आवरण नवंबर - दिसंबर 2006 संयुक्तांक

आवरण नवंबर - दिसंबर 2006 संयुक्तांक
शनिवार, 16 दिसंबर, 2006
पर्यावरण समाचार
पर्यावरण समाचार
सूरज की तर्ज पर ऊर्जा हासिल करने की कवायद
भारत और छ: अन्य देशों के बीच पेरिस में पिछले दिनों एक ऐतिहासिक समझौते ने आकार लिया है। इसके तहत प्रायोगिक तौर पर एक ऐसा रिएक्टर लगाया जाएगा, जो सूर्य के नाभिकीय संलयन की तर्ज पर बिजली बनाएगा। समझौते पर हस्ताक्षर करने वाले अन्य देश है - चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, रुस और अमेरिका व योरपीय यूनियन। लगभग एक दशक की चर्चा के बाद १२.८ अरब डॉलर की लागत से यह रिएक्टर स्थापित किया जाएगा।
भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष अनिल काकोड़कर ने किया। समारोह एलिसी पैलसे में हुआ। इसका आयोजन फ्रांस के राष्ट्रपति जेक शिराक और योरपीय यूनियन के अध्यक्ष एम.जोस मेन्यूल डूरो बारोसो ने किया। मूलत: इस परियोजना का नाम अंतरराष्ट्रीय ताप परमाणु प्रायोगिक रिएक्टर है, लेकिन अब इसे इसके नाम के पहले अक्षरों के आधार पर आईटीईआर नाम से जाना जाएगा। यह परियोजना वर्ष २००८ से लगभग एक दशक में फ्रांस के दक्षिण में स्थित काडराशे नामक स्थान पर आकार लेगी। इस रिएक्टर में नाभिकीय संलयन के लिए जीवाश्म इंर्धन का विकल्प तलाशने की कवायद की जाएगी।
मौजूदा परमाणु संयंत्रों में नाभिकीय विखंडन की तकनीक इस्तेमाल की जाती है। उसकी जगह सूर्य की तरह नाभिकीय संलयन प्रक्रिया को अपनाया जाएगा। श्री काकोड़कर के अनुसार अगर यह परियोजना सफल रही तो व्यावसायिक उत्पादन के लिए एक प्रोटोटाइप बनाया जाएगा। फिर दुनिया के सभी रिएक्टरों में संलयन विधि अपनाई जाने लगेगी। श्री काकोड़कर ने ऋग्वेद के एक श्लोक का उल्लेख करते हुए कहा - हमारे पूर्वज सूर्य की महत्ता को अच्छी तरह जानते थे कि पृथ्वी पर जीवन सूर्य की वजह से ही है।
वे शायद यह नहीं जानते थे कि एक दिन उनके उत्तराधिकारी अपनी ऊर्जा संबंधी जरुरतें पूरी करने के लिए पृथ्वी पर सूर्य की ही नकल उतारेंगे। भारत को इस बात पर गर्व है कि दुनिया के इस आम लक्ष्य में वह भी एक भागीदार बना है। पौराणिक मान्यताआें के अनुसार सूर्य भगवान के रथ को सात अश्व खींचते हैं। इस परियोजना में भी सात देश शामिल हैं जो सात अश्वों के समान हैं।
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सामाजिक पर्यावरण योग्यता बतौर एक विचारधारा
सामाजिक पर्यावरण
योग्यता बतौर एक विचारधारा
-डॉ. अमन मदान
योग्यता के बारे मंे आम समझ यह होती है कि यह कोई वस्तुनिष्ठ चीज है जिसे आसानी से नापा जा सकता है। मसलन आम तौर पर यह माना जाता है कि जो लोग परीक्षा में अव्वल आते हैं, उनमें योग्यता है और वे उन सारे पारितोषिकों के हकदार हैं जो उन्हें मिलते हैं।
अलबत्ता एक विद्वान ने लिखा था कि यदि बाहरी रुप आंतरिक क्षमताआें का द्योतक होता तो विज्ञान की कोई जरुरत नहीं होती। सामाजिक विज्ञान हमें कई ऐसे मिथकों को खोलकर देखने में मदद करते हैं जो तमाम सहज बुद्धि एहसासों में रचे-बसे होते हैं। इनसे हमें यह देखने में मदद मिलती है कि योग्यता वास्तव में विचारधारा (आइडियॉलॉजी) का ही एक भाग है।
कई समाज वैज्ञानिक विचारधारा की अवधारणा को इस रुप में देखते हैं कि कैसे कोई संस्कृति सत्ता का आयाम अख्तियार करती है। संस्कृति प्रतीकों और रिवाजों के एक परस्पर संबंधित तानेबाने से निर्मित होती है और यह संभव है कि इसमें अक्सर कुछ हितों को अन्य के मुकाबले प्राथमिकता मिल जाए। कतिपय अर्थोंा को सामने लाया जाता है जबकि अन्य को पीछे धकेल दिया जाता है। यह सब करते हुए यह आभास दिया जाता है कि सब कुछ सामान्य ओर स्वाभाविक है। जैसे भारत में चमड़ी के बाकी सब रंगों की अपेक्षा गोरेपन को सुंदरता का प्रतीक मान लिया गया है। सम्पन्न व ताकतवर लोगांे के तौर-तरीके को स्टाइल का और अंतत: अच्छाई का प्रतीक बन जाते हैं। विचारधाराएँ सिर्फ राजनैतिक दलों तक सीमित नहीं हैं। संस्कृतियों में भी अदृश्य सूत्र होते हैं, जो प्राय: अचेतन ढंग से कुछ हाथों को मजबूत करते हैं, कुछ हाथों को कमजोर करते हैं। इसे अंजाम देने का सबसे आम तरीका वैधीकरण का है।
जैसे, ब्रिटिश राज की सबसे बड़ी ताकत यह थी कि उन्होंने हमें कायल कर दिया था कि उनके तौर-तरीके बेहतर और सही हैं। अर्थात उपनिवेशवाद की विचारधारा ने हमें उनके सामने इतना बेबस कर दिया जो बंदूकें और तलवारें कभी न कर पातीं। इससे पता चलता है कि क्यों हमारे स्वतंत्रता आंदोलन की प्रमुख रणनीति हमारे अपने तौर-तरीकों के प्रति आत्म-सम्मान और आस्था को बढ़ावा देने की रही।
आज के भारत में योग्यता भी एक विचारधारा की भूमिका निभा रही है। यह सारे प्रतिष्ठित व शक्तिशाली पदों पर प्रवेश के लिए जरुरी गुणों को परिभाषित करती है। यह चंद चुने गए लोगों का गुणगान करती है और उन्हें उन विशेष पदों पर आसीन होने का हकदार और सही पात्र घोषित करती है। इस तरह योग्यता की धारणा चयनित लोगों के गुणों को और रेखांकित करती है और इस तरह से उन व्यवस्थागत खामियों को ढक देती हैं जिनके चलते कमोबेश उतने ही अच्छे प्रत्याशी चुने जाने से वंचित रह जाते हैं।
इस बात की झलक हमें एम.बी.बी.एस. के कुछ छात्रों द्वारा किए गए विरोध प्रदर्शन में देखने को मिलती है। ये लोग एक स्नातकोत्तर विभाग में आरक्षण के विरुद्ध खफा थे। इनका कहना था कि इस विभाग में कुल ५ सीटें हैं और सारे आरक्षण कोटा के बाद मात्र २ सीटें बचेंगी। उनका तर्क था कि यह तो योग्यता की उपेक्षा है। विचारधारा की पकड़ गौरतलब है : वे आरक्षण के खिलाफ प्रदर्शन करने को तैयार थे मगर सीटें कम होने को लेकर नहीं। संभवत: उन्हें लगता कि आरक्षण अवैध है मगर सीटें कम होने के बारे में शायद उनका विचार है कि यह तो 'स्वाभाविक' है।
नौकरियों की कमी, कॉलेजों में सीटों की कमी और नौकरी चाहने वाले लोगांे के लिए गरिमा के अभाव के पीछे समाज के गैर-बराबर ढांचे का मुद्दा है। हमारा राजनैतिक तंत्र ऐसा है जो मुट्ठी भर लोगों को सत्ता देता है, अधिकांश को नहीं। हमारी धार्मिक व्यवस्था ऐसी है जो चंद लोगों को समृद्धि देती है, अधिकांश लोगांे को नहीं। हम चयन की कसौटियों को लेकर तू-तू, मैं-मैं करते रहते हैं, मगर यह नहीं पूछते कि नौकरियाँ इतनी कम क्यों हैं या कॉलेज में सीटें इतनी कम क्यों हैं।
राज्य, कार्पोरेट जगत और पेशेवर दुनिया में प्रवेश का मर्म यह है कि चंद लोगों का चयन होता है और अधिकांश वर्जित रहते हैं। हर मामले में कहा जाता है कि चयन कुछ गुणों के आधार पर किया जाता है और सारे मामलों में वर्जना का औचित्य लगभग उतना ही महत्वपूर्ण होता है जितना कि उन गुणों की तथाकथित उपयोगिता। यदि एक पद के लिए एक हजार आवेदक हैं, तो आप फैसला कैसे करेंगे ? योग्यता की धारणा इस फैसले पर वैधता का मुलम्मा बन जाती है। योग्यता के आधार पर दावा किया जाता है कि जो भी चयन हुआ है वह सही है क्योंकि नापने के किसी मानक पैमाने का इस्तेमाल किया गया था। यह बताया जाता है कि सफल प्रत्याशी शेष के मुकाबले किसी वास्तविक व ठोस फर्क के आधार पर आगे रहा है। यदि हम मान लें कि चयन का आधार सही और प्रासंगिक था तो भी यह असंगति अनुत्तरित रहती है कि १ प्रतिशत अंतर का क्या महत्व है और यदि दो बार टेस्ट लिया जाए तो नतीजे कितने अलग हो सकते हैं। मगर इसमें एक ज्यादा बुनियादी समस्या है : शेष अधिकांश को इसलिए खारिज नहीं किया गया है कि वे उस नौकरी के लिए नाकाबिल थे। उन्हें तो इसलिए रिजेक्ट किया गया है कि उन सबके लिए पर्याप्त नौकरियां ही नहीं थीं।
गैर-बराबरी और उसके औचित्य की स्वीकृति ही वर्चस्व की विचारधारा की प्रमुख भूमिका है। योग्यता एक व्यापकतर संस्कृति का अंग है जिसमें यह माना जाता है कि गैर-बराबरी सामान्य और जायज है। यह उत्साहवर्धन के हमारे तौर-तरीकों का अंग बन चुकी है। एक बार कार में कहीं जाते हुए मेरे एक शुभचिंतक मित्र ने मुझे यह समझाने की कोशिश की कि मुझे जल्दी सें जल्दी अमीर बन जाना चाहिए। मैंने पूछा, क्यों ? उसने कहा, क्यों नहीं, तुम मर्सिडीज़ चलाना नहीं चाहते ? मैं चक्कर में पड़ गया। आखिर मर्सिडीज़ में भी तो वह मेरे साथ बैठा होगा और हम ट्राफिक में रेंग रहे होंगे। तो मर्सिडीज़ से क्या हासिल होगा ? अब मुझे यह बात बेहतर समझ में आती है। उत्साहवर्धन के हमारे तौर-तरीकों का संबंध इस बात से नहीं है कि कुछ करके हमें क्या मिलेगा, बल्कि इस बात है कि वैसा करके हम दूसरों से कितने श्रेष्ठ हो जाएंगे।
जैसे-जैसे एक खास किस्म के आर्थिक विकास के चलते हमारा समाज ज्यादा गैर-बराबर होता जा रहा है, यह गैर-बराबरी ही हमारी प्रेरणा का स्त्रोत बनती जा रही है। हमारे यहाँ विज्ञापन अलग दिखने की आकांक्षा से सराबोर होते हैं। उपभोगवादी माहौल में हमारे मध्यम व उच्च-मध्यम वर्ग टिकाऊ संतोष नहीं चाहते। संतुष्ट हो जाने का मतलब है उपभोगवाद का अंत। यह तो हमारी अर्थ व्यवस्था के लिए घातक होगा, नहीं ? हम तो जिस चीज के पीछे भागते हैं वह है अलग दिखने की इच्छा। और बराबरी के साथ अलग नहीं, मगर ऊँच-नीच के रुप में अलग। अन्य लोगों से बेहतर खाना, अन्य लोगों से बेहतर कार चलाना, अन्य लोगों से बेहतर कपड़े पहनना । श्रेष्ठता को त्वरित लेबल से परिभाषित किया जाता है, उनकी गहराई में जाने की न तो रुचि है, न इच्छा। योग्यता के लेबल में भी उपभोगवादी समाज के अन्य प्रतीकों के गुण मौजूद हैं : लेबल आपको वैधता और प्रमाणीकरण देता है और उस ब्रांड उस लेबल को मूल्य देता है। उसकी अंतर्वस्तु गौण है।
जब योग्यता की अंतर्वस्तु महत्वपूर्ण भी होती है, तब भी उसके अर्थ को जानबूझकर दिमाग से बाहर कर दिया जाता है। जीवन में आगे बढ़ने के लिए जरुरी है कि हमें कुछ खास किस्म की नौकरी मिले और इन नौकरियों के लिए हमें दब्बू, चालाक और अवसरवादी होना पड़ेगा। कई मामलों में तो योग्यता का अर्थ इतना ही होता है। जब १०० नौकरियों के लिए प्रतिस्पर्धा परीक्षा में १०,००० लोग बैठे तो ये गुण बहुत काम आएंगे। प्रतिस्पर्धा जितनी कठोर होगी स्वस्थ, चौतरफा रुचि वाले लोगों या अपने हाथों से चीजें बनाने में दिलचस्पी रखने वाले लोगों या बीमार अथवा मायूस लोगों को चुना जाना उतना ही मुश्किल होगा प्रतिस्पर्धा कठोर होने के साथ इस बात की संभावना कि योग्य व्यक्ति वे होंगेे जो पूरी तरह एकाग्रचित्त और पढ़ाकू हों। इसका मतलब यह भी होगा कि वे नैतिक दृष्टि से कायर होंगे और व्यवस्था की उटपटांग मांगों को चुपचाप पूरा करेंगे और सचमुच की दुनिया में बहुत कम रुचि रखेंगे। इसलिए यह जरुरी है कि हम व्यवस्थागत गैर-बराबरी से संघर्ष करें क्योंकि यह हमारे सबसे प्रिय मूल्य में विकृतियाँ पैदा करती हैं।
जाहिर है कि ये सब चीजें चुनाव करने वाली संस्थाआें के अनुकूल हैं। ऐसे छात्र हुड़दंगी नहीं होते, उन्हेंे आसानी से काबू में रखा जा सकता है और विश्वास किया जा सकता है कि वे व्यवस्था की नाव को डगमग नहीं करेंगे। ऐसे लोग कार्पोरेट जगत के लिए भी बढ़िया होते हैं। अलबत्ता, ये बहुत अच्छे इन्सान नहीं होते और यह बात हमें अपने अस्पतालों या निजी क्षैत्र के क्रियाकलापों में दिखाई देती है।
योग्यता का वैचारिक वजन उन लोगोंं की सत्ता को सुदृढ़ करता है जिन्हें इसका आशीर्वाद प्राप्त है। मसलन, पेशवर लोगांे में गहरी वर्जनावृत्ति पाई जाती है। डॉक्टरों का दावा है कि उनके पास और सिर्फ उनके पास ही स्वस्थ करने की क्षमता है और नैतिक अधिकार है। वे बाकी सबको स्वस्थ करने के दायरे से वर्जित रखना चाहते हैं। यह हर किस्म की पेशेवराना प्रवृत्ति के मूल में हैं - सीमाएं बांधना और उस सीमा के अंदर एकाधिकार। चिकित्सा व्यवसाय की आलोचना योग्यता के दबाव तले कुचल जाती है। शरीर को भेदने वाली चिकित्सा और अस्पतालों की हिंसा के प्रति शंकाएं दब जाती हैं। चिकित्सा क्षैत्र में व्याप्त लालच, स्वार्थ और शोषण की बातें करना बेमानी हो जाता है।
इस व्यवसाय के लिए योग्यता के आधार पर सर्वश्रेष्ठ का चुनाव किया जाता है। वे गलत कैसे हो सकते है? यदि आई.आई.एम. और आई.आई.टी. देश के सबसे योग्य छात्रों का चयन कर रहे हैं तो वे एकदम प्रदूषण रहित पर्यावरण या न्यायपूर्ण, समतामूलक समाज से कम के हिमायती क्यों कर होंगे ?
बतौर विचारधारा योग्यता को समझने के लिए वर्तमान समाज के व्यापक धरातल की जाँच करनी होगी और यह देखना होगा कि यह समाज किस तरह का चयन करना चाहता है। गांधी इस बात को भलीभांति समझते थे। जब उन्होंने ब्रिटिश शिक्षा की निंदा की थी, तो कहा था कि वे यह समझ सकते हैं कि क्यों लोग ब्रिटिश स्कूल और विश्वविद्यालन को छोड़ना नहीं चाहते। ये स्कूल और विश्वविद्यालय सत्ता के मोहक दायरों में प्रवेश देते हैं। सत्ता के उन दायरों की प्रकृति आज भी योग्यता के अर्थ व पकड़ को समझने के मूल में है।
देखा जाए तो योग्यता की जड़े योग्यतावाद के समातामूलक आदर्श में हैं, जहाँ योग्यता ही महत्वपूर्ण चीज है और खानदानी विशेषाधिकारों का कोई स्थान नहीं है। मगर एक गैर-बराबर समाज, जहाँ संसाधनों व अवसरों के बंटवारे में विकृतियाँ हैं, में योग्यता मुंह छिपाने का साधन और एक विचारधारा बन गई है जो उस व्यवस्था की खामियों को छिपाती है, जो यह दर्शाना चाहती है कि उसमें पुरस्कारों का बंटवारा न्यायपूर्ण ढंग से हो रहा है। न्याय की जिस उम्मीद को एक समय पर योग्यता ने जगाया था, वह आज भी पूरी नहीं हुई है।
पर्यावरण परिक्रमा
पर्यावरण परिक्रमा
हर मनुष्य के डीएनए में अंतर
हर मनुष्य की आनुवांशिकी बनावट या डीएनए में खासा अंतर होता है, जबकि पहले ऐसा नहीं माना जाता था, परंतु जेनेटिक मैप इसका खुलासा करते हैं।
इसका सीधा सा अर्थ है कि प्रत्येक मनुष्य दूसरे मनुष्य से आनुवांशिकी रुप से काफी अलग है, भले ही वे एक परिवार से ताल्लुक रखते हों। अभी तक यह माना जाता रहा है कि प्रत्येक मनुष्य में आननुवांशिकी रुप से बहुत कम अंतर होता है। वैज्ञानिकों ने जब इस बारे में शोध किया तो उन्हें आश्चर्यजनक जानकारियाँ मिलीं। शोध के मुताबिक जिस तरह से चिम्पांजी में डीएनए एक समान होते हैें, उस तरह से मनुष्य में नहीं होता है। पहले के शोध मंें कहा गया था कि चिम्पांजी और मनुष्य के ९९ फीसदी डीएनए एक समान होते हैं। एक ही जाति में डीएनए में भारी अंतर तो दूर की बात है, हर घर के अलग-अलग लोगों में भी डीएनए का भेद जबर्दस्त होता है। यह नई खोज कई अध्ययन पर आधारित है और घातक बीमारियों में औषधियाँ लागू करने में खासा परिवर्तन भी ला सकती है। नेचर साइंटिस्ट में प्रकाशित इस शोध में मानव जीनोम का पहला नक्शा बना लिया है। सामान्य और स्वस्थ लोगों में डीएनए के कई अलग सिगमेट या तो लापता होते हैं या दुगुने होते हैं।
कॉपी नंबर वेरिएंट्रस (सीएनवी) के नाम से जाने वाले ये संशोधित डीएनए क्रम कैंसर जैसी घातक बीमारियों के लिए जिम्मेदार हो सकते हैं। बोस्टन के हॉवर्ड मेडिकल स्कूल के शोधार्थी चार्ल्स ली का कहना है कि नए मैप से मानव के आनुवांशिक अंतर का और स्पष्ट चित्र उभरा है। यह साक्ष्य मिला है कि हर व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से आनुवांशिक रुप से काफी भेद रखता है। प्रत्येक व्यक्ति का अपना अलग जीनोम होता है। शोध के दल ने योरप अफ्रीका और ऐशिया में एक ही वंश के २७० लोगों का परीक्षण किया। इसमें १४०० सीएनवी पता चलें, जो १२ फीसदी मानव जीनोम को शामिल करता है। हर मनुष्य की कोशिकाआें में मौजूद क्रोमोसोम्स में ही उसका जेनेटिक कोड है। पूर्व में किए गए मानव जीनोम अध्ययन में पाया गया था कि हर व्यक्ति में बहुत थोड़ा मौलिक अंतर है। जीन को जब समाप्त किया जाता है तो सीएनवी उभरते हैं। यदि नई डीएनए सरंचना बनाने के लिए जब जीन के भागों को एक-दूसरे से मिलाया जाता है तो ये उभरते हैं।
सन् २०२६ में प्रति हजार पुरुषों पर होंगी ९३० महिलाएं
महिलाआें के विकास और सशक्तिकरण के तमाम सरकारी गैर सरकारी दावों और प्रयासों के बावजूद भविष्य में पुरुषों की तुलना में महिलाआें की संख्या में और कमी आने का अनुमान है।
जन सांख्यिकीय आयोग की हाल में जारी एक रिर्पोट के अनुसार अगले बीस वर्षो में यानि सन् २०२६ में प्रति हजार पुरुषों की तुलना में महिलाआें की संख्या वर्तमान ९३३ से तीन अंकर नीचे गिर कर ९३० पर पहंुंच जाएगी। सन् २०२६ तक जनसंख्या की संरचना में आने वाले बदलाआें के आंकलन के लिए तैयार की गयी इस रिपोर्ट में महिलाआें से संबंधित आंकड़े काफी चौकाने वाले है। जिसके अनुसार देश के लगभग सभी महानगरों में ०.६ वर्ष के बच्चो के समूह में लड़कों की तुलना में लड़कियों की संख्या में गिरावट आ रही है।
सन् २००१ की जनगणना में ०.६ वर्ष के समूह में लिंगानुपात ९३३ दर्ज किया गया था जबकि १९८१ की जनगणना में यह अनुपात ९६८ था।
रिर्पोट के रुझानों के अनुसार सन् २०२६ में राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में ही लिंगानुपात सबसे कम ७८८ होगा। इसके बाद पंजाब में ८४० होगा। इसी तरह देश के समृद्ध हिन्दी भाषी राज्यों में घटते लिंगानुपात की समस्या सबसे गंभीर है।
कन्या भ्रूण हत्या के पीछे रुढ़िवादी सामाजिक कारणों के साथ साथ तकनीकी सुविधा भी काफी हद तक जिम्मेदार है। आल्ट्रासाउंड जैसी तकनीकें पश्चिमी देशों में गर्भ में पल रहे बच्चे के स्वास्थ्य की निगरानी के लिए विकसित की गई थीं लेकिन अपने देश में इसका प्रयोग धड़ल्ले से निंग निर्धारण के लिए किया जाने लगा। ग्रामीण क्षेत्रों में भी इस तकनीक के फैलाव से भ्रूण हत्याआें के आंकड़ों में तेजी से इजाफा हुआ।
पैर पसार रहा है रेगिस्तान
विश्व में तेजी हो रहे जलवायु परिवर्तन के कारण गरीब देशों में रहने वाले करोड़ों लोगों को आने वाले समय में पानी की एक बूंद के लिए भी तरसना पड़ सकता है। कुछ ऐसी ही आशंका क्रिश्चियन डेवलपमेंट एजेंसी टियरफंड की फीलिंग द हीट नामक रिपोर्ट में की गई है। इसमें कहा गया है कि विश्व की जितनी जमीन पर आज रेगिस्तान है, वर्ष २०५० में इनमें पांच गुना की बढ़ोत्तरी हो जाएगी।
रिपोर्ट में ऑक्सफोर्ड के नोरमन मेयर्स के एक शोध का हवाला देते हुए कहा गया है कि वर्ष २०५० तक तकरीबन २० करोड़ लोग जलवायु परिवर्तन के कारण विस्थापित हो जाएंगे। यही नहीं, पृथ्वी पर हो रहे जलवायु परिवर्तन तथा विश्व के कई देशों मेंु लोगों ने आर्थिक तंगी के चलते अभी से विस्थापित होना शुरु कर दिया है। ब्राजील के मर्ग उत्तरी इलाकों में रहने वाला हर पांच में से एक व्यक्ति इन इलाको को छोड़कर जा रहा है। चीने में भी गोबी मरुस्थल तेजी से अपने पैर पसार रहा है। नाइजीरिया का भी यही हाल है, जहां २ हजार स्क्वेयर किमी की भूमि हर साल रेगिस्तान में तब्दील होती जा रही है।
ब्रिटेन के जलवायु वैज्ञानिक सर जॉन हॉटन के अनुसार जी-आठ देशों की शिखरवार्ता में सूखा प्रभावित जगहों को मदद देने का वायदा किया गया था, लेकिन इस दिशा में अभी तक ज्यादा कुछ नहीं किया गया हैं।
रिपोर्ट में सर जॉन के हवाले से कहा गया है कि विकासशील देशों की सबसे बड़ी समस्या पानी की कमी होगी। उनके अनुसार अभी विश्व की करीब २ फीसदी भूमि पर रेगिस्तान हे तथा वर्ष २०५० तक १० फीसदी जमीन इनकी चपेट में होगी।
इस रिपोर्ट में एक सकारात्मक बात यह भी कही गई है कि कुछ जगहों पर पानी की समस्या को जलवायु से अप्रभावित रखने के लिए जो उपाय किए गए हैं, उनमें अच्छे परिणाम देखने को मिले हैं इनमें सूखा तथा बाढ़ दोनों ही समस्याआें से निपटने के लिए किए गए उपाय शामिल है।
नाइजीरिया में समुद्र किनारे के पहाड़ों के आसपास पत्थरों के कम ऊंचाई के बांध बनाकर काफी हद तक पानी को समुद्र में जाने से रोका गया, वहीं भारत के बिहार राज्य में बाढ़ के समय गांवों को आपस में जोड़ने के लिए अस्थाई तटबंध बनाए गए जिसमें से पानी निकलने का रास्ता रखा गया।
जन सहयोग से संख्या बढ़ रही है गैंडों की
भारत के विलुप्तप्राय जीवों में शुमार एक सींग वाले गैंडों की संख्या फिर से बढ़ने लगी है। गैंडों के तस्करों के साथ मुकाबला करने में वन्यजीवों के सरंक्षण से जुड़े कर्मचारी व अधिकारी गांव के किसानों की मदद ले रहे हैं।
कुछ वर्षो पहले तक उत्तर-पूर्वी राज्य असम के काजीरंगा नेशनल पार्क में दो सींग वाले गैंडों की लाशें यत्र-तत्र पड़ी देखी जा सकती थीं, लेकिन रेंजरों ने कहा कि अब जिस तरह से पहले हत्या होती थी, अब उसमें काफी कमी आई है। पार्क के वार्डन उत्पल बोरा ने कहा कि किसी ने भी २००६ तक नहीं सोचा था कि गैंडों की संख्या एक बार फिर बढ़ेगी, क्योंकि प्रति १०० गैंडे मौत के गाल में जा रहे थे। इनमें से आधे गैंडे तस्करों द्वारा मारे जाते थे और बचे हुए गैंडे प्राकृतिक मौत के शिकार होते थे। ४३० वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले इस पार्क में दुनिया में सबसे अधिक एक सींग वाले गैंडे रहते हैं।
हालिया आंकड़ों के अनुसार दुनियाभर में अनुमानित रुप से एक सींग वाले गैंडों की संख्या २७०० हैं। जिनमें से १८५५ गैंडे इसी पार्क में रहते है। पार्क के वार्डनों के अनुसार पिछले पांच वर्षो के दौरान गैंडों की तस्करी के मामले में कमी आई हे। इस वर्ष अभी तक सिर्फ चार गैंडे की मारे गए हैं जबकि १९९० के दशक में शुरु मंे वार्षिक रुप से इस पार्क में लगभग ५० गैंडे मारे जाते थे।
संगठित तस्कर गैंडे की सींगों के लिए उनकी हत्या करते हैं। काफी लोगों का मनना है कि गैंडों के सींग में एप्रोडीसियाक गुण पाए जाते हैं। इनका उपयोग बुखार, पेट की बीमारियों और अन्य बीमारियों के लिए दवा के रुप में इस्तेमाल तो किया ही जाता है, साथ ही मध्य पूर्व के व्यापारी काफी ऊंची कीमत देकर इसे खरीदते हैं जो इसके गहने बनाते हैं। गैर कानूनी तरीके से किए जा रहे इस कारोबार में तस्करों को काफी अधिक होता है। गैंडे के एक किलोग्राम सींग की कीमत अंतर्राष्ट्रीय बाजार में १५ लाख रुपये तक होती है।
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कविता - प्रकृति के उपकार, जीवन के आधार
कविता
प्रकृति के उपकार, जीवन के आधार
भगवन्त राव गाजरे
वनस्पति और वृक्षों से नित , होता धरती का श्रृंगार
प्रकृति के उपकार अनेकों, बनते जीवन के आधार ।।
माटी की महिमा को समझें, कण-कण में हरिया छाई ।
जड़ी-बूटी, फल-फूल सदा ही, करते प्रमुदित सबको भाई ।।
मानव की उत्पत्ति से ही, पेड़-पौधे सब पालनकर्त्ता ।
भविष्य पुराण में ऋषियों ने तो, माना इनको कर्त्ता-धर्त्ता ।।
अशोक वृक्ष नित शोक हर्ता, बिल्व दीर्घायु देता है
जामुन को धन-दाता मानों, बकुल पाप को हर लेता है ।।
आम मनोरथ पूर्ण करता, कदम्ब लक्ष्मी-दाता सब जाना ।
वेद-पुराण भी युगों-युगों से , वृक्षारोपण-महत्व माना ।
सप्त-शती औषध के ज्ञाता, भिषक बन चिकित्सा करते ।
औषधि के माध्यम से ही वे , सदा तन का रोग हरते ।।
लक्ष्मी-ब्रह्मा कमलोद्भव हैं, दुर्गा से गणेश प्रसन्न हैं ।
बेल-पत्र से शिव की पूजा, पादपों का देव - सम्बन्ध है ।।
पीपल तले बोध बुद्ध को, अशोक तले सीता रहती थीं।
नारियल का नाम श्रीफल, लक्ष्मी नित उसमें बहती थी ।।
वन ने जन को नहीं भुलाया, जन दे वन को नित सत्कार ।।
बनें परस्पर हम सहयोगी, केसर की होगी भरमार ।।
तीज-त्यौहार सब पेड़-पौधांे से , तब क्यांे इनको काटे-छांटे ।
गाजरे का यही निवेदन, सुख-दुख इनका मिलकर बांटे ।।
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ज्ञान विज्ञान
ज्ञान विज्ञान
गर्म पानी बर्फ जल्दी क्यों बनता है ?
यह एक पहेली रही और यह पहेली आजकल ही नहीं है बल्कि अरस्तू के जमाने से चली आ रही है। पहेली यह है कि ठण्डे पानी की अपेक्षा गर्म पानी जल्दी बर्फ क्यों बन जाता है। यह उटपटांग सी लगने वाली बात सबसे पहले यूनानी दार्शनिकों ने देखी थी मगर हाल के वर्षो में इसे मशहूर करने का काम तंज़ानिया के एक स्कूली छात्र इरेस्टो म्पेम्बा ने किया। उसने देखा कि मीठा दूध यदि पहले से गर्म कर लिया जाए, तो आइसक्रीम जल्दी बनती है। तो इस म्पेम्बा प्रभाव के पीछे मामला क्या है ?
अब वाशिंगटन विश्वविद्यालय के जोनाथन काट्ज को लगता है कि मामला काफी सरल है और इसका संबंध घुलित पदार्थो से है। उनका कहना है कि पहले तो यह सोचना चाहिए कि आखिर गर्म करने से पानी को होता क्या है। पानी में कई लवण घुले होते हैं। कई बार देखा जाता है कि यदि पानी को गर्म करें तो इनमें से कुछ लवण अघुलनशील होते हैं।
द्रवों का एक गुण यह होता है कि यदि उनमें कोई पदार्थ घोला जाए तो उनका हिमांक कम हो जाता है। हिमांक मतलब वह तापमान जिस पर द्रव जम जाता है। जैसे शुद्ध पानी शून्य डिग्री सेल्सियस पर बर्फ बनता है। मगर यदि उसमें कुछ पदार्थ (जैसे लवण) घुले हों तो वह शून्य डिग्री पर नहीं बल्कि शून्य से कुछ नीचे बर्फ बनेगा।
इन दो बातों को जोड़कर देखें तो लगता है कि पानी को गर्म करने से उसमें घुले हुए लवण अघुलित हो जाते हैं, तो कम लवण वाला पानी जल्दी जमना ही चाहिए।
वैसे काट्ज़ का मत है कि इन दोनों कारणों से गर्म पानी जल्दी बर्फ बनता है। अब उनका कहना है कि इन बातों को जाँचने के लिए प्रयोग किये जाने चाहिए। एक तो यह देखा जाना चाहिए कि घुलित लवणों का प्रभाव किस हद तक पड़ता है। यदि काट्ज़ की बात सही है तो 'म्पेम्बा प्रभाव' तब ज्यादा दिखेगा जब पानी बहुत कठोर हो। वैसे यह पहेली जितनी मामूली लगती है, उतनी है नहीं। कम से कम एक चुनौती तो है। हाईस्कूल के छात्र आसानी से काट्ज़ द्वारा सुझाए कारणांे की जाँच कर सकते हैं।
भारतीय वैज्ञानिक मंगल पर जीवन खोजेंगे
भारतीय अंतरिक्ष वैज्ञानिक मंगल पर जीवन की संभावना तलाशने की योजना बना रहे हैं। इसके लिए वर्ष २०१२-१३ में मंगल पर एक यान भेजने की तैयारी की जा रही है। ६ से ८ महीने तक चलने वाले इस मिशन के दौरान लाल ग्रह के वातावरण और उसकी सतह के भीतर मौजूद जीवन संबंधी जानकारी एकत्रित की जाएगी।
इस अंतरग्रही मिशन का उद्देश्य मंगल ग्रही के बारे में अब तक अनसुलझे सवालों के जवाब ढूँढना है। अभियान की सफलता के लिए भारतीय वैज्ञानिकों का दल ऐसी शक्तिशाली रिमोट सेंसिंग मशीन बनाने में जुटा हुआ है जिसकी भारवहन क्षमता ५०० किलोग्राम होगी। इन उपकरणों के माध्यम से मंगल ग्रह के वातावरण में मौजूद गैसों, केमिकल, मिट्टी और मंगल की भूमि के भीतर से विभिन्न पदार्थोंा को एकत्रित किया जाएगा।
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान (इसरो) के चेयरमैन जी. माधवन नायर का कहना है कि मंगल ग्रह पर जीवन की खोज करने के अभियान पहले भी चलाए गए हैं, लेकिन अब भी कई सवालों के जवाब आना बाकी हैं।
अमेरिकी और योरपियन स्पेस एजेंसी द्वारा मंगल ग्रह पर भेजे गए यानों से काफी महत्वपूर्ण आँकड़े पता चले हैं, इसलिए हम अपने अभियान के माध्यम से और भी नई जानकारियाँ जुटाने की कोशिश करेंगे।
चुम्बक खोलेगा ब्रह्मांड के राज
दुनिया का सबसे बड़ा सुपर कंडक्टिंग चुम्बक तैयार कर लिया गया है इसके जरिए ब्रह्मांड के रहस्यों को जानने की कोशिश की जाएगी। इस परियोजना को भी एटलस ही कहा गया है।
यह चुम्बक वैज्ञान