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बुधवार, 21 मई, 2008

३ हमारा भूमण्डल

आटे दाल के भाव
सेव्वी सौम्य मिश्रा
खाद्य एवं कृषि संगठन (एफ.ए.ओ.) ने अपनी खाद्य दृष्टिकोण रिपोर्ट में खाद्यानों के मूल्यों में आगामी १० वर्षो तक वृद्धि का अनुमान लगाया है । हाल ही के वर्षो में अधिकांश खाद्यान्नों की आपूर्ति में जहां कमी आई है वहीं भोजन, चारा व औद्योगिक उपभोग के बढ़ने से इनकी मांग में भी अत्यधिक वृद्धि हुई है । हालांकि २००७-०८ में वैश्विक खाद्य उत्पादन में ५ प्रतिशत की वृद्धि का अनुमान तो है परंतु यह वृद्धि मक्का जो कि बायो इंर्धन में इस्तेमाल होने वाला मुख्य खाद्यान्न है, के उत्पादन में होगी । गेहूँ - दक्षिण पश्चिम अमेरिका और उत्तरी चीन में ठंड के मौसम में गेहूँ की कमजोर फसल के कारण फरवरी २००८ में गेहूँ की कीमतों में १५ प्रतिशत की वृद्धि हुई है । दिसंबर २००५ व दिसम्बर २००७ के मध्य गेहूँ की कीमतों में जबरदस्त उछाल आया और इस दौरान यें प्रतिटन १६७ डालर से बढ़कर ३८१ प्रतिटन तक पहुंच गई और वर्तमान में ये ४४९ डालर प्रतिटन तक पहुंच गई है । कुल मिलाकर यह वृद्धि करीब ११५ प्रतिशत बैठती है । मूल्य वृद्धि का कारण विश्व में गेहूँ के दूसरे सबसे बड़े आपूर्तिकर्ता राष्ट्र आस्ट्रेलिया में पड़ने वाला अकाल है । आस्ट्रेलिया में सामान्यता उत्पादन २५ मिलियन टन रह गया है । वही कनाडा, युरोपिय यूनियन, तुर्की और सीरिया में भी विपरीत मौसम की वजह से निर्यात में कमी आई है । गेहूँ की मांग बायोइंर्धन और चारे के रुप में बढ़ने से भी अंतराष्ट्रीय आपूर्ति प्रभावित हुई है । इस कमी की वजह से भारत को लगातार दूसरे वर्ष भी गेहूूँ का आयात करना पड़ा है । २००७-०८ में भारत ने ०.६८ मिलियन टन एवं २००६-०७ में ५.८ मिलियन टन गेंहूँ का आयात किया था । कृषि लागत एवं मूल्य आयोग के अध्यक्ष टी.हक का कहना है कि २००८-०९ में भारत को गेहूँ के आयात की आवश्यकता नही होगी । वहीं एक अन्य अनुमान के अनुसार भारत को अपने भंडार में वृद्धि के लिए ३ मिलियन टन गेंहूँ का आयात करना पड़ सकता है । चावल - मार्च २००८ में चावल का मूल्य प्रति टन ५०० डालर की सीमा को पार कर गया जो कि पिछले २० वर्षो में अधिकतम है । जानकारी के अनुसार चावल की कीमत में दो गुनी से ज्यादा वृद्धि हुई है । फिलीपीन्स व अफ्रीकी देशों मेें बढ़ती मांग से भी यह मूल्यवृद्धि हुई है । साथ ही पाकिस्तान में बिजली की कमी से चावल मिलों का बंद होना और चीन एवं भारत द्वारा चावल निर्यात पर रोक लगाना भी इस मूल्य वृद्धि के अन्य कारण हैं । भारत ने जहां मेडागास्कर, मारीशस व समुद्री तूफान से ग्रस्त बांग्लादेश के लिए आंशिक छूट दी है वहीं चीन ने तो इसके निर्यात पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है । इसी दौरान वियतनाम ने फिलीपीन्स को टूटा हुआ चावल ७५० डालर प्रतिटन के भाव से बेचा । निर्यातकर्ताआें ने भी कीमतों में वृद्धि की संभावना के मद्देनजर चावल का भंडारण कर लिया है । वहीं पाकिस्तान में कुछ ही महीनों में चावल की कीमतों में ६० प्रतिशत की वृद्धि हुई है । मक्का - दिसम्बर २००५ से दिसम्बर २००७ के मध्य मक्का की कीमतें १०३ डालर प्रतिटन से बढ़कर १८० डालर प्रतिटन तक पहुंच गई । २००७-०८ में मोटे अनाजों के उत्पादन में ९ प्रतिशत की रिकार्ड वृद्धि हुई जिसमें मक्का का सर्वाधिक योगदान है । इसके बावजूद इसकी कीमतें पिछले १० वर्षो के अधिकतक स्तर २३० डालर प्रतिटन पर पहुंच गई । इसकी वजह है मक्का का बायोइंर्धन और चारे के लिए किया जाने वाला उपयोग । मक्का के निर्यात में अमेरिका की हिस्सेदारी ६० प्रतिशत से भी अधिक है । परंतु इस दौरान उसने इसकी एक चौथाई खपत बायो इंर्धन के उत्पादन में कर ली । इस कार्य में उसने २००६-०७ में बढ़कर ८१.३ मिलियन टन हो जाने के अनुमान है । तिलहन - पिछले डेढ़ वर्षो में सोयाबीन तेल और पाम आईल के भावों में जबरदस्त तेजी आई है । खाद्य पदार्थो में सर्वाधिक मूल्य वृद्धि इसी वर्ग में हुई है एवं इसके जारी रहने की संभावना भी है। पिछले एक वर्ष में पाम आईल की कीमतें ३५० डालर से बढ़कर १२५० डालर पर पहुंच गई यानि की इनमें करीब ३.५ गुना वृद्धि दर्ज की गई है । वहीं सोयाबीन तेल की कीमतें बढ़कर ४९९.४३ डालर पहुंच गई है । साथ ही सोयाबीन और सूरजमुखी के उत्पादन मेंं कमी भी इसके लिए जिम्मेदार है । वही पाम, पाम गिरी, गिरी, (खोपरा), रेपसीड व मुंगफली के तेल के उत्पादन में वृद्धि का अनुमान है। वैसे खाद्य तेलों की कीमतों में वृद्धि पामआईल के सबसे बड़े उत्पादक मलयेशिया में आई बाढ़ भी इसके लिए जिम्मेदार है । वहीं यूरोप में पामआईल को अधिक स्वास्थ्यवर्धक मानने से भी इसकी मांग में वृद्धि हुई है । स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि चीन के एक स्टोर में प्रोत्साहन मूल्य पर तेल बेचे जाने के दौरान हुई भगद़़ड में ३ व्यकित्यों की मृत्यु हो गई और ३१ घायल हो गए । मलयेशिया में तो पारम्परिक वन क्षेत्रों को साफ करने वहां पाम का रोपण किया जा रहा है जिससे कि यूरोप की बायोइंर्धन की मांग का पूरा किया जा सके । डेरी एवं पोल्ट्री - प्रति व्यक्ति आय बढ़ने से डेरी उत्पाद की मांग में वैश्विक वृद्धि हुई है । चीन और भारत इसमें सबसे आगे हैं । जानवरों द्वारा अनाज की चारे के रुप में बढ़ती खपत से भी खाद्यानों की आपूर्ति को उस ओर मोड़ना पड़ रहा है । एफ.ए.ओ. के अनुसार २० वर्ष पूर्व के मुकाबले आज २००-२५० मिलियन टन अनाज की चारे के रुप में मांग बढ़ चुकी है । साथ ही इसने यह भी भविष्यवाणी की है कि विकासशील देशों में गाय, भेड़ और बकरी के मांस की मांग में वृद्धि होगी । वहीं विकसित देशों के मांस उत्पादन में कमी की आशंका है । एशिया खासकर भारत और चीन में दूध के उत्पादन में अधिकतम बढ़ोत्तरी हुई है । २००७ मेें जहां दूध की कीमतोंं में १२ प्रतिशत की वृद्धि हुई है । वहीं २००८ में इसके उत्पादन में मात्र २.७ प्रतिशत की वृद्धि की संभावना है । दूसरी ओर मात्र यूरोप में सन् २०१४ तक ८ मिलियन टन अतिरिक्त दूध की आपूर्ति संभावित है । मांग और आपूर्ति के बीच का अंतर बढ़ता ही जा रहा है । इसके लिये सिर्फ जनसंख्या वृद्धि को ही उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता है, वृद्धि के लिये आंचलिक परिस्थितियां भी जिम्मेदार हैं। समाधान खोजने वाले भी दो समूहों जिनमें से एक जैव संवर्धित (जी.एम.) खाद्यान्नों की मूल्य वृद्धि का प्रमुख कारण है । सन् १९७३ में जब इन तेलों की कीमतों में वृद्धि हुई थी तब भी ऐसे ही परिणाम निकले थे । अमेरिका को कुल मकई / ज्वार उत्पादन का २५ प्रतिशत व मक्का का २० प्रतिशत सिर्फ बायोइंर्धन के उत्पादन में लग रहा है। अमेरिका अगले १५ वर्षो में इस उत्पादन मेंं दुगने से अधिक की वृद्धि चाह रहा है । इसके परिणाम स्वरुप खाद्य पदार्थो के मूल्यों में वृद्धि चाह रहा है । इसके परिणाम स्वरुप खाद्य पदार्थो के मूल्यों में वृद्धि तो होगी ही । विश्वबैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार एक मध्य आकार के वाहन में एक बार में जितना इथनाल भरा जाता है । वह एक व्यक्ति के साल भर के भोजन के लिए पर्याप्त् होता है । यूरोप के पर्यावरण आयुक्त स्टाव्रोज डिमास ने स्वीकार किया है कि यूरोपीयन युनियन द्वारा सन् २०२० तक `ग्रीन इंर्धन' की १० प्रतिशत की अनिवार्यता खाद्य पदार्थो की कमी एवं वर्षा वनों की समािप्त् से उत्पन्न होने वाले खतरों को कमतर आकना ही है । भारत भी इस ओर तेजी से कदम बढ़ाने की फिराक में है । गत् अक्टूबर में भारत सरकार ने तय किया है कि अगले वर्ष से पेट्रोल मे १० प्रतिशत इथनाल अनिवार्य रूप से मिलाया जाए । यह वर्तमान से दुगना होगा । इसके लिए भारत को गन्ने का १६ प्रतिशत अतिरिक्त उत्पादन करना होगा । जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रवीण झा का कहना है कि ``हमें बायोइंर्धन उत्पादन की लागत को समझना चाहिए । बायोइंर्धन संयंत्र के लिए न केवल हम खनिज इंर्धन का अतिरिक्त प्रयोग करेंगे बल्कि जंगलों और मैदानी इलाकों की सफाई कर बायोइंर्धन फसल उगाएंगे ।'' दूसरी ओर वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन को भी महसूस किया जाने लगा है । हाल ही प्रकाशित रिपोर्टो के अनुसार मध्यपूर्व व उत्तरी अफ्रीका में बढ़ते तापमान से कृषि को नुकसान पहुंचने लगा है । साथ ही मांस व अन्य डेयरी उत्पादों की मांग में असाधारण वृद्धि ने भी खाद्यान्नों की कीमतों में बढ़ोत्तरी की है । एफ.ए.ओ. का अनुमान है कि अमेरिका, ब्राजील और मेक्सिको में मोटे अनाज के उत्पादन में रिकार्ड वृद्धि बायोइंर्धन एवं चारे की जरूरत की वजह से की गई है। युगांडा, अंगोला और मोजाम्बिक जैसे उच्च् आर्थिक विकास वाले अफ्रीकी देश भी अब अपने भोजन में चावल को प्राथमिकता देने लगे हैं क्योंकि इसको पकाना आसान है एवं घरेलू उत्पादन के बजाए इसका आयात भी आसान है । क्या भारत बढ़ती वैश्विक खाद्य मूल्यों से स्वयं को सुरक्षित रख पाएगा ? इसका कोई निश्चित या सर्वमान्य उत्तर दे पाना संभव नहीं है । कुछ अर्थशास्त्रियों का कहना है कि इस वृद्धि पर आगामी तीन महीनों में रोक लग सकती है वहीं कुछ मानते हैं कि यह प्रवृत्ति लंबे समय तक बनी रह सकती है । कृषि मंत्रालय का अनुमान है कि रबी के मौसम में ७६ मिलियन टन गेहूँ का उत्पादन होगा वहीं दिल्ली स्थित इंस्टि्टयूट ऑफ इकोनॉमिकल ग्रोथ का मानना है कि देश में अधिकतम ७३ मिलियन टन गेहँू का उत्पादन हो सकता है । कृषि लागत व मूल्य आयोग ने चेतावनी दी है कि २००८-०९ में आवश्यक वस्तुआें के मूल्यों में व्यापक बढ़ोत्तरी होगी । साथ ही उसने इनकी आपूर्ति के प्रति भी शंका जाहिर की है । प्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक एम.एस. स्वामीनाथन का कहना है कि मांग और आपूर्ति के अलावा कई अन्य घटक जैसे खनिज तेल के मूल्यों में वृद्धि आदि भी खाद्यान्न मूल्य वृद्धि में सहायक है । कृषि में वैसे भी ऊर्जा का काफी उपयोग होता है । साथ ही खनिज तेल कीमतें ११० डालर प्रति बैरल पहुंचने से कृषि में प्रयुक्त होने वाले उत्पाद जैसे रासायनिक खाद व कीटनाशक भी महंगे हो जाएंगे । भारतीय उपभोक्ता द्वारा बढ़ती कीमतों से अधिक चुभन महसूस न किए जाने के पीछे यह कारण है कि यहां पर कीमतों को सब्सिडी के द्वारा नियंत्रण में रखा जाता है । इस क्रम में खाद्यान्न सब्सिडी जो कि २००६-०७ में २४ हजार करोड़ रूपए थी वह वर्तमान में बढ़कर ३१ हजार करोड़ रूपए तक पहुंच गई है । ऐसा ही खाद पर दी जाने वाली सब्सिडी पर भी हुआ है । सब्सिडी के अलावा इसका एक अन्य कारण यह भी है कि हम धान और गेहँू दोनों ही उपजाते हैं इससे भी कीमतों को काबू में रखने में मदद मिलती है । हम हमारी घरेलू आवश्यकता का ९० से ९५ प्रतिशत तक स्वयं ही पैदा करते हैं इसलिए हमारा आयात भी कम है जिसे हम अधिक दरों पर भी खरीद सकते हैं । इंस्टि्टयूट ऑफ इकोनॉमिक ग्रोथ, दिल्ली के सी.एस.सी. शेखर का कहना है कि `निजी क्रेताआें द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य से अधिक पर खाद्यान्न खरीद लेने के परिणामस्वरूप सरकार के पास इनके आयात के अतिरिक्त अन्य कोई चारा नहीं बचता हैं । आवश्यकता है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य और खरीदी मूल्य को अलग-अलग किया जाए । सरकार को किसानों से बाजार मूल्य पर खाद्यान्न खरीदना चाहिए ।' वहीं एम.एस. स्वामीनाथन का कहना है कि कीटनाशक, खाद, बिजली इत्यादि जैसे विभिन्न कारकों के मूल्यांकन के पश्चात १५ प्रतिशत जोड़कर न्यूनतम समर्थन मूल्य निकाला जाता है जबकि यह कम से कम ५० प्रतिशत होना चाहिए । किसानों के राष्ट्रीय आयोग ने भी आयात कम करने के लिए किसानों को आकर्षक प्रस्ताव देने को कहा है । कीमतों को काबू में रखने के लिए भारत सरकार को बहुत शीघ्रता से खाद्यान्नों की खरीद करना होगी । यह भी कहा जा रहा है कि यदि भारत ने अंतर्राष्ट्रीय बाजार से १० से २० लाख टन खाद्यान्न खरीद लिया तो कीमतों में और भी उछाल आएगा । ठंड में तिलहनों के उत्पादन में कमी ने चिंता और भी बढ़ा दी है । क्योंकि खाद्य तेल के भाव बहुत तेजी से बढ़ रहे हैं । वित्तमंत्री ने राज्यसभा को यह आश्वासन दिया है कि वे अपने तई मुद्रास्फीति को रोकने का पूरा प्रयत्न करेंगे जिससे कि गरीबों पर इसकी मार न पड़े। इस क्रम में खाद्य तेल के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया गया है । साथ ही गेहँू और चावल के निर्यात पर काफी हद तक रोक लगा दी है । इसी के साथ खाद्य तेलों के आयात शुल्क में भी व्यापक कमी की गई है । कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि निर्यात पर एक अल्पकालिक उपाय है एवं किसान विरोधी भी है । कृषि विशेषज्ञ स्वामीनाथन का कहना है कि पूर्वी भारत में अभी भी काफी संभावनाएं हैं । किसानों के लिए सही तकनीक, एक से अधिक फसल होने का प्रशिक्षण एवं सरकारी योजनाआें का लाभ लेना आवश्यक है ।***

सोमवार, 11 फ़रवरी, 2008

३ हमारा भूमण्डल

एक जटिल समस्या है, जलवायु परिवर्तन
मार्टिन खोर
नोबल पुरस्कार प्राप्त् जलवायु परिवर्तन पर अंतर्राष्ट्रीय सरकारों की पेनल (आय.पी.सी.सी.) की ताजा रपट का सार पढ़ लेने मात्र से पर्यावरण परिवर्तन के बारे में नवीनतम जानकारियां संक्षिप्त् और सटीक रूप में हम सबके सामने है। मात्र २३ पृष्ठीय यह रपट (विज्ञान पर प्रभाव, पर्यारण परिवर्तन के असर एवं पर्यावरण परिवर्तन को कम करने के लिए आवश्यक नीतियां) आय.पी.सी.सी. द्वारा पूर्व में जारी की गई हजारों पृष्ठों में फैली तीन अलग-अलग रपटों का निचोड़ है। यह गंभीर संकलित रपट हमें आसन्न चुनौतियों के बीच पृथ्वी पर जीवन को बचाए रखने के बारे में सुझाव भी देती है । उदाहरण के लिए पेनल अध्यक्ष राजेन्द्र पचौरी का कथन कि हम भले ही उत्सर्जन को बहुत सीमित कर लें और वातावरण में ग्रीन हाउस गैसों की मात्रा को इसी स्तर पर बनाए रखें तो भी समुद्री जलस्तर ०.०४ मीटर से १.४ मीटर तक बढ़ने की आशंका बनी रहेगी क्योंकि समुद्री जल के गर्म होने की क्रिया तो जारी रहेगी ही जिसके फलस्वरूप समुद्री क्षेत्र में फैलाव होना लाजमी है । उन्होंने बताया कि यह खोज बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि इसकी वजह से तटीय क्षेत्रों में बड़े परिवर्तन संभावित है जैसे निचले क्षेत्रों में जल प्लावन के खतरे होंगे और नदियों के डेल्टा प्रदेशों एवं निचले द्वीपों में भी इस वजह से बड़े दुष्प्रभाव प्रकट होंगे । इस कार्य में शामिल २५०० विशेषज्ञ वैज्ञानिक विश्लेषकों, १२५० लेखकों और १३० देशों के नीति निर्माताआें के साझा प्रयासों ने इसे इतना महत्वपूर्ण दस्तावेज बनाया है। इस रपट का मुख्य संदेश यह है कि तापमान में हो रही बढ़ोत्तरी में संदेह की गुंजाईश नहीं है और इस वजह से हवाआें की रफ्तार और समुद्री जल का तापमान भी साथ-साथ ही बढ़ेगा । जिसके परिणामस्वरूप समुद्रों का जलस्तर बढ़ेगा और बर्फबारी और पहाड़ों पर जमी बर्फ में और कमी आएगी । समुद्रों के जलस्तर की बढ़ती रफ्तार जो सन् १९६१ के १.८ मिलीमीटर प्रतिवर्ष की तुलना में सन् १९९३ में ३.१ मिलिमीटर प्रतिवर्ष तक जा पहुंची है इस समय सर्वाधिक चिंता का विषय है। इसकी मुख्य वजह है बढ़ते तापमान से हो रही घनत्व वृद्धि और ग्लेशियरों व पहाड़ी चोटियों पर जमी बर्फ और धु्रवों की बर्फ की चादरों का पिघलाव । अनुमान है कि २१वीं सदी के अंत तक समुद्री जलस्तर में वृद्धि का आंकड़ा १८ से ५९ सेंटीमीटर का स्तर छू लेगा । श्री पचौरी चेतावनी देते हुए कहते हैं कि तापमान में वृद्धि के कुछ असर आकस्मिक और अपरिवर्तनीय भी होंगे । उदाहरण के लिए ध्रुवों की बर्फ की चादर में हुआ थोड़ा-सा पिघलाव भी समुद्र के जलस्तर में कई मीटर की वृद्धि कर देगा। जिसके फलस्वरूप तटीय क्षेत्रों में बड़े परिवर्तन होंगे । निचले क्षेत्रों में जल भराव होगा, नदियों के डेल्टा प्रदेशों और निचले टापुआें में भी जलप्लावन की सी स्थितियां निर्मित होंगी । यह रपट तापमान वृद्धि के असर पर क्षेत्रवार प्रकाश डालती है । जैसे अफ्रीका में २०२० तक ७.५ करोड़ से लेकर २५ करोड़ लोगो को इसके दुष्परिणाम भुगतना होंगे । कुछ देशों में तो वर्षा आधारित कृषि घटकर ५० प्रतिशत रह जाएगी । एशिया में आने वाली मुख्य परेशानियां इस तरह है संभावना है कि २०५० तक मध्य, दक्षिण, पूर्व एवं दक्षिण पूर्व एशिया में खासतौर से बड़े नदी संग्रहणों में मीठे जल में भारी कमी होगी । दक्षिण पूर्व एवं दक्षिण पूर्वी एशिया के तटीय क्षेत्रों खास तौर से बड़ी आबादी वाले वृहद डेल्टा प्रदेशों में समुद्रों और नदियों की बाढ़ का सबसे ज्यादा खतरा होगा । संभावित जलवायु चक्र परिवर्तन की वजह से पूर्वी दक्षिण एवं दक्षिण पूर्वी एशिया में बाढ़ और सूखा जनित डायरिया की वजह से प्रदूषण और मृत्युदर में वृद्धि होगी । रपट चेतावनी देती है कि तापमान वृद्धि की शुरूआत हो चुकी है। सन् १९८० से अब तक के सर्वाधिक १२ गरम वर्षो की गणना करें तो हम पाएंगे कि सन् १९९५ से लेकर २००६ तक के बारह में से ग्यारह वर्ष पिछले १०० वर्षो में सर्वाधिक गरम थी, साथ ही पिछले १०० वर्षो में तापमान में ०.७४ डिग्री सेंटीग्रेड की वृद्धि हुई है । आर्कटिक की बर्फ का दायरा २.७ प्रतिशत प्रति दशक की दर से सिकुड़ता जा रहा है । गर्मियों में तो यह ७.४ प्रतिशत दशक की दर से सिकुड़ रहा है । पृथ्वी के दोनोंही गोलार्धो में ग्लेशियरों एवं बर्फ की मात्रा में कमी आई है । रपट लगातार चेताती है कि यदि अब भी अगर कदम न उठाए गए तो वैश्विक उत्सर्जन की मात्रा में सन् २००० और २०३० के बीच २५ से ९० प्रतिशत की वृद्धि होने की संभावना है । अगले बीस सालों में ०.२ डिग्री सेंटीग्रेड प्रति दशक की दर से तापमान वृद्धि की आशंका जताई गई है और अगर ग्रीन हाउस गैसों और एयरोसोल के घनत्व को सन् २००० के स्तर पर स्थित भी रख लिया जाए तब भी इसके ०.१ डिग्री सेंटीग्रेड प्रति दशक की दर से बढ़ने का आकलन किया गया है । उसके बाद के तापमान वृद्धि के आकलन उत्सर्जन के स्तर पर निर्भर करते हैं । रपट के अनुसार मौजूदा स्थिति आई.पी.सी.सी. द्वारा कुछ वर्ष पूर्व कराए गए आकलन से भी काफी खराब है । इसमें चिंता के पांच आधार बिंदु तय किए है । प्रकृति के लिए खतरा : १९८०-१९९९ के स्तर से तापमान का वैश्विक औसत अगर १.५ डिग्री सेंटीग्रेड से २.५ डिग्री सेंटीग्रेड तक बढ़ता है तो वनस्पति और पशुआे की २० से ३० प्रतिशत प्रजातियों पर विलुप्त् होने के खतरे बढ़ जाएंगे । प्राकृतिक आपदाआे के खतरे : सूखा, गर्म हवाएं, बाढ़ में वृद्धि और अनेक अन्य दूरगामी परिणाम भी अनुमानित है । प्रभावों के प्रति सहनीयता: विभिन्न क्षेत्रों में असर भी भिन्न-भिन्न होगा, खासतौर से आर्थिक आधार पर पिछड़े लोगों पर पर्यावरण परिवहन का असर सर्वाधिक हुआ करता है । सामूहिक प्रभाव : कम गर्म होने वाले क्षेत्रों में पर्यावरण परिवर्तन के प्रारंभिक बाजार आधारित लाभ ज्यादा होने का अनुमान किया गया है जबकि ज्यादा गर्म होने वाले क्षेत्रों में सर्वाधिक नुकसान आकलित है । एक बड़ा कारण और उसके खतरे : सैकड़ों वर्षो से जारी तापमान वृद्धि के परिणाम स्वरूप हुई घनत्व वृद्धि की वजह से समुद्री जलस्तर में वृद्धि बीसवीं सदी की अपेक्षा बहुत ज्यादा आकलित है, जिससे तटीय क्षेत्रों में कमी होगी और इससे जुड़े अन्य प्रभाव भी सामने आएंगे। रपट समक्ष बड़े खतरे से निपटने के उपायों पर जिसमें - शमन (ऊर्जा, परिवहन, उद्योग आदि क्षेत्रों में निवारक उपाय अपनाकर स्थिति को बदतर होने से रोकना), अनुकूलन (दुष्प्रभावों को कम करने के उपाय) वित्त प्रबंध एवं तकनीक शामिल हैं पर चर्चा के साथ खत्म होती है । ***

शनिवार, 12 जनवरी, 2008

३ हमारा भूमण्डल

भूख से भरती कार की टंकी
कनग राजा
`वैश्विक स्तर पर भूख की समस्या में लगातार वृद्धि होती जा रही है । आज भूख से पीड़ित व्यक्तियों की संख्या ८५ करोड़ से अधिक हो गई है । साथ ही १९९६ से इसमें लगातार वृद्धि भी हो रही है ।' ये कथन संयुक्त राष्ट्र संघ के भोजन के अधिकार संबंधी विशेष दूत जीन जिगलर के हैं । न्यूयार्क में संयुक्त राष्ट्र संघ महासभा के अक्टूबर में सम्पन्न ६२वें अधिवेशन में प्रस्तुत एक रिपोर्ट (ए/६२/२८९) में अधिकार विशेषज्ञों ने स्पष्ट तौर पर कहा है कि १९९६ में हुए पहले विश्व खाद्य सम्मेलन और शताब्दी सम्मेलन २००० में सरकारों द्वारा भूख घटाने के वादे के बावजूद इस दिशा में कोई प्रगति नहीं हुई हैं । जीन जिगलर का कहना है कि `प्रतिवर्ष ६० लाख से अधिक बच्च्े पांच वर्ष की उम्र के पूर्व ही भूख या भूख संबंधित बीमारियों की वजह से असमय मौत का शिकार हो जाते हैं ।' अपनी बात को विस्तार देते हुए उन्होंने कहा है कि `यह स्थिति पूर्णतया अस्वीकार्य है । सभी मनुष्यों को गरिमामय, स्वतंत्र व भूख रहित जीवन जीने का अधिकार है । भोजन का अधिकार एक मानवाधिकार ही है ।' स्थितियों पर खेद व्यक्त करते हुए वे कहते हैं कि अपने सात साल के कार्यकाल के बावजूद वे भोजन के अधिकार से वंचित व्यक्तियों की संख्या में कमी अपनी रिपोर्ट में नहीं दर्शा पाए हैं । बल्कि इसके ठीक विपरीत चीन, भारत, दक्षिण अफ्रीका और अनेक लेटिन अमेरिकी और केरेबिन देशों में वास्तविक उन्नति के बावजूद भूख और कुपोषण से पीड़ितों की संख्या में न्यूनतम कमी ही आई है । अधिकार विशेषज्ञों का कहना है कि भूख और अकाल अपरिहार्य नहीं है। ख़ाद्य एवं कृषि संगठन (एफ.ए.ओ.) के अनुसार विश्व पूर्व से ही इतने खाद्यान्न का उत्पादन करता है जो न केवल प्रत्येक बच्च्े, महिला व पुरूष की भूख शांत कर सकता है बल्कि इससे १२ अरब लोगों को भोजन मुहैया करवाया जा सकता है जो कि विश्व की वर्तमान जनसंख्या से दुगनी बैठती है । उनका प्रश्न यह है कि `हमारा विश्व आज पहले के मुकाबले अधिक संपन्न है, इसलिए प्रतिवर्ष ६०लाख बच्चेंका भूख और उससे संबंधित बीमारियों से प्राण त्यागने को कैसे स्वीकार्य किया जा सकता है ?' अपनी रिपोर्ट में उन्होंने महासभा का ध्यान दो उभरते हुए मुद्दों पर खींचा है। पहला है जैविक इंर्धन की वजह से भोजन के अधिकार पर पड़ने वाला जबरदस्त नकारात्मक प्रभाव और दूसरा उन्होंने भूख, अकाल और उपवास के कारण अपना देश छोड़कर विकसित देशों में शरण ले रहे व्यक्तियों के मानवाधिकारों के हनन के संबंध में तुरंत हस्तक्षेप की आवश्यकता । अपने निष्कर्ष और अनुशंसाआे में उन्होंने कहा है कि सभी राष्ट्रों को यह स्वीकारोक्ति करते हुए कि उनके प्रत्येक नागरिक को भोजन का अधिकार है, इस दिशा में तुरंत कार्यवाही करना चाहिए । साथ ही सभी राष्ट्रों को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि उनकी अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक और आर्थिक नीतियां जिनमें कि अंतर्राष्ट्रीय व्यापार समझौते भी सम्मिलित हैं, से अन्य देशों के भोजन के अधिकार पर नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए । इस संदर्भ में जिगलर का कहना है कि यूरोपियन यूनियन सरकारें, अफ्रीकी, केरेबियन व पेसिफिक देशों से आर्थिक साझेदारी समझौते के तहत यह सुनिश्चित करें कि इन समझौतों से उनकी खाद्य असुरक्षा और भूख में वृद्धि न हो । विशेष दूत ने अपनी रिपोर्ट में साधारण सभा का ध्यान हाल ही में भोजन अधिकार से संबंधित कुछ अत्यंत सकारात्मक बिंदुआे की ओर खींचा है । ये हैं :-१. छ: अफ्रीकी देशों और संयुक्त राष्ट्र संघ ने मिलकर एक योजना तैयार की है जिसमें अफ्रीका में भूख की बढ़ती मूलभूत समस्या से निपटने का प्रयास किया गया है ।२. बोलिविया की सरकार ने एक ऐसा शून्य कुपोषण कार्यक्रम प्रारंभ किया है जिसके अंतर्गत बोलिविया के तेल और गैस के उत्पादन पर लगा अतिरिक्त कर सीधे शून्य कुपोषण कार्यक्रम को जाएगा ।३. लेटिन अमेरिकी और केरेबियन अंचल ने एक ऐसा आंचलिक कार्यक्रम अपनाया है जिसके अंतर्गत सामूहिक रूप से भूख को समाप्त् करने और खाद्य सुरक्षा प्रदान की जाएगी । इन शक्तिशाली प्रयत्नों में प्रत्येक को भरपूर खाद्य की भावना भी सन्निहित है । विशेष दूत ने यूरोपियन यूनियन और अफ्रीकी, केरेबियन व पेसेफिक देशों (ए.सी.पी.) के साथ हुए आर्थिक समझौतों पर विशेष टिप्पणी करते हुए सभी देशों खासकर यूरोपियन यूनियन का ध्यान इस ओर दिलाया है कि इससे विकासशील विश्व के गरीब किसानों के भोजन के अधिकार पर विपरीत प्रभाव न पड़े । अत्यधिक व्यापारिक खुलेपन से भी वे काफी चिंतित दिखे । उनका सोचना है कि इन ए.सी.पी. देशों के किसान किस प्रकार यूरोपियन यूनियन द्वारा अनैतिक रूप से दी जा रही अत्यधिक सब्सिडी का मुकाबला कर पाएंगे ? उनका कहना थ कि इन देशों में ८० प्रतिशत लोग कृषि पर आश्रित हैं और जहां रोजगार के वैकल्पिक साधन भी नहीं है वहां यह अन्यायी प्रतिस्पर्धा तो बर्बादी ही लाएगी । इसके अतिरिक्त इन नए आर्थिक साझेदारी अनुबंधों से ए.सी.पी. देशों की सरकारों के वाणिज्य में भी जबरदस्त कमी आएगी जो कि काफी हद तक आयात शुल्क पर निर्भर हैं । जैसे ही यूरोपियन यूनियन के देशोंके लिए शुल्क में कमी होगी वैसे ही इन देशों को अपने सामाजिक कल्याण के कार्यक्रमों में कटौती करना पड़ेगी । विशेष दूत ने भूख के संदर्भ में जैविक इंर्धन पर गहरी चिंता दर्शाई है । उनका कहना है कि खाद्य फसलें जैसे मक्का, गेहूं, शक्कर, पाम आईल को बिना वैश्विक भूख को दृष्टिगत रखते हुए कार इत्यादि के इंर्धन के तौर पर इस्तेमाल करने के विनाशकारी परिणाम निकल सकते हैं। एक अनुमान के अनुसार कार की टंकी को भरने के लिए आवश्यक जैविक इंर्धन (५० लीटर) हेतु २०० किलो मक्का की आवश्यकता पड़ेगी जो कि एक व्यक्ति का वर्षभर का भोजन है । जैविक इंर्धन से जहां जलवायु परिवर्तन और विकासशील देशों के किसानों की आर्थिक देशों में सकारात्मक लाभ होगा पर इसी के साथ यह अध्ययन भी आवश्यक है कि इससे भोजन के अधिकार पर क्या प्रभाव पड़ेगा ? विशेष दूत ने वर्तमान पद्धतियों के तहत जैविक इंर्धन के उत्पादन पर पांच वर्षो के लिए अनिवार्य रोक लगाने का आग्रह किया है जिससे कि नई तकनीकें इजाद करने का समय मिल सकें और पर्यावरण, सामाजिक व मानवाधिकारों पर विपरीत प्रभाव पड़ने को रोका जा सके । इन प्रयत्नों के अंतर्गत विश्व के कुल ऊर्जा उपभोग में कमी, ऊर्जा की कार्यक्षमता में वृद्धि, जैविक इंर्धन के उत्पादन हेतु `दूसरी पीढ़ी' की तकनीकों का विकास जिससे कि खाद्य और इंर्धन के बीच की प्रतिस्पर्धा को कम किया जा सके, ऐसी तकनीकों को अपनाना जिसमें अखाद्य फसलों का प्रयोग किया जा सके और असिंचित व बंजर क्षेत्रों में विकसित हो सकें । साथ ही उनका सुझाव है कि जैविक इंर्धन का उत्पादन पारिवारिक स्तर पर होन कि औद्योगिक पैमाने पर । ग्रामीण क्षेत्रों में गरीब किसानों को बजाय प्रतिस्पर्धा के, अवसर उपलब्ध करवाना भी उनकी अनुशंसाआे में सम्मिलित है । ***

शुक्रवार, 7 सितंबर, 2007

२ हमारा भूमण्डल

जीवाश्म : हमारे काल प्रहरी
डॉ. भोलेश्वर दुबे
हमारा भू-मण्डल कल्पनातीत लम्बा सफर तय करते हुए वर्तमान स्वरूप में पहुंचा है । पृथ्वी पर कई भूगर्भीय और वातावरणीय परिवर्तन हुए । प्राणियों और वनस्पतियों के कई साम्राज्य विकसित और विलुप्त् हुए । पृथ्वी और जीवन की विकास कथा के अनेक पात्र आज भी धरती के गर्भ से पुरातन घटनाआे की कथा बयान कर रहे हैं । समय के ये साक्षी और कोई नहीं, जीवाश्म ही हैं । जीवाश्म के लिए अंग्रेज़ी में फॉसिल शब्द का उपयोग होता है जिसका उद्गम लेटिन शब्द फॉसिलियम से हुआ है। इसका अर्थ ज़मीन की सतह के नीचे से खोदना है । अट्ठारवीं शताब्दी तक जीवाश्म से तात्पर्य अतीत के बड़े जीवों की अस्थियों, कवच, पत्तियों, लकड़ी आदि के रूप में प्राप्त् अवशेष तक सीमित रहा। आगे चलकर सूक्ष्मजीवों के भी जीवाश्म खोज निकाले गए । समय के साथ पृथ्वी पर वनस्पतियों और प्राणियों के अनुक्रमण और विलुप्त् प्रजातियों की जानकारी हमें जीवाश्मों से ही प्राप्त् होती हैं । भौतिक शास्त्र के अनुसार किसी भी वस्तु का अध्ययन चार आयामों - लंबाई, चौड़ाई, ऊंचाई और समय के आधार पर किया जा सकता है । जीवाश्म चारों आयामों को व्यक्त करते हैं । जिस चट्टान में ये उपलब्ध हैं उसकी लम्बाई चौड़ाई, ऊंचाई और उसकी तत्कालीन काल गणना । अध्ययन क्षेत्र के आधार पर समय मापन की सीमाएं घटती बढ़ती रहती हैं । दैनिक जीवन में वर्ष, माह, दिन , मिनट और सेकण्ड के रूप में इसकी गणना करते हैं । यदि हमें पृथ्वी की आयु का आकलन या पृथ्वी पर जीवन के उद्भव काल की गणना करनी हो तो हमें करोड़ों वर्ष पीछे जाना होता है । यह समय न केवल हमारे जीवन काल से वरन कई पीढ़ियों के जीवन काल से भी कई गुना अधिक हैं । अत: इस प्रकार के समय निर्धारण की विधि को जियोलॉजिकल टाइम या भौमिकीय समय कहा जाता है । इतिहासकार जहाँ कुछ हजार वर्षो की घटनाआे का वर्णन करते हैं वहीं पुरावैज्ञानिक भौमिकीय समय सारणी के आधार पर करोड़ों वर्ष पूर्व की जानकारी देते हैं । खगोल वैज्ञानिक तो इनसे भी आगे हैं । वे ब्रह्मांड की उत्पत्ति का समय दस से बीस अरब वर्ष पूर्व बताते हैं ।

अत: समय का मान स्थिति के आधार पर सेकण्ड से लगाकर अरबों वर्ष तक फैला हुआ हैं । पृथ्वी की उम्र लगभग चार अरब वर्ष मानी जाती हैं । उस काल की कोई चट्टान उपलब्ध नहीं है । सबसे पुरातन चट्टान ३.८ अरब वर्ष पुरानी है और जीवाश्म २.५ अरब वर्ष पुराने प्राप्त् हुए है । अत:इस कालावधि में ही पृथ्वी पर जीवन का आरंभ माना जाता हैं । पृथ्वी की उम्र ज्ञात करने के लिए वैज्ञानिक अनेक विधियां अपनाते हैं । इनमें भूमि की विभिन्न गहराइयों के तापमान तथा चालकता में परिवर्तन, नदियों तथा समुद्री जल में घुलित लवणों के आयनों का मापन प्रमुख रही हैं किन्तु इन विधियों से सही उम्र ज्ञात न हो सकी । इस समस्या का सर्वमान्य हल १९९६ में रेडियोधर्मिता की खोज के बाद ही संभव हो सका । इस विधि में कार्बन, यूरेनियम तथा सीसे के आइसोटोप के द्वारा चट्टान व जीवाष्म की उम्र ज्ञात की जाती हैं । जीवाश्म प्राय: तलछटी एवं आग्नेय चट्टानों में पाए जाते हैं । तलछटी चट्टानों की परतों के बीच व ज्वालामुखी के लावा के बहाव में जैविक संरचनाआे के दबने से ये जीवाश्म बनें । चट्टानों के प्रकार व इनके प्रािप्त् स्थल के आधार पर भौमिकीय समय सारिणी में कई नाकरण किए गए हैं । जैसे इंग्लैण्ड व फ्रांस में खड़िया की बड़ी तलछटी चट्टानों को क्रिटेशियस कहा जाता है । कोयले वाली चट्टानें, जिनमें एक मोटाई पर बलुआ पत्थर और चूने की पर्त भी पाई जाती हैं, को कार्बोनिफेरस कहा जाता है । सन् १९६० में भौमिकीय समय सारणी को तीन बड़े काल खण्डों में विभाजित किया गया :-पैलियोजोइक ५७.० करोड़ वर्ष पूर्व प्रारंभमीसोजोइक २२.५ करोड़ वर्ष पूर्व प्रारंभसीनोजोइक ६.५ करोड़ वर्ष पूर्व प्रारंभ वैसे उक्त तीना महाकल्पों के अतिरिक्त एक और महाकल्प माना जाता है जिसे अर्कियोजोइक काल कहते हैं। यह ९०.० करोड़ वर्ष पूर्व माना जाता है जो जीवन विहीन रहा । इन कालखंडों को आगे कल्प और युगों में बांटा गया हैं । जैसे पैलियोजोइक महाकल्प के युग हैं कैम्ब्रियन, ऑरडोविसियन, सिलुरियन, डेवोनिन, कार्बोनिफेरस तथा पर्मियन । प्रत्येक युग में विशेष प्रकार के प्राणी और वनस्पतियों का बाहुल्य रहा जो उस काल की पहचान बनें । मीसोजोइक महाकल्प के जुरासिक युग में वृक्ष फर्न, साइकेड्स, गिन्कगो आदि वनस्पतियों बहुतायत में थी तथा पुष्पीय पौधों का आरंभ हुआ था । इसी काल में प्राणियों में भीमकाय डायनासौर का अस्तित्व रहा जो इस का की पहचान बनें। किसी भी जीवन का जीवाश्मीकरण होना अत्यंत दुर्लभ घटना है । जीवाश्मीकरण के लिए जीव के शरीर में आसानी से विघटित न होने वाले कठोर भाग सहायक होते हैं । रीढ़धारी प्राणियों की अस्थियां और दांत, रीढ़विहीन प्राणियों के बाह्य कवच, पौधों के काष्ठीय भाग व सैलुलोज युक्त पत्तियां आसानी से परिरक्षित हो जाते हैं । कुछ कोमल शरीर वाले रीढ़विहीन प्राणियों, शैवाल, ब्रायोफाइट और जीवाणुआें के भी जीवाश्म उपलब्ध हैं । जीवाश्मीकरण में जीव की शरीर रचना के साथ-साथ वे पर्यावरणीय परिस्थितियां भी महत्वपूर्ण होती हैं जो उस भाग को सड़ने से बचाए और संरक्षित करें । जीवाश्मीकरण के लिए जीव का जमीन में दबना आवश्यक है । इस पर तलछट की परतें क्रमश: जमने लगती हैं। दबने पर मृत शरीर से पानी भी निकल जाता हैं और ऑक्सीजन का भी अभाव हो जाता हैं । ऐसी स्थिति में विघटनकारी जीवाणु और फफूंद सक्रिय नहीं रह पाते। जीव का मृत शरीर जितना जल्दी जमीन में दबता है उतनी ही उसकी जीवाश्म बनने की संभावना अधिक होती हैं । जीवाश्म अक्सर समु्रंद तल, झीलों की गाद, नदियों के मुहानों पर अधिक बनते हैं क्योंकि वहां की परिस्थिति जीवाश्मीकरण के लिए उपयुक्त होती हैं । जीव के प्रकार और पारिस्थितियों के आधार पर कई प्रकार के जीवाश्म पाए जाते हैं । इनमें से प्रमुख हैं: संपीड़क जीवाश्म जो पौधों या अन्य जीवों के तलछट में दबने से बनते हैं । अत: ये चपटे होते हैं । अश्मीभूताश्म या पेट्रिफिकेशन में जीव के भाग की आन्तरिक व ब्राह्य संरचना परिरक्षित रहती हैं । मुद्राश्म में जीवों के अंगों की छाप पाई जाती हैं। जीवाश्म न केवल विगत काल के जीवों से हमारा परिचय कराते हैं अपितु उस समय की पर्यावरणीय स्थितियों का भी लेखा जोखा प्रस्तुत करते हैं । दीर्घकाल से घटित हो रही घटनाआें के विश्वसनीय प्रमाण हैं ये जीवाश्म जो आने वाली पीढ़ियों को आज की स्थिति से अवगत करवाएंगे ।

सोमवार, 20 अगस्त, 2007

३ हमारा भूमण्डल

ग्लोबल वार्मिंग : दूसरे के अपराध की सजा
प्रो. जोसेफ स्टिगलीज
दुनिया में एक बहुत बड़ा प्रयोग चल रहा है जिसमें यह पता लगाया जा रहा है कि जब आप वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य ग्रीन हाउस गैसों को अधिकाधिक उत्सर्जित करते जाते हैं, तो क्या परिणाम होता है । वैज्ञानिक समुदाय इसके परिणाम को अच्छी तरह से जानता है कि इससे परिणाम भयावह हैं । प्रदूषण से पैदा होने वाली गैसों धरती के आसपास एक आवरण (ग्रीनहाउस) का प्रभाव निर्माण करती हैं, जिससे पृथ्वी क्रमश: गर्म होती जाती है । हिमनद और ध्रुवीय बर्फ पिघलने लगती है, समुद्री धाराएं दिशा बदल लेती हैं और सागरों का जलस्तर ऊपर उठने लगता है । यह सब पूर्व अनुमानों से ज्यादा तेजी से हो रहा है और इसके दुष्परिणाम भी ज्यादा भयावह होंगे । अगर पृथ्वी जैसे हजारों गृह हमारी पहुंच में होते, तो किसी एक गृह पर यह प्रयोग किया जा सकता था, क्योंकि अगर स्थिति और ज्यादा खराब होती है, जिसकी आशंका वैज्ञानिक व्यक्त कर रहते हैं, तो हम किसी दूसरे गृह पर जा सकते थे । लेकिन हमारे पास वह विकल्प नहीं है । पृथ्वी जैसा कोई दूसरा गृह नहीं है । अतएव हर हाल में हमें इसी धरती पर रहना है । वर्तमान में ग्लोबल वार्मिंग (पृथ्वी के तापमान में वृद्बि) से अधिक व्यापक और महत्वपूर्ण कोई दूसरा वैश्विक मुद्दा नहीं है । हम सभी को एक ही वायुमंडल में सांस लेनी है । गौरतलब है कि अकेला अमरीका ही हर साल ६ अरब टन कार्बन डì