गुरुवार, 31 मई, 2007
इस अंक में
इस अंक में
पर्यावरण डाइजेस्ट के इस अंक में लोक चेतना पर विशेष सामग्री दी गयी है।
पहले लेख संकट में है, भूमिगत जल में सुप्रसिद्ध पर्यावरणविद् सुश्री सुनीता नारायण का कहना है कि सिंचाई एवं अन्य कार्यो में भूमिगत जल का जिस अनियमित तरीके से दोहन हो रहा है, उसके चलते आने वाले समय में जल की समस्या विकराल होगी। सुप्रसिद्ध पर्यावरण लेखक कुशपालसिंह यादव के लेख गंदगी से फैलता जहर में कोची नगर निगम द्वारा अपने अपशिष्ट निपटान में गंदगी फैलाने वाले तरीके की विस्तार से जानकारी दी है। म.प्र. के वनवासी अंचल झाबुआ के सामाजिक कार्यकर्ता शंकर तड़वाल ने अपने लेख आदिवासियों की अस्थिता का संकट में लिखा है कि आदिवासियों को सुधारने और संस्कारित करने के बहुविध प्रयास स्वयं आदिवासियों की अस्मिता का संकट पैदा कर रहे हैं।
म.प्र. के वरिष्ठ साहित्यकार राजेन्द्र जोशी के लेख पेड़ हमारे संस्कृति वाहक में अरण्य संस्कृति की चर्चा की गयी हैं। म.प्र. के प्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक डॉ. विनोद श्राफ के लेख म.प्र. जल समस्या का तात्कालिक उपाय में भूजल पुर्नभरण की तकनीकी पक्षों पर प्रकाश डाला गया है।
शाहजहांपुर उ.प्र. के महाविद्यालयीन विद्यार्थी सतनामसिंह ने अपने लेख विकास बनाम विनाश में पर्यावरण संरक्षण की आवश्यकता प्रतिपादित की है।
आगामी ५ जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जायेगा। इसी अवसर पर डॉ. खुशालसिंह पुरोहित के लेख पर्यावरण रक्षा हमारा सामाजिक दायित्व में पर्यावरण संरक्षण के लोक चेतना पर बल दिया गया हैऔर इसी से जुड़े कुछ सवाल उठाये गये है।
पत्रिका स्थायी स्तंभ पर्यावरण परिक्रमा, ज्ञान विज्ञान एवं पर्यावरण समाचार में आप देश दुनिया में पर्यावरण और विज्ञान के क्षेत्र में चल रही हलचलों से अवगत होते है।
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-कुमार सिद्धार्थरचनात्मक पत्रकारिता की आधी शताब्दी
संपादकीय
रचनात्मक पत्रकारिता की आधी शताब्दी
पिछले दिनों हिंदी की समाचार विचार सेवा सर्वोदय प्रेस सर्विस (सप्रेस) ने अपनी सेवा के ४७ वर्ष पूर्ण कर ४८ वें वर्ष में प्रवेश किया। हिंदी पत्रकारिता के क्षेत्र में स्थापित इस फीचर सेवा से १४ राज्यों के २५० से अधिक दैनिक, नियतकालिक तथा रचनात्मक संस्थाएं, शैक्षिक संस्थाएं एवं विभिन्न जन संगठन जुड़े हुए है।
सप्रेस द्वारा हिंदी भाषी अखबारों के लिए राष्ट्रीय समस्याआें, रचनात्मक कार्योंा, ग्रामीण विकास, पर्यावरण और विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य, जनहित के मुद्दों और गांधी विचारों आदि विषयों से जुड़े हजारों आलेखों व समाचारों का प्रकाशन किया जा चुका है। विगत् ४७ वर्षों में सप्रेस द्वारा सैकड़ों राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय लेखकों, पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताआें और विचारकों के लगभग ६ हजार से अधिक आलेख प्रकाशित हुए है।
पिछले दो वर्षो से पर्यावरण और विकास के मुद्दे पर सप्रेस ने नई दिल्ली स्थित विज्ञान और पर्यावरण केन्द्र के सहयोग से हिंदी में डाउन टू अर्थ फीचर्स पाक्षिक विशेष फीचर सेवा भी आरंभ की है। इसके अलावा सप्रेस द्वारा विगत् १२ वर्षो से मलेशिया स्थित थर्ड वर्ल्ड नेटवर्क संस्था के सहयोग से भी पर्यावरण-विकास व सामाजिक मुद्दों पर लेखों का पाक्षिक प्रकाशन किया जा रहा है।
ज्ञातव्य है कि सन् १९६० से प्रारंभ हुई सप्रेस समाचार विचार सेवा का कार्यभार सर्वोदयी विचारक स्व. महेन्द्रकुमार ने उठाया था और सन् २००३ में अपने निधन तक उन्होंने ४३ वर्षो तक सप्रेस को मानद संपादक के रूप में अपनी सेवाएं दी। उनके निधन के बाद से उनके मित्रों के सहयोग से अब तक सप्रेस सेवा नियमित रूप से जारी है।
युवा पीढ़ी में गांधी विचार और सर्वोदय दर्शन के प्रचार का जो कार्य सप्रेस के माध्यम से महेन्द्र भाई ने चार दशक तक लगातार किया, उसकी देश में दूसरी कोई मिसाल नहीं है। रचनात्मक आंदोलनों और समाज परिवर्तन के कार्यक्रमों के लिये सप्रेस एक मंच बना जिससे सरकार और समाज के सामने सामान्य जन की पीड़ा और उसकी वाणी मुखर हुई। अपनी आधी शताब्दी की यात्रा में सप्रेस ने आंचलिक पत्रों एवं पत्रकारों को नयी शक्ति और नया सामर्थ्य देने के साथ ही ग्रामीण और वनवासी अंचलों की समस्याआें को राष्ट्रीय स्तर पर उठाने का महत्वपूर्ण कार्य किया है।पत्र, संपादक के नाम
पत्र, संपादक के नाम
पेड़ों की कमी कैंसर को बढ़ाएगी
महोदय,
शहरों में विकास के नाम पर काफी पेड़ काटे गए एवं बगीचे उजाड़े गए। शहरों में हो रही पेड़ों की कमी कैंसर को बढ़ावा देगी। हाल ही में पुरड्यू विवि के वैज्ञानिकों ने डॉ. रिचर्ड ग्रांट के नेतृत्व से एक त्रिआयामी मॉडल की सहायता से अध्ययन कर बताया है कि पेड़ हमें खतरनाक पराबैंगनी-बी किरणें के प्रभाव से बचाते हैं। पराबैंगनी-बी (यूवी-बी) किरणें पराबैंगनी किरणों के तीन प्रकारों (ए,बी एवं सी) में सर्वाधिक घातक होती हैं एवं कैंसर पैदा करने की क्षमता रखती है। वायुमंडल में २०-२२ किलोमीटर की ऊँचाई पर स्थित ओजोन परत सूर्य प्रकाश के साथ आई पराबैंगनी किरणों का अवशोषण करती हैं। वर्तमान में ओजोन परत के क्षरण से ये किरणें अधिक मात्रा में पृथ्वी पर पहुँच रही है।
डॉ. रिचर्ड ग्रांट द्वारा विकसित त्रिआयामी मॉडल की सहायता से किसी पेड़ के नीचे तक कितनी पराबैंगनी-बी किरणें पहुँच रही हैं, यह ज्ञात किया जा सकता है। पराबैंगनी बी किरणों की कितनी मात्रा धरती तक पहुँचेगी, यह किसी स्थान की भूमध्य रेखा से दूरी, समुद्र तल से ऊँचाई, दिन का प्रहर व पेड़ों के आच्छादन पर निर्भर रहता है। उदाहरण के लिए यदि एक व्यक्ति सीधे ही धूप में खड़ा है तो वह पेड़ की छांव में खड़े व्यक्ति की तुलना में दो गुनी मात्रा में पराबैंगनी-बी किरणों को ग्रहण कर रहा होता है।
विवि के वैज्ञानिकों ने अपने मॉडल की सहायता से यह भी पता लगाया है कि रहवासी क्षेत्रों, धूप तथा पेड़ों की छांव में खेल रहे बच्चों तक कितनी मात्रा में पराबैंगनी-बी किरणें पहँुचती है।
पराबैंगनी-बी किरणों के प्रभाव से लम्बे समय में त्वचा का कैंसर पैदा होता है, जिसे मेलेनोमा कहा जाता है। दिल्ली विश्वविद्यालय के बायोटेक्नॉलोजी विभाग ने आकलन कर बताया है कि मुम्बई, दिल्ली तथा कोलकाता में उपरोक्त त्वचा कैंसर के प्रकरण बढ़ रहे हैं। पर्यावरण वैज्ञानिकों की गणना के अनुसार ओजोन परत में १% की कमी से २% त्वचा कैंसर एवं ०.५% मोतियाबिन्द (केटरेट्स) के प्रकरण बढ़ जाते हैं। पराबैंगनी किरणें समग्र रुप से रोग प्रतिरोध क्षमता भी घटाती है। डॉ. रिचर्ड ग्रांट के अनुसार वायुमण्डल में जो भूमिका ओजोन की रहती है लगभग वैसा ही कार्य पेड़ों द्वारा धरती पर किया जाता है इसलिए ओजोन परत की सुरक्षा के प्रयासों के साथ-साथ पेड़ों का बचना भी आवश्यक है।
डॉ. ओ. पी. जोशी, डॉ. जयश्री सिक्का,
गुजराती साइंस कॉलेज, इन्दौर (म.प्र.)संकट में है भूमिगत जल
१ सामयिक
संकट में है भूमिगत जल
सुश्री सुनीता नारायण
इसे भारत की कुछ अनजानी विडंबनाआें में से एक कह सकते हैं। पिछले कुछ सालों में सरकार ने सार्वजनिक सिंचाई एजेंसियों के माध्यम से सतही जल प्रणाली का प्रबंधन अपने हाथ में ले लिया है।
इसने सिंचाई प्रणालियों- बांध, तालाब, नहर आदि के निर्माण, इनके रखरखाव और पानी की आपूर्ति का काम संभाल लिया है। इसी के तहत उसने जल संसाधनों को ग्रामीण समुदायों के लेकर अपने पास रख लिया। विडंबना यह है कि सरकार ने यह अधिकार ले लिया है, फिर भी लोगों ने पानी अपने नियंत्रण में रखा है। हर व्यक्ति जमीन के नीचे का पानी निकालने के लिये स्वतंत्र है और देश में ज्यादातर सिंचाई इसी पानी से होती है। इसका अर्थ है कि सरकार का नियंत्रण एक भ्रम मात्र है।
फिलहाल अपने देश के सिंचित इलाके के तीन-चौथाई क्षेत्र में भूमिगत जल से सिंचाई होती है, सतही जल से नहीं। इस जल से सिंचाई का बुनियादी ढांचा किसी भी तरह से कर्ज के माध्यम से धन जुटाकर (धनी और गरीब) सभी किसानों ने बना लिया है। इससे यह बहस तो हो सकती है कि राज्य की ओर से संस्थागत मदद न मिलने के कारण किसान साहूकारों या कर्जदाता एजेंसियों के चंगुल में फंसे हुए हैं और उनकी गरीबी बरकरार है, लेकिन हकीकत यह भी है कि हाल में हुई तीसरी लघु सिंचाई जनगणना के आंकड़े के मुताबिक इस समय देश में एक करोड़ ९० लाख कुएं और गहरे ट्यूबवेल हैं।
पानी के शासन को समझने के लिए हमें अनिवार्य रूप से यह समझना होगा कि क्यों सिंचाई का अर्थशास्त्र मौजूदा तकनीक की सीमाआें से जुड़ा हुआ है। यह जरूरी इसलिए है क्योंकि यह इसका असर दूसरे क्षेत्रों मसलन ऊर्जा उत्पादन, बिजली आपूर्ति आदि में भी देखने को मिलता है। १० वीं योजना की मध्यावधि समीक्षा में बताया गया है कि सिंचाई की सुविधा के विस्तार का पूंजीगत खर्च प्रति हेक्टेयर ४० हजार रुपए से बढ़कर ढाई लाख रुपये हो गया है और भंडारण की सुविधा की जरूरत पिछले एक दशक में दोगुना हो गई है। इसमें विस्थापितों के पुनर्वास और जैव विविधता के क्षरण की भरपाई में खर्च होने वाली रकम को नहीं जोड़ा गया है।
जैसे-जैसे सिंचाई के बुनियादी ढांचे के निर्माण का खर्च बढ़ता गया, किसानों से इसके लागत खर्च और इसके रखरखाव के खर्च की वसूली संभव नहीं रही। ज्यादातर राज्यों में सिंचाई के काम देखने वाली एजेंसियां पिछले साल रखरखाव के खर्च का महज ३० फीसदी ही किसानों से वसूल पाइंर्। इसकी वजह से उनका क्षरण होने लगा। आज स्थिति यह है कि भूमिगत जल से संचालित नहरों की हालत खराब है और उनकी मरम्मत की बेहद सख्त जरूरत है, इसलिए आश्चर्य नहीं है कि सिंचाई के बुनियादी ढांचे की क्षमता और इसके वास्तविक इस्तेमाल के बीच का अंतर बढ़ता जा रहा है। दूसरी ओर सतही जल से सिंचाई के सिस्टम में पानी ढोकर काफी दूर ले जाना होता है, वह भी घाटे में है और अक्षम साबित हो चुका है।
चूंकि पूंजी और संसाधनों की कमी है इसलिए सभी तक सुविधा पहुंचाना संभव नहीं है। आज स्थिति यह है कि ४५ फीसदी खाद्यान्न का उत्पादन उन इलाकों में होता है, जहां बारिश के पानी से ही सिंचाई होती है। गरीबों का जीवन इसी उत्पादन से चलता है। दूसरे शब्दों में कहें तो सतही सिंचाई प्रणाली में किए गए निवेश ने समृद्धि के चंद टापू तैयार किए लेकिन स्थानीय स्तर पर खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में बहुत कम योगदान किया।
इसी वजह से भूमिगत सिंचाई की प्रणाली शुरू हुई। यह सफल रही क्योंकि यह लोगों के हाथ में थी। वे अपनी जरूरत के समय इसका इस्तेमाल कर सकते थे। अगर उनके ट्यूबवेल चलाने के लिए बिजली नहीं है तो वे डीजल से मशीन चलाते हैं या भाड़े पर जनरेटर ले आते हैं और जमीन से पानी खींचते हैं। यह जानी हुई हकीकत है कि जो जितना सक्षम किसान है वह भूमिगत जल का उतना ही आसानी से इस्तेमाल करता है। इसका खर्च बहुत कम है क्योंकि यह आसानी से स्थानीय स्तर पर उपलब्ध है। कई मायने में भूमिगत जल के जरिये होने वाली सिंचाई सबसे बेहतर वितरण का विकेंद्रित विकल्प है लेकिन इसकी शर्त यह है कि इसका प्रबंधन समझदारी से हो।
इस संसाधन के सघन इस्तेमाल का अनिवार्य नतीजा यह हुआ है कि पूरे देश में भूमिगत जल का स्तर तेजी से गिरा है। तकनीक ने ज्यादा से ज्यादा गहराई से पानी खींचने की सुविधा दी है और सब्सिडी से मिलने वाली ऊर्जा ने उन्हें ज्यादा पानी खींचने के लिए प्रेरित किया है। अध्ययन बताते हैं कि जहां सस्ती बिजली उपलब्ध है, वहां हर फसल के लिए दोगुना पानी खींचा गया है, उन जगहों के मुकाबले जहां डीजल के इस्तेमाल से पानी खींचा जाता है।
हम कानून बनाकर इस इस्तेमाल को नियंत्रित कर सकते हैं। एक करोड़ ९० लाख उपभोक्ताआें को नियंत्रित करना मुश्किल जरूर है पर असंभव नहीं है। हमें यह समझना होगा कि भूमिगत जल एक सीमित संसाधन है और इसके लिए कुआें को रिचार्ज करने की जरूरत होती है, इसलिए इसे एक स्थायी संसाधन बनाए रखने के लिए इसका सालाना इस्तेमाल सीमित करना होगा। दूसरे शब्दों में हमें भूमिगत जल का इस्तेमाल बैंक की तरह करना होगा यानी इसका ब्याज इस्तेमाल करें और मूलधन को बचाए रखें।
लेकिन यहां विडंबना दोहरी हो जाती है। एक तरफ सिंचाई की सतही प्रणाली की जगह भूमिगत जल की प्रणाली ने ले ली है और दूसरी ओर सिंचाई के अन्य साधन जैसे कुएं, तालाब और समुदाय आधारित विकेंद्रित वॉटर-हार्वेस्टिंग सिस्टम में गिरावट आई है जबकि हकीकत यह है कि ये साधन भूमिगत जल को रिचार्ज करने में भी काफी मददगार होते हैं। इसका मतलब है कि हम जमीन के नीचे से ज्यादा से ज्यादा पानी खींच रहे हैं और उसे कम से कम रिचार्ज कर रहे हैं।
अगर अपनी पारंपरिक प्रणालियों का सम्मान नहीं करेंगे तो हमारे पानी का भविष्य अंधकारमय हो जाएगा। पारंपरिक प्रणालियों में वर्षा के पानी को रोकने के हजारों माध्यम होते थे और विभिन्न किस्म की संरचनाएं होती थीं, जो अब विलुप्त प्राय: हैं। स्पष्ट है कि हमें इसके अर्थशास्त्र को समझने के लिए तकनीक की राजनीति को समझना होगा।
***जैव इंर्धन - भूखे को तेल की मार
२ हमारा भू-मण्डल
जैव इंर्धन - भूखे को तेल की मार
रोजमैरी बॉर
एक और विश्वभर में लाखों लोगों को खाद्यान्न की कमी के कारण भूखा रहना पड़ रहा है तो वहीं दूसरी ओर इस अनमोल खाद्यान्न का प्रयोग वाहनों के इंर्धन के रूप में किया जा रहा है। पर्यावरण को प्रदूषण से बचाने की आड़ में जिस तरह से जंगलों और जैव विविधता को नष्ट किया जा रहा है उससे तो पृथ्वी का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा। संपन्न अब अपनी विलासिता के लिये समाज के बड़े तबके को भूखा मारने में भी झिझक नहीं रहा है।
तेल की बढ़ती कीमतों और पर्यावरणीय बदलावों के चलते सभी लोग जैव इंर्धन वाली फसलों की खेती की ओर आकर्षित हो रहे हैं। किंतु ऊर्जा का यह नया स्त्रोत अपने साथ भयंकर पर्यावरणीय और सामाजिक खतरे भी लेकर आरहा है।
पर्यावरण पर होने वाली बहसों में जैव इंर्धन नया जादुई शब्द है जिसका प्रचलन लगातार बढ़ता जा रहा है। अमेरिका, यूरोपीय संघ, ब्राजील और एशिया के विशाल क्षेत्र में अब करोड़ों की धनराशि निवेश करके अब बजाय खाने के वाहन चलाने के लिये मक्का, सोयाबीन, सरसों, गन्ना, पाम, आईल या गेहंू के जरिये एथनॉल और बायो-डीजल का उत्पादन किया जा रहा है। अर्थात सारे विश्व में बायो डीजल और बायो एथनॉल को खनिज तेल का विकल्प मान लिया गया है। आजकल औद्योगिक देशों से यह आशा की जा रही है कि वे पर्यावरण हितैषी मोटर वाहन बनाएं ताकि उन्हें साफ दिल से चलाया जा सके।
इंर्धन उद्योग की ओर से यह प्रचार किया जा रहा है कि यूरोपीय संघ के किसानों का भविष्य अनाज के लिये खेती करने में नहीं, जिसके दाम लगातार घटते जा रहे हैं, बल्कि इंर्धन के लिये खेती करने से उज्जवल होगा। जर्मनी के भूतपूर्व मंत्री रेनाटा कृनत्ज ने कहा हमारे किसान भविष्य के शेख हैं। हमारा उत्तरी पड़ौसी एक ऐसा कानून बनाने जा रहा है, जिसके तहत पेट्रोल में निश्चित अनुपात में बायो एथनॉल मिलना अनिवार्य होगा। किंतु इसका भी लाभ किसानों को मिलने वाला नही है। पहले की तरह वे खरीदी के एकाधिकार और खनिज तेल उत्पादक कम्पनियों के मूल्य निर्धारक महाजनों के चंगुल में फसें रहेंगे। आज भी यूरोप में इसका उत्पादन घरेलू मांग से कम है। इसकी पूर्ति करने के लिये दक्षिण अमेरिका, मलेशिया और इण्डोनेशिया से सस्ता पाम आईल और सोयाबीन तेल बड़े-बड़े जहाजों में भर कर यूरोप पहुंच रहा है।
जैव-इंर्धन की मांग बढ़ने के साथ-साथ इसकी खेती करने वाले ब्राजील, इण्डोनेशिया, मलेशिया, बोर्नियो और न्यू गुयाना जैसे प्रमुख देशों में इसके सामाजिक और पर्यावरणीय दुष्प्रभाव नजर आने लगे हैं। कई जगहों पर तो निर्यात के लिये की जाने वाली जैव इंर्धन की खेती की प्रत्यक्ष स्पर्धा खाद्यान्न की खेती से हैं। उदाहरणार्थ ब्राजील में गन्ने के तकरीबन २०० बड़े खेतों और एथनॉल के कारखानों ने गरीबों के लिये ऊपजाए जाने वाले धान, मक्का और फलियों के खेतों की जगह घेर ली है। फास्ट फूड इन्फॉरमेशन एण्ड एक्शन नेटवर्क के ग्रेट्रुड फाक चेतावनी देते हुए कहते हैं, कि जब अनाज इंर्धन बनकर गाडियों की टंकी में समा जायेगा तो स्वाभाविक है कि बहुत से लोगों के पेट खाली रहेंगे। उदाहरण के लिये भारत सरकार जैव इंर्धन को प्रोत्साहित करने के देशभर के अखबारों में पूरे-पूरे पन्नों के विज्ञापन छपवा कर बता रही है कि यह कार्यक्रम किसानों और देश की अर्थव्यवस्था को समृद्ध करने वाला है। जबकि शोचनीय तथ्य यह है कि भारतीय उपमहाद्वीप में भरपेट भोजन न पाने वालों की तादाद अफ्रीका से अधिक होने के बावजूद भारत यूरोप को अनाज निर्यात कर रहा है।
छोटे किसानों की बड़ी मुसीबत
विकासशील देशों में इंर्धन की खेती के लिये जमीन की ताक में रहने वाले दलाल छोटे किसानों से जमीन हड़प रहे हैं। परिणामस्वरूप पारंपरिक खेती और उसके स्वामित्व का स्वरूप समाप्त हो रहा है। इस बसंत में यूरोप के दौरे पर आये इण्डोनेशियाई पर्यावरण और मानवाधिकार निगरानी संगठन, स्वैट वॉच (पाम आईल वॉच) के प्रतिनिधियों ने बताया कि पारंपरिक समाज की विशिष्टता समाप्त हो रही है और भूमि विवाद बढ़ रहे हैं। तेल के लिये पाम (नारियल, ताड़, खूजर की प्रजाति का वृक्ष) के बगान लगाने के लिये उन्हें उनके पारंपरिक निवास स्थान आमतौर पर जंगल से बेदखल किया जा रहा है। सन् १९९९ से अब तक पाम के बागानों का क्षेत्रफल ३० लाख हेक्टेयर से बढ़कर ५० लाख हेक्टेयर हो गया है।
फलस्वरूप छोटे किसान और पट्टे पर खेती करने वाले बेघर-बेरोजगार होकर असंगठित क्षेत्र में रोजगार की तलाश में बड़े शहरों की झुग्गियों में आ बसते हैं। जो लोग पीछे छूट जाते हैं, वे रोजाना १२-१४ घण्टे मजदूरी करके जैसे-तैसे गुजारे लायक आमदनी पाते हैं या फिर मौसम के हिसाब से काम करने वाले अस्थाई मजदूरी बन कर रह जाते हैं।
वर्षा वनों का विनाश
इस खेती की कीमत पर्यावरण विनाश के रूप में भी चुकानी पड़ रही है। बार-बार एक ही फसल लेने (इसके लिये आमतौर पर पश्चिमी बैंकों से वित्तीय सहायता भी मिलती है) से मिट्टी की गुणवत्ता भी प्रभावित हो रही है। रासायनिक उर्वरक और कीटनाशक भूजल को जहरीला बना रहे हैं। पहले ही पानी की कमी से जूझ रहे खाद्यान्न की खेती करने वाले किसानों के बजाय निर्यात के लिये इंर्धन ऊपजाने वालों को पानी दिया जा रहा है। पिछले वर्ष इण्डोनेशिया और उसके पड़ौसी देशों के आकाश पर जो गाढ़ा धुंआ हफ्तों तक छाया रहा था के कारण राजनीतिक तनाव भी उभरने लगा था। इसे देखते हुए दक्षिण पूर्वी एशियाई राष्ट्रों के संघ (आसियान) ने पिछले साल अक्टूबर में एक आपात बैठक बुलाई थी। इण्डोनेशिया के राष्ट्रपति युधोयोनो ने पड़ौसी देशों से इस वायु प्रदूषण के लिये क्षमा भी मांगी थी। दरअसल पाम और सोयाबीन की खेती के लिये जमीन साफ करने के लिये बड़े पैमाने पर जंगल काट कर जलाए जाने से यह धुंआ आसमान पर छा गया था।
इसका एक अन्य दुष्प्रभाव जैव विविधता का समाप्त होना है। मीलों तक फैले एक ही फसल (पाम) के बागानों को इण्डोनेशियाई लोगों ने औद्योगिक जंगल का नाम दिया है। सुमात्रा और बोर्नियों में तो जंगल साफ करने की वजह से औरांग उटान, जंगली हाथी और बाघ की अत्यन्त दुर्लभ प्रजातियां प्राकृतिक आवास समाप्त होने की वजह से लुप्त होने की कगार पर है। ब्राजील में भी सोयाबीन और गन्ने की खेती के लिये लाखों हेक्टेयर वर्षावन काट दिये गये हैं। गतवर्ष ब्राजील की पर्यावरण संरक्षण संगठन फुकोनाम ने प्रकृति के इस निर्मम शोषण की ओर ध्यान आकर्षित करने का प्रयास की किया था । नवम्बर २००५ में संघीय प्रान्त माटो ग्रोसो डुसुल में हुए प्रदर्शन के दौरान फुकोनाम के अध्यक्ष अन्सेमलो डे बार्नस ते हताशा प्रकट करते हुए आत्मदाह तक कर लिया था।
जैव इंर्धन के बढ़ते उत्पादन से विश्व के लगभग ८० करोड़ वाहन मालिकों और गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले २ अरब लोगों के बीच एक खतरनाक स्पर्धा भी प्रारंभ हो रही है। इस नव उपनिवेशवादी दौर में हम अपने वाहन दौड़ने के लिये निर्धनतम लोगों से दो जून रोटी तक छीन रहे हैं। यह कदम अंतत: हमारे समाज की संरचना को बिगाड़ देगा।
***पर्यावरण रक्षा, हमारा सामाजिक दायित्व
३ पर्यावरण दिवस पर विशेष
पर्यावरण रक्षा, हमारा सामाजिक दायित्व
डॉ. खुशालसिंह पुरोहित
आजकल विश्व भर में पर्यावरण और इसके संतुलन की बहुत चर्चा है। पर्यावरण क्या है, इसके संतुलन का क्या अर्थ है, यह संतुलन क्यों नहीं है, ये प्रश्न समय-समय पर उठते रहे हैं, लेकिन आज इन प्रश्नों का महत्व बढ़ गया है, क्योंकि वर्तमान में पर्यावरण विघटन की समस्याआें ने ऐसा विकराल रूप धारण कर लिया है कि पृथ्वी पर प्राणी मात्र के अस्तित्व को लेकर भय मिश्रित आशंकाएं पैदा होने लगी हैं।
पर्यावरण को लेकर मानव समाज की दुर्गति मानव के इस निरर्थक विश्वास के कारण हुई कि प्रकृति में हर वस्तु उसी के उपयोग के लिए हैं। प्रकृति की उदारता, उसकी प्रचुरता तथा उसकी दानशीलता को मनुष्य ने अपना अधिकार समझा और उसकी इसी संकीर्णता से प्रकृति के शोषण से उत्पन्न असंतुलन की स्थिति भयावह हो चुकी है।
प्रकृति के साथ अनेक वर्षोंा से की जा रही छेड़छाड़ से पर्यावरण को हो रहे नुकसान को देखने के लिए अब दूर जाने की जरूरत नहीं है। विश्व में बढ़ते बंजर इलाके, फैलते रेगिस्तान, कटते जंगल, लुप्त होते पेड़-पौधे और जीव जंतु, प्रदूषणों से दूषित पानी, कस्बों एवं शहरों पर गहराती गंदी हवा और हर वर्ष बढ़ते बाढ़ एवं सूखे के प्रकोप इस बात के साक्षी हैं कि हमने अपनी धरती और अपने पर्यावरण की ठीक- देखभाल नहीं की । अब इसके होने वाले संकटों का प्रभाव बिना किसी भेदभाव के समस्त विश्व, वनस्पति जगत और प्राणी मात्र पर समान रूप से पड़ रहा है।
आज पर्यावरण संतुलन के दो बिंदु सहज रूप से प्रकट होते हैं। पहला प्राकृतिक औदार्य का उचित लाभ उठाया जाए एवं दूसरा प्रकृति में मनुष्य जनित प्रदूषण को यथासंभव कम किया जाए। इसके लिए भौतिकवादी विकास के दृष्टिकोण में परिवर्तन करना होगा। करीब पौने तीन सौ साल पहले यूरोप में औद्योगिक क्रांति हुई इसके ठीक १०० वर्ष के अंदर ही पूरे विश्व की जनसंख्या दुगनी हो गई। जनसंख्या वृद्धि के साथ ही नई कृषि तकनीक एवं औद्योगिकरण के कारण लोगों के जीवन स्तर में बदलाव आया। मनुष्य के दैनिक जीवन की आवश्यकताएँ बढ़ गई, इनकी पूर्ति के लिए साधन जुटाएँ जाने लगे। विकास की गति तीव्र हो गई और इसका पैमाना हो गया अधिकाधिक प्राकृतिक संसाधनों का दोहन,इसने एक नई औद्योगिक संस्कृति को जन्म दिया।
आज पूरे विश्व में लोग अधिक सुखमय जीवन की परिकल्पना करते हैं। सुख की इसी असीम चाह का भार प्रकृति पर पड़ता है। विश्व में बढ़ती जनसंख्या, विकसित होने वाली नई तकनीकों तथा आर्थिक विकास ने प्रगति के शोषण को निरंतर बढ़ावा दिया हैं। पर्यावरण विघटन की समस्या आज समूचे विश्व के सामने प्रमुख चुनौती है, जिसका सामना सरकारों तथा जागरूक जनमत द्वारा किया जाना है।
हम देखते हैं कि हमारे जीवन के तीनों बुनियादी आधार हवा, पानी और मिट्टी आज खतरे में हैं। सभ्यता के विकास के शिखर पर बैठे मानव के जीवन में इन तीनों प्रकृति प्रदत्त उपहारों का संकट बढ़ता जा रहा है। बढ़ते वायु प्रदूषण के कारण न केवल महानगरों में ही बल्कि छोटे-छोटे कस्बों और गाँवों में भी शुद्ध प्राणवायु मिलना दुभर हो गया है, क्योंकि धरती के फैफड़े वन समाप्त होते जा रहे हैं। वृक्षों के अभाव में प्राणवायु की शुद्धता और गुणवत्ता दोनों ही घटती जा रही है। बड़े शहरों में तो वायु प्रदूषण इतना बढ़ गया है कि लोगों को सांस संबंधी बीमारियां आम बात हो गई है।
हमारे लिए हवा के बाद जरूरी है जल। इन दिनों जलसंकट बहुआयामी है, इसके साथ ही इसकी शुद्धता और उपलब्धता दोनों ही बुरी तरह प्रभावित हो रही हैं। एक सर्वेक्षण में कहा गया है कि हमारे देश में सतह के जल का ८० प्रतिशत भाग बुरी तरह से प्रदूषित है और भू-जल का स्तर निरंतर नीचे जा रहा है। शहरीकरण और औद्योगिकीकरण ने हमारी बारहमासी नदियों के जीवन में जहर घोल दिया है,हालत यह हो गई है कि मुक्तिदायिनी गंगा की मुक्ति के लिए अभियान चलाना पड़ रहा है। गंगा ही क्यों किसी भी नदी की हालत ठीक नहीं कही जा सकती है।
हमारी भारत माता का स्वास्थ्य भी उत्तम नहीं कहा जा सकता है। देश की कुल ३२ करोड़ ९० लाख हैक्टेयर भूमि में से १७ करोड़ ५० लाख हैक्टेयर जमीन बीमार है। हमारी पहली वन नीति में यह लक्ष्य रखा गया था कि देश का कुल एक तिहाई क्षैत्र वनाच्छादित रहेगा, कहा जाता है कि इन दिनों हमारे यहाँ ९ से १२ प्रतिशत वन आवरण शेष रह गया है। इसके साथ ही अतिशय चराई और निरंतर वन कटाई के कारण भूमि की ऊपरी परत की मिट्टी वर्षा के साथ बह-बह कर समुद्र में जा रही है। इसके कारण बांधों की उम्र कम हो रही है, नदियों में गाद जमने के कारण बाढ़ और सूखे का संकट बढ़ता जा रहा हैं। आज समूचे विश्व में हो रहे विकास ने प्रकृति के सम्मुख अस्तित्व की चुनौती खड़ी कर दी है।
आज दुनियाभर में अनेक स्तरों पर यह कोशिश हो रही है कि आम आदमी को इस चुनौती के विभिन्न पहलुआें से परिचित कराया जाए, ताकि उसके अस्तित्व को संकट में डालने वाले तथ्यों की उसे समय रहते जानकारी हो जाए और स्थिति को सुधारने के उपाय भी गंभीरता से किए जा सके। भारत के संदर्भ में यह सुखद बात है कि पर्यावरण के प्रति सामाजिक चेतना का संदेश हमारे धर्मग्रंथों और नीतिशतकों में प्राचीनकाल से रहा है। हमारे यहाँ जड़ में, चेतन में सभी के प्रति समानता और प्रकृति के प्रति सम्मान का भाव सामाजिक संस्कारों का आधार बिंदु रहा है। प्राकृतिक तथा मानवीय संसाधनों के युक्तियुक्त उपयोग द्वारा ही पर्यावरण की रक्षा की जा सकती है। इसमें लोक चेतना में मीडिया की भूमिका महत्वपूर्ण है।
दुनिया में बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में मीडिया में पर्यावरण के मुद्दो ने अपनी उपस्थिति दर्ज की थी। भारतीय परिदृश्य में देखें तो छठे-सातवें दशक में पर्यावरण से जुड़ी खबरे यदाकदा ही स्थान पाती थी। उत्तराखंड के चिपको आंदोलन और १९७२ के स्टाकहोम पर्यावरण सम्मेलन के बाद इन खबरों का प्रतिशत थोड़ा बढ़ा । देश के अनेक हिस्सों में पर्यावरण के सवालों को लेकर जन जागृतिपरक समाचारों का लगातार आना प्रारंभ हुआ। वर्ष १९८४ में शताब्दी की सबसे बड़ी औद्योगिक दुर्घटना भोपाल गैस त्रासदी के बाद तो समाचार पत्रों में पर्यावरणीय खबरों का प्रतिशत यकायक बढ़ गया।
सन् १९९२ के पृथ्वी सम्मेलन तक आते-आते अनेक फीचर ऐजेंसियां इस पर विशेष फीचर देने लगी। समाचार पत्रों में पर्यावरण विषयों पर लिखने वाले लेखक भी सामने आये, जो पर्यावरण के विविध आयामों पर साधिकार लिखने की क्षमता रखते है। आजकल हमारे यहाँ अंग्रेजी, हिन्दी या किसी भी भाषा का पत्र हो, लगभग सभी समाचार पत्रों में पर्यावरण समस्याआें पर विशेष सामग्री का प्रकाशन होता है। कुछ पत्रों ने तो पर्यावरण को लेकर स्थायी स्तंभ बना रखे है, कुछ पत्र पत्रिकायें पूर्ण रूप से पर्यावरण पर ही केन्द्रित है।
पर्यावरण संरक्षण के उपायों की जानकारी हर स्तर तथा हर उम्र के व्यक्ति के लिए आवश्यक है। पर्यावरण संरक्षण की चेतना की सार्थकता तभी हो सकती है, जब हम अपनी नदियां, पर्वत, पेड़, पशु-पक्षी, प्राणवायु और हमारी धरती को बचा सके। इसके लिए सामान्यजन को अपने आसपास हवा-पानी, वनस्पति जगत और प्रकृति उन्मुख जीवन के क्रिया-कलापों जैसे पर्यावरणीय मुद्दों से परिचित कराया जाए। युवा पीढ़ी में पर्यावरण की बेहतर समझ के लिए स्कूली शिक्षा में जरूरी परिवर्तन करना होंगे पर्यावरण मित्र माध्यम से सभी विषय पढ़ाने होंगे। जिससे प्रत्येक विद्यार्थी अपने परिवेश को बेहतर ढंग से समझ सके। विकास की नीतियों को लागू करते समय पर्यावरण पर होने वाले प्रभाव पर भी समुचित ध्यान देना होगा।
प्रकृति के प्रति प्रेम व आदर की भावना सादगीपूर्ण जीवन पद्धति और वानिकी के प्रति नई चेतना जागृत करना होगी। आज आवश्यकता इस बात की भी है कि मनुष्य के मूलभूत अधिकारों में जीवन के लिए एक स्वच्छ एवं सुरक्षित पर्यावरण को भी शामिल किया जाये। इसके लिए संयुक्त राष्ट्र संघ स्तर तक पहल करना होगी। इतना ही नहीं विश्व के सारे देशों में पर्यावरण एवं सरकारी विकास नीतियों में संतुलन आए, इसके लिए सघन एवं प्रेरणादायक लोक-जागरण अभियान भी शुरू करना होंगे।
आज हमें यह स्वीकारना होगा कि हरा-भरा पर्यावरण मानव जीवन की प्रतीकात्मक शक्ति है और समय के साथ-साथ हो रही इसकी कमी आ रही हमारी वास्तविक ऊर्जा में भी कमी आई है। वैज्ञानिकों का मत है कि पूरे विश्व में पर्यावरण रक्षा की सार्थक पहल ही पर्यावरण को संतुलित बनाए रखने की दिशा में रंग ला सकती है।
आज पर्यावरण का बदलता रूख विश्व को ऐसे पड़ाव पर ले आया है, जहाँ मानव जीवन ढलता नजर आता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि वैश्विक गर्मी (ग्लोबल वार्मिग), बढ़ता प्रदूषण और घटती वन-वृक्षों की संख्या हमें चेता रही है। अब हमें चेतना हो

