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बुधवार, 2 जुलाई, 2008

१० कृषि जगत

भारतीय कृषि की विदेशी नियति
ओमप्रकाश मेहरा
योजना आयोग ओर भारत सरकार में कृषि उत्पादन की लगभग स्थित दर और स्थित ही क्यों क्रमश: अधोमुखी होती प्रवृत्ति को लेकर इन दिनों एक वाजिब चिंता है । उपाय खोजे जा रहे हैं किंतु इस खोज मेंअपनी भयानक गलतियों पर जरा भी नजर डालने को कोई तैयार नहीं बल्कि बलि के बकरे ढूंढे जा रहे हैं । यह तथ्य विचारणीय है कि इतने वर्षो छोटे-बड़ें बांधों के निर्माण में अरबो रूपये खर्च हुए साथ ही दावे भी किए गए कि सिंचाई का रकबा इतने लाख हैक्टर बढ़ा । हमारे पारम्परिक विश्वासों के अनुसार उत्पादन भी बढ़ना चाहिए था । एक समय तो नि:संदेह वह वृद्धिमान रहा किंतु इधर कुछ वर्षो से उसमें एक स्थिरीकरण की प्रवृत्ति देखी गई है । तब यह पहेली और भी जटिल हो जाती है कि वृद्धिमान सिंचाई क्षेत्र के बावजूद स्थिरता सी यह प्रवृत्ति क्यों हैं ? उन लोगों के पास जो विशेष रूप से बड़े बांध के पक्षधर है इस पहेली का कोई माकूल उत्तर नहीं है । वे कभी सिंचाई के गलत तरीकों को कभी फसल चक्र में व्यावसायिक फसलों द्वारा खाद्य फसलों के विस्थापन की चर्चा करते हैं । यदि इस विस्थापन और गलत तरीकों से सिंचाई के पानी के उपयोग की वास्तविकता देखी जाए तो आंकड़ें कुछ और ही कहानी कहते नजर आते हैं यानी इनके प्रभावों के आंकड़े ऐसे नहीं हैं जो इन तर्कोंा की सत्यता को पूरी तरह से प्रमाणित करें । अलबत्ता ये आंशिक सच्चई जरूर हमारे सामने रखते हैं । फिर असल बात क्या है ? इस विमर्श में कतिपय अंवातरता का दोष जरूर आ सकता है किंतु पूरी बात कहने के लिए मुझे यह क्रम आवश्यक प्रतीत होता है । यहां दो बातें देखना जरूरी हैं । प्रथम तो यह कि हमने संसदीय लोकतंत्र प्रणाली अपनाने के बाद भी अपने प्रशासन के तौर तरीकों में प्रजातांत्रिक मूल्यों को फटकने भी नहीं दिया । उनमें आज्ञाआें के ऊपर से नीचे की ओर आते क्रम और इस आज्ञाचक्र पर प्रश्न उठाने की स्वाधीनता के अभाव की प्रधानता थी । हमारे कृषि वैज्ञानिकों ने वहीं किया जो पश्चिम के कृषि वैज्ञानिकों ने उन्हें बताया (उसमें अपने देश की परिस्थितियों पर विचार की रत्तीभर गंुजाइश भी न छोड़ी) हमारे इंजीनियरों ने भी उसी तरह विदेशों में सीखी तकनीकी को यहां लागू कर दिया। विचारतंत्र में प्रजातांत्रिकता के अभाव के कारण हुआ यह कि हमारे नौकरशाहों में हुआ-हुआ संस्कृति का विकास हो गया और बरसों हम एक कुंद तरीके से सीखे हुए पाठ को, बिना उसके परिणामों के मूल्यांकन की परवाह किए दुहराते रहे । दूसरी विचार योग्य बात यह है कि हमारी शासन प्रणाली में मनुष्य की बुद्धि को चारदीवारी में कैद कर रखा है यानी मैं केवलउस विषय पर अधिकारिता के साथ बात कर सकता हँू जो मुझे सौंपा गया है । मसलन बड़े या छोटे बांधों पर बहस छेड़ने का मुझे कोई अधिकार नहीं है । उसी तरह कृषि को लेकर मैं यह प्रश्न नहीं पूछ सकता कि हम कोल्हू के बैलोंकी तरह आंखों पर पट्टी बंधवाए एक निश्चित दायरे का चक्कर काटते काटते आखिर क्या हासिल कर रहे हैं ? शासनतंत्र बदले हैं पुरानी पीढ़ियां गई, नई आई लेकिन प्रशासन के तौर तरीकों और सोच का ढर्रा वही रहा । आँख मंूदकर किताबों में लिखे को मानो, ऊपर से आती आज्ञाआें का पालन करो और प्रश्न मत करो । इन गुरूमंत्रों को इस तरह बुद्धि में पीढ़ी दर पीढ़ी पिलाया जाता रहा कि विश्व में हमारी छवि बुद्धिहीनों की एक पढ़ी लिखी लेकिन कर्महीन जमात से अधिक कुछ न रही और यह तब जबकि इस देश में बुद्धिसंपदा का इतना अकूत खजाना है। दु:ख होता है कि यद्यपि भिन्न-भिन्न विचारधाराआें की सरकारें आती जाती रही है किंतु देश के विकास के बारे में समझ उतनी ही रूढ़ और घिसी पिटी बनी रही । विकास का नया प्रकाश आखिर दीख कैसे पड़ता ? बड़ी घिसी-पिटी उक्तियां प्रचलन में हैं । नौकरशाह ? अरें! वो एक घोड़े के समान है । सफल घुड़सवार वहीं होता है जो उस पर सवारी गांठने में क्षमता हासिल कर ले । आप ही विचार कीजिए कि यदि इस मूलभूत सोच के आधार पर कोई सरकार प्रशासन चलायेगी तो उसका हश्र क्या होगा ? हमने जो कह दिया सत्य की लकीर है । किसी को प्रश्न करने का अधिकार नहीं । क्या यही नहीं हुआ हमारी योजनाआें के साथ ? एक जमाना था जब लक्ष्य वाक्य था भूमि के गर्भ में खोद डालो । जहां कहीं पानी मिले उलीच लो। कितना चाहिए ? या यह ब्रह्म आदेश यूकिलिप्टस लगाओ मत सोचो वह जमीन के गर्भ पर क्या प्रभाव डालता है । आम नहीं यूकिलिप्टस लगाआें जल्दी बढ़ता है मैं अपने सीमित कार्यकाल में ही अच्छे परिणाम दिखा सकता हँू । ताईचुंग धान लाओ देशी धान नहीं ताईचुंग लगाओ । जब कई सालों बाद आँखे खुली की कीट पतंगों को आकर्षित करती है तो नारा उठा बंद करो । ताईचुंग खराब है । उसकी जगह अपने सुधरे बीज लगाओ । पता चला कृषि विभाग की फौज लग पड़ी है पहले किए धरे को उलटने में । पहले लगी थी ताईचुंग की आरती उतारने और प्रख्यात कृषि वैज्ञानिक स्वामीनाथन की प्रशंसा बटोरने में और आज का परिदृश्य क्या है जी.एम.बीज लगाओ बाकी सब बेकार है। महंगा जरुर है लेकिन फसल खूब देता है। विदेशी कंपनी से ही बीज खरीदने की बाध्यता है । कोई परवाह नहीं कर्ज लेकर बीज खरीदे । सूदखोर बैंक वसूली के लिए छाती पर ख़़डा करो, मलटीप्लेक्स सिनेमा बनाओ । शहरी लोग आरामदेह हाल में मजे से पिक्चर देख सके । अरे भाई संरचना का कैसा विकास ? छोड़ो यार तुम्हारे बूते की बात नहीं । गांधी ? अरे उसकी क्या बात ? इक्कीसवीं सदी और चरखा ! भाई वाह । लंगोटी लगाकर आजादी की लड़ाई लड़ ली वही बहुत हुआ । विकास और अर्थनीति में उसका क्या दखल । उसके लिए तो विदेश में प्रशिक्षित शास्त्री के हाथ से बागडोर होनी चाहिए । झुग्गी झोपड़ियों में गुजर बसर करने वाले ? उनका क्या ? दूसरी जगह बसा दो । बिजली पानी दे और जैरामजी की । उनके हाथों को काम ? स्वयं ढूंढे । अब सरकार क्या-क्या करे । अभी तो सरकार को नए उद्योगो की बातचीत के लिए विदेश जाना है । तो सरकार ! इन उद्योग धंधो में तो काम मिलेगा न ! क्यों मजाक करते हो यार ? नई-नई मशीनों से काम होगा कि तुम्हारे टूटे-फूटे इन हाथ पैरों से ? चले वापस अपनी मूल बात, कृषि विकास पर लौंटे । हमें गलत दिशा में जा चुके अपने कदम लौटाना होगा । महंगे रासायनिक खाद और कीटनाशक जो घातक जहर है के स्थान पर गोबर, पत्ती खाद और जमीन की उर्वरा ताकत पर लौटें । केंचुए जो मिट्टी की गुणवत्ता को बढ़ाने में सहायक हमारे मित्र हैं उन तक वापस लौटें। याद नहीं बचपन में कही ग ा खोदो, केंचुए ही दिखाई पड़ते थे ? जमीन में ही रहते और उसे उर्वर बनाते थे । विश्व के बुद्धिमानों ने सलाह दी । कीटों को मारो। कीटनाशकों का उपयोग करों । मित्र-कीटों का क्या ? उन्हे मरने दो हम रासायनिक खाद से पैदावार लेंगे? दामोदर वैली कॉरपोरेशन बना, बड़े-बड़े बांध बने। अब वे ही जाने ले रही है । बांधो में पानी इकट्ठा होता है । जिसे बांध को खतरे की आशंका से एक साथ छोड़ा जाता है । हमारा क्या ? यह कैसी विकास कथा जिसके हर पन्ने पर विनाश दर्ज है । लेकिन क्या करें ? हमने तो किताबो में यही पढ़ा है, दूसरे मुल्कों ने भी यही किया है । हमंे इससे क्या उन्होने हमसे बहुत पहले यह कहानी लिखी, उसके नुकसान देखे और अपनी गलती सुधार ली । हम कब सुधारेंगे अपनी गलतियां ? ***

मंगलवार, 3 जून, 2008

७ कृषि जगत

भारत और इंडिया के मध्य उलझी कृषि
कांची कोहली/मंजु मेनन
संप्रग सरकार के मंत्री सम्मिलित या संपूर्ण विकास की चर्चा करते नहीं अघाते, क्योंकि हमारे प्रजातंत्र का यही लक्ष्य है । वही हमारे कृषक मछुआरों और अदिवासी समुदायो के लिए छलांग लगाती यह आर्थिक वृद्धि दु:स्वप्न ही साबित हो रही है । वित्तमंत्री पी.चिदंबरम ने इस वर्ष केंद्रीय बजट प्रस्तुत करते हुए अपने भाषण में कहा भी है कि हमें सम्पत्ति निर्माण की और ध्यान देना होगा तभी हम उसका उचित वितरण कर पाएंगे। आखिर बिना संपदा के एक राज्य कल्याणकारी राज्य कैसे बन पाएगा ? लेकिन इस तरह की सतही विचारधारा से कुछ नहीं हो पाएगा। हाल ही का कृषि ऋणमाफी का निर्णय ही देखें, यह सत्ताधारी दल के लिए कुछ सींटे भले ही बटोर ले परंतु हितग्राहियों के मूल मुद्दों के बारे में यह कुछ कर पाएगा ? क्या यह विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज) के लिए जमीन अधिग्रहण के मामले में कोई मार्गदर्शन दे पाएगा ? छोटे और सीमांत किसान इस वक्त महत्वपूर्ण मुद्दों पर आशा लगाए बेठे हैं । मात्र साठ हजार करोड़ रुपयों की ऋणमाफी से कृषि क्षेत्र में कोई बड़ा बदलाव नहीं हो पाएगा । केन्द्रीय बजट सरकार की इस मानसिकता को दर्शाता है कि विनिर्माण और सेवा क्षेत्रों का ज्यादा महत्व है और कृषि क्षेत्र तीव्र अर्थिक वृद्धि के लिए प्रतियोगी नहीं है । किंतु कृषक समुदाय इस नजरिए से सहमत नहीं है । बजट पेश होने के एक दिन पहले दिल्ली मेंसेज से संबंधित एक सभा में रायगढ़ उड़ीसा के कृषकों ने साफ-साफ कहा था कि अर्थशास्त्री भले ही कृषि व्यवसाय को तुच्छ मानें हम इसे छोड़ने के पक्ष में नहीं है । कृषि क्षेत्र पर आई इस विपत्ति ने समाचार माध्यमों का ध्यान भी आकृष्ट किया है । किंतु वे सभी इसे सिर्फ आर्थिक समस्या मानते हैं और इसके लिए आर्थिक समाधान ही प्रस्तुत करते हैं । इस समस्या के पर्यावरण कोण को सभी यहां तक कि हमारा ताजा बजट भी नजरअंदाज कर रहे हैं । पिछले दस सालों में भारतीय कृषि की निर्भरता बाह्य साधनों पर होती जा रही है । बीज, खाद, कीटनाशक, कृषि औजार और यहां तक कि पानी भी व्यावसायिक दरों पर उपलब्ध हो पा रहा है । बाजरे जेसी क्षेत्रीय मौसमी पारम्परिक फसल, जिसमें कम पानी और कम खाद की आवश्यकता होती है अब चलन से बाहर हो रही है । इस तरह के कृषि उत्पादों के लिए समुचित वितरण पद्धति के अभाव एवं रासायनिक खादों पर साल-दर-साल बढ़ती सब्सिडी ने न सिर्फ पारम्परिक कृषि को बेदखल कर दिया है बल्कि मिट्टी की उर्वरा शक्ति को भी खत्म कर दिया है । इसके दुष्परिणाम भी भयावह हैं । उदाहरण के लिए उड़ीसा के कृषक आत्महत्या के ताजा मामलोंको ही देखें, ये सभी नगद फसल उगाने वाले कृषक थे जिसमेंं विनियोग के लिए बड़ी रकम चाहिए । यदि एक बार की फसल बिगड़ जाय तो घाटा वहन करना अंसभव होता है । कृषि/समस्याआें के लिए रामबाण मानी जाने वाली बड़ी कृषि परियोजनाएं भी ज्यादा सफल नहीं रही है। सरदार सरोवर जैसी बहुप्रारित परियोजना ने भी कमांड एरिया में पानी के वृहद जमाव की वजह से स्थाई नुकसान पहुुंचाया है । अलबत्ता ताजा बजट में सिचांई क्षेत्र को बड़ा विनियोग प्राप्त् हुआ है, सिंचाई एवं जल संसाधन वित्त निगम की स्थापना के लिए १०० करो़़ड रुपयों का आबंटन प्रारंभिक पूंजी के रुप में किया गया है । एक्सीलेरेटेड इरीगेशन बेनिफिट प्रोगा्रम के लिए वर्ष २००८-०९ में २० हजार करोड़ के खर्च का प्रावधान है जिसमे २४ वृहद एवं मध्यम दर्जे की परियोजनाएं एवं ७५३ छोटे दर्जे की सिंचाई योजनाएं आगामी वर्ष में सम्पन्न की जानी है सूची में सरदार सरोवर बांध ओर मणिपुर के थोबल बांध के नाम भी हैं । यह अलग बात है कि मणिपुर में हाल ही में माणिटोल बांध प्रभावित ग्राम समिति ने थोबल बांध के पुनर्निरीक्षण की मांग की है । उनकी शिकायत है कि जब सन् १९८० में परियोजना को मंजूरी मिली थी तब पर्यावरण आर्थिक एवं सुरक्षा आधारों पर इसकी उचित रुप से जांच नहीं की गई थी । मूल्यों में अस्थिरता, बाजार की अनिश्चितता और कृषि क्षेत्र में बड़े खिलाड़ियों के पदार्पण ने इस क्षेत्र में बड़ी हलचल मचा दी है । कृषि व्यवसाय के ऋणो के संदर्भ में इस समय हमें एक सुविचारित योजना की आवश्यकता है । वरना हम पाएंगे कि हमारी सम्मिलित वृद्धि हमारे गरीब कृषकों की पीठ पर सवारी करने की अपनी प्रवृत्ति जारी रखे रहेगी । ***

शनिवार, 15 दिसंबर, 2007

८ कृषि जगत

कृषि : भारतीय संस्कृति का पर्याय
जी.के. मेनन
कृषि भारतीय संस्कृति की आत्मा है । भारत में कृषि को लेकर जो नैराष्य विद्यमान है उससे भारत स्वमेव आत्माहीन होता जा रहा है । आज की सबसे बड़ी आवश्यकता कृषि को न केवल पुर्नस्थापित करने की है बल्कि उसे सम्मान प्रदान करने की भी है । हमारा देश कई मामलों में अनूठा है । यह एक सर्वज्ञात बात है कि भारत एक प्राचीनतम देश है परंतु प्रकृति ने जिस उदारता और करूणा से इसकी रचना की है वह उल्लेखनीय है । भारत में मौसम की सम्यकता अद्वितीय है । सर्दी, गर्मी और बरसात के चार-चार माह के तीन मौसम, दो-दो महीनों की छ: ऋतुएं, इसी सम्यकता का जीता-जागता प्रमाण हैं । हमारे देश में सर्वाधिक वर्षा का क्षेत्र चेरापूंजी भी है और वहीं दूसरी ओर मरूभूमि भी अपनी सुंदरता से प्रकृतिप्रेमियों की लुभाती है । बर्फ की सफेद चादरों से ढका हिमालय है तो हरियाली से आच्छादित कई पर्वत श्रृंखलाएं नयनों को आनंद देने के लिए सदियों से खड़ी हैं । कन्याकुमारी के समुद्रीतट से लेकर हिमालय तथा अरब की खाड़ी से बंगाल के सुंदरवन के डेल्टा तक जैव विविधता की अनूठी संपदा से संपन्न विशाल क्षेत्र के क्षेत्रफल का मात्र २.४ प्रतिशत भू-भाग भारत के पास है परंतु वैश्विक जैव और वानस्पतिक विविधता में भारत की भागीदारी ८ प्रतिशत है । पर्वत श्रृंखलाएं अनेक तरह की झीलें, रेगिस्तान, वर्षावन, उष्णकटिबंधीय वन, डेल्टा, घास के मैदान, बर्फ की चोटियां, कलकल बहती छोटी, मध्यम और बड़ी हजारों नदियां, प्रवाल की खूबसूरत चट्टानें और विशाल लंबा समुद्र तट हमारे देश में है । इसी तरह राजस्थान में रेतीला रेगिस्तान है और लेह में बर्फीला रेगिस्तान अपनी अनूठी छटा बिखेरता है । केरल में सघन वर्षावन (साइलेंट वेली सहित) हैं तो अरूणाचल में दुर्गम गहन वन हैं जो दुर्लभ वन्य जीवों और वनस्पतियों की धरोहर को संजोए हुए हैं। भारत में सूक्ष्म और अति सूक्ष्म जीव-जंतुआे की इतनी प्रजातियां हैं कि अभी तक इनकी पूरी खोज और पहचान तक नहीं की जा सकी है । दुनिया में जैव विविधता के चिन्हित अठारह स्थलों में से दो भारत में है - वेस्टर्न घाट ओर इस्टर्न हिमालय । हमारे यहां वनस्पतियों की सैंतालीस हजार से भी ज्यादा प्रजातियां हैं तो जंतुआे की ८९ हजार से भी अधिक प्रजातियों की पहचान की जा चुकी है । कई सूक्ष्म और अति सूक्ष्म जीव-जंतु जमीन के नीचे रह कर धरती को पौष्टिक और ह्यूमस युक्त बनाने में अपना जीवनदान भी देते हैं । ऐसी अनुपम प्राकृतिक संपदा समूचे विश्व में अन्य किसी देश के पास नहीं है । इसी तारतम्य में यह बताना समीचीन होगा कि जो परंपराएं रीति-रिवाज या मान्यताएं हमारी सांस्कृतिक धरोहर के रूप में पीढ़ियों को हस्तांतरित होती रही हैं वे एक के बाद एक वैज्ञानिक रूप से निरंतर सत्यापित भी हो रही हैं । दृष्टा ऋषि मुनियों द्वारा प्रतिपादित भारतीय जीव पद्धति न केवल मानव जाति बल्कि प्राणी मात्र को सर्वांगीण रूप से स्वस्थ और निश्चित रखने वाली वैज्ञानिक जीवन पद्धति है । ग्रामीण अर्थव्यवस्था ओर गो -आधारित कृषि भविष्य में एक सुदृढ़ और सुनिश्चित सुखकारक अर्थव्यवस्था सिद्ध होगी, यह एक सहज भविष्य कथन है। धरती और मिट्टी की उर्वरा शक्ति के साथ परस्पर समन्वय वाली जैविक खाद ने किसानों के मन में तेजी से विश्वास अर्जित कर इसके संकेत दे दिए हैं । रासायनिक खाद के घातक प्रयोगों ने न केवल धरती की उर्वरता पर नकारात्मक प्रभाव डाले हैं वरन् किसानों के स्वास्थ्य, समृद्धता और परिश्रमशीलता पर भी वज्राघात कर उन्हें आत्महत्या की ओर ढकेला है । धीरे-धीरे जैविक खाद की सार्थकता और सफलता के प्रति जागृति का जयघोष सर्वत्र विस्तारित हो रहा है । हमारी कृषि वनस्पतियों की संपदा तो चकित कर देने वाली हैं । १६७ फसल प्रजाति और ३५० वन प्रजातियां हैं । चावल की प्रजाति की तीस हजार से पचास हजार किस्में है, वहीं ज्वार- बाजरे की पांच हजार से ज्यादा हैं, और तो और कालीमिर्च जैसी औषधीय वनस्पति की पाँच सौ से अधिक किस्में यहां मिलती हैं । इसी तरह से गो-विद्या, मधु विद्या, पक्षी विद्या, सर्प - विद्या , जल -विद्या, परिवहन विद्या ,वन विविद्या और भू-विद्या संबंधी जीवजंतुआे की संख्या भी अनगिनत हैं । पशुआे में गाय की ही सैकड़ों किस्में हैं, जिनमें से ३० किस्मों को राष्ट्रीय किस्मों की श्रेणी में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने उल्लेख किया है । हमारी कृषि व्यवस्था में जो जैव- विविधता पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही थी, अब कृषि प्रजातियों के साथ आनुवांशिक छेड़छाड़ से उसके लिए नया खतरा उत्पन्न हो गया है । ज्यादा उत्पादन और जल्दी पैसा कमाने के लोभ में किसान फसलों की हायब्रिड और जीन संवर्धित बायो टेक्नालाजी आधारित किस्मों का उपयोग ज्यादा करने लगे हैं । इन किस्मों को ज्यादा रासायनिक उर्वरकों , कीटनाशकों, जल और ऊर्जा तथा मशीनीकरण की आवश्यकता होती है, जो अक्सर विदेशों से आयात होती है या देश में स्थित विदेशी कंपनियों से या देशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा ही उत्पादित हैं । भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद या प्रादेशिक कृषि गोपालन विश्वविद्यालयों में भारतीय कृषि या गोपालन पर बहुत कम या नहीं के बराबर ही अनुसंधान , शिक्षा या प्रचार-प्रसार होता है । दुर्भाग्यवश इन अध्ययनशालाआे और अनुसंधानशालाआे ने विदेशी पाठ्यक्रम को ही अपनाया है । अधिकांश यूरोपीय और अमेरिकी देशों में कृषि भूमि अधिक है और खेती करने वाले किसान कम है, इसलिए मशीनीकरण वहां आवश्यक है। लेकिन हमारे देश में ६० प्रतिशत से अधिक छोटे या सीमांत किसान हैं जिनके पास दो हेक्टेयर से कम कृषि भूमि है और मात्र २-३ पशुधन है । हमें यह सदैव याद रखना होगा कि भारतीय कृषि विदेशी परिभाषा की मोहताज नहीं है , यह हमारी जीवन शैली है । पर्यावरण रक्षा के साथ मानव और पशु शक्ति, पारंपरिक नवीनीकृत ऊर्जा , ब्रह्माण्ड एवं आकाशीय शक्ति सभी प्रकार के जीवांश के पुन: चक्रीकरण के माध्यम से मृदा-संरक्षण और जल पुनर्भरण आदि हमारे प्राचीन कृषि- गोपालन व्यवसाय के अनिवार्य अंग थे । इसलिए १०००० वर्षों तक कृषि करने के बाद भी हमारी धरती शक्तिहीन और बंजर नहीं हुई, आज भी जीवित है । कृषि, गोपालन, फलोद्यान , ग्रामोद्योग, जल संरक्षण व जल पुनर्भरण , ये सब हमारे आत्म निर्भर स्वावलंबी , कृषि उद्योग के अंग हैं । मधुमक्खी पालन, तेलघानी, आटाचक्की, पानी चड़स , चर्खा, बुनाई, गुड़ बनाना, बांस की टोकरी, सुपड़ा आदि तथा रस्सी, चप्पल, जूता, मटका, इंर्ट, लोहारी, सुतारी, सुनारी उद्योग हमारे हर गांव या कस्बे में हुआ करते थे, जो आज तथाकथित विकास की जद़्दोजहद में बंद हो गए हैं । इसलिए गांवों में बेरोजगार ज्यादा हो गए हैं । याद रखिए ! भारत भूमण्डलीकरण की बात करने वाला सबसे पहला देश है। वैदिक काल से ही हम सर्वे भवन्तु सुखिन:, वसुधैव कुटुम्बकम् और सबै भूमि गोपाल की का आनंद घोष करते रहे हैं । इन पावन नारों मंे मातृत्व, मित्रत्व, भातृत्व और वात्सल्य का भाव रहा है । जबकि आज भूमण्डलीकरण की आड़ में कुटिलतापूर्वक अपने व्यापारिक हितों की पूर्ति हेतु विकासशील देशों के लोगों को बकायदा ठगा जा रहा है । इस बात को जानते हुए भी हम स्वयं को, अपनी संस्कृति को, अपने देश की अखण्डता को , विदेशी व्यापारियों के हाथों में सौंपते चले जा रहे हैं । यह जान लेना चाहिए कि अब जो परतंत्रता आएगी वह कालजयी होगी क्योंकि किसी मंगल पांडे को यह पता नहीं चलेगा कि उसकी संस्कृति के साथ खिलवाड़ हो रहा है । यदि ग्रामीण संस्कृति को पुनर्जीवित नहीं किया गया और गांवों के बेरोजगारों का शहर - पलायन नहीं रोका गया तो वह दिन दूर नहीं जब हम फिर से पूरी तरह (आर्थिक सांस्कृतिक, सामाजिक, भौगोलिक आदि) गुलाम हो जाएेंगें । गांव आधारित उद्योग - धंधों को नई वैज्ञानिक तकनीकी के साथ पुन: जीवित करें ताकि हर गांव संपन्न और स्वावलंबी हो । भारतीय कृषि व गोपालन का सशक्तिकरण आज की आवश्यकता है इसे नजर अंदाज करना भविष्य के लिये आत्मघाती होगा ।

मंगलवार, 26 जून, 2007

१४ कृषि जगत

१४ कृषि जगत
बांझ बीज और हताश किसान
शैलेष कुमार
­तमिलनाडू सरकार ने महिको कम्पनी के बी.टी. कपास के बीजों की बिक्री पर प्रतिबन्ध लगा दिया है । धरमपुरी जिले में इन बीजों से फसल पूरी तरह से बर्बाद होने की शिकायत मिली थी । इसके पूर्व सन् २००४ में खरीफ की फसल खराब होने के बाद आंध्रप्रदेश सरकार ने बी.टी. बीजों की प्रमुख भारतीय निर्माता कम्पनियों को काली सूची में डाला था ।
धरमपुरी के हजारों किसानों ने जिलाधीश से बी.टी. कपास के बीजों के घटिया होने की शिकायत दर्ज की थी । जिलाधीश पंकजकुमार बंसल के अनुसार 'इस जिले के २५०० एकड़ क्षेत्र में बी.टी. कपास के बीज बोने वाले लगभग २००० किसानों को इससे भारी नुकसान उठाना पड़ा है । साथ ही प्रारंभिक जांच से यह स्पष्ट हो रहा है कि इस सबके लिये बीज ही जिम्मेदार है ।'
इस घटना को प्रदेश सरकार ने गंभीरता से लिया और साथ ही जांच का आदेश देते हुए प्रदेश के कृषि मंत्री वीरपण्डी एस. अरूमुगम ने कहा, 'जांच पूरी होने तक महिको के बीज बेचने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है । उन्होंने बीज कंपनी से प्रभावित किसानों को मुआवजा देने को भी कहा ।'
इस प्रतिबंध से अनुवांशिक रूप से संशोधित बीजों की मुखालफत करने वाले खुश हैं । अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरण संस्था ग्रीनपीस के अभियानकर्ता राजेश कृष्णन का कहना है कि 'आंध्रप्रदेश के बाद तमिलनाडू में भी बी. टी. बीज नाकारा सिद्ध हुए हैं । लेकिन जैविक अभियांत्रिकी तकनीक की इस विफलता का खामियाजा अन्तत: तो किसानों को ही भुगतना पड़ता है । बीजों के लगातार असफल होने के बावजूद ये कंपनियां लुभावने विज्ञापनों के दम पर अपने बीज बेचने में कामयाब हो जाती हैं ।'
यद्यपि अब तक यह स्पष्ट नहीं है कि घटिया बीज ही धरमपुरी में कपास की फसल बर्बाद होने का कारण हैं । तमिलनाडू के कृषि सचिव सुरजीत चौधरी ने एक उदाहरण देते हुए बताया कि प्रदेश के एक किसान को प्रति एकड़ १५ क्विंटल कपास मिला, बीजों के ६००० रूपये घटाने के बाद उन्हें ५४००० रूपयों का लाभ हुआ । खेती की गलत पद्धति और बीज कंपनी का पर्याप्त् सहयोग न मिलना भी कपास की फसल खराब होने का कारण हो सकता है । कृषि उत्पादकता आयुक्त के पद पर भी आसीन श्री चौधरी ने कहा, 'बीज बेचते समय कंपनी समुचित जानकारी और सहयोग दे या फसल खराब होने पर किसानों को मुआवजे का भुगतान करें ।'
महिको कंपनी ने भी धरमपुरी में फसल खराब होने की बात स्वीकार की है लेकिन इस संबंध में उसने अपने बीजों को इसका कारण मानने से साफ इंकार भी किया है । महिको के उप-महाप्रबंधक संजय देशपाण्डे ने स्पष्टीकरण देते हुए कहा, 'पौधों में मुरझाने की समस्या नजर आई है, किन्तु यह हमारे बीजों के कारण नहीं हुआ है । बीज के हर पैकेट पर हमने लिखित सूचनाएं दी थीं । मुआवजे के लिए सरकार ने समिति गठित कर दी और जल्द ही हम इस पर निर्णय ले लेंगे ।'
इसके पूर्व सन् २००६ में मोंसेन्टो की सहायक कंपनी महिको मोंसेन्टो बायोटेक इंडिया लि. ने बीजों के १८०० रूपये लाभकारी मूल्य वाले ४५० ग्राम के पैकेट पर १२५० रूपये का 'गुण मूल्य' (ट्रेट वेल्यू एक प्रकार की रॉयल्टी) भी लगाया था । जबकि आंध्रप्रदेश सरकार ने ४५० ग्राम के पैकेट का मूल्य ७५० रूपये निर्धारित किया था । मोंसेन्टो द्वारा इसे अस्वीकार करने पर जनवरी २००६ में आंध्रप्रदेश सरकार यह मामला एकाधिकार एवं प्रतिबंधित व्यापार आयोग के पास ले गयी । १० मई २००६ को अंतरिम आदेश देते हुए इस आयोग ने मोंसेन्टो को लाक्षणिक मूल्य घटाने के लिये कहा । इस पर कंपनी सर्वोच्च् न्यायालय में चली गई है ।
इस आयोग ने अंतिम सुनावाई की तारीख २९ जनवरी २००७ तय की थी । इसके बाद सर्वोच्च् न्यायालय में होने वाली सुनवाई के लिये तमिलनाडू सरकार नीति-निर्धारण करने वाली थी । मगर इसके साथ ही आंध्रप्रदेश में बी. टी. कपास के बीजों के मामले में अदालत से बाहर समझौता करने की कोशिशें भी चल रही हैं । प्रदेश में बिक्री करने वाली कुछ भारतीय कंपनियों ने सरकार का फैसला स्वीकार करने का संकेत देते हुए अदालत के बाहर समझौता करने पर जोर दिया है । आंध्रप्रदेश के कृषि मंत्री एन. रघुवीर रेड्डी ने बताया कि, 'किसानों के हित में हम अदालत से बाहर समझौता करने को तैयार हैं । अन्य प्रदेशों की सरकार ने भी अदालत में याचिका दायर की है परन्तु शायद वो भी अदालत के बाहर समझौते के लिए तैयार हो जाएं ।'
अनेक सामाजिक कार्यकर्ता इस बात से नाराज हैं कि जिस कंपनी के बीजों की वजह से किसान बर्बाद होकर आत्महत्या करने को मजबूर हुए हैं सरकार उन्हें मुआवजा दिलाने के बजाय उसी कंपनी के साथ अदालत से बाहर समझौता करने को तैयार है जबकि ज्यादातर लोेगों का कहना है कि न्यायिक प्रक्रिया जारी रहना चाहिए ।
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गुरुवार, 31 मई, 2007

वक्त आ रहा है - बायो डीजल से दाल छौंकने का

१० कृषि जगत

वक्त आ रहा है - बायो डीजल से दाल छौंकने का

सौरव मिश्रा/कीर्तिमान अवस्थी

योजना आयोग, (जिसे भूमण्डलीकरण एवं बहुराष्ट्रीय कंपनियों का पक्षधर माना जा रहा है) भी भारत सरकार के अनेक मंत्रालयों की दिशाहीनता और लालच से घबरा गया है। एक कृषि उपज को व्यापक बनाने के कार्यक्रम में कृषि मंत्रालय की उपेक्षा करना क्या सिद्ध करता है? आज जब देश खाद्य तेल की कमी व बढ़ते दामों से परेशान है ऐसे में भी खाद्य तेलों के उत्पादन की कोई दीर्घकालीन योजना बनाने के बजाय बायो डीजल पर अधिक जोर दिया जा रहा है। इसके पीछे के मकसद किसी से छुपे नहीं हैं।

११ वीं पंचवर्षीय योजना के प्रारुप में योजना आयोग ने देश के विभिन्न भागों में बायो डीजल उत्पादन के लिए हो रही जेट्रोफा (रतनजोत) की खेती से पड़ने वाले पर्यावरणीय व सामाजिक आर्थिक प्रभावों को लेकर चिंता व्यक्त की है। रिपोर्ट में कहा गया है कि जेट्रोफा अधिक पानी इस्तेमाल करने वाली फसल है। इसकी खेती से न केवल पीने के पानी की कमी होगी बल्कि पशुआें की चरने वाली भूमि पर और वन्य प्राणियों के निवास वाली भूमि पर भी अतिक्रमण हो जाएगा।

इस रिपोर्ट का आना वैसे तो आश्चर्य का विषय है क्योंकि यह योजना आयोग ही था, जिसने अप्रैल २००३ में केन्द्र सरकार पर दबाव डाला था कि वह बड़े स्तर पर झट्रोफा की खेती को एक राष्ट्रीय मिशन के अंतर्गत लेकर इस बात के लिये प्रयत्न करे कि सन् २०१० तक डीजल की कुल खपत में बायोडीजल का योगदान २० प्रतिशत तक हो जाए। छत्तीसगढ़ से प्रारंभ हुई झट्रोफा खेती की आरंभिक योजना आठ वर्षोंा के लिये बनी थी। वैसे इस कार्यक्रम को अभी आधिकारिक रुप से प्रारंभ नहीं किया गया है, परन्तु अधिकांश राज्यों में इसके अंतर्गत झट्रोफा की खेती प्रारम्भ कर दी गई है।

राष्ट्रीय बायोडीजल कार्यक्रम की शुरुआत तीन केन्द्रीय मन्त्रालयों, पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस, ग्रामीण विकास और पर्यावरण एवं वन मंत्रालयों एवं कुछ राज्य सरकारों द्वारा इस प्रक्रिया को ही गलत तरीके से प्रारंभ करने से हुई। सबसे आश्चर्यजनक यह है कि केन्द्रीय कृषि मंत्रालय को इससे एकदम अनभिज्ञ व अलग रखा गया।

छत्तीसगढ़ के अशोक प्रधान का कहना है कि सरकार द्वारा निर्मित जेट्रोफा अतिरंजना के कारण भूमि-माफिया और बड़े निगमों ने जिसमें से कई निजी व सार्वजनिक कंपनियाँ रिलायन्स, ईमामी, किट-प्लाय, इण्डियन आईल व भारतीय रेल शामिल है, ने छत्तीसगढ़ में २०,००० हेक्टेयर वन और चरनोई की भूमि पर कब्जे का आश्वासन छत्तीसगढ़ सरकार से ले लिया है।

जमीनों पर कब्जे के पागलपन में यहाँ के विभिन्न जिलों के ३० किसानों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा है। इस खेती के लिये चूँकि छत्तीसगढ़ सबसे आकर्षक स्थान के रुप में उभरा है अतएव यहाँ के गरीब किसानों की जमीनों पर कब्जा करने के लिये पंजाब और हरियाणा के अमीर किसान जिनकी निगाह जेट्रोफा की मलाईदार कमाई पर है, यहाँ पहुँच गए हैं और सरकार द्वारा मात्र १०० रुपये प्रति हेक्टेयर की लीज लेना भी उनके लिये सोने पर सुहागा साबित हो रहा है।

इस मिशन द्वारा सन् २०१२ तक १ करोड़ १० लाख हेक्टेयर भूमि को जेट्रोफा खेती के अंतर्गत लाने का प्रस्ताव है और इस हेतु पूरे देश में १ करोड़ ७० लाख, हेक्टेयर वेस्टलैंड चिन्हित भी कर लिया गया है। पर इन जमीनों पर कब्जा असान नहीं है क्यांेकि उजड़े वन क्षेत्रों पर अनेकों गाँव छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और आंध्रप्रदेश में बस चुके हैं। स्थानीय राजनीति के चलते इन्हें खाली करवाना आसान नहीं होगा।

दूसरी ओर इस खेती कार्यक्रम के औचित्य पर ही प्रश्न चिह्र लगा हुआ है। क्योंकि इस खेती के लिये आवश्यक १ करोड़ १० लाख हेक्टेयर भूमि भारत की कुल उपजाऊ भूमि जिसमें कि वेस्टलैंड भी शामिल हैं का ७ प्रतिशत है। यह भारत में कपास उत्पादन क्षेत्र से अधिक और गेहँू की खेती के क्षेत्र के आधे से ज्यादा है।

रतनजोत खेती का प्रचार जिस आक्रामकता से हो रहा है उनसे अनेक मोटे अनाज और अन्य खाद्य पदार्थ जिनका उत्पादन वेस्टलैंड में हो रहा था खतरे में पड़ गये हैं। अनाज व्यापारियों का कहना है कि ''देश में खाद्य तेल की जबरदस्त कमी है। पिछले वर्ष हमने ९ अरब डॉलर कीमत का खाद्य तेल आयात किया था। हम इन स्थानों पर बजाय जेट्रोफा के मुंगफली इत्यादि उपजाकर खाद्य तेल क्यों प्राप्त नहीं करते।''

पिछले दो वर्षोंा में कच्चे तेल की कीमतों में हुई तकरीबन तीन गुना वृद्धि ने झट्रोफा की खेती के प्रति उत्साह को पागलपन की श्रेणी में ला दिया है। यूरोपियन यूनियन द्वारा बायोडीजल की मिलावट (बलेंडिंग) अनिवार्य कर देने के पश्चात उपज में नये व्यापारिक हितों का समावेश भी हुआ है।

भारतीय अतिरिक्त भूमि (वेस्टलैंड) की तुलना में मलेशिया और इण्डोनेशिया में इस तरह की भूमि पर की जा रही खेती से की जा रही है। पर हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि भारत की जनसंख्या इनसे अधिक है और यहाँ पर लोगांे की जीविका और खाद्य सुरक्षा इस पर अधिक निर्भर है। कृषि विशेषज्ञों ने तो जेट्रोफा की खेती पर ही प्रश्न चिह्र लगा दिया है, उनका कहना है कि इसके स्थानापन्न के रुप में करण (वानस्पतिक नाम पोंगामिया) जैसी अन्य देशज प्रजातियाँ मौजूद हैं। परन्तु जेट्रोफा के पक्ष में यह दलील दी जा रही है, कि यह बहुवर्षीय और मजबूत झाड़ीदार वृक्ष है जिसे कि सीमान्त भूमि पर भी उपजाया जा सकता है। यह सूखा और रोग प्रतिरोधी भी है एवं इसके बीजों में करीब ३० प्रतिशत तेल समाहित होता है, जिसका उपयोग बायोडीजल उत्पादन के लिये किया जा सकता है। ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि रोपण के छठे वर्ष से झट्रोफा के माध्यम से प्रति वर्ष प्रति हेक्टेयर २.५ टन बायोडीजल की प्राप्ति होगी। साथ ही जेट्रोफा को उस सूखे क्षेत्र के लिये भी वरदान माना जा रहा है जहाँ पर कि पानी की कमी है।

पर व्यावसायिक उत्पादन के लिये आवश्यक है कि इसकी खेती में सिंचाई की जाए, कटाई, छटाई व निंदाई गुड़ाई भी की जाए, खाद डाली जाए एवं सूर्य का समुचित प्रकाश इसे मिले। जेट्रोफा की खेती के लिये न्यूनतम ६०० मिमी. का बारिश वाला इलाका चाहिये। ४०० से ६०० मिमी. वर्षा वाले क्षेत्र में अगर इसकी खेती की जाती है तो सिंचाई की समुचित सुविधाएँ आवश्यक हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि जेट्रोफा अपनी पत्तियों को गिराकर दो से तीन वर्ष के सूखे का ही मुकाबला कर सकता है। जेट्रोफा की जड़ें गहरी नहीं होती । अत: उसे ऊपरी सतह पर ही पानी की दरकार होती है, वहीं करण की जड़ें १० मीटर तक गहरी होती हैं। अत: वह ऊपरी सतह के पानी का इस्तेमाल नहीं करता।

कृषि वैज्ञानिक भी इन तथ्यों से सहमत नजर आते हैं। उनका मानना है कि अगर जेट्रोफा की तुलना अन्य खाद्य और वन उपज उसके लिये आवश्यक भूमि पानी और पोषक पदार्थोंा से फसली श्रेणी और कृषि-जैव विविधता से करें तो विशेषज्ञों के विचार विरोधाभासी हैं।

दूसरी ओर निकारागुआ का उदाहरण वहाँ इससे मिलने वाली अत्यधिक पैदावार के लिए दिया जाता है। परन्तु निकारागुआ में वर्षा का औसत (१७०० मिमी.) भारत के वर्षा औसत (११०० मिमी.) से कहीं अधिक है। साथ ही हमारे यहां यह औसत असमान भी है। व अफ्रीका के कई देश तो भूमि पर इससे पड़ने वाले प्रभावों की वैज्ञानिक जाँच तक करवा रहे हैं।

जेट्रोफा का वन सघनीकरण में भी प्रयोग में नहीं लाया जा सकता क्योंकि यह अन्य वृक्षों के समकक्ष पनप ही नहीं सकता। ऊँचे वृक्ष झट्रोफा की बढ़ौत्तरी को रोक देते हैं। अगर सरकार फिर भी इसकी खेती को प्रोत्साहन देती है तो इसका स्वरुप एक तरफा ही होगा, सामुहिक नहीं।

इसी कारण कृषि वैज्ञानिक इसका विरोध भी कर रहे हैं। उनका कहना है कि जेट्रोफा की खेती से लम्बे समय में जैव विविधताआें को नुकसान पहँुचेगा। उनका यह भी मानना है कि इस तरह की एकमेव कृषि से स्थानीय जैव विविधता को भी नुकसान पहँुचेगा। और यांत्रिक बीजकरण से वर्तमान में अस्तित्वमान वनस्पतियाँ नष्ट हो जाएगीं। अतएव मिश्रित खेती ही सर्वश्रेष्ठ है।

अब प्रश्न यह है कि 'सीमान्त' और 'वेस्टलैंड' के इस प्रयोग से सर्वाधिक लाभ में कौन रहने वाला है। सिर्फ पर्यावरणीय लागत की ही बात मत सोचिये यह भी सोचिये कि इस बायोडीजल के प्रयोग से सर्वाधिक लाभ में कौन रहेगा? योजना आयोग के एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि जेट्रोफा आधारित बायोडीजल निर्माण के अनेक फायदों के बावजूद राज्यों और उद्योग जगत ने जो अवैज्ञानिक और अनैतिक रास्ता अपनाया है उसने इस मिशन के उद्देश्यों