सिलिकोसिस जैसी बीमारियों से ग्रस्त भारत । स्वास्थ्य सुविधाविहीन, शिक्षाविहीन, गांव, वतन, परिवार से विस्थापित नारकीय जीवन वालों एवं आत्महत्या करने वालों का भारत।

आदिवासियों पर अत्याचार व शोषण की सभी हदें पार हो गई हैं। लोक कल्याणकारी राज्य होने के बावजूद भी बड़ी-बड़ी घटनाआें के बारे में कोई भी आदिवासियों से पूछने को तैयार नहीं है। फिर यदि असंतोष के स्वर उठने लगते हैं तो उनकी आवाज को अनसुनी करने के लिए उन्हें नक्सली गतिविधि, जातिवादी आंदोलन, आतंकवादी या माहौल बिगाड़ने का षडयंत्र करार दिया जाता है।

हम मानते हैं कि ईसाई धर्म प्रचारकों ने भी आदिवासियों की संस्कृति में छेड़खानी की है। आदिवासियों की पहचान को मिटाने के कार्य भी जरूर हुए हैं। कुछ आदिवासी ईसाई धर्म में धर्मान्तरिक भी हुए हैं। परंतु शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में उनके सराहनीय कार्य हैं। किन्तु आदिवासियों को हिन्दु हैं कह कर ब्राह्मणवादी लोग उनसे जबरन ऊपर ब्राह्मणी संस्कृति का अनुसरण कराते हैं। इस कार्य को धर्मान्तरण की श्रेणी में क्यों नहीं लिया जाता ? आदिवासियों के बीच संस्कार या धार्मिक कार्यक्रम बताकर ब्राह्मणवादी लोगों द्वारा मंदिर निर्माण, मूर्तियों की स्थापना एवं देवी देवताआें के फोटो बांटे जाते हैं। आदिवासियों के पुराने परंपरागत देव स्थलों, देवी-देवताआें को नजर अंदाज किया या भुलाया जाता है। हिन्दु एवं ईसाई धर्म की आपसी धार्मिक प्रतिस्पर्धा में आदिवासियों को बुरी तरह से घसीटा जा रहा है। उसकी कीमत आज आम आदिवासी को चुकानी पड़ रही हैं। आदिवासी समाज धार्मिक राजनीति से भी आहत हो रहा है।

आदिवासी समाज को अपने निजी जीवनयापन के संसाधन जैसे जल, जंगल, जमीन और खनिज सम्पदा से बेदखल किया जा रहा है। वन विधेयक २००६ में भी आदिवासियों की आकांक्षाआें की आपूर्ति होने की गुंजाईश नहीं है। क्योंकि इसमें जंगल पर लोगों के सामूहिक (सामाजिक) अधिकार का कोई प्रावधान नहीं है। विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र के कानून द्वारा सामूहिक स्त्रोत जैसे जल, जंगल, जमीन और खनिज सम्पदा सरकार द्वारा ही सीमित विशिष्ट व्यक्तियों को उपलब्ध करवाई जा रही है। बड़े बांध, कारखाने, रेल्वे, हाइवे, रास्ते अभयारण्य, फिल्म शूटिंग एरिया ज्यादातर आदिवासी क्षेत्रों में ही स्थित हैं। इससे आदिवासियों में बेरोजगारी की समस्या खड़ी हुई हैं। जल, जंगल, जमीन व खजिन सम्पदा श्रमजीवियों को मुहैया कराये बिना और सुरक्षा प्रदान किये बिना इस समस्या का हल नहीं हो सकता है। भारत में ६९७ आदिवासी जातियों में से ५२ जातियां विलुप्त हो गई हैं। आदिवासी संस्कृति, इतिहास, जीवन मूल्य, कला और ज्ञान सिर्फ आदिवासी का ही नहीं बल्कि सारी मानव जाति की विरासत है। इसलिए आदिवासी पहचान बनाये रखना जरूरी है। आदिवासी क्षेत्र में ५वीं अनुसूचित की व्यवस्था संविधान में की हैं किंतु इसे आजादी से आज तक अमल में नहीं लाया गया। आदिवासी महिलाआें का दोहरा शोषण हो रहा है। सिर्फ आदिवासी समाज को ही स्पर्श करने वाली बीमारी सिकलसेल एनिमिया का फैलाव हो रहा है। आदिवासी लोग सबसे अधिक कुपोषण के शिकार हैं।

आदिवासी समाज की आकांक्षा है कि देश के सभी समाजों को सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक न्याय, धर्म और संस्कृति के पालन की स्वतंत्रता हो तथा मानवप्रतिष्ठा और समानता तथा समाज के बंधुत्व भाव स्थापित हो। संविधान के उक्त उद्देश्य की प्राप्ति के आश्वासन का क्रियान्वयन हो। दुनिया में मानवों का अस्तित्व पारिस्थितिकीय संतुलन के साथ बना रहे। धरती हरी भरी बनी रहे। धर्मो पर पुनर्विचार होता रहे। मानव एक दूसरे के हित का सम्मान करें, ख्याल रखें। भाषायी, सांस्कृतिक, धार्मिक, सामाजिक, जैविक, प्राकृतिक विविधता विद्यमान रहे। ऐसे भारत का निर्माण होगा, तभी हमारे राष्ट्र निर्माताआें के सपने साकार होंगे। ***

आधी शताब्दी से भटकते हीराकुण्ड बांध के विस्थापित

१२ बांधो के बाद

आधी शताब्दी से भटकते हीराकुण्ड बांध के विस्थापित

चिन्मय मिश्र

५० वर्ष पूर्व भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने उड़ीसा स्थित हीराकुण्ड बांध का लोकार्पण किया था। सन् १९५७ में बने इस बांध से २४९ गांव के २६५०१ परिवार विस्थापित हुए थे। १.८३ लाख एकड़ का इलाका इसकी डूब में आया था जिसमें से १.२३ लाख एकड़ इलाका सिंचित था। इतना ही नहीं ५०००० भूमिहीन व्यक्तियों को भी जबरदस्ती यहां से हटाया गया था।

५० वर्ष पश्चात् जबकि एक नई सदी का प्रारंभ भी हो चुका है इस बांध के प्रभावितों ने गत दिवस उड़ीसा से झरसुगुडा, सम्बलपुर, बारगढ़ और सोनीपुर के जिला प्रशासनों के सामने प्रदर्शन कर अपनी पीढ़ा व्यक्त की। सरकार के अनुसार इन प्रभावितों को मात्र १ करोड़ ३६ लाख रुपये के करीब का मुआवजा देना है।

राज्य शासन अपने कुल व्यय का एक छोटा सा हिस्सा भी पिछले ५० वर्षो से इन बांध प्रभावितों को देने में असमर्थ रही है। इस घटना से पहला निष्कर्ष तो यह निकलता है कि सरकारें चाहे किसी भी दल की हों वे अंतत: आम व वंचित वर्ग का भला सोच ही नहीं सकतीं। उड़ीसा का हीराकुण्ड बांध तो एक उदाहरण भर है इस देश के राजनीतिक व प्रशासनिक तंत्र की विफलता या संवेदनशीलता का। इस बांध की स्वर्णजयंती समारोह मनाने या देश की इस महान उपलब्धि (?) पर डाक टिकट जारी करने में प्रभावितों को देय क्षतिपूर्ति से अधिक खर्च कर दिया जाएगा परंतु प्रभावितों के लिये बजट में प्रावधान करने के लिये दूसरे गृह के व्यक्ति का इंतजार किया जाना कभी समाप्त ही नहीं होगा।

यहां पर इस बात पर गौर करना भी आवश्यक है कि आजादी के बाद विस्थापन भारत की सबसे बड़ी मानव निर्मित त्रासदी है। पिछले साठ वर्षो में ४ करोड़ से अधिक भारतीय नागरिक विभिन्न कारणों से विस्थापन का शिकार हुए हैं। यह जनसंख्या गुजरात जैसे राज्यों की जनसंख्या से थोड़ी ही कम है। इतने बड़े पैमाने पर विस्थापन तो इजराइल जैसे देश के निर्माण के लिये भी नहीं हुआ है।

बात सिर्फ पूर्व निर्मित हीराकुंड या भाखड़ा नंगल या नागार्जुन सागर की नहीं है कि इनमें हुए विस्थापितों का पुर्नवास नहीं हो पाया। आज नर्मदा पर बने रहे सरदार सरोवर, इंदिरासागर, आेंकारेश्वर व इनके जेसे देश भर की नदियों पर निर्माणाधीन बांधो के विस्थापितों के लिये भी कोई सार्थक पुनर्वास