कार्बन डाई ऑक्साइड को जल समाधि !
इस सदी के मध्य तक दुनिया की आबादी लगभग ९ अरब हो जाएगी। तब ऊर्जा की माँग आज के मुकाबले कम से कम दुगुनी हो जाएगी। ताप विद्युत गृहों से उत्सर्जित कार्बन डाईऑक्साइड ग्लोबल वॉर्मिंग में बेहताशा वृद्धि करते हुए दुनिया पर कहर बरपा देगी। इस स्थिति से बचने के लिए क्या किया जाए ?
वैज्ञानिकों का सुझाव है कि यह कार्बन डाईऑक्साइड आसमान में पहूँचे, इससे पहले इसे ठिकाने लगा दिया जाए तो यह ग्लोबल वॉर्मिंग को नहीं बढ़ा पाएगी। सवाल यह है कि यह ठिकाना कौन-सा हो! क्या अरबों टन कार्बन डाईऑक्साइउ को पंप द्वारा जमीन में गाड़ दिया जाए या समुद्र में डुबो दिया जाए?
तकनीकी रुप से यह असंभव नहीं है, लेकिन जमीन अथवा समुद्र में से कुछ कार्बन डाईऑक्साइड फिर भी बाहर आकर आसमान का रुख कर सकती है, तो फिर क्या किया जाए?
अब कुछ वैज्ञानिकों ने इस समस्या का समाधान खोज निकालने का दावा किया है। इनका कहना है कि समुद्र की सही गहराई तथा उचित तलछट के रहते ऐसी आदर्श स्थिति निर्मित होती है, जिसमें एक बार कार्बन डाईऑक्साइड पहुँचा दी जाए तो वह पानी से बाहर नहीं आ सकती। इन वैज्ञानिकों के अनुसार समुद्री सतह से लगभग १०,००० फुट नीचे तापमान करीब ३५ डिग्री होता हैं । यहाँ की छिद्रिल तलछट में यदि तरलीकृत कार्बन डाईऑक्साइड को पंप द्वारा पहुँचा दिया जाए, तो वह वहीं कैद होकर रह जाएगी। कारण यह कि इस स्तर पर पानी का दबाव दतना होगा कि तरलीकृत कार्बन डाईऑक्साइउ का घनत्व पानी के घनतव से अधिक बना रहेगा। अधिक घनत्व के कारण यह सदा पानी के नीचे दबी रहेगी।
फिलहाल यह दूर की कौड़ी लगती है, लेकिन क्या पता कल शायद यही हमें ग्लोबल वॉर्मिंग के कहरे से बचा सके।
क्लोनिंग की सस्ती तकनीक
जॉर्ज क्लोनी- यह उस सूअर के बच्चे का नाम है, जो क्लोनिंग की नई तकनीक की बदौलत पैदा हुआ है। उसके ९ भाई-बहन और हैं, जो सभी क्लोनिंग से तैयार हुए हैं। यह नई तकनीक पूर्व में इस्तेमाल की जाने वाली तकनीक की अपेक्षा कहीं अधिक कारगर है और इस गुना सस्ती भी !

पहले जिस तकनीक का इस्तेमाल क्लोनिंग में किया जाता था उसमें सबसे पहले अंडाणु में से केन्द्रक को हटाना पड़ता था। केन्द्रक में ही सारी आनुवांशिक सूचना होती हैं । अंडाणु कोशिका में से केन्द्रक को हटाने के लिए एक इंजेक्शन की मदद से उसे खींचकर बाहर निकाल लिया जाता था। फिर उस कोशिका में शरीर की किसी अन्य कोशिका का केन्द्रक डाला जाता था।
डैनिश इंस्टीट्यूट ऑफ एग्रीकल्चर साइंजेस के गाबोर वायता द्वारा तैयार की गई तकनीक में थोड़ा अलग तरीका अपनाया जाता है। वे इसे हैंडमेड क्लोनिंग कहते हैं। इसमें वे एक निषेचित अंडाणु कोशिका लेकर उसे बीच से काटकर दो टुकड़े कर देते हैं। इन दोनों टुकड़ों पर कुछ रजक डाले जाते हैं। ये रंजक दर्शा देते हैं कि किस टुकड़े में केंद्रक है, किसमें नहीं। अब कंेद्रकहीन अर्द्ध कोशिका क्लोनिंग करना है। इस प्रकार प्राप्त कोशिका में कोशिका द्रव्य तो अंडाणु का होता है, मगर केंद्रक किसी अन्य कोशिका का होता है। अब इसे भ्रूण के रुप के विकसित होने देते हैं।
इस विधि से गत जून माह में एक सूअर जॉर्ज क्लोनी का जन्म हुआ। प्रयोग में ४७ क्लोन भ्रूण तैयार हुए थे। इनमें से १० सूअर बन चुके हैं। यानी इस तकनीक की सफलता दर २१ प्रतिशत है जबकि पूर्व तकनीक की सफलता दर मात्र ७ प्रतिशत हुआ करती थी।
हैंडसम क्लोन की एक विशेषता और है। इनमें भु्रण का विकास जोना पेल्यूसिडा नामक बाहरी झिल्ली के बगैर होता है। पुरानी तकनीक में भ्रुण की वृद्धि के समय यह झिल्ली सख्त हो जाती थी। शोधकर्ताओं का मत है कि जोना पेल्यूसिडा की अनुपस्थिति में भ्रुण की वृद्धि ज्यादा आसान होती होगी और शायद इसलिए इसकी सफलता दर ज्यादा है। वायदा का मानना है कि उनकी तकनीक क्लोनिंग में एक नया कदम है।
भेड़ें जानती हैं अपनी बीमारी का इलाज !
आम धारणा है कि भेड़ें मुर्ख होती हैं, शायद इसलिए कि एक को हाँको तो सारी चुपचाप उसके पीछे चल पड़ती हैं। मगर हाल ही में किए गए एक प्रयोग से पता चला है कि भेड़ें अपने पूर्व अनुभवों से सबक सीखने में सक्षम होती हैं और बीमार पड़ने पर अपना इलाज भी कर लेती हैं।
वैसे तो ऐसे किस्से काफी सुनने को मिलते हैं कि कुत्ते, बंदर वगैरह बीमार प़़डने पर ढूँढ-ढूँढकर कोई खास वनस्पति खा लेते हैं और ठीक हो जाते हैं। मगर ऊटा राज्य विश्वविद्यालय (अमेरिका) के जीव वैज्ञानिकों ने अपने प्रयोगों से सिद्ध कर दिया है कि भेड़ें भी सही दवा का चुनाव कर सकती हैं।
विश्वविद्यालय के युआन विलैल्बा और उनके साथियों ने कुछ भेड़ों को तीन अलग-अलग चीजें खाने को दीं। इनकी वजह से ये भेड़ें बीमार हो गई। अब उन्हें ऐसी चीजें खाने को दी गई जिनसे वे चंगी हो सकती थीं - सोडियम बेटोनाइट या पोलीएथिलीन ग्लायकॉल या डाईकैल्शियम फॉस्फेट। साथ में भेड़ों को एक समूह ऐसा भी था, जिसे फौरन औषधि नहीं दी गई, बल्कि तब दी गई जब उनकी तकलीफ कम हो चुकी थी। यह तो था प्रयोग का पहला हिस्सा। अपेक्षा यह थी कि इस अनुभव से सीख पाएँगी कि उन्हें कोई तकलीफदेह चीज खाने के बाद किस चीज से राहत मिलती है। दूसरी ओर, दूसरे समूह की भेड़ंे यह बात नहीं सीखेंगी कि उन्हें किस चीज से राहत मिल सकती है। क्योंकि उन्हें तो हालत सुधरने के बाद वह चीज खाने को मिली थी। अब प्रयोग का दूसरा हिस्सा शुरु हुआ। इस हिस्से में सारी भेड़ों को वे चीजें खाने को दी गइंर्, जिनमें से किसी एक से उन्हें राहत मिली थी।
प्रयोग से देखा गया कि उन भेड़ों ने राहतदायक चीज को चुन लिया, जिन्होंनें पहले हिस्से में यह सीखा था कि किस चीज से राहत मिलती है। 'एनिमल बिहेवियर' नामक पत्रिका में प्रकाशित अपने शोधपत्र में विलेल्बा व उनके साथियों ने बताया कि इन भेड़ों को यह बात कम से कम पाँच महीनों तक तो याद रही थी। अन्य भेड़ों ने राहतदायक पदार्थोंा में से किसी के प्रति कोई विशेष रुझान नहीं दर्शाया।
विलेल्बा का कहना है कि यदि मुर्ख होने का मतलब यह है कि आप अपने अतीत के अनुभवों से और उनके परिणामों से कुछ भी सीखने में असमर्थ हैं, तो इस मायने में भेड़ें मुर्ख नहीं हैं। भेड़चाल मुहावरा बदलने का वक्त आ गया लगता है..। लेकिन यहाँ एक प्रश्न यह उठता है कि यदि भेड़ें इतनी ही समझदार हैं तो फिर उन्होंने दोबारा वह चीज खाई ही क्यों, जिससे पिछली बार उन्हें तकलीफ हुई थी !तो चलिए फिलहाल हम मुहावरे को नहीं बदलते।
शब्द को लिपिबद्ध करने का पहला प्रयास
सभ्यता विकास और इंसान को आधुनिक बनाने में लिपि की महत्वपूर्ण भूमिका रहीहै । आधुनिक दुनिया में अपनी बात को लिपिबद्ध करने का पहला सफल प्रयास मैक्सिको की पूर्व-कोलंबियाई सभ्यता ने किया था। नृविज्ञानियों ने साइंस पत्रिका के विज्ञानियों के हवाले से मैक्सिको के वेराक्रूज प्रांत से मिले शिलालेख को आधुनिक दुनिया का प्राचीनतम लेख बताया है।
नृविज्ञानियों का मानना है कि पत्थर पर संकेतों जैसे दिखने वाले ये शब्द दो हजार वर्षो से भी पहले उकेरे गए होंगे। इस प्राचीन शिलालेख की खोज से जुड़े विज्ञानियों के अनुसार यह आधुनिक लेखन के अब तक मिले प्रमाणों में सबसे पुराना है। विज्ञानियों ने इसे कैस्काजाल ब्लॉक का नाम दिया है। प्रारंभिक पड़ताल के बाद इसे ईसा पूर्व की पहली सहस्त्राब्दी का बताया जा रहा है। यह शिलालेख मीजोअमेरिका इलाके में विकसित हुई ओल्मेक सभ्यता द्वारा बनाया गया था। उत्तरी मैक्सिको और फॉसेका खाड़ी के बीच स्थित इस क्षेत्र पर ही आज मैक्सिको, ग्वांतेमाला, ब्राजील, एल सल्वाडोर और पश्चिमी होंडूरास का अधिकांश भाग मौजूद है। उस समय यह इलाका एजटेक्स, मायाज और उनकी पूर्ववर्ती सभ्यताओं का घर हुआ करता था।
३६ सेंटीमीटर लंबे और २ सेंटीमीटर चौड़े इस शिलालेख का वजन १२ किलो है। इस पर कुल ६२ प्रकार के संकेत बने हुए हैं। इनमें से कुछ संकेतों को ३-४ बार तक दोहराया भी गया है। यह शिलालेख ९० के दशक में सैन लारेंजो के पास सड़क बनाने के लिए की जा रही खुदाई के दौरान मिला था। हालाँकि उस समय इसके पुरातात्विक महत्व को नहीं समझा जा सका था। इसकी कीमत सबसे पहले मैक्सिको के दो पुरातत्वविदों कार्मेन रॉड्रिग्स और पेंसियासनो ऑर्टिज ने पहचानी। इसके बाद इसकी उम्र का पता लगाने का काम शुरु किया गया। आखिरकार दुनियाभर के विशेषज्ञों ने इसे आधुनिक दुनिया के लेखन के सबसे पुराने प्रमाण के तौर पर स्वीकार कर लियाहैं ।
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