गुरुवार, 18 दिसंबर 2014

हमारा भूमण्डल
वैश्विक उथलपुथल का दौर
मार्टिन खोर

    सारा विश्व इस समय समस्याओं व अशांति से उबल सा रहा है । दुनिया का कोई भी क्षेत्र विकसित, विकासशील या अल्पविकसित, इस समय संकट में  है । हम सभी जानते हैं कि ईबोला का पहला मामला सन् १९८० के दशक में सामने आया था, लेकिन इसका उपचार ढूंढने में तेजी तब आई जबकि इसने पश्चिमी अफ्रीका में महामारी का रूप ले लिया और विकसित विश्व में भी दस्तक दे दी ।
    दो दशक पूर्व समाप्त हुए शीत युद्ध के बाद विश्वभर के लोगों ने सोचा था कि अब शांतिकाल आ गया है । एक राजनीतिक  वैज्ञानिक ने तो `इतिहास की समाप्ति` की भविष्यवाणी करते हुए कहा था कि विचारधाराओं एवं बड़ी शाक्तियों के मध्य का संघर्ष समाप्ति हो गया है और मुक्त  बाजार एवं लोकतंत्र की वकालत करने वालों की जीत हो गई है। परन्तु संघर्ष समाप्ती का भ्रम समाप्त हो गया है। संयुक्त राष्ट्र के हालिया वार्षिक सम्मेलन में शामिल हुए नेताओं ने स्वीकारा कि `वैश्विक अशांति` अभी भी कायम है । 
     पश्चिमी अफ्रीका में इबोला के मामलों में जबरदस्त वृद्धि हो रही है और विद्यमान वित्तीय एवं आर्थिक संकट के चलते भी अशांति फैल रही है, जिसकी छाया विकासशील देशों पर पड़ रही है । अपने शुभारंभ भाषण में सं.रा. महासचिव बान की मून ने कहा कि `यह एक भयानक वर्ष रहा है । इसमें बमों से लोगों को उड़ाने से लेकर सिर कलम करने तक, नागरिकों को जानबूझकर भुखमरी में डालने से लेकर अस्पतालों पर हमले करने तक, सं.रा. राहत शिविर व सहायता वाहन, मानवाधिकार एवं कानून का राज सभी पर हमले हुए हैं । उन्होंने इसमें गाजा की त्रासदी, यूक्रेन की उथलपुथल दक्षिण सूडान के राजनीतिक युद्ध में हजारों की हत्या और मध्य अफ्रीकी गणराज्य, माली एवं दि साहेल एवं सोमालिया में संघर्ष को भी इसमें शामिल किया    है । इसके अतिरिक्त  उन्होंने इराक एवं सीरिया का जिक्र किया है, जहां हर दिन क्रूरता की नई हदें तोड़ी जा रही है ।
    इस वर्ष उम्मीद के क्षितिज पर अंधकार छा गया है। बयान न कर सकने वाले कार्यों एवं मासूमों की मृत्यु से हमारा हृदय व्यथित है । दूसरे विश्वयुद्ध के बाद से कभी भी इतने शरणार्थी, विस्थापित लोग एवं दूसरे देशों में शरण लेने वाले लोग नहीं   थे । संयुक्त  राष्ट्रसंघ ने अतीत में कभी भी इतने सारे लोगों के लिए आपात भोजन सहायता और जीवन रक्षक सामग्रियों की आपूर्तियों हेतु अपील नहीं की थी ।
    उन्होंने कहा कि आज हम प्राकृतिक आपदाओं से अधिक मानव निर्मित आपदाओं का सामना कर रहे हैं । उन्होंने वहां इकट्ठा हुए नेताओं से अपनी नेतृत्व क्षमता दिखाने और कार्यवाही करने का आह्वान किया । पश्चिमी नेताओं, खासकर अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने मुस्लिम अतिवाद से निपटने की आवश्यकता पर जोर दिया । उनका इशारा इस्लामिक स्टेट (आईएस) की ओर था । सितंबर में ओबामा ने सीरिया में आइएस के ठिकानों पर बमबारी के  आदेश दिए थे । लेकिन कुछ लोगों ने बमबारी की वैधता और उसी के साथ आतंकवाद से निपटने और अंतरराष्ट्रीय कानूनों के उल्लंघन पर दोहरा मापदंड अपनाने पर प्रश्न उठाते हुए इजराइली हमलों से गाजा में फिलिस्तीनियों की मृत्यु को लेकर इजराइल के खिलाफ कार्यवाही न करने का उदाहरण भी दिया ।
    जलवायु परिवर्तन व ईबोला का उभरना भी सितंबर महीने के दो मुद्दे रहे हैं । २३ सितंबर को बान की मून ने एक जलवायु सम्मेलन बुलाया था, जिसमें १०० से अधिक देशों के उच्च् राजनीतिकनेताओं ने भागीदारी की थी । इसके एक दिन पूर्व अनेक समूहों के ३ लाख से ज्यादा लोगों ने न्यूयॉर्क में प्रदर्शन करते हुए `जलवायु न्याय` की मांग की । यह जलवायु संबंधित अब तक का सबसे बड़ा प्रदर्शन था । इसमें जलवायु संबंधी चरम दुष्परिणामों के सबूतों के सामने आने के बाद भी सरकारों द्वारा गंभीर कदम न उठाए जाने के प्रति बेचैनी दिखाई पड़ी । नेताओं ने उत्सर्जन में कमी का अपना वायदा दोहराया, लेकिन यह मूलत: पुराने वायदों की पुनरावर्ति ही थी जो कि वैसे भी अपर्याप्त सिद्ध हो चुके हैं।
    केवल तीन यूरोपीय नेताओं ने हरित जलवायु कोष के लिए यथोचित धन उपलब्ध कराने का वायदा (प्रतिदेश १ अरब डॉलर) किया । परंतु यह चार वर्ष पूर्व किए गए प्रति वर्ष १०० अरब डॉलर के वायदे से बहुत कम है । इस बात पर भी सवाल उठे कि विकसित देशों की सरकारें बाजार की उन ताकतों के खिलाफ कोर कार्यवाही करने से बच रही हैं, जिनकी वजह से जलवायु समस्या खड़ी हो रही है । इसके अलावा विकसित देश हेतु धन उपलब्ध कराने की अपनी प्रतिबद्धता से भी छिटक रहे हैं ।
    अंतिम दिन सामूहिक विमर्श में, राष्ट्रपतियों, प्रधानमंत्रियों, शक्तिशाली उद्योगपतियों/व्यापारियों, बैंक के मुख्य कार्यकारी अधिकारियों, वैज्ञानिकों और कुछ फिल्मी सितारों (लियोनार्डों केप्रियो, लिबिंग बिंग) ने संबोधित किया । ग्राका माशेल (नेल्सन मंडेला की विधवा) ने अपने समापन भाषण में नेताओं को चुनौती भी दी । उन्होंने कहा कि `समस्या की विशालता और निपटने के उपायों में कोई तारतम्य ही नहीं है । आज लाखों लाख लोग सड़कों पर उतरे हुए हैं और प्रत्युत्तर में हम जो कर रहे हैं क्या वह काफी है? हमें पुन: ठीक से योजना बनानी होगी ।
    आप लोग जो वचन दे रहे हैंउसको देखिए और स्वयं से पूछिए कि क्या आप इसके माध्यम से इस चुनौती से निपट सकते हैं। यह हमारे लाभ के लिए नहीं बल्कि हमारे कल्याण और जीवित रह सकने के लिए है । आपकोे ऐसे निर्णय लेने का साहस उठाना पड़ेगा जो संभवत: कुछ हजार लोगों को पसंद न आएं, लेकिन वह करोड़ों के हित में होंगे । आपमें  इतना साहस होना चाहिए कि आप तकनीक में परिवर्तन और उसका नियमन अनिवार्य कर पाएं । उन लोगों को भी सुनिए जिनके हित इस परिवर्तन से जुड़े हैं।
    मैंने २५ सितंबर को ईबोला के खतरे पर हुए सत्र में भी भागीदारी की थी, जिसमें, अमेरिकी राष्ट्रपति न अन्य वैश्विक नेताओं ने सर्वाधिक प्रभावित तीन देशों लाइबेरिया, सिअरा लिओन एवं गुयाना को मदद देने का वचन दिया । तीनों देशों के राष्ट्रपतियों ने बताया कि `हमने परिवार पद्धति का विस्तार किया है जहां पर हम सदस्यों का ध्यान रखते हैंऔर मरने वालों के साथ खड़े रहते हैं। परंतु हम कमोवेश उस गुस्से के आगे झुक जाते हैं, जब हम लोगों से कहते हैं कि अपने बीमार बच्च्े या दफनाए जा रहे व्यक्ति  को न छुएं ? लाइबेरिया में अब तक १७०० लोग मर चुके हैं,  जिसमें तकरीबन १०० स्वास्थ्यकर्मी भी शामिल हैं।
    ओबामा ने चेतावनी दी कि यदि इसे रोका नहीं गया तो कुछ महीनों में इबोला हजारों लोगों को मार सकता है । विश्वबैंक के अध्यक्ष का कहना था कि उन्होंने अब तक इतनी भयानक महामारी देखी ही नहीं है । इसके लिए जो कुछ संभव हो वह नहीं बल्कि जिस भी तरह की भी आवश्यकता हो वह किया जाना चाहिए । सबसे गंभीर खतरा यह है कि यह प्राणलेवा बीमारी (दो संक्रमित में से एक की मृत्यु) को रोका नहीं गया तो यह पहले संपूर्ण पश्चिमी अफ्रीका को और अन्तोतगत्वा पूरे विश्व को चपेट में ले लेगी । बैठकमें सामने आया कि जब इस तरह के संकट में सं.रा. संघ एकजुटता हेतु महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।         डॉक्टर्स विद आउट बार्डर की प्रमुख जॉनी ल्यु जो कि मामले में सबसे आगे है और महीनों से इस खतरे के बारे में चेता रही हैंने बैठक को बताया कि, जो वायदे किए गए थे वे पूरे नहीं हुए हैं। मदद करने वाले कार्यकर्ता थकान से चकनाचूर हो चुके हैं, सबके मन में डर बैठ गया है और संक्रमण की दर प्रत्येक तीन हफ्तों में दुगनी हो रही है । स्वास्थ्य प्रणाली धराशायी हो चुकी है, मरीज भाग रहे हैं(भगाए जा रहे हैं) और वे घर लौटकर अपने परिवारों को भी बीमार कर रहे हैं। हमें जुटना पड़ेगा और कोई गली मत ढूंढिये । हमारे सामने जबरदस्त सांगठनिक समस्याएं हैं। संयुक्त  राष्ट्र इस मामले में असफल नहीं हो सकता । आज एक राजनीतिक संवेग चल रहा है और विश्व नेता होने के नाते लोग आपका मूल्यांकन भी करेंगे ।`
    स्वास्थ्य कर्मचारियोंएवं प्रशासकों की जितनी भी प्रशंसा की जाए वह कम है, क्योंकि उन्हें स्वयं यह प्राणलेवा बीमारी अपनी चपेट में ले सकती है। सम्मेलन में यह भी सामने आया कि पर्यावरणीय एवं स्वास्थ्य संकट किस हद तक पहुंच चुके हैं। बहुत से लोग इस ओर ध्यान भी दे रहे हैंऔर एक बेहतर विश्व के लिए संघर्ष को तैयार हैं। जमीनी मदद से सार्वजनिक मत बनाने में मदद मिलती है और राजनीतिक नेताओं पर कार्य करने का दबाव भी पड़ता है।   उथलपुथल के इस काल में हमें पलटकर वार करना ही होगा अन्यथा सब नैराश्य में चले जाएंगे । जैसे कि माशोल ने चेताया भी है, `हम एक ऐसी चट्टान के निकट खड़े हैंजो बहुत जल्द गिरने वाली है। वैश्विक राजनीतिक नेतृत्व से मिला प्रत्युत्तर चुनौती के समक्ष अपर्याप्त है और इसे बढ़ाया जाना अनिवार्य है ।`

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