बुधवार, 11 जुलाई 2012

कविता
गगन का चांद
                                           रामधारी सिंह दिनकर

    रात यों कहने लगा मुझसे  गगन का चाँद,
    आदमी भी क्या अनोखा जीव है ।
    उलझनें अपनी बनाकर आप ही फँसता,
    और फिर बेचैन हो जगता, न सोता है ।
    जानता है तू कि मैं कितना पुराना हॅूं ?
    मैं चुका हॅूं देख मनु को जनमते-मरते ।
    और लाखों बार तुझ-से पागलों को भी
    चाँदनी में बैठे स्वप्नों पर सही करते ।
    आदमी का स्वप्न ? वह बुलबूला जल का
    आज उठता और कल फिर फूट जाता    है ।
    किन्तु, फिर भी धन्य ठहरा आदमी ही तो
    बुलबुलों से खेलता, कविता बनाता है ।
    मैं न बोला किन्तु मेरी रागिनी बोली,
    देख फिर से चाँद ! मुझको जानता है तू ?
    स्वप्न मेरे बुलबुले हैं ? है यही पानी,
    आग को भी क्या नहीं पहचानता है तू ?
    मैं न वह जो स्वप्न पर केवलसही करते,
    आग में उसको गला लोहा बनाता हॅू ।
    और उस पर नींव रखता हँू नये घर को,
    इस तरह दीवार फौलादी उठाता हॅू ।
    मनु नहीं, मनु-पुत्र है यह सामने, जिसकी
    कल्पना की जीभ में भी धार होती है ।
    वाण ही होते विचारों के नहीं केवल,
    स्वप्न के भी हाथ मेंतलवार होती है ।
    स्वर्ग के सम्राट को जाकर खबर कर दे
    रोज ही आकाश चढ़ते जा रहे है वे ।
    रोकिये, जैसे बने इन स्वप्नवालों को,
    स्वर्ग की ही ओर बढ़ते आ रहे हैं वे ।

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