गुरुवार, 8 नवंबर, 2007
कैसे मनाएं दीपावली
इस अंक में
संपादकीय
पुण्य स्मरण
१ सामयिक
२ दीपावली पर विशेष
विश्व बैंक और भारत
रेहमत/शिरीष खरे
नई दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय परिसर में विश्व बैंक के कामकाज को लेकर स्वतंत्र जन न्यायाधिकरण (आईपीटी) की सुनवाई २१ से २४ सितंबर २००७ तक संपन्न हुई जिसमें देश के विभिन्न स्थानों से आये प्रभावित समुदायों, लोक संगठनों के प्रतिनिधियों, बुद्धिजीवियों, पत्रकारों आदि ने हिस्सा लिया। इस दौरान विश्व बैंक की कार्यशैली पर प्रकाश डालते हुए १०० से अधिक वक्ताआें ने इसका इतिहास, मान्यता, एजेन्डा, भूमिका, अर्थव्यवस्था और राष्ट्र की संप्रभुता में हस्तक्षेप आदि के साथ शिक्षा, स्वास्थ्य, पानी, ऊर्जा, कृषि, वन, खनन, पर्यावरण, आवास, खाद्य-सुरक्षा, गरीबी और मानवाधिकार जैसे मुद्दों पर अपने विश्लेषण प्रस्तुत किए । इस स्वतंत्र जन न्यायाधिकरण का आयोजन विश्व बैंक समूह द्वारा वित्तपोषित परियोजनाआे पर निगरानी रखने के लिए किया गया था। भारत विश्व बैंक के ४ सर्वाधिक बड़े कर्जदारों में शामिल है । वैसे तो विश्व बैंक का घोषित लक्ष्य दूसरे विश्व युद्ध से जर्जर देशों में ढांचागत सुविधाएं उपलब्ध करवाकर वहां का जीवन स्तर सुधारना था, लेकिन अब यह अपने बड़े निवेशक देशों यथा अमेरिका, इंग्लैंड, जापान, जर्मनी और फ्रांस की निजी कंपनियों का हितसाधक बन गया है । न्यायाधिकरण में बुनकरों से लेकर सार्वजनिक क्षेत्र के कर्मचारियों तक, किसानों से लेकर मछुआरांे तक और ग्रामीणों से लेकर शहरी गरीबों तक सबने एक स्वर में विश्व बैंक को देश की अर्थव्यवस्था की बर्बादी तथा आम आदमी की जीविका पर संकट खड़ा करने के लिए कटघरे में खड़ा किया । विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष की शर्तो के तहत गरीबी हटाने के नाम पर प्रारंभ किए गए ढांचागत समायोजन कार्यक्रमों के परिणाम अब सर्वत्र दिखाई देने लगे हैं । सन् १९९५ में गठित विश्व व्यापार संगठन तीसरी दुनिया के देशोंकी लूट को वैधानिक बनाने हेतु हर उस कानून को खारिज करवाने पर आमदा है जो निजी कंपनियों की लूट में बाधा बन रहा है । नव-उपनिवेशवादी नीतियों के कारण देश की ६५ प्रतिशत आबादी का भरण-पोषण करने वाला कृषि क्षेत्र आज दयनीय हालत में है । हरित क्रांति की आत्ममुग्धता के बावजूद खाद्यान्न आत्मनिर्भरता लगातार कम हो रही है । विदेशी मुद्रा भण्डार का बड़ी मात्रा में उपयोग अनाज, दलहन और खाद्य तेलों के आयात में हो रहा है । निजी कंपनियों को खुली छूट देने से किसानों के लिए कृषि क्षेत्र घाटे का सौदा बनता जा रहा है। फुटकर बाजार में निजी क्षेत्र के प्रवेश ने ने छोटे-मोटे धंधों से रोजीकमाने वालों को बेकार कर दिया है । रियल एस्टेट में पैदा की गई बूम से आम आदमी के सिर पर छत भी सपना बन कर रह गई है । कुल मिलाकर बड़े पैमाने पर लोगों को जमीन और रोजगार से बेदखल किया जा रहा है । एक लाख से अधिक अरबपतियों वाले देश में ३० करोड़ लोग दिन में २० रूपये भी नहीं कमा पाते हैं । ढांचागत समायोजन कार्यक्रम ने विश्व बैंक का काम बढ़ा दिया है । इसलिए उसने तीसरी दुनिया के देशोंको अपने बाहुपाश में जकड़ने के लिए अंतर्राष्ट्रीय विकास संगठन, अंतर्राष्ट्रीय वित्त निगमक, बहुपक्षीय निवेश गारंटी एजेंसी जैसी संस्थाएं गठित कर ली है । केवल इतना ही नहीं इन्होंने `अंतर्राष्ट्रीय निवेश विवाद निराकरण' नाम से अपना अलग न्यायालय भी बना लिया है जहां देशों और कंपनियों के मध्य गुप्त् रूप से विवाद सुलझाए जाते हैं । जानकारी के मुताबिक विश्व बैंक अ.मु.कोष के साथ मिलकर इन दिनों लगभग ९० देशों की अर्थव्यवस्थाआे को वहां के राजनीतिक और व्यावसायिक संपन्न वर्ग के सहयोग से काबू में करने में जुटा है । अनुभव बताते हैं कि एक बार कोई गरीब देश विश्व बैंक समूह के जाल में फंस जाता है तो उसकी हालत बद से बदतर होती जाती है । मेक्सिको, अर्जेटाईना जैसे लातिनी अमेरिकी देश इसके उदाहरण है, जो अब इससे छुटकारा पाने हेतु प्रयासरत हैं । विश्व बैंक देश की नीति निर्धारण प्रक्रिया में अंदर तक घुस चुका है । भारत और विश्व बैंक के अधिकारियों की आपस में अदलाबदली आम है । वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण के अनुसार विश्व बैंक और अ.मु.कोष में नौकरी कर चुके लोगों को देश में अत्यंत संवेदनशील और उच्च् पदों पर बैठाया जाता रहा है । उन्होंने रिजर्व बैंक के गर्वनर विमल जालान, योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेकसिंहआहलुवालिया और उद्योग मंत्रालय में आर्थिक सलाहकार राकेश मोहन का विशेष रूप से उल्लेख किया । इन सभी को विश्व बैंक की नौकरी के कारण ही इन महत्वपूर्ण पदों की सौगात दी गई है । पिछले वर्ष तो योजना आयोग में भी विदेशी फर्मो को अधिकृत रूप से सलाहकार बना दिया गया था । प्रशांत भूषण ने पश्चिम बंगाल के पूर्व वित्तमंत्री और अर्थशास्त्री अशोक मित्रा की पुस्तक का हवाला देते हुए कहा कि १९९१ में डॉ. मनमोहनसिंह को वित्तमंत्री भी विश्व बैंक के दबाव में ही बनाया गया था । किसे पता कि अब उन्हें प्रधानमंत्री बनाने में भी विश्व बैंक का योगदान हो ? कहने के लिए तो विश्व बैंक खुलेपन का हिमायती है लेकिन व्यवहार में उसका चेहरा ऐसा नहीं है । सारे देश में लागू `सूचना का अधिकार कानून' भी विश्व बैंक की मजबूत चारदिवारी के सामने बेदम है । सामाजिक सरोकारों से उसका कोई इत्तेफाक नहीं रहा है । अपनी नीतियों के नकारात्मक परिणामों पर वह जनमत की उपेक्षा करता है । सन् २००२ में प्रकाशित `विश्व बांध आयोग' की रिपोर्ट को खारिज करते हुए उसने बड़े बांधो के लिए कर्ज देना जारी रखा है । भारत में निर्माणाधीन और प्रस्तावित कुछ बांधों में तो विश्व बैंक का वित्तपोषण है । लेकिन उसने आगे भी समर्थन का संकेत दिया है। न्यायाधिकरण में सुनवाई की समािप्त् पर ज्यूरी का मत था कि विश्व बैंक जिस तरह से देश की नीतियों को प्रभावित कर रहा है उससे आम आदमी का जीवन कष्टमय होता जा रहा है । ज्यूरी में प्रो. अमित भादुड़ी, रामास्वामी अय्यर, ब्रूस रिच, अरूणा राय, अरूंधती राय ओर न्यायमूर्ति सुरेश आदि प्रमुख रूप से उपस्थित थे । उधर विश्व बैंक ने अपनी वेबसाइट पर ज्यूरी के निष्कर्षोंा का खण्डन करते हुए कहा कि वह निजीकरण को बढ़ावा नहीं दे रहा है तथा वह प्रदूषण फैलाने वाली प्रौद्योगिकी पर नियंत्रण एवं औद्योगिक अपशिष्टों के निपटान में व्यस्त रहता है । कुल मिलाकर इस न्यायाधिकरण के माध्यम से विश्व बैंक की नीतियों से पीड़ित समाज के विभिन्न वर्गो ने विश्व बैंक को उसकी जनविरोधी नीतियों के प्रति खबरदार किया है । इसे विश्व बैंक की नीतियों के प्रति बढ़ने प्रतिरोध के रूप में देखा जाना चाहिए । विश्व बैंक द्वारा न्यायाधिकरण के निष्कर्मो पर जवाब देना यह सिद्ध करता है कि जनआक्रोश की अवहेलना अब उसके लिए आसान नहीं है । हम उम्मीद करते हैं कि अब देश के प्रभावित समुदाय और बुद्धिजीवी विश्व बैंक की नीतियों पर लगाम लगाने की दिशा में लगातार प्रयासरत रहेंगे ।


