शनिवार, 12 जनवरी, 2008

इस अंक में

पर्यावरण डाइजेस्ट इस अंक से अपने प्रकाशन के २२वें वर्ष में प्रवेश कर रही है । विगत २१वर्षो की प्रकाशन यात्रा में हमें हमारे पाठकों, लेखकों और शुभचिंतकों का सहयोग मिला, सहयोग की इसी शक्ति से हम पत्रिका की नियमितता बनाये रख सके । इस अवसर पर हम अपने पाठकों, लेखकों एवं शुभचिंतकों के प्रति हार्दिक कृतज्ञता ज्ञापित करते हैं ।
पत्रिका के इस अंक की शुरूआत वरिष्ठ पत्रकार भारत डोगरा के लेख गणदेवता के सपने अभी भी अधूरे से कर रहे हैं । गणतंत्र दिवस के अवसर पर आम आदमी (गणदेवता) की हालत क्या है इस पर इस लेख में विस्तार से वर्णन है । बांधों, नदियों एवं लोगों के दक्षिण एशिया नेटवर्क (सेन्ट्रल) से जुड़े लेखक बिपिनचंद्र चतुर्वेदी के लेख जलाशयों की जीवंत परमम्परा में प्राकृतिक जल संसाधनों से जुड़े लेखक कनग राजा के लेख भूख से भरती कार की टंकी में कहा गया है कि जैविक इंर्धन हेतु खाद्यान्न का प्रयोग भूख और कुपोषण की समस्या को दुगना कर देगा । चंदौसी उ.प्र. के प्रसिद्ध लेखक डॉ. सुनील कुमार अग्रवाल के लेख वन रहवास और वनवासी में इस बात पर जोर दिया गया है कि हमारा उद्देश्य प्रकृति को, वनों को और वन्य जंतुआे को संभालना है न कि प्रकृति से जुड़े जीवन को उजाड़ना । डॉ. खुशालसिंह पुरोहित के लेख रामचरित मानस में पर्यावरण चेतना में मानस में प्रकृति वर्णन और पर्यावरण चेतना के बिंदुआे की चर्चा की गई है । झाबुआ के प्रसिद्ध समाजकर्मी निलेश देसाई के लेख पशुधन सहेजने की आवश्यकता युवा लेखक जे. सकलेचा के लेख ग्लोबन वार्मिंग : जिम्मेदारी से भागता अमेरिका और दिल्ली की लेखिका निधि जामवाल, मौरीन नन्दिनी और रावलीन कौर के लेख धारावी : वैधानिक लूट का नया औजार भी आप पढ़ेंगे। पत्रिका के स्थायी स्तम्भ पर्यावरण परिक्रमा, ज्ञान-विज्ञान और पर्यावरण समाचार में पर्यावरण जगत मे हो रही नित-नयी हलचलों से आप रुबरु होते हैं । पत्रिका के बारे में अपने विचारों से हमें अवगत करायें ।
:: गणतंत्र दिवस के शुभ अवसर पर हार्दिक शुभकामनाएँ ::
- कुमार सिद्धार्थ

आवरण



संपादकीय

गण तन्त्र से मुक्त कब होगा ?
२६ जनवरी १९५० को हमारे देश में संवैधानिक सरकार की शुरूआत हुई । इसी दिन से प्रत्येक वर्ष २६ जनवरी गणतन्त्र दिवस के रूप में मनाया जाता है । एक सम्पूर्ण प्रभुत्व लोकतन्त्रात्मक गणराज्य का आदर्श हमारा लक्ष्य है । देश के सभी नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार अभिव्यक्ति , विश्वास, निष्ठा और पूजा की स्वतंत्रता, सामाजिक स्तर और अवसर की समानता होगी, ऐसा संविधान में कहा गया है । यह देश का दुर्भाग्य ही है कि स्वतंत्रता के समय सत्ता में जन तो परिवर्तित हो गया लेकिन तंत्र वहीं रहा । अंग्रेजी साम्राज्यवाद में अंग्रेजों ने अपने सत्ता केन्द्रों की सुरक्षा के लिए जिस तंत्र और तंत्रज्ञों का जाल बुना था दुर्भाग्य से हमने जनतंत्र के रूप में इसे ऐसा ही स्वीकार कर लिया यही कारण हुआ कि पुराने नौकरशाह स्वतंत्रता के बाद राजनीतिज्ञो के सेवक या सलाहकार के स्थान पर उनके मालिक हो गए । नौकरशाही के गलत रवैये के कारण ही आज स्थिति यह है कि आम आदमी को उसको सही, जरूरी और सम्भव सहायता नौकरशाहों की दया पर निर्भर है, पटवारी से मुख्य सचिव तक हमारे नौकरशाह सही मालिक होने का अभिनय बखूबी कर रहे हैं और मालिक होने का भ्रम पाले गणदेवता (नागरिक) बेचारा हाथ जोड़कर याचक की भूमिका से अब तक ऊपर नहीं उठ सका है । यह गणतंत्र के नाम पर छलावा नहीं तो क्या है ? सेवा भावना से गरीब के दर्द को समझकर काम कर सकने की भावना किसी भी प्रशासक में नहीं है । आदमी की औकात उनके सामने आंकड़ों के रूप में है कि इतनों की इतनी सहायता देनी है व्यक्ति नहीं लक्ष्य प्रमुख हैं इसलिए रोज लक्ष्यपूर्ति के दावे किये जाते हैं । व्यक्ति की अस्मिता जहां गोण हो जाए इससे ज्यादा दुभाग्यपूर्ण क्षण और क्या हो सकता है ? समाज परिवर्तन में हमारे प्रयास और सरकारी नीतियां इसीलिए असफल हो रही है कि अधिकारियों के मन में आम आदमी के प्रति प्रेम श्रद्धा या आदर का कोई स्थान नहीं है, आम आदमी को अधिकारीगण हिकारत की दृष्टि से देखते है । आज सही गणतंत्र में नागरिक सुविधाआे की दृष्टि से जरूरी हो गया है कि `गण' को तंत्र से जितना सम्भव हो सके मुक्ति को दिशा में ले जाया जाए, तंत्र से पूर्ण मुक्ति ही सच्च्े गणतंत्र की स्थापना में सहायक होगी, जब तक तो गणतंत्र के नाम पर तंत्र वालों की मौज चलती रहेगी । ***

प्रसंगवश

नदी को राष्ट्रीय संपत्ति क्यों नहीं माना जाता?
पिछले दिनोंकेंद्रीय जल संसाधन मंत्री सैफुद्दीन सोज ने यह सुझाव दिया कि देश की प्रमुख नदियों को राष्ट्रीय नदियाँ और राष्ट्रीय संपत्ति घोषित कर केंद्रीय शासन के क्षेत्राधिकार में शामिल किया जाना चाहिए । केन्द्रीय जल संसाधन मंत्री ने ऐसी बारह नदियों को `राष्ट्रीय' घोषित करने का सुझाव दिया है । ये नदियाँ हिमालय व काराकोरम, विंध्य, सतपुड़ा, छोटा नागपुर, सह्यादि व पश्चिमी घाट पर्वत श्रृंखलाआे से निकलती हैं और अरब सागर व बंगाल की खाड़ी में गिरती हैं । गंगा, सिंधु, नर्मदा, कावेरी, महानदी, ब्रह्मपुत्र, कृष्णा, ताप्ती, दामोदर, यमुना, सतलज, चंबल, झेलम आदि नाम अत्यंत श्रृद्धा एवं प्रेम से लिए जाते हैं । देश में १३५०० किलोमीटर लंबी नदियों की अनेक सहायक नदियाँ और शाखाएँ भी हैं । नदियाँ प्रकृति की देन हैं और मानव जाति के विकास, समृद्धि एवं कल्याण की आधार हैं । नदियाँ मानव-सभ्यता के विकास का स्त्रोत रही हैं । उनसे जो जल प्राप्त् होता है, वह पीने के पानी के अलावा मानवीय स्वास्थ्य, कृषि, उद्योग, व्यवसाय, परिवहन, निर्माण कार्य, सफाई और बिजली उत्पादन के लिए भी काम आता है । सिंचाई और विद्युत के लिए इतनी खास जरूरत है । मगर इन नदियों पर किसी खास स्थान, क्षेत्र, राज्य का आधिपत्य स्वीकार कर हम दूसरे राज्य के लोगों को नदी के कारण मिलने वाले लाभों से वंचित कर देते हैं । भारतीय संविधान में `जल' को राज्यों के क्षेत्राधिकार वाली सूची में रखा गया है। इसलिए नदी के जल को लेकर अनेक मौकों पर विभिन्न राज्यों में परस्पर विवाद चलते रहते हैं । कम से कम उन नदियों को जो एक से अधिक राज्यों के क्षेत्र में बहती है, राष्ट्रीय नदी घोषित करना चाहिए और अंतरराज्यीय विवादों से मुक्त कर देना चाहिए । भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची की ५६वीं प्रविष्टि में केन्द्र को अधिकार दिया गया है कि वह अंतरराज्यीय नदी विवादों का निराकरण कर सकता है । मगर नदी का उद्गम, प्रवाह क्षेत्र और निस्तार अलग-अलग राज्यों में हो और प्रत्येक राज्य उसके जल पर अपना दावा करें और क्षेत्रीय तत्व अपना प्रभुत्व दिखलाना चाहे तो विकास का सिलसिला धीमा होना स्वाभाविक है । आखिर नदी तो प्रकृति की देन है और जल का निर्माण मनुष्य या राज्य नहीं करता है । जैसे देश की धरती पूरे देश की है, वैसे नदी भी पूरे देश की है, यह मानने में किसी को आपत्ति क्यों होनी चाहिए ? नदी किसी एक स्थान या क्षेत्र की नहीं हो सकती है ।इस भावना से नदी विवादों को सुलझाया जाना चाहिये । ***

१ गणतंत्र दिवस पर विशेष

गणदेवता के सपने अभी भी अधूरे
भारत डोगरा
भारत की आजादी की लड़ाई एक महान उद्देश्य के लिए त्याग और बलिदान की गौरवशाली गाथा है । विश्व में जब भी किसी महान उद्देश्य के लिए अपना सब कुछ लुटा देने के उदाहरण खोजे जाएंगे, तो भारत का स्वतंत्रता संग्राम ऐसे प्रेरणादायक प्रसंगों के लिए विशेष तौर पर समृद्ध सिद्ध होगा । चाहे वह शोषक-लुटेरे विदेशी शासकों के विरूद्ध बंदूक-तलवार उठाने वालों के संघर्ष हों या अहिंसात्मक संघर्ष की राह का अनुकरणीय उदाहरण दुनिया भर के सामने रखने के ऐतिहासिक सत्याग्रह हों, दोनों में मातृभूमि को विदेशी शोषण से मुक्त कराने के लिए हंसते-हंसते अपना जीवन न्यौछावर करने के अनेक उदाहरण मिल जाएंगे । आज का एक सुलगता सवाल यह है कि क्या आजादी के साठा वर्ष बाद देश इस स्थिति में है कि हम कह सकें कि हमने आजादी के इन दीवानों व स्वतंत्रता समर से शहीदों के सपने पूरे किए? बहुत दु:ख से कहना पड़ता है कि इसका उत्तर निश्चित तौर पर `नहीं' ही है। आजादी के बाद देश ने भले ही कई महत्वपूर्ण सफलताएं अर्जित की हो पर स्वाधीनता समर के वीरों के सपनों को देश साकार नहीं कर सका है । हम उन वीरों के आदर्श प्राप्त् करने में तो विफल रहे ही हैं, परंतु अब तो हम कम से कम इतनी ईमानदारी तो दिखा दें कि अपनी इस विफलता को स्वीकार करें । यह कोई निराशा उत्पन्न करने वाली बात नहीं है । अपितु यह स्वीकृति तो इसलिए है कि हम ऐसे आत्म-मंथन की ओर ले जाएगी जिससे शहीदों के जो सपने हम अब तक साकार नहीं कर सके हैं कम से कम अब उनकी ओर बढ़ने का प्रयास तो करेंगे । इस दिशा में पहला प्रयास तो यह समझ बनाने का है कि आजादी की लड़ाई के सपनों के अनुकूल आज के भारत में क्या होना चाहिए ? निश्चय ही आजादी की लड़ाई के कई आयाम थे । पर इसका सबसे महत्वपूर्ण पक्ष था कि यह शोषण और लूट के विरूद्ध लड़ाई थी । ऐसी शोषण व लूट जिसने लगभग दो सौ वर्षो में दुनिया के समृद्ध माने जाने वाले एक देश को दुनिया के सबसे अभावग्रस्त देशों में बदल दिया था । अत: आजादी के बाद का एक महत्वपूर्ण कार्य यह था कि हर प्रकार और स्तर के शोषण को मिटाना । इस तरह से जो कार्य विदेशी शासन से मुक्ति से आरंभ हुआ था उसके मूल उद्देश्य को प्राप्त् किया जा सके । पर देश के करोड़ों लोग आज भी तरह-तरह के शोषण में पिस रहे हैं । मेहनत करने के बावजूद या मेहनत करने की पूरी तत्परता के बावजूद वे जीवन की सबसे बुनियादी आवश्यकताआे की पूर्ति भी नहीं कर पा रहे हैं । देश की आधी से अधिक आबादी आज भी बुनियादी जरूरतों को पूरा नहीं कर पाती है । इसके बावजूद विषमता को बढ़ने दिया जा रहा है । साधारण किसान, मजदूर, छोटे-छोटे कई व्यवसायों में लगे लोगों की रोजी-रोटी छीनने वाली नीतियां अपनाई जा रही हैं । बड़े व्यवसायियों के लिए अरबों रूपए की छूट सरकारें आसानी से देती हैं पर छोटे किसानों-मजदूरों के लिए कंजूस बन जाती है । आजादी के कुछ वर्ष बाद तक ऐसा लगता भी था कि नए आजाद हो रहे देशों की एकता व स्वतंत्र नीतियां अपनाने में साथ ही इन्हेंं बड़े देशों के प्रभुत्व से मुक्त रहने में भारत की महत्वपूर्ण भूमिका होगी । पर धीरे-धीरे भारत विकासशील देशों की एकता पर आधारित इस अग्रणी भूमिका से पीछे हटता गया । अब तो कई बार वह फिर से साम्राज्यवादी ताकतों के पिछलग्गू जैसा नजर आने लगा है । यह दुनिया भर में माना जाता रहा है कि अमेरिका के वर्तमान राष्ट्रपति बुश के शासन में अमेरिकी साम्राज्यवाद अपने सबसे आक्रामक रूप में सामने आया है और सबसे लोकप्रिय भी हुआ है । परंतु इसी दौर में भारत ने अमेरिका से संबंध प्रगाढ़ करने पर सबसे अधिक ध्यान दिया और वह भी इस आधार पर जिससे उसकी संप्रभुता पर प्रतिकूल असर पड़ता हो । यह सच है कि अपनी विशालता के कारण भारत को सदा विकासशील देशों के मंचों पर महत्वपूर्ण स्थान मिलता रहेगा, पर अब उसमें पहले जैसी गरिमा व मजबूती नहीं रही । यह तभी पुन: प्राप्त् होगी जबकि दुनियाभर के गरीब देशों की भलाई के प्रयासों में भारत आगे आए और इसके लिए साम्राज्यवाद के सामने मजबूती से खड़े होने की हिम्मत दिखाए । आजादी के दीवानों का सपना तो तभी पूरा होगा जब विश्व मंच पर भारत की आवाज पूरी तरह अपनी स्वतंत्र आवाज होगी जिसमें साम्राज्यवादी शोषण का विरोध करने की हिम्मत भी होगी । देश का इतिहास बहुत पुराना व कई मामलों में शानदार रहा है । इसकी समृद्ध विरासत रही है । पुरानी सभ्यता तरह-तरह के क्षेत्रों में प्रयोग कर बहुत सा ज्ञान अर्जित करती है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी कृषि, पशुपालन, उद्योग, शिल्प, कलाआे आदि को समृद्ध करती रहती है । देश पर अंग्रेजी शासन और विदेशी लाभ को नीतियों का आधार बनाया गया इससे देशवासियों की क्षमताआे का यह स्वाभाविक विकास कई तरह से अवरूद्ध हो गया । आजादी के दीवाने चाहते थे कि विदेशी शासन को हटाकर पुन: भारतवासियों को अपनी क्षमताआे के विकास के भरपूर अवसर दिए जाएं । आजादी के बाद यह कार्य अपेक्षा के अनुकूल इसलिए नहीं हो सका क्योंकि विकास की सोच व मॉडल पश्चिमी सोच व असर से बुरी तरह त्रस्त रहे । यहां तक कि खेती-किसानी व पशुपालन के विकास में भी अपने ५००० वर्ष से एकत्र होते रहे ज्ञान की उपेक्षा कर बाहरी एजेंडे को अपनाया गया । जो कुछ भी अपना था उसे पिछड़ा बताया गया और जो कुछ बाहर से आया उसे विकास माना गया । विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष व विश्व व्यापार संगठन को इतनी घुसपैठ करने दी गई जिससे कि भारतीय कृषि, उद्यम व उद्योग को गंभीर क्षति पहुंची । सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को विदेशी हितों व बड़े व्यापार के दबाव में बंद होने दिया गया । छोटे स्तर पर कार्य करने वाले तरह-तरह के उद्यमियों के लिए इतनी कठिनाईयां उत्पन्न की गइंर् कि उनकी रचनात्मकता लिखले से पहले ही मुरझा गई । इसके फलस्वरूप तरह-तरह के शोषण पर टिके वह बेइंतहा पर्यावरण की तबाही करने वाले पश्चिमी/विकसित देशों के विकास मॉडल से अलग एक समता व सादगी पर आधारित टिकाऊ विकास का उदाहरण उपस्थित करनेकी जो भूमिका भारत को निभानी चाहिए थी, वह उसमें असफल रहा । विकास के क्षेत्र में भी वह पश्चिमी देशों के पिछलग्गू के रूप में अधिक नजर आने लगा व अपनी स्वतंत्र पहचान न बना सका । आजादी की लड़ाई के दौरान अपने समाज का सिर्फ गौरवगान ही नहीं किया गया था, अपितु उसकी कुरीतियों से लड़ने का आव्हान भी बार-बार हुआ। चाहे वह छूआछूत की प्रथा हो या महिलाआे से अन्याय की, इन विभिन्न तरह के पिछड़ेपन व कुरीतियों का विरोध भी हमारी आजादी की लड़ाई के साथ जुड़ा रहा हैं । अत: आजादी की लड़ाई समग्र संदेश तो यह था कि अपनी परंपरा की गौरवशाली अच्छाईयों से जरूर सीखो पर साथ ही उन बुराईयों को छोड़ना भी जरूरी है जिनके कारण हम कमजोर हुए व गुलाम बने । इस तरह से यह संग्राम केवल विदेशी शासकों को निकलाने का नहीं अपितु समाज के नवनिर्माण का संदेश भी था । पर इस नवनिर्माण के लिए जो प्रेरणादायक माहौल आजादी के बाद बना रहना चाहिए था, वह निरंतर धूमिल पड़ता गया । अंतत: बात यहां तक आ पहुंची कि उन आदर्शो व बलिदानों को तेजी से भुलाया जाने लगा जिन्हें प्रेरणा स्त्रोत बनाना चाहिए था । अभी भी समय है कि आजादी की लड़ाई के दीवानों के सपनों को सच करने के लिए नए सिरे से प्रयास तेज हों। शोषण और विषमता को दूर कर मजदूर-किसानों सब मेहनतकशों को न्याय दिलाना उच्च्तम प्राथमिकता बनना चाहिए । साम्राज्यवाद के आक्रामक होते तेवरों से न केवल अपनी कृषि व उद्यम बचाने चाहिए बल्कि ऐसे व्यापक अभियान में अन्य विकासशील देशों की एकता के प्रयास तेज करने में भी भारत को मुख्य भूमिका निभानी चाहिए । नव-औपनिवेशिक सोच से मुक्त होकर मौलिक सोच के आधार पर अपने देश व समाज की प्राथमिकताएं तय करनी चाहिए । विभिन्न क्षेत्रों का विकास अपनी समृद्ध परंपरा व भौगोलिक स्थितियों के आधार पर होना चाहिए । इस तरह हम अपनी क्षमताआे का भरपूर उपयोग कर न केवल अपने देश की गरीबी व अभाव दूर करेंगे बल्कि अन्य गरीब पिछड़े देशों की सहायता करने के लिए भी न केवल स्वयं तैयार रहेंगे बल्कि इस हेतु साम्राज्यवादी ताकतों का सामना करने के लिए भी तैयार रहेंगे, तभी आजादी के दीवानों ने गणतंत्र के गणदेवता के लिए जो स्वप्न संजोये थे वे सपने पूरे होंगे । ***

२ सामयिक

जलाशयों की जीवंत विरासत
बिपिनचंद्र चतुर्वेदी
प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग, संरक्षण एवं विनाश के सन्दर्भ में हमें तीन प्रमुख वैश्विक प्रवृत्तियां नजर आती हैं । पहली, जो उपयोग से ज्यादा संरक्षण पर ध्यान देती है । दूसरी, जो प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग के साथ-साथ उनकी समािप्त् से पहले सचेत होकर संरक्षण के लिए जुट जाती है । तीसरी, जो उपयोग तो विनाशक स्तर तक करती है लेकिन संरक्षण बिल्कुल नहीं करती । आज के परिवेश में ज्यादातर लोग तीसरी प्रवृत्ति के पोषक नजर आते हैं, इसीलिए जनोपयोगी प्राकृतिक संसाधनों का धीरे-धीरे विलोप हो रहा है । यह बात जगजाहिर है कि भारत में प्राचीन तालाबों, जोहड़ों व कुण्डों की मौजूदा हालात बहुत ही दयनीय है एवं उचित संरक्षण के अभाव में यह और भी बिगड़ती जा रही है । विभिन्न क्षेत्रों के तालाबों व कुण्डों की जानकारी समेटने की महत्वूपर्ण कोशिश कई अलग-अलग लोगों ने की है । लेकिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जलाशयों की ऐतिहासिक विरासत को दस्तावेजों में समेटने का संगठित प्रयास मेरठ स्थित ``जनहित फाउंडेशन'' द्वारा किया गया है । इस शोध कार्य को अंजाम देने वाले हरिशंकर शर्मा के अनुसार उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती यह आई कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जलाशयों पर छोटी-बड़ी कोई भी पुस्तक उपलब्ध नहीं थी । वैसे नई दिल्ली स्थित सेन्टर फॉर साइंस एंड इनवायमेंट (सीएसई) ने सन् १९९७ में प्रकाशित ``डाइंग विजडम'' में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ प्रमुख तालाबों का वर्णन मिलता है । इसके बावजूद यह नवीनतम दस्तावेज इस क्षेत्र में तालाब व अन्य जल स्त्रोतों की जानकारी प्राप्त् करने का अच्छा माध्यम है । ``पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जलाशय: ऐतिहासिक विरासत'' नामक पुस्तक में उन्होंने तालाबों व कुण्डों की प्रमुख जानकारी जुटाने के साथ-साथ उनके ऐतिहासिक सरोकारों को प्राचीन धर्मग्रंथों से खोजने की जहमत भी उठाई है । मेरठ जिले का ``सूरज कुण्ड'' अत्यधिक महत्वपूर्ण तालाब था, जो अब पूर्ण रूप से सूख चुका है । एक मील क्षेत्र में फैले इस तालाब का अस्तित्व गंगनहर बनने के बाद तक तो कायम था । आबू नाला बनने के बाद शहर का गंदा पानी आने से इस तालाब की मौत हो गई । सन् १९८० ई. में बना ``श्री राम ताल'' ४० वर्ष पूर्व तक गंग नहर से भरे जाने तक तो जीवित था, लेकिन बाद में जब इसे नलकूपों से भरा जाने लगा तो यह तालाब सूख गया । मध्य काल में मेरठ से गढ़मुक्तेश्वर मार्ग पर किठौर कस्बे के चारों और ``किठौर के तालाब'' काफी प्रसिद्ध थे । अब सिर्फ उत्तर व दक्षिण के तालाब ही शेष बचे हैं और दक्षिण तालाब १२५ एकड़ से सिकुड़ कर सिर्फ ४० एकड़ में ही रह गया है । मोदीनगर के समीप ढिडाला गांव में करीब ४० बीघे में फैले ``प्राकृतिक झील'' के आस-पास जाड़े के मौसम में प्रवासी पक्षी भोजन के तलाश में आज भी यहां आते हैं । इस तरह मेरठ जिले में ही पिलोखड़ी का तालाब, लुप्त् नवचण्डी ताल, लुप्त् सरोवर, श्रीराम ताल, पक्का तालाब, दुर्वासा ताल, गंधारी तालाब, कौशिकी तालाब, जरत्कारू ऋषि का तालाब, जाटों का तालाब, बूढ़ी गंगा झील, शहजहांपुर का तालाब, नंगली ताल, गंगाल तालाब, सेठों का तालाब, करनावाल का तालाब आदि अपना स्वर्णिम इतिहास समेटे हुए दुदर्शा की गाथाएं कह रहे हैं । मुजफ्फरनगर जिले में अति प्राचीन ``मोती झील'' का पानी किसी समय मोती के समान स्वच्छ हुआ करता था । यह जलाशय मौजूदा काली नदी के अस्तित्व में आने से पहले से मौजूद था, यह नदी भी आज काफी उथली होकर सिकुड़ चुकी है । शामली तहसील में महाभारत कालीन प्राचीन तालाब ``हनुमान टीला'' को स्थानीय युवकों ने करीब ढाई साल की मेहनत के बाद जीर्णोद्धार करके भव्य बना दिया है । कैराना कस्बे में स्थित ``नवाबों का तालाब'' का जीर्णोद्धार शाहजहां के वंशज हकीम मुकर्रब खान ने कराया था। इस कस्बे में महाभारत काल में कर्ण द्वारा निर्मित ३६० विशाल कुआें का जिक्र भी आता है, वर्तमान में इनमें से २-४ के ही अवशेष प्राप्त् होते है । जानसठ तहसील के बिहारी गांव में स्थित ``कांच का तालाब'' के बारे में कहा जाता है कि महाभारत काल में मीलों तक फैलेपाण्डवों के विहार स्थल के मध्य में स्थित इस भव्य व विशाल तालाब के समीप ही कौरव-पाण्डव की निर्णायक द्यूत क्रीड़ा सम्पन्न हुई थी । आज वह एक घांस-फूंस-जंगली वनस्पति से अटा हुआ पानी से युक्त लगभग १००० मीटर का गड्ढा मात्र रह गया है । तालाब में पहले स्वर्ण निर्मित सीढ़ी होने के कारण इसे कंचन ताल कहा जाता था, जो बाद में अपभ्रंश होकर ``कांच का तालाब'' कहलाने लगा । बुढ़ाना से तीन किमी दूर स्थित महाभारत काल से भी प्राचीन ``बनी का तालाब'' करीब ६ एकड़ में फैला है । महाभारत काल में द्वैपायन नाम से प्रसिद्ध इस तालाब के बारे में कहा जाता है कि मृत्यु से पूर्व दुर्योधन इसी में छिपे थे । जानसठ तहसील में ही १८वीं शताब्दी में मराठो द्वारा मन्दिर, तालाब व कुंए बनवाए गये थे, जिसमें से एक ``चार दीवाली वाला कुआं'' का पानी आज भी अपने औषधीय गुणों के कारण जाना जाता है । आजादी के बाद भी इस विशाल कुएं से आस-पास के कई गांववासी पेयजल लेते थे एवं इससे थोड़ी बहुत सिंचाई भी होती थी । इसी तालाब में मुंझैड़ा गढ़ी गांव में अष्टभुजी १६ मीटर गोलाई का ``बाय वाला कुआं'' (बावड़ी) में आज भी भरपूर पानी रहता है । इस क्षेत्र में आज भी उस काल में ५३ छोटे बड़े कुएं व बावड़ी मौजूद हैं । मवाना-बिजनौर मार्ग पर बहसूमा कस्बे में १८वीं शताब्दी में तत्कालीन शासक जैतसिह ने महाभारत कालीन चिन्हों को देखकर एक विशाल तालाब बनवाया था, जो ``जैतसिंह का तालाब'' के नाम से जाना जाता है । उस समय यह तालाब स्थानीय आवश्यकताआे के साथ-साथ बाहरी आक्रमणकारियों से रक्षा भी करता था । गौरवपूर्ण अतीत वाला यह तालाब सन् १९९५ तक अतिक्रमण विहीन एवं स्वच्छ पानी से लबालब था, जो अब अतिक्रमण से आधा रह गया है । जिले में मीरापुर से दक्षिण-पश्चिम में मौजूद १०० बीघे में फैला ``कच्च-पक्का तालाब'' कुछ जाट युवकों के प्रयत्न से अतिक्रमण से बचा हुआ है । महाभारत काल से बसे हुए नगर कांधला के चारो तरफ करीब १२ बड़े तालाब हुआ करते थे । मुगल काल में इन बड़े एवं कई छोटे-छोटे तालाबों को नहरों के माध्यम से आपस में जोड़कर प्रभावी जल निकासी के साथ-साथ सिंचाई के उपयोग में लाया जाता था । इन तालाबों के आपसी सम्पर्क को सड़क आदि विभिन्न आधुनिक निर्माणों के माध्यम से बाधित किये जाने से अब ये तालाब समाप्त् होते जा रहे हैं । इनके अलावा जिले में कई ऐतिहासिक तालाब जिनका थोड़ा-बहुत अस्तित्व बरकरार है उनमें कुटी तालाब, देवी मन्दिर वाला तालाब, ज्ञानेश्वर ताल, हास कुण्ड, टन्ढे़डा के तालाब, मीरापुर के तालाब, भंराई वाला तालाब, सतियों वाला तालाब, एवं शेखपुर का तालाब प्रमुख हैं । गाजियाबाद जिले में, ऐतिहासिक दूधेश्वर महादेव मन्दिर व सरोवर, नृग का कुआं सहित नौ सरोवर एवं कुआे का वर्णन किया गया है । इनमें से हसनपुर की ``प्राकृतिक झील'' आज भी बहुत विशाल भूभाग में फैली हुई है । जिले के मसूरी औद्योगिक क्षेत्र में दादरी मार्ग पर ३५ हेक्टेयर क्षेत्र में फैली इस झील के एक तिहाई हिस्से में पानी है एवं शेष नमभूमि है । यह विदेशी पक्षियों का प्रवास स्थल माना जाता है । जिले में लालकुआं से डेढ़ कि.मी. की दूरी पर स्थित ``कुत्ते के तालाब'' के बारे में कहावत है कि इसमें नहाने मात्र से कुत्ते के काटे का असर समाप्त् हो जाता है । मोदीनगर से लगभग ६ कि.मी. दूर मछरी गांव के पास २० एकड़ में फैला ``सिद्ध बाबा कौड़िया तालाब'' के बारे में कहावत है कि इसमें नहाने से चर्म रोग दूर हो जाता है । करीब ५०० वर्ष पूर्व प्राकृतिक तालाब के इस गुण को महसूस करके एक बनजारे ने इस विशाल तालाब का स्वरूप दिया था । बागपत जिले में राम ताल, सेठों का तालाब एवं हिण्डन झील के बारे में वर्णन किया गया है । जिले में मात्र तीन तालाबों के बारे जिक्र आता है और वो भी जीर्ण-शीर्ण अवस्था में हैं । किसी समय हिण्डन नदी मौजूदा ``हिण्डन झील'' से होकर बहती थी और आगे धूमकर वर्तमान नदी की धारा के स्थान पर आ जाती थी । बाद में नदी के किनारों को बांध देने के पश्चात नदी का यह पुराना स्थल झील में बदल गया, जो अब सूखकर समाप्त् होने के कगार पर है । मध्य काल में उपरोक्त तालाब ज्यादातर सिंचाई के लिए इस्तेमाल किए जाते रहे हैं, लेकिन आज इनमें से मात्र कुछ ही सिंचाई के लिए इस्तेमाल होते हैं । भारत सरकार के जल संसाधन मंत्रालय के पास सूक्ष्म सिंचाई परियोजनाआे के नवीनतम उपलब्ध आंकड़ों पर यदि नजर डाले तो सन् २०००-०१ में इन चार जिलों में मात्र पांच तालाबों में ही सिंचाई क्षमता तैयार की गई हैं । उनमें से गाजियाबाद जिले में ३ तालाब सिंचाई के लिए इस्तेमाल होते हैं, जबकि बागपत जिले के दो तालाब सिंचाई के लिए इस्तेमाल ही नहीं होते हैं। इस तरह सन् २०००-०१ में तालाबों से सकल रूप से २९१ हेक्टेयर सिंचाई क्षमता (पूर्ण क्षमता) का इस्तेमाल हुआ । पश्चिमी उत्तर प्रदेश के चार जिलों में मात्र ६२ तालाबों एवं कुण्डों के बारे में संक्षिप्त् जानकारी निश्चित तौर पर आंखे खोलने वाली है, जिससे पता लगता है कि उनमें से ज्यादातर आज या तो लुप्त्प्राय स्थिति में है या फिर जलविहीन । इन तालाबों व कुण्डों के लुप्त् होने का एक प्रमुख कारण यह है कि आधुनिक विकास की चाहत में एक तरफ तो इनके जलग्रहण क्षेत्रों को अवरूद्ध किया जा रहा है, दूसरी तरफ प्राकृतिक जल स्त्रोतों के जल निकास मार्ग को बाधित किया जा रहा है । विकास के दौर में इनकी प्रासंगिकता बरकरार रखना इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि ये स्थानीय आवश्यकता की पूर्ति के साथ-साथ प्रकृति चक्र में एक कड़ी के तौर पर कार्य करते हैं । शोधकर्ता द्वारा जुटाये गये कई महत्वपूर्ण जानकारियों के स्त्रोत का उल्लेख नहीं होने से यह दस्तावेज कुछ अधूरा सा लगता है । इन संसाधनों की जमीनी सच को उजागर करने के बाद लेखक इनके भावी उपायों के बारे में जिक्र करते तो यह दस्तावेज और बेहतर बन सकता था । इन तालाबों व कुण्डों के बारे में वर्तमान सच जानने के बाद भी क्या इनके संरक्षण के बजाय इन्हें इनके हाल पर छोड़ना उचित होगा ? इनके संरक्षण के लिए यदि अब भी चेतना नहीं आती है तो शायद आगामी पीढ़ी इनके अस्तित्व के बारे में सिर्फ ऐसे ही कुछ दस्तावेजों के माध्यम से ही जान सकेगी । ***

३ हमारा भूमण्डल

भूख से भरती कार की टंकी
कनग राजा
`वैश्विक स्तर पर भूख की समस्या में लगातार वृद्धि होती जा रही है । आज भूख से पीड़ित व्यक्तियों की संख्या ८५ करोड़ से अधिक हो गई है । साथ ही १९९६ से इसमें लगातार वृद्धि भी हो रही है ।' ये कथन संयुक्त राष्ट्र संघ के भोजन के अधिकार संबंधी विशेष दूत जीन जिगलर के हैं । न्यूयार्क में संयुक्त राष्ट्र संघ महासभा के अक्टूबर में सम्पन्न ६२वें अधिवेशन में प्रस्तुत एक रिपोर्ट (ए/६२/२८९) में अधिकार विशेषज्ञों ने स्पष्ट तौर पर कहा है कि १९९६ में हुए पहले विश्व खाद्य सम्मेलन और शताब्दी सम्मेलन २००० में सरकारों द्वारा भूख घटाने के वादे के बावजूद इस दिशा में कोई प्रगति नहीं हुई हैं । जीन जिगलर का कहना है कि `प्रतिवर्ष ६० लाख से अधिक बच्च्े पांच वर्ष की उम्र के पूर्व ही भूख या भूख संबंधित बीमारियों की वजह से असमय मौत का शिकार हो जाते हैं ।' अपनी बात को विस्तार देते हुए उन्होंने कहा है कि `यह स्थिति पूर्णतया अस्वीकार्य है । सभी मनुष्यों को गरिमामय, स्वतंत्र व भूख रहित जीवन जीने का अधिकार है । भोजन का अधिकार एक मानवाधिकार ही है ।' स्थितियों पर खेद व्यक्त करते हुए वे कहते हैं कि अपने सात साल के कार्यकाल के बावजूद वे भोजन के अधिकार से वंचित व्यक्तियों की संख्या में कमी अपनी रिपोर्ट में नहीं दर्शा पाए हैं । बल्कि इसके ठीक विपरीत चीन, भारत, दक्षिण अफ्रीका और अनेक लेटिन अमेरिकी और केरेबिन देशों में वास्तविक उन्नति के बावजूद भूख और कुपोषण से पीड़ितों की संख्या में न्यूनतम कमी ही आई है । अधिकार विशेषज्ञों का कहना है कि भूख और अकाल अपरिहार्य नहीं है। ख़ाद्य एवं कृषि संगठन (एफ.ए.ओ.) के अनुसार विश्व पूर्व से ही इतने खाद्यान्न का उत्पादन करता है जो न केवल प्रत्येक बच्च्े, महिला व पुरूष की भूख शांत कर सकता है बल्कि इससे १२ अरब लोगों को भोजन मुहैया करवाया जा सकता है जो कि विश्व की वर्तमान जनसंख्या से दुगनी बैठती है । उनका प्रश्न यह है कि `हमारा विश्व आज पहले के मुकाबले अधिक संपन्न है, इसलिए प्रतिवर्ष ६०लाख बच्चेंका भूख और उससे संबंधित बीमारियों से प्राण त्यागने को कैसे स्वीकार्य किया जा सकता है ?' अपनी रिपोर्ट में उन्होंने महासभा का ध्यान दो उभरते हुए मुद्दों पर खींचा है। पहला है जैविक इंर्धन की वजह से भोजन के अधिकार पर पड़ने वाला जबरदस्त नकारात्मक प्रभाव और दूसरा उन्होंने भूख, अकाल और उपवास के कारण अपना देश छोड़कर विकसित देशों में शरण ले रहे व्यक्तियों के मानवाधिकारों के हनन के संबंध में तुरंत हस्तक्षेप की आवश्यकता । अपने निष्कर्ष और अनुशंसाआे में उन्होंने कहा है कि सभी राष्ट्रों को यह स्वीकारोक्ति करते हुए कि उनके प्रत्येक नागरिक को भोजन का अधिकार है, इस दिशा में तुरंत कार्यवाही करना चाहिए । साथ ही सभी राष्ट्रों को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि उनकी अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक और आर्थिक नीतियां जिनमें कि अंतर्राष्ट्रीय व्यापार समझौते भी सम्मिलित हैं, से अन्य देशों के भोजन के अधिकार पर नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए । इस संदर्भ में जिगलर का कहना है कि यूरोपियन यूनियन सरकारें, अफ्रीकी, केरेबियन व पेसिफिक देशों से आर्थिक साझेदारी समझौते के तहत यह सुनिश्चित करें कि इन समझौतों से उनकी खाद्य असुरक्षा और भूख में वृद्धि न हो । विशेष दूत ने अपनी रिपोर्ट में साधारण सभा का ध्यान हाल ही में भोजन अधिकार से संबंधित कुछ अत्यंत सकारात्मक बिंदुआे की ओर खींचा है । ये हैं :-१. छ: अफ्रीकी देशों और संयुक्त राष्ट्र संघ ने मिलकर एक योजना तैयार की है जिसमें अफ्रीका में भूख की बढ़ती मूलभूत समस्या से निपटने का प्रयास किया गया है ।२. बोलिविया की सरकार ने एक ऐसा शून्य कुपोषण कार्यक्रम प्रारंभ किया है जिसके अंतर्गत बोलिविया के तेल और गैस के उत्पादन पर लगा अतिरिक्त कर सीधे शून्य कुपोषण कार्यक्रम को जाएगा ।३. लेटिन अमेरिकी और केरेबियन अंचल ने एक ऐसा आंचलिक कार्यक्रम अपनाया है जिसके अंतर्गत सामूहिक रूप से भूख को समाप्त् करने और खाद्य सुरक्षा प्रदान की जाएगी । इन शक्तिशाली प्रयत्नों में प्रत्येक को भरपूर खाद्य की भावना भी सन्निहित है । विशेष दूत ने यूरोपियन यूनियन और अफ्रीकी, केरेबियन व पेसेफिक देशों (ए.सी.पी.) के साथ हुए आर्थिक समझौतों पर विशेष टिप्पणी करते हुए सभी देशों खासकर यूरोपियन यूनियन का ध्यान इस ओर दिलाया है कि इससे विकासशील विश्व के गरीब किसानों के भोजन के अधिकार पर विपरीत प्रभाव न पड़े । अत्यधिक व्यापारिक खुलेपन से भी वे काफी चिंतित दिखे । उनका सोचना है कि इन ए.सी.पी. देशों के किसान किस प्रकार यूरोपियन यूनियन द्वारा अनैतिक रूप से दी जा रही अत्यधिक सब्सिडी का मुकाबला कर पाएंगे ? उनका कहना थ कि इन देशों में ८० प्रतिशत लोग कृषि पर आश्रित हैं और जहां रोजगार के वैकल्पिक साधन भी नहीं है वहां यह अन्यायी प्रतिस्पर्धा तो बर्बादी ही लाएगी । इसके अतिरिक्त इन नए आर्थिक साझेदारी अनुबंधों से ए.सी.पी. देशों की सरकारों के वाणिज्य में भी जबरदस्त कमी आएगी जो कि काफी हद तक आयात शुल्क पर निर्भर हैं । जैसे ही यूरोपियन यूनियन के देशोंके लिए शुल्क में कमी होगी वैसे ही इन देशों को अपने सामाजिक कल्याण के कार्यक्रमों में कटौती करना पड़ेगी । विशेष दूत ने भूख के संदर्भ में जैविक इंर्धन पर गहरी चिंता दर्शाई है । उनका कहना है कि खाद्य फसलें जैसे मक्का, गेहूं, शक्कर, पाम आईल को बिना वैश्विक भूख को दृष्टिगत रखते हुए कार इत्यादि के इंर्धन के तौर पर इस्तेमाल करने के विनाशकारी परिणाम निकल सकते हैं। एक अनुमान के अनुसार कार की टंकी को भरने के लिए आवश्यक जैविक इंर्धन (५० लीटर) हेतु २०० किलो मक्का की आवश्यकता पड़ेगी जो कि एक व्यक्ति का वर्षभर का भोजन है । जैविक इंर्धन से जहां जलवायु परिवर्तन और विकासशील देशों के किसानों की आर्थिक देशों में सकारात्मक लाभ होगा पर इसी के साथ यह अध्ययन भी आवश्यक है कि इससे भोजन के अधिकार पर क्या प्रभाव पड़ेगा ? विशेष दूत ने वर्तमान पद्धतियों के तहत जैविक इंर्धन के उत्पादन पर पांच वर्षो के लिए अनिवार्य रोक लगाने का आग्रह किया है जिससे कि नई तकनीकें इजाद करने का समय मिल सकें और पर्यावरण, सामाजिक व मानवाधिकारों पर विपरीत प्रभाव पड़ने को रोका जा सके । इन प्रयत्नों के अंतर्गत विश्व के कुल ऊर्जा उपभोग में कमी, ऊर्जा की कार्यक्षमता में वृद्धि, जैविक इंर्धन के उत्पादन हेतु `दूसरी पीढ़ी' की तकनीकों का विकास जिससे कि खाद्य और इंर्धन के बीच की प्रतिस्पर्धा को कम किया जा सके, ऐसी तकनीकों को अपनाना जिसमें अखाद्य फसलों का प्रयोग किया जा सके और असिंचित व बंजर क्षेत्रों में विकसित हो सकें । साथ ही उनका सुझाव है कि जैविक इंर्धन का उत्पादन पारिवारिक स्तर पर होन कि औद्योगिक पैमाने पर । ग्रामीण क्षेत्रों में गरीब किसानों को बजाय प्रतिस्पर्धा के, अवसर उपलब्ध करवाना भी उनकी अनुशंसाआे में सम्मिलित है । ***