
सोमवार, 11 फ़रवरी, 2008
इस अंक में
पर्यावरण डाइजेस्ट इस अंक में वन, वनवासी और जलवायु परिवर्तन पर विशेष सामग्री दी गयी है । पहले लेख सर एडमंड हिलेरी : प्रकृति पुत्र का अवसान में डॉ. खुशालसिंह पुरोहित ने सर एडमंड हिलेरी को श्रद्धासुमन अर्पित किए हैं । दूसरे लेख नदियों की जिंदगी का सवाल में म.प्र. के वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद भार्गव लिख रहे हैं कि आज की सबसे बड़ी आवश्यकता नदियों को प्रदूषण एवं शोषण से बचाने की है । पेनांग (मलेशिया) स्थित थर्ड वर्ल्ड नेटवर्क के निदेशक मार्टिन खोर के लेख एक जटिल समस्या है, जलवायु परिवर्तन में वे सचेत कर रहे हैं कि बढ़ता तापमान आज का सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा है । सुप्रसिद्ध पत्रकार लेखक राजुकुमार लेख वन अधिकार कानून : अभी तो अंगड़ाई है में लिख रहे हैं कि १५० वर्षो के अन्याय के बाद पहली बार वनवासी समूह विस्थापित होने की यातना से थोड़ी राहत की उम्मीद कर रहा है । म.प्र. के वरिष्ठ वन अधिकारी जगदीश प्रसाद शर्मा के लेख दूध-दही की नदियों वाले देश में बिकता पानी में लिख रहे कि हमारे देश में धर्म, जाति, सम्प्रदाय आदि को भुलाकर केवल राष्ट्र धर्म को सर्वोपरि रखते हुए आबादी नियंत्रण और वनक्षेत्र बढ़ाने हेतु कानून बनाना होगा । कविता में इस बार टीकमगढ़ (म.प्र.) के साहित्यकार राना लिधौरी के प्रकृति और पर्यावरण पर हाईकू आपको पसंद आएंगें इसी प्रकार विशेष लेख में दिल्ली स्थित लेखिका सुश्री रेशमा भारती का लेख जलवायु परिवर्तन और हम भी आपको रूचिकर लगेगा । पत्रिका के स्थायी स्तम्भ पर्यावरण परिक्रमा, ज्ञान-विज्ञान और पर्यावरण समाचार में पर्यावरण जगत मे हो रही नित-नयी हलचलों से आप रुबरु होते हैं । पत्रिका के बारे में अपने विचारों से हमें अवगत करायें ।
- कुमार सिद्धार्थ
स्तम्भ:
इस अंक में
संपादकीय
कान्हा में पर्यटको की बढ़ती संख्या से जुड़े सवाल
विश्वविख्यात कान्हा टाईगर रिजर्व इस वर्ष भी पर्यटकों को भी आकर्षित करने में सफल रहा है। पर्यटन वर्ष २००६-०७ में देशी सैलानियों की संख्या में पिछले वर्ष की तुलना में लगभग दो गुना वृद्धि दर्ज की गयी है । जबकि विदेशी पर्यटकों की संख्या लगभग बराबर रही है । देश के २८ टाईगर रिजर्व में सर्वश्रेष्ठ कान्हा टाईगर रिजर्व में पर्यटकों की बढ़ती संख्या से भविष्य में होने वाले नुकसान को भी अनदेखा नहीं किया जाना चाहिये । देश के हृदय स्थल मध्यप्रदेश में लगभग १९४७ वर्ग किलोमीटर में फेलायह वन्य जीवन संरक्षित क्षेत्र एशिया का सर्वश्रेष्ठ पर्यटन स्थल है । जैव विविधता से परिपूर्ण इस टाईगर रिजर्व में स्तनधारियों की ४० तथा पक्षियों की ३०० से अधिक प्रजातियां पायी जाती है । बाघ दर्शन के लिए प्रसिद्ध इस टाईगर रिजर्व की प्रमुख विशेषता है विश्व में अन्यत्र कहीं नहीं पाया जाने वाली अतिसंकटग्रस्त वन्यजीव प्रजाति का दलदली हिरण, बारहसिंघा विलुप्त् होने की कगार पर खड़ी इस ब्रेडरी उपप्रजाति के बारहसिंगों की संख्या कान्हा में ३०० के आसपास है । बाघों के दर्शन के लिए प्रसिद्ध इस टाईगर रिजर्व में बाघों की संख्या ९० तथा गुलबाघों की संख्या ९८ है । पर्यटन वर्ष २००६-०७ में ९५,६४६ घरेलू तथा १०,६५१ विदेशी यानि कुल १,०६,२९७ पर्यटकों ने कान्हा टाईगर रिजर्व का भ्रमण किया है । कान्हा टाईगर रिजर्व में पर्यटकों की संख्या में लगातार वृद्धि राजस्व प्रािप्त् की दृष्टि से यह एक अच्छी खबर हो सकती है लेकिन वन्यजीव विशेषज्ञ और वन्य जीव प्रेमी इस खबर से ज्यादा हर्षित नहीं है । वर्षो से जैविक दबाव झेल रहा कान्हा टाईगर रिजर्व पर्यटकों के इस बढ़ते दबाव को किस हद तक सहन कर पायेगा यह देखा जाना जरूरी है । रिजर्व का छोटा पर्यटन जोन तथा इको पर्यटन की सीमित सुविधाएं इस तरह से बढ़ती पर्यटकों की भीड़ को सम्हालने में असमर्थ दिखायी देते है । यद्यपि कान्हा उद्यान प्रबंधन पर्यटकों की इस भीड़ को नियंत्रित करने की दिशा में समुचित प्रयास कर रहा है लेकिन इको पर्यटन की अवधारणा को लेकर आगे आये पर्यटन व्यवसायियों की भागीदारी इस दिशा में शून्य है । एक सीमित वन क्षेत्र में तेजी से बढ़ रही पर्यटन गतिविधियों से वन्यजीवों के प्राकृतिक रहवास पर तो असर पड़ेगा ही वन्यजीव भी सुरक्षित नहीं रह पायेंगे। वन्य जीवन के प्रति बढ़ती जनजागरूकता व रूचि के कारण आगामी वर्षो में पर्यटकों की संख्या में और भी वृद्धि होने की संभावना है । विश्व के पर्यटन मानचित्र पर तेजी से एक वन्यजीव पर्यटन स्थल के रूप में स्थान बना रहे कान्हा टाईगर रिजर्व में भारतीय भौगोलिक परिस्थितियों के अनुकूल विश्वस्तरीय पर्यटन सुविधाएं विकसित करना आवश्यक है । यद्यपि किसी भी वन्यजीव संरक्षित क्षेत्र का उद्देश्य पर्यटन से राजस्व की प्राप्त् न होकर जैवविधिता का संरक्षण करना है लेकिन वन्य प्राणियों और इंसान के बीच प्रेम पूर्ण रिश्ता कायम कर इस प्राकृतिक सम्पदा के संरक्षण के साथ राजस्व प्रािप्त् भी की जा सकती है ।
स्तम्भ:
संपादकीय
प्रसंगवश
सही जानकारी
भारत में सिंचाई क्षेत्र की क्षमता में लगातार वृद्धि
पर्यावरण डाइजेस्ट के दिसम्बर ०७ अंक में प्रकाशित संपादकीय सामग्री में सिंचित क्षेत्र मेंकमी के आंकड़ों पर कुछ जागरूक पाठको ने हमारा ध्यान आकर्षित किया है । वास्तव में यह सामग्री सर्वोदय प्रेस सर्विस (सप्रेस) के १९ अक्टूबर ०७ के बुलेटिन से ली गयी थी । सप्रेस ने इसे बांधों, नदियों एवं लोगों का दक्षिण एशिया नेटवर्क द्वारा जारी विज्ञिप्त् एवं रिपोर्ट के आधार पर जारी किया था । हम अपने पाठकों को सही जानकारी मिल सके इस हेतु भारत सरकार द्वारा जारी आंकड़े सविस्तार दे रहे हैं । भारत सरकार के एक दस्तावेज में कहा गया है कि मौजूद प्रणालियों को सुदृढ़ करने के साथ-साथ सिंचाई सुविधाआे का विस्तार खाद्यान उत्पादन बढ़ाने की रणनीति का एक प्रमुख हिस्सा रहा है । सिंचाई सुविधा के प्रणालीबद्ध विकास के साथ बड़ी मध्यम और छोटी सिंचाई परियोजनाआे की कुल क्षमता १९५१ में २२.६ मिलियन हेक्टेयर (एम.एच.ए.) से बढ़कर वर्ष २००४-०५ के अंत तक लगभग ९८.८४ मिलियन हेक्टेयर हो गयी है । इसमें २००० में १०,००० हेक्टेयर के बीच के क्षेत्र मध्यम परियोजना और १०,००० हेक्टेयर से ऊपर के क्षेत्र बड़ी परियोजनाआे के अंतर्गत आते है । दसवींयोजना की शुरूआत में १६२ बड़ी परियोजनायें थी जिन पर कुल व्यय १४०९६८.७९ करोड़ रूपये अनुमानित था, जबकि २२१ मध्यम परियोजनाआे पर १२७६८.७७ करोड़ रूपये व्यय तथा ८५ विस्तार नवीनीकरण और आधुनिकीकरण परियोजनाआेपर २१२५६.५० करोड़ रूपये कुल व्यय होने का अनुमान था ।
आशा है हमारे पाठकों को इससे सही जानकारी प्राप्त् हो गयी होगी । इसी प्रकार जागरूक पाठकों से पत्रिका की संपादकीय सामग्री पर उनके विचार आमंत्रित है ।-प्र. संपादक
स्तम्भ:
प्रसंगवश
१ पुण्य स्मरण
सर एडमंड हिलेरी : प्रकृति पुत्र का अवसान
डॉ. खुशालसिंह पुरोहित
विश्व की सबसे ऊंची चोटी एवरेस्ट पर पहली बार कदम रखने वाले न्यूजीलैंड के सर एडमंड हिलेरी का ऑकलैंड अस्पताल में १० जनवरी को दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया । वे ८८ वर्ष के थे । आपका जन्म २० जुलाई १९१९ को हुआ था । श्री हिलेरी ने १९५३ में एवरेस्ट पर विजय पाकर एक नया इतिहास रचा था । वे पिछले कुछ समय से बीमार थे । न्यूजीलैंड के सर्वाधिक लोकप्रिय सर हिलेरी का छायाचित्र सम्मान स्वरूप न्यूजीलैंड के ५ डॉलर के नोट पर अंकित किया जाता है। अपने जीवन को नेपाली शेरपाआे को समर्पित करने वाले सर हिलेरी ने नेपाल में ६३ विद्यालयों के अतिरिक्त अनेक अस्पतालों, पुलों व हवाई पट्टी का भी निर्माण किया । उनके हिमालय ट्रस्ट ने नेपाल के लिए प्रति वर्ष ढाई लाख अमेरिकन डॉलर जुटाए और हिलेरी ने निजी तौर पर नेपाल अभियान में मदद दी । सर एडमंड हिलेरी और नेपाल के पर्वतारोही शेरपा तेनिजंग नोर्गे ने २९ मई १९५३ में माउंट एवरेस्ट पर विजय प्राप्त् की थी । सर हिलेरी कई सफलताआे, उल्लेखनीय साहसिक कारनामों, खोज और रोमांच के अलावा अपने विनम्र भाव के लिए जाने जाते थे। उन्होंने कभी अहंकार को अपने पास नहीं फटकने दिया । दुनिया की सबसे ऊंची चोटी पर ध्वज फहराकर ब्रिटिश क्लाइम्बिंग एक्सपीडीशन के तहत जब उन्होंने सफलता हासिल की तब वे केवल ३३ साल के थे । उनकी सफलता पर ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ द्वितीय ने उन्हें नाइट की उपाधि दी । लेकिन एडमंड एवरेस्ट में उनके साथ पहुंचे नोर्गे शेरपा के देश नेपाल में स्कूल और चिकित्सा क्लीनिक खोलने में अधिक गौरव महसूस करते रहे । सर एडमंड हिलेरी ने हिमालय की तलहटी में रहने वाले नेपाल के शेरपाआे के कल्याण के लिए अपना पूरा जीवन लगाया था । श्री हिलेरी जब १९३५ में स्कूल के एक पर्वतारोहण दल में शामिल हुए तब कोई नहीं कह सकता था कि कमजोर-सा दिखने वाला एक छात्र जबरदस्त इच्छाशक्ति का धनी है और मधुमक्खी पालन से जीविकापार्जन में लगे उस बालक के इरादे कुछ कर दिखाने के हैं । बीसवीं सदी के महान पर्वतारोहियों में एक हिलेरी ने न्यूजीलैंड की चोटियां चढ़ने के बाद आल्पस को लक्ष्य बनाया और फिर हिमालय पर्वत श्रृंखला की ११ विभिन्न चोटियां फतह करने के बाद उनका आत्मविश्वास और दृढ़ हो चुका था । एवरेस्ट रिकनेसेन्स एक्सपीडीशन के सदस्य के रूप में हिलेरी की प्रतिभा पर नजर १९५१ में एवरेस्ट फतह करने जा रहे अभियान दल के नेता सर जान हंट की पड़ी । मई में जब अभियान साउथ पीक पहुंचा तब केवल दो को छोड़कर शेष सदस्य थकान के कारण वापस लौटने को मजबूर हो गए । ये दो थे हिलेरी और नेपाली पवर्तरोही तेंजिंग नोर्गे । उन्होंने आखिरकार २९ मई १९५३ को समुद्र की सतह से २९,०२८ फुट ऊंची चोटी पर अपने पांव रख कर पर्वतारोहण क्षेत्र के कालपुरूष बन गए । इन उपलब्धि पूर्ण क्षणों में दोनों ने चोटी पर मात्र १५ मिनट बिताए । हिलेरी ने तेंजिग की फोटो ली । उन्होंने चोटी पर अपना क्रास उतारकर चढ़ाया । बाद में उन्होंने कहा था, हम नहीं जानते थे कि चोटी पर मानव का पहुंचना संभव है । शुरू में दोनों ने कहा था कि उन्होंने एक साथ चोटी चढ़ी लेकिन १९८६ में शेरपा की मौत के बाद सर एडमंड ने खुलासा किया कि वह अंतिम रिज में करीब १० फुट आगे थे । एवरेस्ट फतह की खबर ब्रिटेन में महारानी के अभिषेक के दिन पहुंची थी । श्री हिलेरी न्यूजीलैंड के थे और इस तरह वे राष्ट्रमंडल के नागरिक हुए, लिहाजा ब्रिटेन में भी उनकी उपलब्धि पर जश्न मनाया गया और उनकी सफलता के लिए नाइट की उपाधि दी गई । अगले दो दशकों के दौरान हिलेरी ने हिमालय में दस अन्य चोटियां फतह की । वे कामनवैल्थ ट्रांस : अंटार्कटिक एक्सपीडिशन के तहत दक्षिणी ध्रुव भी पहुंचे । उन्होंने १९७७ में गंगा नदी एक अभियान (जेटबोट एक्सपीडिशन) का भी नेतृत्व किया । सर हिलेरी ने अपने जीवन का अधिकांश भाग उन शेरपाआें के कल्याण में लगाया जो उनके विभिन्न अभियानों के दौरान उनसे मिले । भारत में दो साल तक न्यूजीलैंड के उच्चयुक्त रहने के दौरान उन्होंने १९६४ में हिमालय ट्रस्ट की स्थापना की थी । यह संस्था क्लीनिक, अस्पताल और स्कूल बनाने में मदद करती है । सर हिलेरी नेपालियोें की सेवा करने में गर्व महसूस करते थे । उन्होंने कहा था, मेरा सबसे बेहतर काम रहा स्कूलोंऔर क्लीनिकों का निर्माण । किसी चोटी की सतह से अधिक आनंद की अनुभूति मुझे इस कार्य से मिलती है । उन्हें उनकेदेश न्यूजीलैंड में काफी सम्मान दिया। न्यूजीलैंड और विदेशो में कई स्कूलों और संगठनों के नाम उन पर रखे गए । भारत में सेंट पाल्स स्कूल दार्जिलिंग में एक प्राथमिक खंड का नाम उनके नाम पर है । सर एडमंड शर्मीले स्वभाव के थे । इतने कि सितंबर १९५३ में अपनी होने वाली पत्नी लुसी मेरी रोस के समक्ष विवाह का प्रस्ताव उन्होंने अपनी सास के जरिए रखा था । वे अपने सेलीब्रिटी स्तर को लेकर भी काफी शर्मीले थे । अपनी सफलता की ५०वीं वर्षगांठ पर उन्होंने महारानी का निमंत्रण ठुकरा दिया और नेपाल में अपने शेरपा मित्रों के साथ इस अवसर को याद किया । सन् १९७५ वे नेपाल के फाफलू गाँव में अस्पताल का निर्माण करा रहे थे। तभी वहाँ आते हुए उनकी पत्नी और एक बच्च्े की विमान हादसे में मौत हो गई । परंतु हिलेरी का काम नहीं रुका । २१ दिसंबर १९८९ में उन्होने जून मलग्रु से विवाह किया, जो उनके स्वर्गवासी मित्र पीटर की पत्नी है । इस सेवाभावी व्यक्ति के ६ पोते-पोतियाँ हैं । इनमें से एमिलिया हिलेरी तो उनके ट्रस्ट का ही काम देख रही हैं । एवरेस्ट की पहली फतह की पंचासवीं बरसी पर उनके बेटे पीयर और तेजिंग नोर्गे के पुत्र जेमलिंग तेनजिंग नोर्गे ने भी अप्रैल २००३ में एवरेस्ट फतह किया। इस प्रकार प्रकृति पुत्रों ने अपनी परंपरा अपनी संतानों को विरासत में दी। वे अमेरिका हिमालयन फाउंडेशन के अध्यक्ष थे । यह अमेरिका की अलाभकारी संस्था है, जो हिमालय में लोगों के जीवनयापन तथा पारिस्थितकीय तंत्र को सुधारने में मदद करती है । सर हिलेरी की मृत्यु पर दुनियाभर में शोक मनाया गया और उन्हें शताब्दी के महत्वपूर्ण व्यक्ति के रूप में आदर दिया गया । ***
स्तम्भ:
पुण्य स्मरण
२ सामयिक
नदियों की जिंदगी का सवाल
प्रमोद भार्गव
जीवनदायनी नदियां हमारी सांस्कृतिक धरोहर हैं। नदियों के किनारे ही सभी आधुनिकतम सभ्यताएं विकसित हुई हैं । जिन पर हम गर्व कर सकते हैं । सिंधु घाटी और सारस्वत (सरस्वती) सभ्यताएं इसके उदाहरण हैं । भारत के सांस्कृतिक उन्नयन के नायकोंमें भागीरथ, राम और कृष्ण का नदियों से गहरा संबंध रहा है । भारतीय वांगमय में इन्द्र विपुल जल राशि के प्राचीनतम वैज्ञानिक प्रबंधक रहे हैं । भारत भू-खंड में आग, हवा और पानी को सर्वसुलभ नियामत माना गया है। हवा और पानी की शुद्धता व सहज उपलब्धता नदियों से है । आज नदियों के जल बंटवारे को लेकर राज्यों में परस्पर विवाद हैं । दूसरे औद्योगिक कचरे शहरी मल-मूत्र बहा देने का क्रम जारी रहने से नदियां प्रदूषित होकर अपना अस्तित्व ही खो रही हैं । ऐसे में केन्द्रीय जलसंसाधन मंत्री सैफुद्दीन सोज का यह सुझाव कि देश की प्रमुख नदियों को राष्ट्रीय नदियां और राष्ट्रीय संपत्ति घोषित कर भारत सरकार अपने अधिकार में ले, स्वागत योग्य है । यह जलसंकट के भयावह दौर से गुजर रहे राष्ट्र को जल समस्या से किसी हद तक निजात दिलाने का ठोस उपाय बन सकता है । जरुरत है हठधर्मिता छोड़ सम्यक, समन्वयवादी रवैया अपनाने और सर्वागीण विकासोन्मुखी दृष्टिकोण प्रचलन में लाने की । होने को तो दुनिया के महासागरों, हिमखंडो, नदियों और बड़े जलाशयों में अकूत जल भंडार हैं । लकिन मानव के लिए उपयोगी जीवनदायी जल और बढ़ती आबादी के बीच जल की उपलब्धता का बिगड़ता अनुपात चिंता का बड़ा कारण बना हुआ है । ऐसे मेें बढ़ते तापमान के कारण हिमखंडो के पिघलने और अवर्षा के चलते जल स्त्रोतों के सूखने का सिलसिला जारी है । वर्तमान में जल की खपत कृषि, उद्योग, विद्युत और पेयजल के रुप में सर्वधिक हो रही है । हालांकि पेयजल की खपत मात्र आठ फीसदी है । जिसका मुख्य स्त्रोत नदियां और भू-जल हैं । औद्योगिकीकरण, शहरीकरण और बढ़ती आबादी के दबाव के चलते एक ओर तो नदियां सिकुड़ रही हैं दूसरी ओर औद्योगिक कचरा और मल मूत्र बहाने का सिलसिला जारी रहने से गंगा और यमुना जैसी नदियां इतनी प्रदूषित हो गई हैं कि एक पर्यावरण संस्था ने यमुना को मरी हुई नदी तक घोषित कर दिया । मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित प्रख्यात जलविद् राजेन्द्र सिंह ने यमुना के किनारे राष्ट्रमंडल खेलों और मेट्रो को इस जीवनदायी नदी की मौत बताते हुए इन प्रस्तावों के विरुद्ध संघर्ष ही छेड़ा हुआ है । यह सही भी है यदि यमुना के जल-भरण वाले चार से पांच किलोमीटर चौड़े तटांे पर स्थायी सीमेंट-कांक्रीट के जंगल खड़े किए जाते हैं तो नदी की जल संग्रहण क्षमता निर्विवाद रुप से प्रभावित होगी । अक्षरधाम मंदिर का विशाल परिसर इस नदी के तट पर पहले ही खड़ा किया जा चुका है । राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में ४० प्रतिशत जल की आपूर्ति यमुना से ही होती है । गंगा, यमुना वाले पूरे दोआब क्षेत्र में जल का विशालतम भंडार है जो इंद्रप्रस्थ (दिल्ली) के भू-जल से अंत: सलिला के रुप में जु़़डा है । भू-जल के इन भंडारों का विस्तार हस्तिनापुर तक है। यमुना के जिन तटों पर खेल परिसर, पंचतारा होटल और सड़कों के निर्माण प्रस्तावित हैं, यदि वे आकार लेते हैं तो निश्चित ही उपरोक्त जल भंडारों में प्राकृतिक तौर से जारी जल पुनर्भरण की प्रक्रिया बाधित होगी । केन्द्रीय बोर्ड भी कहता है कि खुले मैदानों में जल पुर्नभरण की गतिविधियां तेजी से चलती हैं । एक तरफ तो दिल्ली सरकार हस्तिनापुर के भू-जल भंडारों से दिल्ली की प्यास बुझाने की कोशिश में लगी है । वहीं दूसरी तरफ यमुना के विशाल तटों को सीमेंट-कांक्रीट से पाटकर हस्तिनापुर के भूजल भंडारो के पुर्नभरण में अवरोध करने के प्रस्ताव ला रही है । वर्तमान हालातोंमें वैसे भी यमुना बाईस किलोमीटर लंबे नाले में तब्दील हो चुकी है । इसे प्रदूषण मुक्त बनाए रखने के लिए दो हजार करोड़ रुपए खर्च किए जा चुके हैं, लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात ही रहा बल्कि इसके उलट प्रदूषण दो गुना तक बढ़ गया है । नदियों में प्रतिदिन औद्योगिक अवशेष और मानव उत्सर्जन के रुप में तीन सौ करोड़ लीटर गंदा पानी छोड़ा जा रहा है । ८० प्रतिशत गंदा पानी शहरों से निकलता है । नदियों की प्रदूषण ग्रहण करने की स्वाभाविक क्षमता सेे यह गंदा पानी कई गुना अधिक है । इसलिए नदियों का जल मनुष्य और जलीय जीवों के लिए रोगजन्य साबित हो रहा है । हाल ही में चंबल नदी में ३१ घड़ियाल मरे पाए गए। वन विशेषज्ञों ने दावा किया है कि ये घड़ियाल चंबल का पानी जहरीला हो जाने के कारण लीवर सिरोसिस की बीमारी से मरे । अब तक यह बीमारी मनुष्यों में ही रेखांकित की गई थी । शायद ऐसे ही हालातों के संदर्भ में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को अंतत: यह कहना पड़ रहा है कि नदियों कि प्रदूषित होने के कारण सकल घरेलू उत्पाद में चार प्रतिशत का घाटा उठाना पड़ रहा है । केन्द्रीय भू-जल बोर्ड ने राष्ट्र के लगभग ८०० ऐसे भू-खंड को चिन्हित किया है, जिनमें भू-जल का स्तर निरंतर घट रहा है । ये भू-खंड दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, मध्यप्रदेश, बिहार, गुजरात और तमिलनाडु में हैं । यदि भू-जल स्तर के गिरावट में निरंतरता बनी रहती है तो भविष्य में भयावह जल संकट तो पैदा होगा ही भारत का पारिस्थितिकी तंत्र भी गड़बड़ा जाएगा । केन्द्र सरकार ने ४३ भू-खंडो से जल निकासी पर प्रतिबंध लगा दिया है। भू-जल संवर्धन की दृष्टि से यह एक कारगर पहल है । केन्द्रीय जल संसाधन मंत्री ने फिलहाल १२ नदियों को राष्ट्रीय संपत्ति घोषित करने का सुझाव दिया है । १३५०० किलोमीटर लंबी ये नदियां भारत के संपूर्ण मैदानी क्षेत्रों में अठखेलियां करती हुई मनुष्य और जीव-जगत के लिए प्रकृति का अनूठा और बहुमूल्य वरदान बनी हुई हैं । २५२८ लाख हेक्टेयर भू-खंड़ों और वन प्रांतरों में प्रवाहित इन नदियों में प्रति व्यक्ति ६९० घनमीटर जल है । कृषि योग्य कुल १४११ लाख हेक्टेयर भूमि में से ५४६ लाख हेक्टेयर भूमि इन्हीं नदियों की बदौलत प्रतिवर्ष सिंचित की जाकर फसलों को लहलहाती है । वैसे `पानी' हमारे संविधान में राज्यों के क्षेत्राधिकार में आता है । परंतु जो नदियों एक से अधिक राज्यों में बहती हैं उन्हें संपत्ति घोषित किए जाने में राज्यों को आपत्ति नहीं होनी चाहिए । हालांकि कावेरी जल विवाद पिछले १७ साल से उलझन में है । चंबल सिंचाई हेतु जल को लेकर भी राजस्थान और मध्यप्रदेश में हर साल विवाद छिड़ता है । वहीं महानदी और ब्रह्मपुत्र अंतर्राष्ट्रीय विवाद का कारण भी बनती हैं । इन विवादों का राष्ट्रीय स्तर पर निपटारा गंगा, यमुना, कृष्णा, कावेरी, नर्मदा, चंबल, सिंधु, महानदी, ब्रह्मपुत्र, ताप्ती, दामोदर, सतलज, झेलम और साबरमती नदियों को राष्ट्रीय संपत्ति घोषित कर किया जा सकता है । दरअसल हमारे देश में बड़ी और राष्ट्रीय मुश्किल यह है कि सरकारी क्षेत्र में जल, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी समस्याएं न तो राष्ट्रीयता को बोध कराने वाली प्राथमिक सूची में है । ***
स्तम्भ:
सामयिक
३ हमारा भूमण्डल
एक जटिल समस्या है, जलवायु परिवर्तन
मार्टिन खोर
नोबल पुरस्कार प्राप्त् जलवायु परिवर्तन पर अंतर्राष्ट्रीय सरकारों की पेनल (आय.पी.सी.सी.) की ताजा रपट का सार पढ़ लेने मात्र से पर्यावरण परिवर्तन के बारे में नवीनतम जानकारियां संक्षिप्त् और सटीक रूप में हम सबके सामने है। मात्र २३ पृष्ठीय यह रपट (विज्ञान पर प्रभाव, पर्यारण परिवर्तन के असर एवं पर्यावरण परिवर्तन को कम करने के लिए आवश्यक नीतियां) आय.पी.सी.सी. द्वारा पूर्व में जारी की गई हजारों पृष्ठों में फैली तीन अलग-अलग रपटों का निचोड़ है। यह गंभीर संकलित रपट हमें आसन्न चुनौतियों के बीच पृथ्वी पर जीवन को बचाए रखने के बारे में सुझाव भी देती है । उदाहरण के लिए पेनल अध्यक्ष राजेन्द्र पचौरी का कथन कि हम भले ही उत्सर्जन को बहुत सीमित कर लें और वातावरण में ग्रीन हाउस गैसों की मात्रा को इसी स्तर पर बनाए रखें तो भी समुद्री जलस्तर ०.०४ मीटर से १.४ मीटर तक बढ़ने की आशंका बनी रहेगी क्योंकि समुद्री जल के गर्म होने की क्रिया तो जारी रहेगी ही जिसके फलस्वरूप समुद्री क्षेत्र में फैलाव होना लाजमी है । उन्होंने बताया कि यह खोज बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि इसकी वजह से तटीय क्षेत्रों में बड़े परिवर्तन संभावित है जैसे निचले क्षेत्रों में जल प्लावन के खतरे होंगे और नदियों के डेल्टा प्रदेशों एवं निचले द्वीपों में भी इस वजह से बड़े दुष्प्रभाव प्रकट होंगे । इस कार्य में शामिल २५०० विशेषज्ञ वैज्ञानिक विश्लेषकों, १२५० लेखकों और १३० देशों के नीति निर्माताआें के साझा प्रयासों ने इसे इतना महत्वपूर्ण दस्तावेज बनाया है। इस रपट का मुख्य संदेश यह है कि तापमान में हो रही बढ़ोत्तरी में संदेह की गुंजाईश नहीं है और इस वजह से हवाआें की रफ्तार और समुद्री जल का तापमान भी साथ-साथ ही बढ़ेगा । जिसके परिणामस्वरूप समुद्रों का जलस्तर बढ़ेगा और बर्फबारी और पहाड़ों पर जमी बर्फ में और कमी आएगी । समुद्रों के जलस्तर की बढ़ती रफ्तार जो सन् १९६१ के १.८ मिलीमीटर प्रतिवर्ष की तुलना में सन् १९९३ में ३.१ मिलिमीटर प्रतिवर्ष तक जा पहुंची है इस समय सर्वाधिक चिंता का विषय है। इसकी मुख्य वजह है बढ़ते तापमान से हो रही घनत्व वृद्धि और ग्लेशियरों व पहाड़ी चोटियों पर जमी बर्फ और धु्रवों की बर्फ की चादरों का पिघलाव । अनुमान है कि २१वीं सदी के अंत तक समुद्री जलस्तर में वृद्धि का आंकड़ा १८ से ५९ सेंटीमीटर का स्तर छू लेगा । श्री पचौरी चेतावनी देते हुए कहते हैं कि तापमान में वृद्धि के कुछ असर आकस्मिक और अपरिवर्तनीय भी होंगे । उदाहरण के लिए ध्रुवों की बर्फ की चादर में हुआ थोड़ा-सा पिघलाव भी समुद्र के जलस्तर में कई मीटर की वृद्धि कर देगा। जिसके फलस्वरूप तटीय क्षेत्रों में बड़े परिवर्तन होंगे । निचले क्षेत्रों में जल भराव होगा, नदियों के डेल्टा प्रदेशों और निचले टापुआें में भी जलप्लावन की सी स्थितियां निर्मित होंगी । यह रपट तापमान वृद्धि के असर पर क्षेत्रवार प्रकाश डालती है । जैसे अफ्रीका में २०२० तक ७.५ करोड़ से लेकर २५ करोड़ लोगो को इसके दुष्परिणाम भुगतना होंगे । कुछ देशों में तो वर्षा आधारित कृषि घटकर ५० प्रतिशत रह जाएगी । एशिया में आने वाली मुख्य परेशानियां इस तरह है संभावना है कि २०५० तक मध्य, दक्षिण, पूर्व एवं दक्षिण पूर्व एशिया में खासतौर से बड़े नदी संग्रहणों में मीठे जल में भारी कमी होगी । दक्षिण पूर्व एवं दक्षिण पूर्वी एशिया के तटीय क्षेत्रों खास तौर से बड़ी आबादी वाले वृहद डेल्टा प्रदेशों में समुद्रों और नदियों की बाढ़ का सबसे ज्यादा खतरा होगा । संभावित जलवायु चक्र परिवर्तन की वजह से पूर्वी दक्षिण एवं दक्षिण पूर्वी एशिया में बाढ़ और सूखा जनित डायरिया की वजह से प्रदूषण और मृत्युदर में वृद्धि होगी । रपट चेतावनी देती है कि तापमान वृद्धि की शुरूआत हो चुकी है। सन् १९८० से अब तक के सर्वाधिक १२ गरम वर्षो की गणना करें तो हम पाएंगे कि सन् १९९५ से लेकर २००६ तक के बारह में से ग्यारह वर्ष पिछले १०० वर्षो में सर्वाधिक गरम थी, साथ ही पिछले १०० वर्षो में तापमान में ०.७४ डिग्री सेंटीग्रेड की वृद्धि हुई है । आर्कटिक की बर्फ का दायरा २.७ प्रतिशत प्रति दशक की दर से सिकुड़ता जा रहा है । गर्मियों में तो यह ७.४ प्रतिशत दशक की दर से सिकुड़ रहा है । पृथ्वी के दोनोंही गोलार्धो में ग्लेशियरों एवं बर्फ की मात्रा में कमी आई है । रपट लगातार चेताती है कि यदि अब भी अगर कदम न उठाए गए तो वैश्विक उत्सर्जन की मात्रा में सन् २००० और २०३० के बीच २५ से ९० प्रतिशत की वृद्धि होने की संभावना है । अगले बीस सालों में ०.२ डिग्री सेंटीग्रेड प्रति दशक की दर से तापमान वृद्धि की आशंका जताई गई है और अगर ग्रीन हाउस गैसों और एयरोसोल के घनत्व को सन् २००० के स्तर पर स्थित भी रख लिया जाए तब भी इसके ०.१ डिग्री सेंटीग्रेड प्रति दशक की दर से बढ़ने का आकलन किया गया है । उसके बाद के तापमान वृद्धि के आकलन उत्सर्जन के स्तर पर निर्भर करते हैं । रपट के अनुसार मौजूदा स्थिति आई.पी.सी.सी. द्वारा कुछ वर्ष पूर्व कराए गए आकलन से भी काफी खराब है । इसमें चिंता के पांच आधार बिंदु तय किए है । प्रकृति के लिए खतरा : १९८०-१९९९ के स्तर से तापमान का वैश्विक औसत अगर १.५ डिग्री सेंटीग्रेड से २.५ डिग्री सेंटीग्रेड तक बढ़ता है तो वनस्पति और पशुआे की २० से ३० प्रतिशत प्रजातियों पर विलुप्त् होने के खतरे बढ़ जाएंगे । प्राकृतिक आपदाआे के खतरे : सूखा, गर्म हवाएं, बाढ़ में वृद्धि और अनेक अन्य दूरगामी परिणाम भी अनुमानित है । प्रभावों के प्रति सहनीयता: विभिन्न क्षेत्रों में असर भी भिन्न-भिन्न होगा, खासतौर से आर्थिक आधार पर पिछड़े लोगों पर पर्यावरण परिवहन का असर सर्वाधिक हुआ करता है । सामूहिक प्रभाव : कम गर्म होने वाले क्षेत्रों में पर्यावरण परिवर्तन के प्रारंभिक बाजार आधारित लाभ ज्यादा होने का अनुमान किया गया है जबकि ज्यादा गर्म होने वाले क्षेत्रों में सर्वाधिक नुकसान आकलित है । एक बड़ा कारण और उसके खतरे : सैकड़ों वर्षो से जारी तापमान वृद्धि के परिणाम स्वरूप हुई घनत्व वृद्धि की वजह से समुद्री जलस्तर में वृद्धि बीसवीं सदी की अपेक्षा बहुत ज्यादा आकलित है, जिससे तटीय क्षेत्रों में कमी होगी और इससे जुड़े अन्य प्रभाव भी सामने आएंगे। रपट समक्ष बड़े खतरे से निपटने के उपायों पर जिसमें - शमन (ऊर्जा, परिवहन, उद्योग आदि क्षेत्रों में निवारक उपाय अपनाकर स्थिति को बदतर होने से रोकना), अनुकूलन (दुष्प्रभावों को कम करने के उपाय) वित्त प्रबंध एवं तकनीक शामिल हैं पर चर्चा के साथ खत्म होती है । ***
स्तम्भ:
हमारा भूमण्डल
४ ऊर्जा जगत
परमाणु ऊर्जा के और भी विकल्प हैं
रिचर्ड महापात्र
विश्व के किसी भी देश को इस बात की जानकारी नहींहै कि रेडियोएक्टिव अपशिष्ट का सुरक्षित व स्थायी निपटान किस प्रकार किया जा सकता है । दूसरे शब्दों में कहें तो काम में आ चुके यूरेनियम की कम से कम १५००० वर्षो तक और प्लूटोनियम की ७५००० से १००००० वर्षो तक निगरानी रखनी पड़ेगी । विश्व में ४४२ परमाणु संयंत्र प्रतिवर्ष १२ हजार टन रेडियोएक्टिव अपशिष्ट उत्पन्न करते हैं। अगर परमाणु हथियारों को नष्ट किया गया तो इससे ५० हजार टन प्लूटोनियम की वृद्धि होगी । सन् २००४ में ओबनिन्स में दुनिया के पहले परमाणु ऊर्जा केन्द्र की पचासवीं वर्षगांठ के अवसर पर विश्व में ३२ देशों के ५०० वैज्ञानिक व नीति निर्माताआे ने एक स्वर में यह तय किया कि परमाणु ऊर्जा को २१वीं शताब्दी में एकमात्र विश्वसनीय ऊर्जा स्त्रोत के रूप में प्रोत्साहित किया जाए । परमाणु ऊर्जा क्षेत्र के पुनरूद्धार की बात उस समय उठी है जबकि विश्व के ४४२ परमाणु रिएक्टरों में से ७० प्रतिशत की आयु सीमा समािप्त् पर है । परमाणु ऊर्जा विश्व के ऊर्जा उत्पादन में सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाने में भी असफल रही है और २००२ में इन सभी रिएक्टरों का सम्मिलित ऊर्जा उत्पादन ३६० गीगावाट इलेक्ट्रिकल (जीडब्ल्यूई) था जो कि विश्व विद्युत उत्पादन का मात्र १६ प्रतिशत है । इतना ही नहीं यह अनुपात १९८७ से स्थिर है । अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेन्सी का कहना है कि वर्ष २०१५ तक उपरोक्त में मात्र १० जीडब्ल्यूई की वृद्धि संभव है। इतना ही नहीं वर्ष २०३० तक अपनी आयु सीमा पूर्ण कर चुके ४०० पुराने रिएक्टरों को नए रिएक्टरों से बदलना होगा अन्यथा विद्युत आपूर्ति में जबरदस्त कमी आ सकती है । चूंकि विकसित देशों की घरेलू आबादी अपने यहां नए संयंत्र खोलने की अनुमति नहीं दे रही है अतएव विकसित देश अपने पुराने रिएक्टरों की आयु सीमा को बढ़ा रहे हैं । अमेरिका के परमाणु नियामक आयोग ने १९७७ से अब तक ९६ रिएक्टरों की क्षमता २० प्रतिशत तक बढ़ाने की अनुमति दी है । स्विजरलैंड ने अपने पांच रिएक्टरों की क्षमता में १२.३ प्रतिशत की वृद्धि की है। वहीं जापान ने अपने संयंत्रों की आयु सीमा ७० वर्ष तक और बढ़ाने का निश्चय किया है । वहीं आईएईए के परमाणु ऊर्जा तकनीक विकास विभाग के रोनाल्ड स्टेडर का कहना है कि `हमें अपनी क्षमता बढ़ाने के लिए प्रतिवर्ष चार नए रिएक्टरों की स्थापना करनी होगी । परंतु क्या यह व्यवहारिक है ?' इस संबंध में यूरोप में अजीब-सी स्थिति उत्पन्न हो गई है । एक ओर जर्मनी है जो कि सुरक्षा और इससे उत्पन्न अपशिष्ट के मद्देनजर २०५० तक परमाणु ऊर्जा से छुटकारा पा लेना चाहता है । वहीं दूसरी ओर फ्रांस के कुल विद्युत उत्पादन का ८० प्रतिशत परमाणु ऊर्जा से आता है वह इस क्षमता में और वृद्धि करना चाहता है । इन दो चरम स्थितियों की बीच अन्य देश अवस्थित है । पिछले वर्षो में यूरोपियन यूनियन की सदस्यता लेने वाले देशों में से चेक गणराज्य, स्लोवाक गणराज्य, स्लोवेनिया, हंगरी और लिथुएनिया मुख्यता रूस में निर्मित रिएक्टरों का प्रयोग कर रहे हैं । चंूकि अगले २० से ३० वर्षो में यूरोप की आयातित ऊर्जा पर निर्भरता ७० प्रतिशत तक बढ़ जाएगी अतएव उसने अनुशंसा की है कि वह परमाणु ऊर्जा को व्यापक स्वीकृति प्रदान करते हुए ऊर्जा सुरक्षा पर एक पर्यावरणीय लेखाजोखा (ग्रीन पेपर) जारी करें । इसी बीच अमेरिका ने इस दिशा में कदम बढ़ाते हुए अमेरिकन परमाणु ऊर्जा २०१० कार्यक्रम के अंतर्गत वहां की सरकार एवं निजी कंपनियों ने एक साथ कार्य करते हुए नए परमाणु संयंत्रों हेतु स्थानों का चयन किया है । इस कार्यक्रम के अंतर्गत घोषित प्रथम संयंत्र इस दशक के अंत तक बनकर तैयार हो जाएगा । हालांकि एशिया को परमाणु ऊर्जा का भविष्य माना जा रहा है । अमेरिका स्थित ऊर्जा सूचना प्रशासन ने २००४ में जारी रिपोर्ट में कहा है कि २०२५ तक एशिया की क्षमता में ४४ जीडब्ल्यूई की वृद्धि संभावित है । जो कि पूरे विकासशील विश्व की दर्शाई गई क्षमता का ९६ प्रतिशत है । इसमें से चीन १९ जीडब्ल्यूई, दक्षिण कोरिया १५ जीडब्ल्यूई,जापान ११ जीडब्ल्यूई और भारत और रूस ६ जीडब्ल्यूई की वृद्धि करेंगे । परमाणु ऊर्जा को पर्यावरणीय व राजनीतिक, दोहरी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है । पर्यावरण के प्रति चिंता इसे सार्वजनिक स्वीकृति प्रदान नहीं कर पा रही है । वहीं ९/११ सितंबर के पश्चात यह एक राजनीतिक विषय वस्तु के रूप में तब्दील हो गई है । पुरानी पड़ती अधिसंरचना और इसके अबाध प्रवाह को रोकने हेतु विकसित तकनीक इसकी अन्य चुनौतियां हैं । इतना ही नहीं विभिन्न राष्ट्रों के बीच तकनीक के संबंध में बन रहा गतिरोध व नए संयंत्रों की स्थापना के स्थानों को लेकर भी अंतर्विरोध बना हुआ है । रूस और चीन चाहते हैं कि यह रिएक्टर काडाराची,फ्रांस में लगे तो अमेरिका, दक्षिण कोरिया व जापान चाहते हैं कि यह रोक्काशोमुरा, जापान में स्थापित हो । परंतु रेडियोएक्टिव अपशिष्ट निपटान की पर्यावरणीय समस्या दिन-ब-दिन व्यापक रुप लेती जा रही है । आईएईए के उपनिदेशक जनरल का कोई सर्वमान्य ही ढूंढ ही लेना होगा अन्यथा परमाणु ऊर्जा की नकारात्मक छवि से छुटकारा पाना नामुमकिन है । परमाणु ऊर्जा की राह में सबसे बड़ा रोड़ा इसके उत्पादन तकनीक में लगने वाली लागत है । विद्युत बाजार पर नियंत्रण समाप्त् होेने से इसे कोयले, गैस व जल विद्युत परियोजनाआें से प्रतिस्पर्था करना पड़ा रही है । वर्तमान में कार्यरत संयंत्रों की लागत का या तो भुगतान हो गया है अथवा उन्हे सब्सिडी के माध्यम से चुका दिया गया है । अतएव वर्तमान में कार्यरत अधिकांश संयंत्र ज&

