सोमवार, 17 मार्च 2014

विशेष लेख
आर्सेनिक विषाक्तता का प्रभाव
आचार्य ईश्वरचन्द्र शुक्ल/वीरेन्द्रकुमार/ओमप्रकाश यादव

    आजकल हम सभी प्रदूषण से ग्रस्त हैं । वायु, जल, मृदा, खाद्य पदार्थ तथा अन्य सभी वस्तुएं प्रदूषित हो रही   है । हम स्वयं इन प्रदूषणों को बढ़ाने में योगदान दे रहे हैं फिर भी सचेत नहीं हो रहे हैं ।
    रासायनिक प्रदूषणों में सबसे घातक है आर्सेनिक विषाक्तता । एक विषद शोध में यह पाया गया कि विश्व में अनेक देशों जैसे - अर्जेन्टाइना, आस्ट्रेलिया, बंगलादेश, कनाड़ा, चीली, चीन, ग्रीस, हंग्री, भारत, जापन, मैक्सिको, मंगोलिया, न्यूजीलैण्ड, दक्षिण अफ्रीका, फिलीपीन्स, ताइवान, थाइलैण्ड, अमेरिका तथा रूस मुख्य रूप से प्रभावित हैं, यद्यपि सरकार तन्त्र द्वारा इस पर नियंत्रण लगाने का प्रयास हो रहा है फिर भी अधिक सफलता नहीं मिल रही हैं ।
    आर्सेनिक का प्रयोग सदियों से औषधि, जहर तथा कल कारखानों में हो रहा है । इसके प्रभाव को बीसवीं सदी के प्रारंभ में ही जान लिया गया था लेकिन लगभग आधी शताब्दी बाद इस ओर विशेष ध्यान दिया गया । इसका प्रभाव थोड़ी मात्रा में होने पर शीघ्र दिखाई नहीं पड़ता लेकिन अधिक दिनां तक या अधिक मात्रा में प्रयुक्त होने पर जानलेवा हो सकता है । ऐसा कहा जाता है कि विश्व प्रसिद्ध नैपोलियन की मृत्यु आर्सेनिक देने से ही हुई थी । आर्सेनिक लवण सामान्यत: गंधरहित, स्वाद रहित तथा रंगहीन होते हैं अत: इसका प्रयोग आसानी से किया जा सकता है । अकार्बनिक लवण अधिक हानिकारक होते हैं तथा शरीर पर धीरे-धीरे कार्य करते हैं । सबसे घातक आर्सेनिक आक्साइड होता है । 

     अमेरिकन पर्यावरण संरक्षण संस्थान द्वारा यह बताया गया है कि अनेकों रोग आर्सेनिक युक्त पानी पीने से होते हैं । मुख्यत: फेफड़ों, त्वचा, पौरूष ग्रंथि, गुर्दे, नाक, यकृत आदि में कैंसर की संभावना रहती है । इतना ही नहीं आर्सेनिक की अधिकता स्थायी रूप से आनुवांशिक क्षति पैदा करती है । अधिकतर यह पता लगाना कठिन होता है कि आर्सेनिक विषाक्तता प्राकृतिक पदार्थो से अथवा हमारी कुव्यवस्था से  पैदा हुई । प्राकृतिक रूप से पैदा हुई विषाक्तता को रोकना उतना आसान नहीं होता लेकिन अधिकतर कल कारखानों से पैदा कुप्रभाव को रोकने  में हमारी लापरवाही तथा कुप्रबन्धन ही है  । मानव द्वारा प्रदत्त प्रदूषण अधिक हानिकारक है जिसके लिए कोई विशेष व्यवस्था नहीं की गई ।
    अमेरिका जैसे विकसित देश में आर्सेनिक की उपस्थिति भौम जल में भी देखी गयी । सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्र नेवादा कैलीफोर्निया तथा एरीजोना राज्य है । ज्वालामुखी वाले क्षेत्रों में जलोद तथा सरोवरी निक्षेप आर्सेनिक के मुख्य स्त्रोत है । इसके अतिरिक्त कल कारखानों का अपशिष्ट, खनिज उत्पाद कारखाने, कीटनाशकों का अनियत्रित प्रयोग तथा पृष्ट जल भी आर्सेनिक विषाक्तता प्रदान करते हैं । प्राकृतिक विषाक्तता तो सीमित है लेकिन मानव निर्मित विषाक्तता अधिक भयावह हैं । अत: इसके रोकने के सार्थक प्रयास की आवश्यकता है । जहाँ भी कारखानों की अधिकता है वहां पर भौम तथा पृष्ट जल दोनों ही प्रभावित होते रहे हैं । वह चाहे अमेरिका हो या आस्ट्रेलिया अथवा अन्य देश ।
    आर्सेनिक विषाक्तता कितनी मात्रा तक हानिकारक नहीं होगी इसका मापदण्ड बदलता रहता है । कुछ समय पहले पीने वाले पानी में ५० आर्सेनिक का होना सुरक्षित माना जाता था लेकिन ताइवान में इस प्रकार के पानी से कई हजार लोग बीमार हो गये । अत: विश्व स्वास्थ्य संगठन को यह मानक २ करना पड़ा इससे अधिक मात्रा कैंसर तथा अन्य हानिकारक प्रभावों को पैदा करती हैं । वर्तमान में केवल अमेरिका में एक-डेढ़ करोड़ लोग ही इस मानक का पानी पी रहे हैं ।
    अन्य देशों की तुलना में बांग्लादेश में अकार्बनिक विषाक्तता पा्रकृतिक स्त्रोतों से आ रही है । अनिवार्य समस्या सरकार की अदूरदर्शिता तथा लापरवाही के कारण अधिक हो रही है । उदाहरणार्थ विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा निर्धारित मानकों को न मानकर वहाँ अभी ५० लीटर का पानी प्रयोग किया जा रहा है । लगभग पाँच से छ: करोड़ लोग १० लीटर आर्सेनिक युक्त जल तथा लगभग चार करोड़ लोग ५० लीटर आर्सेनिक युक्त जल का प्रयोग कर रहे हैं । इस प्रकार लगभग नौ करोड़ लोग आर्सेनिक विषाक्तता से ग्रसित है । कहीं-कहीं तो इसकी मात्रा ३०००-१०००० लीटर तक पहुँच गई है जो कि अत्यन्त हानिकारक है ।
    बांग्लादेश सरकार ने वैज्ञानिकों की सलाह न तो मानी और न ही कोई निर्णय लिया । वहाँ पर कुल आर्सेनिक नदियों से आता है लेकिन मुख्यत: भूगर्भ से प्राप्त् होता है । इसका कारण बाढ़ ग्रस्त क्षेत्र में जमा आर्सेनिक का अवसदी सतहों पर जमा होना तथा बाद में भूजल में मिल जाना होता है । इस देश का अधिकतर भाग होलीसीन तथा प्लीस्टोसीन - पिलोसीन युग का है जो कि ३०-२७० मीटर गहराई तक जाता है । अत: अधिकतर भागों में २५० मीटर से नीचे का जल पीने योग्य होता है लेकिन सामान्य कुएँ इस गहराई के नहीं है अत: आर्सेनिक संदूषण बना रहता है ।
    बांग्लादेश की असफल आंतरिक नीति के साथ-साथ अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाआें ने भी आर्सेनिक बढ़ाने में सहयोग दिया है उदाहरणार्थ अस्सी के दशक में ब्रिटिश भूवैज्ञानिक निरीक्षण ने नलकूप के पानी में आर्सेनिक संदूषण का परीक्षण ही नहीं किया । इसी प्रकार संयुक्त राष्ट्र ने भी पिछले कुएँ खोदने तथा सतही पानी के प्रयोग को वर्जित किया लेकिन आर्सेनिक संदूषण का परीक्षण नहीं किया । परिणाम स्वरूप १९९० के आसपास आर्सेनिक संबंधित रोग जैसे त्वचा संक्रमण, कैंसर आदि फैलने लगे ।
    सामान्य धारणा यह है कि बांग्लादेश का आर्सेनिक संदूषण प्राकृतिक देन है लेकिन उसका कोई उपयुक्त हल निकलना आसान नहीं है । समस्या की गंभीरता वहाँ की अति गरीबी ने और बढ़ा दी है लेकिन मानव संदूषण को कम करना तथा जनता को उपस्थित संदूषण से बचाकर इस समस्या का कम किया जा सकता है । अंतत: औषधीय व्यवस्था का विकास किया जाये जिससे आर्सेनिक प्रभावित व्यक्तियों का उपचार किया जा सके । जिस क्षेत्र में आर्सेनिक विषाक्तता है वहाँ पर कृषि कार्य न किया जाए अन्यथा उत्पादों में आर्सेनिक की मात्रा चली जायेगी । इस प्रकार वातावरण में आर्सेनिक विषाक्तता बहुत हद तक कम की जा सकती है ।
    जहाँ भी आर्सेनिक संदूषण है विशेषत: ग्रामीण क्षेत्रों की आबादी में जल शुद्धिकरण की विधियाँ बतायी जायें तथा जनता को जागरूक किया जाये । प्रयोगों द्वारा पाया गया है कि सक्रिय एल्युमिनियत तथा आयन आक्साइड की परत युक्त बालू से पानी छानने  से आर्सेनिक विषाक्तता ५ लीटर तक कम की जा सकती है । नदी के पानी को साधारण बालू से छानकर भी आर्सेनिक की मात्रा को कम किया जा सकता है । यह विधि असुविधाजनक हो सकती है अत: छानक पात्रों का निर्माण किया गया है । जिससे पानी शुद्ध हो जाता है लेकिन विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानक के अनुसार नहीं । सबसे उचित विधि तो यह है कि समय-समय पर नलकूपों का परीक्षण किया जाय तथा गहरें कुएँ खोदे जायें ।
    आर्सेनिक प्रभावित  देशों की सरकार को चाहिए कि सस्ते जल शोधक उपकरण प्रदान करे तथा बड़े संयंत्र लगाकर जल शुद्ध करवायें । इन संयंत्रों में आर्सेनिक + ३ को आर्सेनिक + ५ में हाइड्रोजन परमाणु या क्लोरीन द्वारा बदला जाता है । इसके उपरांत विपरीत रसाकर्षण तथा एनायन विनिमय या सक्रिय एल्यूमिना पर अधिशोषित किया जाता है इसके पश्चात् छानने से आर्सेनिक मात्रा समाप्त् हो जाती है ।
    आजकल जीवाणुआें द्वारा पानी के अंदर आर्सेनिक का प्रक्षेपण किया जा रहा है । ये सभी क्रियाएं महंगी है अत: सरकार को विश्व स्तर पर जल शुद्धि का प्रयास करना चाहिए इसके अतिरिक्त औषधीय सुविधाआें का भी विकास करना चाहिए जिससे आर्सेनिक संक्रमित रोगियों का उपचार सफलतापूर्वक किया जा सके । खोज द्वारा यह पाया गया कि प्रतिदिन ४०० लीटर फालिक अम्ल की खुराक रक्त में आर्सेनिक की मात्रा को १४ प्रतिशत तक कम कर सकती है । अन्य उपचार जैसे कीलेशन द्वारा भी शरीर में व्याप्त् आर्सेनिक को कम किया जा सकता है ।
    बांग्लादेश में अभी भी अधिकांश लोग आर्सेनिक युक्त पानी पी रहे हैं । अनुमानत: आगामी पन्द्रह वर्षो तक यह समस्या रहेगी जिससे लोग बीमार होंगे या मृत्यु होगी । इस आपत्ति को बचाना आवश्यक है लेकिन बचाव या उपचार हेतु वहन करने योग्य साधन बहुत कम हैं । अत: वृहत शोध की आवश्यकता है साथ ही साथ जागरूकता भी पैदा करनी चाहिए । इसके लिए विश्व की अग्रणी संस्थाआें द्वारा साधन उपलब्ध कराये जा रहे हैं जो कि सराहणीय है । विश्व बैंक ने लगभग पाँच करोड़ डॉलर की राशि इस समस्या को सुलझाने हेतु प्रदान की है जो कि बढ़ाकर लाखों में की जा सकती है ।
    आर्सेनिक विषाक्तता का प्रभाव केवल बांग्लादेश में ही नहीं है भारत में भी इसका प्रकोप जारी है । बांग्लादेश से लगे क्षेत्रों में सर्वाधिक प्रभाव देखा गया है । अभी हमारे यहाँ इतनी जागरूकता नहीं पैदा की गई और न ही कोई विशेष उपाय किये गये । समय रहते ही लोग विदेशों में हो रहे अनुसंधानों तथा संयंत्रों का उपयोग प्रारंभ कर दें तो इस विभिषिका से निजात पा सकते हैं । अन्यथा हमारे यहाँ भी आर्सेनिक विषाक्तता महामारी का रूप धारण कर लेगी । इसमें सरकार तन्त्र की जागरूकता तथा उचित प्रबन्धों की आवश्यकता है ।

कोई टिप्पणी नहीं: