गुरुवार, 8 नवंबर 2007

५ बहस

जल का निजीकरण या जल डकैती
न्यायमूर्ति एस. राजेन्द्र बाबू
जल मनुष्य के जीवन का एक अनिवार्य तत्व और मूलभूत आवश्यकता है । अतएव यह सभी प्राकृतिक संसाधनों में सबसे मूल्यवान भी है । राष्ट्र के आर्थिक विकास में निर्णायात्मक भूमिका निभाने वाला `जल' अंतत: इसके निवासियों के सामाजिक संबंधों को भी प्रभावित करता है । असंतुलन औद्योगिकीकरण, अवैज्ञानिक सिंचाई प्रणालियों, विशाल बांधों के निर्माण जहरीले पदार्थो की डम्पिंग एवं जंगलों व आर्द्र भूमि के मनमाने विनाश ने पृथ्वी की सतह पर उपलब्ध जल को इतना भयानक नुकसान पहुंचाया है कि प्रकृति उसकी भरपाई भी नहीं कर सकती है । वर्तमान वैश्विक शुद्ध जल संकट इस ग्रह पर जीवन के अस्तित्व के लिए सबसे बड़ा खतरा है । शुद्ध जल एक लुप्त् होता संसाधन है और राज्यों को अपने नागरिकों को इसकी यथोचित्त आपूर्ति बनाये रखने में बहुत दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है । जल जो कि एक अनिवार्यता है अब विलासिता की वस्तु बनता जा रहा है । इन दिनों संस्थाआे के स्तर पर एक नए विचार `परोक्ष जल' ने अपनी पैठ जमाई है । इसका अर्थ है किसी वस्तु के उत्पादन में परोक्ष रूप से या छिपी हुई जल की मात्रा । उदाहरणार्थ जब एक किलो खाद्यान्न का उपयोग किया जाता है तो माना जाता है कि व्यक्ति ने इसके उत्पादन हेतु एक हजार लीटर जल का उपभोग किया है । वहींउपभोग हेतु एक किलो मांसाहार उत्पादन करने के लिए १३००० लीटर पानी की आवश्यकता पड़ती है । जल संसाधन प्रबंधन आज का सबसे महत्वपूर्ण मसला बन चुका है । यह सभी प्राकृतिक संसाधनों में सबसे अधिक ध्यान आकर्षित कर रहा है । आज सभी पूर्व प्रचलित प्रणालियों जिसमें `निजी भागीदारी' भी शामिल है को उसके गुण दोष के आधार पर देखने की अनिवार्यता बताई जा रही है, जिससे कि इस संसाधन का न्यायोचित प्रबंधन हो सके । शुद्ध पेयजल, मनुष्य के जीवित रहने की मूलभूत आवश्यकता है, अतएव यह स्वमेव मानव जाति एक मूलभूत मानव या प्राकृतिक अधिकार भी है । जल के अधिकार को मानव अधिकार मानने का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इससे अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में पानी के बढ़ते संकट, खासकर विकासशील देशों के संदर्भ में जागरूकता में वृद्धि होगी । वैसे किसी भी देश की सरकार के लिए पानी की आपूर्ति उसके प्राथमिक कर्तव्यों में से एक है, परंतु कई सरकारें अपनी संकुचित सोच व अर्कमण्यता की वजह से ऐसा नही कर पाती हैं । पानी की समस्या के वैश्विक प्रभावों पर संयुक्त राष्ट्र संघ ने सन् १९७२ से लेकर अभी तक अनेकों सम्मेलनों का आयोजन कर इसे मानव अधिकार के रूप में स्वीकारा है । इसके बावजूद जल विषयक मानव अधिकारों का सर्वाधिक हनन हो रहा है । ऐसा माना जा रहा है कि वर्ष २०२५ तक विश्व की दो तिहाई आबादी पानी की जबरदस्त कमी का सामना करने को बाध्य होगी । भारत के संदर्भ में उपलब्धता का अत्यधिक महत्व है । क्योंकि जहां एक ओर गरीबों को प्रति व्यक्ति प्रतिदिन मात्र पंद्रह लीटर जल ही उपलब्ध हो पाता हैं वहीं संपन्न वर्ग को ३०० लीटर तक उपलब्ध है । भारत में पानी की कमी गरीब व्यक्ति को सर्वाधिक प्रभावित करती है । इस संबंध में यहां अन्य अनेकों भेदभाव भी अनंत काल से विद्यमाल हैं। जैसे महिलाआे और लड़कियों को घंटों पैदल चलकर पानी लाना व शहरी गरीब (गंदी) बस्तियों में भी पानी की न्यूनतम उपलब्धता। भुगतान का सामर्थ्य भी जल की उपलब्धता का ही महत्वपूर्ण अनुषंग है । इसकी लागत इतनी नही होना चाहिए कि यह गरीब व्यक्ति की पहुंच से बाहर हो जाए । अगर गरीबों को जल की उच्च् लागत के कारण मूलभूत आवश्यकताआे जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाआे या खाद्यान्न पर समझौता करना पड़े अथवा दूषित जल पीना पड़े तो यह उनके मानव अधिकार का हनन होगा । पानी से होने वाली बीमारियों को रोकने से व्यक्तियों की कार्यक्षमता में वृद्धि होगी । जल की सामाजिक आर्थिक विकास और गरीबी उन्मूलन में निर्णायक भूमिका है । जल का वैश्विक उपभोग प्रत्येक बीस वर्ष में दुगुना हो जाता है । यह जनसंख्या वृद्धि की दर से दुगुना है । इस बढ़ती मांग और भविष्य में होने वाली कमी के मद्देनजर बहुराष्ट्रीय जल निगमों ने इस बहुमूल्य प्राकृतिक संसाधन पर कब्जे हेतु अपने पैर फैलाने प्रारंभ कर दिए हैं । जल तेजी से भूमण्डलीय कारपोरेट उद्योग बनता जा रहा है । एक तरह से यह निजी निवेशकों द्वारा अधिसंरचना पर किया गया अंतिम निवेश भी होगा । अंतर्राष्ट्रीय जल कंपनियों अनेक देशों में मात्र लाभ कमाने के लिए शहरी जल आपूर्ति अपने हाथ में ले रहीं है । उनके इस उद्यम में अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष व विश्व बैंक के अलावा अंसख्य आंचलिक बैंक जैसे यूरोपियन इन्वेस्टमेंट बैंक, इंटर अमेरिकन डेवलपमेंट बैंक, एशिया विकास बैंक और अफ्रीका विकास बैंक विशाल पैमाने पर पाईप लाईन का निर्माण करवा कर दूरस्थ स्थानों पर शुद्ध पेय जल के विक्रय में सहायता कर रहे हैं। इतना ही नहीं ये कंपनियां तो अब समुद्र पार तक जल का परिवहन बड़े पैमाने पर कर रही हैं । इस मामले में विश्व बैंक का नजरिया है कि `शीघ्र ही जल भी विश्व में तेल की तरह ही संचालित होगा।' वैसे भी बोतल बंद पानी का व्यापार निजी निगमों के लिए सोने की खान बन गया है। इतना ही नहीं जल कंपनियां पुराने पड़ चुके कानूनों का फायदा उठाकर बड़े-बड़े भूखण्ड खरीद कर बड़ी मात्रा में भूजल का दोहन कर रहीं है । साथ ही साथ वे स्थानीय समुदायों द्वारा प्रयोग में लाए जाने वाले कुआें और अन्य स्थानीय पारंपरिक जल स्त्रोतों को भी योजनाबद्ध तरीके से नष्ट कर रहीं हैं । कुल मिलाकर भारत के शहरों में जल समस्या विस्फोटक स्थिति तक पहुंच चुकी है । जल पूर्ति के सभी स्त्रोत देखरेख के अभाव में बर्बाद होते जा रहे हैं। पानी पर सब्सिडी पद्धति का उद्देश्य शहरी गरीबों को कम मूल्य पर जल उपलब्ध करवाना था पंरतु वास्तव में इससे शहरी अमीरों को ही लाभ पंहुच रहा है। अगर हम अपने नेताआें और नौकरशाहों पर विश्वास करें तो उनके अनुसार जल का निजीकरण ही एकमात्र हल बच रहा है । उनके हिसाब से जल के बढ़े मूल्य ही शहरी लोगों को जल की बचत की ओर प्रेरित करेंगे । निजीकरण के ऐसे प्रयोग इंग्लैंड, फिलीपीन्स, अफ्रीकी देशों, बोलिविया व अन्य कई देशों में किए गए हैं । परंतु इनकी कार्यप्रणाली देखकर यह स्पष्ट हो जाता है कि यह प्रयोग भारत में शायद ही सफल हो । वैसे कुछ चरम पंथियोंने जल आपूर्ति के निजीकरण के विचार को मूर्त रूप देते हुए देश भर के तीस शहरों में नगर निगमों द्वारा की जाने वाली जल आपूर्ति को निजी उद्यमियों को सौंपने का निश्चय कर लिया है । अगर हमें इन निगमों द्वारा दी जाने वाली `जल डकैतियों' को रोकना है तो इस हेतु तुरंत प्रभावकारी कदम उठाने होंगे । पानी जैसे मानव अधिकार का निजीकरण कई महत्वपूर्ण प्रश्न भी खड़े करता है । क्योंकि इसके निजीकरण का पैमाना टेलीकाम, बिजली आदि के निजीकरण से एकदम भिन्न है । निजीकरण की निविदा ही इस दिशा में पहला कदम है । जल की सार्वजनिक मिल्कियत कायम रखी जानी चाहिए । कार्पोरेट के लिए जल के निजीकरण की पहली परिकल्पना ही यह होती है कि जल एक आर्थिक उत्पाद भर हैं । यह उस भारतीय मानसिकता से कोसों दूर हैं जिसके लिए `नि:शुल्क जल' जीवन जीने का ही एक तरीका है । इन दोनों विरोधाभासों में सामंजस्य बिठाने के पूर्व प्रतयेक ऐसा राज्य जो निजीकरण की ओर अग्रसर हो रहा हो, में एक मजबूत नियामक का गठन होना अनिवार्य है । इस नियामक प्राधिकारी की अध्यक्षता उच्च् न्यायालय के वर्तमान या पूर्व न्यायाधीश द्वारा की जानी चाहिए । इतना ही नहीं इसकी कार्यप्रणाली से जनता की भलाई सुस्पष्ट रूप से परिलिक्षित भी होनी चाहिए । जल के मूल्य का निर्धारण भी इसी प्राधिकारी द्वारा किया जाना चाहिए एवं ऐसा करते समय निजी उद्यमी को यह सुनिश्चित करने के लिए निर्देशित किया जाना चाहिए कि वह इस मानव अधिकार को संतुष्ट करने के लिए मूलभूत आवश्यकताआे हेतु जल की आपूर्ति बिना किसी शुल्क के उपलब्ध करवाए । इस न्यूनतम अनिवार्य मात्रा की आपूर्ति के पश्चात ही इस नियामक इकाई द्वारा जल दरों का निर्धारण किया जाना चाहिए । साथ ही दरों में यह भी प्रावधान किया जाना चाहिए कि गरीबों को कम दर पर जल मिले और लागत की भरपाई समृद्ध ग्राहकों एवं सरकारों द्वारा मात्र `यथोचित लाभ' हेतु ही की जाए । जल आपूर्ति के लिये नदियों और झीलों को निजी उद्यमियों को सौंपने के पूर्व राज्य को इस पर अपने सार्वभौम अधिकार और समुदाय के हितों को भी ध्यान में रखना चाहिए । स्थानीय स्वशासन संस्थाआे द्वारा जल आपूर्ति सेवा के धराशायी होने देने से राज्य इस बात पर मजबूर होते जा रहे हैं कि जल संकट से निपटने हेतु यह कार्य विशाल बहुराष्ट्रीय निगमों को मात्र लाभ कमाने हेतु हस्तांतरित कर दिया जाए । दूसरी ओर हमारे सभी नेता बजाए सार्वजनिक क्षेत्र में इन सुविधाआे को बेहतर तरीके से उपलब्ध कराये जाने का प्रयास करने के इनके निजीकरण का अंध समर्थन कर रहे हैं । इस व्यवस्था में किए गए किसी भी परिवर्तन के दूरगामी सामाजिक परिणाम निकलेंगे । इस संदर्भ में आदर्श स्थिति भी यही है कि जल आपूर्ति `कल्याणकारी राज्य' के अधिकार क्षेत्र में ही हो ।

1 टिप्पणी:

परमजीत बाली ने कहा…

बहुत ही विचारणीय लेख है।