शुक्रवार, 21 जनवरी 2011

कविता

सर्दी की दो गजलें
अजहर हाशमी

सूरज का सेंसेक्स
ठिठुरन-सिहरन-कंपकंपी, सर्दी के अंदाज
पाला झपटा फसल पर, ज्यों चिड़िया पर बाज !

सर्दी ऐसे चुभ रही, जैसे चुभती कील
तन को ऐसे नोचती, जैसे नोचे चील ।

मौसम की मुंडेर पर, कोहरे का कौआ
बच्चे से बूढ़े तलक, जाड़ा हुआ हौआ ।

ओसामा लादेन-सा, जाडे का व्यवहार
किया अपहरण धूप का, सूरज है लाचार ।

जाड़ा हुआ सटोरिया, करती धुंध धमाल
सूरज का सेंसेक्स, नीचे पड़ा निढाल ।

ठंडा हो गया सूरज !
ठंड में जो ठिठुरन से ठंडा हो गया सूरज
ओढ़कर बादल की चादर सो गया सूरज ।

जेठ में जो कहकहे लू के लगाता था
पौष से पाला पड़ा तो रो गया सूरज ।

चाहता था धूप की खेती करे लेकिन
कांप के सर्दी से, कोहरा बो गया सूरज ।

एक पल जब ये निकलकर छिप गया फौरन
लोग बोल लो ! ये आया, बो गया सूरज

सर्द मौसम कुंभ का मेला हुआ जैसे
नभ से मेले में बिछुड़कर खो गया सूरज !

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