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बुधवार, 2 जुलाई, 2008

५ वातावरण

और कितने भोपाल ?
सुश्री रावलीन कौर
सुप्रसिद्ध साहित्यकार स्व. कमलेश्वर के उपन्यास का शीर्षक `और कितने पाकिस्तान' उस मानसिकता को उधेड़ता था जिसने पाकिस्तान का निर्माण किया है । भोपाल गैस त्रासदी भी एक ऐसी मानसिकता की द्योतक है जिसका एकमात्र लक्ष्य लाभ अर्जित करना है । विशेषज्ञों द्वारा यह माना जा रहा है कि हाल ही में गुजरात के भरूच में रासायनिक अपशिष्ट भंडार में लगी आग भोपाल गैस त्रासदी से भयावह रूप ले सकती थी । भरूच एन्वायरो इन्फ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड (बी.इ.आय.एल.), अंकलेश्वर (गुजरात) जिसमें कीटनाशक क्षेत्र के महाकाय यूनाइटेड फास्फोरस की बड़ी हिस्सेदारी है, में गत ३ अप्रैल को लगी आग ने सिद्ध कर दिया है कि खतरनाक रासायनिक अपशिष्ट प्रबंधन के मामले में हमारा रवैया भोपाल गैस त्रासदी से भी सबक नहीं ले पाया है । भस्मक की प्रतिदिन उपचार क्षमता के विरूद्ध उस दिन यहां कुल १२,८०० टन खतरनाक रासायनिक तरल और अपशिष्ट तेल का भंडारण था जिसमें से २५० टन अपशिष्ट खतरनाक जहरीले कीटनाशकों का था । वह तो किस्मत अच्छी थी कि आग लगने के दस मिनट में ही हवा ने रूख बदल लिया वर्ना आग का फैलाव वहां स्थित अन्य कारखानों और गांवों में भी हो जाता और इसके फलस्वरूप होने वाले हादसे का आकार भोपाल त्रासदी से काफी बड़ा होता । आग पर भले ही २४ घंटे में काबू पा लिया गया हो लेकिन `डाउन टू अर्थ' की पड़ताल ने गया कि आसपास के गांवो के निवासियों में जहरीली गैस का असर आँखों और नाक की जलन, सांस की तकलीफ और कुछ मामलों में तो त्वचा पर चकत्ते और ज्वर के रूप में अब भी मौजूद है । आग के कारणोंका ठीक से खुलासा तो नहीं हुआ है किंतु गुजरात प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और स्थानीय प्रशासन के प्रारंभिक आकलन के अनुसार यहां उपचार, भंडारण और अपशिष्ट प्रबंध सेवा (टीएसडीएफ) के कार्य में पर्यावरण और सुरक्षा नियमों की गंभीर अनदेखी की गई थी । टीएसडीएफ यूनियन कार्बाइड, भोपाल के अपशिष्ट उपचार का दस लाख डॉलर का ठेका भी हासिल करने का प्रयास कर रही है । औद्योगिक स्वास्थ्य एवं सुरक्षा विभाग ने गुजरात कारखाना अधिनियम १९४८ के अंतर्गत बीइआयएल के विरूद्ध खतरनाक अपशिष्ट भंडारण के लिए दो शेडस की अनुमति के विरूद्ध सात शेडस बनाने का प्रकरण दर्ज किया है । प्रसंगवश यही वह सातवां शेड था जहां दुर्घटना हुई । मामले में और छानबीन जारी है । दुर्घटनास्थल, जहां पीपो में अपशिष्ट भंडारण किया जाता है से पहली बार शाम ५.३० बजे काला धुंआ उठता देखा गया था जिसकी सूचना प्रबंधन को तुरंत दी गई थी फिर भी महज दो किलोमीटर दूर स्थित आपदा सुरक्षा और प्रबंधन केन्द्र को इसकी सूचना ६ बजे मिल पाई । बीइआयएल से एक किलोमीटर दूर स्थित जिताली गांव के निवासियों ने पीपे हवा में उड़ते देखे लेकिन पंचायत भवन में कंपनी द्वारा स्थापित खतरे की सूचना देने वाला अलार्म नहीं बजा । बाद में जांच में पता लगा कि मूल प्रणाली को तार द्वारा जोड़ा ही नहीं गया था । अपने मोबाईल पर खींची दुर्घटना की तस्वीरें दिखाते हुए जिताली के रहवासी निलेश पटेल ने डाउन टू अर्थ को बताया कि जल्द ही अंधेरा छाने लगा एवं हवा इतनी कसैली हो गई थी कि सांस लेना मुश्किल हो रहा था । जिताली के पास के दो गांव सारंगपुर और ढढाल इनाम को भी खाली करने के आदेश दे दिए गए थे । चारों तरफ राख ही दिखाई दे रही थी । लोगों के घर की छत पर पत्थरों जैसी भारी वस्तुएं आ गिरी थीं वे सुबह तक जल रही थीं और उनमें से दुर्गन्ध निकल रही थी । हवा के रूख की ओर होने की वजह से जिताली सर्वाधिक प्रभावित रहा। अंकलेश्वर स्थित आपदा सुरक्षा एवं प्रबंधन केन्द्र के अग्नि एवं सुरक्षा प्रबंधक मनोज कोटड़िया का कहना था कि बीस किलोमीटर की गति से चलती हवा की वजह से धुंआ ठहर नहीं पाया और खाली जमीन की ओर इसके रूख की वजह से चारों ओर पड़े पीपों में आग नहीं लग पाई वर्ना बड़ा हादसा हो जाता । ढढाल इनाम में शाम को मदरसे से लौटते बच्चें ने जब धमाके की आवाज सुनी तो वे उत्सुकतावश उसी ओर भागे और धुएं की चपेट में आ गए । प्रदूषण के असर की जांच के लिए हवा में मौजूद जहरीली गैसों की पहचान आवश्यक होती है किंतु बीइआयएल अभी तक जलने वाले रसायनों के नामों का खुलासा नहीं कर पाया है । जबकि प्रबंधन केन्द्र के लिए अपेन यहां उपचार के लिए अपने वाले अपशिष्ट के प्रकार का रिकॉर्ड रखना और लेने से पहले उसकी जांच कर तस्दीक कर लेना कानूनन आवश्यक है । दुर्घटना के अगले दिन गुजरात प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने हवा की जांच के लिए जिताली, बीइआयएल और एवेंटिस नामक दवा फैक्ट्री में मशीनें लगा दी थी। अधिकारियों ने बताया कि स्थिति आमतौर पर नियंत्रण में है । लेकिन जब उनका ध्यान डायोक्सिन, फ्यूरॉन और अन्य अत्यंत खतरनाक रसायनों के नमूने एकत्र न करने की ओर आकृष्ट किया गया तो गुजरात प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के पर्यावरण यंत्री आर.जी. शाह का जवाब था `इसका क्या फायदा ? हमारे देश में किसी भी प्रयोगशाला ने इनकी जांच की व्यवस्था ही नहीं है ।' हाँ धातुकणों के नमूने जरूर ४ अप्रैल को मुम्बई स्थित नेटेल इण्डिया लेब को भेज दिए हैं । डाउन टू अर्थ ने जब ८ अप्रैल की शाम को नेटेल से सम्पर्क किया तो पता चला कि नमूने अभी भी उन तक नहीं पहुंचे थे । यह भस्मक अपशिष्ट को बहुत ऊँचे तापमान पर जलाता है जिससे इसका जहर हवा में घुल नहीं पाता, जबकि दुर्घटना में यह काफी कम तापमान पर जला जिससे हवा दूषित होने और फलस्वरूप भूमि और जल के भी दूषित होने की निश्चित संभावना है । नियमों के मुताबिक कोई भी औद्योगिक ईकाई अपने परिसर में ९० दिनों से ज्यादा अपशिष्ट संग्रहित नहीं रख सकती है किंतु बीइआयएल ने ५० टन प्रतिदिन उपचार क्षमता के विरूद्ध १२,८२५ टन अपशिष्ट संग्रहित कर रखा था । बीइआयएल की अपशिष्ट उपचार की दर १५ रू. प्रति किलो है और वह इसे अग्रिम लेता है, इस तरह उसके यहां कुल भंडारित अपशिष्ट का उपचार मूल्य १९ करोड़ रूपया जो वह प्राप्त् कर चुका है फिर भी उसने उपचार नहीं किया है । बल्कि दुर्घटना ने तो उसे २५० टन अपशिष्ट जलाकर ३७.५० लाख रूपयों का फायदा करा दिया है । बीइआयएल अधिकारियों, पुलिस और जिला प्रशासन अधिकारियों ने आग के कारणों पर चुप्पी साथ ली । जिला आपदा दल के शीर्ष अधिकारी जिलाधिकारी द्वारा संयोजित तीन सदस्यीय समिति ने अपनी रपट ९ अप्रैल को सौंप दी जिसमें उन्होंने दुर्घटना का निश्चित कारण जान सकने में असफलता स्वीकार की और संभावित कारण अपशिष्ट और लोहे के पीपों की बीच पायरोफोरिक रासायनिक क्रिया माना । रपट में अपर्याप्त् सुरक्षा उपायों की ओर भी ध्यान आकृष्ट किया गया । जिसमें गैस रिसाव से आग टकराने वाले सेंसरों का कार्यरत न होना, खतरनाक रसायनों की पहचान न किया जाना, उन्हें अलग-अलग संग्रह न किया जाना, आग से बचाव के लिए समुचित उपकरण न होना आदि शामिल हैं । गुजरात प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सदस्य सचिव संजीव त्यागी ने कहा कि कंपनी के विरूद्ध प्राथमिकी दर्ज करवाना हमारे क्षेत्राधिकार में नही है । जबकि मामाल निश्चित रूप से लापरवाही का है और आग मानव द्वारा लगाई गई प्रतीत होती है । एक बार निश्चित कारणों का पता लगने पर हम पर्यावरण नियमों के तहत कार्यवाही करेंगे । दुर्घटनास्थल पर कुछ और जानकारियां भी मिली हैं । जैसे कंपनी की ओर से फायर हाइड्रेंट की कोई अवस्था नहीं थी । दमकल कर्मचारियों को आग बुझाने में बड़ी मशक्कत करना पड़ी । सड़क बहुत सकरी होने और गहरे धुंए के कारण दमकल पहुंचने के लिए परिसर की पिछली दीवार का एक हिस्सा तोड़ना पड़ा । स्थानीय चिकित्सक के मुताबिक अगर मजदूर अंदर फंसे होते तो स्थित और खराब होती क्योंकि बाहर निकलने के लिए वहां कोई आकस्मिक दरवाजा भी नहीं है । दुर्घटना की अगली सुबह यहां लोगों को तेल और कीचड़ से सना पाया गया । यह सब कुछ जमीन के अंदर रिसेगा। यहां के कर्मचारी भी मास्क की कमी और थकान की शिकायत करते हैं । इस तरह के उपचार स्थलों पर तो सामान्य से ज्यादा निरीक्षण और सुरक्षा उपायों की दरकार होती हैं किन्तु इस मामले में तो ठीक इसका उल्टा हो रहा है । ***

शनिवार, 12 जनवरी, 2008

१० वातावरण

ग्लोबल वार्मिंग : जिम्मेदारी से भागता अमेरिका
जे. सकलेचा
कुछ साल पहले पर्यावरण कार्यकर्ता प्रोफेसर वांगारी एम. मथाई को शांति का नोबेल पुरस्कार दिए जारे पर उसे पर्यावरण के प्रति समर्पण का `सम्मान' निरूपित किया गया था । अब इस साल फिर यह प्रतिष्ठित सम्मान पर्यावरण के क्षैत्र को समर्पित किया गया है । यह पुरस्कार जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा गठित अंतर्राष्ट्रीय समिति (आइ्रपीसीसी) और अमेरिका के पूर्व उपराष्ट्रपति अलगोर को संयुक्त रूप से देने की घोषणा की गई है । नोबेल पुरस्कार की इस घोषणा से साफ है कि जलवायु परिवर्तन, खासकर वैश्विक गर्माहट (ग्लोबल वार्मिंग) में बढ़ोतरी को लेकर दुनिया की चिंता बढ़ती जा रही है । विडंबना यह है कि जिस देश के एकपूर्व उपप्रमुख को यह पुरस्कार देने का ऐलान किया गया है , वही देश वैश्विक तापमान को बढ़ाने में सबसे आगे है । जी हां, यहां बात उसी अमरीका की हो रही है जो विश्व स्तर पर एक चौथाई ग्रीन हाउस गैस उगलकर ग्लोबल वार्मिंग बढ़ाने में सर्वाधिक `योगदान' दे रहा है । नीम पर करेला यह कि उसने क्योटो संधि के अनुमोदन से भी इंकार करके इसकी सफलता पर ही सवालिया निशान लगा दिया है । ग्लोबल वार्मिंग बढ़ाने से चिंतित विश्व समुदाय ग्रीनहाउस गैसों के प्रभाव को कम करने के मकसद से इस संधि पर राज़ी हुआ है, लेकिन अमेरीका ने अपने `राष्ट्रहित' के नाम पर इसे पलीता लगाकर मानव जाति के कल्याण की सामूहिक वैश्विक प्रतिबद्धता की भावना को ताक पर रख दिया है । हम आगे बढ़ें, उससे पहले एक नजर क्योटो संधि पर डाल लेते हें । क्योटो प्रोटोकॉल या संधि को लेकर दिसंबर १९९७ में जापान के क्योटो शहर में वार्ताआे का क्रम शुरू हुआ था। इसी वजह से इसे `क्योटो संधि' नाम दिया गया हे । नवंबर २००४ में रूस द्वारा अनुमोदन के बाद इसके क्रियान्वयन का रास्ता साफ हो गया । यह १६ फरवरी २००५ से लागू कर दी गई । यह संधि विश्व के औद्योगिक देशों को छह ग्रीनहाउस गैसों - कार्बन डाइऑक्साईड, मीथेन, नाइट्रस ऑक्साईड, सल्फर हेक्साफ्लोराइड, एचएफसी और पीएफसी में एक निश्चित सीमा तक कटौती करने को आध्य करती है । इसके तहत वर्ष २०१२ तक ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन के स्तर को १९९० के स्तर से ५.२ फीसदी कम करना है । वैसे विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वाकई अस लक्ष्य को हासिल कर लिया जाता है प्रभावी तौर पर यह कटौती २९ फीसदी तक होगी। इस प्रकार बढ़ते वैश्विक तापमान के इस दौर में यह संधि पूरी मानव जाति के लिए वरदान साबित हो सकती है । लेकिन अड़ंगा है तो केवल अमरीका का। अमरीका ने इसका अनुमोदन करने से अंकार कर दिया। हालांकि पूर्व डेमोक्रेट राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने इस पर हस्ताक्षर किए थे लेकिन २००१ में जार्ज डब्ल्यू. बुश के राष्ट्रपति बनने के बाद उन्होंने इसे अनुमोदन के लिए कांग्रेस में पेश नहंी किया । बुश ने संभवत: ऐसा सीनेट में इस तरह की किसी संधि के खिलाफ ९५-० से पारित एक प्रस्ताव के मद्देनजर किया था । सीनेट का कहना था कि वह ऐसी किसी `भेदभावपूर्ण' वैश्विक संधि का समर्थन नही कर सकती जो केवल औद्योगिक देशों पर बंधनकारी हो । यहां एक सवाल उठता है कि नोबेल पुरस्कार विजेता अल गौर अगर राष्ट्रपति होते तो कया वे अमरीकी संसद को ऐसी संधि के अनुमोदन के लिए मना पाते । वर्ष २३००० के राष्ट्रपति चुनाव मे बुश के ख्लिाफ अल गौर ही डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मदीवार थे और विवादास्पद मतगणना मेंबहुत ही कम अंतर से पराजित हुए थे । अल गोर दुनिया के उन चुनिंदा राजनीतिज्ञों में शामिल हैं , जो राजनीति की शतरंज पर मोहरे चलने के साथ- साथ पर्यावरण संरक्षण के प्रति भी सक्रिय रहे हैं। उप राष्ट्रपति के पद पर रहते हुए वर्ष १९९४ में उन्होंने पृथ्वी दिवस के दिन विद्यार्थियों में पर्यावरण संरक्षण को लेकर जागृति पैदा करने के मकसद से `ग्लोब कार्यक्रम' शुरू किया था । उनकी चिंता के केन्द्र में ग्लोबल वार्मिंग सदैव से रहा है । वे जगह-जगह घुमकर इसके खतरों के प्रति अलख जगाते आए हैं । उनके संगठन `सेव अवरसेल्व्स' के तत्वावधान में ७ जुलाई २००७ को `लाइव अर्थ' नाम से संगीत कार्यक्रम का आयोजन किया गया था जिसमें संगीत के क्षैत्र की कई हस्तियों ने भागीदारी की थी । गोर ने क्योटो संधि की भी जोरदार पैरवी की है। लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि अमरीका के अन्य राजनेताआे की सोच उनकी जैसी नहीं है वे ऐसी किसी भी संधि को मानने को तैयार नहीं है जो अमरीका की अर्थव्यवस्था पर विपरीत असर डाले । सवाल यह है कि कया अमरीका भी भागीदारी के बगैर क्योटो जैसी संधियों की कोई प्रासंगिकता है ? दिक्कत यह है कि अमरीका ऐसी संध्यिों को मानने को बिल्कुल तैयार नहंी है क्योंकि इसमें उसके आर्थिक हित आड़े आते हैं । अमरीका की जैसी नीति रही है, उसके चलते आगे भी उससे कोई विशेष उम्मीद नही रखी जा सकती और फिलहाल तो अमेरीका की अर्थव्यवस्था डांवाडोल चल रही है , डॉलर न्यूनतम स्तर पर है और `यूरो' के साथ संघर्षशील है , कच्च्े तेल की कीमते १०० डॉलर प्रति बैरल तक जा पहुंची है । ऐसे में अमरीका नहीं चाहेगा कि पर्यावरण संरक्षण के नाम पर उसकी अर्थव्यवस्था को कोई और धक्का लगे । लेकिन आईपीसीसी की हाल ही जारी रिपोट्र के संदर्भ में एक बड़ा सवाल यह भी उठता है कि आखिर अमरीका इस दुनिया में अपनी `बादशाहत' कायम करके कया पाना चाहेगा जो शायद अगले कुछ दशकों में रहने लायक भी नहीं बचेगी । आईपीसीसी ने १७ नवंबर को स्पेन के वैलेंशिया में जारी अपनी चौथी और अंतिम रिपोर्ट में कड़ी चेतावनी देते हुए कहा है कि ग्लोबल वार्मिंग की क्षतिपूर्ति नहीं हो पाएगी । इसके दुष्प्रभाव से कोई भी देश नहीं बच पाएगा । सैकड़ों वैज्ञानिकों व पर्यावरण विशेषज्ञों द्वारा तैयार इस रिपोर्ट की विश्वसनीयता असंदिग्ध है, इस पर कोई सवाल नहीं उठाया जा सकता । शायद खुद अमरीका भी इसके निष्कर्षो से असहमति नहीं जता सकता । इसलिए इस रिपोर्ट की उपरोक्त चेतावनी से भी वह शायद ही असहमत होगा कि ग्लोबल वार्मिंग के दुष्प्रभावों से कोई भी देश नहीं बच सकता । यह सच है कि गरीब व विकासशील देशों को इसकी ज्यादा कीमत चुकानी होगी, लेकिन अमरीका जैसे विकसित देश भी इसके प्रभाव से अछूते नहीं रह पाएंगे । आखिर ऐसे किसी कवच का निर्माण तो अब तक अमरीका भी नहीं कर पाया है और न ही कर पाना संभव है कि बाहर पूरी दुनिया जलती रहे और वह कवच के भीतर बैठकर खुद को सुरक्षित महसूस कर सके । अंत में आईपीसीसी के अध्यक्ष डॉ. आर.के. पचौरी का यह कथन महत्वपूर्ण है जो उन्होंने अंतिम रिपोर्ट जारी करते हुए व्यक्त किया था, ``हमें अब उन मूल्यों या नैतिकता की जरूरत है जिनमें हर मानव अपनी जीवन प्रणाली व व्यवहार में बदलाव कर उस चुनौती का सामना करने के लिए कमर कस सके जो हमारे सामने पेश आ रही है ।'' क्या अमरीकी शासन इस पर ध्यान देंगे ? आखिर इस दुनिया को तपने से बचाने की जिम्मेदारी केवल मथाई, बहुगुणा, पचौरी या अल गोर की तो नहीं है ! ***

मंगलवार, 26 जून, 2007

४ वातावरण

४ वातावरण
भारत ग्लोबल वॉर्मिंग का सामना कैसे करे ?
सुश्री रेशमा भारती
हाल के समय में हुए कई वैज्ञानिक अध्ययन-अनुसंधानों और विश्व के कई भागों में प्रकट जलवायु परिवर्तन की विकट स्थितियों ने ग्लोबल वॉर्मिंग के संकट की गंभीरता को प्रकट किया है और इसका सामना करने के लिए बिना विलंब के ठोस व अहम कदम उठाने की जरूरत पर बल दिया है ।
विश्व भर में इस संकट का सामना करने के लिए ग्रीन हाऊस गैसोंके बढते उत्सर्जन को कम करने की बुनियादी जरूरत को महसूस किया जा रहा है । औद्योगीकरण, मशीनीकरण वाली दुनिया में इसे एक गंभीर चुनौती माना गया है ।
तेजी से विकसित होती भारत की अर्थव्यवस्था भी काफी ग्रीन हाऊस गैसों के उत्सर्जन की स्थिति पैदा कर रही है । कार्बन डायॉक्साइड के उत्सर्जन में भारत विश्व के चार-पाँच प्रमुख देशों में से एक है ।
इंटरगर्वंमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आई.पी.सी.सी ) के अध्यक्ष डॉ. आर.के. पचौरी का मानना है कि जलवायु परिवर्तन का सामना करने के संदर्भ में भारत को एशिया में प्रमुख सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए ।
सवाल उठता है कि ग्लोबल वॉर्मिंग का सामना करने के लिए भारत कौन-सा मार्ग अपनाएगा ? क्या वह आकर्षक दिखने वाले उस गैर टिकाऊ व विसंगतिपूर्ण विकास को अंधाधुंध अपनाएगा जिस पर चलकर स्वयं कई विकसित देश आज थके हुए व हताश मालूम होते हैं? तब तो शायद वह भी स्वयं को महज कुछ ग्रीन व ईको फैं्रडली दिखाकर फील गुड करके संतुष्ट हो लेगा ! अथवा क्या भारत कई अन्य देशों की स्थिति व स्वयं अपने अतीत के अनुभवों से ठोस सबक लेता हुआ वैकल्पिक विकास की नई राहें तलाशेगा ? ग्लोबल वॉर्मिंग का सामना करने में कई विकसित देशों की दोहरी नीतियों पर भारत का क्या रूख होगा ?
बेलगाम बढता औद्योगिकरण, मशीनीकरणण, शहरीकरण बिजली की खपत को बेइंतहा बढा रहा है । जहां एक ओर कोयला तेल जैसे जीवाश्म इंर्धनों की खपत को कम करना जरूरी है; वहीं दूसरी ओर यह समझना भी जरूरी है कि ऊर्जा के वैकल्पिक स्त्रोतों की भी अपनी कई सीमाएं हैं ।
बडी पनबिजली योजनाआें से जुडे पर्यावरण संबंधी नुकसानों, विस्थापन, बाढ की बढती समस्या, दुर्घटनाआें की संभावना, अपेक्षित लाभ न मिल पाना, सिकुडते ग्लेशियरों के चलते इनके अनिश्चित भविष्य ने इनपर कई सवाल खडे किए हैं। कई वैज्ञानिकों-पर्यावरणविदों ने बांधों के जलाशय की सतह से व पनबिजली सयंत्र संचालन के दौरान होने वाले ग्रीन हाऊस गैस उत्सर्जन की समस्या पर भी ध्यान दिलाया है ।
परमाणु ऊर्जा में रेडियोएक्टिव कचरे से होने वाले प्रदूषण की गंभीर समस्या है जो भूमिगत जल में भी फैल सकता है और शेष पर्यावरण में भी । परमाणु ऊर्जा सयंत्रों में दुर्घटना व चोरी की संभावना भी मौजूद रहती है । परमाणु इंर्धन की मौजूदगी अधिकाधिक हिंसक होती दुनिया में अपने आप में खतरा तो उपस्थित करती ही हैं ।
ऊर्जा के वैकल्पिक स्त्रोतों के रूप में सौर व पवन ऊर्जा को भी महत्त्वपूर्ण माना गया है । बिजली की बचत करने वाली तकनीकों को भी प्रोत्साहन मिल रहा है ।
हर संभव तरीके से बिजली की बचत करने वाली तकनीकों को भी प्रोत्साहन मिल रहा है ।
हर संभव तरीके से बिजली की बचत करना आज की जरूरत है । अधिक बिजली खींचने वाले उपकरणों जैसे ए.सी., फ्रिज (जो ओजोन परत को भी नुकसान पहुँचाते हैं), कम्प्यूटर आदि का उपयोग यथासंभव सीमित किया जाए । इसके प्रति विशेष सजग रहा जाए कि जब जरूरत न हो तब बिजली के उपकरण अवश्य बंद रहें। बिजली की जरूरतों को कम करना प्राथमिकता होनी चाहिए । विकल्पों को भी अंधाधुंध नहीं अपनाया चाहिए और वैकल्पिक वस्तुआें को अपनाते हुए इस बात का भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि क्या समाज में मेहनतकश गरीबों के लिए वैकल्पिक रोजगार भी पनप रहे हैं या नहीं।
बढती कार्बन डायॉक्साइड को एकत्र कर भूमिगत या समुद्र की गहराईयों में छोड देना धरती व समुद्र की प्रकृतिपर बोझ तो होगा ही; साथ ही इस प्रक्रिया के दौरान भी कार्बन डायॉक्साइड वातावरण् में छूट सकती हैं और यह खतरा पैदा करती हैं ।
बायोइंर्धन के अंधाधुंध प्रसार पर भी सवाल उठे हैं । इसके कच्च्े माल की खेती के अंधाधुंध प्रसार से पर्यावरण, जैव विविधता, सीमित भूमि संसाधन पर पडते दबावों और इसकी रसायनयुक्त खेती के प्रसार से मोनोकल्चर को मिलता बढावा सवालों के घेरे में है । बायोइंर्धन निर्माण प्रक्रिया व ट्रांसपोर्ट में होते ग्रीन हाऊस गैस उत्सर्जन पर भी चिंता प्रकट हुई है । वस्तुत: इंर्धन की खपत ही कम करना प्राथमिकता होनी चाहिए ।
वाहनों के संदर्भ में अपेक्षाकृत कम प्रदूषण करने वाली तकनीकों व इंर्धनों को कई जगह बढावा दिया जा रहा है । सार्वजनिक वाहनों की गुणवत्ता में सुधार व उनको बढावा दिया जाना चाहिए । साथ ही, बेलगाम बढते निजी वाहनों पर नियंत्रण बहुत जरूरी है । कुछ पश्चिमी देशों में सुव (डणत) जैसे बडे व काफी प्रदूषण करने वाले वाहनों पर कुछ सीमाएं लगायी जा रही हैं । हमें भी इससे सबक लेना चाहिए। एक विरोधाभास देश की राजधानी दिल्ली में यह देखा जा रहा है कि सडके चौडी करने व बेहतर सार्वजनिक वाहन सेवा की व्यवस्था के नाम पर बडी संख्या में पेड काटे जा रहे है ! इस तरह के दोहरे मापदण्डो से अंतत: पर्यावरण् की क्षति ही होती है ।
वायुयानों से होने वाला काफी ग्रीन हाऊस गैस उत्सर्जन सीधा वायुमण्डल की ऊपरी सतहों को प्रदूषित करता है, ओजोन परत को नुकसान पहुँचाता है वायुमण्डल का रेडियोएक्टिव संतुलन बिगाडता है । बेइंतहा बढती हवाई यात्राआें को सीमित करना प्राथमिकता होनी चाहिए।
साईकिल, साईकिल रिक्शा व पैदल चलने वालों को प्रोत्साहन मिलना चाहिए । घर व कार्यस्थल की दूरियों को यथासंभव कम करने की दिशा में भी सोचा जा सकता है । इसके अतिरिक्त निजी मोटर वाहनों का सोच समझकर किया गया सीमित उपयोग ठीक रहेगा जैसे सामान्य कम दूरी के कामों के लिए मोटर वाहन का उपयोग न करना, अपने वाहनों में यथासंभव परिचितों के साथ मिलकर यात्रा करना आदि सुलभ उपाय हैं।
हर तरह से जल-संरक्षण को बढावा देना जरूरी है । वर्षा जल संचयन की पद्धतियों को बढावा मिलना चाहिए और परम्परागत जल संरक्षण विधियों से भी सीखा जाना चाहिए। परम्परागत जल स्त्रोतों की देखरेख व वृक्षारोपण को प्रोत्साहन मिलना चाहिए।
कार्बन ट्रेडिंग वस्तुत: ग्लोबल वॉर्मिंग का सामना करने के नाम पर भ्रमपूर्ण स्थिति ही अधिक पैदा करती है और कुछ संकीर्ण हितों की पूर्ति करती है। जहां एक ओर महज कार्बन क्रेडिट में निवेश करके विकसित देश अपना ग्रीन हाऊस गैस उत्सर्जन बढाते रहते है; वहीं दूसरी ओर विकासशील देशों में इस ट्रेडिंग के अंतर्गत होने वाले प्रोजेक्ट भी ग्रीन हाऊस गैस उत्सर्जन में काई वास्तविक व उल्लेखनीय कटौती करने के स्थान पर कई बार कुछ नई समस्याएं ही पैदा कर देते हैं (जैसे परम्परागत जंगलों को काटकर किसी नए किस्म के पेड-पौधे का प्रसार अथवा मोनोकल्चर को मिलता बढावा)।
गांवों में जलवायु परिवर्तन की मार झेलते कृषकों व अन्य ग्रामवासियों को विशेष सहायता की जरूरत है। परम्परागत जल स्त्रोतों के उत्थान और बिजली-पानी की बचत की ओर ध्यान देना होगा। गैर रसायनिक, गैर मशीनीकृत, गैर जी.एम., परम्परागत खेती की ओर लौटना होगा और जलवायु परिवर्तन की नई चुनौतियों का सामना करने के अनुरूप कदम खेती में उठाने होंगे। जलवायु बदलाव व प्राकृतिक आपदाआें के दौर में गांवों से बढते पलायन को कम करने के लिए गांवों में छोटे स्तर के श्रम प्रधान, उत्पादनात्मक, रचनात्मक व गांवों की बुनियादी जरूरतों की पूर्ति में आत्मनिर्भरता लाने वाले रोजगारों का सृजन करना होगा।
यह सब तभी संभव है जब भूमण्डलीकरण की ताकतों द्वारा प्राकृतिक संसाधनों की खुली लूट व उसके चलते गांववासियों को उनके जल-जंगल-जमीन से वंचित किए जाने का अन्यायपूर्ण सिसलिता थमेगा।
बढते उपभोक्तावाद, बढती विषमता, बेलगाम बढते औद्योगिकरण-मशीनीकरण और प्राकृतिक संसाधनों की अन्यायपूर्ण लूट की प्रक्रिया प्राकृतिक असंतुलन और ग्लोबल वॉर्मिंग को बढाएगी ही। ग्लोबल वॉर्मिंग की प्रकट होती गंभीर चुनौती विकास के इस प्रचलित रास्ते पर प्रश्नचिह्र लगाती है और संतोष, सादगी, समता व प्राकृतिक जीवन शैली के महत्व को उभारती है। ***

गुरुवार, 31 मई, 2007

गंदगी से फैलता जहर

वातावरण

गंदगी से फैलता जहर

कुशलपाल सिंह यादव

नागरीय निकाय अपना इलाका साफ रखने के लिए अभी तक तो अपने आस-पड़ौस को ही प्रदूषित कर रहे थे। अब तो वे दूसरे राज्यों में जंगलों इत्यादि में कचरा फेंककर पर्यावरण को जबरदस्त नुकसान पहुंचा रहे हैं। वहीं इस कचरे से बिजली उत्पादन करने वाले संयंत्र भी बड़े स्तर पर प्रदूषण फैला रहे हैं।

दिसम्बर २००६ में कोची नगर निगम ने अपशिष्ट निपटान का एक अद्भुत तरीका इजाद किया। इसके अंतर्गत उन्होंने कचरे से भरे ट्रकों को न केवल नजदीकी जिलों के गांवों में, बल्कि नजदीक के राज्यों में भी खाली करने को भेज दिया। इस कचरे को ले जाने हेतु एक ठेकेदार से १३६५ रुपये प्रति टन का भाव तय हुआ था। विचारणीय तथ्य यह है कि नगर निगम ने ठेकेदार से यह पूछने का कष्ट भी नहीं उठाया कि वह यह कचरा कहां फेंकेगा और यह कि क्या उसमें उन गांवों से अनापत्ति प्रमाण-पत्र ले लिया है जहां पर कि यह कचरा फंेका जाना है।

कुछ ही दिन पश्चात् कचरे से लगे १९ ट्रकों का काफिला पड़ौसी कर्नाटक राज्य के बंदिपुर राष्ट्रीय पार्क के मुलाहल्ला वन नाके पर पहँुचा। ये ट्रक केरल के पाँच जिलों को पार करके उस नाके से करीब २० किमी. दूर गुंडुल्पेट नामक छोटे से गांव में कचरा फेंकने जा रहे थे। वन रक्षक ने इस हेतु आवश्यक कागजों की मांग करने पर ट्रक ड्राईवरों ने कोची नगर निगम और ठेकेदारों के बीच हुआ अनुबंध उसे दिखाया। ड्राईवरों को उस रात नाके पर ही रोक लिया गया। अगले दिन मामला निपटा दिया गया और उस कचरे को वहीं पास की किसी निजी भूमि पर डाल दिया गया।

स्थानीय निवासियों ने नगर निगम को लज्जित करते हुए इसका भरपूर नैतिक विरोध किया। केरल और तमिलनाडू के सीमावर्ती क्षेत्रों जैसे कम्बामेट्टू आदि जगह तो ट्रक ड्राईवरों से झूमा-झटकी भी की गई। इस कारण ये वाहन कचरा फेंकने का स्थान ढूंढने के लिये इधर-उधर मारे-मारे फिरते रहे। इसी क्रम में ४ जनवरी २००७ को आठ ट्रकों द्वारा पालक्कड़ जिले के नेल्लीप्पेली के नजदीक स्थित वीरान्दोट्टा में कचरा फंेंकने को लेकर पुलिस में रिपोर्ट करने गये व्यक्तियों ने इतना उग्र प्रदर्शन किया कि पुलिस को लाठी चार्ज करना पड़ा। इस सबके चलते नगर निगम ने एक अन्य ठेकेदार को यह ठेका दे दिया जिसके बारे में कहा जा रहा है कि उसके पास इस अपशिष्ट के निपटान हेतु गुड्डालोटे में जमीन व आवश्यक संसाधन उपलब्ध है।

कोची नगर निगम द्वारा हड़बड़ी में लिये जा रहे कदमों पर विचार करना आवश्यक है। ७ लाख जनसंख्या के इस शहर में अपशिष्ट निपटान का कोई ठीक-ठाक प्रबंध नहीं था। पूर्व में जो भूमि इस हेतु ली गई थी वह उस पानी के स्त्रोत के मुहाने पर भी जिससे कि पानी नदी में पहँुचता है। इसके अतिरिक्त चार गांवों के निवासी न केवल पीने के पानी हेतु इस पर निर्भर हैं बल्कि ३०० मछुआरों के परिवारों की जीविका भी इसी पर निर्भर है। इसके विरोध में ग्रामवासियों ने आंदोलन किया और अंतत: वह स्थान बदल गया।

इन सब विवादों के चलते कोची नगर निगम ने कोचीन पोर्ट ट्रस्ट के नजदीक की अपने स्वामित्व की जमीन जो कि वेलिंगटन द्वीप पर स्थित भारतीय नौ सेना के दक्षिणी कमान के पास स्थित थी पर कचरा निपटान का कार्य प्रारंभ किया। नौसेना ने थोड़े समय के लिये कि जब तक निपटान का यथोचित तंत्र खड़ा न हो जाए अनुमति भी दे दी। पर जब इससे समस्या खड़ी होने लग गई तो नौसेना ने नगर निगम से चर्चा की। क्योंकि कचरे की वजह से वहाँ आ रहे पक्षियों के कारण विमान वाही पोत गरुड़ के विमानों को खतरा पैदा होने लगा था।

इसी दौरान केरल उच्च न्यायालय ने नगर निगम को निर्देशित किया कि वह ब्रह्मापुरम में अपशिष्ट निपटान का कार्य करे। साथ ही न्यायालय ने पुलिस को आदेश दिया कि गांववासियों के विरोध के चलते वे अधिकारियों को संरक्षण प्रदान करें।

दूसरी ओर न्यायालय इस बात पर भी विचार कर रहा है कि क्या निगम ने ठोस अपशिष्ट निपटान की विस्तृत योजना उसके सम्मुख प्रस्तुत न कर उसकी अवमानना की है? इसी दौरान निगम ने पुन: अपशिष्ट निपटान के स्थल में परिवर्तन का मन बना लिया है।

अनुमान है कि केरल में प्रतिदिन ३००० टन कचरा पैदा होता है। इसमें से आधे से भी कम इकट्ठा होता है और उसमें से भी बहुत ही थोड़ी मात्रा को पुर्न:चक्रण (रिसायकल) किया जाता है एवं बाकी का या तो पानी के स्थानीय स्त्रोतों या बहुत ही नजदीक के क्षेत्रों में भराव के काम में ले लिया जाता है।

शहरी भारत में अनेक स्थानों पर कचरे से निपटने की तथाकथित कार्यवाहियाँ चल रही हैं। गुजरात के सूरत नगर निगम ने शहर के पश्चिम में करीब १५ किमी. की दूरी पर ३.६ हेक्टेयर खारे पानी वाली भूमि को कचरे से भरने हेतु नियत किया है। तीन वर्ष पूर्व निर्मित यह स्थान अभी भी प्रयोग में नहीं आ रहा है। इसकी वजह यह है कि गुजरात प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने वहां पर कचरे के भराव की अनुमति नहीं दी है। इस संदर्भ में बोर्ड ने ठोस अपशिष्ट निवारण नियम २००० का कड़ाई से पालन करवाने का निश्चय किया है। जिसके अंतर्गत सिर्फ वो ही कचरा भरा जा सकता है जिसका पुर्न:चक्रण नहीं किया जा सकता हो। चंूकि निगम के पास दोनों तरह के अपशिष्टों को अलग-अलग करने की व्यवस्था नहीं है अतएव वह इसका उपयोग नहीं कर पा रहा है।

जहां सूरत और कोची के माध्यम से कचरे के भराव में आने वाली मुश्किलों पर प्रकाश पड़ा है वहीं इस दौरान कचरे से उर्जा जैसे संयंत्रों के प्रति भी अतिरेक भरा उत्साह भी पैदा हो गया है। इसकी खास वजह है कि इस पर सरकार द्वारा दी जाने वाली सब्सिडी।

केन्द्रीय वैकल्पिक उर्जा मंत्रालय (न्यू एवं रिन्यूवेबल एनर्जी) इस हेतु ब्याज पर २ करोड़ रुपये तक की छूट उपलब्ध करवाता है। इतना ही नहीं इसमें अनेक अन्य सुविधाआें के साथ ही साथ ३० वर्षोंा तक मुफ्त कचरा उपलब्ध कराने का आश्वासन भी शामिल है। यह नीति व्यापारियों को इस तरह प्रोत्साहित करती है, जिससे सरकार और व्यापारियों की बंदरबाट चलती रहती है। इसके बावजूद इस तरह के मात्र चार संयंत्र अभी तक भारत में सामने आए हैंं। ये हैं आंध्रप्रदेश के हैदराबाद व विजयवाड़ा, उत्तरप्रदेश में लखनऊ और दिल्ली। इसमें से दिल्ली का संयंत्र सन् १९९० में प्रारंभ हुआ और मात्र २१ दिन चलकर अभी तक बंद है। लखनऊ के संयंत्र की नींव सन् १९९८ में तत्कालीन प्रधानमंत्री ने रखी थी, परंतु वह अब तक प्रारंभ नहीं हो पाया है।

वहीं हैदराबाद के नजदीक सेल्को इण्डस्ट्रीज द्वारा सन् १९९० में प्रारंभ हुए संयंत्र में हैदराबाद के कचरे के निपटान के कारण समीपस्थ भू-जल पूरी तरह से दूषित हो गया है। यहां स्थित घरों में लोगों को बोतलबंद पानी खरीदकर पीना पड़ रहा है। परंतु बोतलबंद पानी से खेती संभव तो नहीं हो सकती, अतएव वहां पर खेती पूर्णतया समाप्त हो गई है। इसी के साथ खुले में पड़े कबाड़ जिसमें प्लास्टिक और अन्य जहरीले पदार्थ जैसे बैटरी, टूटे थर्मामीटर, रयासन रखने के डिब्बे आदि के जलने से आसपास का पूरा वातावरण दूषित हो गया है। सन् २००१ में आसपास की तीन छोटी बस्तियों के बाशिंदे १५ दिनों तक संयंत्र के दरवाजे पर धरने पर बैठे रहे। इसी दौरान आंध्रप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने पानी की जांच में पाया कि भू-जल पूरी तरह से प्रदूषित हो चुका है। इसमें तेजाब, क्लोराईड, सल्फेट और नाईट्रेट की मात्रा अत्यधिक हो गई है जिससे कि कैंसर जैसी बीमारियां भी हो सकती हैं। जिसके पश्चात् संयंत्र पर रोक लगा दी गई। परंतु संयंत्र के मालिक ताकतवर लोग थे अतएव एक महीने में ही उक्त आदेश वापस ले लिया गया।

इसी दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने इस तरह के संयंत्रों की जांच हेतु कमेटी गठन करने का आदेश दिया। परंतु जो कमेटी गठित हुई उनमें से अधिकांश सदस्यों का इन संयंत्रों के विकास में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष सहयोग रहा था। अतएव इसके सदस्यों ने अलग-अलग मन्तव्य की रिपोर्ट प्रस्तुत की। वहीं विशेषज्ञों का साफतौर पर मानना है कि अपशिष्ट उर्जा संयंत्र गर्म देशों में सफल हो ही नहीं सकते। दूसरी ओर आर्थिक रुप से भी ये लाभप्रद नहीं है। क्योंकि इनमें हमारे जैसे देश में यदि १०० इकाई कचरा डाला जाए तो २५ इकाई ऊर्जा मिलती है वहीं ठंडे व यूरोपीय देशों में ३४ यूनिट तक ऊर्जा प्राप्त होती है।

इसके बावजूद मंत्रालय ने सितंबर २००६ में फरमान निकाला कि बड़े शहरों के आसपास ऐसे १००० संयंत्र लगाये जाएं। दूसरी ओर योजना आयोग का कहना है कि कम्पोस्ट संयंत्रों में निर्मित जैविक खाद पर सब्सिडी देने का प्रावधान हो, क्योंकि भारत मात्र रासायनिक खादों पर ही १४००० करोड़ की सब्सिडी दे रहा है।

आज आवश्यकता है कि अपशिष्ट प्रबंधन को संस्थागत किया जाए। अभी तक अपशिष्ट प्रबंधन नगर निगम के स्वास्थ्य विभाग के अंतर्गत किया जाता है। जो कि किसी स्वास्थ्य चिकित्सक के अधीन होता है एवं वह इस विषय का विशेषज्ञ भी नहीं होता। दूसरी ओर इस निजी क्षेत्र के कई संस्थान व व्यक्ति कम्पोस्ट खाद का संयंत्र डालने को तैयार हैं, जिन्हें कि प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

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शनिवार, 31 मार्च, 2007

पड़ती भूमि पर पुनर्विचार की ज़रुरत

2 हमारा आसपास

पड़ती भूमि पर पुनर्विचार की ज़रुरत

जयश्री वेंकटेशन

पिछले दिनों पड़ती भूमि कई कारणों से खबरों में रही। तमिलनाडु सरकार ने यह कदम उठाया कि राज्य के भूमिहीनों को ढाई-ढाई एकड़ जमीन दी जाएगी। इस निर्णय के चलते यह बहस छिड़ गई कि जमीन आएगीकहां से?

इसी प्रकार से चेन्नै जैसे महानगरों के आसपास सेटेलाइट टाउन निर्मित करने क