गुरुवार, 8 नवंबर, 2007

कैसे मनाएं दीपावली

दीपावली सादगी से मनाएँ
`घर-घर दीप जले आया दीपावली का त्योहार/संग लाया ये अपने खुशियों की सौगात/कहीं रंगोली, कहीं पुताई तो कहीं रोशनी की है भरमार ।' दीपावली का नाम सुनते ही हमारे अंदर उत्साह आ जाता है, परंतु आज बदलते परिवेश में यह त्योहार अपना स्वरूप खो रहा है । हमें दीपावली को सादगी से मनाना चाहिए । इस दिन मिट्टी के दीये से रोेशनी करना चाहिए, क्योंकि इनका दीपावली में धार्मिक महत्व है । आज इन दीपों की जगह मोमबत्ती, मोम के दीये, विद्युत रोशनी ने ले ली है। इससे विद्युत का अपव्यय ज्यादा होता है । इसी के साथ दीपावली पर फोड़े जाने वाले पटाखे सबसे ज्यादा प्रदूषण करते हैं । आजकल बहुत शोर और प्रदूषण करने वाले पटाखे ज्यादा उपयोग में आते हैं। हमें उनका उपयोग खत्म कर उन पटाखों को अपनाना चाहिए जिनसे ध्वनि व वायु प्रदूषण नहीं होता है । इस तरह इस पावन पर्व को बिना शोर और प्रदूषण से हम सादगी से मना सकते है । लक्ष्मी पूजन के साथ अन्य बातों का ध्यान रखकर हम इस त्योहार का अधिक आनंद ले सकते है ।`दीपावली है दीपों का त्योहार/ इस दिन सभी एक-दूसरे को दें एक प्यार-सा उपहार ।
'प्रियंका ठक्कर, इन्दौर (म.प्र.)
इको फ्रेंडली दीपावली
इको फ्रेंडली दीपावली के लिए निम्न प्रयास किए जाएँ :-
१. पटाखों के अत्यधिक उपयोग से दीपावली अब प्रकाश पर्व न रहकर धूल-धुएँ एवं धमाकों का महापर्व बन गई है । अत: पटाखों का उपयोग न्यूनतम करें । बाजार में आजकल कम धुआँ एवं आवाज करने वाले पटाखे उपलब्ध हैं । यदि आवश्यक हो तो उनका उपयोग किया जाए । रात्रि ११ से दूसरे दिन सुबह ६ बजे तक पटाखों का उपयोग हर्गिज न करें । २. पटाखों से पैदा शोर से वृद्धों, गर्भवती महिलाआें एवं बच्चें को बचाने का यथासंभव प्रयास करें । ३. विद्युत से सजावट कम से कम करें, क्योंकि कोयला जलाकर विद्युत उत्पादन में भारी मात्रा में कार्बनडाय ऑक्साइड पैदा होती है, जो एक प्रमुख ग्रीन हाउस गैस है एवं ग्लोबल वार्मिंग के लिए जिम्मेदार है । ४. अभिनंदन पत्रों का उपयोग भी न्यूनतम करें, क्योंकि इनके निर्माण में हमारे देश के ही लगभग एक लाख वृक्ष काटे जाते हैं । ५. सजावट के लिए प्लास्टिक की सामग्री का उपयोग कम हो । प्राकृतिक वस्तुआे को सजावट में महत्व दिया जाए । ६. घरों को दीये एवं रंगोली से सजाएँ । ७. घरों की सफाई से निकला कचरा यथा स्थान डालें ।
ओपी जोशी, जय श्री सिक्का, इन्दौर (म.प्र.)
पटाखों से तौबा जरूरी
दीपावली आपसी प्रेम व भाईचारे का त्योहार है । यह त्योहार पाँच दिनों तक मनाया जाता है जिसमें हर दिन का अपना अलग महत्व है । सभी लोगों को पारंपरिक ढंग से यह पर्व शालीनता व मर्यादा में रहकर मनाना चाहिए । यह पर्व आपसी प्रेम व भाईचारे को बढ़ाने वाला है किंतु कई लोग शराब पीकर व जुआ खेलकर इस पावन पर्व की गरिमा को घृणित कर अपने परिवार की खुशियों को गम में बदल देते हैं । हमें शराब व जुए से बचना होगा । आज हमारे समाज में पटाखों का प्रचलन बढ़ता ही चला जा रहा है । चाहे शादी-ब्याह हो, कोई नेता की अगवानी हो, किसी व्यक्ति की अंतिम यात्रा हो या दीपावली पर्व पटाखों का कानफोडू शोर व आतिशबाजी प्रकृति के संतुलन को बिगाड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहे है । पटाखों से ध्वनि प्रदूषण व वायु प्रदूषण हो रहा है जिससे कई प्रकार की बीमारियों से लोग ग्रस्त हो रहे हैं । पटाखे जलाने से कई लोग जल जाते हैं एवं कई जगह आग लगने से घर-मकान या फसलें जलकर राख हो जाती हैं । पटाखे फायदेमेंद तो नही हैं अपितु बहुत नुकसानदायक हैं । आज समय आ गया है कि हम दीपावली का सार्थक स्वरूप समझें ।
सुरेश सोलंकी, ठीकरी (बड़वानी) म.प्र.
दूर रखें धमाकों से बच्चें के कान
रोशनी का पर्व दीपावली दीपों का त्योहार है । अंधकार पर उजाले की जीत के रूप में भी हम इसे मनाते हैं । हमारे पुराणों में अग्नि को उजाले का स्वरूप भी कहा गया है । यदि किसी कारण उजाले का अभाव हो तो आवाज को भी खुशियाँ मनाने का तरीका माना गया है । दीपावली पर दीपक एवं पटाखे जीवन में उसी रोशनी और आवाज को प्रदर्शित करते हैं एवं ये दोनों ही खुशी मनाने के स्वरूप में स्वीकार किए गए हैं । बच्चें को इनसे दूर रखना चाहिए ।
मनमोहन राजावत, शाजापुर

आवरण



इस अंक में

इस अंक में दीपावली के शुभ अवसर पर प्रकाशित पर्यावरण डाइजेस्ट के इस अंक में दीपावली पर आर्थिक विषयों पर विशेष सामग्री दी गयी है । पहले लेख गरीबी और ग्लोबलाइजेशन में सुप्रसिद्ध लेखक/पत्रकार डॉ. भरत झुनझुनवाला के विचार में गरीब की आय में कुछ वृद्धि से गरीबी उन्मुलन नहीं हो सकता है । मंथन से जुड़े समाजसेवी लेखक रेहमत एवं शिरीश खरे ने अपने लेख विश्व बैंक और भारत में विश्व बैंक की जनविरोधी नीतियों की विस्तार से चर्चा की है । सामाजिक संगठन `नो मोर ब्रेस्ट केंसर केम्पेन' से जुड़ी अक्रिसन क्रेग डायनावार्ड एवं डेबोराह बर्टन ने अपने लेख औद्योगिकरण की शिकार महिलायें में लिखा है कि जीवनशैली में शामिल हो रहे घातक रसायनों की सर्वाधिक शिकार महिलायें ही हैं । म.प्र. की प्रमुख पर्यावरण संस्था एप्को से जुड़े वैज्ञानिक डॉ.आर.पी.सिंह एवं डॉ. यशपाल सिंह ने अपने लेख म.प्र. : बायोस्फिर रिजर्व एवं प्रकृति संरक्षण में प्रदेश के पचमढ़ी एवं अचानकमार बायोस्फिर रिजर्व की गतिविधियों की जानकारी दी है । पिछले दिनों भारत के पर्यावरण वैज्ञानिक आर.के. पचौरी नोबल पुरस्कार विजेताआें में शामिल किये गए । हमारे विशेष संवाददाता की रिपोर्ट खास खबर में आप पढ़ेंगें पचौरी पैनल को नोबेल शांति पुरस्कार । पिछले दिनों जल,जमीन,जंगल की हकदारी को लेकर चल रही २५००० लोगों की पदयात्रा दिल्ली पहुंची । इसकी जानकारी समाजकर्मी पत्रकार संतोषकुमार द्विवेदी के लेख जनादेश २००७ : एक निर्णायक जनसंघर्ष में होगी । इस बार दीपावली कैसे मनायें इस विषय पर प्रबुद्धजनों के विचार भी आप पढ़ेंगें । पिछले दिनों लगातार विद्युत कटौती एवं अन्य कारणों से पत्रिका का अक्टूबर अंक नहीं निकल पाया इसके लिये पाठकों से क्षमाप्रार्थी हैं । अब अक्टूबर-नवम्बर संयुक्तांक के रूप में यह दीपावली विशेषांक आपकी सेवा में प्रेषित है ।
दीपावली के शुभ अवसर पर सभी पाठकों, लेखकों एवं शुभचिंतकों को हार्दिक शुभकामनाएँ ।
पत्रिका के बारे में आपकी राय से अवगत करायें।
- कुमार सिद्धार्थ

संपादकीय

ग्लोबल फेस्टिवल दीपावली
आजकल दीपावली ग्लोबल फेस्टिवल है । दीपावली रोम से लेकर यूनान और लंदन से लेकर न्यूयार्क तक में मनायी जा रही है । इसकी वजह यह है कि धन दुनिया के हर इंसान को प्रिय होता है फिर चाहे वह जिस धर्म या समाज से रिश्ता रखता हो । दीपावली मेंधन की देवी लक्ष्मी की पूजा होती है जो इंसान की स्वाभाविक चेतना का हिस्सा है, इसलिए यह लक्ष्मी सिर्फ हमारी ही देवी या आराध्या नहीं है बल्कि अलग-अलग नामों से धन की देवी की आराधना सभी धर्मो और समाजों में होती है । यही कारण है कि भारत की ही तरह रोम में भी दीपज्योति जलाकर देवी लक्ष्मी की पूजा की जाती है । हालांकि दोनों में फर्क भी हैं, हम भारत में जिसे लक्ष्मी कहते हैं रोम में उसे ज्योति की देवी वेस्ता कहते हैं । रोम की ही तरह यूनान भी प्राचीन सभ्यता व संस्कृति का केन्द्र है । यहां भी लक्ष्मी की पूजा होती है । यहां लक्ष्मी को कृषि एवं सामाजिक संपन्नता की देवी री के रूप में जाना जाता है । री देवी की पूजा धूमधाम से की जाती है तथा इस रात यहां भी चारों और दीपावली के समान ही दीपों को जलाया जाता है । भारत की लक्ष्मी और एथेंस की देवी एथेना में तो इतनी साम्यता है कि लगता है जैसे लक्ष्मी का ही व्यापक संस्करण एथेना है । एथेना प्राचीन यूनान की महालक्ष्मी के रूप में प्रतिष्ठित है । भारत की लक्ष्मी की ही तरह एथेना का वाहन भी उल्लू है । यहां की महिलाएं महालक्ष्मी एथेना की उपासना करती हैं । वे मंदिरों में जाकर दीप जलाती है तथा लिली के पीले फूल चढ़ाती है । कंबोडिया में अंकोरवाट के विशालकाय विष्णु मंदिर में लोग दीपावली की तरह जीवन ज्योति देवी की पूजा दीप जलाकर करते हैं । मान्यता है कि जीवन ज्योति की पूजा करने वाला अभवग्रस्त नही रहता । इसके अलावा इंडोनेशिया के बाली द्वीप में लक्ष्मी की पूजा धान पैदा करने वाली देवी के रूप में की जाती है । भारत के पड़ोसी श्रीलंका में वहां के लोग देवी लंकिनी की पूजा करते हैं । देवी लंकिनी को भी वैभव एवं ऐश्वर्य की देवी मानकर पूजा की जाती है । सूडान यूं तो इस्लामी देश है लेकिन वहां भी दीपावली में देवी मूर्तिजा की पूजा की परंपरा है । इसके अलावा नेपाल, थाइलैंड, जावा, सुमात्रा, मारीशस, गुयाना, दक्षिण अफ्रीका और जापान आदि देशों में भी अनेक रूपों में लक्ष्मी की पूजा की जाती हैं ।

पुण्य स्मरण

पर्यावरण प्रेमी पत्रकार सुदेश पौराणिक का निधन

वन्यजीव सुरक्षा एवं पर्यावरण संरक्षण से जुड़े बालाघाट म.प्र. के युवा पत्रकार सुदेश पौराणिक का १४ अक्टूबर ०७ को हृदयाघात से निधन हो गया । ४८ वर्षीय श्री पौराणिक एक समर्पित वन्य जीव प्रेमी एवं कुशल वन्य जीव छायाकार रहे हैं । पिछले एक दशक से वे मध्यप्रदेश में वन्य प्राणी संरक्षण के क्षेत्र में एक सक्रिय कार्यकर्ता के रूप में कार्य कर रहे थे । डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय सागर से स्नातक एवं बरकतउल्ला विश्वविद्यालय भोपाल से फोटोग्राफी कर पत्रोपाधि प्राप्त् करने के उपरांत वे १९८४ से देश के प्रमुख राष्ट्रीय उद्यानों एवं अभ्यारण्यों में वन्य जीवन छायांकन करने के साथ ग्रीन जर्नलिज्म से भी जुड़े रहे । उन्होंने वन्य जीव एवं पर्यावरण संरक्षण पर सैकड़ों आलेख लिखे जो अनेक प्रतिष्ठित समाचार पत्रों एवं पत्रिकाआे मंे प्रकाशित हुए । पर्यावरण डाइजेस्ट में उनके अनेक लेख प्रकाशित हुए हैं । माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय भोपाल से ग्रामीण पत्रकारिता का प्रशिक्षण प्राप्त् श्री पौराणिक ने प्रदेश के कुछ प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में समाचार सम्पादक एवं संवाददाता के रूप में भी कार्य किया । विश्व विख्यात कान्हा राष्ट्रीय वन उद्यान से वन्य जीवन छायांकन एवं संरक्षण का सफर प्राप्त् करने वाले वाईल्डलाईफ जर्नस्टि श्री पौराणिक वर्तमान में सतपुड़ा वन्य जीवन संरक्षण समिति नामक स्वयं सेवाी संस्था के माध्यम से वन्य जीवन एवं पर्यावरण संरक्षण के कार्य में जुटे थे । श्री पौराणिक को ५ जून २००३ को विश्व पर्यावरण दिवस पर नई दिल्ली में एक समारोह में तत्कालीन उपराष्ट्रपति भैरोसिंह शेखावत द्वारा मेदिनी पुरस्कार दिया गया । श्री पौराणिक के निधन पर म.प्र. के जनसम्पर्क एवं संस्कृति मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा ने अपने शोक संदेश में कहा है कि श्री पौराणिक के निधन से प्रदेश के पत्रकार जगत को अपूर्णीय क्षति पहुंची है । उनके द्वारा वन्य प्राणी संरक्षण एवं पर्यावरण संरक्षण में दिये गये योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकेगा । म.प्र. के लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी मंत्री तथा जिले के प्रभारी मंत्री चौधरी चंद्रभान सिंह ने श्री पौराणिक के निधन पर शोक व्यक्त करते हुए कहा कि बहुमुखी प्रतिभा के धनी श्री पौराणिक के निधन से जिले एवं प्रदेश ने एक वन्य जीव प्रेमी पत्रकार खो दिया है । पर्यावरण डाइजेस्ट परिवार भी अपने सहयोगी के निधन पर श्रृद्धांजलि अर्पित करता है ।

१ सामयिक

गरीबी और ग्लोबलाइजेशन
डॉ. भरत झुनझुनवाला
ग्लोबलाइजेशन का प्रभाव जानने के लिये असमानता को देखना होगा । अप्रवासी प्रोफेसरों द्वारा अपने विदेशी मालिकों के हित को साधने का सिलसिला जारी है । कनाडा की मैकगिल यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर बलदेव राज नायर ने अपनी पुस्तक भारत में ग्लोबलाइजेशन एवं राजनीति में गरीबी उन्मूलन के लिये ग्लोबलाइजेशन को मददगार बताया है । पहला तर्क है कि खुली अर्थव्यवस्था से देश की आय बढ़ती है जिससे गरीबी कम होती है । सही है कि भारत जैसे कई देशों में ग्लोबलाइजेशन को अपनाने के बाद आर्थिक विकास दर में वृद्धि हुई है । परन्तु गरीबी का कम होना प्रमाणित नहीं होता है । गरीब की आय में कुछ वृद्धि के संकेत अवश्य मिलते हैं जैसे पूर्व में देश की गरीब परिवारों की दैनिक आय ६० रूपये हो तो वर्तमान में ७० रूपये हो गयी है । परन्तु इस वृद्धि को गरीबी उन्मूलन नहीं का जा सकता है क्योंकि गरीबी तुलनात्मक आधार पर आंकी जाती है । जैसे अमरीका में दैनिक पारिवारिक आय २० डालर या ८०० रूपये प्रतिदिन हो तो वह गरीब गिना जाता है । अथवा दिल्ली में फ्रिज और पंखो के साथ झुग्गी में रहने वाला परिवार गरीब कहलाता है जबकि गांव में बिना फ्रिज और पंखे के पक्के मकान में रहने वाला परिवार समृद्ध कहलाता है । देश में असमानता बढ़ी है । आज से लगभग दस वर्ष पूर्व आईआईएम के ग्रेजुएट को प्रति वर्ष १० लाख रूपये का प्रारम्भिक वेतन मिलता था । उस समय अकुशल श्रमिकों का वेतन लगभग ५० रूपये प्रति वर्ष था । ग्रेजुएट को अकुशल श्रमिक से ६७ गुणा अधिक वेतन मिलता था । आज ग्रेजुएट को एक करोड़ मिलता है जबकि अकुशल श्रमिकों को १०० रूपये या ३०,००० रूपये प्रति वर्ष । असमानता का गुणांक ६७ से बढ़कर ३३३ हो गया है । इससे झलक मिलती है कि देश में गरीबी बढ़ी है । ग्लोबलाइजेशन का गरीबी पर दुष्प्रभाव का कारण पंूजी-सघन उत्पादन है । उदाहरणत: पूर्व में एक ट्रक में १० टन माल की ढुलार्ह होती थी । अब तीन एक्सल की आयातित ट्रकें सड़कों पर दौड़ रही हैं जो ३० टन माल की ढुलाई करती हैं । ३० टन माल की ढुलाई में पूर्व में तीन ड्राइवर एवं तीन क्लीनर लगते थे । अब उतने ही माल की ढुलाई में एक ड्रायवर और क्लीनर से काम हो जाता है। ढुलाई से हो रही आय मे श्रम का हिस्सा घट गया है । वित्त मंत्रालय द्वारा प्रकाशित आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार देश में एक व्यक्ति की दैनिक खाद्यान्न खपत १९९१ में ५१० ग्राम से घटकर २००५ में ४२२ ग्राम रह गयी है । बेरोजगारों की संख्या १९९४ में ९० लाख से बढ़कर २००५ में १३१ लाख हो गयी है । गांवों से दूध का निर्यात होने लगा है । बिक्री से होने वाली आय से टेलिविजन खरीदा जा रहा है जबकि बच्च्े पूर्व में मिलने वाले दूध से वंछित है। बाजार, स्कूटर एवं टेलिविजन ये सभी ग्लोबलाइजेशन की देन है । तर्क है कि तीव्र आर्थिक विकास से सरकार के राजस्व में वृद्धि होती है और सरकार के लिये कल्याणकारी कार्यक्रम चलाना संभव हो जाता है । भारत सरकार ने पूरे देश में रोजगार गारण्टी योजना को लागू कर दिया है चूंकि आयकर में वृद्धि हो रही है । परन्तु आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार २००३ में केन्द्र सरकार के कुल खर्च में सामाजिक सेवाआे का हिस्सा २८.८ फीसदी था । सन् २००७ में यह घटकर २७.२ फीसदी रह गया है । कल्याणकारी सुविधाआे में वृद्धि कम है । इसे ग्लोबलाइजेशन का दुष्प्रभाव ही माना जायेगा । इसके अतिरिक्त सरकारी कल्याणकारी खर्चो का मुख्य हिस्सा नौकरशाही को पोसने में खप जाता है । जनता की मानसिकता पर भी इन खर्चो का दुष्प्रभाव पड़ता है । जनता में आत्मसम्मानपूर्वक स्वरोजगार आदि द्वारा जीवनयापन करने के स्थान पर सरकारी दान पर पलने की प्रवृत्ति बनती है । इससे जनता की मन:स्थिति भिक्षावृत्ति की बनती है जो दीर्घकाल में आर्थिक विकास में बाधक होती है । ग्लोबलाइजेशन से गरीबी उन्मूलन पर सुप्रभाव पड़ने का प्रमाण चीन, दक्षिण कोरिया एवं पूर्वी एशिया का दिया जाता है । परन्तु इस चुनिन्दा देशों के आधार पर किसी निष्कर्श पर नहीं पहुंचा जा सकता है । अनेक देशों में विपरीत स्थिति है । विश्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार कुछ प्रमुख देशों में वर्ष १९९२ एवं २००२ के बीच बेरोजगारों की संख्या में वृद्धि इस प्रकार हुई है :- अर्जेन्टीना में बेरोजगारों की संख्या ६.७ फीसदी से बढ़कर १९.६ फीसदी हो गयी है, नामिबिया में १९ से बढ़कर ३३.८ फीसदी, पोलैण्ड में १३.३ से बढ़कर १९.९ फीसदी, रूस में ५.२ से बढ़कर ८.६ फीसदी एवं वेनेजुएला में ७.७ से बढ़कर १५.८ फीसदी । विद्वान अर्थशास्त्री अपनी सुविधानुसार उन देशों का उदाहरण देते हैं जो उनके तर्क के उपयुक्त पड़ता है और उन देशों की दुखद गाथा को दबा जाते हैं जो उनके तर्क के विपरीत होते हैं। जिन देशों में ग्लोबलाइजेशन का गरीबी पर सुप्रभाव बताया जा रहा है वह भी सिद्ध नहीं होता है । विश्व बैंक के अनुसार इन देशों में भी बेरोजगारी में वृद्धि हुई है - मलेशिया में ३.७ से ३.८ फीसदी, फिलिपीन्स में ८.६ से ९.८ फीसदी, थाईलैण्ड मेें १.४ से २.६ फीसदी, कोरिया में २.५ से ३.१ फीसदी एवं हांगकांग में २.० से ७.३ फीसदी । ग्लोबलाइजेशन के गरीबी पर प्रभाव को जानने के लिये वैश्विक स्तर पर अध्ययन करना जरूरी है । जिस प्रकार उपनिवेशवादी युग में इंग्लैण्ड के श्रमिकों की समृद्धि और भारत के श्रमिकों की गरीबी एक ही सिक्के के दो पहलू थे उसी प्रकार अग्रणी विकासशील देशों में गरीबी कम होने से दूसरे विकासशील देशों में गरीबी का विस्तार होता है । पिछले कुछ वर्षो में पूर्वी एशिया के देशों की दुरूह परिस्थिति के लिये चीन को जिम्मेदार बताया जा रहा है । मान लीजिये चीन में श्रमिकों का दैनिक वेतन ५० रूपये से बढ़कर ७० रूपया हो गया । परन्तु चीन के विश्व बाजार में प्रवेश करने से थाइलैण्ड के वेतन १०० रूपये से गिरकर ८० रूपया रह गया । इस प्रकार चीन में गरीबी का कम होना तथा थाइलैण्ड में गरीबी का विस्तार साथ-साथ चलते हैं । अत: कोरिया एवं चीन में गरीबी कम हो जाये तब भी ग्लोबलाइजेशन का गरीबी उन्मूलन पर सुप्रभाव प्रमाणित नहीं होता है । अन्तिम तर्क है कि विकासशील देशों के गरीबतम लोगों के लिए घरेलू दमनकारी सरकार का न होना ही अच्छा है । कुछ विद्वानों का मानना है कि भारत में अंग्रेजों का शासन दलितों प्रथम मुक्ति थी चूंकि उन्हें भारत की रूढ़िवादी जाति व्यवस्था से मुक्ति मिली थी । ग्लोबलाइजेशन उनकी द्वितीय मुक्ति है चूंकि बाहरी शक्तियों द्वारा कमजोर वर्गो को संरक्षण दिया जा रहा है जैसे इसाई मशीनरी दलितों के प्रति ज्यादा नरम दिखते हैं । निश्चित रूप से ऐसा होता है । परन्तु इस प्रकार का सबलीकरण दीर्घकाल तक टिकता नहीं है । अंग्रेजों के अत्याचार से बंगाल के सूखे में मरने वाले अधिकांश लोग दलित ही थे । पश्चिमी स्वार्थो को बढ़ाने में लगे हमारे विद्वान अप्रवासी अर्थशास्त्री अपनी सुविधानुसार घरेलू सरकारों द्वारा छोटे उत्पीड़न को उछालते है । साउदी अरब द्वारा महिलाआे पर किये जा रहे अत्याचार को नहीं उछाला जाता परन्तु भारत में दलितों पर हो रहे अत्याचार को उछाला जाता है । सारांश यह है कि हमें अप्रवासी विद्वानों से सजग रहना चाहिये । जिस प्रकार जयपुर के ब्राह्मणों ने राजा मानसिंह द्वारा शिवाजी पर विजय के लिए जप किए थे उसी प्रकार ये विद्वान अपने पश्चिमी मालिकों की विजय के लिए हमें झूठे पाठ पढ़ा रहे हैं ।

२ दीपावली पर विशेष

विश्व बैंक और भारत

रेहमत/शिरीष खरे

नई दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय परिसर में विश्व बैंक के कामकाज को लेकर स्वतंत्र जन न्यायाधिकरण (आईपीटी) की सुनवाई २१ से २४ सितंबर २००७ तक संपन्न हुई जिसमें देश के विभिन्न स्थानों से आये प्रभावित समुदायों, लोक संगठनों के प्रतिनिधियों, बुद्धिजीवियों, पत्रकारों आदि ने हिस्सा लिया। इस दौरान विश्व बैंक की कार्यशैली पर प्रकाश डालते हुए १०० से अधिक वक्ताआें ने इसका इतिहास, मान्यता, एजेन्डा, भूमिका, अर्थव्यवस्था और राष्ट्र की संप्रभुता में हस्तक्षेप आदि के साथ शिक्षा, स्वास्थ्य, पानी, ऊर्जा, कृषि, वन, खनन, पर्यावरण, आवास, खाद्य-सुरक्षा, गरीबी और मानवाधिकार जैसे मुद्दों पर अपने विश्लेषण प्रस्तुत किए । इस स्वतंत्र जन न्यायाधिकरण का आयोजन विश्व बैंक समूह द्वारा वित्तपोषित परियोजनाआे पर निगरानी रखने के लिए किया गया था। भारत विश्व बैंक के ४ सर्वाधिक बड़े कर्जदारों में शामिल है । वैसे तो विश्व बैंक का घोषित लक्ष्य दूसरे विश्व युद्ध से जर्जर देशों में ढांचागत सुविधाएं उपलब्ध करवाकर वहां का जीवन स्तर सुधारना था, लेकिन अब यह अपने बड़े निवेशक देशों यथा अमेरिका, इंग्लैंड, जापान, जर्मनी और फ्रांस की निजी कंपनियों का हितसाधक बन गया है । न्यायाधिकरण में बुनकरों से लेकर सार्वजनिक क्षेत्र के कर्मचारियों तक, किसानों से लेकर मछुआरांे तक और ग्रामीणों से लेकर शहरी गरीबों तक सबने एक स्वर में विश्व बैंक को देश की अर्थव्यवस्था की बर्बादी तथा आम आदमी की जीविका पर संकट खड़ा करने के लिए कटघरे में खड़ा किया । विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष की शर्तो के तहत गरीबी हटाने के नाम पर प्रारंभ किए गए ढांचागत समायोजन कार्यक्रमों के परिणाम अब सर्वत्र दिखाई देने लगे हैं । सन् १९९५ में गठित विश्व व्यापार संगठन तीसरी दुनिया के देशोंकी लूट को वैधानिक बनाने हेतु हर उस कानून को खारिज करवाने पर आमदा है जो निजी कंपनियों की लूट में बाधा बन रहा है । नव-उपनिवेशवादी नीतियों के कारण देश की ६५ प्रतिशत आबादी का भरण-पोषण करने वाला कृषि क्षेत्र आज दयनीय हालत में है । हरित क्रांति की आत्ममुग्धता के बावजूद खाद्यान्न आत्मनिर्भरता लगातार कम हो रही है । विदेशी मुद्रा भण्डार का बड़ी मात्रा में उपयोग अनाज, दलहन और खाद्य तेलों के आयात में हो रहा है । निजी कंपनियों को खुली छूट देने से किसानों के लिए कृषि क्षेत्र घाटे का सौदा बनता जा रहा है। फुटकर बाजार में निजी क्षेत्र के प्रवेश ने ने छोटे-मोटे धंधों से रोजीकमाने वालों को बेकार कर दिया है । रियल एस्टेट में पैदा की गई बूम से आम आदमी के सिर पर छत भी सपना बन कर रह गई है । कुल मिलाकर बड़े पैमाने पर लोगों को जमीन और रोजगार से बेदखल किया जा रहा है । एक लाख से अधिक अरबपतियों वाले देश में ३० करोड़ लोग दिन में २० रूपये भी नहीं कमा पाते हैं । ढांचागत समायोजन कार्यक्रम ने विश्व बैंक का काम बढ़ा दिया है । इसलिए उसने तीसरी दुनिया के देशोंको अपने बाहुपाश में जकड़ने के लिए अंतर्राष्ट्रीय विकास संगठन, अंतर्राष्ट्रीय वित्त निगमक, बहुपक्षीय निवेश गारंटी एजेंसी जैसी संस्थाएं गठित कर ली है । केवल इतना ही नहीं इन्होंने `अंतर्राष्ट्रीय निवेश विवाद निराकरण' नाम से अपना अलग न्यायालय भी बना लिया है जहां देशों और कंपनियों के मध्य गुप्त् रूप से विवाद सुलझाए जाते हैं । जानकारी के मुताबिक विश्व बैंक अ.मु.कोष के साथ मिलकर इन दिनों लगभग ९० देशों की अर्थव्यवस्थाआे को वहां के राजनीतिक और व्यावसायिक संपन्न वर्ग के सहयोग से काबू में करने में जुटा है । अनुभव बताते हैं कि एक बार कोई गरीब देश विश्व बैंक समूह के जाल में फंस जाता है तो उसकी हालत बद से बदतर होती जाती है । मेक्सिको, अर्जेटाईना जैसे लातिनी अमेरिकी देश इसके उदाहरण है, जो अब इससे छुटकारा पाने हेतु प्रयासरत हैं । विश्व बैंक देश की नीति निर्धारण प्रक्रिया में अंदर तक घुस चुका है । भारत और विश्व बैंक के अधिकारियों की आपस में अदलाबदली आम है । वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण के अनुसार विश्व बैंक और अ.मु.कोष में नौकरी कर चुके लोगों को देश में अत्यंत संवेदनशील और उच्च् पदों पर बैठाया जाता रहा है । उन्होंने रिजर्व बैंक के गर्वनर विमल जालान, योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेकसिंहआहलुवालिया और उद्योग मंत्रालय में आर्थिक सलाहकार राकेश मोहन का विशेष रूप से उल्लेख किया । इन सभी को विश्व बैंक की नौकरी के कारण ही इन महत्वपूर्ण पदों की सौगात दी गई है । पिछले वर्ष तो योजना आयोग में भी विदेशी फर्मो को अधिकृत रूप से सलाहकार बना दिया गया था । प्रशांत भूषण ने पश्चिम बंगाल के पूर्व वित्तमंत्री और अर्थशास्त्री अशोक मित्रा की पुस्तक का हवाला देते हुए कहा कि १९९१ में डॉ. मनमोहनसिंह को वित्तमंत्री भी विश्व बैंक के दबाव में ही बनाया गया था । किसे पता कि अब उन्हें प्रधानमंत्री बनाने में भी विश्व बैंक का योगदान हो ? कहने के लिए तो विश्व बैंक खुलेपन का हिमायती है लेकिन व्यवहार में उसका चेहरा ऐसा नहीं है । सारे देश में लागू `सूचना का अधिकार कानून' भी विश्व बैंक की मजबूत चारदिवारी के सामने बेदम है । सामाजिक सरोकारों से उसका कोई इत्तेफाक नहीं रहा है । अपनी नीतियों के नकारात्मक परिणामों पर वह जनमत की उपेक्षा करता है । सन् २००२ में प्रकाशित `विश्व बांध आयोग' की रिपोर्ट को खारिज करते हुए उसने बड़े बांधो के लिए कर्ज देना जारी रखा है । भारत में निर्माणाधीन और प्रस्तावित कुछ बांधों में तो विश्व बैंक का वित्तपोषण है । लेकिन उसने आगे भी समर्थन का संकेत दिया है। न्यायाधिकरण में सुनवाई की समािप्त् पर ज्यूरी का मत था कि विश्व बैंक जिस तरह से देश की नीतियों को प्रभावित कर रहा है उससे आम आदमी का जीवन कष्टमय होता जा रहा है । ज्यूरी में प्रो. अमित भादुड़ी, रामास्वामी अय्यर, ब्रूस रिच, अरूणा राय, अरूंधती राय ओर न्यायमूर्ति सुरेश आदि प्रमुख रूप से उपस्थित थे । उधर विश्व बैंक ने अपनी वेबसाइट पर ज्यूरी के निष्कर्षोंा का खण्डन करते हुए कहा कि वह निजीकरण को बढ़ावा नहीं दे रहा है तथा वह प्रदूषण फैलाने वाली प्रौद्योगिकी पर नियंत्रण एवं औद्योगिक अपशिष्टों के निपटान में व्यस्त रहता है । कुल मिलाकर इस न्यायाधिकरण के माध्यम से विश्व बैंक की नीतियों से पीड़ित समाज के विभिन्न वर्गो ने विश्व बैंक को उसकी जनविरोधी नीतियों के प्रति खबरदार किया है । इसे विश्व बैंक की नीतियों के प्रति बढ़ने प्रतिरोध के रूप में देखा जाना चाहिए । विश्व बैंक द्वारा न्यायाधिकरण के निष्कर्मो पर जवाब देना यह सिद्ध करता है कि जनआक्रोश की अवहेलना अब उसके लिए आसान नहीं है । हम उम्मीद करते हैं कि अब देश के प्रभावित समुदाय और बुद्धिजीवी विश्व बैंक की नीतियों पर लगाम लगाने की दिशा में लगातार प्रयासरत रहेंगे ।

३ हमारा भूमण्डल

औद्योगिकीकरण की शिकार महिलाएं
अलिसन क्रेग/डायना वार्ड एवं डेबोराह बर्टन
हम अपने आसपास नजर दौड़ाएं तो लगता है कि स्तर कैंसर से न केवल रिकार्ड स्थापित कर दिये हैं बल्कि ये बहुत आम भी हो चला है । वैज्ञानिक भी इसकी पुष्टि करते हैं । इन मामलों में कमी के कोई आसार भी नजर नहीं आ रहे हैं । इंग्लैड के सरकारी आंकड़े (सितंबर २००६) बताते हैं कि गत तीन दशकों में इनमें न केवल ८० प्रतिशत का इजाफा हुआ है बल्कि अब इनमें लगातार वृद्धि भी हो रही है । ब्रिटेन में कैंसर के सारे प्रकारों ने स्तन कैंसर का प्रतिशत सर्वाधिक है । हर वर्ष करीब ४२००० महिलाआे में इस बीमारी की पुष्टि हो रही है । यह बीमारी स्वयं पीड़िता और उसके परिवार दोनों के लिए एक भयावह त्रासदी है । वैज्ञानिक कहते हैं कि मानव निर्मित ऐसे कृत्रिम रसायनों की एक बड़ी श्रृंखला हमारे वातावरण में मौजूद है जो स्त्री हारमोन की नकल है । स्तन कैंसर के आक्रमण एवं फैलाव का प्रमुख कारण ये हारमोन्स ही हैं। यदि स्त्रियां इस तरह के रसायनों के संपर्क में ज्यादा समय तक रहेंगी तो जाहिर है स्तन कैंसर के फैलाव की संभावनाएं भी बढ़ेगी, खासकर जीवन के विभिन्न विकट पड़ावों जैसे गर्भावस्था, मासिक धर्म, रजो-निवृत्ति और वृद्धावस्थ के दौरान । हमारी सरकारें, रयासन उद्योग और प्रमुख कैंसर संगठन इन खतरों को जानबूझकर नजरअंदाज कर रहे हैं । रणनीतिक विशेषज्ञों ने सरकार को आगर किया है कि दो प्रमुख वजहें है - बढ़ती उम्र और दैनिक जीवन पद्धति । साथ ही उनकी यह अनुशंसा भी है कि चूंकि इन मामलों में बहुत बढ़ोत्तरी होने वाली है, अत: पूर्व तैयारी ही अब समय की मांग है। इस घातक बीमारी से लड़ने के लिए हमें समुचित दवाइयों की आवश्यकता होगी। नए शोध बताते हैं कि स्तर कैंसर के ५० प्रशित मामलें भी ऐसे नहीं है जिनमें पारंपरिक रूप से मान्य कारकों (प्रथम प्रसव देर से होना, संतानें न होना, कुपोषण, मोटापा ओर नशीले पदार्थो का सेवन) को उत्तरदायी ठहराया जा सके । मात्र ५ प्रतिशत स्तन कैंसर के मामलों में आनुवांशिकता कारक मानी जाती है । अतएव यह सिद्ध हो जाता है कि पीड़ित महिलाआे की एक बड़ी संख्या आनुवांशिक कारणों से पीड़ित नहीं हुई है वरन इस बीमारी ने उन्हें स्वयं के जीवनकाल के दौरान ही अपनी गिरफ्त में लिया है । अप्रकाशित सरकारी आंकड़े बताते हैं कि सभी आयु समूहों को ध्यान में रखें तो पिछले पंद्रह वर्षो में बीमारी ग्रस्त स्तन को ऑपरेशन द्वारा निकालना (मेसटेकटॉमी) की दर ने ४४ प्रतिशत की छलांग लगाई है और इसकी सबसे बुरी बात यह है कि १५ से ४४ वर्ष आयु समूह में यह अत्यधिक यानि ४१ प्रतिशत है । यह इस बात का प्रमाण है कि स्तन कैंसर सिर्फ बढ़ती उम्र की बीमारी नहीं है, बल्कि इसकी संभावना अब हर आयु समूह तक फैल रही है । यूरोप में इस वक्त तकरीबन एक लाख कृत्रिम रयासन बेचे जा रहे हैं । इनका प्रभाव अब न सिर्फ हवा, मिट्टी, पानी, जल स्त्रोतों, जंगलों और जानवरों में बल्कि मानवों में भी फैल चुका है । रोजमर्रा के जीवन में खाद्य पदार्थो में कीटनाशकों के अवशेषों या अन्य दैनिक उपभोग की वस्तुआें के माध्यम से हम इनके संपर्क में आते हैं । इनकी इतनी बड़ी मात्रा ही इनके विषैले प्रभावों से संंबंधित आंकड़ों के एकत्रीकरण में बाधक है । अमेरिका के राष्ट्रीय स्वास्थ्य एवं सुरक्षा संगठन द्वारा १९८० में सूचीबद्ध ४५००० विषैले रसायनों में से २५०० की पहचान कारसीनोजीन्स (कैंसर संवर्धित करने वाले) के रूप में २७०० की म्यूटाजीन्स (जो आनुवांशिक परिवर्तन के लिए जिम्मेदार हैं) और ३०० की टेराटोजेम्स (जो भ्रूण विकास के लिए जिम्मेदार हैं) के रूप में हुई है यानि उतने सारे रसायनों में से सिर्फ ७००० का ही समुचित परीक्षण हो पाया है । यूरोपीय नियामक प्राधिकरण द्वारा सूचित ४०० रयासना तो हरमोन प्रणाली को प्रभावित करने के अपने गुणों की वजह से हारमोन कैंसर के लिए शक के दायरे में हैं । स्वतंत्र वैज्ञानिकों के प्राग घोषणापत्र में भी अंत: स्त्रावी प्रभावकारी रसायनों के बारे में चिंता व्यक्त की गई है। लगता है कि जैसे नियामक विज्ञान पिछड़ रहा है और लगता है कि जैसे नियामक विज्ञान पिछड़ रहा है और निवारक उपायों के मामलें में ढीलपोल बदस्तूर जारी है । `नो मोर बे्रस्ट केंसर केम्पेन' अब सरकार पर यह दबाव बना रहा है कि नागरिकों को ऐसे हानिकारक पदार्थो के संपर्क में कमी लाने हेतु अंतर सरकारी रणनीतिक योजना बनाई जाए, क्योंकि कैंसर मात्र जीवन पद्धति से संबंधित बीमारी नहीं है । सरकारों को भोजन पदार्थो में कीटनाशकों के अंशोंके लिए नई सीमाएं निर्धारित करना होंगी । क्योंकि आज हमारे द्वारा खरीदे जाने वाले ताजा खाद्य पदार्थो में से एक तिहाई में इनकी खतरनाक मात्रा मौजूद है । सरकारों की खतरनाक औद्योगिक रसायनों जैसे कि डिब्बाबंद पदार्थो के डिब्बों की अंदरूनी परत में `बिस्फेनाल ए' के इस्तेमाल पर भी रोक लगानी होगी । दूषित हवा को भी इसमें शामिल किया जाना होगा क्योंकि तभी उत्सर्जन संबंधी कड़े सरकारी नियम बनाए जा सकेंगे । एक मुकम्मल जांच पद्धति भी बनानी होगी ताकि इन रसायनों के प्रभावों को आंकने के लिए स्वैच्छिक तौर पर खून एवं वसा की जांच द्वारा प्रदूषण के विस्तार पर रोशनी डाली जा सके । वास्तविक यह है कि किसी भी तरह के बड़े रणनीतिक उपाय करना व्यक्तिगत रूप से एक अंकेली महिला के बस की बात नहीं है । बल्कि ऐसा सिर्फ सरकारें कर सकती हैं । हां कुछ साधारण निवारक उपाय जरूर महिलाएं कर सकती है, जैसे जैविक रूप से उपजाए गए खाद्य पदार्थ खरीदना । इससे रसायनों से संपर्क तो कम होगा ही वातावरण में भी विष का प्रभाव घटेगा या एक उपभोक्ता के नाते पर्यावरण हितैषी सौंदर्य सामग्री और घरेलू सफाई हेतु ऐसे उत्पादों का उपयोग करना जिसमें खतरनाक रसायन मौजूद न हों । स्तर कैंसर के बढ़ते मामलों में हुई वास्तविक मृत्यु को आम तौर पर सरकारें और प्रमुख कैंसर संगठन आंकड़ों के साथ हेराफेरी कर छुपाते हैं । सच पूछा जाए तो इस वक्त उस महिला के पास जिसके स्तन कैंसर का कारण वातावरण का प्रदूषण है कोई ऐसा समुचित तरीका नहीं है जो उसे उसके कष्ट से छुटकारा दिला सके । `नो मोर ब्रेस्ट कैंसर क&