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रविवार, 29 अगस्त 2010

१३ मौसम

धरती क्यों सूखी, बारिश क्यों रूठी ?
श्वेता आनंद

मानसून का लगातार अनियमित होना भविष्य के लिए खतरे की घंटी है । भूजल का कम से कम दोहन और पानी की अधिक खपत करने वाली फसलों की बुआई कम करके ही हम स्वयं को बचा सकते हैं ।
देश में पड़ रही भीषण गर्मी और बारिश में होने वाली देरी से सभी परेशान है और देवताआें को मनाने का सिलसिला भी शुरू हो चुका है । बारिश लोगों के लिए उत्सव और खुशी का माहौल लेकर आती है । यह देश के लिए किसी वरदान से कम नहींहोती ।
मानसून का खेती के संदर्भ में प्रभाव नेशनल अकेडमी ऑफ एग्रीकलचर रिसर्च मेनेजमेंट, हेदराबाद के निदेशक डॉ.प्रमोद कुमार जोशी कहते हैंकि कृषि आज भी हमारे देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में १५.७ प्रतिशत का एक बड़ा हिस्सा देती है । भारत की लगभग आधी आबादी आज भी खेती पर ही निर्भर है । अभी मानसून के दगा देने से बाढ़, सूखा अथवा अपर्याप्त् मदद की वजह से खेती आजीविका के लिए उतनी आकर्षक नहीं रह गई है ।
भारत की १४ करोड़ हेक्टेयर कृषि भूमि में से ८ करोड़ हेक्टेयर बारिश पर ही निर्भर, लगभग ६० प्रतिशत खेती कृत्रिम रूप से सिंचित भूमि के सहारे हैं जो खेत में उपलब्ध भूजल पर ही निर्भर करता है, न कि नहरों या बाँधों पर (लेकिन यह भूजल भी उसी समय भरेगा जब अच्छी बारिश होगी) । ऐसी धारणा बनी हुई है कि पंजाब, हरियाणा और पश्चिम उत्तरप्रदेश का हरित और उपजाऊ क्षेत्र बाँधों के पानी के कारण है, जबकि ऐसा नहीं है, यह इलाका अधिकतर भूजल द्वारा ही सिंचित है ।
वरिष्ठ पर्यावरणकर्मी अनुपम मिश्र कहते हैं, हजारों वर्षोंा से भारत के किसान बारिश पर ही निर्भर रहते आए हैं, सो वे जानते हैं कि परिस्थिति का सामना कैसे किया जाये, कौन सी फसल ली जाए, किसी जगह ली जाए, वर्ष के किस समय ली जाए आदि । हम ज्ञान उनका परम्परागत ज्ञान है, दुर्भाग्य से आज की हालत यह हो गई है कि इन किसानों की जरूरत को सरकारों और बाजार की शक्तियों द्वारा मिल-जुलकर नियंत्रित करने की कोशिश की जा रही है ।
भारत में वर्षाकाल सामान्यतौर पर जून से सितम्बर तक होता है । देश में वर्षा बहुत अधिक भिन्नता लिए होती है । जैसे राजस्थान के कई भागों में बारिश का वार्षिक औसत सिर्फ १०० मि.मी. है तो दूसरी तरफ मेघालय में अधिकतम ११,००० मि.मी. बारिश भी हो जाती है । जाहिर है कि तर्कसंगत रूप से भिन्नता लिए हुए फसलें उगाना ही सही रहेगा ।
उत्तराखण्ड में बड़े बांधों के निर्माण के खिलाफ आंदोलन चलाने वाले विमलभाई कहते हैं, हम लोग प्रकृति द्वारा मानव प्रजाति को विभिन्न प्रकार के भोज्य देने की क्षमता के प्रति सम्मान नहीं दिखा रहे, जबकि प्रकृति अलग-अलग मौसम और क्षेत्र के अनुसार अनाज, सब्जियाँ और फल उत्पादन करने में सक्षम है । हम लोग ठण्ड के दिनों में आम की माँग करते हैं और गर्मियों मे संतरों की ।
खाद्य पदार्थोंा की विविधता में कमी तथा किसानों द्वारा उगाई जाने वाली फसलों के बाजारीकरण से विजय जड़धारी भी बहुत परेशान हैं । उनके बीज बचाआें आंदोलन ने उत्तराखंड में बेहतरीन काम किया है और इस सत्याग्रही आंदोलन के कारण कई खाद्य फसलें, सब्जियों, बीजों, पेड़ों और मसालों को भी संरक्षित करने में सफलता हासिल हुई हे। जिन दिनों भारत में कृषि परम्परागत और मुख्य व्यवसाय माना जाता था उस समय प्रमुख भोज्य पदार्थ रागी ज्वार और बाजरा ही थे, जो बेहद पौष्टिक और सूखा प्रतिरोधी भी थे । लेकिन धीरे-धीरे इस भोजन को गँवार का भोजन (जिसे गाँव वाले खाते हैं ) कहकर दुष्परिणाम किया जाने लगा और उसकी जगह ले ली, चावल और गेहूँ ने जो खाने में स्वादिष्ट है, छूने में कोमल लगते हैं और अमीरों की आँखों को भाते हैं । इसका प्रचार होने के कारण लोग इसे अधिक खाने लगे जिससे इन खाद्य जिंसों का बड़ा बाजार तैयार हो गया । मजबूरी में किसान अधिक पानी पर आधारित तथा रासायनिक उर्वरकों से भरपूर गेहूं-चावल की फसलें उगाने लगे ।
प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह ने ग्रामीण भारत की अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए बनाये गए कार्यक्रम भारत निर्माण को प्रचारित करते हुए अक्सर इस बात पर जोर दिया है कि कृषि उत्पादन वृद्धि के लिए गाँवोंमें मानव निर्मित सिंचाई प्रणाली को बढ़ावा दिया
जाएगा । जल भण्डारण और बड़ी-बड़ी सिंचाई परियोजनाएं बीते वर्षोंा के दौरान लगातार असफल सिद्ध हुई हैं । उनसे होने वाली सिंचाई घट रही है, जिससे खेती के कामों का दायरा घट रहा है । एक तरफ बड़े बाँधों और परियोजनाआें के कारण आम जनता के कर (टेक्स) का पैरा भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता
है, वहीं इनके कारण सिंचित जमीन के बड़े हिस्से में भी प्रतिवर्ष कमी आ रही है । उपरोक्त तथ्य प्रसिद्ध पर्यावरणविद् हिमांशु ठक्कर द्वारा केन्द्रीय कृषि मंत्रालय द्वारा सूचना के अधिकार तहत माँगी गई जानकारी के दस्तावेजों में सामने आया है ।
हिमांशु ठक्कर का कहना है कि अधिकारिक आँकड़ों के अनुसार भारत में पिछले १५ वर्ष में बड़ी और मझोले आकार की सिंचाई परियोजनाआें पर एक लाख बयालीस हजार करोड़ रूपया खर्च किया जा चुका है, लेकिन सिंचित भूमि के क्षेत्रफल में कोई बढ़ोत्तरी नहीं हो सकी है, जबकि भारत निर्माण के प्रमुख लक्ष्यों में से एक है सिंचित भूमि को अधिक से अधिक बढ़ाना । यहाँ तक कि इसके पहले चलने वाला कार्यक्रम, जिसे एक्सेलेरेटेड ईरिगेशन बेनेफिट्स प्रोग्राम कहा जाता था, उसमें भी सिंचित भूमि के रकबे में कोई खास बढ़ोतरी नहीं हुई थी । बल्कि इसके उलट बड़ी सिंचाई परियोजनाआें के कारण सिंचित भूमि के क्षेत्र में२४ लाख हेक्टेयर की कमी आ गई थी ।
अनुपम मिश्र कहते हैं कि कम से कम पानी एक ऐसा क्षेत्र है, जिसमें भारत कतई गरीब नहीं है, राजस्थान के कई इलाकों में लोग आज भी परम्परागत तरीके से बारिश का पानी एकत्रित करते हैं, और कम से कम पानी में भी कई प्रकार की फसलें उगा लेते हैं ।
पानी के भारी दुरूपयोग और कुप्रबन्धन के बारे में खाद्य और कृषि नीति विशेषज्ञ देविन्दर शर्मा कहते हैंकि राजस्थान के कुछ शहरों में बड़े-बड़े गोल्फ कोर्स, होटल बडे भवन गन्ने के खेत और संगमरमर की खदानों में पानी की भारी बरबादी की जा रही है । इन सभी की वजह से भूजल तेजी से नीचे जा रहा है । उदाहरण के लिए एक १८ होल वाले गोल्फ के मैदान को हराभरा रखने के लिए जितना साफ पानी उपयोग में लिया जाता है, उतने मे ं२०,००० घरों की पानी की जरूरत पूरी की जा सकती है ।
भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) मानसूनकी भविष्यवाणी सही तरीके से नहीं बता सक ने की वजह से लोगों के गुस्से का केन्द्र बना हुआ है । विज्ञान लेखक पल्लव बागला कहते हैं कि भारत में १९९४ में भीषण बाढ़ आई थी, और १९८७, २००२, २००४ और २००९ में सूखा पड़ा था, जबकि मौसम विभाग ने २०१० में भी सामान्य मानसून की भविष्यवाणी की है । श्री बागला कहते हैं कि इतने महत्वपूर्ण विभाग को किसानों तथा नीति निर्माताआें को मौसम के बारे में एकदम सटीक जानकारी देने में सक्षम होना चाहिए, ताकि वे अच्छी अथवा बुरी से बुरी स्थिति के लिए भी खुद को तैयार कर सकें । पिछले वर्ष भी सामान्य मानसून की घोषणा के बावजूद देश में बारिश औसतन २२ प्रतिशत कम हुई, जिसका सीधा असर चावल की कमी के रूप में हुआ तथा खाद्य पदार्थोंा की मुद्रास्फीति बढ़ती चली गई । ऐसी स्थिति में गरीब किसान सबसे अधिक प्रभावित होता है ।
अच्छी फसल और बारिश की सटीक भविष्यवाणी के बीच सम्बन्ध को स्पष्ट करते हुए राष्ट्रीय जलवायु केन्द्र के निदेशक डी.एस.पई कहते हैंकि यदि अगले दिन बारिश होने की सटीक सम्भावना व्यक्त की जायेगी तो किसान खेतों में सिंचाई नहीं करेगा वरना उसके खेतों में अधिक पानी जमा हो सकता है, जो फसल के लिए नुकसानदायक होगा । मौसम विभाग आम जनता से मौसम सम्बन्धी महत्वपूर्ण आँकड़े छिपाकर रखता है । यदि मौसम विभाग विभिन्न जिलों और तहसीलों के मौसम तथा बारिश सम्बन्धी आँकड़ों का सतत अध्ययन करता रहता तो सूरत में २००६, उड़ीसा में २००८ तथा दामोदर घाटी में २००९ की बाढ़ से होने वाली जन-धन की हानि को रोका जा सकता था ।
सन् २००९ में नासा की एक रिपोर्ट के अनुसार देश के प्रमुख अन्न उत्पादन क्षेत्र, पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तरप्रदेश में भूजल की स्थिति बेहद खराब हो चुकी है । पानी के भारी दुरूपयोग और तथाकथित विकास के नाम पर भवन निर्माण गतिविधियों के चलते जमीन का अधिकर पानी सोखा जा चुका है, जिसे जल्दी से रिचार्ज कर पाना अब असम्भव है । क्योंकि भूजल रिचार्ज करने के लिये प्रकृति की अपनी एक समय सीमा होती है । हमें उस प्राकृतिक प्रकिया का सम्मान करना चाहिए और भूजल को उपयोग सीमित करने के साथ-साथ भूजल पुनर्भरण पर विशेष ध्यान देना चाहिए ।
मानसून को दोष देने की बजाय हमें अपने अन्दर झाँककर देखना चाहिए, कि हम प्रकृति के कितने बड़े दोषी हैं । स्थिति में परिवर्तन लाने के लिए हमें प्रकृति के साथ चलना होगा, जब हम उसे इतना बिगाड़ चुके हैं तो उसे सुधारने के लिए एक निश्चित वक्त तो देना ही होगा । बात-बात पर मानसून को दोष देने पर बात नहीं बनेगी ।
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शनिवार, 19 सितंबर 2009

१० मौसम

सज गया मौसम का बाजार
सुश्री अर्चना भट्ट
मौसम की भविष्यवाणी का निजीकरण भारत की बाजारवादी अर्थव्यवस्था की नवीनतम घटना है । इसके दोनों ही पक्ष हैं। भारतीय टेलीविजन पर जिस अंदाज से अब मौसम की जानकारी दी जा रही है वह व्यावसायिकता के नए युग की ओर इशारा कर रहा है । परंतु इसी के समानांतर भारतीय मौसम विभाग का सक्रिय होना जेठ में ठंडी बयार की अनुभूति दे रहा है । पुणे स्थित भारतीय मौसम विभाग (आई.एम.डी.) ने जब १७ अप्रैल ०९ को मानूसन के दौरान कम वर्षा का अंदाजा नहीं था । भविष्यवाणी के अनुसार सामान्य वर्षा की ९६ प्रतिशत होनी थी परंतु तपती जून में यह मात्र ५७ प्रतिशत ही हुई जो कि जुन १९२६ के बाद सबसे कम थी २४ जुन को आईएमडी इस आंकडे को ९३ प्रतिशत ले गया । परंतु मई में हुई दो घटनाआें ने मौसम विभाग को अचंभित कर दिया । ये थीं बंगाल में आया आईला तूफान और पश्चिम विक्षोभ की वजह से देश के उत्तरी भाग में हुई बरसात जिसकी वजह से मौसम ठंडा हो गया और उसने मानसून को कमजोर कर दिया। प्रश्न उठता है कि ऐतिहासिक आंकड़ो पर आधारित भविष्यवाणी का वर्तमान में कोई अर्थ बचा है ? शोध बताते हैं कि जून और जुलाई में वर्षा में वर्षा में कमी आई है । पुणे स्थित आईएमडी के भविष्यवाणी विभाग के प्रभारी डी.एस.पाई का कहना है कि हम १० डायनामिकल मॉडल्स के बहुमुखी स्वरूप के अंतर्गत मौसम की जानकारी इकट्ठी करते हैं । यदि हम इनके परिणामों के प्रति आवश्वस्त नहीं हो पाते तो पुराने सांख्यकीय मॉडल पर समझौता कर लेते है । डायनामिक मॉडल के अंतर्गत बादलों की प्रवृत्ति और आर्द्रता पर नजर रखी जाती है । वहीं दुसरी ओर आईएमडी के अनेक वैज्ञानिक उपरोक्त प्रणाली पर भरोसा नहीं करते क्योंकि उनके अनुसार यह भारत की परिस्थितियों पर आधारित नहीं है । आईएमडी के वैज्ञानिकों की एक पीड़ा यह भी भारत में नेशनल सेंटर फॉर मीडियम रेंज फोरकास्टिंग, अनेक आई.आई.टी., इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ ट्राफिकल मेट्रोलाजी जैसे मौसम शोध संस्थानों और आईएमडी के मध्य कोई सामंजस्य ही नहीं है । आईएमडी स्वयं अपने द्वारा सरकार को कृषि रणनीति बनाने में दी जाने वाली मौसमी भविष्यवाणियों से बहुत संतुष्ट नहीं है । परंतु वह अपनी मध्य और लघु अवधि भविष्यवाणियां क्रमश: पांच व एक दिन अग्रिम, के मामले में विश्वास से भरा हुआ है। हवा अब किस ओर बहेगी यह जानना अब आईएमडी का विशेषाधिकार नहीं रहा है । पिछले ६ वर्षो में मौसम की भविष्यवाणी करने वाली अनेक कंपनियां अस्तित्व में आ गई हैं जो प्रतिदिन, प्रतिघंटे ओर प्रति १० मिनट फर भविष्यवाणियां कर रही है । दिल्ली में ३० मई ०९ को एकाएक आई वर्षा और तूफान के कारण तापमान में आई कमी से एयरकंडीशनरों की आवश्यकता में कमी होने की वजह से विद्युत वितरण कंपनियों ने उस दिन की विद्युत आपूर्ति में कमी कर दी थी । नई दिल्ली पावर लि. (एनडीपीएल) जो कि टाटा का संयुक्त उपक्रम है, के पास यदि अग्रिम सूचना नहीं होती तो उन्हें ५ से ८ लाख के मध्य आर्थिक हानि उठानी पड़ सकती थी । विद्युत वितरण कंपनियां, उत्पादन कंपियों से एक दिन अग्रिम विद़्युत खरीदती हैं । मौसम में एकाएक आया परिवर्तन उनके इस गणित को बिगाड़ सकता है । दिल्ली स्थित स्कायमेक सप्लाईज एनडीपीएल और रिलायन्स इन्फ्रास्ट्रक्चर लि. को उनकी जरूरत के अनुरूप मौसम संबंधी सेवाएं प्रदान करती है । २००३ में उसने १८ लाख रूपये के कारोबार से व्यापार प्रारंभ किया था जो अब बढ़कर १.४ करोड़ तक पहुंच गया है । कानपुर स्थित वेदर रिस्क मेनेजमेंट के भी इसी तरह की सेवाएं उपलब्ध करवाती है । यह कंपनी बीमा कंपनियों को कृषि आधारित बीमा पॉलिसी के जोखिम निर्धारण की गणना में सहायता करती है । स्कायमेट तो स्वयं को परिपूर्ण मौसम भंडार की संज्ञा देती है । इस व्यापार का हानि अथवा लाभ इस बात पर निर्भर करता है कि कंपनी कितनी सटीक जानकारी उपलब्ध करवा पाती है । खरी न उतरने वाली प्रत्येक भविष्यवाणी के लिए कंपनी को दंडित किया जाता है । उदाहरण के लिए तापमान के मामले में केवल एक डिग्री से तक की गलती की अनुमति है । एमडीपीएल के महाप्रबंधक जयंत चटर्जी का कहना है कि सटीक भविष्यवाणी संबंधी आकड़ों के लिए निजी मौसम कंपनियों को किए जा रहे भुगतान क माध्यम से हम २० लाख रूपए तक बचा पाते हैं । अब विद्युत का क्रय मूल्य मांग के स्वरूप पर आधारित होता है जो कि १.५० पैसे प्रति यूनिट से लेकर १५ रूपए प्रति यूनिट के मध्य तक कहीं भी हो सकता है । २८ से ३० मई मध्य दिल्लली का तापमान ४१ डिग्री सेल्सियस से घटकर ३५ डिग्री सेल्सियस पर आ गया था जिसके परिणामस्वरूप विद्युत दर ५.५० प्रति यूनिट से घटकर १.०८ पैसे प्रति यूनिट पर आ गई है । सटिक अग्रिम चेतावनी मिलने से आपात स्थिति से निपटने में भी मदद मिलती है । सार्वजनिक कंपनी पॉवरग्रिड कॉपरेशेन ने गत सर्दियों में स्कायमेट से प्राप्त् सूचनाआें के आधार पर धुंध के प्रभावों की अग्रिम गणना कर एक हेलीकॉप्टर किराये से लेकर अपनी वितरण की लाइनों से धुंध और प्रदूषण की सच्चई जिससे कि वितरण लाईनों में खराबी नहंी आई । तेल शोधन के कार्य में भी ये कंपनियां अत्यंत सहायक होती हैं क्योंकि ये समुद्री तूफान के दौरान तेल शोधन का कार्य रोकना पड़ता है अन्यथा कुएं में आग लग सकती है । इसी तरह फसल बीमा भी मौसम पर अत्यधिक निर्भर है । ये नई कंपनियां पूर्णतया स्वचालित मौसम केन्द्रों के माध्यम से संचालित होती है । यंत्र चौबीस घंटे, तापमान आर्द्रता, हवा की रफ्तार और दिश और वर्षा प्रति घंटे गणना कर सेटेलाईट या केबल के माध्यम से कंपनियों को पहुंचाते रहते हैं । नेशनल कोलेटरल मेनेजमेंट सर्विसेस लि. ने अनेक बैंकों की सहायता से २००४ में अपना कार्य १६ राज्यों में ४०० पूर्णतया स्वचालित मौसम केंद्रों से प्रारंभ किया । यी १००० रूपए से १०००० रूपए प्रति माह तक का ाुल्क लेती है । भारत में हइस समय १२०० ० निजी मौसम केंद्र कार्यरत् हैं जिनके निकट भविष्य में और वृद्धि की संभावना है । महाराष्ट्र के पूना, सांगली, नासिक क्षेत्र के अंगरू उत्पादक ृकषक आईसीआईसीआई बैंक के ग्राहक है। बैंक अपने इन ग्राहकों को मौसम संबंधी जानकारी उपलब्ध करवाती है क्योंकि किसान अभी भी मौसम कंपनियों से सीधे ग्राहक नहीं है । वैसे इन मौसम भविष्यवाणी कपंनियों के सबसे बड़े ग्राहक मीडिया समूह हैं । इसमें टेलीविजन और प्रिंट दोनों ही शामिल हैं । आज इस क्षेत्र में होने वाले व्यापार का ७० प्रतिशत यहीं से प्राप्त् होता है । मीडिया कंपनियों का कहना है कि उन्हें बजाए भारतीय मौसम विभाग के निजी कंपनियों के साथ ज्यादा साहूलियत महसूस होती है । भारतीय मौसम विभाग के आधुनिकीकरण के लिए भी केन्द्र ने ९५० करोड़ की योजना को स्वीकृति दे दी है । इसके माध्यम से अब तक १२५ नए स्वचालित केंद्र स्थापित भी हो चुके हैं । मौसम विभाग इन्हें पर्याप्त् नहीं मानता । विभाग का मानना है कि प्रत्येक जिले में कम से कम चार केंद्र होना चाहिए अतएव देश में २५०० केन्द्रों की आवश्यकता है । अमेरिका में १९८० के दशक के प्रारंभ में इन सेवाआें के निजीकरण की शुरूआत हुई । निजीकरण के संबंध में भारतीय मौसम विभाग का कहना है कि मौसम की भविष्यवाणी के लिए वर्तमाल अवलोकन के साथ ही साथ ऐतिहासिक आंकड़ों की भी आवश्यकता है । अधिकांश निजी सेवा प्रदाताआें के पास इनका अभाव है । उनका यह भी कहना है कि सामान्य भविष्यवाणी मौसम विभाग की जिम्मेदारी है परंतु निजी जरूरतों पर आधारित भविष्यवाणी आंकड़े तो निजी क्षेत्र ही बेहतर उपलब्ध करवा सकते हैं । निजी क्षेत्र के हस्तक्षेप से आईएमडी को सेवाआें की गुणवत्ता बढ़ाने पर विवश कर दिया है । वहंी विश्व मौसम संगठन का मानना है कि कोई एक सरकार या एजेंसी अकेले के दम पर यह कार्य नहीं कर सकती । राष्ट्रीय मौसम भविष्यवाणी की अनिवार्यता को इसलिए नहीं नकारा जा सकता क्योंकि भारत के करोड़ों किसानों को आज मौसम की भविष्यवाणी से कही अधिक आवश्यकता है । ***
करोंड़ो पौधे रोपे फिर भी हरियाली की रफ्तार कम
पिछले महीने देश भर में वन महोत्सव के दौरान कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक और गांधीनगर से गुवाहाटी तक करोड़ों पौधे लगाए गए हर साल यही होता है, फिर भी हरियाली उस रफ्तार से नहीं बढ़ रही है, जिससे हर साल वन संपदा को हो रहे नुकसान की भरपाई की जा सके । नतीजा सामने है । बीस साल पहले वन क्षेत्र को देश के कुल भू-भाग का ३३ फीसदी तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया था, जिसे आज तक पूरा नहीं किया जा सका है । मौजूदा आंकड़ों के अनुसार इस समय देश के कुल भू-भाग का २० प्रतिशत ही वनाच्छादित है । जबकि पर्यावरण संतुलन के लिए ३५ फीसदी वन क्षेत्र जरूरी है । वन क्षेत्र के घटने के कारण पारिस्थितिकी असंतुलन पैदा हुआ है, जिसकी वजह से सूखा, बाढ़ और भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाआें में इजाफा हुआ है । वन क्षेत्र में कमी आने से कई जानवरोंं के अस्तित्व को खतरा पैदा हो गया है । पिछली सदी की शुरूआत में देश में ५० हजार बाघ थे । अब उनकी संख्या घटकर १५०० से भी कम रह गई है । यही हाल हाथियों का भी है । कई ऐसे भी जीव-जंतु हैं, जो हर साल खामोश मौत मर रहे हैं । खाद्यान्न श्रृंखला की इन महत्वपूर्ण कड़ियों के खत्म होने से पारस्थितिकी असंतुलन की समस्या गंभीर है । पर्यावरण को होने वाले इन्हीं नुकसानों को कम करने के लिए देश में १९८८ में राष्ट्रीय वन नीति बनाई गई थी ।

गुरुवार, 19 फ़रवरी 2009

५ मौसम

जलवायु परिवर्तन एक नयी चुनौती
जितेन्द्र द्विवेदी
अन्तराष्ट्रीय मंचों पर प्राय: विकसित और विकासशील देशों के बीच मूलत: वाद-विवाद का विषय बनकर रह गयी, जलवायु-परिवर्तन की चुनौती भले ही रोजमर्रा की आजीविका के संघर्ष एवं व्यस्त दिनचर्या मेंलीन लोगों के लिए महज खबर या अकादमिक विषय सामग्री मात्र ही हो, सच्चई तो यह है कि हवा, पानी, वाली इस समस्या से देर-सबेर, कम-ज्यादा हम सभी का जीवन प्रभावित होता है । भारत में मौसम बदलाव के एक प्रमुख प्रभाव के रूप में बाढ व सूखे को देखा जा सकता है । देश का बहुत बड़ा क्षैत्र बाढ की विभीषिका को झेलता आ रहा है । परन्तु विगत दो दशकों से बाढ के स्वरूप, प्रवृत्ति व आवृत्ति में व्यापक परिवर्तन देखा जा रहा है । ऐसे बदलाव के चलते कृषि, स्वास्थ्य जीवन यापन आदि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है और जान-माल, उत्पादकता आदि की क्षति का क्रम बढ़ा है । ऐसा नहीं है कि देश के लिए बाढ़ कोई नई बात है परन्तु मौसम में हो रहे बदलाव के इस प्राकृतिक प्रक्रिया की तीव्रता व स्वरूप को बदल दिया है और बाढ़ की भयावहता आपदा के रूप में दिखाई दे रही हैं । इसमें विशेषकर तेज व त्वरित बाढ का आना, पानी का अधिक दिनों तक रूके रहना तथा लम्बे समय तक जल-जमाव की समस्या समाने आ रही है । मौसम बदलाव का दूसरा प्रमुख सूखे के रूप में देखा जा सकता है । तापमान वृद्धि एवं वाष्पीकरण की दर तीव्र होने के परिणाम स्वरूप सूखाग्रस्त क्षेत्र बढ़ता जा रहा है । मौसम बदलाव के चलते वर्षा समयानुसार नहीं हो रही है और उसकी मात्रा में भी कमी आई है । मिट्टी की जलग्रहण क्षमता का कम होना भी सूखा का एक प्रमुख कारण है । बहुत से क्षेत्र जो पहले उपजाऊ थे आज बंजर हो चले हैं वहाँ की उत्पादकता समाप्त् हो गई है । भारत के संदर्भ में ही हाल के समय में ग्रीन पीस इण्डिया की एक सर्वेक्षण रिपोर्ट इस बात को रेखांकित करती है कि भारत में सर्वाधिक आमदनी वाले वर्ग के एक फीसदी लोग सबसे कम आमदनी वाले ३८ फीसदी लोगों के मुकाबले कार्बन डाई आक्साइड का साढ़े चार गुना ज्यादा उत्सर्जन करते हैं । हाल के बाली सम्मेलन में वनों के कटाव पर विशेष चिन्ता प्रकट की गयी थी । ऐसा अनुमान लगाया है कि ग्रीन हाउस गैसे उत्सर्जन के लिए २० से २५ प्रतिशत के लिए वनों के कटाव उत्तरदायी है । इसलिए वनों के संरक्षण पर विशेष बल दिया जाना चाहिए । हमारे एवं हमारी भावी पीढियों के जीवन को निर्णायक रूप से प्रभावित करने वाली जलवायु-परिवर्तन की समस्या हम सबके लिए चुनौती है । इसका सामना सार्थक एवं प्रभावशाली ढंग से करने के लिए हमें जागरूकता दिखाते हुए सरकारों, अन्तराष्ट्रीय मंचाों पर अपने लोकतांत्रिक अधिकारों का उपयोग करते हुए दबाव बनाना होगा । इस दिशा में हो रहे सरकारी, गैर सरकारी संघटनों के प्रयासों में सहयोग देना होगा । व्यक्तिगत जीवन में भी हम सादगी लाने और बिजली, पानी इंर्धन की बचत की दिशा में कदम उठा सकते हैं । लगातार बढ़ता शहरीकरण जलवायु-परिवर्तन को और बढावा देगा और बढ़ती शहरी जनसंख्या के कारण उपजाऊ भूमि इमारतों के निर्माण हेतु उपयोग हो रही है तथा पेड-पौधों की संख्या तेजी से कम होती जा रही है । भारत में ही १९५५ से २००० के बीच करीब २-३ लाख हेक्टेअर खेती तथा वन भूमि आवासीय उपयोग में आ चुकी है । भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के अनुसार मात्र एक डिग्री सेण्टीग्रेड तापमान में वृद्धि से भारत में ४० से ५० लाख टन गेहूँ की कम उपज का अनुमान है । इससे प्रति व्यक्ति खाद्य उपलब्धता कम होगी और खाद्य असुरक्षा तथा कुपोषण बढेगा । यदि जलवायु परिवर्तनों को समय रहते कम करने तथा खाद्यान्न उपलब्धता बढ़ाने हेतु प्रभावी कदम नही उठाये गये तो शहरी गरीबों पर इसका गभीर असर पड़ेगा और कुपोषित बच्चें की संख्या और भी अधिक बढ जाएगी । जलवायु-परिवर्तन के चलते सूखे एवं बाढ में वृद्धि से पानी की उपलब्धता प्रभावित होगी । भारत वातावरणीय परिवर्तनों से होन वाली स्थितियों पर नियंत्रण से संबंधित योजनाआें पर सकल घरेलू उत्पाद का करीब ढाई प्रतिशत खर्च करता है जो कि एक विकासशील देश के लिए काफी बड़ी राशि है । चूँकि जलवायु-परिवर्तन किसी एक देश अथवा क्षेत्र तक सीमित नहीं है इसलिए इनमें कमी लाने हेतु सभी स्तरों पर ठोस उपायों की जरूरत है । भारत में गैर परम्परागत स्रोतों जैसे सूर्य, जल एवं पवन ऊर्जा की काफी बड़ी संभावना है । पवन ऊर्जा पैदा करने की क्षमता में भारत विश्व में चौथे स्थान पर है । इन साधनों के प्रयोग हेतु प्रोत्साहन से भी वातावरण से कार्बन डाई आक्साइड को सोखने एवं जलवायु-परिवर्तन को कम करने में काफी सहायता है । चूँकि पुराने वृक्षों में कार्बन डाइ्र आक्साइड को अवशोषित करने की क्षमता कम हो जाती है इसलिए जलवायु-परिवर्तनों के नियंत्रण हेतु प्रत्येक स्तर पर अधिकाधिक वृक्षारोपण को बढावा देने की आवश्यकता है । जलवायु परिवर्तन के कृषि पर तात्कालिक एवं दूरगामी पभावों के अध्ययन की जरूरत है । कृषि वैज्ञानिक भी यहाँ कमी नहीं हैं, लेकिन कृषि वैज्ञानिक भी अभी जलवायु-परिवर्तन को स्वीकार नहीं कर पा रहे है । इसलिए इस दिश में कोई शोध शुरू नहीं हुआ जबकि हमें इस क्षेत्र में तत्काल दो काम करने चाहिए । एक यह कि जलवायु-परिवर्तन से कृषि चक्र पर क्या फर्क पड रहा है । दूसरा क्या इस परिवर्तन की भरपाई कुछ वैकल्पिक फसले लगाकर पूरी की जा सकती है । साथ ही हमें ऐसी किस्म की फसलें विकसित करनी चाहिए जो जलवायु-परिवर्तन के खतरों से निपटने में सक्षम हो-मसलन फसलों की ऐसी किस्मों का ईजाद, जो ज्यादा गरमी, कम या ज्यादा बारिश सहन करने में सक्षम हों । यह कहने में अतिशयोक्ति नहीं होगी कि जलवायु-परिवर्तन न केवल कृषि के लिए बल्कि सम्पूर्ण मानव सभ्यता के लिए एक खतरे के रूप में सामने आया है और इसलिए इसे सीमा में बांधना बेईमानी होगी । कोई भी देश इसकी ऑच से बच नहीं सकता । हम इस तथ्य से भी मुँह नहीं मोड सकते कि जलवायु-परिवर्तन के मुद्दे पर अब शिखर सम्मेलनों के आयोजन की अपेक्षा जमीनी स्तर पर विचार किया जाना चाहिये । हम यह भी उम्मीद करेंगे कि अगले दो सालों के भीतर दुनिया के समस्त देश इस गंभीर चुनौती का सामना करने के लिए एकजुट होकर वर्ष २००९ की डेनमार्क में कोेपेन हेगन वार्ता में कोई ऐसा सर्व सम्मत एजेंडा विश्व के समक्ष रखने में समर्थ होंगे जो २०१२ में समाप्त् होने वाले क्योटो प्रोटोकाल का स्थान ले और उसमें विशेष रूप से कृषि पर पडने वाले जलवायु-परिवर्तन के प्रभाव को कम करने की प्रभावी व्यवस्था भी शामिल हो। **