शनिवार, 18 नवंबर, 2006

पर्यावरण डाइजेस्ट के इंटरनेट संस्करण का लोकार्पण सुंदरलाल बहुगुणा द्वारा


पर्यावरण पर सन् 1987 से निरंतर प्रकाशित राष्ट्रीय हिन्दी मासिक पर्यावरण डाइजेस्ट के इंटरनेट संस्करण का लोकार्पण सुविख्यात पर्यावरणविद् व चिपको आंदोलन के प्रणेता श्री सुंदरलाल बहुगुणा द्वारा दिनांक 19 नवंबर को एक सादे समारोह में किया गया. इस अवसर पर पर्यावरण डाइजेस्ट के लिए उनके दिया गया हस्तलिखित शुभकामना संदेश:

हलचल - अक्तूबर 2006

हलचल

सिंहों के लिए १५ करोड़ का खर्च बेकार

पिछले दस सालों में २४ गांवों के पंद्रह सौ की आबादी का विस्थापन , पंद्रह करोड़ का खर्च और सरकारी कर्मचारियों की अनथक मेहनत....। इस सबके बावजूद कूनो- पालपुर अभयारण्य में अब भी एशियाटिक लॉयन (एशियाई सिंह) आने की उम्मीद नहीं है।

यह दास्तान है विलुप्तप्राय शेरों की प्रजाति एशियाटिक लॉयन के संरक्षण के प्रयासों की । इन्हें किसी आपदा से बचाने के लिए गुजरात से म.प्र. में बसाने के तमाम प्रयास सिर नहीं पूरे ही पा रहे हैं । बताया जाता है कि गुजरात सरकार ने हाल ही में केंद्र को फिर कहा है वह अपने एशियाई सिंह किसी और राज्य को नहीं देगा ।

दरअसल एशियाई सिंह देशभर में सिर्फ गुजरात के पास है और वहां गिर के जंगल इनका बसेरा है । इनकी संख्या लगभग साढ़े तीन सौ है । एक दशक पहले गुजराती की ही पहल पर कुछ ंसिह अन्य राज्यों में विस्थापित करने की मुहिम शुरु हुई थी । ताकि गिर में अचानक कोई आपदा या बीमारी फैलने पर इस प्रजाति के नष्ट हो जाने का खतरा कम किया जाए । इसके बाद गुजरात सरकार का रुख लगातार बदलता रहा और एशियाटिक लॉयन की म.प्र. आमद पर रोक लगी रहे । म.प्र. की बेचैनी की एक वजह यह है भी है कि उसने सिंहों के लिए श्योपुर जिले के ३४५ वर्ग किमी क्षेत्र में एक अभयारण्य तैयार कर रखा है । इसकंे लिए २४ गांवों को विस्थापित करने की मशक्कत पूरी की गई है । इससे डेढ़ हजार ग्रामीण अपने जंगल-जमीन से बमुश्किल दूर करने पड़े हैं और इस पूरी कवायद में सरकार पंद्रह करोड़ रुपए खर्च कर चुकी है।

सूर्य की परिक्रमा करने वाले ग्रहों की खोज

खगोल वैज्ञानिकों ने सौर मंडल के बाहर स्थित ऐसे सुदूर ग्रहों का पता लगाया है, जो अपने सूर्य यानी तारों के गुरुत्वाकर्षण से इस कदर बंधे हैं कि मात्र दस घंटे में उसकी परिक्रमा पूरी कर लेते हैं ।

अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा द्वारा अंतरिक्ष में स्थापित अत्यधिक शक्तिशाली हब्बल दूरबीन के जरिए वैज्ञानिकांे ने सौर मंडल के बाहर आकाश गंगा के माध्यम में ८ से १६ ऐसे ग्रहों को खोज निकाला है । ये ग्रह पृथ्वी से २५६ हजार प्रकाश वर्ष दूर है औरअब तक ज्ञात ग्रहों में ये सबसे दूरी पर स्थित है । वैज्ञानिकों के अनुसार इस प्रकार के कई अन्य ग्रह आकाश गंगा में जहाँ-तहाँ फैले हुए हैं ।

तोते की कीमत १ लाख २० हजार रुपए

उ.प्र. में बनारसी साड़ियों के लिए मशहूर वाराणसी नगर में लाट भैरव इलाके में भोजपुरी बोलने वाला एक ब्राजीली तोता आकर्षण का केन्द्र बना हुआ है। वेटू नाम के इस ताते के मालिक के मुताबिक इसे खरीदने के लिए लोग १ लाख २० हजार रुपए तक देने के लिए तैयार हैं। लेकिन परिवार के एक सदस्य के रुप में मान पाले वाले वेटू को बेचने के लिए परिवार और पड़ोस में रहने वाला कोई भी व्यक्ति तैयार नहीं है। लाट भैरव इलाके के पप्पू गुप्ता ने इस तोते को लगभग छ: साल पहले ८० रुपए में खरीदा था। इस बातूनी तोते ने धीरे-धीरे श्री गुप्ता के परिवार में अपनी विशेष जगह बना ली। इस दौरान घर में बोली जाने वाली भोजपुरी बोली उसकी जुबान में रच बस गई। श्री गुप्ता ने बताया कि यह तोता हमसे विशुद्ध भोजपुरी बोली में बात करता है। कभी-कभी बेटू गुस्से में चुनिंदा भोजपुरी गालियों की बौछार भी कर देता है।

अमेरिकी जनसंख्या ३० करोड़ होगी

जनसंख्या मामले में विश्व की मुख्य हस्तियों में एक ओर जहां प्रथम और द्वितीय श्रेणी में चीन और भारत का नाम प्रमुखता से शामिल रहता है वहीं अब इसके बाद के क्रम में अमेरिका का नाम भी शामिल होने वाला है । आंकड़े बताते हैं कि अमेरिका की जनसंख्या ३० करोड़ को पार करने पर वह जनसंख्या क्रम में तीसरे स्थान पर आ जाएगा ।

सोचने समझने की क्षमता लाखों वर्ष पुरानी

मनुष्य में १ लाख साल पहले अमूर्त चिंतन की क्षमता विकसित हो गई थी। ब्रिटिश वैज्ञानिक लारेंस बारहैम की जमैका स्थित पॉजिटिव टूरिज्म न्यूज में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार अवधारणात्मक चिंतन की क्षमता मनुष्य के विकास में एक लंबी छलाँग थी। अवधारणात्मक चिंतन का आशय एक चीज को दूसरे के माध्यम से पेश करना है।

दक्षिण जाम्बिया के टि्वन रिवर इलाके में मिले प्राचीन मानवों के इस्तेमाल में आने वाले औजारों और अन्य सामग्रियो के अध्ययन के बाद बारहैम इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि मनुष्य २ लाख साल पहले रंगो का प्रतीकात्मक उपयोग करने लगा था। जाँच के दौरान वहाँ खनिजों से बनाए गए विभिन्न रंग मिलें, जिन्हें देखकर ऐसा लगता है कि उनका इस्तेमाल शरीर को रंगने के लिए किया जाता था। डॉ. बारहैम ने कहा कि रंगों का प्रतीकात्मक इस्तेमाल एक अमूर्त चिंतन है और यह भाषा के बगैर नहीं हो सकता। इससे भाषा की उत्पत्ति कब हुई, इसके बारे में भी सही जानकारी मिल सकती है।

बारहैम पिछले १० सालों से दक्षिणी जाम्बिया के टि्वन रिवर इलाके में काम कर रहें हैं, जहाँ कई प्राचीन गुफाएँ है। करीब १ लाख ७० हजार से ३ लाख साल पहले यहाँ मानव जीवन था। लेकिन उनकी प्रजाति के बारे में जानकारी नहीं मिल सकी। यहाँ मिले हडि्डयों के टुकड़ों की जॉंच से यह अनुमान लगाया जा रहा है कि वह होमो हेडडेलबरजेंसिस प्रजाति के थे। इन्हें आधुनिक मानव का पूर्वज माना जाता है, जिनके पास हमारी तरह ही बड़ा मस्तिष्क था।

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पर्यावरण समाचार

पर्यावरण समाचार

वन अपराधों के लिए न्यायालयों के गठन की पहल

म.प्र. के वन मंत्री हिम्मत कोठारी ने भोपाल में वन संरक्षक सम्मेलन में कहा कि वन अपराधों से जुड़े मामलों के शीघ्र निराकरण और वन अपराधों पर प्रभावी कार्यवाही के लिए विशेष न्यायालयों की स्थापना के बारे में ठोस पहल की जायेगी। इस दो दिवसीय वन संरक्षक सम्मेलन में मुख्य रुप से वनों की सुरक्षा से जुड़े मुद्दों वनग्रामों के विकास, राजस्व एवं वनभूमि सीमांकन तथा वन व्यवस्थापन की प्रक्रिया और प्रगति तथा वन्य प्राणी प्रबंधक ने बारे में विस्तार से चर्चा हुई।

विस्तृत चर्चा के बाद इस सम्मेलन में ३१ प्रमुख अनुशंसाएं प्रस्तुत की गई है। इस अवसर पर प्रमुख सचिव वन अवनि वैश्य, महानिदेशक प्रशासन अकादमी माला श्रीवास्तव, प्रधान मुख्य वन संरक्षक मुहम्मद हाशिम, प्रधान मुख्य वनसंरक्षक (वन्यप्राणी) डॉ. पी.बी. गंगोपाध्याय, प्रबंध संचालक म.प्र. राज्य लघु वनोपज सहकारी संघ वी.आर. खरे और प्रबंध संचालक राज्य वन विभाग निगम आर.के. दुबे सहित अन्य अधिकारी उपस्थित थे।

बांस के फूल निकलने की समस्या के लिए ८५ करोड़

केन्द्र सरकार ने सात पूर्वोत्तर राज्यों में बांस के पेड़ों से फूल निकलने की समस्या से निपटने के लिए ८५ करोड़ रुपये की सहायता दी है। प्राकृतिक परिघटना को पूर्वोत्तर में महामारी का सबब माना जाता रहा है।

त्रिपुरा के प्रधान मुख्य वन संरक्षक आर.पी. तंगवान के अनुसार पर्यावरण एवं वन मंत्रालय में आवंटित राशि की पहली किश्त १७.८२ करोड़ रुपये जारी कर दी है। इस समस्या से निटपने के लिए पूर्वोत्तर राज्यों को कई योजनाओं पर अमल करना होगा। इस परियोजना के तहत सबसे अधिक मिजोरम को रकम मिलेगी। मिजोरम को २३ करोड़ रुपये मिलेंगे। उसके बाद त्रिपुरा को सबसे अधिक राशि दी जाएगी। उसे बांस से फूल निकलने की समस्या से निपटने के लिए २१ करोड़ रुपये दिए जाएंगेवहीं असम को इस रकम से १३ करोड़ रुपये मिलेंगे। मणिपुर को ९ करोड़ रुपये और नागालैंड को ८करोड़ रुपये दिए जाएंगे वहीं मेघालय और अरुणाचल प्रदेश को क्रमश: ६.८ करोड़ और १.५ करोड़ रुपये दिए जाएंगे।

श्री तंगवान ने कहा कि इतिहास को दोहराने से रोकने के लिए केंद्र सरकार ने यह कदम उठाया है। वन एवं पर्यावरण मंत्रालय और पूर्वोपत्तर राज्यों के प्रतिनिधियों ने इस समस्या से निपटने के लिए एक योजना चलाए जाने की सिफारिश की है।

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कविता - पेड़


पेड़

डॉ. रणजीत

मैघर में घुसता हूँ तो देखता हूँ कि

तुम मेरी छत पर लटके हुए हो

मेरे सिर को छाया देने वाले पत्थरो को थामे हुए

मै बाहर जाता हूँ

तुम उसे बन्द कर लेते हो,दरवाजे पर खड़े होकर

किसी और को बिना मेरी अनुमति के

घुसने नहीं देने के लिए।

मै आराम कर रहा होता हूँ

तो तुम मेरे बिस्तर के नीचे पड़े हुए चुपचाप

प्रतीक्षा करते रहते हो।

मै बैठता हूँ

तुम मुझे सहारा देते हो

अड़े रहते हो बीच में, कि कहीं

पृथ्वी मुझे खींचकर अपने पेट में न समेट ले।

मै खाना खाता हूँ

तो तुम मेरी थाली अपने सिर पर थामे

चुपचाप खड़े रहते हो सांस रोककर इस तरह कि कहीं छलक न जाय लबालब भरा हुआ

मेरा पानी का गिलास

मैं आइने में अपना चेहता देखता हॅंू

तो तुम उसकी ओट में खड़े होकर

एक टक निहारते रहते हो मुझे

तुम हर जगह मेरे साथ मौजूद रहते हो

नाहते हुए, कपड़े धोते हुए

यहाँ तक कि जब मैं अपने सब

खिड़की-दरवाजे बन्द कर कमरे की रोशनी बुझाने के लिए बिजली का स्विच दबाता हूँ

तो पाता हूँ कि तुम्हीं उस स्विच को

मेरे लिए दीवार के सीने से लगाते हुए हो

ओर जब मैं बत्ती गुल कर घुस जाता हूँ

अपनी प्रिया को गर्म बाहों में

तब भी तुम उपस्थित रहते हो

लेकिन चुपचाप अपनी उपस्थिति को झुठलाते हुए

मै हैरान हूँ यह देखकर कि दोस्त

किस कदर तुम मेरी जिन्दगी में रसे-बसे हो।

पर इस सारी अन्तरंगता के बावजूद

मै समझता रहा तुम्हें अपने इस्तेमाल की

एक वस्तु भर जब तक कि सुन्दरलाल बहुगुणा ने नहीं बताया मुझे कि तुम मुझे मिट्टी देते हो

मेरी हडि्डयां और मांस मेरी दुनिया, मेरा आकार !

तुम मुझे पानी देते हो; मेरा रक्त,

मेरे चेहरे की रौनक मेरी धरती की जड़ों तक

पहुँचता हुआ तुम्हारा अजस्र प्यार।

तुम मुझे हवा देते हो; मेरी प्राण वायु,

मेरा आकाश मेरा पूरा जीवन्त संसार !

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वन संपदा और इको टूरिज्म


वन संपदा और इको टूरिज्म

लक्ष्मण सिंह

भारतवर्ष में वृक्षों की पूजा तथा वन संरक्षण का महत्व आदिकाल से रहा है। पिछले कुछ दशकों से बढ़ती आबादी के कारण यह कम जरुर हुआ है, परंतु समाप्त नहीं हुआ है। प्राचीनकाल में वन संरक्षण का कार्य धर्म से जोड़ दिया गया था, और वन संरक्षण की जवाबदारी पूरे गाँव की अथवा शहर की होती थी। आज भी हम देखतेहैं कि ग्रामीण क्षेत्रों में स्थानीय देवता को वृक्ष के नीचे स्थापित किया जाता हैऔर उस स्थान के आसपास वृक्षों का जंगल खड़ा किया जाता हैतथा इसकी पूजा कर रक्षा की जाती है। इसका वर्णन में हमें कालिदास के ग्रंथ विक्रम ओवास्यम में मिलता है।

वनों का क्षेत्र घटते-घटते आज वनक्षेत्र केवल २० प्रतिशत ही रह गया है। लगभग २६ हजार वर्ग किलोमीटर का जंगल कट चुका है। आज के तथाकथित बुद्धिजीवी इसे भले ही विकास के लिए आवश्यक मानते हों, परंतु जहाँ विकास को आवश्यक मानने का सवाल है उसी के साथ यह भी आवश्यक है कि अगर एक पेड़ काटें तो उसी प्रजाति के लगभग १० पेड़ और लगाएँ जिससे कि वनों का घनत्व और बढ़ें।

आदिकाल से वन में रहने वाले वनक्षेत्र के आसपास रहने वाले लोग अपनी जीविका हेतु वनोपज पर निर्भर रहते आए हैं, परंतु वनक्षेत्र कम होने के कारण आज ये लोग गाँव से पलायन कर रोजगार पाने के लिए शहर की ओर जाने लगे हैं। वनरासियों के अलावा वन्य प्राणी भी वनक्षेत्र मे कमी होने के कारण शहर में प्रवेश कर रहे है। उल्लेखनीय है कि मुंबई में हमने हाल ही में देखा कि एक राष्ट्रीय वन उद्यान के क्षेत्र में अतिक्रमण के कारण तेंदुआ एक आवासीय कॉलोनी में प्रवेश कर गया और कुछ लोगों की जानें भी गयी। आजादी के बाद वन संरक्षण का कार्य शासकीय अधिकारियों के साथ मेंचला गया और वनों की व्यवस्था जितनी सुदृढ़ होनी चाहिए थी, नहीं हो पाई। क्योंकि जिन अधिकारियों का इस विषय से लगाव था, उन्होंने तो अच्छा कार्य किया, परंतु कुछ अधिकारी ऐसे भी रहे हैं कि जिनके कारण वनमाफिया सक्रिय हुआ और वनक्षेत्र कम होता गया, वनवासियों का पलायन भी साथ-साथ होता गया।

राजस्थान में तरुण भारत संघ द्वारा अलवर जिले मेंं राजेन्द्रसिंह राठौर द्वारा स्थापित संस्था तरुण भारत संघ के प्रयासों से आज जो लोग शहरों की ओर पलायन कर रहे थे, वे लौट रहे हैं। परंतु दुर्भाग्य यह ळै कि ऐसे संगठनों को प्रश्रय नहीं दिया जाता। आज रोजगार गारंटी योजना के नाम से ग्रामीण अंचलों में १०० दिन का रोजगार उपलब्ध कराने की महत्वाकांक्षी योजना बनाई गई है। अरबों रुपयों का बजट में प्रावधान भी किया गया हैं । इसके परिणाम इस योजना के क्रियान्वयन के पश्चात ही सामने आएँगे, परंतु इसमें भी, कहीं राजनीति छुपी हुई है ? जिन जिलों में यह योजना लागू की गई है वहाँ कुछ राजनीतिक छुटभैयों द्वारा यह कहा जा रहा है कि यह एक प्रमुख पार्टी की योजना है। इस घटिया सोच को बदलना पड़ेगा, क्योंकि यह देश की योजना है और देशवासियों गे लिए है।

हमने हाल ही में देखा मध्यप्रदेश, राजस्थान व उड़ीसा तथा अन्य राज्यों में भारी बाढ़ के कारण लोग प्रभावित हुए हैं तथा लाखों हैक्टेयर भूमि एवं वन प्रभावित हुए हैं। परंतु जो सहायता राशि इन राज्यों को दी गई है वह बहुत कम हैव बाढ़ पीड़ितों के साथ अन्याय है। अगर प्रभावित लोगों को पूरी सहायता नहीं दी गई तो पलायन और बढ़ेगा। देश में कई कारखाने भी लगाए गए। पर ये कारखाने स्थानीय रोजगार उपलब्ध कराने के लिए नहीं लगाए गए हैं। वहाँ प्राकृतिक सौंदर्य और कुटीर उद्योग के कारण वहाँ का एक भी व्यक्ति बेरोजगार नहीं है। क्योंकि विश्व के सारे लोग वहाँ प्राकृतिक सौंदर्य देखने जाते हैं और कुटीर उद्योग उन्हें पर्याप्त रोजगार उपलब्ध कराता है। हमारे यहाँ भी केरल तथा कुछ पूर्वोत्तर राज्यों में पर्यावरण पर्यअन इको टूरिज्म की बढ़ावा दिया जा रहा है।

वन संरक्षण के साथ-साथ वहाँ के स्थानीय लोगों को भी स्वरोजगार के अवसर मिले हैं। इस पर्यटक स्थल में स्थानीय लोगों को गाइड बनने का अवसर मिला है। स्थानीय हस्तशिल्प की वस्तुओं की बिक्री हो रही है तथा पर्यटकों के लिए होटल व छोटी-छोटी दुकानें भी खुली हैं, जो कि स्वरोजगार उपलब्ध करा रही हैं। अगर हम रोजगार गांरटी जैसी योजना की आधी राशि भी वन अभयारण्य व व पर्यावरण-पर्यटन (इको टूरिज्य) में खर्च करें तो एक रिपोर्ट के अनुसार हम देश में लगभग १० करोड़ से भी अधिक युवाओं को स्वरोजगार के अवसर उपलब्ध करा सकते हैं। और हमारे बेरोजगारों को किसी नेता या अधिकारी की स्वयं की नौकरी लगवाने के लिए सिफारिश नहीं लेना पड़ेगी।

इसलिए आवश्यक है कि जिन राज्यों में अधिक वनक्षेत्र हैं, वहाँ नर्सरी के माध्यम से, जल संग्रहण के माध्यम से, वन समितियों को उचित ऋण उपलबध कराकर और वन समितियों के अधिकारों का संरक्षण कर तथा वन माफिया से सख्ती बरतने के साथ, फलदार वृक्षों का वृक्षारोपण एवं दुर्लभ जड़ी-बूटियों का संरक्षण कर उनका उत्पादन बढ़ाकर बेरोजगारी दूर करने का लक्ष्य प्राप्त कर सकते हैं। आवश्यक है कि राजनेताओं व अधिकारियों की जो साँठगाँठ है उसे तोड़ना होगा और यह कार्य कोई राजनीतिक पार्टी नहीं कर सकती है, यह कार्य देश के प्रति हर नागरिक का है तथा मीडिया का है। राजनीतिक पाट्रियों व राजनेताओं ने देश कई वर्षो तक चला लिया, आज हम सब मिलकर जात-पाँत से ऊपर उठकर मजबूत भारतवर्ष का का निर्माण कर सकते है।

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ज्ञान विज्ञान - अक्तूबर 2006


कार्बन डाई ऑक्साइड को जल समाधि !

इस सदी के मध्य तक दुनिया की आबादी लगभग ९ अरब हो जाएगी। तब ऊर्जा की माँग आज के मुकाबले कम से कम दुगुनी हो जाएगी। ताप विद्युत गृहों से उत्सर्जित कार्बन डाईऑक्साइड ग्लोबल वॉर्मिंग में बेहताशा वृद्धि करते हुए दुनिया पर कहर बरपा देगी। इस स्थिति से बचने के लिए क्या किया जाए ?

वैज्ञानिकों का सुझाव है कि यह कार्बन डाईऑक्साइड आसमान में पहूँचे, इससे पहले इसे ठिकाने लगा दिया जाए तो यह ग्लोबल वॉर्मिंग को नहीं बढ़ा पाएगी। सवाल यह है कि यह ठिकाना कौन-सा हो! क्या अरबों टन कार्बन डाईऑक्साइउ को पंप द्वारा जमीन में गाड़ दिया जाए या समुद्र में डुबो दिया जाए? तकनीकी रुप से यह असंभव नहीं है, लेकिन जमीन अथवा समुद्र में से कुछ कार्बन डाईऑक्साइड फिर भी बाहर आकर आसमान का रुख कर सकती है, तो फिर क्या किया जाए?

अब कुछ वैज्ञानिकों ने इस समस्या का समाधान खोज निकालने का दावा किया है। इनका कहना है कि समुद्र की सही गहराई तथा उचित तलछट के रहते ऐसी आदर्श स्थिति निर्मित होती है, जिसमें एक बार कार्बन डाईऑक्साइड पहुँचा दी जाए तो वह पानी से बाहर नहीं आ सकती। इन वैज्ञानिकों के अनुसार समुद्री सतह से लगभग १०,००० फुट नीचे तापमान करीब ३५ डिग्री होता हैं । यहाँ की छिद्रिल तलछट में यदि तरलीकृत कार्बन डाईऑक्साइड को पंप द्वारा पहुँचा दिया जाए, तो वह वहीं कैद होकर रह जाएगी। कारण यह कि इस स्तर पर पानी का दबाव दतना होगा कि तरलीकृत कार्बन डाईऑक्साइउ का घनत्व पानी के घनतव से अधिक बना रहेगा। अधिक घनत्व के कारण यह सदा पानी के नीचे दबी रहेगी।

फिलहाल यह दूर की कौड़ी लगती है, लेकिन क्या पता कल शायद यही हमें ग्लोबल वॉर्मिंग के कहरे से बचा सके।

क्लोनिंग की सस्ती तकनीक

जॉर्ज क्लोनी- यह उस सूअर के बच्चे का नाम है, जो क्लोनिंग की नई तकनीक की बदौलत पैदा हुआ है। उसके ९ भाई-बहन और हैं, जो सभी क्लोनिंग से तैयार हुए हैं। यह नई तकनीक पूर्व में इस्तेमाल की जाने वाली तकनीक की अपेक्षा कहीं अधिक कारगर है और इस गुना सस्ती भी !


पहले जिस तकनीक का इस्तेमाल क्लोनिंग में किया जाता था उसमें सबसे पहले अंडाणु में से केन्द्रक को हटाना पड़ता था। केन्द्रक में ही सारी आनुवांशिक सूचना होती हैं । अंडाणु कोशिका में से केन्द्रक को हटाने के लिए एक इंजेक्शन की मदद से उसे खींचकर बाहर निकाल लिया जाता था। फिर उस कोशिका में शरीर की किसी अन्य कोशिका का केन्द्रक डाला जाता था।

डैनिश इंस्टीट्यूट ऑफ एग्रीकल्चर साइंजेस के गाबोर वायता द्वारा तैयार की गई तकनीक में थोड़ा अलग तरीका अपनाया जाता है। वे इसे हैंडमेड क्लोनिंग कहते हैं। इसमें वे एक निषेचित अंडाणु कोशिका लेकर उसे बीच से काटकर दो टुकड़े कर देते हैं। इन दोनों टुकड़ों पर कुछ रजक डाले जाते हैं। ये रंजक दर्शा देते हैं कि किस टुकड़े में केंद्रक है, किसमें नहीं। अब कंेद्रकहीन अर्द्ध कोशिका क्लोनिंग करना है। इस प्रकार प्राप्त कोशिका में कोशिका द्रव्य तो अंडाणु का होता है, मगर केंद्रक किसी अन्य कोशिका का होता है। अब इसे भ्रूण के रुप के विकसित होने देते हैं।

इस विधि से गत जून माह में एक सूअर जॉर्ज क्लोनी का जन्म हुआ। प्रयोग में ४७ क्लोन भ्रूण तैयार हुए थे। इनमें से १० सूअर बन चुके हैं। यानी इस तकनीक की सफलता दर २१ प्रतिशत है जबकि पूर्व तकनीक की सफलता दर मात्र ७ प्रतिशत हुआ करती थी।

हैंडसम क्लोन की एक विशेषता और है। इनमें भु्रण का विकास जोना पेल्यूसिडा नामक बाहरी झिल्ली के बगैर होता है। पुरानी तकनीक में भ्रुण की वृद्धि के समय यह झिल्ली सख्त हो जाती थी। शोधकर्ताओं का मत है कि जोना पेल्यूसिडा की अनुपस्थिति में भ्रुण की वृद्धि ज्यादा आसान होती होगी और शायद इसलिए इसकी सफलता दर ज्यादा है। वायदा का मानना है कि उनकी तकनीक क्लोनिंग में एक नया कदम है।

भेड़ें जानती हैं अपनी बीमारी का इलाज !

आम धारणा है कि भेड़ें मुर्ख होती हैं, शायद इसलिए कि एक को हाँको तो सारी चुपचाप उसके पीछे चल पड़ती हैं। मगर हाल ही में किए गए एक प्रयोग से पता चला है कि भेड़ें अपने पूर्व अनुभवों से सबक सीखने में सक्षम होती हैं और बीमार पड़ने पर अपना इलाज भी कर लेती हैं।

वैसे तो ऐसे किस्से काफी सुनने को मिलते हैं कि कुत्ते, बंदर वगैरह बीमार प़़डने पर ढूँढ-ढूँढकर कोई खास वनस्पति खा लेते हैं और ठीक हो जाते हैं। मगर ऊटा राज्य विश्वविद्यालय (अमेरिका) के जीव वैज्ञानिकों ने अपने प्रयोगों से सिद्ध कर दिया है कि भेड़ें भी सही दवा का चुनाव कर सकती हैं।

विश्वविद्यालय के युआन विलैल्बा और उनके साथियों ने कुछ भेड़ों को तीन अलग-अलग चीजें खाने को दीं। इनकी वजह से ये भेड़ें बीमार हो गई। अब उन्हें ऐसी चीजें खाने को दी गई जिनसे वे चंगी हो सकती थीं - सोडियम बेटोनाइट या पोलीएथिलीन ग्लायकॉल या डाईकैल्शियम फॉस्फेट। साथ में भेड़ों को एक समूह ऐसा भी था, जिसे फौरन औषधि नहीं दी गई, बल्कि तब दी गई जब उनकी तकलीफ कम हो चुकी थी। यह तो था प्रयोग का पहला हिस्सा। अपेक्षा यह थी कि इस अनुभव से सीख पाएँगी कि उन्हें कोई तकलीफदेह चीज खाने के बाद किस चीज से राहत मिलती है। दूसरी ओर, दूसरे समूह की भेड़ंे यह बात नहीं सीखेंगी कि उन्हें किस चीज से राहत मिल सकती है। क्योंकि उन्हें तो हालत सुधरने के बाद वह चीज खाने को मिली थी। अब प्रयोग का दूसरा हिस्सा शुरु हुआ। इस हिस्से में सारी भेड़ों को वे चीजें खाने को दी गइंर्, जिनमें से किसी एक से उन्हें राहत मिली थी।

प्रयोग से देखा गया कि उन भेड़ों ने राहतदायक चीज को चुन लिया, जिन्होंनें पहले हिस्से में यह सीखा था कि किस चीज से राहत मिलती है। 'एनिमल बिहेवियर' नामक पत्रिका में प्रकाशित अपने शोधपत्र में विलेल्बा व उनके साथियों ने बताया कि इन भेड़ों को यह बात कम से कम पाँच महीनों तक तो याद रही थी। अन्य भेड़ों ने राहतदायक पदार्थोंा में से किसी के प्रति कोई विशेष रुझान नहीं दर्शाया।


विलेल्बा का कहना है कि यदि मुर्ख होने का मतलब यह है कि आप अपने अतीत के अनुभवों से और उनके परिणामों से कुछ भी सीखने में असमर्थ हैं, तो इस मायने में भेड़ें मुर्ख नहीं हैं। भेड़चाल मुहावरा बदलने का वक्त आ गया लगता है..। लेकिन यहाँ एक प्रश्न यह उठता है कि यदि भेड़ें इतनी ही समझदार हैं तो फिर उन्होंने दोबारा वह चीज खाई ही क्यों, जिससे पिछली बार उन्हें तकलीफ हुई थी !तो चलिए फिलहाल हम मुहावरे को नहीं बदलते।

शब्द को लिपिबद्ध करने का पहला प्रयास

सभ्यता विकास और इंसान को आधुनिक बनाने में लिपि की महत्वपूर्ण भूमिका रहीहै । आधुनिक दुनिया में अपनी बात को लिपिबद्ध करने का पहला सफल प्रयास मैक्सिको की पूर्व-कोलंबियाई सभ्यता ने किया था। नृविज्ञानियों ने साइंस पत्रिका के विज्ञानियों के हवाले से मैक्सिको के वेराक्रूज प्रांत से मिले शिलालेख को आधुनिक दुनिया का प्राचीनतम लेख बताया है।

नृविज्ञानियों का मानना है कि पत्थर पर संकेतों जैसे दिखने वाले ये शब्द दो हजार वर्षो से भी पहले उकेरे गए होंगे। इस प्राचीन शिलालेख की खोज से जुड़े विज्ञानियों के अनुसार यह आधुनिक लेखन के अब तक मिले प्रमाणों में सबसे पुराना है। विज्ञानियों ने इसे कैस्काजाल ब्लॉक का नाम दिया है। प्रारंभिक पड़ताल के बाद इसे ईसा पूर्व की पहली सहस्त्राब्दी का बताया जा रहा है। यह शिलालेख मीजोअमेरिका इलाके में विकसित हुई ओल्मेक सभ्यता द्वारा बनाया गया था। उत्तरी मैक्सिको और फॉसेका खाड़ी के बीच स्थित इस क्षेत्र पर ही आज मैक्सिको, ग्वांतेमाला, ब्राजील, एल सल्वाडोर और पश्चिमी होंडूरास का अधिकांश भाग मौजूद है। उस समय यह इलाका एजटेक्स, मायाज और उनकी पूर्ववर्ती सभ्यताओं का घर हुआ करता था।

३६ सेंटीमीटर लंबे और २ सेंटीमीटर चौड़े इस शिलालेख का वजन १२ किलो है। इस पर कुल ६२ प्रकार के संकेत बने हुए हैं। इनमें से कुछ संकेतों को ३-४ बार तक दोहराया भी गया है। यह शिलालेख ९० के दशक में सैन लारेंजो के पास सड़क बनाने के लिए की जा रही खुदाई के दौरान मिला था। हालाँकि उस समय इसके पुरातात्विक महत्व को नहीं समझा जा सका था। इसकी कीमत सबसे पहले मैक्सिको के दो पुरातत्वविदों कार्मेन रॉड्रिग्स और पेंसियासनो ऑर्टिज ने पहचानी। इसके बाद इसकी उम्र का पता लगाने का काम शुरु किया गया। आखिरकार दुनियाभर के विशेषज्ञों ने इसे आधुनिक दुनिया के लेखन के सबसे पुराने प्रमाण के तौर पर स्वीकार कर लियाहैं ।

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पश्चिमी मीडिया के दुष्प्रचार का शिकार भारत


पश्चिमी मीडिया के दुष्प्रचार का शिकार भारत

डेविड गोस्लिंग

पिछले महीनों में ब्रिटेन से निकलने वाले समाचार पत्रों न्यू सांइटिस्ट और न्यू स्टेट्समेन ने भारत के संबंध में व्याप्त रुढ़िबद्ध धारणा को चुनौती देते हुए विशेषांक छापे हैं।

जनवरी में न्यू स्टेट्समेन ने अपने ग्राहकों को यह प्रस्ताव दिया कि आपको नई महाशक्ति के आर्थिक उछाल से लेकर सेक्स क्रांति तक जानने की आवश्यकता हैं इसके पूर्व न्यू साइंटिस्ट ने अधिक मर्यादित तरीके से यह बताने परमाणु शक्ति व सेटेलाईट जैसी अत्याधुनिक तकनीके उपलब्ध हैं, बिल्कि वह उनका उपयोग अपने समाज के निर्धनतम लोगों के विकास के लिए भी कर रहा हैं। उसने इस बात की ओर भी इंगित किया कि भारत के राष्ट्रपति जो कि एक मुस्लिम है, अंतरिक्ष और परमाणु विज्ञान दोनों विषयों के विशेषज्ञ भी हैं।

इस तरह के प्रकाशनों ने भारत से संबंधित उस रुढ़िबद्ध धारणा को चुनौती दी है जिसके अनुसार भारत एक पिछड़ा, अंधविश्वासी एवं गरीबी आदि व्याधियों से ग्रसित राष्ट्र है। परन्तु हमारे पास इस बात के वास्तविक प्रमाण मौजूद हैं कि किस प्रकार नई तकनीक दूरस्थ समुदायों को बजली, प्राथमिक शिक्षा, इन्टरनेट इत्यादि उपलब्ध करवा रही हैं । परन्तु विश्व के कई हिस्सों खासकर गरीब देशों में जो कुछ घटित हो रहा है उसकी एक संतुलित तस्वीर प्रस्तुत करना अभी भी एक गतिशील संघर्ष ही है।

कुछ दिनों पूर्व दी इंडिपेंडेंट ने एक बड़ा लेख छापा था जिसमें यह दावा किया गया था कि भारत को किसी भी यूरोपियन देश की बनिस्बत अत्यधिक ग्रीन हाऊस गैसों के उत्सर्जन के लिए दोषी ठहराया जा सकता है। इस वक्तव्य को अगर इसके वास्तविक स्वरुप में ग्रहण करें तो यह वक्तव्य बहुत ही बेचैन कर देने वाला प्रतीत होता हैं। पर गौर करने पर यह तर्क ही ढेर हो जाता है। तो मैंने समाचार पत्र को इस बिन्दु की ओर इशारा करते हुए लिखा, एक अरब से ज्यादा की जनसंख्या वाले भारत की तुलना किसी एक यूरोपीय देश से नहीं बल्कि