मंगलवार, 19 जनवरी 2016

 पर्यावरण समाचार
 तीन देश और ३ राज्य अपनाएंगे म.प्र. का टाइगर मॉडल
    दुनिया के लुप्त् होने के कगार पर पहुंच रहे बाघोंके संरक्षण के लिए मिसाल बने पन्ना टाइगर रिजर्व के मॉडल को अब दुनिया के दूसरे देश भी अपना रहे हैं ।
    कंबोडिया, म्यांमार और थाईलैण्ड ने पन्ना में बाघों के संरक्षण के लिए चलाए गए अभियान को चलाने का निर्णय लिया है । इसके अलावा देश मेंछत्तीसगढ़ के अचानकमार, उत्तराखंड के राजाजी और पश्चिम बंगाल के बक्सा टाइगर रिजर्व में भी पन्ना का संरक्षण मॉडल लागू किया जाएगा । २००९ में पन्ना को बाघ विहीन घोषित कर दिया गया था और २०१५ तक यहां बाघों की संख्या ३७ तक पहुंच गई है । वर्तमान में भोपाल के मुख्य वन संरक्षक, वन्य प्राणी एवं पन्ना के तत्कालीन क्षेत्र संचालक श्रीनिवास मूर्ति के अनुसार यहां बाघों की संख्या बढ़ाने का सुपर फार्मूला अपनाया गया, जिसमें इन जीवों को आश्वस्त किया गया कि उनकी जान को यहां कोई खतरा नहीं है । इसके लिए भरपूर तकनीक अपनाई गई । इसमें सर्विलांस से उनकी सुरक्षा से लेकर एक-एक बाघ की लोकेशनपर नजर रखना तक शामिल है ।
    २००९ में पन्ना को बाघ विहीन घोषित कर दिया गया था । इसके बाद शासन ने बाघ पुनर्स्थापना योजना प्रारंभ की । सबसे पहले ४ मार्च २००९ को बांधवगढ़ से पहली बाघिन टी-१ यहां लाई गई । इसके बाद ९ मार्च २००९ को कान्हा की बाघिनी टी-२ को यहां लाया गया । फिर कान्हा से ही बाघिन टी-४ और टी-५ लाई गई । इसके बाद पेच से बाघ टी-३ और बाघिन टी-६ को यहां लाकर रखा गया । बाघिन टी-२ ने सबसे पहले ४ अक्टूबर २०१० को ४ शावकों को जन्म दिया । २००९ से २०१५ तक की अवधि में ये बाघ १८बार में ४१ शावकों को जन्म दे चुके हैं । इनमें से ३७ बाघ जीवित है । वर्ष २०१५ में भोपाल से बाघ टी-७ को यहां से लेकर जाकर छोड़ा गया था ।
क्या इन्दौर में भोपाल से प्रदूषण कम है ?
    केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने इन्दौर में प्रदूषण को लेकर जो आंकड़ा जारी किये है, वो गलत है । इन्दौर में प्रदूषण की डेंसिटी १०८ बताई गई हैं, जबकि उज्जैन की ११५, भोपाल की १८१है । क्या ऐसा हो सकता है कि आबादी और क्षेत्रफल में बडे होने के अलावा प्रदेश में सर्वाधिक १७ लाख वाहनों वाले शहर में प्रदूषण इन शहरों के मुकाबले कम होगा ?
    ये बात विकास मित्र दृष्टि २०५० के किशोर कोडवानी ने पिछले दिनों इन्दौर में पत्रकारों से चर्चा करते हुए बताया कि इन्दौर में सड़कों में सड़कों का निर्माण की धूल से ३५ प्रतिशत, वाहनों से २५-३५ प्रतिशत, घरेलू, ईधन उपयोग से २२ प्रतिशत प्रदूषण उत्पन्न होता है । इन तीनों कारणों से इन्दौर प्रदूषण के मामलों में दिल्ली, जयपुर से भी आगे है ।
    तीन दशक पूर्व शहर में एक भी डायलिसिस मशीन नहीं थी, जबकि ३०० रिटेल दवा दुकानें थी, लेकिन आज ६० से अधिक डायलिसिस मशीनें है और ३००० से अधिक दुकानें हैं । इससे पता चलता है कि प्रदूषण से होने वाली बीमारियों के इलाज की सुविधाएं बढ़ी हैं । केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने इन्दौर को उज्जैन और भोपाल की तुलना में कम प्रदूषित बताया है, जबकि जनसंख्या घनत्व में इन्दौर में १६६७० लोग प्रति वर्ग कि.मी., उज्जैन में ६६१९,भोपाल में ३३८८, जयपुर में १५१६९ लोग रहते हैं । वाहनों के घनत्व में भी इन्दौर आगे है । यहीं प्रति वर्ग कि.मी. क्षेत्रफल में १३०७५ वाहन है जबकि जयपुर में ११३१७, दिल्ली में ९८२९, भोपाल में २९२३ और उज्जैन में २०२६ हैं ।
    आबादी और वाहन संख्या के मान से प्रदेश में इन्दौर सबसे आगे है । फिर भी मात्र तीन जगह प्रदूषण गणना की जाती है । उज्जैन, भोपाल अपेक्षाकृत छोटे है फिर भी चार जगह गणना की जा रही है । उन्होनें मांग्र की कि शहर में कम से कम ११ स्थानों पर गणना की जाना चाहिए । उनके अनुसार ये स्थान कालानी नगर, मरीमाता चौराहा, महू नाका, भंवरकुआ, बगाली चौराहा, विजय नगर चौराहा, पालदा, सांवरे रोड़, प्रदूषण केन्द्र और टी. चोइथराम पर प्रदूषण की गणना की जाना    चाहिए जब इन स्थानों के आंकड़ें आएंगे, वो सही होंगे । उन्होनें कहा कि दिल्ली में छह, भोपाल में चार, नागदा में तीन, जयपुर में छह, उज्जैन में चार, देवास में तीन, पीथमपुर में दो स्थानों पर प्रदूषण की गणना की जाती है, जबकि इन्दौर में मात्र तीन स्थानों पर ही प्रदूषण पर नजर रखी जाती है ।

1 टिप्पणी:

Yathavat Magazine ने कहा…

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