शनिवार, 15 दिसंबर, 2007

इस अंक में

पर्यावरण डाइजेस्ट के इस अंक में पर्यावरण से जुड़े विभिन्न सवालों और विश्व एड्स दिवस के अवसर पर एड्स पर विशेष सामग्री दी गयी है । पहले लेख यमुना और कामनवेल्थ खेल लेख में शिराज केसर और मंजू जैन ने यमुना नदी के भविष्य की चिंता व्यक्त की है । जल योद्धा राजेन्द्र सिंह पिछले चार माह से दिल्ली में यमुना नदी को लेकर जल सत्याग्रह कर सरकार का ध्यान आकर्षित कर रहे हैं । पिछले दिनों पर्यावरण डाइजेस्ट के सम्पादक डॉ. खुशालसिंह पुरोहित ने भी यमुना सत्याग्रह में भाग लिया था । दूसरे लेख मनुष्य ने पेड़ों पर ही सीखा था चलना में प्रवीण कुमार ने इस बारे में प्राणी विज्ञान की तथ्यात्मक जानकारी दी है । रतलाम के युवा साहित्यकार आशीष दशोत्तर के लेख दूर होती कौए की कांव-कांव में हमारे आसपास के पर्यावरण में कौए की भूमिका की चर्चा की है । गुजरात के पूर्व उपमुख्यमंत्री और सामाजिक विषयों के लेखक सनत मेहता ने अपने लेख संकट में है जीवनदायिनी नदियां में नदियों के जीवन में घुलते जा रहे जहर का विवरण दिया है । जलवायु परिवर्तन की चिंता आज दुनिया भर में हो रही है, संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव बान की मून ने अपने लेख विनाश के मुहाने पर दुनिया में जलवायु परिवर्तन के दुष्परिणामों की चर्चा की है । विशेष लेख में उ.प्र. के प्रसिद्ध लेखक डॉ. सुनील कुमार अग्रवाल का लेख पर्यावरण और भारतीय दर्शन में पर्यावरण के दर्शन से आप परिचित होंगे । विश्व एड्स दिवस के अवसर पर इंदौर (म.प्र.) के प्राध्यापक डॉ. भोलेश्वर दुबे ने अपने लेख एड्स वायरस : एक रहस्य में इस वायरस की विस्तृत जानकारी दी है। कविता में इस बार हैदराबाद के साहित्यकार डॉ. किशोरीलाल व्यास की कविता बोधिसत्व दी गयी है, जो आपको रूचिकर लगेगी । पत्रिका के स्थायी स्तम्भ पर्यावरण परिक्रमा, ज्ञान-विज्ञान और पर्यावरण समाचार मंे पर्यावरण जगत मे हो रही नित-नयी हलचलों से आप रुबरु होते हैं । पत्रिका के बारे में अपने विचारों से हमें अवगत करायें ।
- कुमार सिद्धार्थ

आवरण




संपादकीय

एक लाख करोड़ खर्च के बाद भी सिंचित क्षेत्र में कमी
केन्द्रीय कृषि मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार सन् १९९१-९२ से २००३-०४ तक नहरों से शुद्ध सिंचित इलाकों में कोई बढ़ोत्तरी नहीं हुई हैं । जबकि इस अवधि में देश ने नहर आधारित सिंचित इलाकों में बढ़ोत्तरी के उद्देश्य से बड़ी व मध्यम सिंचाई परियोजनाआे में रूपये ९९६१० करोड़ व्यय किये हैं । इस पूरे व्यय से पिछले १२ सालों में देश के बड़े बांधों की नहरों द्वारा शुद्ध सिंचित इलाके में एक भी एकड़ की बढ़ोत्तरी नहीं हुई है । यह बहुत गंभीर चिंता का कारण होना चाहिए । सन् १९९१-९२ में पूरे देश में नहर द्वारा शुद्ध सिंचित इलाका १७७.९ लाख हेक्टेयर था । उसके बाद २००३-०४ तक जिसके आंकड़े मौजूद हैं के सभी सालों में नहरों द्वारा शुद्ध सिंचित इलाका १७७.९ लाख हेक्टेयर से कम रहा है यानि वह लगातार कम हो रहा है । जल संसाधन मंत्रालय ने ११वीं योजना में प्रस्ताव किया है कि बड़ी एवं मध्यम सिंचाई परियोजनाआे के लिए १६५९०० करोड़ रूपयों का आवंटन किया जाये । अब तक उपलब्ध तथ्य दिखाते हैं कि इससे सार्वजनिक धन की पूरी तरह बर्बादी ही होगी । सिंचित क्षेत्र में कमी के अनेक कारण है । विश्व बैंक की २००५ की रिपोर्ट `इंडियाज वाटर इकॉनामी : ब्रैसिंग फॉर ए ट्रबूलेंट फ्यूचर' यह दिखाती है कि भारत के सिंचाई ढांचों के रख-रखाव के लिए सालाना वित्तीय आवश्यकता १७००० करोड़ रूपयों की है लेकिन इस हेतु आवश्यकता से १० प्रतिशत से भी कम राशि उपलब्ध होती है एवं इनमें से ज्यादातर ढांचो के भौतिक रख-रखाव में इस्तेमाल नहीं होती है । इन आंकड़ों से साफ पता चलता है कि देश में प्रति वर्ष बड़ी सिंचाई परियोजनाआे पर व्यय होने वाले हजारों करोड़ की राशि से कोई अतिरिक्त सिंचित इलाका विकसित नहीं हो रहा है । सिंचित इलाके में वास्तविक बढ़ोत्तरी पूरी तरह भू-जल सिंचाई से हो रही है । वास्तव में ९९६१० करोड़ रू. के अफलदायी निवेश द्वारा सिंचाई में कोई बढ़ोत्तरी नहीं होना पिछले दशक में भारत की घटती कृषि विकास दर का प्रमुख कारण है । बताया जा रहा है कि त्वरित सिंचाई लाभ कार्यक्रम (ए.आई.बी.पी.) में अप्रैल १९९६ से मार्च २००४ तक व्यय किये गये १४६६९ करोड़ रू. से कोई अतिरिक्त सिंचित इलाका नहीं जुड़ा है । इस तरह जल संसाधन मंत्रालय का यह दावा कि उपरोक्त अवधि में ए.आई.बी.पी. से २६.६० लाख हेक्टेयर अतिरिक्त सिंचित इलाका जुड़ा है सही नहीं है । इससे जवाबदेही के कई मुद्दे उठते हैं एवं इसके लिए जल संसाधन मंत्रालय, योजना आयोग एवं राज्यों में जो जिम्मेदार अधिकारी हैं उनको ढेर सारे सवालों का जवाब जनता को देना होगा ।

प्रसंगवश

क्या इन्सान को अंतरिक्ष में भेजना ज़रूरी है ?
कई अंतरिक्ष वैज्ञानिक यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या मानव को अंतरिक्ष में भेजकर हम कोई ऐसा ज्ञान प्राप्त् कर पाते हैं तो मानवरहित अभियानों से प्राप्त् नहीं किया जा सकता। अंतरिक्ष वैज्ञानिक फिलिप बॉल को लगता है कि मानवरहित अंतरिक्ष अभियानों से ऐसी कोई जानकारी नहीं मिलती जो तत्काल जरूरी हो या जिससे विज्ञान छलांग लगाने लगे । खासकर यह बात तब ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है जब मानवरहित अंतरिक्ष अभियान के सस्ते विकल्प मौजूद हैं । जैसे हाल ही में युरोपियन स्पेस एजेंसी का फोटॉन-३ मिशन सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। इस अभियान की खास बात यह थी कि युरोप के करीब ४५० छात्रों ने इसमें भाग लिया और कई महत्वपूर्ण प्रयोग किए गए । जैसे, इस अभियान के दौरान यह समझने के प्रयास किए गए कि अंतरिक्ष से बैक्टीरियानुमा जीव के पृथ्वी पर पहुंचने की कितनी संभावना है । वैसे इनमें से कोई भी प्रयोग ऐसा नहीं था जिससे विज्ञान में किसी नाटकीय प्रगति की अपेक्षा की जाए मगर मानवसहित अभियानों में भी तो यही स्थिति होती है । मानवसहित अंतरिक्ष अभियान कम से कम दस गुना महंगे होने के अलावा खतरों से भरे भी होते हैं । अंतत: अधिकांश वैज्ञानिक शोध धीमे-धीमे क्रमश: ही होता है और छात्रों का जुड़ाव फोटॉन-३ मिशन का अतिरिक्त लाभ था । फोटॉन-३ मिशन पूरी तरह यंत्रचालित था । अत: यह सवाल उठ रहा है कि जब यह संभव है तो मानव मिशन भेजे ही क्यों जाएं । जैसे यदि यह देखना है कि शून्य गुरूत्व की स्थिति में अंतरिक्ष यात्रियों की हडि्डयों की वृद्धि पर क्या असर पड़ता है, तो पहली बात तो यह है कि आप यह क्यों देखना चाहते हैं ? बताया जाता है कि इससे भविष्य में अंतरिक्ष यात्रियों को बेहतर तैयारी के साथ भेजा जा सकेगा । मगर यदि रोबोट्स वही काम कर देते हैं तो इन्सानों को वहां भेजना ही नहीं पड़ेगा । दूसरी बात यह है कि ऐसे ही अध्ययन जंतुआे के ऊतकों की मदद से भी किए जा सकते है । फोटॉन-३ मिशन में ऐसा एक प्रयोग किया भी गया है । दूसरी ओर, रॉयल एस्ट्रॉनॉमिकल सोसायटी ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि मानव अभियान बहुत जरूरी हैं क्योंकि इनसे हमें चिकित्सा संबंधी विशिष्ट जानकारी मिलती है । वैसे सोसायटी ने स्पष्ट नहीं किया है कि यह `विशिष्ट' जानकारी क्या है । लगता है मानवसहित अंतरिक्ष अभियानों का ग्मैलर ही उनकी शक्ति है ।

१ सामयिक

यमुना और कॉमनवेल्थ खेल
शिराज केसर/मंजू जैन
दिल्ली के भूभाग पर हृदय धमनियों की तरह बहने वाली यमुना के तटों पर कॉमनवेल्थ खेल - २०१० के आयोजन की तैयारियाँ जोर-शोर पर हैं। पूरी दिल्ली तथा नोएडा में कॉमनवेल्थ खेल पर ८,००० करोड़ रूपया खर्च का अनुमान है । यमुना तट तथा नोएडा में होटल, मॉल, मेट्रो रेलवे का रास्ता और स्टेशन आदि के लिए निर्माण जोर-शोर से चल रहे हैं । कॉमनवेल्थ खेल के आयोजन के काफी हिस्से का निर्माण पूर्वी यमुना तट पर होना है । कायदे-कानूनों सहित यमुना तट की भूभौगोलिक परिस्थितियों की अनदेखी भी भयानक रूप से की जा रही है । मध्यम वर्ग और उच्च् वर्ग दोनों मात्र इस बात से खुश है कि यमुना तट पर ५००० से ज्यादा आवासीय फ्लैटों का निर्माण हो रहा है । इससे रीयल एस्टेट के दाम घटेंगे, पर कॉमनवेल्थ खेल के शोर में यमुना के दर्द को जानने-समझने का शायद किसी के पास वक्त नहीं है । एक जीती-जागती नदी की धीरे-धीरे मौत के गवाह हैं हम । सीएसई के सुरेश बाबू कहते हैं कि ``हमेशा से यमुना दिल्लीवासियों की पानी की जरूरत को पूरा करती रही है, वही आज दिल्ली के लिए कलंक बन गई है ।'' दिल्ली में यमुना की लम्बाई २२ किलोमीटर है जो यमुना की कुल लम्बाई का दो फीसदी है। पर यमुना के कुल प्रदूषण का ७० फीसदी अकेले दिल्ली के लोग करते हैं । १० अप्रैल २००१ को उच्च्तम न्यायालय ने आदेश दिया था कि ३१ मार्च २००३ तक न्यूनतम जल गुणवत्ता प्राप्त् कर ली जानी चाहिए, ताकि यमुना को `मैली' न कहा जा सके । पर ५ सालों के बाद भी दिल्ली क्षेत्र में बहने वाली नदी में ऑक्सीजन का नामोनिशान ही नहीं रह गया है यानी पूरा पानी जहरीला हो चुका है और यमुना मर चुकी है ।प्रदूषित यमुना - एक अच्छा धंधा है : यमुना प्रदूषण दूर करने के लिए लगातार समय और पैसा बर्बाद किया जा रहा है । लेकिन परिणाम शून्य है । ९ महीनों से भी ज्यादा समय से इसका पानी पीने योग्य नहीं है । वजीराबाद से जब यमुना दिल्ली में प्रवेश करती है, तो इसका पानी साफ होता है लेकिन दिल्ली से निकलते ही यह गंदे नाले में बदल जाती है । पाले में जहां यमुना नदी दिल्ली में प्रवेश करती है मई २००६ में घुलनशील ऑक्सीजन का स्तर लगभग ६.५ मिग्रा. प्रति लीटर आंका गया, जो काफी स्वास्थ्यवर्द्धक है । लेकिन यही ऑक्सीजन का स्तर जनवरी २००३ में ९.६ मिलीग्राम था जो इस बात की ओर संकेत करता है कि यमुना की ऊपरी धारा दिन-ब-दिन प्रदूषित हो रही है। ओखला में तो यमुना नदी के बीओडी स्तर भी सर्वोच्च् न्यायालय द्वारा निश्चित स्तर से ४०-४८ गुना ज्यादा है । ओखला के लोगों को कभी भी साफ पानी नहीं मिला क्योंकि यह पानी न पीने लायक है और न ही नहाने लायक है । बेशक यह नदी दिल्ली में तो एक ऐसा गंदा नाला बन गई है, जहाँ शहर की सारी गंदगी उड़ेली जा रही है । पेस्टीसाइड्स और लोहा, जिंक आदि धातुएं भी नदी में पाई गयी है । एम्स के फारेन्सिक विभाग के अनुसार २००४ में ०.०८ मिग्रा. आर्सेनिक की मात्रा पाई गई जो वास्तव में ०.०१ मिग्रा होनी चाहिए। सेन्ट्रल पोल्यूशन कंट्रोल बोर्ड (सीपीसीबी) ने यमुना का सर्वे करते हुए आर्सेनिक की मात्रा को नजरअंदाज कर दिया । पानी में मौजूद फास्फेट और नाइट्रेट का भी कोई जिक्र नहीं किया गया है । ऊपरी यमुना का पानी तो किसी लायक नहीं ही रहा। लेकिन यह विडम्बना ही है कि यमुना की निचली धारा जहां बहती है, वहाँ लोग (मथुरा, आगरा, इलाहाबाद आदि) पीने के पानी के लिये यमुना के पानी पर ही निर्भर है । सर्वोच्च् न्यायालय द्वारा निर्धारित समय-सीमा को बीते तीन वर्ष हो चुके हैं, लेकिन अब भी नदी में ऑक्सीजन नहीं है । नदी को साफ करने के लिए बुनियादी ढाँचे पर भी दिल्ली सरकार ने कितनी ही राशि लगा डाली, `यमुना एक्शन प्लान' के माध्यम से भी योजना बनाइ गई और पैसा लगाया गया । २००६ तक कुल ११८८-१४९१ करोड़ रूपए का निवेश किया गया है जबकि प्रदूषण का स्तर और ज्यादा बढ़ गया है । इतना धन खर्च होने के बावजूद भी केवल मानसून में ही यमुना में ऑक्सीजन का बुनियादी स्तर देखा जा सकता है । अधिकांश राशि सीवेज और औद्योगिक कचरे को पानी से साफ करने पर ही लगाई गई । अगर दिल्ली जलबोर्ड का २००४-०५ का बजट प्रस्तावत देखें तो इसमें १९९८-२००४ के दौरान १२२०.७५ करोड़ रू. पूंजी का निवेश सीवरेज संबंधी कार्यो के लिए किया था। इसके अतिरिक्त दिल्ली में जो उच्च्स्तरीय तकनीकी यंत्रों का इस्तेमाल किया जा रहा है, उनकी लागत भी २५-८५ लाख प्रति एमआईडी आंकी गई है । दूसरे शब्दों मेंकहा जाए तो सीवेज साफ करने के लिये व्यय की गई राशि पानी के बचाव और संरक्षण पर व्यय की गई राशि से ०.६२ गुना ज्यादा है ।प्रदूषण का कारण - सरकार मानती है झुग्गी - इतना ही नहीं, नदी के प्रदूषण को दूर करने के लिए सर्वोच्च् न्यायालय ने अनेक मुकदमें हुए हैं, जिस पर न्यायालय ने प्रदूषण नियंत्रण के लिए निर्देश भी दिये हैं । लेकिन उनके फैसलों निर्देशों की परवाह किये बिना ही विभिन्न एजेंसियां झुग्गियों को प्रदूषण का कारण बनाने में लगी हैं । इसलिए २००४ में यमुना को प्रदूषण मुक्त करवाने के नाम पर, यमुना पुस्ता को खाली करा लिया गया लेकिन दो साल के बाद भी प्रदूषण की स्थिति जस की तस हैं । हां उसी जगह पर अब मॉल बनेंगे । वे शायद सरकार की नजर में प्रदूषण नहीं करते है।वर्तमान का यमुना संकट - मात्र यमुना के तट ही अब केवल दिल्ली के भूगर्भ जल को भर रहे हैं । यमुना तटों की बलुहट मिट्टी सबसे ज्यादा पानी सोखती है । यमुना तटों पर बहुमंजिली इमारतों का निर्माण एक भयानक खतरा बनके आया है । अक्षरधाम मंदिर से शुरू हुई यमुना तट पर कब्जे की शुरूआत के बाद कॉमनवेल्थ खेल बिल्डर्स भूमाफिया के लिए एक सुअवसर बनकर आया है । यमुना तट पर कॉमनवेल्थ खेल के नाम पर कब्जा किया जा रहा है । यमुना तट पर निर्माण के सवाल को कॉमनवेल्थ खेल पर विवाद के रूप में पेश करने की कोशिश हो रही है । ताकि कॉमनवेल्थ खेल यानी देश की शान के नाम पर यमुना के तटीय हिस्सों पर कब्जा कर लिया जाए । पर सवाल पानी के संदर्भ में दिल्ली के साझे भविष्य का है । केन्द्र सरकार इस वर्ष को `जल वर्ष' के रूप में मना रही है, विज्ञापनों में, पोस्टरों में, नारों में, पर असल में तो वह कॉमनवेल्थ खेल के नाम पर यमुना तट पर कंक्रीट का जंगल खड़ा करके दिल्ली के लिए `जल तबाही वर्ष' ही साबित करने में जुटी है ।

२ हमारा भूमण्डल

मनुष्य ने पेड़ों पर ही सीखा था चलना
प्रवीण कुमार
`मुर्गी पहले या अंडा' की तरह ही एक यह सवाल भी उठता रहा है कि मानव के पूर्वजों (चिम्पैंजी या ओरांगुटान) ने पेड़ पर रहने के दौरान ही दो पैरों पर चलना सीख लिया था या फिर जमीन पर उतरने के बाद उन्होंनेऐसा किया ? हाल ही में किए गए अध्ययन इस पहेली को सुलझाने का दावा करते हैं । उनके अनुसार पेड़ों पर रहने के दौरान ही हमारे पूर्वज दो पैरों पर चलने लगे थे । हालांकि इसके बाद भी वे लंबे अर्से तक पेड़ों को नहीं छोड़ पाए । बाद में जलवायु परिवर्तन की वजह से उन्हें धरती पर उतरना पड़ा । बर्मिगहैम विश्वविद्यालय (ब्रिटेन) से सुज़ाना थोर्प और उनके साथियों ने सुमात्रा (इंडोनेशिया) के गुनुंग लेंसर नेशनल पार्क में एक साल के दौरान ओरांगुटान पर करीब ३,००० अवलोकन किए । इसमें उन्होंने पाया कि जब वे पेड़ की सबसे पतली शाखा (४ से.मी. से कम व्यास वाली) पर होते हैं तो अपने पिछले पैरों पर चलने का प्रयास करते हैं। इस समय उनके हाथ उनका मार्गदर्शन करते हैं । मध्यम गोलाई वाली शाखा (४ से २० से.मी. के बीच व्यास वाली) पर वे दो पैरों पर चलने को प्रवृत्त होते हैं, लेकिन शाखाआें से लटकने व झूलने के दौरान शरीर के वज़न को संभालने में वे हाथों का इस्तेमाल करते हैं । मात्र २० से.मी. से मोटी शाखाआे पर ही वे चारों पैरों से चलते हैं । सुश्री थोर्प कहती हैं कि पतली शाखाआे पर चलने की क्षमता फलों तक उनकी पहुंच को आसान बना देती है । यह क्षमता उन्हें एक पेड़ से दूसरे पेड़ तक छलांग लगाने में भी सहायता करती हैं क्योंकि ऐसा करने के लिए उन्हें शाखाआे के पतले हिस्सों के जरिए ही जाना पड़ता है । ग्रेट एप्स, जैसे चिम्पैंजी, बोनोबो, गोरिल्ला, ओरांगुटान और गिब्बन में से केवलओरांगुटान ही ऐसे हैं जो अब भी पेड़ों पर ही रहते हैं । इससे वे हमारे पूर्वज बंदरों पर पड़ने वाले विभिन्न दबावों को समझने के लिए बेहतर मॉडल है । हालांकि अनुवांशिक रूप से देखा जाए तो ओरांगुटान हमारे पूर्वज बंदरों में सबसे दूर के `रिश्तेदार' हैं, जबकि सबसे निकट के रिश्तेदार चिम्पैंजी माने जाते हैं । करीब ६० लाख साल पहले बोनोबो और चिम्पैंजी से अलग होकर मनुष्य का विकास होना शुरू हुआ था, जबकि ओरांगुटान से तो मानव काफी पहले यानी करीब एक करोड़ साल पहले ही अलग हो गया था, इसक बावजूद ओरांगुटान की चाल हम मनुष्यों की चाल से काफी निकट है । वे सीधे होकर चलते हैं, जबकि चिम्पैंजी घुटनों व धड़ को झुकाकर चलते हैं । इससे लगता है कि जब मनुष्य के आदिम पूर्वजों ने जंगल छोड़ा होगा तो उसे ओरांगुटान के इसी कौशल का लाभ मिला होगा । इसे दूसरे शब्दों में यों भी कहा जा सकता है कि धरती पर उतरने से पहले ही आदिम पूर्वजों ने पेड़ों पर ही दो पैरों पर चलना सीख लिया था । जब मायोसीन काल (२.४ करोड़ से ५० लाख साल पहले) में जलवायु में परिवर्तन से जंगलों का घनत्व कम होना शुरू हुआ, तो चिपैंजी व गोरिल्ला एक पेड़ से दूसरे पेड़ तक घुटनों के बल जाने लगे, जबकि अन्य मानव पूर्वज छोटे पेड़ों व धरती पर पड़े फलों को बीनने के लिए दो पैरों का इस्तेमाल कर चलने लगे । लंदन स्थित नेचुरल हिस्ट्री म्यूजियम में जीवाश्म विशेषज्ञ क्रिस स्ट्रिंगर कहते हैं कि थोर्पे का यह विचार नया तो नहीं है, लेकिय यह मानव के दो पैरों पर खड़ा होकर चलने संबंधी विकास यात्रा को समझने में महत्वपूर्ण है । शुरूआती मानव के जीवाश्म बहुत कम मिलते हैं, लेकिन दोपाएपन के विकास संबंधी हालिया विचार की पुष्टि वर्ष १९९२ में अदिस अबासा (इथियोपिया) के पास स्थित एक गांव अरामिस में प्राप्त् होमिनिड या मनुष्य सदृश जीवाश्म से होती है । इसे ऑस्ट्रेलोपेथिकस रैमिडस नाम दिया गया था । यह जीवाम चिम्पैंजी के काफी करीब है । इस प्रकार का जीवाश्म इससे पहले कभी प्राप्त् नहीं किया जा सका था । इसके छोटे कपाल और कृदंत (कैनाइन) के आकार से साफ हो जाता है कि यह प्रजाति बंदर से पहले ही अलग हो गई थी और उसका मानव के रूप में विकास होना ही प्रारंभ हो चुका था । यह जीवाश्म जिस तरह से लकड़ियों के बीच मिला है, उससे भी सिद्ध हो जाता है कि मानव के दूरस्थ पूर्वज जंगल छोड़ने से पहले से ही दो पैरों पर चलने लगे थे । ऑस्ट्रेलोपेथिकस रैमिडस की अनुमानित आयु ४४ लाख साल आंकी गई है, यानी ल्यूसी या आस्ट्रेलोपेथिकस अफारेन्सिस से भी ८ लाख साल पुराना । यह जीवाश्म वर्ष १९७४ में इथियोपिया के अफार व हादर क्षेत्र में पाया गया था। इसे ल्यूसी नाम बीटल्स के गीत ल्यूसी इन दी स्काय विद डायमंड्स से दिया गया था । यह एक मादा का जीवाश्म था । उसके कमर के घेरे से ही पता चलता था कि वह पूरी तरह से दौ पैरों पर चलने वाली प्रजाति का जीवाश्म था । उसके अंदरूनी कान की अर्द्ध वृत्ताकार नलियों से स्पष्ट था कि ल्यूसी ने उछलने व चलने जैसे जटिल कार्य की बजाय ऊपर चढ़ने का काम ज्यादा किया होगा । कान की अर्द्ध वृत्ताकार नलियां दो पैरों पर चलने के दौरान संतुलन बनाए रखने में अहम भूमिका निभाती हे ।दो पैरों पर चलने के लाभ :- चलने में चारों पैरों का इस्तेमाल करने से गति बढ़ जाती है, लेकिन यह भी तय है कि दो पैरों की गति का अपना विशेष महत्व होगा, अन्यथा चार पैरों से दो पैरों में स्वाभाविक प्राकृतिक बदलाव नहीं होता । दो पैरों पर चलने से शरीर के कद में बढ़ोत्तरी हुई । ऊंचेकद से खतरे को दूर से भी देखा जा सकता है और इस प्रकार शत्रु से बचने के लिए अधिक समय मिल जाता है । यही नहीं, सीधे खड़े होकर चलने से शरीर का वजन सभी अंगो पर बराबर पड़ता है, यानी शरीर संतुलित रहता है । इस प्रकार बंदर से मनुष्य में परिवर्तन के क्रम में दौ पैरों की गति एक अहम पड़ाव था । गति संबंधी तीन परिवर्तनों हाथों के सहारे झूलना, आंशिक दोपाया चाल और घुटनों के बल चलने के साथ-साथ एक अहम बदलाव और आया । घ्राण शक्ति कम होती गई और देखने की क्षमता में इजाफा हुआ । यही नहीं, परिवर्तन की हर घटना के बाद मस्तिष्क का आकार भी बढ़ता गया । बंदर प्रजाति के मस्तिष्क का आकार ४०० घन से.मी. होता है जो आधुनिक मनुष्य में बढ़कर १५०० घन से.मी. हो गया है । जैसे-जैसे प्रारंभिक मनुष्य ने दिमाग का इस्तेमाल शुरू किया, उसके शरीर का आकार घटता गया, क्योंकि अब उसे बलिष्ठ शरीर की जरूरत कम पड़ने लगी थी । उसने अपने आसपास के उपादानोंजैसे औजारों व सामान ढोने वाले जानवरों का इस्तेमाल करना सीख लिया था । उसने शिकार करना, पशुआें को चराना और पशुआे के शवों का इस्तेमाल करना भी शुरू कर दिया था । आधुनिक मानव जिस जीनस होमो से संबंध रखता है, उसके जीवाश्मों से पता चलता है कि उसका मस्तिष्क व शरीर दोनों आकार में बड़े थे, लेकिन दांत छोटे थे। इससे साफ है कि होमो जीनस ऑस्ट्रेलोपेथिकस की तुलना में दांतों का इस्तेमाल कम करती थी, क्योंकि वह रेशेदार की बजाय पौष्टिक भोजन खाती थी । दो पैरों की चाल के विकास को प्रकृति से इसलिए भी समर्थन मिला क्योंकि इसमें ऊर्जा की खपत कम होती है । इसकी पुष्टि ट्रेडमिल अध्ययन से भी होती है जिसमें मनुष्य की दो पैरों की गति और चिम्पैंजी की घुटनों के बल चाल का अध्ययन किया गया । इसमें चिम्पैंजी को भी दो पैरों पर चलना सिखाया गया था। शोध पत्र के लेखकों में से एक डेविड राइच्लेन के अनुसार यह अध्ययन इस तथ्य का समर्थन करता है कि ऊर्जा की बचत ने दोपाया चाल के विकास में अहम भूमिका निभाई है । यह अध्ययन हाल ही में प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेस में प्रकाशित हुआ है । सीधे तनकर खड़े होने की मुद्रा की वजह से हाथ मुक्त हो गए जिनका इस्तेमाल फल एकत्र करने और छोटे बच्चें को संभालने में होने लगा । एकत्रित फलों में हिस्सेदारी से पारिवारिक जीवन और पारस्परिक संवाद की नींव पड़ी । कहते हैं इस संवाद से भाषा विकास में भी मदद मिली । ऐसा भी नहीं है कि यह सब कुछ वरदान ही साबित हुआ । तने हुए शरीर का पूरा वजन नीचे की ओर पड़ता है जिससे मेरूदंड की मुलायम डिस्क को नुकसान पहुंचता है । ये मुलायम डिस्क शॉक एब्जॉर्बर का काम करती हैं और भार को पूरे मेरूदंड पर संतुलित कर देती हैं । वृद्धावस्था में डिस्क में से पानी सूख जाता है और वे सख्त हो जाती हैं । ऐसी स्थिति में इन डिस्क पर असामान्य दबाव पड़ने पर वे टूट जाती हैं या उनमें बाहर की ओर उभार आ जाता है । इसी समस्या को आज हम `स्लिप्ड डिस्क' के नाम से जानते हैं । मानव निर्मित कोई भी स्प्रिंग मेरूदंड या रीढ़ की हड्डी से बेहतर काम नहीं कर सकती । जैसे-जैसे हम बूढ़े होते जाते हैं, वैसे-वैसे मेरूदंड के लचीलेपन में कमी आती जाती है । कंधे भी झुकते जाते हैं और इस प्रकार व्यक्ति का पूरा शरीर भी ढलता जाता है । यानी कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि स्वाभाविक प्राकृतिक लाभों ने `सुपर-बंदर' बनाने में भूमिका जरूर निभाई, लेकिन इसकी कीमत भी चुकानी पड़ी है ।

३ विशेष लेख

पर्यावरण और भारतीय दर्शन

डॉ. सुनील कुमार अग्रवाल

दर्शन का अर्थ अमूर्त का चिंतन करने का प्रयास है । जिसके द्वारा आत्मा, परमात्मा, प्रकृति और संपूर्ण जीवन के रहस्य को परिभाषित और उद्भाषित किया जाता है । दर्शन अनेकानेक जिज्ञासाएं जगाता है जैसे जीवन क्या है ? जीवन का हेतु क्या है ? संसार की प्रकृति क्या है? मनुष्य का इस संसार में अवतरण का उद्देश्य क्या है ? ईश्वरीय स्वरूप क्या है ? विकृति क्या है? जीवन-मृत्यु का रहस्य क्या है ? क्या इस दृश्यमान जगत से इतर कोई और लोक भी है ? यथार्थ क्या है? कल्पनाएं क्या है? पूर्नजन्म क्या है? कैसे रह पायेगी प्रकृति हमारी चिर संगनी ? कैसे संरक्षित और सुरक्षित रह सकेगा हमारा पर्यावरण ? इन्हीं तमाम जिज्ञासा मूलक प्रश्नों के गूढ़ार्थो पर चिंतन मनन करना और किसी निष्कर्ष पर ठहरना ही दर्शन है । सत्य से साक्षात्कार ही दर्शन है । सम्यक दृष्टि को पाना ही दर्शन है । संसार का प्रत्येक व्यक्ति अपने संचित अनुभवों के साथ सत्य को जानने का जिज्ञासु होता है । अत: सभी जन जन्मजात दार्शनिक ही होते है । आर.डब्ल्यू. सेलर्स नाम के विचारक ने दर्शन को वह प्रयास बतलाया है जिसके द्वारा हम अपनी प्रकृति के संबंध में क्रमबद्ध ज्ञान द्वारा सूक्ष्म दृष्टि प्राप्त् करने की चेष्टा करते है । सृष्टि मेंसूक्ष्मदर्शी से विशालकाय सभी जीवों में जीवन का अक्षिम मिलता है किंतु जीवन यापन की जीवन जीने की कला जानने वाला ही तो सच्च योगी होता है । वह जीवन को सुंदरतम, अक्षय एवं पर्यावरण तथा प्रकृति से प्रतिपालित अभिव्यक्ति देता है । वह प्रकृति के अन्तरण चेतन्य और प्रकृतिमान बर्हिरंग, दोनों ही रूपिकाआे में सत्य शिव सुन्दर होता है । वह यर्थाथ जीवी होता है । परमार्थ कर्म करता है । शुभाशुभ दोनों ही स्थितियों में सत्य बोलता है । धर्म का आचरण करता है । लोभ का संभरण करता है वह स्वयं को जानता है ब्रह्म को जानता है समस्त सृष्टि में ब्रह्म का दर्शन करता है । आत्म प्रकाशित ओर आत्म प्रभाषित रहता है । वहीं व्यक्ति दूसरों को जान सकता है जो स्वयं को जानता हो , अपनी प्रकृति और पर्यावरण को जानता हो । वह जिज्ञासु होता है तथा उसे अपनी क्षमताआे का ज्ञान होता है । उसे इस बात का भी अनुमान होता है कि वह क्या कुछ और जान सकता है। वह संभावनाशील होता है। वह महिमावंत होता है । वह जानता है कि उसके जीवन का हेतु क्या है, उसे क्या करना चाहिए, उसका पुरूषार्थ क्या है, उसका धर्म क्या है । वस्तुत: वह मर्मज्ञ प्रकृति योगी होता है वह अपने कंधोंपर मृत संवेदनाएं नहीं ढोता है वरन वह आशान्वित रहता है और आशा ही जगाता है । यथार्थ का दर्पण दिखाता है और आदर्श का रास्ता भी । वह भक्ति में विश्वास रखता है विभक्ति में नहीं । वह संघात में विश्वास रखता है आघात में नहीं । वह परमात्मा में अटल विश्वास रखता है । जो परमात्मा में श्रृद्धा रखता है वहीं परात्पर प्रकृति और पर्यावरण को संरक्षित रख सकता है और उसे परिबर्धित कर सकता है । वस्तुत: यही षड् दर्शन का मूल है किंतु हम मूलत्व को भूलकर आकाश कुसुम सजाना चाहते हैं और दूसरी ओर पर्यावरण घ्वंस में संलग्न है । हमें अपनी कुत्साआे को विराम देना ही होगा । प्रकृति को संजोना ही होगा। दर्शन का संबंध विज्ञान से घनिष्ठता का होता है । चूंकि विज्ञान हमें वास्तविकता से परिचित कराता है । यथार्थ का दर्पण दिखाता है । विज्ञान का आधार सुविकसित सुव्यवस्थित ज्ञान होता है जो सदैव प्रकृति और पर्यावरण की चेतना संजोता है । सत्य का संबंध वातावरण से होता है । वह विचारशीलता, विश्वास, रीतियों-नीतियों तथा मूल्यों पर आधारित होता है । पर्यावरण परिरक्षण में आदर्शवाद हमारे दार्शनिक चिंतन का प्रथम सहकार है क्योंकि आदर्शवाद की धारणा है कि भौतिक जगत की अपेक्षा आध्यात्मिक जगत (स्प्रिचुअल वर्ल्ड) अधिक उत्कृष्ट एवं महान है क्योंकि भौतिक जगत मृर्त्य है मरण धर्मा है नाशवान है नश्वर है असत्य है जबकि आध्यात्मिक जगत विचार भावों, आदर्शो, मूल्यों तथा नीतियों पर आधारित है । ज्ञान मन और आत्मा से अभिव्यक्त है। जब हम गहन चिंतन करते हैं तो विचार हमें यथार्थ का बोध कराते है हम यथार्थवादी हो जाते है यथार्थवाद (रीयलिज्म) पदार्थो वस्तुआे के अस्तित्व संबंधी दृष्टिकोण देता है । जो कुछ भी जगत में दृश्य है वही सत्य है कहता है । प्रायोजनवादी (प्रेगमेटिज्म) प्रगतिशीलता को प्रमुखता देता है और क्रियाआे एवं चेष्टाआे पर आधारित होता है । इन सबको सम्यक दृष्टि से दार्शनिक रस्क ने देखा है और अपना नवयथार्थवादी दृष्टिकोण दिया है - ``नव यथार्थवाद का उद्देश्य एक ऐसे दर्शन का प्रतिपादन है जो सामान्य जीवन के सत्य तथा भौतिक विज्ञान के निष्कर्ष के अनुकूल हो ।'' यहाँ इस चिंतन की चर्चा इसलिए की गई है कि पर्यावरण अनुकूलता ही जीवन के लिए नितांत जरूरी है । प्रकृतिवादी (नेचुरेलिस्टक) प्रकृति मनुष्य तथा पदार्थो में केवल प्रकृति को ही सर्वाधिक महत्वपूर्ण मानते है और प्रकृति की ओर लौटने का संदेश देते है । उनके अनुसार प्रकृति में गुरूतत्व होता है प्रकृति ही प्रथम शिक्षिका होती है । प्रकृति और पर्यावरण के कारक हमारी प्रवृत्तियों के विकास में सहायक होते हैं और वही सर्वाधिक प्रभावी भी होते है । हमारा जीवन इतना भौतिकतावादी हो गया है कि प्रकृति की ओर लौट पाना असम्भव प्रतीत होता है । रूसों ने प्रकृति की समीपता पाने पर जोर दिया है । आज आदमी कृत्रिम होकर रह गया है । यंत्रों के बीच काम करता हुआ स्वयं भी यांत्रिक होकर रह गया है । भौतिकतावादी हो गया है । रूसों ने अपनी पुस्तक ``एमील एण्ड एज्यूकेशन'' में सटीक टिप्पणी की है - ``प्रकृति के निर्माता के हाथों में सभी वस्तुएं अच्छे रूप में मिलती है, परन्तु मानव के सम्पर्क में आते ही वे सब दूषित हो जाती है।'' वास्तव में प्रकृति सत्य है शिव है सुन्दर है और महिमावंत है । यह हमारा पाप है कि हमने सौन्दर्यीपृक्त प्रकृति का चेहरा बिगाड़ा है उसमें अतिशय प्रदूषण कर डाला है । यदि दार्शनिक दृष्टि और आध्यात्मिक चिंतन से देखा जाये तो सम्पूर्ण विश्व ही वृहत परितंत्र है और मनुष्य इस तंत्र का एक घटक है साथ ही मनुष्य एक कारक भी है । यदि हमें अपने देह यंत्र को शक्ति सम्पन्न एवं महिमावंत रखना है तो दैहिक यंत्र को ब्रह्मांडीय यंत्र से तालमेल बनाये रखना होगा । गीता में भी कृष्ण ने स्वयं कहा है कि देह यंत्र में आरूढ़ हुए सम्पूर्ण प्राणियों की अर्न्तयामी परमात्मा अपनी माया से, उनके कर्मो के अनुसार भ्रमण कराता हुआ सब प्राणियों के हृदय में स्थित है । (गीता १८/६१) हमारा समग्र जीवन दर्शन प्रभु महिमा का प्रकाशक है । सामवेद में लिखा है -``अरण्योनिर्हितो जातवेदा: ।'' अर्थात सर्वज्ञ परमात्मा रूपी अग्नि, ज्ञान और भक्ति रूपी अरणियों में अथवा देहरूपी अधरारणि में रखा हुआ है। जैसे अरिणयों की रगड़ से अग्नि उत्पन्न होती है वैसे ही ज्ञान और भक्ति के संघात से प्रभु के दर्शन होते हैं । जब हम जीवन दर्शन की बात करते हैं तो कुछ भारतीय व्यक्तित्व हमारे मानस पटल पर स्वयं उभर आते हैं जिन्होंने भारतीय चिंतन की धारा को वैश्विक स्तर पर प्रवाहित किया और प्रकृतिएवं पर्यावरण को व्यापक अर्थवत्ता प्रदान की। महात्मा गांधी उनमें से एक हैं जो सदैव ईश्वरवादी रहे । उन्होंने आत्मा को परमात्मा का अंश मानते हुए राम-रहीम में अभेद दृष्टि का उद्भाष किया :- ``ईश्वर अल्लाह तेरो नाम, सबको सन्मति दे भगवान ।'' गाँधीजी ने ही कहा था कि ``प्रकृति पेट तो सबका भर सकती है किन्तु लालच किसी एक का भी पूरा नहीं कर सकती।'' उन्होंने सत्य अहिंसा प्रेम निर्भयता सजगता शालीनता सच्चिरत्रता और सत्याग्रह की शक्ति को पहचाना, यही था गाँधीजी का व्यवहारिक दर्शन जो सम्पूर्ण परिवेश के रक्षक रूप में आज भी प्रासंगिक है । महान कवि चिंतक विचारक रवीन्द्रनाथ टैगोर का जीवन दर्शन भी आदर्शवाद पर अवलम्बित रहा । सत्यम् शिवम् सुन्दरम् को प्रतिपादित करते हुए उन्होंने ईश्वर को सर्वोच्च् मानव के रूप में स्वीकार कर सृष्टि को ब्रह्म विवर्त अभिव्यक्ति के रूप में ग्रहण किया । उनका विश्वास अद्वैतवाद में अटल रहा । उन्होंने कहा कि हमें ईश्वर को खोजते हुए सत्य को वरण करने का प्रयास करना चाहिए । टैगोर ने सदैव मनुष्य और प्रकृति के बीच समन्वय की बात की, नैतिक मूल्यों को सर्वोपरि माना और राष्ट्रवाद को ऊपर माना। आध्यात्मिक चिंतक और विश्लेषक अरविन्द घोष भी आदर्शवादी थे उन्होंने अपने चिंतन में वेद-वेदान्त को पर्याप्त् महत्व दिया । उन्होंने विकास का लक्ष्य, अखण्ड चिन्मय दिव्य शक्ति और प्रकाश को माना । उन्होंने प्रकृति को संरक्षित, संस्कृति को वरणीय और विकृति को त्याज्य बतलाया । उन्होंने संशय व्यक्त किया कि भौतिक विकासवादी मानव कहीं अतिवादी होकर अपनी सहचरी प्रकृति को ही न झपटने लगे । उनका संशय सत्य सिद्ध हो रहा है यही हमारी चिंता और चिंतन का विषय है । स्वामी विवेकानंद ने जीवन को चुनौती के रूप में संघर्ष का पर्याय माना। उनके अनुसार संघर्ष में उत्तरजीवी ही विजयी होता है । समर्थ ही विजयी होता है । उन्होंने आदर्शात्मक स्थिति में रहते हुए वीरता का आव्हान किया और कहा -``याद रखें वीरता उसमें नहीं है कि हम किसको कितना डरा सकते है ।'' हमें इस बात का गर्व होना चाहिए कि ऐसे पग चिन्ह और पथरेख हमारे जीवन दर्शन की शाश्वत विभूतियों से हमें प्राप्त् हैं । फिर भी हम विनाश के बारूद के ढेर पर खड़े आक्रांत और भयाक्रांत है । इस डर का कारण हमारा अर्न्तमन है । इसी भयता को झटक कर हमें मंगलमयता का वरण करना है । सृष्टि का आदि धारक एवं भर्ता ऋत है, ऋतु चक्र है । जो नियति से निर्धारित है और वही हमारी चेतना को संपादित करता है । नियति का विधान ही भौतिक जगत को संचालित करता है और आध्याम्तिकता के मूल में स्थित परम् सत्य है । देखो ! प्रभु रचित काव्यमय सृष्टि नित्य नूतन और अक्षर जीती है ।``देवस्य पश्य काव्यं न ममार न जीर्यति ।'' इस जैव अजैव सोमित्र जगत की गहनतम दैहिक दैविक भौतिक माँग है उन्नयन और प्रगति । यही तो प्रकृति की परात्पर गति है । यदि इसमें हमारी सन्मति हो तो सब कुछ आदर्श स्थिति में रहे । प्रकृति और पर्यावरण भी अक्षुण्य रहे प्राकृतिक उपादान भी प्रफुल्लित रहे और चहुँओर आह्लाद का प्रेमास्पद पान रहे । चराचर जगत में जो गति, प्रगति, विकास, परिवर्तन नर्तन, और हलचल है वह सब जीवन का और जीवंतता का लक्षण है। हम सभी इसके साथ श्रेयसता से जुड़े रहे और परमात्म चैतन्य रहें ।