गुरुवार, 31 मई 2007

पर्यावरण रक्षा, हमारा सामाजिक दायित्व

पर्यावरण दिवस पर विशेष

पर्यावरण रक्षा, हमारा सामाजिक दायित्व

डॉ. खुशालसिंह पुरोहित

आजकल विश्व भर में पर्यावरण और इसके संतुलन की बहुत चर्चा है। पर्यावरण क्या है, इसके संतुलन का क्या अर्थ है, यह संतुलन क्यों नहीं है, ये प्रश्न समय-समय पर उठते रहे हैं, लेकिन आज इन प्रश्नों का महत्व बढ़ गया है, क्योंकि वर्तमान में पर्यावरण विघटन की समस्याआें ने ऐसा विकराल रूप धारण कर लिया है कि पृथ्वी पर प्राणी मात्र के अस्तित्व को लेकर भय मिश्रित आशंकाएं पैदा होने लगी हैं।

पर्यावरण को लेकर मानव समाज की दुर्गति मानव के इस निरर्थक विश्वास के कारण हुई कि प्रकृति में हर वस्तु उसी के उपयोग के लिए हैं। प्रकृति की उदारता, उसकी प्रचुरता तथा उसकी दानशीलता को मनुष्य ने अपना अधिकार समझा और उसकी इसी संकीर्णता से प्रकृति के शोषण से उत्पन्न असंतुलन की स्थिति भयावह हो चुकी है।

प्रकृति के साथ अनेक वर्षोंा से की जा रही छेड़छाड़ से पर्यावरण को हो रहे नुकसान को देखने के लिए अब दूर जाने की जरूरत नहीं है। विश्व में बढ़ते बंजर इलाके, फैलते रेगिस्तान, कटते जंगल, लुप्त होते पेड़-पौधे और जीव जंतु, प्रदूषणों से दूषित पानी, कस्बों एवं शहरों पर गहराती गंदी हवा और हर वर्ष बढ़ते बाढ़ एवं सूखे के प्रकोप इस बात के साक्षी हैं कि हमने अपनी धरती और अपने पर्यावरण की ठीक- देखभाल नहीं की । अब इसके होने वाले संकटों का प्रभाव बिना किसी भेदभाव के समस्त विश्व, वनस्पति जगत और प्राणी मात्र पर समान रूप से पड़ रहा है।

आज पर्यावरण संतुलन के दो बिंदु सहज रूप से प्रकट होते हैं। पहला प्राकृतिक औदार्य का उचित लाभ उठाया जाए एवं दूसरा प्रकृति में मनुष्य जनित प्रदूषण को यथासंभव कम किया जाए। इसके लिए भौतिकवादी विकास के दृष्टिकोण में परिवर्तन करना होगा। करीब पौने तीन सौ साल पहले यूरोप में औद्योगिक क्रांति हुई इसके ठीक १०० वर्ष के अंदर ही पूरे विश्व की जनसंख्या दुगनी हो गई। जनसंख्या वृद्धि के साथ ही नई कृषि तकनीक एवं औद्योगिकरण के कारण लोगों के जीवन स्तर में बदलाव आया। मनुष्य के दैनिक जीवन की आवश्यकताएँ बढ़ गई, इनकी पूर्ति के लिए साधन जुटाएँ जाने लगे। विकास की गति तीव्र हो गई और इसका पैमाना हो गया अधिकाधिक प्राकृतिक संसाधनों का दोहन,इसने एक नई औद्योगिक संस्कृति को जन्म दिया।

आज पूरे विश्व में लोग अधिक सुखमय जीवन की परिकल्पना करते हैं। सुख की इसी असीम चाह का भार प्रकृति पर पड़ता है। विश्व में बढ़ती जनसंख्या, विकसित होने वाली नई तकनीकों तथा आर्थिक विकास ने प्रगति के शोषण को निरंतर बढ़ावा दिया हैं। पर्यावरण विघटन की समस्या आज समूचे विश्व के सामने प्रमुख चुनौती है, जिसका सामना सरकारों तथा जागरूक जनमत द्वारा किया जाना है।

हम देखते हैं कि हमारे जीवन के तीनों बुनियादी आधार हवा, पानी और मिट्टी आज खतरे में हैं। सभ्यता के विकास के शिखर पर बैठे मानव के जीवन में इन तीनों प्रकृति प्रदत्त उपहारों का संकट बढ़ता जा रहा है। बढ़ते वायु प्रदूषण के कारण न केवल महानगरों में ही बल्कि छोटे-छोटे कस्बों और गाँवों में भी शुद्ध प्राणवायु मिलना दुभर हो गया है, क्योंकि धरती के फैफड़े वन समाप्त होते जा रहे हैं। वृक्षों के अभाव में प्राणवायु की शुद्धता और गुणवत्ता दोनों ही घटती जा रही है। बड़े शहरों में तो वायु प्रदूषण इतना बढ़ गया है कि लोगों को सांस संबंधी बीमारियां आम बात हो गई है।

हमारे लिए हवा के बाद जरूरी है जल। इन दिनों जलसंकट बहुआयामी है, इसके साथ ही इसकी शुद्धता और उपलब्धता दोनों ही बुरी तरह प्रभावित हो रही हैं। एक सर्वेक्षण में कहा गया है कि हमारे देश में सतह के जल का ८० प्रतिशत भाग बुरी तरह से प्रदूषित है और भू-जल का स्तर निरंतर नीचे जा रहा है। शहरीकरण और औद्योगिकीकरण ने हमारी बारहमासी नदियों के जीवन में जहर घोल दिया है,हालत यह हो गई है कि मुक्तिदायिनी गंगा की मुक्ति के लिए अभियान चलाना पड़ रहा है। गंगा ही क्यों किसी भी नदी की हालत ठीक नहीं कही जा सकती है।

हमारी भारत माता का स्वास्थ्य भी उत्तम नहीं कहा जा सकता है। देश की कुल ३२ करोड़ ९० लाख हैक्टेयर भूमि में से १७ करोड़ ५० लाख हैक्टेयर जमीन बीमार है। हमारी पहली वन नीति में यह लक्ष्य रखा गया था कि देश का कुल एक तिहाई क्षैत्र वनाच्छादित रहेगा, कहा जाता है कि इन दिनों हमारे यहाँ ९ से १२ प्रतिशत वन आवरण शेष रह गया है। इसके साथ ही अतिशय चराई और निरंतर वन कटाई के कारण भूमि की ऊपरी परत की मिट्टी वर्षा के साथ बह-बह कर समुद्र में जा रही है। इसके कारण बांधों की उम्र कम हो रही है, नदियों में गाद जमने के कारण बाढ़ और सूखे का संकट बढ़ता जा रहा हैं। आज समूचे विश्व में हो रहे विकास ने प्रकृति के सम्मुख अस्तित्व की चुनौती खड़ी कर दी है।

आज दुनियाभर में अनेक स्तरों पर यह कोशिश हो रही है कि आम आदमी को इस चुनौती के विभिन्न पहलुआें से परिचित कराया जाए, ताकि उसके अस्तित्व को संकट में डालने वाले तथ्यों की उसे समय रहते जानकारी हो जाए और स्थिति को सुधारने के उपाय भी गंभीरता से किए जा सके। भारत के संदर्भ में यह सुखद बात है कि पर्यावरण के प्रति सामाजिक चेतना का संदेश हमारे धर्मग्रंथों और नीतिशतकों में प्राचीनकाल से रहा है। हमारे यहाँ जड़ में, चेतन में सभी के प्रति समानता और प्रकृति के प्रति सम्मान का भाव सामाजिक संस्कारों का आधार बिंदु रहा है। प्राकृतिक तथा मानवीय संसाधनों के युक्तियुक्त उपयोग द्वारा ही पर्यावरण की रक्षा की जा सकती है। इसमें लोक चेतना में मीडिया की भूमिका महत्वपूर्ण है।

दुनिया में बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में मीडिया में पर्यावरण के मुद्दो ने अपनी उपस्थिति दर्ज की थी। भारतीय परिदृश्य में देखें तो छठे-सातवें दशक में पर्यावरण से जुड़ी खबरे यदाकदा ही स्थान पाती थी। उत्तराखंड के चिपको आंदोलन और १९७२ के स्टाकहोम पर्यावरण सम्मेलन के बाद इन खबरों का प्रतिशत थोड़ा बढ़ा । देश के अनेक हिस्सों में पर्यावरण के सवालों को लेकर जन जागृतिपरक समाचारों का लगातार आना प्रारंभ हुआ। वर्ष १९८४ में शताब्दी की सबसे बड़ी औद्योगिक दुर्घटना भोपाल गैस त्रासदी के बाद तो समाचार पत्रों में पर्यावरणीय खबरों का प्रतिशत यकायक बढ़ गया।

सन् १९९२ के पृथ्वी सम्मेलन तक आते-आते अनेक फीचर ऐजेंसियां इस पर विशेष फीचर देने लगी। समाचार पत्रों में पर्यावरण विषयों पर लिखने वाले लेखक भी सामने आये, जो पर्यावरण के विविध आयामों पर साधिकार लिखने की क्षमता रखते है। आजकल हमारे यहाँ अंग्रेजी, हिन्दी या किसी भी भाषा का पत्र हो, लगभग सभी समाचार पत्रों में पर्यावरण समस्याआें पर विशेष सामग्री का प्रकाशन होता है। कुछ पत्रों ने तो पर्यावरण को लेकर स्थायी स्तंभ बना रखे है, कुछ पत्र पत्रिकायें पूर्ण रूप से पर्यावरण पर ही केन्द्रित है।

पर्यावरण संरक्षण के उपायों की जानकारी हर स्तर तथा हर उम्र के व्यक्ति के लिए आवश्यक है। पर्यावरण संरक्षण की चेतना की सार्थकता तभी हो सकती है, जब हम अपनी नदियां, पर्वत, पेड़, पशु-पक्षी, प्राणवायु और हमारी धरती को बचा सके। इसके लिए सामान्यजन को अपने आसपास हवा-पानी, वनस्पति जगत और प्रकृति उन्मुख जीवन के क्रिया-कलापों जैसे पर्यावरणीय मुद्दों से परिचित कराया जाए। युवा पीढ़ी में पर्यावरण की बेहतर समझ के लिए स्कूली शिक्षा में जरूरी परिवर्तन करना होंगे पर्यावरण मित्र माध्यम से सभी विषय पढ़ाने होंगे। जिससे प्रत्येक विद्यार्थी अपने परिवेश को बेहतर ढंग से समझ सके। विकास की नीतियों को लागू करते समय पर्यावरण पर होने वाले प्रभाव पर भी समुचित ध्यान देना होगा।

प्रकृति के प्रति प्रेम व आदर की भावना सादगीपूर्ण जीवन पद्धति और वानिकी के प्रति नई चेतना जागृत करना होगी। आज आवश्यकता इस बात की भी है कि मनुष्य के मूलभूत अधिकारों में जीवन के लिए एक स्वच्छ एवं सुरक्षित पर्यावरण को भी शामिल किया जाये। इसके लिए संयुक्त राष्ट्र संघ स्तर तक पहल करना होगी। इतना ही नहीं विश्व के सारे देशों में पर्यावरण एवं सरकारी विकास नीतियों में संतुलन आए, इसके लिए सघन एवं प्रेरणादायक लोक-जागरण अभियान भी शुरू करना होंगे।

आज हमें यह स्वीकारना होगा कि हरा-भरा पर्यावरण मानव जीवन की प्रतीकात्मक शक्ति है और समय के साथ-साथ हो रही इसकी कमी आ रही हमारी वास्तविक ऊर्जा में भी कमी आई है। वैज्ञानिकों का मत है कि पूरे विश्व में पर्यावरण रक्षा की सार्थक पहल ही पर्यावरण को संतुलित बनाए रखने की दिशा में रंग ला सकती है।

आज पर्यावरण का बदलता रूख विश्व को ऐसे पड़ाव पर ले आया है, जहाँ मानव जीवन ढलता नजर आता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि वैश्विक गर्मी (ग्लोबल वार्मिग), बढ़ता प्रदूषण और घटती वन-वृक्षों की संख्या हमें चेता रही है। अब हमें चेतना होगा, ऊर्जा के लिए प्रदूषण रहित नए उपाय विकसित किए जाएँ और पेड़-पौधों को अधिक से अधिक लगाने के सार्थक प्रयत्न किए जाएँ। पौधारोपण की सहायता से पर्यावरण को मजबूत बनाया जाए।

पर्यावरण की अनदेखी मानव सभ्यता पर कालिख पोत रही हैं । इस दिशा में भागीरथी प्रयास जरूरी है। भागीरथ प्रतीक है उच्चतम श्रम का,मनुष्य के श्रम के पसीने का। मनुष्य के श्रम का पसीना गंगाजल से भी ज्यादा पवित्र है। गंगा और भागीरथ के मिथक से ही इसे समझा जा सकता है। भागीरथ जब अपने श्रम से गंगा को धरती पर लाये तो गंगा का नाम हो गया भागीरथी, भागीरथ का नाम गंगाप्रसाद नहीं हुआ । इस प्रकार अधिक परिश्रमी और असाध्य कार्य के लिए प्रतीक हो गया भागीरथी प्रयास। पर्यावरण के क्षैत्र में भी संरक्षण के भागीरथी प्रयासों की आवश्यकता है। सर्वप्रथम यह हमारा सामाजिक दायित्व है कि हम स्वयं पर्यावरण हितैषी बनें जिससे पर्यावरण समृद्ध भारत बनाया जा सके।

प्रकृति और मनुष्य के गहरे अनुराग के कारण दोनों के साहचर्य से प्रकृति का संतुलन बना रहता है। पिछले हजारों वर्षो से चले आ रहे प्रकृति संतुलन में पिछले एक शताब्दी में आये व्यापक बदलाव के लिए उत्तरदायी कारणों की खोज जरूरी है। मनुष्य के प्रकृति के साथ प्रेममूलक संबंधों में आ रही गिरावट और बढ़ती संवेदनशीलता के दायरों से बाहर निकलकर पुन: प्रकृति की ओर लौटने के लिये हमें हमारी परंपराआें, शिक्षाआें और संस्कृति की समृद्ध विरासत की ओर लौटना होगा।

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1 टिप्पणी:

mish ने कहा…

Accha nibandh he!! it helped me a,lot Thxx