सोमवार, 20 अगस्त, 2007

७ आवरण कथा















प्रदूषित हो रहा है पवित्र अमरनाथ धाम






सुदेश पौराणिक






शिवभक्तों में कौन ऐसा होगा जो अमरनाथ के दर्शन करने नहीं जाना चाहता। हर शिवभक्त की यह आकांक्षा होती है कि वह जीवन में कम से कम एक बार पवित्र गुफा में स्थित इस हिमलिंग के दर्शन करें, जिसकी कथा सुनने मात्र से अनेक पाप नष्ट हो जाते हैं । ऐसे पवित्र स्थान में बढ़ रहे प्रदूषण को लेकर श्रद्धालुआे में चिंता होना स्वाभाविक है । आज पहलगाम से लेकर पवित्र गुफा तक प्लास्टिक की खाली बोतलें, पोलीथीन की थैलियां तथा थर्माकोल के बर्तन बिखरे पड़े हैं । एक अत्यंत पवित्र धर्मस्थल में लगातार बढ़ रहे प्रदूषण पर नियंत्रण करना आवश्यक हो गया है । जम्मू व कश्मीर सरकार, पहलगाम विकास प्राधिकरण, श्री अमरनाथ श्राईन बोर्ड तथा स्थानीय प्रशासन सभी इस बढ़ते प्रदूषण को लेकर गंभीर दिखाई नहीं देते हैं। धरती का स्वर्ग कहे जाने वाले कश्मीर में १२,७२३ फीट ऊँचाई पर हिम आच्छादित पर्वतों के बीच स्थित भगवान अमरनाथजी की महिमा निराली है । मनमोहन झीलों, चश्मों, देवदार व चीड़ के घने जंगलों के बीच से बहती दूधिया नदियों की कलकल आवाज में श्री बाबा अमरनाथ की ध्वनि स्पंदित होती है । पर्वतों के मध्य में लगभग ६० फीट लम्बी, ३० फीट चौड़ी और १५ फीट ऊँची उबड़-खाबड़ गुफा के अंदर प्रतिवर्ष हिमलिंग की रचना होना अपने आप में एक आश्चर्य है ।



















अमरनाथ यात्रा के आधार शिविर पहलगाम और बालटाल, चन्दनवाड़ी, पिस्सुघाटी, समुद्रतल से १४९०० फीट की ऊँचाई पर स्थित महागुनस टाप, जोजेपाल, पर्वतों के बीच गहरे हरे नीले जल की विशाल जलराशि शेषनाग झील, पोषपत्री तथा चंदनवाड़ी में अतुलनीय सौंदर्य बिखरा पड़ा है । इन रास्तों पर चलते वक्त ऊँचाई का अहसास नहीं होता और यह भी विश्वास नहीं होता कि प्रकृति इतनी सुंदर हो सकती है । मन को अपूर्व शांति व सुख देने वाली कश्मीर घाटी में यात्रियों द्वारा फैलाया जा रहा प्रदूषण मन को विचलित कर देता है। इंसान द्वारा फैलाये गये इस प्रदूषण का प्रारंभ दोनों आधार शिविरों बालटाल और पहलगाम से ही हो जाता है । पहलगाम आधार शिविर के पास बहने वाली नदी के किनारे शौच के बाद फेंकी गयी पैकेज्ड वाटर की बोतलें तथा खाद्य पदार्थोंा की पॉलीथीन सर्वत्र बिखरी दिखाई देती है । पिछले कुछ सालों से अमरनाथ यात्रा में शामिल होने वाले लोगों की बढ़ती संख्या का ही परिणाम है कि लिद्दर दरिया का पानी पीने लायक नहीं रह गया है और बैसरन तथा सरबल के जंगल जो अभी तक मानव के कदमों से अछूते थे। अब अपने अस्तित्व की लड़ाई में लगे हैं। पिछले साल यात्रा के बाद ५५ हजार किग्रा. कूड़ा-करकट यात्रा मार्ग पर एकत्र किया गया था, इसमें आधा प्लास्टिक था और जो दरियाआे मे बहा दिया गया था, उसका कोई हिसाब नहीं है। श्री अमरनाथ गुफा के पास बहने वाली नदी में पानी की खाली बोतलें तैरती दिखाई देती हैं । सबसे ज्यादा प्रदूषण तो उस समय दिखा जब शेषनाग झील के पास स्थित नागाकोटी के मनोरम जल प्रपात में अज्ञानी यात्रियों द्वारा सैकड़ों प्लास्टिक की बोतलें व खाद्य पदार्थों के पोलीथीन फेंककर इसे गंदा किया गया । श्री अमरनाथ यात्रा के दौरान स्थानीय निवासियों द्वारा जगह-जगह लगायी गयी खाद्य सामग्री की दूकानें तो खूब हैं, लेकिन खाली बोतलों, पॉलीथीन तथा थर्माकोल के कप व गिलास को यथास्थान फेंकने की व्यवस्था नहीं है। श्री अमरनाथ श्राइन बार्ड की कार्यप्रणाली भी सुस्त व निष्क्रिय लग। बोर्ड ने कहीं भी ऐसे इंतजाम नहीं किये जिससे इस पवित्र अमरनाथ धाम को प्रदूषित होने से बचाया जा सके । श्री अमरनाथ गुफा के ठीक नीचे स्थित हेलीपेड के पास भी कभी नष्ट न होने वाली प्लास्टिक व पोलीथीन जहां तहां बिखरी पड़ी है । श्री अमरनाथ श्राइन बोर्ड में श्रद्धालुआे को जागरूक करने के लिए कोई प्रयास किया हो ऐसा दिखाई नहीं पड़ता है। यही हाल पहलगाम विकास प्राधिकरण (पी.डी.ए.) का भी है । पूरी यात्रा के दौरान ऐसा लगा कि जिस तरह से श्री अमरनाथ धाम में घातक प्रदूषण बढ़ रहा है । यदि उसे रोकने के लिए समय रहते ठोस उपाय नहीं किये गये तो वह दिन दूर नहीं जब कश्मीर की यह मनोरम वादी प्लास्टिक के कचरे से पट जायेगी जिससे घाटी के पर्यावरण को अपूर्णनीय क्षति पहँुचेगी । शिव को अनेक नामों से जाना जाता है । शिवभक्त शंकर ने शिव को शंकर कहा था, शंकर का शाब्दिक अर्थ है - शं यानी कल्याण तथा कर याने करने वाले अर्थात कल्याण करने वाला । ऐसे शंकर के पवित्र धाम को यदि हम अज्ञानतावश प्रदूषित कर रहे हैं , इससे जनता को जागरूक करने के लिए एक जन जागरूकता अभियान की जरूरत है जिसे श्रद्धालुआे, शिवभक्तों की सेवा करने वाले भण्डारे वाले, पहलगाम विकास प्राधिकरण, श्री अमरनाथ श्राईन बोर्ड, स्थानीय दुकानदारों तथा प्रशासन के द्वारा जन सहयोग से चलाया जा सकता है। भारतीय दर्शन व विज्ञान की उत्कृष्ट परम्परा के प्राण कहे जाने वाले, कल्याण करने वाले देवता शिव के पवित्र धाम में प्रदूषण नियंत्रण करने का उचित समय आ गया है ।

इस अंक में

स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर प्रकाशित पर्यावरण डाइजेस्ट के इस अंक में स्वतंत्रता दिवस और राष्ट्रपिता के विचारोंपर केन्द्रीत सामग्री दी गई है । पहले लेख आधुनिक यंत्र और लाचार होता मनुष्य में दिल्ली स्थित प्रसिद्ध लेखिका सुश्री रेशमा भारती ने भोगवादी सभ्यताकी गांधीवादी विचारों से समीक्षा की है । वरिष्ठ गांधीवादी विचारक पूर्व सांसद डॉ. रामजीसिंह अपने लेख सेज: अन्याय की पराकाष्ठा में लिख रहे हैं कि सेज के द्वारा न केवल आर्थिक गुलामी आयेगी, बल्कि स्वदेशी संस्कृति को भी खतरा हो गया है । अमेरिका में कालंबिया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर नोबल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री प्रो. जोसेफ स्टिगलीज ने अपने लेख ग्लोबल वार्मिंग: दूसरे के अपराध की सजा में लिखा है कि वैश्विक गरीबी को समाप्त् करने के लिए ग्लोबल वार्मिंग को समाप्त् करना जरूरी है । भोपाल के पत्रकार सचिन कुमार जैन ने अपने लेख लोकतंत्र का अलोकतांत्रिक चेहरा में लिखा है कि गरीबी हटाओ के नाम पर सीधे-सीधे गरीबों को ही हटाया जा रहा है । आगामी १८ अगस्त को देश के विख्यात साहित्यकार डॉ. शिवमंगलसिंह सुमन का जन्मदिन है इस अवसर पर डॉ. खुशालसिंह पुरोहित अपने लेख युगमनीषी डॉ. शिवमंगलसिंह सुमन में अपने गुरू डॉ. सुमन के व्यक्तित्व की विशेषताआे से परिचय करा रहे हैं । आवरण कथा में इस बार सुदेश पौराणिक ने अमरनाथ धाम में बढ़ते प्रदूषण की जानकारी दी है । आपको उनका लेख प्रदूषित हो रहा है पवित्र अमरनाथ धाम में ताजा जानकारियां मिलेगी । इसके साथ ही युवा पत्रकार /लेखक मनोज कुमार मिश्र के लेख दिल्ली : यमुना तट पर उभरते पर्यावरणीय नासूर में यमुना नदी और दिल्ली के प्रदूषण पर चर्चा की गई है । पत्रिका स्थायी स्तंभ पर्यावरण परिक्रमा, ज्ञान विज्ञान एवं पर्यावरण समाचार में आप देश दुनिया में पर्यावरण और विज्ञान के क्षेत्र में चल रही हलचलों से अवगत होते है। आप सभी को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ । पत्रिका के बारे में आपकी राय से अवगत करायें।-कुमार सिद्धार्थ

सम्पादकीय

कचरे से बढ़ता प्रदूषण खतरनाक
इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के अनुपयोगी हो जाने से इकट्ठा हो रहे कचरे का निपटान ढंग से नहीं हो पाने के कारण पर्यावरण केखतरे बढ़ रहे है । एक अध्ययन के अनुसार भारत में प्रतिवर्ष डेढ़ लाख टन ई-वेस्ट या इलेक्ट्रॉनिक कचरा बढ़ रहा है । इसमें देश में बाहर से आने वाले कबाड़ को जोड़ दिया जाए तो न केवल कबाड़ की मात्रा दुगुनी हो जाएगी, वरन् पर्यावरण के खतरों और संभावित दुष्परिणामों का सही अनुमान नहीं लगाया जा सकेगा । प्रतिवर्ष भारत में बीस लाख कम्प्यूटर अनुपयोगी हो जाते हैं । इनके अलावा हजारों की तादाद में प्रिंटर, फोन, मोबाईल, मॉनीटर, टीवी, रेडियो, ओवन, रेफ्रिजरेटर, टोस्टर, वेक्यूम क्लीनर, वाशिंग मशीन, एयर कंडीशनर, पंखे, कूलर, सीडी व डीवीडी प्येयर, वीडियो गेम, सीडी, कैसेट, खिलौने, फ्लोरेसेंट, ट्यूब, ड्रिलिंग मशीन, मेडिकल इंस्टूमेंट, थर्मामीटर और मशीनें भी बेकार हो जाते हैं । जब उनका उपयोग नहीं हो सकता तो ऐसा कचरा खाली भूमि पर इकट्ठा होता रहता है, इसका अधिकांश हिस्सा जहरीला और प्राणीमात्र के स्वास्थ्य के लिए खतरनाक होता है । कुछ दिनों पहले इस तरह के कचरे में खतरनाक हथियार व विस्फोटक सामगी भी पाई गई थी । इनमें धातुआे व रासायनिक सामग्री की भी काफी मात्रा होती है जो संपर्क में आने वाले लोगों की सेहत के लिए खतरनाक होती है । लेड, केडमियम, मरक्यूरी, एक्बेस्टस, क्रोमियम, बेरियम, बेेटीलियम, बैटरी आदि यकृत, फेफड़े, दिल व त्वचा की अनेक बीमारियों का कारण बनते हैं । अनुमान है कि यह कचरा एक करोड़ से अधिक लोगों को बीमार करता है । इनमें से ज्यादातर गरीब, महिलाएँ व बच्च्े होते हैं । इस दिशा में गंभीरता से कार्रवाई होना जरूरी है । महाराष्ट्र, गुजरात, पंजाब, आंध्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, उत्तरप्रदेश, पश्चिमी बंगाल व मध्यप्रदेश में इस कचरे की मात्रा बढ़ती जा रही है । मुंबई, दिल्ली, बंगलोर, चेन्नई, कोलकाता, अहमदाबाद, हैदराबाद, पुणे, सूरत, नागपुर इसके बड़े केंद्र है । ये सब बारूद के ढेर पर बसे हैं । मेनन कमेटी की सिफारिश पर इसके लिए नियम भी बनाए गए थे, उनमें हर वर्ष सुधार भी होता रहा है । मगर देश के लोगों की मानसिकता अभी कबाड़ संभालने व कचरे से सोना निकालने की बनी हुई है । इस कारण कचरे से पर्यावरण प्रदूषण का खतरा बड़ता जा रहा है ।

प्रसंगवश स्वतंत्रता दिवस

गांधीजकी की दृष्टि में भारतीय लोकतंत्र
सर्वोच्च् कोटि की स्वतंत्रता के साथ सर्वोच्च् कोटि का अनुशासन और विनय होता है । अनुशासन और विनय से मिलने वाली स्वतंत्रता को कोई छीन नहीं सकता । संयमहीन स्वच्छंदता, संस्कारहीनता की द्योतक है, उससे व्यक्ति की अपनी और पड़ोसियों की भी हानि होती है । यंग इंडिया, ३-६-२६ कोई भी मनुष्य की बनाई हुई संस्था ऐसी नहीं है, जिसमें खतरा न हो । संस्था जितनी बड़ी होगी, उसके दुरूपयोग की संभावनाएं भी उतनी ही बड़ी होगी । लोकतंत्र एक बड़ी संस्था हैं, इसलिए उसका दुरूपयोग भी बहुत हो सकता है, लेकिन उसका इलाज लोकतंत्र से बचना नहीं, बल्कि दुरूपयोग की संभावना को कम से कम करना है ।यंग इंडिया ७-५-३१ जनता की राय के अनुसार चलने वाला राज्य जनमत से आगे बढ़कर कोई काम नहीं कर सकता । यदि वह जनमत के खिलाफ जाएगा तो नष्ट हो जाएगा । अनुशासन और विवेकयुक्त जनतंत्र दुनिया की सबसे सुन्दर वस्तु है, लेकिन राग-द्वेष, अज्ञान और अंधविश्वास आदि दुर्गुणों से ग्रस्त जनतंत्र अराजकात के गड्डे में गिरता है और अपना नाश खुद कर डालता हैं ।यंग इंडिया, ३०-७-३१ प्रजातंत्र का सार ही यह है कि उसमें हर व्यक्ति उन विविध स्वार्थो का प्रतिनिधित्व करता है, जिनसे राष्ट्र बनता है । यह सच है कि इसका यह मतलब नहीं कि विशेष स्वार्थो के विशेष प्रतिनिधियों का प्रतिनिधित्व करने से रोक दिया जाये, लेकिन ऐसा प्रतिनिधित्व उनकी कसौटी नहीं है । यह उसकी अपूर्णता की एक निशानी है ।हरिजन सेवक २२.४.३९ आजाद प्रजातांत्रिक भारत आक्रमण के खिलाफ पारस्परिक रक्षण और आर्थिक सहकार के लिये दूसरे आजाद देशों के साथ खुशी से सहयोग करेगा । वह आजादी और जनतंत्र पर आधारित ऐसी विश्व व्यवस्था की स्थापना के लिये काम करेगा, जो मानव जाति की प्रगति और विकास के लिये दुनिया के समूचे ज्ञान और उसकी समूची साधन सम्पत्ति का उपयोग करेगा ।
हरिजन २३.९.२९

१ जीवन शैली

आधुनिक यंत्र और लाचार होता मनुष्य
सुश्री रेशमा भारती
विकास का सूचक और अर्थव्यवस्था का आधार बना तेजी से बढ़ता मशीनीकरण आज आधुनिक जीवन के हर क्षेत्र को संचालित कर रहा है । आधुनिक जीवन मशीनों पर इस कदर निर्भर है कि इसके बिना कई काम रूक जाते हैं । इंटरनेट और मोबाइल भी दूरी व समय की सीमाआे को लांघ कर सारी दुनिया को अपने में समेटने का दावा करते हैं । इस यंत्र युग में सारी दुनिया में हिंसा, शोषण, विषमता और बेरोजगारी भी बढ़ रही है । स्वास्थ्य समस्याएँ और पर्यावरण विनाश भी अपने चरम पर हैं । दौड़ती-भागती जिंदगी में समय का अभाव प्राय: आम शिकायत रहती है । रिश्तों में कृत्रिमता और दूरियाँ बढ़ रही हैं। कई लोग स्वयं को बेहद अकेला महसूस करने लगे हैं । बढ़ती मशीनों ने मनुष्य की शारीरिक श्रम की आदत को कम करके स्वास्थ्य समस्याआें का आधार तैयार किया है । दूरदर्शी गांधीजी ने चेताया था - ''अगर मशीनीकरण की यह सनक जारी रही, तो काफी संभावना है कि एक समय ऐसा आएगा जब हम इतने असमर्थ और लाचार हो जाएेंगे कि अपने को ही यह कोसने लगेंगे कि हम भगवान द्वारा दी गई शरीर रूपी मशीन का इस्तेमाल करना क्यों भूल गए'' (अनुवादित यंग इंडिया, २ जुलाई १९३१) । स्वास्थ्य का आधार तो बिगड़ा ही, साथ ही आधुनिकतम मशीनों ने शरीर और मस्तिष्क संबंधी कई नए किस्म के विकार भी पैदा किए हैं । शारीरिक श्रम करके आजीविका जुटाने वाले अनेक मेहनतकशों के लिए अंधाधुंध बढ़ता मशीनीकरण बेराजगारी, शोषण और भेदभाव की संभावनाएं बढ़ता है । तेजी से बढ़ते मशीनीकरण ने विभिन्न कार्यक्षेत्रों में श्रम का अवमूल्यन और बेरोजगारी की स्थितियां पैदा कर दी हैं । पहले से कमजोर आर्थिक स्थिति वाले कई मेहनतकश इस तथाकथित तरक्की में और लाचार होते जा रहे हैं । उदाहरण के लिए कृषि में कम्बाइन हारवेस्टर मशीन का बढ़ता हुआ उपयोग कटाई के दौरान खेतीहर मजदूरों को मिलने वाली आजीविका का परंपरागत आधार छीन रहा है । गांधीजी ने मशीनों से आने वाली बेकारी पर विशेष चिंता प्रकट की थी, उन्होंने लिखा था, ''मुझे आपत्ति स्वयं मशीनों पर नहीं, बल्कि उनके लिए पागल बनने पर है । यह पागलपन श्रम बचाने वाले यंत्रों के लिए है । लोग श्रम बचाने में लगे रहते हैं । यहां तक कि हजारों लोगों को बेकार करके भूख से मरने के लिए खुली सड़कों पर छोड़ दिया जाता है ।'' (यंग इंडिया, १३.११.१९२४)। बढ़ता मशीनीकरण उपभोक्तावाद को बढ़ावा देकर समाज में विषमता की नींव को पुख्ता करता आया है । एक औद्योगिककृत अर्थव्यवस्था में अंधाधुंध बढ़ता मशीनीकरण वस्तुत: स्थानीय जरूरतों व सीमाआे को लांघकर व्यापक स्तर पर वस्तुआे के उत्पादन, बिक्री या खपत को बढ़ाने की महत्वाकांक्षाआे से प्रेरित होता है । ये महत्वाकांक्षाएं और उनसे बढ़ते उत्पादन का दबाव कच्च्े माल, सस्ते श्रम और बाजार की लालचपूर्ण तलाश को जन्म देता है । यह अंतहीन प्रतिस्पर्धा, शोषण, संसाधनों की लूट, आधिपत्य और साम्राज्यवादी प्रवृत्तियों का आधार तैयार करती है । 'हिंसा' इस प्रक्रियाकी स्वाभाविक परिणति होती है । गांधीजी ने भी यंत्रों के इस शोषणपूर्ण चरित्र का विरोध करते हुए कहा था, ''यंत्रों के मेरे बुनियादी विरोध का आधार यह सत्य है कि यंत्रों ने ही कुछ राष्ट्रों को दूसरे राष्ट्रों का शोषण करने की शक्ति दी है ।'' (यंग इण्डिया, २२ अक्टूबर १९३१) । अधिकतम मुनाफे और बाजार पर छाने की महत्वाकांक्षाआे से प्रेरित बेलगाम मशीनीकरण वाली औद्योगिक अर्थव्यवस्था वास्तव में मजदूरों के शोषण और प्राकृतिक संसाधनों के दोहन पर फलती आई है । जो आधुनिक मशीनें ''मुट्ठी भर लोगों को करोड़ों की पीठ पर सवार होने में मदद करती हैं ।'' गांधीजी उसके विरूद्ध संघर्षरत थे । सन् १९८८ में किशन पटनायक ने भी यंत्रों के चरित्र पर कुछ ऐसे ही बुनियादी सवाल उठाए थे । इस ऐतिहासिक सत्य को हम कैसे भुला सकते हैं कि आधुनिक टेक्नालॉजी को उन्हीं शक्तियों ने विकसित करवाया है जिनका निहित स्वार्थ साम्राज्यवादी संपर्कों को दृढ़ करना था । अरबों डॉलर लगाकर सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिकों को पैसे और प्रतिष्ठा के जरिए प्रलोभित कर जो कंपनियाँया सरकारें दिन-ब-दिन यंत्रों को अधिक क्षमताआे से लैस करा रही हैं क्या उनके सामाजिक चरित्र का पुट इन यंत्रों में प्रकट नहीं हो जाता ? बेलगाम बढ़ती मशीनें ऊर्जा व इंर्धन की खपत बेइंतहा बढ़ाकर पर्यावरण पर भी बोझ डाल रही है और प्रदूषण फैलाकर ग्लोबल वार्मिंग की स्थितियों को और भी विकट बना रही हैं । मशीनों का बढ़ता कचरा पर्यावरण को असीम और स्थायी क्षति पहँुचा रहा है । यंत्रों का बुरा उपयोग आसानी से कर लिया जाता है । यह भी गांधीजी की यंत्रों पर एक प्रमुख आपत्ति थी । इस विरोध की प्रासंगिकता आज और भी बढ़ गई है जब हम देखते हैं कि टीवी, इंटरनेट, मोबाइल आदि कैसे हिंसा व अश्लीलता के प्रचार-प्रसार का प्रमुख माध्यम बन गए हैं । हिंसक, आक्रामक व आतंकवादी शक्तियाँ भी अपने संकीर्ण व विनाशकारी लक्ष्यों की पूर्ति के लिए मशीनों का भरपूर इस्तेमाल कर रही हैं । हथियारों का उद्योग निरन्तर फल-फूल रहा है । इंटरनेट जैसी आधुनिक प्रौद्योगिकी में अंतर्निहित खामियों व खतरों को रेखांकित करते हुए किशन पटनायक ने अपने एक लेख में चेताया था ''आधुनिक साम्राज्यवादी टेक्नालॉजी में पैदा करने की क्षमता नहीं है सिर्फ एकत्रित करने की क्षमता है । आधुनिक विज्ञान का चमत्कार एक तरफ तो एकत्रीकरण का चमत्कार है और दूसरी तरफ ध्वंस का चमत्कार । इंटरनेट और वैश्विक शहर (ग्लोबल विलेज) की परिकलपना ही भयावह है । यह दुनिया के एक फीसदी लोगोे को विश्व श्हरी बनाकर बाकी लोगो को साधनविहीन बना देने का षड़यंत्र है । वैश्विक शहर इंटरनेट ज्ञान की विविधता को नष्ट करने का षड़यंत्र है । ज्ञान का स्थान सूचना ले लेगी और सूचनाआें का काफी हिस्सा गलत तथा अधूरा भी हो सकता है ।'' मशीनों से जिंदगी में आयी तेजी और यांत्रिकता कहीं न कहीं व्यक्ति के व्यवहार व रिश्तों में भी अधीरता, संवेदनहीनता व कृत्रिमता का प्रभाव छोड़ सकती है । मौलिक सोच-विचार की क्षमता और जीवंत अहसास से उत्पन्न संवेदनशीलता का अभाव भी ऐसे समाज में देखा जा सकता है जिस पर मशीनें हावी हों । इस सबके बावजूद हम यह नहीं भूल सकते कि मशीनों के जरूरी व सार्थक उपयोगों की भी कई संभावनाएं मौजूद हैं, बशर्ते कि किसी सार्थक उद्देश्य की पूर्ति का इन्हें ही एकमात्र या प्रमुख साधन न बना लिया जाए । गांधीजी ने यंत्रों के उपयोग पर सीमाएं लगाने पर बल दिया था और विध्वंसक व शोषणकारी यंत्रों का विरोध किया था । ``मैं यंत्र मात्र के विरूद्ब नहीं हूं । मैं यंत्रों की विवेकहीन वृद्धि के खिलाफ हूं । मैं यंत्रों की बाहरी विजय से प्रभावित होने से इंकार करता हूं । मैं तमाम नाशकारी यंत्रों का कट्टर विरोधी हूं । यंत्रों का अधिक से अधिक उपयोग करने के बजाय हमें उनका कम से कम उपयोग करके काम चलाना चाहिए और इसी में समाज की सच्ची सुरक्षा और आत्मरक्षा निहित हैं ।''

२ सामयिक

सेज : अन्याय की पराकाष्ठा
डॉ. रामजी सिंह
इतिहास अपनी पुरावृत्ति करता है। आज पुन: पूंजीवाद अपने नये रूप में अवतरित हो रहा है । एक समय था जब पाश्चात्य जगत ने अर्थशास्त्र में उदारवाद को अपने विकास का स्वधर्म मान लिया था । एडम स्मिथ, मार्शल और कन्स की क्रांति तक उदारवाद का ही झंडा लहराता रहा । मार्क्स और एंजेल्स के समाजवादी अर्थशास्त्र को दरिद्रता का दर्शन (फिलॉसफी ऑफ पॉवर्टी) घोषित किया गया । मार्क्स ने `पूंजी' में पूंजीवाद की शव परीक्षा ही कर डाली थी । बोल्शेविक क्रांति ने समाजवाद को केवल रूस में ही नहीं विश्व में अनेक मार्गो में प्रतिष्ठित किया था । एक समय पूंजीवाद के बदले समाजवाद ही युगधर्म बन गया था। इसी के साथ-साथ एशिया और अफ्रीका के देशों में उपनिवेशवाद भी धराशायी हो गया इसीलिए साम्राज्यवाद और पूंजीवाद के समर्थकों ने विश्वविजय की एक साझा योजना बनाई जिस हम विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष, विश्व व्यापार संगठन आदि संस्थाआे में सगुण रूप से देख सकते हैं । साम्राज्यवाद और पूंजीवाद का मध्ययुगीन या १८वीं १९वीं शताब्दी का रूप अब चल नहीं सकता था । इसीलिए उदारवाद के नाम पर निजीकरण, उदारीकरण और भमंडलीकरण की त्रयी सामने आई । यह प्रचारित किया गया कि आर्थिक विकास का यही राजमार्ग है । दुर्भाग्य तो यह है कि सोवियत संघ ने भी समाजवादी अर्थव्यवस्था को अलविदा कह दिया और चीन भी विश्व व्यापार संघ के दस्तावेज पर मुहर लगाकर वैश्विक पूंजीवाद में महाप्रपंच में शामिल हो गया। चीन ने अपने देश में विशेष आर्थिक क्षेत्र की सर्वप्रथम स्थापना शुरू की थी । भारत में भी नेहरू युग तक समाजवादी ढांचा और लोकतांत्रिक समाजवाद का वर्चस्व रहा, जो इंदिरा गांधी तक बैंकों का राष्ट्रीकरण, प्रिवीपर्स की समािप्त् और गरीबी हटाओ के कार्यक्रम में देखा जा सकता है । लेकिन उस समय भी देशी पूंजीवाद को बढ़ाने के लिए अनेकानेक प्रोत्साहन दिए गए । राजीव गांधी के समय भी देश पूंजीवादी दिशा की ओर बढ़ता रहा लेकिन डॉ. नरसिम्हा राव के काल में वैश्वीकरण की राह में नई आर्थिक नीति के नाम पर उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण को अपना लिया गया जिसके मुख्य सलाहकार डॉ. मनमोहनसिंह (जो आज भारत के प्रधानमंत्री हैं) थे । जो विश्वबैंक के उच्च् पद पर निष्ठापूर्वक कार्य कर चूके थे । इसी क्रम में आज हमारे सामने विशेष आर्थिक क्षैत्र की समस्या आती है ।१. सामंतवाद का पुनरागमन - भारत में भूमि का स्वामित्व प्रारंभ में ग्राम समाज का रहा, इसीलिए वेद में भूमि को माता कहा गया है । माता भूमि पुत्रोअहम् पृथिव्या - पृथ्वी पर किसी व्यक्ति का अधिकार नहीं है । वह तो प्रकृति या ईश्वर की कृति है । इसीलिए सर्वभूमि गोपाल भी कहा जाता है । लेकिन सामंत युग में जमीन पर व्यक्तिगत अधिकार होने लगे जो मुगल काल तक कायम रहे । अंग्रेजों के समय लार्ड कार्नवालिस ने भूमि व्यवस्था के बारे में चिरस्थाई प्रबंध के नाम से एक योजना लागू की जिसमें भूमिपुत्र किसानों और राज्य के बीच जमींदारों को रखा गया जो बिचौलिये के रूप में थे । इस प्रकार इस चिरस्थाई प्रबंध के द्वारा जमीन पर निहित स्वार्थ रखने वाले समूह का निर्माण हुआ और जमीन जातने वाले और जमीन के मालिक में असमानता और भेदभाव कायम हुआ । स्वतंत्रता के पश्चात जमींदारों को इसीलिए मुआवजा देकर हटा दिया गया । इसी को ध्यान में रखकर भूमि सुधार के प्रगतिशील कार्यक्रम राज्य सरकारों ने बनाए । जिसमें जमीन की हदबंदी, चकबंदी, जमीन जोतने वालों को फसल का आधा हिस्सा न्यूनतम मजदूरी, सूद से कुछ हद तक मुक्ति आदि कुछ कानून लागू भी हुए । लेकिन विशेष आर्थिक क्षेत्र के नाम से पुन: पूंजीपतियों को शहर के आसपास जमीन खरीदने का अधिकार दे दिया गया है । महाराष्ट्र सरकार ने अंबानी को समुद्र किनारे हजारोंएकड़ जमीन खरीदने की इजाजत दे दी है, जिसे उसने औने पौने दाम में खरीद लिया । जो जमीन २० से ४० लाख रू. प्रति एकड़ खरीदी जानी चाहिए थी उसे मात्र एक लाख प्रति एकड़ में खरीद लिया गया । इसी तरह हरियाणा, पंजाब आदि राज्यों में राज्य सरकारों की संठगांठ से किसानों की जमीन सस्ते दाम में खरीदने की मुहिम चली । इससे किसानों का असंतोष भड़का और कई आंदोलन हुए । तब पूंजीपतियों ने राज्य सरकारों की मदद से जमीन खरीदना प्रारंभ कर दिया । बहाना यह है कि इससे उद्योगों का विकास होगा । सरकार ने शहरी जमीन की हदबंदी का कानून तो खत्म ही कर दिया है । अब गांव की भूमि की हदबंदी पूंजीपतियों के लिए खत्म की जा रही है । इसी तरह हम कह सकते हैं कि नई आर्थिक नीति के नाम पर सामंतवादी व्यवस्था पुर्नस्थापित हो रही है, जो एक प्रतिक्रयावादी कदम हैं।२. सर्वहारा का अंत - सरकार की कृषि व्यवस्था के दुष्परिणाम स्पष्ट हो रहे हैं । कृषि प्रधान देश में आज लगभग डेढ़ लाख किसानों की आत्महत्या करने पर विवश होना पड़ा है । कृषि अलाभकारी होती जा रही है और किसान कर्ज से दबा जा रहा है । प्रधानमंत्री ने कहा है कि सिर्फ १० प्रतिशत आबादी की खेती पर निर्भर रहना चाहिए। पता नहीं शेष ९० प्रतिशत नागरिकों को रोजगार क्या चांद या मंगलगृह पर मिलेगा? सरकारी सर्वेक्षण के अनुसार नए उद्योगों से केवल १.५ लाख लोगों को रोजगार मिल पाया है । खेती में जिस प्रकार औद्योगिकरण का समावेश हो रहा है उससे खेतिहर मजदूर छोटे और सीमांत किसान तो समाप्त् ही हो जाएगें । अभी देश में इनकी संख्या लगभग ११ करोड़ है, जो खेती में बढ़ते औद्योगिकरण के कारण बेकार हो रहे हैं । उसी तरह छोटे और सीमांत किसान की जमीन बेचकर हट रहे हैं । ३. सार्वजनिक कोष से पूंजीपतियों का संरक्षण - विशेष आर्थिक क्षेत्र ऐसे क्षेत्र में निर्मित किया जाए जहां की जमीन खेती के उपयुक्त न हो तो एक बार सहन भी किया जा सकता है । परंतु सिंगुर में ऐसी जमीन ली गई है जहां सरकार ने सारी सुविधाएं जनता के खर्च पर दी हैं । रेल, सड़क, बिजली आदि के लिए पूंजीतियों को अपना खर्च नहीं करना पड़ा । सरकार पूंजीपतियों को तो मनमाने कर्ज की सुविधा देती है या ऐसी जगह उद्योग लगाने की सुविधा देती है जहां जनता के खर्च से दी जाने वाली बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध हैं। सरकार ने बड़े पूंजीपतियों को ८५ हजार करोड़ रूपए कर्ज की माफी के रूप में दिये हैं जिसके वसूल होने की संभावना नहीं है । जबकि किसानों पर छोटे-मोटे कर्जो की वसूली के लिए दबाव बनाया जाता है ।४. पर्यावरण - पूंजीपति पर्यावरण की रक्षा पर ध्यान नहीं देते उन्हें तो सिर्फ मुनाफा चाहिए । यही कारण है कि चाहे कृषि हो या सेवा क्षेत्र, उनका ध्यान व्यक्तिगत मुनाफे पर रहता है । हरित क्रांति के नाम पर कृषि में रासायनिक खाद और कीटनाशक के कारण थोड़े समय तक जो उपज बढ़ी लेकिन उससे भूमि की उर्वराशक्ति घटी है । भूगर्भ के जल का अत्यधिक दोहन करने से जल संकट बढ़ा है । आज हमारा देश अन्न का पुन: आयात करने लगा हैं।५. संप्रभुता का लोप - सन् २००५ में जो सेज कानून बना है उसके अनुसार उस क्षेत्र में केन्द्र या राज्य सरकारों के बहुत से कानून स्थगित रहेंगे । वहां श्रमिकों की हड़ताल आदि के अधिकार सीमित कर दिए जाएंगे। वहां विदेशी कंपनियों को टैक्स भी नहीं लगेगा । जबकि वर्तमान में इन क्षेत्रों से एक लाख करोड़ की आमदनी होती है । बहुराष्ट्रीय कंपनियों को जो छूद दी जाएगी उससे जहां सरकार को ७५ हजार करोड़ का घाटा होगा वहीं सरकार को मात्र ४७०० करोड़ की आय होगी । जब एक ईस्ट इंडिया कंपनी आयी थी तो देश आर्थिक गुलामी के साथ राजनीतिक गुलामी में डेढ़ सौ साल रहा । आज लगभग १७५० बहुराष्ट्रीय कंपनियां यहां चली आई हैं ।६. सांस्कृतिक आक्रमण - विशेष आर्थिक क्षेत्र ऊपर से तो व्यापार का मुखौटा रखते हैं लेकिन धीरे-धींरे हमारे राजनीतिक व्यवस्था को प्रभावित करते हैं और उससे भी अधिक हमारी भाषा संस्कृति आदि को भी प्रभावित करते हैं। इसीलिए आज देश में मातृभाषा के स्थान पर विदेशी भाषा का वर्चस्व है । इतना ही नहीं हम विदेशी सभ्यता और संस्कृति में डूबते जा रहे हैं । इसीलिए सेज के द्वारा ने केवल आर्थिक गुलामी आएगी बल्कि स्वदेशी संस्कृति को भी खतरा हो गया है। सेज या विशेष आर्थिक क्षेत्र जो सबसे पहले चीन से शुरू हुआ था आज भारत में फैलने लगा है । लगभग ४०० ऐसे क्षेत्रों की पहचान कर ली गई है । हर्ष की बात यह है कि आज जनता ने इसका विरोध करना शुरू कर दिया है और सरकार और पंूजीपति वर्ग मिलकर संघर्ष का दमन कर रहे हैं । बंगाल में मार्क्सवादी सरकार ने भी सिंगुर और नंदीग्राम में किसानों पर जो कहर ढाया है उससे साम्यवाद भी कलंकित हो गया है । हाल में इन विशेष आर्थिक क्षेत्रों का विरोध करने के लिए माओवादी नक्सलवादीयों ने पांच प्रांतों में जो आर्थिक नाकेबंदी की है वह चाहे जितनी भी विध्वंसक हो उसने सरकार के बहरे कानों तक अपनी आवाज पहुंचा दी है । गांधी और सर्वोदय के लोग सेज और सरकार की आर्थिक नीति का विरोध कर रहे हैं । आवश्यकता है कि हम मिलजुलकर एक जनमोर्चा बनाएं । माओवादी अगर आर्थिक नीति और सेज का विरोध करते हैं तो उन्हें चीन की नीति का भी विरोध करना होगा और उसके माक्सर्वादी ढांचों का भी विरोध करना होगा । साथ ही संघर्ष का कोई एक नया विकल्प ढूंढना होगा जिसमें आतंक और हिंसा का कोई स्थान न हो । गांधी ने चंपारण, खेड़ा, बारडोली आदि अनेकों जगह में कृषकों को न्याय दिलाने के लिए प्रभावशाली आंदोलन किए थे और उसमें सफलता भी पाई थी । आज देश में लोकतंत्र है जहां जनता ही सौर्वभौम है । यदि हम जनता को लामबंद कर लें तो और नई आर्थिक नीति के परिवर्तन का ही मुद्दा देश के सामने रखें तो शायद हम परिवर्तन की दिशा में एक मौन क्रांति कर सकते है । अहिंसा हिंसा से अच्छी हैं । लेकिन जब हमें हिंसा और कायरता में चुनाव करना होगा तो हमें हिंसा को ही चुनना ही तर्क संगत होगा । गांधी का सत्याग्रह कायरता नहीं, बल्कि वीरता की पराकाष्ठा है । वह अन्याय के प्रतिकार का अहिंसक अणुबम है ।

३ हमारा भूमण्डल

ग्लोबल वार्मिंग : दूसरे के अपराध की सजा
प्रो. जोसेफ स्टिगलीज
दुनिया में एक बहुत बड़ा प्रयोग चल रहा है जिसमें यह पता लगाया जा रहा है कि जब आप वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य ग्रीन हाउस गैसों को अधिकाधिक उत्सर्जित करते जाते हैं, तो क्या परिणाम होता है । वैज्ञानिक समुदाय इसके परिणाम को अच्छी तरह से जानता है कि इससे परिणाम भयावह हैं । प्रदूषण से पैदा होने वाली गैसों धरती के आसपास एक आवरण (ग्रीनहाउस) का प्रभाव निर्माण करती हैं, जिससे पृथ्वी क्रमश: गर्म होती जाती है । हिमनद और ध्रुवीय बर्फ पिघलने लगती है, समुद्री धाराएं दिशा बदल लेती हैं और सागरों का जलस्तर ऊपर उठने लगता है । यह सब पूर्व अनुमानों से ज्यादा तेजी से हो रहा है और इसके दुष्परिणाम भी ज्यादा भयावह होंगे । अगर पृथ्वी जैसे हजारों गृह हमारी पहुंच में होते, तो किसी एक गृह पर यह प्रयोग किया जा सकता था, क्योंकि अगर स्थिति और ज्यादा खराब होती है, जिसकी आशंका वैज्ञानिक व्यक्त कर रहते हैं, तो हम किसी दूसरे गृह पर जा सकते थे । लेकिन हमारे पास वह विकल्प नहीं है । पृथ्वी जैसा कोई दूसरा गृह नहीं है । अतएव हर हाल में हमें इसी धरती पर रहना है । वर्तमान में ग्लोबल वार्मिंग (पृथ्वी के तापमान में वृद्बि) से अधिक व्यापक और महत्वपूर्ण कोई दूसरा वैश्विक मुद्दा नहीं है । हम सभी को एक ही वायुमंडल में सांस लेनी है । गौरतलब है कि अकेला अमरीका ही हर साल ६ अरब टन कार्बन डाइऑक्साइड हवा में छोड़ कर तापमान वृद्धि में मदद करता है, जिसका खामियाजा दुनिया के सभी लोगों को भुगतना पड़ रहा है । अगर यह संभव होता कि अमरीका द्वारा छोड़ी गई ग्रीन हाउस गैसें उसकी वायुसीमा में ही रहतीं तो भले ही वह हवा में जहरीली गैस छोड़ने का अपना यह विनाशकारी प्रयोग जारी रख सकता था, मगर बदकिस्मती से कार्बन हार्डऑक्साइड गैस राष्ट्रों की सीमाआे को नहीं पहचानती हैं । अमरीका चीन या किसी और देश द्वारा छोड़ी गई गैसें समूची दुनिया के वायुमंडल को प्रदूषित करती हैं । अमरीका या चीन या ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन करने वाले किसी और देश को उसके द्वारा किये जाने प्रदूषण की कीमत अपने देश की सीमा के बाहर नहीं चुकानी पड़ती है, इसलिए पर्यावरण संरक्षण के लिए अधिक कड़े उपाय करने की जरूरत है । हाल में प्रकाशित अपनी किताब मेकिंग ग्लोबलाइजेश वर्क, अमेरिका - में मैंने ध्यान दिलाया है कि अपना जीवन स्तर ऊँचा रखने के नाम पर अमरीका जैसे देश ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी लाने को तैयार नहीं हैं । जबकि अन्य कुछ देश ऐसे भी हैं, मगर अमरीका जैसे देश उनसे कोई प्रेरणा नहीं ले रहे हैं । दूसरी ओर सन् १९९७ के क्योटो प्रोटोकॉल के अनुसार जापान, यूरोपीय और अन्य कुछ लोगों ने अपना स्वार्थ एक ओर रखकर भी सारी दुनिया की भलाई के लिए ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन कम किया हैं । भूमंडलीकरण की अन्य बुराईयों के साथ यह भी तय है कि गरीब व्यक्ति को ही इसके सर्वाधिक त्रासद दुष्प्रभावों को झेलना होगा और उनके पास ही इसका सामना करने के साधन भी नहीं है । बांग्लादेश और मालदीव दूसरे राष्ट्रों के प्रदूषण के कारण उपजे ऐसे ही संकट का सामना कर रहे हैं, जो उनके बस में नहीं है । बांग्लादेश का अधिकांश क्षेत्र नीचा पठार है जो धान उपजाने के लिये बहुत अच्छा माना जाता है । मगर साथ ही समुद्र की सतह में होने वाली थोड़ी सी वृद्धि इस उपजाऊ जमीन को निगल लेगी। अभी भी वह लगातार आने वाले तूफानों और चक्रवातों का सामना करते रहता है। समुद्र का जलस्तर बढ़ने से देश की एक तिहाई भूमि समुद्र निगल जायेगा और १४ करोड़ की आबादी वाले इस देश में शेष बची भूमि पर भीड़ और जनसंख्या का बोझ भी और ज्यादा बढ़ जाएगा। उपजाऊ जमीन के डूब जाने से इस गरीब देश की आमदनी भी घट जाएगी । बांग्लादेश से भी बुरे परिणाम अन्य कुछ देशों को भोगने पड़ेंगे । हिंद महासागर में १२०० द्वीपों पर फैलाऔर ३३०००० की आबादी वाला मालदीव एक समय में ऊष्णकटिबंधीय क्षेत्र का स्वर्ग माना जाता था । विश्वसनीय वैज्ञानिक अनुमानों के अनुसार यह सुंदर देश अगले पचास वर्षो में पूरी तरह जलमग्न हो जाएगा । इसी प्रकार के नीची भूमि वाले अनेक द्वीपों का अस्तित्व खतरे में है । जिस क्योटो समझौते के अनुसार दुनिया में होने वाले कुल प्रदूषण का ७५ प्रतिशत विकसित देशों द्वारा किया जा रहा है, उस पर न तो अमरीका ने हस्ताक्षर किए हैं और ना ही उसने जंगलों की कटाई र&