शुक्रवार, 16 फ़रवरी 2018


सामयिक
हिमालय का सांस्कृतिक अवदान
कुलभूषण उपमन्यु
हिमालय का हमें जैव विविधता के साथ ही सांस्कृतिक विविधता का भी अवदान है । यहां सदियों से अनेक धर्म फल फूल रहे हैं। इनमें हिन्दू, बौद्ध, जीव वादी बर्मी मत, और एकेश्वर वादी मुस्लिम और इसाई मत प्रमुख हैं । 
सनातन हिन्दू परंपरा, बौद्ध और जीव वादी मतों सबमें आत्मा को मानना और पूजने के अंश विद्यमान हैं। घोर एकेश्वरवादी इस्लाम और इसाई मतों ने इन जीव वादी मतों की निंदा की और घोर विरोध किया । किन्तु हिमालय ने इनको सह अस्तित्व का रास्ता दिखाने का काम किया ।
मनुष्य प्रकृतिमें पैदा होकर, प्रकृति को अपने बुद्धि कौशल द्वारा जीवन को सुंदर और सबके लिए उपयोगी बनाने के लिए संस्कारित करता है तो संस्कृति का विकास होता है और जीवन को अहंकारी एवं पर-पीड़क बनाने के लिए यदि प्रकृति का उपयोग करता है तो विकृति का उदय होता है । संस्कृति के विकास में भौगोलिक और पारिस्थितकीय कारकों का विशेष महत्व रहता है । संस्कृति का स्थूल पक्ष तो भौगोलिक और पारिस्थितिकीय कारकों पर ही ज्यादातर निर्भर करता है । 
समुद्र तटीय, मरुस्थलीय, वन क्षेत्रीय, हिम क्षेत्रीय और उपजाऊ  भूमियों में पनपी संस्कृतियों पर इन कारकों का प्रभाव स्पस्ट दृष्टि गोचर होता है । उनके पहनावे, खान पान, कला, साहित्य, त्यौहार, नृत्य, गायन आदि में इसकी झलक मिल जाती है ।
संस्कृति का दूसरा और महत्वपूर्ण पक्ष है उसका सूक्ष्म पक्ष । यह सृष्टि को देखने की दृष्टि के रुप मेंचरितार्थ होता है । इसे किसी भी संस्कृति का मूल कहा जा सकता है । जिस रंग का चश्मा हम लगा लेंगे उसी रंग की सृष्टि दिखाई देगी । जैसी सृष्टि दिखेगी उसी के आधार पर हमारे निर्णय और सोच बनेगी । जिसके आधार पर हमारी संस्कृति का विकास होगा । हिमालय ने संस्कृति के विकास के लिए महत्वपूर्ण इन दोनों कारकों को प्रभावित किया है । स्थूल रुप से हिमालय ने उत्तर ध्रुवीय शीत हवाआें को रोक कर भारत में छ: ऋतुआें के निर्माण में सहायता की । 
ऋतु विविधता से वैचारिक विविधता के लिए उपयुक्त वातावरण का निर्माण किया । सदा-नीरा नदियां दे कर गंगा और सिंध के मैदानों की रचना करके, समृद्ध कृषि संस्कृति और उस पर आधारित कलाआें और हस्त शिल्पों के विकास में योगदान दिया । हिमालय की गोद में ही भारत ही विद्वानों और ऋषियों की मेघा अनुप्राणित हुई ।
हिमालय के वनोंऔर हिमालय से निकली नदियों से अनुप्राणित वन्य प्रदेशों में ही भारतीय संस्कृतिके महान ग्रन्थोंकी रचना हुई । ऐसा मानना है कि उत्तराखण्ड के बदरीवन मेंबादरायण व्यास ने महाभारत ग्रन्थ की रचना की । वनों में रचे जाने के कारण उपनिषद् ग्रन्थों को तो आरण्यक शास्त्र ही कहा जाने लगा । गीता में भगवान् कृष्ण अपनी विभूति वर्णन में कहते हैं ` स्थावराणाम च हिमालय ' स्थिर रहने वालों में मैं हिमालय हूँ । इस तरह हिमालय प्राकृतिक विविधता के साथ सामंजस्य स्थापित करते हुए संस्कृति के विकास का कारक बना । जिसमेंप्रकृति के प्रति श्रद्धा का भाव पैदा हुआ । इससे एक सुक्ष्म दृष्टि का विकास हुआ जिसने एक ऐसा चश्मा दिया जो प्रकृति की क्रि याओ को बिना कोई रंग चढ़ाए अपने असली रुप में देखनें में सक्षम था । 
इसी के फलस्वरुप एक ओर `सत्यं ज्ञानं अनंतम ब्रह्म' का उद्घोष हुआ, दूसरी ओर उस सत्य की खोज की व्यावहारिक गतिविधियां प्रारंभ हुई । इसी के परिणाम स्वरुप बिना आधुनिक उपकरणों के ही सूर्य सिद्धांत जैसे वैज्ञानिक ग्रन्थों की रचना हुई । ज्योतिर्विज्ञान, आयुर्वेद, गणित, आदि विज्ञानों की खोज के साथ शून्य की खोज हुई । भौतिक विज्ञानों की खोज के साथ-साथ सूक्ष्म जगत की और सृष्टि के आदि कारण की खोज प्रारंभ हुई ।  जिसमें एक चेतन तत्व की अवधारणा की प्रस्थापना हुई जिसे सृष्टि का मूल कारण माना गया । वह चेतना व्यष्टि चेतना के रुप में आत्मा कहलाई, और समष्टि चेतना के रुप में परमात्मा कहलाई । सभी में उस समष्टि चेतना का अंश विद्यमान माना गया । `सर्व खलु इदं ब्रह्म' कह कर उद््घोषणा की गई । जहां भी आत्मा है वह श्रद्धा के योग्य है ।
इसीलिए जड़-चेतन, नदी, पेड़, पहाड़, जीव, जंतु, अग्नि, वायु, सूर्य आदि सभी श्रद्धा के पात्र हो गए, पूज्य हो गए । विष्णु पुराण मेंविष्णु स्वयं कहते है कि `मैने हिमालय की सृष्टि यज्ञ के साधन के लिए की ।' यज्ञ की एक व्याख्या यह भी है कि प्रकृति के उपयोग के कारण होने वाली छीजन की भरपाई करने वाला कार्य यज्ञ है । कपड़ा पहनते है तो कातना-बुनना यज्ञ है, विद्या से जीवन चलाते है तो विद्या दान यज्ञ है यानि ज्ञान यज्ञ, दूसरों के यहां खाते है तो खिलाना भी यज्ञ है और अन्न पैदा करना भी यज्ञ है ।
यानि यज्ञ एक भावना है, प्रकृति और जीवन के प्रति जिम्मेदारी की भावना । स्वयं हिमालय भी मिट्टी निर्माण, जल संरक्षण और जैव विविधता संरक्षण करके छीजन दूर करने का ही कार्य कर रहा है । तो एक तरह से हिमालय हमारी संस्कृति का  प्रतीक भी है और हमारे जीवन दर्शन का आधार भी है । यह भगवान शंकर का आवास ही नहीं भगवती पार्वती का पिता भी है । इसे देवात्मा कह कर पुकारा गया ।
हिमालय ने हमें जैव विविधता के साथ सांस्कृ तिक विविधता का भी अवदान दिया है । यहां सदियोंसे अनेक धर्म फल-फूल रहेंहै । इनमें से हिन्दू, बौद्ध, जीव वादी बर्मी मत, और एकेश्वर वादी मुस्लिम और इसाई मत प्रमुख है । सनातन हिन्दू परंपरा, बौद्ध, और जीव वादी मतों सबमें आत्मा को मानना और पूजने के अंश विद्यमान हैं। घोर एकेश्वरवादी इस्लाम और इसाई मतों ने इन जीव वादी मतों की निंदा की और घोर विरोध किया । किन्तु हिमालय ने इनको सह अस्तित्व का रास्ता दिखाने का काम किया । सनातन हिन्दू परंपरा में सबके अंदर एक ईश्वर देखने की जो समझ है इसे एकात्म-सर्वात्म वाद कह सकते है । इस अवधारणा ने प्रकृति के प्रति जिम्मेदार व्यवहार की महत्ता को स्थापित किया । जिसके फलस्वरुप नदी मां हो गई तो अनेक पशु-पक्षी पूज्य होकर संरक्षित हो गए । 
पेड़ पौधों में जीवन की वैज्ञानिक सत्यता को मान्यता दी गई । तुलसी, पीपल, बिल्व, आम, वट, आमला आदि अनेक वृक्ष श्रद्धा के पात्र हो गए । गीता मेंभगवान कृष्ण ने कहा ` वृक्षानाम अश्वत्थो अहं ' इस विविधता के प्रति श्रद्धा ने ही सभी पंथो धर्मोंा के प्रति समदृष्टि प्रदान की । ` एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति ' एक ही ईश्वर को विद्वान लोग अलग-अलग तरह से वर्णन करते है । सहिष्णुता, वैचारिक विविधता की समझ और इसकी सत्यता पर आस्था से ठीक ऐसी भावना पैदा होती है । यही कटुता का मूल कारण बनती है । आज दुनियां को इस भारतीय पंरपरा को आत्मसात करने की बड़ी जरुरत है । किन्तु हम भारतीय परंपरा के ध्वजवाहक स्वयं ही इसके कई पक्षोंको भूल बैठे है या विकृत कर चुके है । खास कर उंच-नीच के भेद बना कर हमने ` सर्व खलु इदं ब्रह्म ' और ` ईशावास्यं इदं सर्वं ' जैसी मौलिक घोषणाआें को ही निरर्थक बनाने का अपराध किया है । विवेकानंद ने अपने समय के आपसी विद्वेष और उंच नीच के भेदोंसे जर्जर समाज के विषय मेंकहा था कि `ये विकृतियां भारतीय संस्कृति के कारण पैदा नहींहुई बल्कि उसको सही तरीके से लागू न करने, गलत व्याख्या और गुलामी के कारण पैदा हुई है ।' यह कथन आज भी काफी हद तक सत्य है । उस एकात्म सर्वात्मवादी संस्कृति को सही अर्थोंा में अपना कर सहिष्णु समतावादी समाज की रचना की जा सकती है । साथ साथ जीवनदायिनी प्रकिृति मां की संभाल भी की जा सकती है । यही विचार, टिकाउ विकास को हासिल करने का मार्ग भी प्रशस्त करेगा । ***
हमारा भूमण्डल
बिग बैंग के बाद प्रथम ब्लैक होल की खोज
प्रदीप
महान यूनानी दार्शनिक अरस्तू ने कहा था कि मनुष्य स्वभावत:  जिज्ञासु है तथा उसकी ब्रह्मांड की व्याख्या करने की एक अदम्य इच्छा है । 
ब्रह्मांड की कई संकल्पनाआें ने मानव मस्तिष्क को हज़ारों वर्षो से उलझन में डाल रखा है । वर्तमान में वैज्ञानिक ब्रह्मांड की सूक्ष्मतम एवं विशालतम सीमाआेंतक पहुंच चुके है । ब्रह्मांड के प्रेक्षणोंसे खगोलविदों को ब्रह्मांड की विचित्रताआें और रहस्यों के बारें में पता चला है । दिलचस्प यह है कि ब्रह्मांडीय पिंडों के बारे में हमारे ज्ञान में वृद्धि के साथ और अधिक विचित्रतांए सामने आती गई है । ब्रह्मांड की इन्ही विचित्रताआें में से एक है ब्लैक होल या श्याम विवर ।
ब्लैक होल अत्यधिक घनत्व तथा द्रव्यमान वाले ऐसे पिंड होते है, जो अपने द्रव्यमान की तुलना में आकार में बहुत छोटे होते है । इनका गुरुत्वाकर्षण इतना प्रबल होता है कि इनके चंगुल से प्रकाश की किरणोंका निकलना भी असंभव होता है । चूंकि ब्लैक होल प्रकाश की किरणों को भी अवशोषित कर लेते है , इसीलिए ये हमारे लिए सदैव अदृश्य ही बने रहते है ।
आजकल ब्लैक होल एक बार फिर से चर्चा में है क्यांकि मैसाचूसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के खगोल वैाानिकोंने पृथ्वी से सर्वाधिक दूरी पर स्थित एक विशालकाय ब्लैक होल की खोज की है । इस ब्लैक होल को जे१३४२+०९२८ नाम दिया गया है । इस विशालकाय ब्लैक होल की मौजूदगी के संकेत एक अत्यधिक चमकील क्वासर (क्वासी स्टेलर रेडियो सोर्स) के केंद्र में मिले है । क्वासर ने भी लंबे समय से खगोल वैज्ञानिकों को उलझन में डाल रखा है । वैसे तो ये क्वासर हमारी आकाशगंगा (मिल्की वे) से करीब पांच लाख गुना छोटे पिंड है, मगर ये १०० से अधिक आकाशगंगाआें के बराबर रेडियों तरंगों का उत्सर्जन करते है । क्वासर की खोज के ही समय कुछ वैज्ञानिकोंने अनुमान लगाया था कि ब्रह्मांड के ये रहस्यमय बाशिंदे ब्रह्मांड की दूरस्थ सीमाआें पर स्थित हो सकते हैं । एमआइटी द्वारा की गई इस हालिया खोज ने वैज्ञानिकों के इस पूर्वानुमान की पुष्टि की है तथा यह भी संकेत दिया है कि क्वासर के केंद्र में विशालकाय ब्लैक होल मौजूद हो सकते हैं ।
इस नवीनतम खोज से यह पता चला है कि जे१३४२+०९२८ ब्लैक होल के मुखिया क्वासर ने ब्रह्मांड की उत्पत्ति की घटना (बिग बैंग) के कुछ समय बाद प्रकाश/रेडियो तरंगों का उत्सर्जन शुरु कर किया होगा । उस प्रकाश ने हम तक पहूंचने के लिए लगभग १३ अरब वर्ष का समय लिया होगा । यह समयावधि लगभग हमारे ब्रह्मांड की उम्र के बराबर है । इस क्वासर के प्रकाश की तेजस्विता आधुनिक खगौलीय मानकोंके आधार पर इस ब्लैक होल को प्रारम्भिक ब्रह्मांड का निवासी कहें तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी । इस ब्लैक होल का द्रव्यमान हमारे सूर्य के द्रव्यमान से लगभग एक अरब गुना अधिक है । 
इस दूरस्थ व अति प्राचीन ब्लैक होल की खोज कार्नेजी इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस के खगोल वैज्ञानिक एडुआर्डो बनाडोस के निर्दशन मे की गई है । इस खोज में वाइडफील्ड इंफ्रारेड सर्वे एक्सप्लोरर (वाइस) के आंकड़ों के अलावा चिली स्थित मेजीलान दूरबीन, एरिज़ोना स्थित लार्ज बायनोंक्यूलर दूरबीन और हवाई में स्थापित जेमिनी नॉर्थ दूरबीन की सहायता ली गई । 
यह खोज ब्रह्मांड वैज्ञानियों के लिए एक बड़ा रहस्य बनकर सामने आई है क्योंकि इस ब्लैक होल का निर्माण बिग बैंग के ठीक बाद हुआ था, जबकी वर्तमान खगोलीय सिद्धांतों के अनुसार उस समय तो आकाशगंगाआें और तारों को जन्म देने वाली निहारिकाआें का भी निर्माण शुरु नहीं हुआ था । 
इस संदर्भ में एमआइटी के कवली इंस्टीट्यूट फॉर एस्ट्रोफिज़िक्स एंड स्पेस रिसर्च के खगोल वैज्ञानिक रॉबर्ट सिमको और फ्रांसिस फ्रीडमैन का कहना है कि ` यह एक अत्यधिक द्रव्यमान वाला ब्लैक होल है जब ब्रह्मांड बिल्कुल नया रहा होगा, ब्रह्मांड का विस्तार भी ज़्यादा नहीं हो पाया होगा अर्थात जब ब्रह्मांड एक बहुत बड़े ब्लैक होल को जन्म देने के लिए पर्याप्त् भी नही रहा होगा, उस समय एक ब्लैक होल की उत्पत्ति आश्चर्यचकित करती है ।'
यह सर्वविदित तथ्य है कि जब सूर्य से लगभग १० गुना अधिक द्रव्यमान वाले तारोंका हाइड्रोजन और हीलियम रुपी इंर्धन खत्म हो जाता है, तब उन्हें फैलाकर रखनें वाली ऊ र्जा चुक जाती है और वे अत्यधिक गुरुत्वाकर्षण के कारण सिकुड़कर अत्यधिक सघन पिंड ` ब्लैक होल 'बन जाते है ।
प्रश्न यह उठता है कि जब तारों का ही जन्म नहीं हुआ था तब तारों के अवशेष से एक अत्यंत विशालकाय ब्लैक होल की उत्पत्ति कैसे हुई होगी ? क्या यह संभव है कि पिता के जन्म से पहले पुत्र का जन्म हो जाए ? यह नवीनतम खोज बिग बैंग को ब्रह्मांड की उत्पत्ति की सम्पूर्ण तार्किक व्याख्या मानने से इंकार करती है और उसमेंसंशोधन की मांग करती नज़र आ रही है । 
ब्रह्मांड की उत्पत्ति कब और कैसे हुई? क्या यह सदैव से अस्तित्व मेंथा या इसका कोई प्रारम्भ भी था ? इसकी उत्पत्ति से पूर्व क्या था ? क्या इसका कोई जन्मदाता भी है ? यदि ब्रह्मांड का कोई जन्मदाता है तो पहले ब्रह्मांड का जन्म हुआ या उसके जन्मदाता का ? यदि पहले ब्रह्मांड का जन्म हुआ तो उसके जन्म से पहले उसका जन्मदाता कहां से आया? इस विराट ब्रह्मांड की मूल संरचना कैसी है - ये कुछ ऐसे मूलभूत प्रश्न है जो आज भी उतने ही प्रासंगिक है जितने सदियोंपूर्व थे । हमारा अद्भुत ब्रह्मांड रहस्यों से भरा पड़ा है । लेकिन अब हम विज्ञान प्रश्नों के जवाब तो देता है किंतु साथ ही सर्वथा नए प्रश्न भी खड़े कर देता है । ***
विशेष लेख
शिक्षा व्यवस्था पर पुनर्विचार की जरुरत
फैज कुरैशी
शिक्षा तंत्र की विशालता और गिरती हुई साख के बीच की कड़ी शिक्षक है । अपने दैनंदिनी अनुभवों में शिक्षक और शिक्षण से जुड़े कुछ पूर्वाग्रहों से जूझ रहे है । खोती हुई साख और बच्चें के अकादमिक स्तर को बढ़ाने के लिए प्रयास किये जाने की जरुरत है । वही कुछ नीतिगत बदलाव के बारे मेंभी सोचा जाना चाहिए ।
देश की सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था दुनिया की सबसे बड़ी और जटिल व्यवस्थाआें में से एक है । यहाँ प्रति सवा किलोमीटर पर एक विद्यालय मौजूद है । आंकड़ो के मुताबिक इस व्यवस्था में १५ लाख २२ हजार तीन सौ छियालीस स्कूल है, जिनमें २५ करोड़ ९४ लाख ६८ हजार बच्च्े अध्ययन करते है । इन्हें सीखने में मदद के लिए है ८६ लाख ९१ हजार नौ सौ बाइस शिक्षक । शिक्षा व्यवस्था की ये संख्या कई देशों की कुल जनसंख्या के बराबर है । संख्या की दृष्टि से इतना विशाल तंत्र हमेंविस्मित और गौरवान्वित भी करता है ।
` वर्ल्ड डेवेलपमेंट रिपोर्ट ' २०१८-लर्निंग टू रियलाइज एजुकेशंस प्रॉमिस द्वारा जारी की गई दुनिया के बदतर शिक्षा व्यवस्था वाले १२ देशोंकी सूची में भारत दूसरे स्थान पर है । वहां २०१६ में प्रकाशित असर रिपोर्ट के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रोंमें कक्षा ५ के ५२२ प्रतिशत और कक्षा ८ के २७ प्रतिशत बच्च्े कक्षा २ के स्तर का पाठ नहीं पढ़ पाते । कक्षा ५ के ७५.४ प्रतिशत बच्चें को घटाना और ७४.१ प्रतिशत बच्चें को भाग देना नहीं आता । यही हालत कक्षा ८ के भी है जहां ७६.८ प्रतिशत बच्च्ें घटाना तो ५६.८ प्रतिशत बच्च्े भाग देना नहीं जानते ।
मानव संसाधन विकास मंत्रालय के २०१४-१५ के आंकड़ो के अनुसार भारत में प्राथमिक स्तर तथा उच्च् प्राथमिक स्तर पर छात्र शिक्षक अनुपात क्रमश: २४ व १७ दिखता है, जो कि समग्रता मेंदेखने पर बेहतर लगता है । मगर राज्य, जिला और ब्लॉक स्तर पर ये अनुपात अलग ही शक्ल लेते हैं । यह जानकर आश्चर्य होगा कि अधिकतर स्कूलों में विषयवार शिक्षक उपलब्ध ही नहीं है । पिछले दिनोंमध्यप्रदेश विधानसभा में पूछे गए एक प्रश्न के उत्तर मेंशिक्षा मंत्री ने स्वीकार किया कि प्रदेश के ३५५३ प्राथमिक, ५१६२ माध्यमिक, १०९१ हाई व हायर सेकेंड्री विद्यालय शिक्षक विहीन है । आरटीई-०९ के मुताबिक प्रदेश के विद्यालयोंमें ६३८५१ शिक्षकों की कमी बनी हुई है । स्कूलोंमें बच्चें के लिए शैक्षिक प्रक्रियाएं करनी होती है जो विशेषज्ञता की मांग करती है लेकिन स्कूल की व्यवहारिक परिस्थितियोंमें सामाजिक विज्ञान विषय के शिक्षक को हिंदी/संस्कृत पढ़ाना पड़ता है । इसी तरह गणित विषय के लिए नियुक्त शिक्षकोंके बारे मेंधारणा होती है कि इनकी विज्ञान विषय पर समझ तो अच्छी ही होगी । कितनी ही विशेषज्ञ शिक्षक हो वे २-३ विषयों पर एक साथ समान अधिकार रखते हुए अपेक्षित शैक्षिक प्रक्रियाएं नहीं कर पाते है, तब प्रतिफल को कैसेदेखा जाए । यहाँ शिक्षकों की कार्यक्षमता, काबिलियत, शिक्षण पद्धति, आदि पर प्रश्न नहीं उठाया जा रहा है ।
शिक्षा तंत्र की विशालता और गिरती हुई साख के बीच की कड़ी शिक्षक ही है । अपने दैनंदिनी अनुभवों में शिक्षक और शिक्षण से जुडे कुछ पूर्वाग्रह जैसे सरकारी स्कूल मेंतो पढ़ाई ही नहीं होती, शिक्षक काम ही नही करते, ये पढ़ाना ही नही चाहते आदि को कहते आ रहे है । खोती हुई साख को समझने और बच्चें के अकादमिक स्तर को बढ़ाने के लिए कुछ पहलुआेंका विश्लेषण करने का प्रयास किया है । इसके केंद्र में कुछ प्रश्न उभरते है जिनमें इतना विशाल और संगठित तंत्र होने के बावजूद बच्च्े क्यों अपेक्षित स्तर का सीख नहीं पा रहे हैं ? क्यों सरकारी स्कूलोंसे बच्च्े निजी स्कूलोंमें दाखिला ले रहे हैं ? क्यों शासकीय स्कूलबंद होते जा रहे है ? आदि । वैसे तो इन सवालों के जवाब आपस में गूंथे हुए है और वे अवसरोंकी उपलब्धता के अलावा शिक्षक और तंत्र की जटिलता पर निर्भर करते हैं ।
पिछले कुछ वर्षोंा तथा वर्तमान में भी मध्यप्रदेश के शिक्षक किसी एक शिक्षण सत्र में शिक्षण के साथ या अतिरिक्त तौर पर बूथ लेवल ऑफिसर, विविध सर्वे, पशु गणना आदि में ३ माह से अधिक समय के लिए व्यस्त रहे है । आमतौर पर ये ३-६ माह एक साथ नहीं होते, अंतरालों में होते हैं । इससे अनियमितता की स्थिति पैदा होती है, जो सीखने-सिखाने को बाधित करती है ।
यदि शिक्षकों का अपने विद्यालय क्षेत्र के अलावा अन्य इलाकों में काम को करना होता है (जो कि अधिकतम शिक्षक कर रहे है ) तो वह अपने मूल का याने शिक्षण कार्य को नही कर पाते है । इसके अतिरिक्त समग्र आईडी, आधार कार्ड वेरीफिकेशन, जाति प्रमाण-पत्र, स्वच्छता अभियान, कुम्भ या बड़े उत्सवों में ड्यूटी जैसे कुछ और काम इसमें जोड़ लेना चाहिए ।
यह तो थी स्कूल के बाहर के कुछ कामोंकी बानगी । लेकिन स्कूल के भीतर किये जाने वाले शैक्षिक कामोंके अलावा मध्यान्ह भोजन, यूनिफार्म, किताबें वितरण, छात्रवृत्ति, विविध पत्रक, हिसाब-किताब रखना आदि जैसे भी काम भी शिक्षक के जिम्मे हैंही । इसके अलावा प्रवेशोत्सव पुस्ताकोत्सव, शालेय खेल और ३ से १५ दिवसीय प्रशिक्षण आदि, जो विविध अंतरालों पर चलते ही रहते है । क्या इन सब परिस्थितियों में २२० दिन (आरटीई-०९ के मान से) नियमित रुप से किसी शिक्षक का शिक्षण कार्य करना संभव हो पाता होगा ?
वैसे शिक्षा का अधिकार कानून २००९ (आरटीई-०९) के अंतर्गत प्रारंभिक शिक्षा मेंशिक्षकों के शैक्षणिक कार्य के लिए कक्षा पहली से पांचवी तक एक शैक्षणिक वर्ष में ८०० घंटे तथा छठवीं से कार्यदिवस का प्रावधान है । इसके बरअक्स आरटीई-०९ की धारा २७ के अनुसार `किसी शिक्षक को दस वर्षीय जनगणना, आपदा राहत कर्तव्यों या यथास्थिति, स्थानीय प्राधिकारी या राज्य पा राज्य विधान मंडलों या संसद के निर्वाचन से सम्बंधित कर्तव्यों से भिन्न किसी गैर-शैक्षणिक प्रयोजनों के लिए अभियोजित नहीं किया जाएगा । '
इस विश्लेषण में एक जटिलता और है । ये जटिलता बच्चें व पाठ्यपुस्तक की भाषा, पढ़ाने के तौर तरीकोंव जीवन से कटाव वाले सन्दर्भोंा से बनती है जैसे पाठ्यपुस्तक की हिंदी (जो अधिकतम बच्चें की मातृभाषा नहीं है, में अध्ययन करना), अमूर्त गणितीय संकल्पनाएँ जो परिवेश से जुड़ती दिखाई नहीं देती, अंग्रेजी व संस्कृत भाषा जो परिवेश में उपयोग नही की जाती, बगैर संदर्भोंा व नए परिभाषिक शब्दों में पर्यावरण अध्ययन पढ़ना, माध्यमिक स्तर पर सामाजिक विज्ञान जिसमें इतिहास, भूगोल, नागरिक शास्त्र शामिल है और विज्ञान विषय को रटना या याद करने जैसी प्रक्रियाआें से गुजरना । इस जटिलता से गुजरते हुए बच्च्े जब घर पहुँचते है तो घरों पर अकादमिक सहयोग की अपेक्षा बेमानी ही लगती है । ये तमाम चीज़ेंशैक्षिक उपलब्धियों पर प्रतिकूल असर डालते ही होगी ।
अब हम आरटीई-०९ के २५ प्रतिशत आरक्षण वाले नियम की भी व्यावहारिक स्थिति को परख लेते है । यह नियम संभव्त: बड़े शहरों में वंचित वर्ग के बच्चें को समान अवसर उपलब्ध कराने के नजरिए से बनाया होगा । इसके तहत बड़े/महंगे निजी विद्यालयों में पहुंचे छात्रों और पालको के अनुभव यूनिफार्म, पिकनिक, रोज का टिफिन, स्कूलोंकी संस्कृति, व्यवहार आदि को लेकर नकारात्मक अनुभव सामने आते है । इस नियम के बारे मेंवामपंथी शिक्षाशास्त्री ने एक विमर्श में कहा था `इससे हम शिक्षा के निजीकरण और सरकारी स्कूलोंको बंद करने के दरवाजे खोल रहे है ' । 
इनका यह कथन आंकड़ो के मान से सत्य परिलक्षित होता दिखता है । २०१५-२०१६ के मुताबिक मध्यप्रदेश मेंवर्ष २०१०-२०११ में १११९४३ शासकीय तो २३७१० निजी विद्यालय थे, वहीं वर्ष २०१५-१६ में यह आंकड़ा ११४४६५ तथा २७१९४ हो गया है । इस काम में अजीब स्थिति ये है कि स्कूल के केचमेंट एरिया से सरकारी स्कूलोंमें आ सकने वाले बच्चें को  शासकीय शिक्षकों को ही नियम के तहत निजी स्कूलोंमें भेजने की प्रक्रियाकरनी होती है । उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक वर्ष में२०१०-११ में २० या उससे कम छात्रों वाले ३५७७ विद्यालय थे, जो कि २०१५-१६ में बढ़ कर ११६२५ हो गए यानी आरटीई ०९ के लागू होने के बाद सरकारी स्कूल लगातार खाली हो रहे और आने वाले समय मेंये स्कूल जल्द ही बंद होने की स्थिति मेंहोंगे ।
वर्तमान शिक्षा के परिदृश्य को देखते हुए आने वाले समय में सरकारी स्कूलों का अस्तित्व संकट में दिखता है । सरकारी और निजी स्कूलोंमें बच्चें के शैक्षिक स्थितियां एक समान है, ऐसे मेंनीतिगत मुद्दों पर पुनर्विचार करने की जरुरत होगी, जिससे बच्चें को शिक्षा के अधिकार से वंचित होने की स्थिति से बचाया जा सकेगा ।     ***
वर्ष 2017
वैश्विक परिदृश्य में पर्यावरण
डॉ. ओ. पी. जोशी
वर्ष २०१७ में पर्यावरण से सम्बधिंत कई घटनायें घटी एवं बिगड़ते  पर्यावरण पर चेतावनी स्वरुप कई रिपोर्टस भी जारी कह गयी । प्रस्तुत है कुछ प्रमुख घटनायें एवं रिपोर्ट्स । अमेरीका का लगभग १००० वर्ष पुराना टनेल-ट्री (सिकोइया प्रजाति) १५ जनवरी का आए तूफान में धराशायी हो गया । लगभग २५० फीट उंचाई के इस पेड़ के तने को काटकर १३७ वर्ष पूर्व इसमें एक सुरंग बनाई गयी थी जिसमें से कार निकल जाती थी । सुरंग को लोग पायोनियर केबिन भी कहते थे । इस सुरंग के कारण लोगोंका दो किलोमीटर का चक्कर बच जाता था । कैलिफोर्निया के कुछ लकड़ी तस्करो ने कुछ पुराने रेड वुड के वृक्ष भी काटे । 
अंटार्कटिका मेंहिम चट्टानों (आइस शेल्फ) लार्सेन सी का एक बड़ा हिस्सा १० से १२ जुलाई के मध्य टूटकर अलग हो गया जिससे लार्सेन सी का आकार १२ प्रतिशत कम हो गया । टूटकर अलग हुआ भाग लंदन के क्षेत्रफल से चार गुना बड़ा था (लगभग ५८०० वर्ग किलोमीटर)। लार्सेन सी में पिछले कई वर्षो से २०० कि.मी. लम्बी दरार देखी जा रही थी । पर्यावरणविदों ने इसका कारण बढ़ता तापमान मानते हुए इसे भविष्य के लिए खतरनाक बताया है ।
विश्व में सम्भवत: पहली बार न्यूजीलैंड की सरकार ने मार्च में वहां की १५० कि.मी लम्बी वांगजुई नदी को सजीव इंसान मानकर मानव अधिकार प्रदान किए । नदी को दिए अधिकारों के तहत् प्रदूषण, अतिक्रमण व अत्यधिक दोहन पर न्यायालय में मुकदमा करके दंड का प्रावधान किया गया है । न्यायालयीन प्रकरणों में नदी का पक्ष कोई शासकीय वकील तथा माओरी समाज के प्रतिनिधि करेंगे । यहां की माओरी जनजाति पिछले १५० वर्षो से इस नदी हो बचाने की लड़ाई लड़ रही है ।
वर्ष २०१६ मे हुए पेरिस जलवायु परिवर्तन सम्मेलन के समझौते से अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मार्च में अलग होने की घोषणा की । ट्रंप प्रशासन इसे अमेरिकी लोगों पर आर्थिक बोझ मानता है । वर्तमान यूएस सरकार ने पूर्व राष्ट्रपति ओबामा की स्वच्छ ऊ र्जा योजना को रद्द करके यू.एन.ग्रीन क्लाईमेट फंड को दी जाने वाली वित्तीय सहायता पर रोक लगा दी । पर्यावरण सुरक्षा एजेंसी (इ.पी.ए.) के बजट मेंएक तिहाई की कटौती की गई ।
पौलेण्ड की सरकार ने एक पर्यावरण कानून पारित कर निजी जमीन पर मनचाही संख्या में पेड़ो को बगैर अनुमति काटने का प्रावधान किया । पर्यावरण प्रेमियों तथा मानव अधिकार समूहो ने इसका विरोध किया है । वैको शहर में महिलाआें ने `पोलिश मदर्स ऑन ट्री स्टंप्स ' नाम से एक समूह गठित करके इस कानून का विरोध शुरु किया है। विरोध प्रदर्शन मेंमहिलाएं कटे वृक्षों के  ठूंठों पर बैठकर बच्चें को स्तनपान कराती है । वे दर्शाना चाहती है कि पेड़ भी पर्यावरण का पोषण एक माता के समान करते है ।
ऑस्ट्रेलिया के बुद्धिजीवियों तथा खिलाड़ियों ने क्वीसलैंड में अडाणी समूह के  चेयरमेन को कोयला खनन परियोजना वापस लेने के लिए एक खुला पत्र लिखा । इस परियोजना से विश्व प्रसिद्ध ग्रेट बैरीयर रीफ को खतरा बताया गया है । ग्लोबल वार्मिंग तथा भूजल स्तर के लिए भी इसे उचित नहीं बताया गया । ६० वर्षोंा तक चलने वाली यह परियोजना लगभग एक लाख करोड़ रुपए की है । ९० जाने-माने लोगों द्वारा लिखे गए पत्र में कहा गया है कि यदि परियोजना आगे बढ़ी तो दोनों देशों (भारत व ऑस्ट्रेलिया) के बीच सम्बंधो पर बुरा प्रभाव होगा एवं क्रिकेट तथा अन्य खेल भी प्रभावति होगें। पत्र लिखने वालों में विश्व प्रसिद्ध क्रिकेटर इयान तथा ग्रेग चेपल भी शामिल है ।
पेरिस जलवायु सम्मेलन के समझौते पर नियम कानून बनाने हेतु जर्मनी के बॉन शहर मेंनवम्बर में एक सम्मेलन हुआ जिसमें १९७ देश के लगभग २५ हजार प्रतिनिधियों ने भाग लिया । इस सम्मेलन के आयोजन की सारी व्यवस्थाएं (ई-बस व सायकल का उपयोग, चाय-पानी के लिए मिट्टी के कप, कागज का उपयोग नहीं, कोई प्रेस नोट का वितरण न हो तथा राश्न नदी के किनारेंतम्बुआें में कार्य) तो पर्यावरण हितैषी रहे परंतु अन्य सम्मेलनों के समान यहां भी कोई ठोस निणर्य नहीं हो पाया । विकासशील देशों से कई गुना अधिक कार्बन का उत्सर्जन करने वाले विकसित देश इसी जिद पर अड़े रहे कि उत्सर्जन कम करने में सभी को साझा प्रयास करने चाहिए । अमेरिका के कम प्रतिनिधित्व के बावजूद जलवायु परिवर्तन की रोकथाम के लिए भागीदार देशोंकी एकता व प्रयास सराहनीय रहे ।
ब्राज़ील के एक न्यायालय ने राष्ट्रपति के उस आदेश को निरस्त कर दिया जिसके तहत विश्व प्रसिद्ध अमेज़न के वर्षा वनों एक बड़े संरक्षित अभयारण्य में खनन कार्य की अनुमति प्रदान की गई थी । राष्ट्रपति का यह मानना था कि खनन कार्य से देश की अर्थव्यवस्था सुधरेगी परंतु न्यायालय ने पर्यावरण संरक्षण को ज़्यादा महत्व दिया ।
संयुक्त राष्ट्र संघ के सहयोग से किए गए एक अध्ययन की रिपोर्ट में बताया गया कि पिछले चार दशकों से दुनिया की एक तिहाई भूमि की उर्वरा शक्ति कम हो गई है । कई कारणों से मैग्नेशियम, सोडियम तथा पौटेशियम की मात्रा के बढ़ने से यह परिणाम हुआ है । मिट्टी की सेहत बिगड़ने की दर उर्वरा शक्ति के निर्माण से लगभगल सौ गुना अधिक है । यह आशंका व्यक्त की गई है कि वर्ष २०५० तक दक्षिण एशिया, उत्तर पूर्वीव मध्य अफ्रीका इससे ज्यादा प्रभावित होगें । अफ्रीका महाद्वीप के कई देशोंमें तो पिछले कई वर्षो से भूमि सुधार के काईकार्य नही पाए है ।
विश्व स्वास्थ्य संगठन तथा युनीसेफ द्वारा तैयार एक रिपोर्ट के अनुसार विश्व की ६० प्रतिशत आबादी शौच व्यवस्था के अभाव में जीवनयापन कर रही है तथा ३० प्रतिशत लोगों को साफ पेयजल उपलब्ध नहीं है । विश्व स्वास्थ्य संगठन के महानिदेशक ने रिपोर्ट में कहा है कि शौच व्यवस्था, साफ पेयजल तथा स्वास्थ्य सेवाएं मूलभूत आवश्यकताएं है जो सभी की पहुंच में होना जरुरी है तभी पर्यावरण साफ सुथरा रहेगा ।
अमेरीकी वैज्ञानिकों ने पीएनएएस जर्नल में प्रकाशित एक लेख में चेतावनी दी है कि भारत के ९० प्रतिशत समुद्री पक्षियों के पेट मेंकिसी न किसी तरह प्लास्टिक पहुंच गया है । वर्ष २०५० तक यह प्रतिशत ९९ की सीमा पार कर जाएगा । १९६० के दशक में केवल ५ प्रतिशत समुद्री पक्षी प्लास्टीक से प्रभावित थे । जॉर्जिया विश्वविद्यालय का अध्ययन दर्शाता है कि यदि वर्तमान गति से समुद्रो में प्लास्टिक फेंका जाता रहा तो २०५० में मछलियों से ज़्यादा प्लास्टिक होगा ।
नेचर में प्रकाशित विश्व स्वास्थय संगठन की एक रिपोर्ट अनुसार विश्व में घर से बाहर के वायु प्रदूषण के कारण प्रति वर्ष ३५ लाख लोगों की मौत होती है एवं २०५० तक यह ६६ लाख होने की संभावना है । विश्व के सर्वाधिक २० प्रदूषित शहरों में आधे से ज्यादा भारतीय शहर बताए गए है ।
ग्लोबल विटनेस तथा गार्जियन ने एक संयुक्त रिपोर्ट में बताया है कि वर्ष २०१७ में पर्यावरण सुरक्षा से जुड़े १७० लोंगो को मार दिया गया । इनमें अधिकांश घटनाएं खनन, वन्यजीव संरक्षण तथा उद्योग के क्षेत्र से सम्बंधित  थी और ग्रामीण क्षेत्रों में ज़्यादा हुई । रिपोर्ट में भारत का नाम भी शामिल है ।
यूएस की नेशनल एके डमी ऑफ सांइसेज़की एक अध्ययन रिपोर्ट के अनुसार हमारी पृथ्वी जीवों के महाविनाश के छठे दौर में प्रवेश कर चुकी है । पृथ्वी के लगभग ४.५ अरब वर्ष के इतिहास में अब तक पांच बार ऐसा हुआ है जब सबसे ज्यादा फैली प्रजाति विलुप्त् हो गई । पांचवे दौर में विशालकाय डायनासौर समाप्त् हुए थे । कु छ वैज्ञानिक इस छठे महाविनाश को वैश्विक महामारी भी कह रहे हैं ।
वैश्विक पर्यावरण से जुड़ी ये प्रमुख घटनाए तथा रिपोट्र्स यही दर्शाती है कि पर्यावरण बेहद खराब स्थिति में पहुंच चुका है । यदि ऐसी ही परिस्थितियां जारी रहीं तो प्रजातियों के आसन्न छठे महाविनाश में होमो सेपिएन्स प्रजाति (मनुष्य) की विलुिप्त् की सम्भावना से एकदम इन्कार नहीं किया जा सकता ।   ***
प्रदेश चर्चा
राजस्थान : मुकुन्दरा हिल्स टाइगर रिजर्व
श्रीमती प्रज्ञा गौतम
चार वर्षोंा की लंबी प्रतीक्षा के बाद राजस्थान के तीसरे टाइगर रिजर्व - `मुकुन्दरा हिल्स टाइगर रिजर्व ' मेंबाद्य लाने की तैयारियां शुरु हो गई है । 
राजस्थान में `सरिस्का' और `रणथम्भौर' राष्ट्रीय उद्यान पहले से ही टाइगर रिजर्व क्षेत्र हैं । ९ अप्रेल २०१३ को तात्कालिन सरकार ने मुकुन्दरा हिल्स को टाइगर रिजर्व घोषित कर दिया था । कोटा शहर के दक्षिण-पूर्व मेंस्थित वन क्षेत्र और चंबल नदी घाटी का कुछ भाग इस टाइगर रिजर्व के अर्न्तगत आता है । चंबल नदी की सुंदर घाटियाँ, सघन वन और पानी की प्रचुरता के कारण यह क्षेत्र बाघ को बहुत रास आएगा । इसके अतिरिक्त अनेक झरनों, प्राकृतिक महत्वके स्थलोंयुक्त यह क्षेत्र पर्यटक ोंके लिए भी किसी स्वर्ग से कम नही होगा ।
यह करीब ७६० वर्ग कि.मी में चार जिलों कोटा, बूदीं, झालावाड़ और चित्तौड़गढ़ में फैला है । करीब ४१७ वर्ग कि.मी कोर और ३४२ वर्ग कि.मी बफर जोन है । इसमें दरा अभ्यारण, जवाहर सागर और चंबल घड़ियाल अभ्यारण का कुछ भाग शामिल है । इस क्षेत्र को टाइगर रिजर्व घोषित करने के बाद प्रथम कदम था इस क्षेत्र मेंबसे हुए ग्रामों को अन्यत्र विस्थापित करना, सुरक्षा दीवार का निर्माण और बाघों को छोड़ने के लिए एनक्लोजर बनाया जाना । मुकुन्दरा हिल्स टाइगर रिजर्व के दायरे मे कुल १४ गांव है, जिन्हें धीरे-धीरे अन्यत्र विस्थापित किया जा रहा है । ऐसा ही एक गांव है जवाहर सागर बांध जो अभी तक मेरी स्मृतियों में है । मैने यहां अपने बचपन का लंबा समय बिताया था । 
जवाहर सागर बांध को चंबल नदी की गोद में, जंगलों को साफ करके और चट्टानों को काट कर बसाया गया था । यहां ८० के दशक मेंभी बाघ की उपस्थिति दर्ज की गई थी । मुझे याद है बाघ की दहाड़ राजस्थान विद्युत उत्पादन निगम लि. कॉलोनी तक पहुंच जाती थी। क्वार्टर्स में अक्सर अनेक प्रकार के साँप और छोटे डायनसौर सदृश मॉनिटर लिजर्ड घुस जाया करते थे और लोगों के हाथोंमारे जाते थे । गर्मियों में पीली चोंच और लाल टोपी वाले सुंदर तोते आम के पेड़ों पर मंडराते थे ।
यह गाँव और राजस्थान विद्युत उत्पादन निगम लि. कॉलोनी अभ्यारण्य क्षेत्र में ही बना दी गई थी । अब यहाँ मनुष्य का दखल नहीं होगा और वनचर निर्बाध रुप से विचरण कर सकेंगे ।
यहाँ मार्च २०१८ में तीन बाघ लाने की योजना है, जिनमें एक नर और दो मादा होंगी । यह भारत का पाँचवा सबसे बड़ा टाइगर रिजर्व होगा । अभ्यारण्य के चारों तरफ ३२ कि.मी. दीवार का ही निर्माण हो पाया है । एनक्लोजरों में से सेल्जर क्षेत्र में एक एनक्लोजर तैयार हो गया है, दूसरे में अभी काम बाकी है ।
बरसात में यहाँ का सौंदर्य निखर उठता है । सर्दियों में पीलाभ रंगत लिए पहाड़ियाँ, बरसात में गहरी हो उठती है ं। वृक्षों पर मार्च-अप्रेल में नए पत्ते आ जाते है और मानसून आने पर ये हरे और सघन हो जाते है । यहां शुष्क पत्तझड़ी वन हैं । तेंदु, पलाश, अमलतास, महुआ, बेल, आँवला, घोकड़ा, बरगद, पीपल, नीम, जामुन, इमली, कदम्ब औ सेमल के वृक्ष पाए जाते है । घाटी मेंबाँस के वन भी है ।
वन में पेंथर, हाइना, भालू, भेड़िया, चीतल, सांभर, चिंकारा, नीलगाय, स्याहगोह, जँगली बिलाव जानवर हैं । यहाँ सर्पोंा की अनेक प्रजातियाँ, अजगर और मॉनिटर लिजर्ड जैसे सरीसृप भी मिलेंगे । नेवला, खरगोश, साही और हेजहोग जैसे छोटे प्राणी भी वन मेंदेखने को मिलेंगे । यहाँ करीब २२५ तरह के पक्षियों की प्रजातियाँ है - इनमें अति दुर्लभ सफेद पीठ और लंबी चोंच वाले गिद्ध, क्रेस्टेड सरपेंट ईगल, शॉट टोड, ईगल, सारस, स्टोर्क बिल्ड, किंग फिशर, ब्राउन हॉक आउल, डार्टर्स रेड क्रेस्टेड, पोचर्ड, पल्लास फिश ईगल आदि पक्षी प्रमुख हैं।
चंबल नदी में मगरमच्छ और घड़ियाल जैसे जीव हैं । पानी में नेरा हेडेड सॉफ्ट शेल टर्टल और थ्री स्ट्रिप्ड रुफ टर्टल जैसे कछुए भी हैं । यह पहला टाइगर रिजर्व है जिसमें जंगल सफारी के साथ-साथ चंबल सफारी भी करवायी जाएगी । जवाहर सागर बाँध से भैंसरोड़ गढ़ तक चंबल की लहरों पर बोटिंग करवायी जाएगी ।
यहाँ १४ वीं शाताब्दी का गागरोन का किला स्थित है जो कि मुकुन्दरा पहाड़ी पर है और तीन तरफ से जल से घिरा है । यहाँ काली सिंध और आहू नदी का संगम है । दरा के पास ही अबली मीणी का महल है जो कि कोटा से ५० कि.मी. दूर है । रावतभाटा के पास बाडोली मंदिर समूह है जो गुर्जर प्रतिहार शैली मेंबने हुए ९ मंदिरों का समूह है । ये ८ वीं से ११ वीं शताब्दी में बने हुए है । इनके अतिरिक्त भैंसरोड़ गढ़ फोर्ट १९ वीं शताब्दी का रावठा महल, शिकारगाह आदि अनेक ऐतिहासिक इमारतें है ं।
पिकनिक और सैर सपाटे के स्थल गेपर नाथ महादेव मंदिर और झरना, गराड़िया महादेव भी रिजर्व के अंतर्गत आते है ।
मुकुन्दरा हिल टाइगर रिजर्व के बारेंमें जानकारी देते हुए जिला वन अधिकारी एस.आर. यादव ने बताया कि बाघों को लाने की तैयारियाँ लगभग पूर्ण है । प्रदेश में बजरी संकट के कारण थोड़ा विलंब हुआ है । बजट की कोई कमी नहीं है । उन्होने बताया कि रणथम्भौर से टी-९१ बाघ और टी-८३ बाघिन को यहाँ लाया जाएगा । घने जंगल में लगभग २५ कि.मी. चंबल सफारी की व्यवस्था होगी ।
यहाँ घूमने के लिए अक्टूबर से मार्च तक का मौसम उपयुक्त है । सड़क या रेलमार्ग द्वारा कोटा आकर यहाँ भ्रमण किया जा सकता है । यहाँ का निकटतम हवाई अड्डा उदयपुर है ।

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पर्यावरण परिक्रमा
बस्तर के कांगेर वैली में खुजली वाला जंगल
एक जंगल ऐसा भी है जहां भीतर गए तो फिर शरीर में इतनी खुजली होगी कि हाथों को आराम मिलना मुश्किल हो जाएगा । यहां बात हो रही है छत्तीसगढ़ में बस्तरके कांगेर वैली की । यहां लगभग २९९ हेक्टेयर में फैले सूरन (जमीकंद) के  जंगल भीतर जाने की लोग सोचते भी नही । वैसे तो सूरन एक लोकप्रिय सब्जी है, लेकिन यहां पाया जाने वाला सूरन भूलकर भी रसोई में नहीं पहंुचता । अत्यधिक खुजली पैदा करने के कारण लोग इस कंद का उपयोग सब्जी के रुप में नही वरन औषधि के रुप में करते है । जिला मुख्यालय से २० किलोमीटर दूर नानगूर-नेतानार चौक के पास जगदलपुर वन परिक्षेत्र अंतर्गत कांगेर आरक्षित वनखंड के कक्ष क्रमांक १७७३ और १७७४ में२९९ हेक्टेयर में यह जंगल फैला है यह सूरन के पौधोंसे भरा हुआ है । यहां के सूरन के पौधे एक से सात फीट तक उंचे है । इसके पत्ते और तने मे बारीक रोएं होते है जो शरीर के संपर्क मेंआते ही खुजली पैदा कर देते है । ग्राम बड़े बोदल के आशाराम ठाकु र कहते है कि सूरन वाले जंगल मेंदुश्मन को भी कभी न जाना पड़े । खुजली होने पर शरीर पर गोबर लगाकर रगड़ा जाता है । उन्होनें बताया कि मवेशियों को जख्म हो जाने पर यहां के सूरन का गूदा लगा देने से घाव जल्दी भर जाता है । औषधि के लिए जब कभी सूरन को निकालना होता है तो पूरे शरीर को कंबल से ढंककर जाते है ।
जिला आयुर्वेद चिकित्सालय के आयुर्वेद चिकित्सक केके शुक्ला बताते है कि सूरन को जमीकंद कहते है । इसका अंग्रेजी नाम वाइल्ड क्रोम है । सब्जी और औषधि के रुप मेंइसका उपयोग होता है । इसके कंद में प्रोटीन, वसा, कैल्शियम, फास्फोरस, लौह तत्व, क्षार व विटामिन ए और बी पाया जाता है । सूरन के सेवन से सांस रोग, खांसी, आमवात, बवासीर, आंतो में दर्द, कृमिरोग, यकृत क्रिया से जुड़ी परेशानियां दूर होती है, लेकिन चिकित्सक की सलाह से ही इसका उपयोग किया जाए । इस जंगल में पाए जाने वाले सूरन में ऑक्सेलेट एसिड पाया जाता है, इसी से खुजली होती है ।

पशु विविधता की रक्षा करने की जरुरत
नस्ल पंजीकरण अपने देश के इस अपार पशु आनुवंशिक संसाधन तथा उनमें संबंधित ज्ञान व सूचना का प्रलेखन करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है । जिससे कि हम अपने आनुवंशिक संसाधनों की एक इंवेंटरी तैयार कर सकें एवं अनुवंशिक सुधार, संरक्षण एवं सतत उपयोग हो सके । यह बात केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री राधा मोहनसिंह ने पिछले दिनों नई दिल्ली में आयोजित पशु नस्ल पंजीकरण प्रमाण-पत्र पुरस्कार वितरण समारोह में कही ।
उनहोनें कहा भारत में विविध उपयोग, जलवायु एवं पारिस्थितिकी क्षेत्र होने के कारण विभिन्न पशुधन प्रजातियों की बड़ी संख्या में नस्लें विकसित हुई है । देश में आज ५१२ मिलियन पशुधन व ७२९ मिलियन कुक्कुट है । मौजूदा समय में भारत में पशुआें और मुर्गियों की १६९ पंजीकृत नस्ले है, जिसमें पशुधन गाय की ४१, भैंस १३, भेड़ ४२, बकरी २८, घोड़ ७, सुअर ७, ऊं ट ९, गधे-याक की १-१ और कुक्कुट समुदाय में मुर्गी की १८ एवं बत्तक व गीज की १-१ नस्लें शामिल है । यह महत्वपूर्ण है कि पहली बार याक, बत्तक व गीज की नस्लें भी पंजीकृत की गई है । देश में मौजूदा पशुधन तथा मुर्गी की १२९ देशी नस्लें एक साथ पंजीकृत की है । इसके बाद कई और नई नस्लों का पंजीकरण हुआ है । इस प्रक्रिया के तहत यह संख्या बढ़कर कुल १६९ हो गई है ।
यह चिंता का विषय है कि भारत में आर्थिक असमानता बढ़ती जा रही है । गरीबी उन्मूलन पर काम करने वाली संस्था `ऑक्सफैम' की रिपोर्ट के मुताबिक, बीते साल भारत मेंजितनी संपत्ति पैदा हुई, उसका ७३ प्रतिशत हिस्सा देश के १ फीसदी धनाढ्य लोगों के हाथोंमें चला गया, जबकि नीचे के ६७ करोड़ भारतीयों को इस सपंत्ति के सिर्फ एक फीसदी यानी सौवें हिस्से से संतोष करना पड़ा है । २०१६ के इसी सर्वे के अनुसार,भारत के १ फीसदी सबसे अमीर लोगोंके पास देश की ५८ फीसदी संपत्ति थी । हमारे यहां इतनी तेज़ बढ़ती असमानता दुनिया के नामी अर्थशास्त्रियोंको भी चकित किए हुए है । पिछले दिनोंदावोस में वर्ल्ड इकॉनॉमिक फोरम का सलाना सम्मेलन शुरु होने के कुछ की घंटोंपहले जारी इस रिपोर्ट के अनुसार बाकी दुनिया का हाल भी अच्छा नही है ।
पिछले साल दुनिया की संपत्ति में हुए कुल इजाफे का ८२ प्रतिशत हिस्सा महज एक प्रतिशत अमीर आबादी के हाथ लगा, जबकि ३.७ अरब लोगों की संपत्ति में कोई वृद्धि नही हुई । ऑक्सफैम के सलाना सर्वेको लेकर दुनिया भर में उत्सुकता रहती है और इस पर वर्ल्ड इकॉनॉमिक फोरम के सम्मेलन मेंचर्चा भी होती है । आय असमानता की बढ़ती खाई और लैंगिक असमानता जैसे मुद्दे भी सम्मेलन के एजेंडा में शमिल रहते है । अगर यह सम्मेलन आर्थिक असमानता कम करने का कोई सूत्र ढंूढ सके तो इसे जरुर सार्थक समझा जाएगा, वरना सुपर-अमीरों की पिकनिक तो इसे कहा ही जाता है । 
आर्थिक असमानता के चलते आज हर जगह आम जनता में भारी आक्रोश है, जिसकी अभिव्यक्ति अराजकता और हिंसक प्रदर्शनोंमें हो रही है । अमीरों के पास संपत्ति इक्ट्ठा होने का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि इस संपत्ति का बड़ा हिस्सा अनुत्पादक होकर अर्थतंत्र से बाहर हो जाता है । उनका उपभोग न तो उत्पादन में कोई योगदान करता है, न ही उससे विकास दर को गति मिल पाती है ।
करोड़ो की गाड़ियाँ, लाखों की घड़ियाँ और पेन, बिटकॉइन जैसी आभासी मुद्रा में लगा हुआ पैसा क्या किसी पिछड़े देश में कोई रोजगार पैदा करता है ? ऑक्सफैम की रिपोर्ट को एक अर्थ में उदारीकरण और भूमंडलीकरण पर की गई टिप्पणी भी माना जा सकता है। दुनिया में पूंजी के अबाध प्रवाह के बावजूद फायदा उन्हीं के हिस्से गया, जो पहले से समृद्ध थे । नई व्यवस्था मेंसरकारों का रोल घट जाने से राजनीति भी गरीबों के पक्ष में  नीतियां बनाने के बजाय उन्हें भरमाने पर केंद्रीत हो गई है । मनरेगा जैसी कुछ गरीब समर्थक नीतियां बनी भी तो उनका जोर कमजोर वर्ग को उत्पादन प्रक्रिया का हिस्सा बनाने की बजाय उन्हें किसी तरह जीवित रखने पर रहा । बहरहाल, असमानता के  मुद्दे को टालते जाने की भी सीमा है । कहीं ऐसा न हो कि दुनिया ऐसी अराजकता की शिकार हो जाए, जिससे उबरने की कल्पना भी मुश्किल लगने लगें ।

दुनिया के सर्वाधिक प्रदूषित देशों में है भारत
पर्यावरण के मामले मेंभारत की हालत बदतर है । ताजा ग्लोबल एन्वॉयर्नमेंट इंडेक्स में शामिल १८० देशों में भारत का स्थान १७७ वां है । दो साल पहले इस सूची में भारत १४१ वां स्थान पर था । उभरती अर्थ व्यवस्थाआें में शुमार चीन का स्थान १२० वां है ।
भारत की आबोहवा इतनी खराब है कि इसे दुनिया के सबसे खराब पांच देशों में रखा गया है । इन पांच देशों में बांग्लादेश, नेपाल, बुरुंडी और कांगो शामिल है । रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत और चीन आबादी के विकास के भारी दबाव से जूझ रहे है । विकास की गति तेज करने का सीधा असर पर्यावरण पर पड़ रहा है और वायु की गुणवत्ता गिर रही है । पड़ोसी पाकिस्तान भी इस सूची में ज्यादा ऊ पर नहीं है । १८० देशों की सूची में उसका स्थान १६९ वां है । इस लिहाज से पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में पर्यावरण के सुधार के लिए बड़े कदम उठाए जाने की जरुरत है । यह रिपोर्ट पिछले दिनों दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की शिखर बैठक के मौके पर सार्वजनिक की गई है । इस सूची मेंस्विट्जरलैंड लगातार सिरमौर बना हुआ है । स्वच्छता के लिहाज से फ्रांस, डेनमार्क, माल्टा और स्वीडन क्रमश: दूसरे,तीसरे चौथे और पांचवें स्थान पर हैं । रिपोर्ट में कहा गया है कि पर्यावरण की समस्या प्राणियों के स्वास्थ्य पर सीधा असर डाल रही है । हवा के साथ ही पानी और मिट्टी भी दूषित हो रही है । इसका असर जलीय जीवों, पक्षियों और खाद्यान्न की गुणवत्ता पर हो रहा है ।

भारत में लगातार बढ़ती आर्थिक असमानता
यह चिंता का विषय है कि भारत में आर्थिक असमानता बढ़ती जा रही है । गरीबी उन्मूलन पर काम करने वाली संस्था `ऑक्सफैम' की रिपोर्ट के मुताबिक, बीते साल भारत मेंजितनी संपत्ति पैदा हुई, उसका ७३ प्रतिशत हिस्सा देश के १ फीसदी धनाढ्य लोगों के हाथोंमें चला गया, जबकि नीचे के ६७ करोड़ भारतीयों को इस सपंत्ति के सिर्फ एक फीसदी यानी सौवें हिस्से से संतोष करना पड़ा है । २०१६ के इसी सर्वे के अनुसार,भारत के १ फीसदी सबसे अमीर लोगोंके पास देश की ५८ फीसदी संपत्ति थी । हमारे यहां इतनी तेज़ बढ़ती असमानता दुनिया के नामी अर्थशास्त्रियोंको भी चकित किए हुए है । पिछले दिनोंदावोस में वर्ल्ड इकॉनॉमिक फोरम का सलाना सम्मेलन शुरु होने के कुछ की घंटोंपहले जारी इस रिपोर्ट के अनुसार बाकी दुनिया का हाल भी अच्छा नही है ।
पिछले साल दुनिया की संपत्ति में हुए कुल इजाफे का ८२ प्रतिशत हिस्सा महज एक प्रतिशत अमीर आबादी के हाथ लगा, जबकि ३.७ अरब लोगों की संपत्ति में कोई वृद्धि नही हुई । ऑक्सफैम के सलाना सर्वेको लेकर दुनिया भर में उत्सुकता रहती है और इस पर वर्ल्ड इकॉनॉमिक फोरम के सम्मेलन मेंचर्चा भी होती है । आय असमानता की बढ़ती खाई और लैंगिक असमानता जैसे मुद्दे भी सम्मेलन के एजेंडा में शमिल रहते है । अगर यह सम्मेलन आर्थिक असमानता कम करने का कोई सूत्र ढंूढ सके तो इसे जरुर सार्थक समझा जाएगा, वरना सुपर-अमीरों की पिकनिक तो इसे कहा ही जाता है । 
आर्थिक असमानता के चलते आज हर जगह आम जनता में भारी आक्रोश है, जिसकी अभिव्यक्ति अराजकता और हिंसक प्रदर्शनोंमें हो रही है । अमीरों के पास संपत्ति इक्ट्ठा होने का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि इस संपत्ति का बड़ा हिस्सा अनुत्पादक होकर अर्थतंत्र से बाहर हो जाता है । उनका उपभोग न तो उत्पादन में कोई योगदान करता है, न ही उससे विकास दर को गति मिल पाती है ।
करोड़ो की गाड़ियाँ, लाखों की घड़ियाँ और पेन, बिटकॉइन जैसी आभासी मुद्रा में लगा हुआ पैसा क्या किसी पिछड़े देश में कोई रोजगार पैदा करता है ? ऑक्सफैम की रिपोर्ट को एक अर्थ में उदारीकरण और भूमंडलीकरण पर की गई टिप्पणी भी माना जा सकता है। दुनिया में पूंजी के अबाध प्रवाह के बावजूद फायदा उन्हीं के हिस्से गया, जो पहले से समृद्ध थे । नई व्यवस्था मेंसरकारों का रोल घट जाने से राजनीति भी गरीबों के पक्ष में  नीतियां बनाने के बजाय उन्हें भरमाने पर केंद्रीत हो गई है । मनरेगा जैसी कुछ गरीब समर्थक नीतियां बनी भी तो उनका जोर कमजोर वर्ग को उत्पादन प्रक्रिया का हिस्सा बनाने की बजाय उन्हें किसी तरह जीवित रखने पर रहा । बहरहाल, असमानता के  मुद्दे को टालते जाने की भी सीमा है । कहीं ऐसा न हो कि दुनिया ऐसी अराजकता की शिकार हो जाए, जिससे उबरने की कल्पना भी मुश्किल लगने लगें ।

वैज्ञानिकों ने दिखाया कि ९ हजार साल पहले लोग कैसे दिखते थे
वैज्ञानिकोंने पहली बार दुनिया को ये दिखाया है कि ९ हजार साल पहले, करीब ७ हजार ईसा पूर्व में लोग कैसेदिखते थे । एथेंस के वैज्ञानिको ने  हू-ब-हू वैसी तस्वीर तैयार कर दी है, जैसे ७ हमार बीसी के लोग दिखते थे । उन्होने ३-डी प्रिटिंग की मदद से १५-१८ साल की एक युवती की तस्वीर बनाई । युवती को नाम दिया - डॉन, मतलब नई सुबह । इसका कारण उन्होनें बताया कि - ७ हजार बीसी का समय भी मानव सभ्यता के इतिहास की नई सुबह जैसा था । वैज्ञानिकोंको १९९३ में ग्रीस की ट्रियोपेट्रा गुफा से ये कंकालमिला था । शोध में पता चला कि ये कंकाल ९ हजार साल पुराना है । इसके बाद यूनिवर्सिटी ऑफ एथेंस के वैज्ञानिकोंने इस कंकाल की मदद से उस जमाने के लोगों के लुक को रिवाइव करने का फैसला किया । कंकाल का सीटी-स्कैन किया गया । इस सीटी-स्कैन की ३-डी प्रिंटिंग तैयार की गई । इस ३-डी इमेज को अध्ययन करने पर पता चल गया के ये कंकाल १५-१८ साल की एक युवती का रहा होगा । हडि्डयोंऔर दांत के आकार की मदद से युवती की कद-काठी का भी अंदाला लग गया । फिर इस ३-डी इमेज एथेंस के एक्रोपोलिस म्यूजियम में रखी गई है । इस युवती का जबड़ा भारी, माथा चौड़ा और गुस्सैल चेहरा लग रहा है ।

दो तरह के इंर्धन से चलने वाले दुपहिया वाहन जल्द
मोटरसाइकिल बनाने वाली दो प्रमुख कंपनियोंके जल्द ही भारतीय बाजार मेंबिजली और दो तरह के इंर्धन से चलने वाली मोटरसाइकिले उतारने की उम्मीद है । इन वाहनों के इंजन को पेट्रोल या एथेनॉल दोनोंसे चलाया जा सकेगा । केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने पिछले दिनों यह जानकारी दी । श्री गडकरी देश में बिजली के वाहनों के साथ-साथ एथेनॉल जैसे वैकल्पिक इंर्धन से चलाए जाने में सक्षम वाहनों को प्रोत्साहन देने पर काम कर रहे है । इसके लिए उन्होने एथेनॉल के उत्पादन को बढ़ाने पर भी जोर दिया है, ताकि एथेनॉल आधारित परिवहन को बढ़ावा दिया जा सके ।
उन्होनें कहा कि इस माह के अंत तक दुपहिया वाहन बनाने वाली दो कंपनियोंने बिजली की मोटरसाइकिल और दो तरह के इंर्धन से चलने में सक्षम मोटर साइकिल बाजार में उतारने का वादा किया है ।   ***
विज्ञान, हमारे आसपास
सिलिकॉन की खोज की कहानी
डॉ. विजय कुमार उपाध्याय
सिलिकॉन एक प्रमुख रासायनिक तत्व है जिसका एसआई तथा परमाणु संख्या १४ है । यह एक कठोर, भंगुर, रवेदार अर्ध-धात्विक ठोस है जिसका रंग नीला-भूरा तथा चमक धात्विक है । इसकी संयोजकता ४ है और यह आवर्त सारणी के १४ वें समूह का सदस्य है ।
अब प्रश्न उठता है कि सिलिकॉन की खोज कब तथा किसके द्वारा की गई? वस्तुत: इस तत्व की खोज की दिशा मेंकई वैज्ञानिकों ने प्रयास किए तथा इसे खोजने में काफी लंबा समय लगा । सर्वप्रथम सन १७८७ में एंतोन लेवॉजिये के मन मे यह विचार आया कि सिलिका में एक रासायनिक तत्व मौजूद हो सकता है। 
सन् १८०८ में हम्फ्री डैवी  ने इस तत्व को इसके यौगिकों से पृथक करने का प्रयास किया परन्तु सफलता नही मिली । परंतु उन्होंने इस संभावित ततव का नाम फ्िलंट के लिए उपयोग में लाए जाने वाले लेटिन शब्द `सिलेक्स' के आधार पर सिलिकम रखा । सन् १८११ में गेलूसैक तथा थिनार्ड ने पौटेशियम तथा सिलिकॉन टेट्राफ्लोराइड के मिश्रण को तपाकर अशुद्ध तथा चूर्णरुपी सिलिकॉन प्राप्त् किया । परंतु वे दोनो शोधकर्र्ता न तो इसे शुद्ध कर सके और न इसे एक नए तत्व के रुप मेंपहचानने में सफल रहे ।
सन् १८१७ में स्कॉटिश रसायनविद थॉमस थॉमसन ने डैवी द्वारा प्रस्तावित नाम को आंशिक रुप से बदलकर इसका नाम सिलिकॉन रखा । थॉमसन की धारणा थी कि सम्भावित नया तत्व सिलिकॉन भी कार्बन और बोरॉन के समान ही एक अधातु होगा । सन् १८२३ मेंबर्जीलियस ने थिनार्ड की विधि को ही उपयोग में लाते हुए अशुद्ध तथा चूर्णरुपी सिलिकॉन तैयार किया । परंतु उन्होंने इसका कई बार शुद्धिकरण किया तथा अंत में भूरे रंग का एक चूर्ण प्राप्त् किया जो सिलिकॉन था ।
अत: सिलिकॉन तत्व की खोज का श्रेय बऱ्जीलियस को ही दिया जाता है । परंतु बऱ्जीलियस ने जो सिलिकॉल प्राप्त् किया था । पूर्णत: शुद्ध एवं रवेदार सिलिकॉन ३१ वर्ष बाद १८५४ में फ्रांसीसी रसायनज्ञ हेनरी डेविले द्वारा प्राप्त् किया गया था ।
बह्मांड मेंमात्रा के लिहाज़से सिलिकॉन आठवां सर्वाधिक पाया जाने वाला तत्व है । परंतु विशुद्ध तात्विक अवस्था में नहीं पाया जाता, बल्कि सिलिका या सिलिकेट खनिजों के रुप में पाया जाता है । भूपर्पटी का लगभग ९० प्रतिशत अंश सिलिकेट या सिलिका खनिजों से निर्मित है । भूपर्पटी में मात्रा के लिहाज़से २७.७ प्रतिशत अंश सिर्फ सिलिकॉन तत्वे से बना है । भूपर्पटी मेंमात्रा के हिसाब से ऑक्सीजन के बाद सिलिकॉन दूसरा सर्वाधिक पाया जाने वाला तत्व है । प्रकृति मेंसिलिकॉन तत्व के रवे मुक्त अवस्था मेंनही पाए जाते । परंतु इसमें एक अपवाद भी है । 
कमचटका प्रायद्वीप में मौजूद एक ज्वालामुखी से निकलने वाली गैसों में विशुद्ध सिलिकॉन तत्व के रवे पाए जाते है ।इन रवों का आकार ०.३ मिलीमीटर तक पाया गया है । सिलिकॉल अनेक उल्का पत्थरों का प्रमुख घटक है । इसी प्रकार टेक्टाइट में भी सिलिकॉन की उपस्थिति पाई गई है । टेक्टाइट की उत्पत्ति पृथ्वी पर ऐसे स्थानों पर होती है जहां कोई उल्का धरातल पर गिर कर अत्यंत उच्च् तापमान उत्पन्न करती है ।
भूवैज्ञानिकोंके अनुसार सौर मंडल के भीतरी ग्रहोंका निर्माण अत्यधिक उच्च् तापमान पर हुआ था जिसके कारण सिलिकॉन और ऑक्सीजन आसानी से एक दूसरे से जुड़ गए तथा सिलिका एवं विभिन्न प्रकासर के सिलिकेट खनिजोंका निर्माण हुआ । जब ऑक्सीजन और सिलिकॉन एक दूसरे से जुड़ने लगे तो कुछ अन्य सक्रिय तत्व भी इनसे जुड़ते गए, जिनमें प्रमुख थ एल्यूमिनियम, कैल्शियम, सोडियम, पौटेशियम तथा मैग्नेशियम । 
वाष्पशील गैसों तथा कार्बन एवं गंधक  के हाइड्रोजन के साथ प्रतिक्रिया कर संयुक्त होने के बाद भूपटल मेंसिलिकेट खनिजोंकी अधिकता रह गई । इनमें से अधिकांश सिलिकेट जटिल संरचना वाले थे । भू वैज्ञानिकों का अनुमान है कि सुपरनोवा से बिखरे कणों (जिनसे सौरमंडल का निर्माण एवं विकास हुआ) में ऑक्सीजन एवं सिलिकॉन कणों की संख्या बहुत अधिक थी । सिलिकेट खनिज प्राय: सौरमंडल के भीतरी ग्रहोंमें बहुत अधिक परिमाण में शामिल हो गए ।
उपरोक्त विभिन्न प्रकार के सिलिकेट खनिज लोहा, निकल तथा कुछ अन्य भारी धातुआें की अपेक्षा कम घनत्व वाले थे । यही कारण था कि लोहा, निकल तथा अन्य भारी तत्व पृथ्वी के केन्द्र की ओर चले गए जबकि हल्के सिलिकेट खनिजोंका लगभग पूरा भाग भूपर्पटी में आ गया । मैग्नेशियम तथा लोहे से युक्त मध्यम घनत्व वाले सिलिकेट पृथ्वी के मैटल मेंरह गए । भूपर्पटी में मौजूद प्रमुख खनिजों में शामिल है फेल्डस्पार, पाइरोक्जेन, एम्फीबोल, अभ्रक (माइका), क्वाटर्ज तथा ओलिविन इत्यादि । ये ही खनिज मृदा, ग्रैनाइट तथा अन्य प्रकार की चट्टानों में पाए जाते है ।
अब प्रश्न उठता है कि सिलिकॉन तत्व का उपयोग क्या है? आधुनिक काल में सिलिकॉन का उपयोग कई उद्योगो में किया जा रहा है । इनमें सर्वप्रमुख है इलेक्ट्रानिक उद्योग । पीज़ो इलेक्ट्रिक गुण के कारण सिलिकॉन का उपयोग इलेक्ट्रानिक उद्योग में व्यापक स्तर पर किया जा रहा है । विशुद्ध सिलिकॉन तत्व का उपयोग सेल फोन तथा कम्प्यूटर के निर्माण में किया जाता है । सिलिकोन नामक सिंथेटिक पोलीमर के निर्माण में भी सिलिकॉन महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है । इसके अलावा सिलिकॉन का उपयोग इस्पात शुद्धिकरण तथा अनेक प्रकार के रासायनिम उद्योगोंमें व्यापक स्तर पर किया जाता है अर्धचालक (सेमी कंडक्टर) उपकरणों में सिलिकॉन एक महत्वपूर्ण घटक के रुप में लाया जाता है । सिलिकॉन से बनाया गया सिलिकॉन कार्बाइड एक उत्तम प्रकार का अपघर्षक है ।
सिर्फ उद्योग ही नही जीव विज्ञान के क्षेत्र में सिलिकॉन की बहुत बड़ी भूमिका है । अध्ययनों से जानकारी मिली है कि विभिन्न प्रकार के समुद्री स्पॉन्ज तथा सूक्ष्मजीव (उदाहरण के रुप में डायटम तथा रेडयोलेरिया) के कठोर अंगों (कंकाल) के निर्माण मेंसिलिकॉन एक आवश्यक घटक है । कई वनस्पति ऊ तकों में भी सिलिकॉन की उपस्थिति दर्ज की गई है, जिनमे प्रमुख है क्राइसोवैलेंसिया की छाल तथा लकड़ी इत्यादि । इनके अलावा धान तथा कई प्रकार की घांसो की वृद्धि में भी सिलिकॉन जरुरी होता है ।
सिलिकॉन एक ओर जहां इतना उपयोगी है, वही दूसरी ओर इसका एक अत्यन्त हानिकारक पक्ष भी पाया गया है । सिलिकॉन मानव स्वास्थ पर बहुत ही बुरा प्रभाव डालता है । मानव शरीर में सिलिकॉन प्रवेश कई प्रकार से हो सकता है सांस द्वारा, त्वचा के स्पर्श से तथा आंखों के द्वारा । सांस के साथ सिलिकॉन के शरीर मेंपहुंचने पर सिलिकोसिस नामक रोग होता है । सिलिकोसिस से बचने हेतु प्रतिदिन ८ घण्टे के कार्यकाल के दौरान कार्यस्थल पर सिलिकॉन कणोंकी अधिकतम सीमा १५ मिलीग्राम प्रति घन मीटर होनी चाहिए ।  ***
खास खबर
वैज्ञानिक शोध पत्रों के लोकप्रिय जीन्स
(हमारे विशेष संवाददाता द्वारा)
संपूर्ण मानव जीवन में से मात्र १०० जीन्स ही एक चौथाई वैज्ञानिक शोध पत्रों और रिपोर्ट पर छाए हुए है ।
मानव शरीर कोशिकाआें से बना होता है । शरीर के ये छोटे-छोटे कारखाने ही अधिकांश कार्रवाई को अंजाम देते है । ये ऊ तकों का निर्माण करते है, ऊ तक अंगों का निर्माण करते है और इनसे पूरे शरीर का निर्माण होता है । इस प्रकार कोशिका कामकाज का अंतिम बिंदु है । कोशिकाएं जो कुछ करती है उसके निर्देश उनके मुख्यालय यानी नाभिक के अंदर स्थित होते है । ये निर्देश गुणसूत्रों में सहेजकर रखे होते है । 
प्रत्येक गुणसूत्र पर यह सूचना जीन्स के रुप में अंकित होती है जीन्स मे यह सूचना संचित होती है कि कोई कोशिका क्या करेगी, और कोशिकाआें से बने ऊ तक और अंग क्या करेंगे, और उन अंगों से बना शरीर क्या करेगा । जीन्स में उपस्थित सूचना में त्रुटियां ऊ तक, अंग या शरीर की गड़बड़ी के रुप में झलकती है ।
जीन्स में ये जानकारी डीएनए अणु के रुप में अंकित रहती है । प्रत्येक जीन चार अणुआें का लंबा अनुक्रम होता है । ये चार अणु क्षार कहलाते है । ये एक लंबी बहुलक श्रंखला में गूंथे होते है । अंग्रेजी वर्णमाला में २६ अक्षर और विराम होते है जबकि जीन्स वणमाला में चार क्षार होते है जिन्हे अ,ऋ,उ, और ढ कहते है । इन चारों क्षारों का क्रम ही आनुवांशिक शब्द और विराम चिन्ह बनाता है ।
मानव जीनोम सूचनाआें का संग्रह है जो गुणसूत्रों के रुप में संगठित जीन्स में पाई जाती है । गुणसूत्र स्वयं कोशिकाआें के नाभिक में बंद होते है । इस प्रकार हमारा जीनोम हमारी जिन्दगी की किताब होता है जिसमें गुणसूत्र अध्याय समान होते है जो जीन के रुप में लिखें गए वाक्यों से बनते है । ये वाक्य स्वयं चार अक्षरों की जेनेटिक वर्णमाला में कूट रुप में संग्रहित रहते है ।
जैसे ही कोशिका गुणसूत्रों में संग्रहित सूचना को पढ़ती है, वह अपना काम करने लगती है । इस कार्रवाई का महत्वपूर्ण हिस्सा जेनेटिक भाषा को वास्तविक क्रियाकारी अणुआें में तबदील या अनुवादित करने को होता है । कुल मिलाकर मामला यह है कि डीएनए रुपी सॉफ्टवेयर से कोड्स को पढ़ा जाता है और कोशिका (या शरीर) रुपी हार्डवेयर मेंकार्रवाई को अंजाम दिया जाता है ।
जीव विज्ञान के इतिहास का यह एक रोचक तथ्य है कि डीएनए की प्रकृति व रासायनिक संरचना और जेनेटिक कोड को समझने से पहले ही जीन्स के बारे मेंसमझना और उन्हें पहचानना शुरु हो गया था । सन् १८५६ और १८६३ के बीच ऑस्ट्रियन मठवासी ग्रेगर मेंडल ने मटर के पौधों पर प्रयोग करते हुए पैतृक गुणों या कारकों की पहचान की थी (अब हम इन्हें जीन्स कहते है ) । उन्होनें फूलोंमें रंग बनाने का काम करने वाले कारकों की पहचान की थी । यह बात भी पहचान ली गई थी कि हिमोफीलिया जैसे कुछ खानदानी रोग जीन्स मेंगड़बड़ी की वजह से होते है हालांकि इन्हें आणविक रुप में पढ़ना बहुत सालो बाद संभव हुआ ।
शरीर में प्रोटीन जीन्स में लिखे हुए संदेशो के आधार पर बनाए जाते है । हालांकि जीन्स के डीएनए के क्षार अनुक्रम को पढ़ना पिछले पचासेक वर्षो में ही संभव हुआ है, किंतु प्रोटीन्स में अमीनो अम्लों के क्रम को पढ़ना १९५० के दशक मेंप्रचलन में आ चुका था । वैज्ञानिकों ने बीमारियों से सम्बंधित प्रोटीन के गुणोंका अध्ययन करना शुरु कर दिया था । कभी कभी तो किसी प्रोटीन के अमीनो अम्ल अनुक्रम में एक छोटे से बदलाव से भी प्रोटीन के गुणोंमें परिवर्तन हो सकता है और स्वास्थ्य सम्बंधी समस्याएं सिर उठा सकती है । जैसा कि डॉ. लायनस पौलिंग और वर्नन इन्ग्राम ने ७० वर्षोंा पहले यह दिखा दिया था, हिमोग्लोबिन के अणु के अनुक्रम में अमीनो अम्ल `ग्लूटेमिक अम्ल' की जगह `वैलीन' जुड़ जाने पर इसके गुणधर्म मेंनाटकीय बदलाव आता है, जो एक किस्म के एनीमिया का कारण बन जाता है ।
प्रोटीन अनुक्रम मेंइस तरह की त्रुटियां अक्सर मूल जीन्स के अनुक्रम मेंत्रुटि की वजह से पैदा होती है । जीन्स में डीएनए अनुक्रम को पढ़ना समय हो जाने के बाद रोग के पीछे के जेनेटिक आधार को समझना संभव हो गया । इससे चिकित्सा आनुवंशिकी के क्षेत्र का जन्म हुआ । पिछले दो दशकोंमें जीन अनुक्रमण के काम में तेज़विकास के चलते चिकित्सा आनुवंशिकी भी खूब फली-फूली । कैंसर आनुवंशिकी सबसे गहमा गहमी का क्षेत्र है और कैंसर से सम्बंधित जीन्स का अध्ययन लोकप्रिय हो गया है । यही स्थिति अल्ज़ाइमर और अन्य तंत्रिका विकारों के मामले में भी है।
नेचर पत्रिका के २३ नवंबर के अंक में `ग्रेटेस्ट हिट्स ऑफ दी ह्युमन जीनोम' (मानव जीनोम के सफलतम हिस्से) की सूची प्रकाशित हुई है । इसमेंबताया गया है कि मानव जीनोम में मौजूद २० हज़ार या इससके कुछ अधिक प्रोटीन निर्माता जीन्स में से केवल १०० जीन्स एक चौथाई से अधिक वैज्ञानिक शोध पत्र और रिपोर्टस के विषय है । और इन १०० मेंसे भी मात्र १० जीन्स पर सबसे ज्यादा अध्ययन किए गए है, और ये सबसे उंची पायदान पर है ।
इन १० में से सबसे उपर पी-५३ नामक प्रोटीन का जीन है । इस प्रोटीन की भूमिका ट्यूमर्स के दमन में है । कोई आश्चर्य की नहीं कि इसका अध्ययन ८४७९ शोध पत्रों में किया गया है । पी-५३ के बाद टीएनएफ प्रोटीन का जीन है, जो ट्यूमर नेक्रोसिस कारक नामक अणु का कोड है । इस कारक की भूमिका ट्यूमर कोशिकाआें को मारने में है और इसके बारे में ५३१४ शोध पत्रों में चर्चा की गई है । इस सूची में पांचवी पायदान पर एपीओई नामक जीन है जिसका जिक्र ३९७७ पर्चोंा में किया गया है । यह प्रोटीन एपीओई का कोड है जो अल्जाईमर रोग के जोखिम से जुड़ा है । 
इनके अध्ययन के पीछे यह उम्मीद है कि यदि हम बीमारी का आणविक आधार समझ लें तो इलाज के बेहतर तरीकें तैयार कर सकेंगे जो आनुवंशिकी आधारित होगें । ये १०० सबसे लोकप्रिय जीन्स किसी फैशन परेड या गिनीज़ बुक में रिकॉर्ड के नही बल्कि चिकित्सा आनुवंशिकी के माध्यम से मानव पीड़ा को कम करने के प्रयासोंके प्रतिबिंब है ।   ***
जीव जगत
छिपकली से हम क्या सीख सकते है ?
डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन
हमारे देश में छिपकली के बारे में काफी भला बुरा कहा जाता है । कई समुदायों में छिपकली का मनुष्य के शरीर पर गिरना अपशकुन माना जाता है । कुछ लोग मानते हैं कि यदि यह हमारे सिर पर गिरती है तो इसका मतलब है कि मृत्यु निकट है और यदि पैर पर गिरती है तो माना जाता है कि यह बीमारी की चेतावनी है । दरअसल, घरों में रहने वाली छिपकली के शरीर पर गिरने के स्थानों और उनके प्रभावोंके अध्ययन को गौली शास्त्र नाम दिया जाता है ।
हालांकि इस तरह की भविष्य वाणियां साफ तौर पर गलत है  किंतु असली आश्चर्य तो यह है कि कैसे छिपकली दीवार पर और फिर छत पर चल लेती है । स्वस्थ छिपकली आसानी से नीचे नही गिरती । इसे छोटे-से जीव मेंे ऐसी क्या अद्भुत क्षमता होती है ? इस पहेली को सुलझाने में वैज्ञानिकों को आधी सदी का समय लगा ।
पहले विचार यह था कि जब छिपकली किसी सतह पर पैर रखती है तो पैर की उंगलियों और सतह के बीच एक अस्थायी निर्वात बनता है और निर्वातकी वजह से वह सतह पर चिपकी रहती है । लेकिन जब छिपकली के पैरों की बाह्य रचना का विश्लेषण किया गया तब यह धारणा गलत साबित हुई । पैरों की प्रत्येक उंगली पर कई हजारों छोटे स्पेचुला जैसे सिरों वाले विभाजित रोम पाए गए । यह पता चला कि इन रोमों और सतह के बीच की परस्पर क्रिया की वजह से ही छिपकली सतह पर चिपककर चल पाती है । यही उस जीव की असाधारण क्षमता का राज है ।
यह व्यवस्था काम कैसे करती है ? रोम और सतह के बीच बनने वाला यह बंधन अपने आप मेंबहुत ही कमज़ोर होता है । लेकिन जब इस तरह के हज़ारों रोम सतह पर जमते है तो इन छोटे-छोटे विद्युतीय प्रभावों का मिला जुला असर बढ़ा जाता है । इस प्रेरित विद्युत बल प्रेरित द्विध्रुवीय आघूर्ण या इंड्यूस्ड डाइपोल मोमेंट कहा जाता है । (इस बल का एक रोजमर्रा का उदाहरण है) कि जब बच्च फूले हुए गुब्बारे को रगड़कर कागज़ के छोटे-छोटे टुकड़ों के पास ले जाता है तो कागज़ के टुकड़े गुब्बारे से चिपक जाते है । इसका कारण यह है कि जब गुब्बारे को रगड़ा जाता है तो प्रेरित विद्युत क्षेत्र उत्पन्न होता है जिसकी वजह से कागज़के टुकड़े चिपक जाते है ।) इसी तरह का अस्थायी द्विधु्रवीय बल छिपकली के पैरोंको दीवार की सतह से चिपका देता है । और यह बल इतना दुर्बल होता है कि इससे पार पाना मुश्किल नहीं होता । इसलिए छिपकली के लिए अगला कदम उठाने में कोई परेशानी नहीं होती है और वह दीवारों और वह दीवारों और छतों पर ऐसे दौड़ती चली जाती है जैसे कोई फैशन मॉडल केटवॉक कर रही हो ।
यह बल दो पदार्थोके बीच ऐसे अत्यंत दुर्बल विद्युत `बंधन' के कारण होता है और यह बहुत ही कम दूरी पर काम करता है । इस बल को सबसे पहले डच वैज्ञानिक जोहानेस डाइडेरिक वॉन्डर वॉल्स ने पहचाना था और इसे वॉन्डर वॉल्स बल कहते है जब पैरों की गद्दी पर स्थित हज़ारों रोमों द्वारा एक साथ यह बल लगता है जो इसका प्रभाव काफी अधिक और जीवंत हो उठता है । इसी वॉन्डर वॉल्स बल के प्रभाव से छिपकली दीवार पर आसानी से चढ़ पाती है और छत पर टिकी रह पाती है । (अगर उसके पैरों के बालोंकी हजामत बना दी जाए तो वह दीवार और छत पर नहीं चढ़ पाएगी ।) यह भी एक उदाहरण है कि एकता और मिलजुल कर काम करने में कितनी ताकत होती है ।
छिपकली में एक अद्भुत शक्ति और होती है । छिपकली को पूंछ से पकड़ने की कोशिश करेंगे तो पूंछ आसानी से आपके हाथ में आ जाएगी और छिपकली तेज़ी से दूर भाग जाएगी । और कुछ ही दिनों के बाद वह अपनी खोई हुई पुंछ का पुननिर्माण कर लेगी । और इस तरक के पुनर्जनन करने वाले जीवोंमें छिपकली अकेलीनही है । इसके उभयचर रिश्तेदार सेलेमैण्डर और यहां तक कि मेंढक भी अपने क्षतिग्रस्त या लुप्त् हुए ऊ तकों और अंगों का पूनर्जनन कर लेते है । और तो और, सेलेमैण्डर तो अपनी पूंछ, रीढ़ की हड्डी, उपास्थि और आंख के कुछ हिस्सोंका भी पुनर्जनन कर लेते हैं । वे कैसे यह कर पाते हैंऔर हम मनुष्य क्यों नहीं कर पाते ? यह सवाल दुनिया भर के कुछ वैज्ञानिकों के दिमाग मेंकौंधता रहा है । 
ऐसा लगता है कि जब छिपकली या सेलेमैण्डर में कोई ऊ तक क्षतिग्रस्त हो जाता है तो कई कोशिकीय अणु उस क्षतिग्रस्त या लुप्त् हुए स्थान पर एकत्रित हो जाते हैं और सम्बंधित कोशिकाआें का पुनर्जनन करते हैं, इनमें से कुछ अणु प्रतिरक्षा से सम्बंधित होते है, कुछ कोशिका की वृद्धि को शुरु करवाते है और कुछ कोशिकाआेंका समन्वय करते है । इसकी विस्तृत रिपोर्ट कनेक्टिव टिशू रिसर्च के मार्च २०१७ के अंक मेंप्रकाशित हुई थी ।
चंदगशेखरन व साथियों द्वारा एक अन्य रिपोर्ट में बताया गया है कि कैसे सामान्य `कायिक' कोशिकाएं दो विशेष अणुआेंके असर से ऊ तक-पुनर्जनन स्टेम कोशिकाआें में तबदील हो जाती हैं । इससे और इस तरह के अन्य पर्चो से सीखकर इस तरह के प्रयास मानव ऊतकों और अंगों पर करना मुफीद हो सकता है ।
कुछ अन्य शोधकर्ताआेंने बताया है कि सेलेमैण्डर और मनुष्यों की आनुवंशिक सामग्री (जीनोम) में कई एक समान जीन है । और कुछ जीन्स थोड़े फेरबदल के साथ दोनों में एक जैसे है । इस आधार पर एक वैज्ञानिक का सवाल है कि क्या हम अपने अंदर छिपे सेलेमैण्डर को जगा सकते है । अर्थात क्या हम अपने जीनोम में उपस्थित सेलेमैण्डर जैसे जीन्स को सक्रिय करने का रास्ता खोजने का प्रयास कर सकते है ताकि हम भी आंख जैसे अंगों के क्षतिग्रस्त या लुप्त् हुए हिस्सों का पुनर्जनन कर सकें ।
इस तरह के प्रयास को एक `दु:साहसी लक्ष्य' की संज्ञा दी गई है । लेकिन यह सवाल उठने का मतलब ही है कि लोग इस लक्ष्य तक पहुंचने के लिए काम करेंगे, और हो सकता है देर सबेर इसमें सफलता भी हासिल हो जाए । न हि सुप्त्स्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगा: ।   ***
ज्ञान विज्ञान
वैज्ञानिकों ने पहली बार बनाया बंदरों का क्लोन
वैज्ञानिकों ने पहली बार बंदरों का क्लोन तैयार करने में सफलता हासिल कर ली है । इस सफलता को इंसानो का क्लोन तैयार करने की दिशा में बेहद अहम माना जा रहा है, क्योंकि बंदरो की शारीरिक संरचना इंसानों से काफी मिलती-जुलती है । इस वजह से ही क्लोनिंग के लिए बंदरों को चुना गया । प्रयोग सफल होने के बाद चीन के वैज्ञानिकों ने कहा है कि अब उन्हें भरोसा है के जल्द ही इंसानों का क्लोन भी तैयार किया जा सकेगा । इंसानों की क्लोनिंग की टेक्नोलॉजी मिलने पर अल्जाइमर, पार्किंसन जैसी बीमारियों का इलाज भी पहले से आसान हो सकेगा ।
क्लोनिंग के लिए वैज्ञानिकों ने डॉली-द शीप टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया और डीएनए की कार्बन कॉपी करके क्लोनिंग तैयार की । क्लोनिंग करने वाली श्ंाघाई की रिसर्च टीम को लीड करने वाली डॉक्टर मु मिंग पू ने बताया - `बंदरों की शारीरिक संरचना इंसानों से सबसे ज्यादा मिलती-जुलती है । अब चूंकि हमने बंदरों की क्लोनिंग कर ली है, तो जाहिर है हम इंसानों का क्लोन तैयार करने की दिशा में भी आगे बढ़ गए है । टेक्नोलॉजी के लिहाज से अब कोई बेरियर नहीं बचा ।' वैज्ञानिको ने झोंग झोंग नाम केे एक बंदर का क्लोन तैयार किया । इसका नाम हुआ हुआ रखा । हालांकि ब्रिटिश वैज्ञानिक इस डेवलेपमेंट से ज्यादा सहमत नहीं हैं । ह्यूमन जेनेटिक अलर्ट ग्रुप के डॉ. डेविड किंग कहते है - ` ह्यूमन क्लोनिंग ऐसी टेक्नोलॉजी है जिसका आसानी से गलत इस्तेमाल किया जा सकेगा ।' हालांकि क्लोनिंग तैयार करने वाले चीन के वैज्ञानिक ऐसा नहीं मानते । वो कहते है कि - क्लोनिंग टेक्नोलॉजी का सबसे बेहर इस्तेमाल मेडिकल फील्ड में किया जा सकेगा । दोनो बंदर अब फिट है । इन्हें अभी मेडिकल सुपरविजन में ही रखा जा रहा है ।
सबसे पहले १९९७ में किसी जिंदा स्पेसीज का क्लोन तैयार किया गया था । स्कॉटलैंड के वैज्ञानिकोंने एक भेड़ का क्लोन तैयार किया था । इसे ही डॉली नाम दिया गया था । तब से क्लोनिंग की ये तकनीक ही डॉली-द शीप के नाम से मशहूर हो गई ।

डीजल-बिजली के बजाय हाइड्रोजन से चलेगी ट्रेन
देश मेंआने वाले दिनों में ट्रेन डीजल या बिजली के बजाय हाइड्रोजन से चला करेंगी । चेन्नई स्थित इंटेग्रल कोच फैक्टरी (आईसीएफ) ने देश मेंपहली बार हाइड्रोजन गैस से चलने वाले इंजन का प्रोटोटाइप तैयार कर लिया है । गत दिसंबर में इसका ट्रायल भी सफल रहा । जर्मनी के बाद पहली बार भारत में यह प्रोटोटाइप तैयार किया गया है । आईसीएफ के वैज्ञानिकोंके अनुसार यह नये इंजर वाली ट्रेन २०२१ के अंत तक पटरी पर दौड़ सकती है । प्रोजेक्ट से जुड़े एक वैज्ञानिक ने बताया कि यह ट्रेन पूरी तरह प्रदूषण मुक्त होगी । इसमेंइंजन से धंुए की जगह सिर्फ भाप निकलेगी । आईसीएफ के वैज्ञानिकों के अनुसार शुरु मेंहाइड्रोजन ट्रेन महंगी पड़ेगी । प्रचलन में आने पर यह डीजल इंजन से १० गुना और बिजली वाले इंजन से पांच गुना सस्ती होगी । हाइड्रोजन इंजन में एक फ्यूल टैंक होगा । टैंक में पानी डाला जाता है । पानी से रासायनिक रिएक्शन कर हाइड्रोजन गैस बनती है । ऑक्सीजन की मदद से हाइड्रोजन को नियंत्रित कर बेहरत ढंग से जलाया जाता है । इससे गर्मी पैदा होती है । गर्मी से लिथियम बैटरी चार्ज होती है, जिससे ट्रेन चलती है । ट्रेन चलने के दौरान धुंए की जगह सिर्फ भाप निकलती है ।
आईसीपीएफ के वैज्ञानिकोंने बताया कि स्थानीय इंजीनियरिंग कॉलेज के कुछ छात्र भी प्रोजेक्ट में शामिल किए गए । ११ माह में ७ बार प्रोटोटाइप में बदलाव करने पड़े । हाइड्रोजन इंजन डीजल वाले की तुलना में ६०%  कम शोर करता है । इसकी रफ्तार और यात्रियों को ढोने की क्षमता डीजल इंजन के बराबर है ।
हम पारम्परिक भाप या डीजल इंजन के बजाय ट्रेन-१८ की तरह कोच मोटर इंजन प्रोटोटाइप बनाने पर काम कर रहे हैं। इसमें जगह बचने के साथ ट्रेन आगे पीछे ले जाने के लिए इंजन बदलने से छुटकारा मिलेगा । कोच के उपर या नीचे १०० किलो हाइड्रोजन गैस के लिए फ्यूल टैंक बनाया जाएगा । ताकि ३००-३५० यात्रियों को ट्रेन १४०-१५० किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से ७०० किलोमीटर जा सके ।
क्या कुत्ते कैंसर की गंध को सूंघ सकते है ?
यह तो जानी मानी बात है कि कुत्ते आपराधिक गुत्थी सुलझाने, आपदा के क्षेत्रोंमें बचाव दलों का मार्गदर्शन देने वगैरह में अच्छी भूमिका निभाते हैं । अब कहा जा रहा है कि कुत्तों को कैंसर सूंघने का प्रशिक्षण दिया जा सकता है । रोगग्रस्त कोशिकाआेंसे निकलने वाली गंध से कैसर का पता लगाने के लिए कुत्तों की संवेदनशील नाक का उपयोग कर अनगिनत लोगों का निदान करने में मदद मिल सकती है । लेकिन अभी इसमें कई समस्याएं है ।
१९८९ में दी लैंसेट में कुत्तेद्वारा सूंघकर कैंसर पता लगाने की रिपोर्ट के प्रकाशन के बाद ऐसी कई रिपोर्ट्स सामने आई और २००६ में एक डबल ब्लाइंड अध्ययन भी प्रकाशित हुआ । जल्द ही, अनगिनत अध्ययनों से पता चला कि प्रशिक्षित कुत्तें किसी व्यक्ति की सांस या पेशाब के नमूनों का सूंघकर कतिपय कैसर का पता लगा सकते है । कोशिकाएं, यहां तक कि कैंसर कोशिकाएं, वाष्पशील कार्बनीक यौगिकों (वीओसी) का उत्सर्जन करती हैं । इन यौगिकों की प्रकृतिके चलतेहर प्रकार के  कैंसर की एक अलग गंध होती है । 
कुत्तों की नाक में २२ करोड़ सेअधिक गंध संवेदना ग्राही होते है जिसकी वजह से ये रोग सूंघने के लिए सबसे उत्कृष्ट जानवर है ।
कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में ओटोलैरिंगोलॉजी के प्रोफेसर डॉ. हिलेरी ब्रॉडी ने इसका एक विकल्प सुझाया है । आप पहले कुत्तोंको संूघने के लिए यौगिकोंका एक मिश्रण दीजिए, फिर उसमें से एक-एक यौगिक को हटाते जाइए । कुछ घटक हटा दिए जाने के बाद जब कुत्ते नमूने पर जवाब देना बंद कर दें तब यह निष्कर्ष निकला जा सकता है कि हटाए गए यौगिक कैंसर से सम्बंधित हैं । इसके बाद शोधकर्ता इन अलग-अलग घटकों का विश्लेषण कर सकेगें ।
अधिकांश कुत्तोंको विशेष कैंसर की गंध को पहचानने के लिए लगभग ६ महीनोंमें प्रशिक्षित किया जा सकता है । किंतुऐसे अध्ययन वास्तविक परिस्थिति में नहीं बल्कि प्रयोगशाला में किए गए है जहां कुत्तों को पांच नमूने दिए जाते है जिसमें एक कैंसरयुक्त नमूना होता है । मगर वास्तव में एक कुत्तेको १००० नमूने सुंघाए जाने पर शायद एक ही कैंसर वाला नमूना निकले । शायद इसी वजह से वजह से वास्तविक परिस्थिति में किया गया अध्ययन असफल रहा था । 
अगर कुत्तों को ध्यान में रखते हुए सेटअप बदला भी जाए तब भी यह मरीज़ोंको स्क्रीन करने के लिए एक यथार्थवादी तरीका नहींहोगा । एक तो इसके लिए विभिन्न प्रकार के कैंसर पहचानने के लिए कुत्तोंका प्रशिक्षण करना होगा । और कुत्तोंके स्वभाव में परिवर्तन के दैनिक चक्र को भी ध्यान मेंरखना होगा । और परिणाम अलग अलग कुत्तोंके लिए अलग-अलग भी हो सकते है ।
इसकी बजाय, ब्रॉडी और हैकनर का ख्याल है कि कुत्ते एक जैव रासायनिक नाक मशीन (ई-नाक) विकसित करने मेंमददगार हो सकते है । ऐसी मशीनें कुछ चिकित्सकीय स्थितियों के लिए उपलब्ध भी हैं । कुत्तों की मदद से इन्हें और अधिक संवेदनशील बनाया जा सकता है ।
ब्रह्मांडीय जीपीएस
आजकल स्कूली बसोंके संदर्भ मेंजीपीएस काफी चर्चा में है । जीपीएस यानी ग्लोबल पोज़ीशनिंग सिस्टम एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें पृथ्वी और पृथ्वी के बाहर की किसी भी जगह की स्थिति का निर्धारण उपग्रहों की मदद से किया जाता है । कम से कम तीन उपग्रहों से प्राप्त् सूचनाआें का मिला-जुला उपयोग करके यहा बताया जा सकता है कि कोई बिंदु कहां है । अब वैज्ञानिकों ने एक ऐसी ब्रह्मांडीय जीपीएस प्रणाली के विचार पर काम करना शुरु किया है जो उपग्रहों की मदद के बगैर, अंतरिक्ष में कहीं भी स्थिति का निर्धारण कर सके । इसमें पल्सर का उपयोग किया जाएगा । शुरुआती प्रयोगों ने इस प्रणाली की व्यवहारिकता दर्शाई है ।
पल्सर मृत हो चुके तारोंके अवशेष होते है जो लगातार घूर्णन करते रहते है और समय के एक िशिचनत अंतराल पर रेडियो तरंगेंछोड़ते रहते है । पिछले वर्ष नवंबर में नासा ने अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर पल्सर आधारित जीपीएस की संभावना को टटोला था । न्यूट्रॉन स्टार इंटीरियर कंपोजीशन एक्सप्लोरर (नाइसर)वास्तव मेंमृत तारों के पदार्थ का अध्ययन करने के लिए शुरु किया गया है । नाइसर ने एक प्रयोग में पल्सर से आने वाले विकिरण के समय मेंहोने वाले अत्यंत अल्प अंतर के आधार पर स्वयं अपनी स्थिति निर्धारित करने का प्रयास किया । स्थिति के निर्धारण मेंमात्र ५ किलोमीटर की त्रुटि हुई ।
इससे पहले चीन ने पल्सर आधारित मार्ग संचालन के परीक्षण हेतु एक उपग्रह छोड़ा था । इसने ६५०० प्रकाश वर्ष दूर स्थित पल्सर से निकलने वाले एक्सरे संकेतों का विश्लेषण करके स्थिति निर्धारण का प्रयास किया था ।      ***
जन जीवन
अनियोजित शहरीकरण और बड़े शहर
पंकज चतुर्वेदी
भारत की कुल आबादी का ८.५० प्रतिशत हिस्सा देश के २६ महानगरोंमें रह रहा है । अनुमान है कि आने वाले २०-२५ सालों में १० लाख से अधिक आबादी वाले शहरों की संख्या ६० से अधिक हो जाएगी जिनका देश के सकल घरेलू उत्पाद में योगदान ७० प्रतिशत होगा । 
संयुक्त राष्ट्र संघ का मानना है कि वर्ष २०५० तक भारत की ६० फीसदी आबादी शहरों में रहने लगेगी । वैसे भी २०११ की जनगणना के मुताबिक कुल ३ फीसदी आबादी अभी शहर मेंनिवास कर रही है । साल दर साल बढ़ती गर्मी गांव-गांव तक फैल रहा जल-संकट का साया, बीमारियों के कारण पट रहे अस्पताल, ऐसे कई मसले है जो आम लोगों को पर्यावरण के प्रति जागरुक बना रहे हैं । कहीं कोई नदी, तालाब के संरक्षण की बातर कर रहा है तो कही कोई पेड़ लगा कर धरती को बचाने का संकल्प कर रहा है तो वहीं जंगल व वहां के बाशिंदे जानवारोंको बचाने के लिए प्रयास कर रहे है, लेकिन भारत जैसे विकासशील देश में पर्यावरण का सबसे बड़ा संकट शहरीकरण एक समग्र विषय के तौर लगभग उपेक्षित है ।
असल में, संकट जंगल का हो या फिर स्वच्छ वायु का या फिर पानी का । सभी के मूल मेंविकास की वह अवधारणा है जिससे शहर रुपी सुरसा सतत विस्तार कर रही है और उसकी चपेट में आ रही है प्रकृतिऔर नैसर्गिकता । अपने देश में संस्कृति, मानवता और बसाहट का विकास नदियों के किनारे ही हुआ है । सदियों से नदियों की अविरल धारा और उसके तट पर मानव-जीवन फलता-फूलता रहा है । बीते कुछ दशकोंमें विकास की ऐसी धारा बही कि नदी की धारा आबादी के बीच आ गई और आबादी की धारा को जहां जगह मिली वह बस गई । 
यही कारण है कि हर साल कस्बे नगर बन रहे है और नगर महानगर । बेहतर रोजगार, आधुनिक जन सुविधाएं और उज्जवल भविष्य की लालसा में अपने पुश्तैनी घर-बार छोड़कर शहर की ओर पलायन करने की प्रवृत्ति का नतीजा है कि देश में एक लाख से अधिक आबादी वाले शहरों की संख्या ३०२ हो गई है, जबकि १९७१ में ऐसे शहर मात्र १५१ थे । यही हाल दस लाख से अधिक आबादी वाले शहरों का है । इसकी संख्या गत दो दशकों में दुगुनी होकर १६ हो गई है । पांच से १० लाख आबादी वाले शहर १९७१ में मात्र ९ थे जो आज बढ़कर आधा सैकड़ा हो गए है ।
विश्व बैंक की ताजा रिपोर्ट बताती है कि आने वाले २०-२५ सालों में १० लाख से अधिक आबादी वाले शहरों की संख्या ६० से अधिक हो जाएगी जिनका देश के सकल घरेलू उत्पाद मेंयोगदान ७० प्रतिशत होगा । एक बात और बेहद चौंकाने वाली है कि भारत के ग्रामीण क्षेत्रोंमें गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों की संख्या शहरों में रहने वाले गरीबों के बराबर ही है । यह संख्या धीरे-धीरे बढ़ रही है , यानी यह डर गलत नहीं होगा कि कही भारत आने वाली सदी में `अरबन स्लम' या शहरी मलिन बस्तियों में तब्दील न हो जाए । शहर के लिए सड़क चाहिए, बिजली चाहिए, मकान चाहिए, दफ्तर चाहिए । इन सबके लिए या तो खेत होम हो रहे है या फिर जंगल । जंगल को हजम करने की चाल में पेड़, जंगली जानवर, पारंपरिक जल स्त्रोत, सभी कुछ नष्ट हो रहा है । यह वह नुकसान है, जिसका हर्जाना संभव नहींहै । शहरीकरण यानी रफ्तार, रफ्तार का मतलब है वाहन और वाहन है कि विदेशी मुद्रा भंडार से खरीदे गए इंर्धन को पी रहे है और बदले में दे रहे है दूषित वायु । शहर को ज्यादा बिजली चाहिए, यानि ज्यादा कोयला जलेगा, ज्यादा परमाणु सयंत्र लगेंगे । 
दिल्ली कोलकाता, पटना जैसे महानगरों में जल निकासी की माकूल व्यवस्था न होना शहर में जल भराव का स्थाई कारण कहा जाता है । मुंबई में मीठी नदी के उथले होने और ५० साल पुरानी सीवर व्यवस्था के जर्जर होने के कारण बाढ़ के हालात बनना सरकारेंस्वीकार करती रही है । बेंगलुरु में पारंपरिक तालाबों के मूल स्वरुप में अवांछित छेड़छाड़ को बाढ़ का कारक माना जाता है । शहरों में बाढ़ रोकने के लिए सबसे पहला काम तो वहां के पारंपरिक जल स्त्रोतों में पानी की आवक और निकासी के पुराने रास्तोंमें बन गए स्थाई निर्माणों को हटाने का करना होगा । यदि किसी पहाड़ी से पानी नीचे बहकर आ रहा है तो उसका संकलन किसी तालाब में ही होगा । ऐसे जोहड़-तालाब कांक्रीट की नदियों में खो गए है । परिणामत: थोड़ी ही बारिश में पानी कहीं बहने को बहकने लगता है । महानगरों में भूमिगत सीवर जल भराव का सबसे बड़ा कारण है । जब हम भूमिगत सीवर के लायक संस्कार नहीं सीख पा रहे है तो फिर खुले नालों से अपना काम क्यों नही चला पा रहे हैं ?
पोलीथीन, घर से निकलने वाले रसायन और नष्ट न होने वाले कचरे की बढ़ती मात्रा, कुछ ऐसे कारण है, जो कि गहरे सीवरों के दुश्मन है । शहर का मतलब है औद्योगिकीकरण और अनियोजित कारखानोंकी स्थापना का ही दुखद परिणाम है कि तकरीबन सभी नदियां अब जहरीली हो चुकी है । नदी थी खेती के लिए, मछली के लिए, दैनिक कार्योके लिए न कि उसमेंगंदगी बहाने के लिए । गांवो के कस्बे, कस्बोंके शहर और शहरों के महानगर में बदलने की होड़, एक ऐसी मृग मरिचिका की लिप्सा में लगी है, जिसकी असलियत कुछ देर से खुलती है । दूर से जो जगह रोजगार, सफाई, सुरक्षा, बिजली, सड़क के सुख के केंद्र होते है, असल में वहां सांस लेना भी गुनाह लगता है ।
शहरों की घनी आबादी संक्रामक रोगों के प्रसार का आसान जरिया होते है, यहां दूषित पानी या हवा भीतर ही भीतर इंसान को खाती रहती है और यहां बीमारों की संख्या ज्यादा होती है । देश के सभी बड़े शहर इन दिनों कूड़े को निबटाने की समस्या से जूझ रहे है ं । कूड़े को एकत्र करना और फिर उसका शमन करना, एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है । एक बार फिर शहरीकरण से उपज रहे कचरे की मार पर्यावरण पर ही पड़ रही है ।
असल में शहरीकरण के कारण पर्यावरण को हो रहे नुकसान का मूल कारण अनियोजित शहरीकरण है । बीत दो दशकोंके दौरान यह परिपाटी पूरे देश में बढ़ी कि लोगों ने जिला मुख्यालय या कस्बों की सीमा से सटे खेतों पर अवैध कालोनियां काट लीं । इसके बाद जहां कहीं सड़क बनी, उसके आसपास के खेत, जंगल, तालाब को वैध या अवैध तरीके से कांक्रीट के जंगल मेंबदल दिया गया । देश के अधिकांश शहर अब सड़को के दोनोंओर बेहतरीन बढ़ते जा रहे हैं । न तो वहां सर्वाजनिक परिवहन है, न ही सुरक्षा, न ही बिजली-पानी की न्यूनतम आपूर्ति ।   ***
लोक परिवहन
अब निशाने पर पद-पथिक और साइकिलिस्ट
राजेंद्र रवि
आज दुनिया के विकसित मुल्क साईकिल हाईवे बना रहे हैं और पद-पथिकों के सरल और सुगम सफर के लिए मोटर वाहनों पर बंदिश लगा रहे हैं, ताकि जलवायु परिवर्तन के खतरे को कमजोर किया जा सके । ऐसी हालात मेंपद-पथिकों, साइकिलिस्टों और साइकिल रिक्शा पर पाबंदी लगाना कितना जायज है ? देश के लोगों के जीवन स्तर में सुधार की जरुरत है, न कि जीडीपी के बढ़ते ग्राफ की । 
भारत सरकार के परिवहन, पर्यटन और संस्कृति से जुड़ी `पार्लियामेंटरी स्टैडिंग कमेटी' ने केन्द्रीय मोटर गाड़ी कानून में संशोधन बिल २०१६ पर सुझाव देते हुएकहा है, `गैर मोटर वाहनों यानि पद पथिको, साइकिलिस्टों और साइकिल रिक्शों को देश के सभी राष्ट्रीय राजमार्गो और सभी बड़े शहरों के मुख्य मार्गोपर चलने से प्रतिबंधित करना होगा, क्योंकि पद-पथिक सड़क पर चलने वाले वाहनों में सबसे ज्यादा दुर्घटना के शिकार होते है और ये किसी भी तरह के इंश्योरेंस के दायरे मेंनहीं आते है ।
समिति यह भी मानती है कि ये लोग सड़क के किसी भी कानून को नहीं मानते है तथा सड़कों पर बहुत ज्यादा उत्पात मचाते है । ये लोग सड़क पर चल रहे दूसरे वाहनों के लिए भी खतरा पैदा करते है । इसलिए यह समिति सिफारिश करती है कि निर्बाध सड़क-यात्रा के लिए 
जरुरी है कि पद-पथिकोंसाइकिलिस्टों और साइकिल रिक्शों को नियंत्रित किया जाए तथा इसके लिए दंड और सजा तय किए जाए । '
इस समिति की अध्यक्षता मुकुल रॉय ने की थी । समिति में कुल ३१ सदस्यों में राज्यसभा के १० और लोकसभा के २१ सदस्य थे । ९ अगस्त २०१६ को यह बिल लोकसभा मेंरखा गया, जिसे लोकसभा के अध्यक्ष ने राज्यसभा के सभापति से विचार विमर्श के बाद `पार्लियामेंटरी स्टैडिंग कमेटी'के पास राय-विचार के लिए भेज दिया । इस समिति को दो माह के अन्दर सभी पक्षोंके साथ विचार-विमर्श करके अपनी रिपोर्ट देनी थी, लेकिन इस समिति की अवधि दो बार बढ़ाई गई और जिसके बाद इस समिति ने १६ फरवरी २०१७ को अपनी रिपोर्ट संसद को सौंप दी । १९८८ में बने मोटर गाड़ी कानून मुख्यत: देश भर के मोटर वाहनों की गतिविधियों से जुड़े विषयों को संचालित करती है जिसमें अभी तक वर्ष१९९४, २०००, २००१ और २०१५ में संशोधन हो चुके है ।
लेकिन तत्कालीन केंद्रीय परिवहन और राष्ट्रीय राज मार्ग मंत्रालय का मानना है कि पूर्व मेें किए गए संशोधन आज की जरुरतों को पूरा नहीं करते है, इसलिए इस कानून में व्यापक बदलाव की आवश्यकता है । उनका कहना है कि २०१५ के दौरान सड़क दुर्घनाआें में एक लाख छियालीस हजार लोग मारे गए और तीन लाख से अधिक लोग घायल हुए । इसलिए कानून में संशोधन अनिवार्य है ताकि सड़क सुरक्षा, के सवाल को भी इस कानून के दायरे में और ट्रैफिक उल्लंघन को जुर्म के दायरे में लाया जा सके ।अभी की सड़कें २००-२५० किलोमीटर प्रति घंटे के लिए उपयुक्त नहीं हैं । इस बिल से यह लक्ष्य पाया जा सकेगा।
चूंकि यह मंत्रालय मोटर वाहनों से जुड़े कानूनऔर गतिविधियों को ही देखता रहा है और प्रदूषण रहित गैर-मोटर परिवहन के साधन इसके दायरे मेंनही रहे हैं इसलिए देश भर में इस मुद्दे पर काम कर रहे संगठन, समूह और व्यक्ति इस कानून के संशोधन के बारे में सचेत भी नहीं थे और न ही `पार्लियामेंटरी स्टैडिंग कमेटी' की प्रक्रियामें सक्रियता दिखाई । परन्तु जब इस समिति की सिफारिशें उजागर हुई, तब लोग चौंक गए और अपना विरोध तथा आपत्तियां दर्ज करना शुरु किया ।
सस्टेनेबल अर्बल मोबिलिटी नेटवर्क इंडिया (समनेट) ने केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी को एक कड़ा पत्र लिखते हुए कहा है कि `पार्लियामेंटरी स्टैडिंग कमेटी' ने पद-पाथिकों, साइकिलिस्टों और साइकिल रिक्शों का उल्लेख करते हुए जिन शब्दों का प्रयोग किया है वह न केवलनिंदनीय है बल्कि जन विरोधी, गरीब विरोधी और भेदभाव बढ़ाने वाला है । यह भारत सरकार के घोषित नीतियों और कार्यक्रमोंके भी विपरीत है । इसका कोई वैज्ञानिक आधार भी नही है कि मोटर गाड़ी संशोधन विधेयक २०१७ में समिति द्वारा सुझाए गए उपरोक्त पैराग्राफ को शामिल करने से सड़क सुरक्षा को बल मिलेगा ।
इनका कहना है कि राष्ट्रीय शहरी परिवहन नीति २००६ के पैरा अड़तीस में जोर देते हुए साफ तौर पर कहा है कि प्रदूषण को कम करने के और समाज की एक बड़ी आबादी द्वारा गैर-मोटर परिवहन का उपयोग किए जाने की हालत में सरकार न सिर्फ इसके लिए अलग लेन बनाएगी, बल्कि सार्वजनिक परिवहन के लिए कॉरिडोर का निर्माण भी करेगी । इसी तरह स्मार्ट सिटी मिशन स्टेटमेंट और गाइडलाइन्स २०१५ में भी गैर-मोटर परिवहनों को बढ़ावा देने का विशेष उल्लेख किया गया है । 
केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय का एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम अमृत के गाइड लाइन मेंभी पद-पथिकों, साइकिलिस्टों और साइकिल रिक्शों को बढ़ावा देने का स्पष्ट उल्ललेख किया गया है । समनेट का मानना है कि जहां तक पद-पथिकों, साइकिलिस्टों और साइकिल रिक्शों को सुरक्षा देने का सवाल है, इसके लिए आवश्यक है कि इनके लिए अलग लेन, आबादी वाले इलाकों में मोटर वाहनों की गति पर नियंत्रण, मोटर गाड़ी मुक्त एरिया का निर्माण, मोटर वाहनों द्वारा ट्रेफिक उल्लंघन के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जरुरत है । मोटर वाहनों के लिए मुफ्त पार्किंग और पद-पथिकों, साइकिलिस्टों और साइकिल रिक्शों की लेन में जबरन पार्किंग सड़क दुर्घटना को बढ़ावा देने का एक मुख्य कारक है ।
सार्वजनिक परिवहन में पद पथिकों, साइकिलिस्टों और साइकिल रिक्शों का प्रथम और अंतिम यात्रा के रुप में महत्वपूर्ण और अनिवार्य भूमिका है । इसे ज्यादा से ज्यादा बढ़ावा देकर ही कार्बल के न्यूनतम लक्ष्य को पाया जा सकता है । इसलिए इन्हें प्रतिबंधित करने की सोच पीछे ले जाने वाली सोच है । सरकार पद-पथिकों, साइकिलिस्टों और साइकिल रिक्शों के लिए अलग से कानून बनाए, यही वक्त की जरुरत है और प्रगति के लिए अनिवार्य है ।
इस मुद्दे में आईआईटी दिल्ली की शहरी परिवहन योजनाकार गीतम तिवारी का कहना है कि जब विकसित मुल्क सड़क जाम, सड़क दुर्घटना और जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से मुकाबला करने तथा समाधान के रुप में पदपथिकों, साइकिलिस्टों और साइकिल रिक्शों को अपना रही है और इनके पक्ष्र में नियम कानून भी बना रहे है, ऐसे समय में भारत में जनता के चुने हुए प्रतिनिधियोंकी  ` पार्लियामेंटरी स्टैडिंग कमटी ' द्वारा प्रतिबंध की सिफारिश काफी चिंताजनक बात है । 
शहरी परिवहन विशेषज्ञ अन्विता अरोड़ा का कहना है कि लोकतंत्र में जनता सर्वोपरि होती है और उनके चुने हुए जन प्रतिनिधि जब कोई कानून बनाते है तब उन्हें इस बात का हमेशा ख्याल रखना चाहिए कि बनने वाले कानून से देश की जनता, प्राकृतिक संसाधन और समाज की तरक्की पर इसका क्या असर होने वाला है । २०१७ मोटर गाड़ी कानून संशोधन बिल का असर काफी व्यानक होने वाला है । इसकी सत्यता की परख सरकार के पास उपलब्ध आंकड़े से ही हो जाती है अगर २०११ की जनगणना पर नज़र डाले और देंखे कि देश की जनता के पास कौन-कौन से परिवहन के साधल है और वे किन साधनोंसे सफर करते है तो साफ पता लग जाएगा कि इस कानून का प्रभाव जनता कैसे झेल पाएगी । 
२०११ की जनगणनानुसार भारत में सिर्फ ढाई प्रतिशत लोगों के पास मोटर वाहन, साढ़े ग्यारह प्रतिशत के पास दोपहिया मोटर साइकिल और तैंतालिस प्रतिशत के पास साइकिलेंहैं । इस आंकड़े में यह भी दर्ज है कि ४७ प्रतिशत व्यक्ति में से कोई भी वाहन नहीं रखते है । इसका मतलब है ४७ प्रतिशत आबादी पद पथक है और आने-जाने के लिए किसी न किसी प्रकार के सार्वजनिक परिवहन पर निर्भर है ।
राष्ट्रीय राज्य मार्ग और शहरों में सड़को का जाल किसके पैसे से बनतो है ? क्या यह सत्य नहीं है कि देश के आम आदमी के  टैक्स के पैसे से ही सब एक्सप्रेस-वे और शहरोंके  ढांचागत निर्माण होते हैं। तो फिर उस पर सब के चलने पर प्रतिबंध की सिफारिश किस वजह से की गई है, क्योंकि मोटर वाहनों के आंकड़े में दोपहिया को भी शामिल कर दें तो १५ प्रतिशत से कम ही लोग इसका इस्तेमाल करते हैं । फिर २५ प्रतिशत पर बंदिश का क्या तर्क है? अगर इसका आधार यह है कि ८५ प्रतिशत को इन सड़को पर चलने से इसलिए रोका और दण्डित किया जाएगा क्योंकि ये सड़कें इनके लिए असुरक्षित है । तो फिर हमारे विज्ञान और तकनिक किस दिन और किस काम के लिए है, जिनके इस्तेमाल से देश के ८५ प्रतिशत की आबादी को सुरक्षित सफर का रास्ता भी नहींबनाया जा सकता ?
दूसरा तथ्य यह भी है कि इन सड़को के लिए किनकी जमीन ली गई है? क्या यह जमीन उन गांववासियोंसे नहीं ली गई है जिन्हें चलने से रोकने के लिए कानून बनाया जा रहा हैं ? वे गांववासी घर से खेत और खेत से घर कैसेआएंगे-जाएंगे ? इनके पशुआेंऔर कृषि उपकरणों का आना जाना कैसे होगा । यह एक अहम सवाल है और हमारे लोकतंत्र और अधिकारोंसे जुड़ा हुआ है । क्या पार्लियामेंटरी स्टैडिंग कमेटी ने इस पर विचार किया है या इनकी सुरक्षा के नाम पर धोखाधड़ी हो रही है ।       ***
कविता
पर्यावरण की रक्षा के लिए
डॉ. लक्ष्मीकांत दाधीच
कहना यही है,
क्या सोचा
आपने
पर्यावरण की रक्षा के लिए
स्वयं के जीवन के लिए
प्रदूषण से मुक्ति के लिए
सुंदर वनोंव झरनों के लिए
ऊं चे पर्वतों व निर्मल जल के लिए
शुद्ध संतुलित पर्यावरण के लिए
पर्यावरण बोध जागृति के लिए
कचरे से मुक्ति के लिए
गर्माती धरती के लिए
पानी के धोरोंके लिए
शानदार जीवन के लिए
परोपकारी समाज सेवा के लिए
जीवन की उन्नति के लिए
शांति के लिए और
स्वस्थ जीवन के लिए
क्या कहा
कुछ नहींसोचा
मर्जी आपकी । ***
पर्यावरण समाचार
देश में ४ करोड़ ७० लाख बच्चे वायु प्रदूषण से प्रभावित
पिछले दिनों नई दिल्ली में ग्रीनपीस इंडिया ने अपनी वार्षिक रिपोर्ट `एयरपोक्लिपस' का दूसरा संस्करण जारी किया । इस रिपोर्ट में २८० शहरों के एक साल में पीएम १० के औसत स्तर पर विश्लेषण किया गया है । इन शहरों में देश की ६३ करोड़ (करीब ५३ फीसदी जनसंख्या) आबादी रहती है । शेष ४७ प्रतिशत (५८ करोड़) आबादी ऐसे क्षेत्र में रहती है जहां की वायु गुणवत्ता के आंकड़े उपलब्ध ही नहीं है । इन ६३ करोड़ में से ५५ करोड़ लोग ऐसे क्षेत्र में रहते है जहां पीएम१० का स्तर राष्ट्रीय मानक से कहीं अधिक है ।
वहीं देशभर में पांच साल से कम उम्र के ४ करोड़ ७० लाख बच्चे ऐसे क्षेत्र में रहते हैं जहां सीपीसीबी द्वारा तय मानक से पीएम१० का स्तर अधिक है । इनमें से १ करोड़ ७० लाख बच्चें मानक से दोगुने पीएम१० स्तर वाले क्षेत्र में निवास करते है । वायु प्रदूषण से सबसे ज्यादा प्रदूषित शहर गंगा के मैदानी इलाके मेंहै ।
रिपोर्ट के अनुसार देश का एक भी शहर विश्व स्वास्थ संगठन के वायु गुणवत्ता मानक (२० माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर औसत) को पूरा नहींकरते । वही ८० शहर सीपीसीबी के राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता मानक (६० एमजी प्रति घनमीटर औसत) को भी पूरा नहीं करते ।
ग्रीनपीस के सीनियर कैपेनर सुनील दहिया कहते है कि भारत मेंकुल जनसंख्या के सिर्फ १६ प्रतिशत लोगों को वायु गुणवत्ता का रियल टाइम आंकड़ा उपलब्ध है । यहां तक कि जिन ३०० शहरों में वायु गुणवत्ता के आंकड़े मैन्यूअल रुप से एकत्र किये जाते है । का मानकों पर खरा उतरना यह दर्शाता है कि ठोस कार्ययोजना का अभाव है ।
सबसे ज्यादा बच्चे उत्तरप्रदेश, राजस्थान, बिहार, महाराष्ट्र और दिल्ली में वायु प्रदूषण से प्रभावित है । इन राज्यों में लगभग १ करोड़ २९ लाख बच्चे रह रहे है जो पांच साल से कम उम्र के है और प्रदूषित हवा की चपेट में है । 
दिल्ली वायु प्रदूषण से सबसे अधिक प्रभावित शहर बना हुआ है, जहां का औसम पीएम१० स्तर राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता मानको से पांच गुना अधिक है । औसम पीएम१० स्तर दिल्ली में २९० माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर तो वहीं फरीदाबाद, भिवाड़ी, पटना क्रमश: २७२, २६२ और २६१ माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर है । सारे देश की स्थिति का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है । ***

मंगलवार, 16 जनवरी 2018


प्रसंगवश
बाघों की गणना में उपयोगी तकनीकें
भारत विश्व के उन १३ देशोंमें शामिल है जहां बाघ पाएं जाते है । भारत में बाघों की सख्या विश्व के किसी भी देश से अधिक है । बाघ हमारा राष्ट्रीय पशु है जिस अग्रेंजी में टाईगर और संस्कृत में व्याघ्र कहतें है ।
बाघ वन्य आहार श्रंृखला की महत्वपूर्ण कड़ी होने के साथ ही परिस्थितिकीय तंत्र के स्वास्थ्य का भी प्रतीक है । बाघो की उपस्थिति किसी भी जंगल के संरक्षण की निशानी होती है । बाघ वैज्ञानिक , आर्थिक, सौंदर्य और सांस्कृतिक दृष्टि से महत्व का जीव है । इसलिए इसका संरक्षण आवश्यक है ।
संरक्षण की दृष्टि से बाघों की सही संख्या का पता होना अति आवश्यक है । इसलिए हमारे देश में समय-समय पर बाघों को गिना जाता है । इंसानों की जनगणना की बात करें तो उसमें घर-घर जाकर आंकड़े जुटाए जाते है । लेकिन जंगली जानवरों की गणना के लिए उनके पास जाने का जोखिम नही उठाया जाता । इसके लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी का सहारा लिया जाता है ।
बाघों की गणना करने की कई विधियां है । इनमें से एक विधि है केमरा ट्रैप सर्वेक्षण विधि । इस विधि में जंगल में बाघों द्वारा उपयोग कि ये जा रहे रास्तों पर सेकड़ों संवेदनशील केमरेंलगा दिये जाते है । जब कोई बाघ केमरें की रेंज में आता है तो सेंसर आधारित ये केमरेंउसकी तस्वीरें खींच लेते है । हालांकि कभी-कभार ऐसा भी होता है कि किसी क्षैत्र में बाघ का फोटो खींचे जाने के बाद वह अन्य क्षेत्र में चला जाता है और वहां भी उसकी तस्वीर खींच ली जाती है । ऐसे में दोहराव की संभावना रहती है । इससे बचने के लिए बाघ की धारियों के पेटर्न की सहायता ली जाती है । हर बाघ की धारियां हमारे फिंगर प्रिंट के समान अलग अलग होती है । इससे बाघ की पहचान की जा सकती है । इस प्रकार धारियों के आधार पर दोनों क्षेत्रों में ली गई तस्वीरों का मिलान किया जाता है, इससे एक बाघ की दो बार गिनती होने की संभावना नही रहती । धारियों के पेटर्न की पहचान करने के लिए कई सॉफ्टवेयर उपलब्ध है । हमारे देश मेंमुख्यतया वाइल्ड- आइडी नामक सॉफ्टवेयर का उपयोग किया गया है ।
कैमरों से बाघों की गणना करने में जिन स्थानों पर परेशानी आती है और जहां बाघों का घनत्व कम होता है , वह डीएनए फिंगरप्रिंटिंग तकनीक का अधिक उपयोग किया जाता है । डीएनए फिंगरप्रिंटिंग तकनीक में बाघों को उनके मल से पहचाना जा सकता है । इसके साथ ही बाघों के पंजोंके निशानोंसे भी बाघ की संख्या की गणना की जाती है ।
सम्पादकीय 
विकास बनाम पर्यावरण
पर्यावरण संरक्षण आज मानव जीवन से जुड़ा अहम मुद्दा है । पर विकास के आगे इसकी गूंज उतनी जोर से नहींसुनाई देती, जितनी होनी चाहिये । आज स्थिति ऐसी हो गई है कि हमें साफ हवा के लिए तरसना पड़ रहा है । खासकर दिल्ली जैसे शहरों की स्थिति कुछ ऐसी हो गई है, जहां साल में कम ही ऐसे दिन देखने को मिलते है, जब हवा का स्तर बिलकुल साफ हो । हालांकि सरकार ने इसके लिए कई बड़े कदम उठाए है, लेकिन इनमें बड़ी पहल जागरुकता को लेकर भी हैं । लोगों को पर्यावरण बचाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है ।
सरकार को यह पहल उस समय करनी पड़ रही है, जब पर्यावरण बचाने के लिए बड़ी संख्या में कानून बनाने के बाद भी इसकी स्थिति में कोई सुधार नहीं दिखाई दे रहा है । उदाहरण के तौर पर प्रदूषण फैलाने वाले वाहनोंके खिलाफ दंड के कड़े प्रावधानों के बावजूद भी प्रदूषण के स्तर मेंकाई कमी नहीं आयी । इसी तरह से जंगल और पेड़ों को काटने से बचाने के लिए फारेस्ट एक्ट में कड़े प्रावधान किए गए थे । बावजूद इसके पेड़ों का कटना बंद नहीं हुआ ।
ऐसे में सरकार ने पर्यावरण को लेकर अपनी रणनीति को बदला है । अब वह कानून की सख्ती के साथ लोगों को जागरुक बनाने और कानूनों के पालन में लोगों का सहयोग लेने में भी जुटी है । इसके लिए लोगों को पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी छोटी-छोटी चीजों को लेकर जागरुक किया जा रहा है । जिसमें निर्माण कार्योंा को ग्रीन कवर करना, निजी वाहनों के इस्तेमाल के बजाय पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल करना, घर की छतों पर पेड़-पौधे लगाकर हरा-भरा करने जैसे कदम हैं । इसके साथ ही सरकार ने विकास से जुड़े सभी कार्योंा में पर्यावरण को प्रमुखता से शामिल करने की दिशा में काम करना होगा ।
पिछले दिनों प्रधानमंत्री ने जल समस्या का जिक्र करते हुए जनभागीदारी से इसे हल करने की बात कही है । उनकी इस पहल से स्पष्ट है कि सरकार करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद जो नही कर पा रही है उसे जन जागरुकता से पूरा किया जा सकता है । पर्यावरण को लेकर कुछ ऐसे ही कदम उठाने की आवश्यकता हैं । ***