सोमवार, 11 फ़रवरी 2008

१२ कविता

`प्रकृति एवं पर्यावरण पर हाइकु'
राजीव नामदेव `राना लिधौरी'
पर्यावरण,
की उथल-पुथल ।
महा विनाश ।।
जल के स्त्रोत,

जंगल औ बादल ।
जीवन ज्योति ।।
साफ जंगल,

नदिया प्रदूषित ।
कैसे मंगल ।।
जीवन दवा,

जल,जमीन, हवा ।
बिकने लगी ।।
टेढ़ी नज़र,

जब प्रकृति की होती ।
सब रोते हैं ।।
जाड़े के दिन,
ये कुनकुनी धूप ।
हमें सुहाती ।।
फागुन आया,

फूली है कचनार ।
आम बौराया ।।
आकाश पाना,

चाहता हँू मैं तो हँू,
धरा की धूल ।।
उड़ान भरी,

कि आसमां छू ले देखा ।
जमीं अंदर ।।
जीवन यात्रा,

अहसास की राहें ।
पथरीली है ।।
***

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