शुक्रवार, 21 जनवरी 2011

महिला जगत

गर्भनिरोधक का नया फंडा
अंकुर पालीवाल

जन आरोग्य अभियान के अनंत फड़के का कहना है पिछले एक दशक में ग्रामीण स्वास्थ्य अधोसंरचना में नाम मात्र का भी परिवर्तन नहीं आया है । हमारे यहां भी अभी भी पर्याप्त् अस्पताल नहीं हैं और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों का तो बहुत ही बुरा हाल है ।
दुनियाभर में गर्भनिरोधक के जोखिम भरे सारे उपायोंके परीक्षण महिलाआें पर ही होते हैं । देश में १५ वर्ष के अंतराल के पश्चात इंजेक्शन के माध्यम से महिलाआें के शरीर मेंगर्भनिरोधक पहुंचाकर उन्हें खोखला बनाने के प्रयास पुन: प्रारंभ हो गए हैं । अंतर्राष्ट्रीय दानदाता एजेंसियां चेरिटी की आड़ में बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियोंके हितोंको लगातार प्रश्रय देती रहती हैं । आज गर्भनिरोधक के अनेक हानिरहित उपायों की मौजूदगी के बावजूद हार्मोन आधारित इस इंजेक्शन को भारतीय परिवार नियोजन कार्यक्रम में सरकारी तौर पर शामिल किए जाने के प्रयास अनेक शंकाआें को जन्म दे रहे हैं ।
केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय अपने परिवार कल्याण (नियोजन) कार्यक्रम में एक बार पुन: इंजेक्शन के माध्यम से शरीर में प्रविष्ठ होने वाले गर्भ-निरोधकों को शामिल किये जाने पर विचार कर रहा है । मंत्रालय ने इस संबंध में औषधि तकनीकी सलाहकार समिति (डीटीएबी) से आग्रह किया है कि वह उसे डीपोट मेड्रोझायप्रोगेस्टीरोन एसीटेट (डीपीएमए) को अपने कार्यक्रम में शामिल करने की अनुमति दे । गौरतलब है कि पूर्व में इसे शामिल किए जाने के प्रयास को सन् १९९५ में सर्वोच्च् न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद वापस ले लिया गया था ।
इस गर्भनिरोधक के माहवारी का लोप एवं वजन का बढ़ना जैसे कई दुष्परिणाम भी हैं । इसके दीर्घकालिक दुष्परिणामों में ओस्टोफोरोसिस या हडि्डयों का क्षरण भी शामिल हैं । केन्द्रीय स्वास्थ्य सचिव सुजाता राव का कहना है कि इस गर्भनिरोधक को शामिल किए जाने से संबंधित अधिकांश प्रक्रियाएं पूरी हो गई हैंऔर अब इस संबंध में सलाहकार समिति की अनुमति मिलना ही शेष है । वैसे इस बीच वे स्वयं रिटायर हो गई हैं ।
स्वास्थ्य कार्यकर्ता और महिला संगठन इसके विरूद्ध उठ खड़े हुए हैं । मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की नेता और राज्यसभा सदस्य वंृदा करात ने स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नदी आजाद को यह कहते हुए कि यह गर्भनिरोधक महिलाआें के स्वास्थ्य को हानि पहुंचाएगा, लिखा है कार्यक्रम को महज जनसंख्या नियंत्रण पर ही केंद्रित न होकर सुरक्षित गर्भनिरोध की ओर भी ध्यान देना चाहिए ।
दुष्परिणाम - महिला स्वास्थ्य समूहों ने औषधि तकनीकी सलाहकार समिति को भेजे गए ज्ञापन में अनुरोध किया है कि वह डीपीएमए को अमेरिकी कंपनी अपजॉन के ब्रांड नेम डेपो-प्रोवेरा के नाम से बेचने की स्वीकृति न दे, जिसे कि अब फाइजर ने खरीद लिया है । इस इंजेक्शन में प्रोगेस्टिन नामक हारमोन है, जिसे प्रत्येक तीन महीने में लगाया जाना होता है । यह डिम्बीकरण का निषेध कर एवं गर्भाशय की झिल्ली को मोटा करके इसमें शुक्राणुआें प्रवेश रोक देता है, जिसमें गर्भ नहीं ठहर पाता ।
दिल्ली के गंगाराम अस्पताल की स्त्रीरोग विशेषज्ञ माला श्रीवास्तव का कहना है कि अपने दुष्परिणामों की वजह से डीपीएमए भारत में लोकप्रिय नहीं हो पाया । उनका कहना है कि इसके बजाए कंडोम और जैल बेहतर विकल्प हैं क्योंकि इनसे यौन रोगों की संभावना में भी कमी आती है । भारत के दवा नियंत्रक ने सन् १९९३ में तीसरे चरण के अनिवार्य परीक्षण के बिना ही देश मे इस इंजेक्शन की बिक्री की अनुमति दे दी थी । दवा नियंत्रक ने अपजॉन से कहा था कि वह बिक्री के बाद ऐसा अध्यन कराए परंतु महिला संगठनों ने इसे अपर्याप्त् बताया और इसके बाद वे हस्तक्षेप के इरादे से सर्वोच्च् न्यायालय मे चले गए । सन् १९९५ में न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद डीटीएबी ने कहा था कि डेप्रो-प्रोवेरा को इसलिए अनुशंसित नहीं किया जा सकता क्योंकि इसका इस्तेमाल करने वाली महिलाआें की सतत् निगरानी की आवश्यकता होती है और देश में इस हेतु आवश्यक मात्रा में यथोचित अधोसंरचना ही मौजूद नहीं है । इसके बावजूद डीटीएबी ने इसके बाजार में बिक्री की अनुमति दे दी । मंत्रालय के अधिकारियों का कहना है कि अब इस इंजेक्शन के माध्यम से दिए जाने वाले गर्भनिरोधक की निगरानी हेतु पर्याप्त् अधोसंरचना मौजूद है ।
वहीं स्वास्थ्य कार्यकर्ता इस दावे को अस्वीकार कर रहे हैं । महाराष्ट्र के गैर सरकारी संगठन जन आरोग्य अभियान के अनंत फड़के का कहना है पिछले एक दशक में ग्रामीण स्वास्थ्य अधोसंरचना में नाम मात्र का भी परिवर्तन नहीं आया है । हमारे यहां भी अभी भी पर्याप्त् अस्पताल नहीं हैं और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों का तो बहुत ही बुरा हाल है ।
वैसे कई गैर सरकारी संगठन डेपो-प्रोवेरा के इस्तेमाल की वकालत भी कर रहे हैं । डीकेटी इंटरनेशनल की मुंबई शाखा की निदेशक सांड्रा ग्रास का कहना है कि हमारा अनुभव बताता है कि डीएमपीए सुरक्षित है। चूंकि यह हारमोन आधारित इंजेक्शन है अतएव इसके कुछ दुष्परिणाम (साईड इफेक्ट) तो होंगे ही । परंतु वे इतने गंभीर नहीं हैं । वही बिहार स्थित जननी की मुख्य प्रबंधक नीता झा का कहना है माहवारी रूकने जैसे दुष्परिणाम अंतत: तो लाभकारी ही हैं क्योंकि ग्रामीण भारत की बड़ी संख्या में महिलाएं एनीमिक हैं अतएव यदि कुछ समय के लिए माहवारी रूकती है तो खून की हानि को रोका जा सकता है ।
परिवार सेवा संस्थान एवं फेमिली प्लानिंग एसोसिएशन जैसे कुछ न्य गैर सरकारी संगठन भी डीएमपीए को प्रोत्साहित कर रहे हैं। वहीं दूसरी ओर दिल्ली स्थित एक महिला संसाधन केन्द्र सहेली से जुड़ीं स्वास्थ्य कार्यकर्ता कल्पना का कहना है कि यूएसएड अमेरिका उत्पादों को बढ़ावा देता है और वह गैर सरकारी संगठनों के माध्यम से भारत में परिवार नियोजन कार्यक्रम के बड़े भाग का निजीकरण भी कर रहा है । इस दौरान गैर सरकारी संगठनों द्वारा डीटीएबी को एक ज्ञापन देकर डीपीएमए को प्रोत्साहित किए जाने वाले कार्यक्रमोंपर रोक लगाने की भी मांग की गई है । ***

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