मंगलवार, 26 जून, 2007

इस अंक में

इस अंक में

पर्यावरण डाइजेस्ट के इस अंक में पर्यावरण से जुडे विभिन्न मुद्दों पर विशेष जानकारी दी गयी है। पहले लेख पानी और सरकारी नीतियां में जलयोद्धा राजेन्द्रसिंह लिख रहे हैं कि हमारे देश में आसमान से यदि पानी की चार हजार बूंदें गिरती है तो हम उनमें से महज ६ सौ बूंदों का ही इस्तेमाल करते हैं । दिल्ली की प्रसिद्ध विज्ञान लेखिका सुश्री रेशमा भारती के लेख भारत ग्लोबल वार्मिंग का सामना कैसे करे ? में वे लिख रही हैं कि यह तभी संभव है , जब भूमण्डलीकरण की ताकतों द्वारा प्राकृतिक साधनों की खुली लूट व उसके चलते गांववासियों को उनके जल-जमीन-जंगल से वंचित किये जाने का सिलसिला थमेगा । जयपुर (राज.) के पत्रकार अशोक माथुर के लेख इंदिरा गांधी नहर से क्या सबक लें ? में श्री माथुर लिख रहे हैं कि इंदिरा गांधी नहर में हुए भ्रष्टाचार, लापरवाही व किसान व खेती विरोधी नीतियों से सबक लेने का समय आ गया है । मुंबई के प्रसिद्ध सर्वोदयी कार्यकर्ता टी.आर.के. सोमैया ने अपने लेख कहां जाए औरत ? में कहा है कि दुनियाभर की औरतें प्रतिदिन ६ लाख ४० हजार करोड का ऐसा श्रम करती हैं जिसका उन्हें भुगतान नहीं किया जाता है । सुप्रसिद्ध वन्यजीव विशेषज्ञ डॉ. चन्द्रशीला गुप्त के लेख अब के बरस भी न आये सारस में साइबेरियन सारस के भारत आने की संख्या में हो रही लगातार कमी के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई है । खास खबर में इस बार हमारे विशेष संवाददाता की रिपोर्ट बाघों को लेकर मंत्रालय और संस्थान में ठनी पढेंगें । कविता में इस बार रतलाम के शिक्षाविद् शिवकुमार दीक्षित की कविता प्रार्थना के स्वर आपको रूचिकर लगेगी । पत्रिका स्थायी स्तंभ पर्यावरण परिक्रमा, ज्ञान विज्ञान एवं पर्यावरण समाचार में आप देश दुनिया में पर्यावरण और विज्ञान के क्षेत्र में चल रही हलचलों से अवगत होते है। पत्रिका के बारे में आपकी राय से अवगत करायें।-कुमार सिद्धार्थ

संपादकीय

बड़े बांधों से बढ़ता पर्यावरणीय असंतुलन
नवीनतम वैज्ञानिक अध्ययन बताते है कि भारत में बड़े बांध देश के ग्लोबल वार्मिंग कुल असर के पांचवे हिस्से के लिए जिम्मेदार हैं। ये आकलन यह भी उजागर करते हैं कि दूसरे देशों के मुकाबले भारत में बांध ग्लोबल वार्मिंग में सबसे ज्यादा योगदान करते हैं । ब्राजील के नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर रिसर्च (आईएनपीई) के इवान लीमा एवं उनके सहयोगियों द्वारा किये गये आकलन से यह जानकारी मिली है । इस अध्ययन के अनुसार भारत के बड़े बांधों से कुल मीथेन उत्सर्जन ३.३५ करोड़ टन प्रति वर्ष है, जिसमें जलाशयों से (११ लाख टन), स्पिलवे से (१.३२ करोड़ टन) एवं पनबिजली परियोजनाआें के टरबाईन से (१.९२ करोड़ टन) उत्सर्जन शामिल है । भारत के जलाशयों से कुल मीथेन का उत्पादन ४.५८ करोड़ टन है। अध्ययन का यह भी आकलन है कि विश्व के समस्त जलाशयों से मीथेन का उत्सर्जन १२ करोड़ टन प्रति वर्ष तक हो सकता है । इसका मतलब हुआ कि समस्त मानवीय गतिविधियों से मीथेन के कुल वैश्विक उत्सर्जन में अकेले बड़े बांधों का योगदान २४ प्रतिशत है । इस अध्ययन में बड़े बांधों से उत्सर्जित होने वाले नाइट्रस आक्साइड एवं कार्बन डाई ऑक्साइड शामिल नहीं है । यदि इन सबको शामिल किया जाता है तो बड़े जलाशयों से होने वाले ग्लोबल वार्मिंग का असर और भी ज्यादा हो जाएगा । भारत के बांधों से मीथेन का उत्सर्जन पूरे विश्व के बड़े बांधों के मीथेन उत्सर्जन का करीब २७.८६ प्रतिशत अनुमानित है , जो कि विश्व के किसी भी देश के हिस्से से ज्यादा है । ब्राजील के जलाशय मीथेन उत्सर्जन के मामले में दूसरे नंबर पर आते हैं, जो २.१८ करोड़ टन प्रतिवर्ष मीथेन उत्सर्जन करते हैं एवं वह पूरे विश्व के मीथेन उत्सर्जन का १८.१३ प्रतिशत है । अध्ययन से इस विश्वास से भी लोगों की आंखें खुलेगी कि बड़ी पनबिजली परियोजनाआें से पैदा होने वाली बिजली स्वच्छ होती है । भारत की पनबिजली परियोजनाएं पहले से ही समुदायों एवं पर्यावरण पर गंभीर सामाजिक एवं पर्यावरणीय असर के कारण जानी जाती हैं । इस वास्तविकता के बाद कि ये परियोजनाएं बड़ी मात्रा में ग्लोबल वार्मिंग गैस का उत्सर्जन भी करती हैं , परियोजनाआें का इस दृष्टि से भी अध्ययन होगा ।

प्रसंगवश

भारत अखबारों का दूसरा बड़ा बाजार
न्यूज चैनलों और मोबाईल पर खबरों की भरमार के बावजूद भारत में अखबारों की प्रसार संख्या २००६ में करीब १३ फीसदी बढ़ी है । खासकर जब पूरी दुनिया में अखबारों की प्रसार संख्या २.३ फीसदी बढ़ी । इसमें भी चीन और भारत का बड़ा योगदान है। अखबारों के बाजार में चीन के बाद भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा बाजार बन गया है ।
यह रोचक तथ्य वर्ल्ड ऐसासिएशन ऑफ न्यूजपेपर्स (वान) के एक अध्ययन में उभरकर आया है । अखबारों की प्रसार संख्या एशिया , यूरोप , अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका में बढ़ी है । केवल उत्तरी अमेरिका में अखबारों की प्रसार संख्या घटी है ।खरीदे जाने वाले अखबारों में विज्ञापन से आय भी पिछले साल ३.७७ फीसदी बढ़ी ह्ै । चीन , जापान और भारत को जोड़ दिया जाए तो दुनिया के सौ सबसे ज्यादा बिकने वाले अखबारों में ६० इन तीनों देशों में हैं । पांच बड़े बाजारों में चीन, भारत,जापान, अमेरिका, जर्मनी है । अखबार खरीदने के मामले में जापानी अब भी दुनिया में सबसे आगे है।
* २९ मई १८२६ को कलकत्ता से
पं. युगल किशोर शुक्ल के सम्पादन में
साप्तहिक उदंत मार्तण्ड
का प्रकाशन हुआ था ।
इसलिए २९ मई के दिन को
देश में हिन्दी पत्रकारिता दिवस के रूप में
मनाया जाता है ।
मुफ्त में बंटने वाले अखबारों को खरीदे जाने वाले अखबारों की संख्या में जोड़ दिया जाए तो अंतराष्ट्रीय प्रसार संख्या में ४.६१ फीसदी का इजाफा हुआ है । मुफ्त बंटने वाले दैनिकों की प्रसार संख्या दुनियाभर में केवल ८ फीसदी है। वान की रिपोर्ट के बारे में सीईओ तिमोेती बाल्डिंग का कहना है कि नतीजे उम्मीद से बेहतर आए हैं बल्कि इंटरनेट के विस्तार का ज्यादा फर्क नहीं पड़ता है । ज्यादातर पाठक आज भी सबसे पहले अखबार पढ़ना पसंद करते हैं । बाल्डिंग का कहना है कि डिजिटल वितरण की सुविधा का लाभ अखबार बखूबी ले रहे हैं ।

१ सामयिक

१ सामयिक
पानी और सरकारी नीतियां
राजेन्द्र सिंह
पानी का सवाल अधिकार और जवाबदेही (राइट एंड रिस्पांसिबिलिटी) का है । सरकार ने पानी पर अधिकार तो बहुराष्ट्रीय कंपनियों को सौंप दिया है और जिम्मेदारी आम जनता पर थोपना चाहती है। इस वजह से जनता ने पानी को अपना मानना छोड दिया है, इसलिए वे इसे छीनने या चुराने की कोशिश तो करते हैं लेकिन बचाने या संग्रहण करने की प्रवृत्ति छोडते जा रहे हैं ।
ऐसे में जरूरी है कि सरकार अधिकार और जिम्मेदारी दोनों जनता को हस्तांतरित करें और साथ-साथ कुछ संसाधन भी उसे दे ताकि वह पानी को बचाने और संग्रहण का काम कर सके । इस तरह से समुदायों द्वारा संचालित होने वाली एक विकेंद्रित जल व्यवस्था प्रणाली विकसित होगी । यह विकेंद्रीकरण ग्रामीण इलाकों के लिए अलग और शहरी इलाकों के लिए अलग किस्म का ह्ोगा ।
भारत में दरअसल जल की दो तरह की समस्या है । एक अधिकता की है और दूसरी कमी की। दोनों से निपटने के लिए एक जैसी लेकिन समग्र नीति बनाना होगी, यह काम न तो अकेले राज्य कर सकता है और न समाज । दोनों एक साथ मिलकर काम करें तो इसका समाधान आसानी से निकाला जा सकता है । इसके लिए पहली जरूरत समाज को पानी के काम की जिम्मेदारी सौंपने की है । जहां पानी दौडता है, समाज उसे वहां चलना सिखाएगा, जहां पानी चलता है, वहां उसे रेंगना सिखाएगा और जहां पानी रेंगता है या रेंगने लगेगा, वहां उसे पकडकर धरती के पेट में पहुंचाना होगा । जहां आसमान से पानी गिरेगा, उसे वहीं पकडकर धरती के पेट में पहुंचा दिया जाएगा । धरती का पेट भरा रहेगा तो किसी को पानी की कभी किल्लत नहीं होगी । जब भी पानी की जरूरत होगी, गरीब आदमी भी छोटी-सी कुइंर्या खोदकर अपनी जरूरत का पानी निकाल लेगा ।
यह काम जनोन्मुखी विकेंद्रित जल प्रबंधन के जरिये हो सकता है पर शुरूआत सरकार को करना होगी । उसे पानी का प्रबंधन छोड चुकी जनता को यह काम सौंपना होगा । भारत में हर साल चार हजार बीसीएम पानी गिरता है, जिसमें से हम औसतन छह सौ बीसीएम पानी का इस्तेमाल कर पाते हैं, बाकी बर्बाद हो जाता है । इसे प्रतीक रूप में ऐसे कहंें कि आसमान से चार हजार बूंदे गिरती हैं, जिनमें से हम महज छह सौ बूंदों का इस्तेमाल करते हैं । इसका मतलब है कि अपने देश में पानी की कमी नहीं है । हमारी जरूरत से काफी ज्यादा पानी प्रकृत्ति हमें देती है । हम छह सौ बीसीएम इस्तेमाल करते हैं और इसका करीब छह गुना बर्बाद कर देते हैं । अगर उसका कुछ और हिस्सा उपयोग करने लगें तो भारत की जन जरूरतें पूरी करने के लायक पर्याप्त् पानी हमारे पास उपलब्ध होगा ।
इसकी शुरूआत सरकारी नीतियों में बदलाव से करना होगी । भारत सरकार ने २००२ में राष्ट्रीय जल नीति बनाई थी । इस जल नीति की धारा १३ के अनुसार पानी का अधिकार या तो निजी कंपनियों के हाथ में दिया गया है या निजी व्यक्तियों के हाथ में । साझा तौर पर पानी का जिम्मा किसी को नहीं दिया गया है । इस वजह से लोगों ने पानी के कामसे अपनी जिम्मेदारी समाप्त् समझ ली और पानी चुराने या छीनने के काम में लग गए । इस नीति में बदलाव करके लोगों को यह संदेश दिया जाना चाहिए कि पानी प्रकृत्ति प्रदत्त संसाधन है, जो सभी प्राणियों के प्राणों का आधार है । यह नई जल नीति की प्रस्तावना होना चाहिए, तभी आम लोग पानी को अपना मानकर उसके काम में जुटेंगे, पानी सहेजेंगे, संभालकर खर्च करेेंगे, संग्रहण के तरीके निकालेगे ।
एक नीतिगत गडबडी पानी के बंटवारे में भी है । दिल्ली जैसे शहर में बडे और अमीर लोगों को तो पानी चार रूपए में एक हजार लीटर मिलता है लेकिन गरीब आदमी जो टैंकर से पानी खरीदता है, उसे एक बाल्टी पानी २० रुपए में मिलती है । यह नीति का विरोधाभास है, जिससे सामाजिक भेदभाव भी बढता है। इससे पानी के झगडे-विवाद की जमीन तैयार होती है । इसे ठीक करना चाहिए । वाटर हार्वेस्टिंग का काम करने वाले लोगों को आर्थिक मदद दी जाए, उन्हें पैसे से प्रोत्साहन दिया जाए तो वे ज्यादा समर्पण से काम करेंगे । इसी तरह पानी लूटने या बर्बाद करने वालों को सख्त दंड देने की व्यवस्था भी की जाना चाहिए ।
सरकार विकेंद्रित जल नीति को मान्यता दे दे तो उससे भी काफी फायदा होगा । हर नदी के जल संग्रहण क्षेत्र में सरकारी कर्मचारियों और जल प्रबंधन से जुडे लोगों के लिए अनिवार्य किया जाना चाहिए कि वे समुदायों के साथ मिलकर पानी का काम करें । पानी के काम से जुडे सरकारी लोग जब इसे नैतिक व कानूनी जिम्मेदारी समझने लगेंगे तब वे अपने इलाके को पानीदार बनाने का प्रयास करेंगे ।
सरकारी नीतियों की अन्य खामियों की ओर भी मैं ध्यान दिलाना चाहूंगा । जब रूफटॉप हार्वेस्टिंग की नीति बनी उस समय पाइप बनाने वाली कंपनियों ने किसी तरह से इसमें प्लास्टिक के पाइप के इस्तेमाल को मंजूर करवा लिया, जिससे वाटर हार्वेस्टिंग की इस नीति को लागू करने में मुश्किल आयी । इसी तरह से राजस्थान में हम लोगों ने अपने प्रयास से पिछले २३ साल में एक नदी को पुनर्जीवित किया था । जब नदी पुनर्जीवित हो गई तो राज्य सरकार ने उस नदी के किनारे शराब की २३ फैक्टरियों के लाइसेंस दे दिए । इम लोगों ने विरोध किया कि पानी की अधिक खपत वाला कोई उद्योग-व्यवसाय नदी किनारे नहीं लगना चाहिए तो २००२ में सरकार ने इनके लाइसेंस रद्द कर दिए ।
अब नई सरकार ने फिर ये लाइसेंस जारी कर दिए हैं । इसका मतलब है कि सरकार खुद तो कोई काम नहीं कर रही है, ऊपर से लोगों द्वारा किए गए काम को भी बिगाडने में लगी है, इसलिए मुझे लगता है कि नीतियों को मानवीय स्वरूप दिया जाए और प्रकृत्ति व इंसान के अनुकूल नीतियां बनाई जाएं । जरूरत इस बात की भी है कि पानी के इस्तेमाल को लेकर भी स्पष्ट कानून बनाया जाना चाहिए । जहां कम पानी है वहां अधिक पानी की जरूरत वाली फसलें लगाने पर रोक लगाई जाए। कम पानी वाले इलाके में पानी के अधिक इस्तेमाल वाले उद्योगों पर भी रोक लगे। जहां पानी की नई व्यवस्था बन रही हो, वहां भी इस तरह की फसलों और उद्योगों पर रोक लगाना चाहिए । इस तरह के हम इन इलाकों के सीमित पानी का अधिकतम इस्तेमाल कर पाएंगे ।
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२ विशेष लेख

२ विशेष लेख

गर्म हवायें और बदलती जलवायु
डॉ. लक्ष्मीकांत दाधीच
जलवायु प्रणाली एक जटिल विषय है । इसका नियंत्रण मात्र वायुमंडल में होने वाली घटनाआें से नहंी होता । महासागरों , हिममंडल, भूमंडल और जीवमंडल में होने वाली हलचल भी इसे नियंत्रित करती है ।सौरमंडल में सौर विकिरण से होेने वाली गरमाहट की मात्रा भी अंशत: धरती के स्वरूप पर निर्भर करती है । सागर व भूमि तल अलग- अलग गति से गरमाते हैं और हरी भरी धरती का सौर ऊर्जा को अवशोषित व परावर्तित करने का ढंग भी रेगिस्तानी या बर्फीली भूमि से अलग होता है । इस प्रकार सतहों की विविधता , सतहों पर ऊर्जा वितरण की एक जटिल बानगी प्रस्तुत करती है ।
विज्ञान ने आज यह स्पष्ट कर दिया है कि गहरे सागर तल पर बहने वाली धराएं दूरगामी जलवायु परिवर्तनों को लाती है । अधिकांश महासागरों पर सतह का पानी गर्म रहता है और इसीलिए अपने नीचे वाले पानी से हल्का होता है । इससे सतह का पानी गहरे सागर तल की ओर बढने को प्रवृत्त नहंी होता है परंतु उत्तर पश्चिम अटलांटिक सागर मे वाष्पीकरण और सर्दियो की ठंडक के मिश्रित दबाव मे सतह का पानी नीचे बैठने के लिए समुचित सघनता प्राप्त् कर लेता है । इसी मूल प्रक्रिया के कारण् उष्मा और सतह के पानी में घुला कार्बन सागर की गइराईयों में हजारों वर्षोंा तक पडा रहकर सागरीय धाराआें के परिवर्तन का कारण बना है । अतिरिक्त कार्बन का यह भंडारण या इसकी विमुक्ति मानव जनित जलवायु परिवर्तन को स्पष्ट करती है। जलवायु परिवर्तन के अंतर शासकीय पैनल (आईपीसीसी) के अनुसार, पूर्वानुमान क्षमता बढाने के लिए हमें जलवायु संबंधी प्रक्रियाआें के अंतर्गत बादलों, महासागरों व कार्बन चक्र से जुडे वैज्ञानिक विष्लेषणों पर अंतर्राष्ट्रीय विनिमय को सुविधाजनक बनाना ही होगा ।
आज धरती के गरमाने को समस्या न मानकर इसे जलवायु परिवर्तन का लक्षण माना जाता है । यह हमारे ध्यान दिए जाने वाला एक महत्वपूर्ण बिन्दु है जिसे लक्षण के रूप में बीमारी समझलेना एक भारी भूल साबित हो सकती है । मूल समस्या यह है कि मानवीय क्रिया कलाप वायुमंडल की ऊर्जा को सोखने व उत्सर्जित करने के तरीके को बदल रहा है । इस परिवर्तन के कुछ संभावित परिणाम जैसे समुद्रतल का ऊपर उठना इस बात पर सीधे तौर पर निर्भर करेगा कि इससे प्रति सतह का तापमान क्या क्रिया करता है । लेकिन सर्वाधिक महत्वपूर्ण प्रभावों में से अनेक, जैसे वर्षण और मिट्टी की नमी की मात्रा में बदलाव, किसी पता लग सकने वाली तापमान वृद्धि से काफी पहले ही आ धमेंकगें ।
आज की प्रावस्था में यदि कोई वैज्ञानिक यह तर्क प्रस्तुत करता है कि तापमान वृद्धि , मॉडलों के पूर्वानुमानों जितनी बडी या तेज नहीं होगी तो उसका यह तात्पर्य कदापि नहीं हो सकता कि समस्या की अनदेखी की जाये । सवाल सिर्फ यह है कि यह विशेष लक्षण यानि धरती का औसत तापमान अविश्वसनीय हो सकते हैं । हम जानते हैं कि वायु के विकरणी गुण बदल रहे हैं । साथ ही हमें यह भी पता है कि इस बदलाव के जलवायवी प्रभावी काफी गंभीर होंगें । सभी जलवायु मॉडलों के अनुसार सबसे महत्वपूर्ण बदलाव होगा धरती का गरमाना, किन्तु अगर यह बात नहंी भी है तो दूसरे इतने ही गंभीर बदलाव अवश्यंभावी है । हम जलवायु प्रणाली के जलवायु के ऊर्जा स्त्रोत में हेरफेर कर रहे हैं । इस प्रघात को आत्मसात करने के लिए कुछ को तो बदलना ही होगा ।
मानव जनित जलवायु परिवर्तन निश्चित ही मानव की कृषि को प्रभावित कर मानव जीवन को संकट में डाल सकता है । वर्षण घट सकता है, मिट्टी में नमी की मात्रा कम हो सकती है तथा अतिरिक्त गर्मी के जोर से उष्ण कटिबंधी क्षेत्रों की फसलें और विशेषकर पशुधन को नुकसान हो सकता है । कुछ तटीय क्षेत्रों में भूजल और ज्यादा खारा हो सकता है । बाढ, तूफान और उष्ण कटिबंधी चक्रवातों से होने वाली हानि की मात्रा बढ सकती है तथ बदलते तरंग पेटर्न कुछ क्षेत्रों में और ज्यादा महातरंगे तथा ज्वारीय तरंगे पैदा कर सकते हैं ।
जलवायु परिवर्तन के पूर्वानुमानित प्रभावों से विश्व में भूख और गरीबी के पनपने का अनुमान है । नए और अस्थिर जलवायुक्रमोंका आथ्र्ािक स्थिति पर भारी दुष्प्रभाव हो सकता है, विशेषतौर से प्राकृतिक संसाधनों के क्षेत्र में । जो लोग कृषि, मछलीपालन या वानिकी पर निर्भर हैं उनकी आजीविका कम वर्षा, विकृत मिट्टी और क्षीण हुए जंगलों व मछली क्षेत्रों के कारण खतरे में पड सकती है । यदि तापमान बढता है और ओजोन की घटती परत पराबैंगनी किरणों को अधिक मात्रा में प्रवेश होने देती है तो विषाक्त जीवाणु पनपने लगेंगें और शरीर की रोगनिरोधक क्षमता घटने लगेगी । स्वास्थ्य के बढते खतरे कुपोषित बच्चें, बीमार बूढों और बेघरों को अपना निशाना बनायेंगें ।
यह भी कहा जाता है कि जलवायु परिवर्तन से विकासशील देशों पर सर्वाधिक प्रभाव पडने से संघर्ष और बढेगा। इन कुप्रभावों से महत्वपूर्ण स्त्रोत जैसे भोजन और पानी के सापेक्ष वितरण में बदलाव आ सकता है । जिन क्षेत्रों में जनसंख्या वृद्धिके कारण इन स्त्रोतों की पहले ही तंगी है , जलवायु परिवर्तन के कारण भूखमरी फैलने और विस्थापितों की समस्या पैदा होने का खतरा है । सामर्थ्यवान देशों की तरह गरीब देशों के पास कम प्रभावित देशों से इन स्त्रोतों को खरीदने की सामर्थ्य नहीं होगी , और न ही वे खाद़्य पदार्थोंा व अन्य आवश्यक स्त्रोतों में फिर से आत्मनिर्भरता पैदा कर पायेंगें । यदि जलवायु परिवर्तन के परिणाम भयंकर हुए तो समर्थ देश, कमजोर देशों के मुकाबले अपने स्त्रोतों व सीमाआें की बेहतर सुरक्षा कर सकेंगें । यदि हमारे प्रयासों के बावजूद भी जलवायु परिवर्तन के प्रभाव महसूस होते हैं तो हमें पर्यावरण को हुई क्षति के परिणाम भुगतने ही पडेंगें । विश्व जलवायु परिवर्तन का आर्थिक पहलू मुख्यतया गरमाती धरती के साथ मानव द्वारा किये जाने वाले त्याग के बीच संतुलन में निहित होगा ।
आगामी कुछ दशक निर्णायक ह्ै जब प्रत्येक व्यक्ति को यह सोचना पडेगा कि पर्यावरण संरक्षण प्रकृति संरक्षण का प्रश्न अंतर्राष्ट्रीय मंच का प्रश्न है और इसका एक ही उत्तर है भावी पीढी के हितों पर कुठाराघात किए बिना पर्यावरण के सभी घटकों का ईमानदारी से संरक्षण जिसमें नियोजित दोहन तो हो पर शोषण नहीं । अत: जलवायु परिवर्तन के क्रम को बदलने के लिए तत्काल कदम उठाना आज समय की आवश्यकता है ।
आज सारी दुनिया में राजनेताआें, समाजसेवियों, वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों के बीच मुख्य चर्चा है कि जलवायु परिवर्तन जैसे महत्वपूर्ण पर्यावरणीय संकट का विकल्प कैसे खोजा जाए ।
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३ प्रवासी पक्षी

३ प्रवासी पक्षी
अब के बरस भी न आए सारस
डॉ. चन्द्रशीला गुप्त
प्रावासी पक्षियों का ज़िक्र आते ही भरतपुर, राजस्थान के केवलादेव अभयारण्य के सुहावने साइबेरियाई सारस याद आते हैं लेकिन अब कुछ सुहावना नहीं हैं ।
भारत ही नहीं वरन् दुनिया भर के पक्षी प्रेमी यह सुनकर मायूस होंगे । सर्दियों में भ्रतपुर के इस अभयारण्य में इन विदेशी मेहमानों का बसेरा शायद अब हमेशा के लिए खत्म हो गया है । दरअसल गत ५-६ वर्षो से ये सारस केवलादेव नहीं आ हैंं । अत: अब इनके आने की उम्मीद करना व्यर्थ है । वर्ल्ड वाइड फाउण्डेशन फॉर नेचर का भी यही कहना है कि इस पक्षी ने भारत से मुंह मोड लिया है ।
सन् १९८१ में इस अभयारण्य को राष्ट्रीय उद्यान घोषित कर इसे केवलादेव उद्यान नाम दिया गया था । वैसे इसे घाना पक्षी विहार भी कहते हैं । कुल २८.७३ वर्ग कि.मी. में फैले इस उद्यान में एक समय देशी पक्षियों की ३६६ प्रजातियां पाई जाती थीं जिन्हें निहारने हर साल लगभग एक लाख से ज़्यादा पर्यटक आते थे ।
शिकारगाह :- राजाआें के ज़माने में भरतपुर एक बेहतरीन शिकारगाह हुआ करता था । महाराजा वायसराय जैसी बडी-बडी हस्तियों को पक्षियों के शिकार के लिये आमंत्रित करते थे ।
आज यह अभयारण्य मनुष्यों से सुरक्षित है, कोई भी यहां वन्य जीवों के सिर्फ दर्शन कर सकता है । इनमें चीतल, नीलगाय, उदबिलाव और सारस, बतख, लकदक व मानस राजहंस की ३ प्रजातियां समेत प्रवासी विदेशी पक्षियों की करीबन १०२ प्रजातियां शामिल हैं ।
साइबेरियन सारस एशिया का सबसे प्रसिद्ध व दुर्लभ पक्षी है । काले किनारे वाले धवल पंख और लाल गर्दन निसंदेह इसे समस्त भारतीय सारसों में खूबसूरत बना देते हैं । यह खुशमिज़ाज पक्षी जब प्रसन्न होता है तो अपने पंख फैलाकर गर्दन ऊपर कर सीना आगे करते हुए नृत्य करता है । आसमान की ओर चोंच उठाए यह ज़ोर-ज़ोर से आवाज लगाता है - टर्र-टर्र । यह प्रात: अभिवादन है । जब भी पास की झील से कोई मित्र उनके पास आता है, वे खुशी से लम्बी किलकारी भरते व नाचते हैं। लडते वक्त उनकी आवाज़ अलग होती है ।
ये सारस क्रिसमस से पहले भरतपुर आते हैं और जब किसान फागुन में फाग गा रहे होते हैं तब ये भारत भर में अपनी एकमात्र पसंदीदा जगह से वापस चले जाते हैं । उनका यह मौसमी आना-जाना हज़ारों साल से चल रहा है ।
इतिहास - भारतीय संग्रहालय कोलकाता में रखी सत्रहवीं शताब्दी की एक पेंटिग में साइबेरियन सारस को दर्शाया गया है । यह पेंटिंग मुगल-शासक जहांगीर के दरबारी कलाकार उस्ताद मंसूर की है । भारतीय साहित्य में इसे सफेद सारस कहा गया है । जर्मन प्रकृतिविद् पीटर पलास ने अठारवीं सदी में इसका वैज्ञानिक विवरण प्रस्तुत कर वैज्ञानिक नाम ग्रूस ल्यूकोजिरेनस दिया ।
प्रख्यात राजनीतिज्ञ ओ, ह्यूम, जिन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना की थी, के लेखन में भी इस सारस का जिक्र आता है । दरअसल वे प्रकृतिविद भी थे । उ.प्र. के इटावा में ज़िला मजिस्ट्रेट के पद पर पदस्थ थे तब सर्दियों में आने वाले इस मेहमान को उन्होंने देखा था ।
इस लम्बे, छरहरे सारस की संख्या कभी ज़्यादा नहीं रही, ओ. ह्यूम के समय भी नहीं । उन्होंने १८६७ में आइबिस नामक एक ब्रिटिश जनरल में इसका विस्तृत विवरण दिया था । ह्यूम के अनुसार यह अन्य भारतीय सारसों से भिन्न है । यह प्राकृतिक जलीय वनस्पति खाता है, खेतों या मैदानों में चरने नहीं जाता है। इसका मुख्य भोजन नदी या तालाब किनारे की जमीन में पैदा होने वाले सायपैरस नामक पौधे का कन्द होता है जिसका छिलका कडा होता है । यह पौष्टिक कन्द है, इसे जंगली सूअर से लेकर अन्य जंगली जानवर भी खाते हैं ।
भरतपुर की झीलों में ये कन्द मिट्टी में दबे रहते हैं व सारस ज़्यादातर समय इनको निकालने में गुजारते हैं । ये जब कन्द खोदते है तब इनके सिर, गर्दन व पैर पूरी तरह डूबे होते हैं । झील में मात्र इनकी सफेद पीठ ही पानी में तैरती नज़र आती है। यह दृश्य बेहद मनोहारी होता है ।
यहां आने वाले साइबेरियाई सारस सहित सभी विदेशी मेहमान शुद्ध शाकाहारी होते हैं जबकि देशी पक्षी मांसाहारी होते हैं। जलीय वनस्पतियां, मछलियां, कीट, मोलस्क, प्लवक का भोजन और साथ में झील के चारों ओर फैली झाडियां पक्षियों के बसने के लिए इस उद्यान को आदर्श बनाते हैं ।
सारस ज़्यादातर ५-६ के झुण्ड में रहते हैं, कुछ जोडे में रहते हैं । हरेक जोडा अपने इलाके निर्धारित कर लेता है व किसी भी घुसपैठिए को रोकने के लिये ये एक स्वर में चिल्लाकर चेतावनी देते हैं । नर पहले शुरू करता है व अपना सिर व गर्दन तेज़ी से झटके से साथ आगे पीछे ले जाता है । जैसे सफेद लिली अचानक खिलती है, उसी तरह यह अपने पंख फैला देता है । इसी बीच मादा भी साथ हो लेती है । दोनों अपना सिर हिलाकर ऊंचे व नीचे स्वर में आवाज़ देते हैं । भरतपुर में पौ फटने के समय ये आवाज़ें सुनी जा सकती है ।
सारस की अपने साथी के प्रति वफादारी अदभुत है । साथी के बिछुड जाने पर ये आजीवन अकेले रहते हैं।अनेक जोडी के साथ एक तीसरा प्राणी-उनका ४-६ माह का शावक - भी हो सकता है, जिसका जिसका जन्म टूण्ड्रा में हुआ था, जहां उसके लिए काई-लाइकेन आदि पर्याप्त् भोजन था । वहीं इसे पंख का पहला जोडा मिलता है जो इसे अपने माता-पिता के साथ उडाकर यहां लाया है ।शावक भोजन के लिए अपने माता-पिता पर निर्भर करते हैं।
मेहमानों ने मोडा मुंह - साइबेरियन सारसों के संरक्षण के लिए स्थापित मास्को स्थित अंर्तराष्ट्रीय संस्था साइबेरियन क्रेन फ्लाइवे कोआर्डिनेशन की रिपोर्ट के अनुसार, घाना में १९६० की सर्दियों में ६० सारस देखे गए थे । प्रसिद्ध विशेषज्ञ वाल्किनशा ने अनुसार १९६४-६५ में इनकी संख्या २०० थी और १९६८ में १०० । उद्यान के उपमुख्य वन्य जीव प्रतिपालक के अनुसार १९९१ में २३ सारस अपने शीतकालीन प्रयास पर यहां आए थे । सन २००२ की सर्दियों में केवल एक साइबेरियन सारस का जोडा यहां आया था और उसके बाद से ही इस पक्षी ने केवलादेव की ओर रूख नहीं किया है ।
साइबेरियन सारस के संरक्षण विशेषज्ञों का कहना है कि घना में निरंतर हो रही पानी की कमी इन सारसों की यहां से विदाई की प्रमुख वजह है । इस अभयारण्य का एक बडा क्षेत्र कभी एक विशाल झील के रूप में था जिसे सडकों, पुलों, बांधो आदि द्वारा अनेक छोटी-बडी उथली झीलों में बांट दिया गया है जिनमें पानी का आवागमन चेकगेट द्वारा नियंत्रित किया जाता है । राजस्थान के कारोली ज़िले में स्थित पांचना बांध का पानी अजान बांध के ज़रिए घाना को दिया जाता रहा है । लेकिन पिछले कुछ वर्षो से राजनैतिक कारणों से पांचना बांध से घाना को पानी मिलना बंद हो गया है ।
पानी की कमी से मात्र साइबेरियाई सारस ने ही मुंह नहीं मोडा है बल्कि पूरा पक्षी विहार बर्बादी की कगार पर पहुंच गया है । इन सारसों के यहां न पहुंचने की एक वजह इनका शिकार भी है । अंतर्राष्ट्रीय क्रेन फाउण्डेशन सहित कई संस्थाआें का मानना है कि साइबेरियाई सारस अपनी जन्मभूमि साइबेरिया और शीतकालीन आवास घाना में तो सुरक्षित रहते हैं लेकिन रास्ते में इनके निरंतर शिकार ने इन्हें विलुिप्त् की कगार पर ला खडा किया है ।
इनके शीतकालीन प्रवास के ३ रास्ते हैं, पश्चिमी, मध्य और उत्तरी । सारसों की एक प्रजाति पश्चिमी मार्ग से सर्दियां बिताने ईरान जाती है जबकि मध्य मार्ग से दूसरी प्रजाति भारत आती हैं । उत्तर पूर्व साइबेरिया की प्रजाति उत्तरी मार्ग से चीन की प्योंग झील के किनारे सर्दियां बिताती हैं । भारतीय मेहमान रूस, कज़ाकिस्तान, उजबेकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान में सुरक्षित नहीं हैं और यहां इनका जमकर शिकार हुआ है। सन १९९८ में एक साईबेरियाई सारस के जोडे व उसके बच्च्े पर ट्रांसमीटर बांधकर परीक्षण करने से भी इस बात की पुष्टि हुई हैं।
अंर्तराष्ट्रीय क्रेन फाउण्डेशन का मानना है कि मध्य मार्ग से आने वाली प्रजाति का पूरी तरह विनाश हो चुका है, हमारे देश में सारसों का आना बंद होने के पीछे यही वजह मानी जा रही है । उत्तर पूर्वी साइबेरियाई सारस शिकारियों से अभी बचे हुए हैं, लिहाजा चीन के प्योंगे झील के किनारे आज भी इन्हें सर्दियां बिताते देखा जा सकता है ।
ऐसा नहीं है कि साइबेरियाई सारस को बचाने के प्रयास नहीं हुए हैं । तीस वर्ष पूर्व स्थापित इन्टरनेशनल क्रेन फाउण्डेशन से लेकर अब तक कई संस्थाए इस काम में लगी हैं । वहीं संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रयासों से ९० के दशक के आरंभ में ११ देशों ने इस पक्षी को बचाने के लिए एक सहमति पत्र पर हस्ताक्षर किए थे ।
रूसी प्राणी वैज्ञानिकों ने चीन से अण्डे इकट्ठे कर इन्टरनेशनल क्रेन फाउण्डेशन को भेजे थे व इनसे चूज़े निकालने में भी सफलता हासिल की । चीन व रूस में इनके आवास की सुरक्षा, जनन क्षेत्र की पहचान, प्रवास के रास्तों की पहचान व शिकार पर पूर्ण प्रतिबंध व इसके प्रति जागरूकता आदि की अनेक योजनाएं बनाई गई हैं। इसी प्रकार भारत में भी अण्डे प्राप्त् कर चूज़े पालने की योजना बनाई जाए तो चूज़ों को लद्दाख की दलदली झील में स्थापित किया जा सकता है। यहां एक अन्य दुर्लभ सारस चा-थुंग सदियों से प्रजनन कर रहा है; साईबेरियन सारस के लिए भी यह उपयुक्त आवास होगा ।
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४ वातावरण

४ वातावरण
भारत ग्लोबल वॉर्मिंग का सामना कैसे करे ?
सुश्री रेशमा भारती
हाल के समय में हुए कई वैज्ञानिक अध्ययन-अनुसंधानों और विश्व के कई भागों में प्रकट जलवायु परिवर्तन की विकट स्थितियों ने ग्लोबल वॉर्मिंग के संकट की गंभीरता को प्रकट किया है और इसका सामना करने के लिए बिना विलंब के ठोस व अहम कदम उठाने की जरूरत पर बल दिया है ।
विश्व भर में इस संकट का सामना करने के लिए ग्रीन हाऊस गैसोंके बढते उत्सर्जन को कम करने की बुनियादी जरूरत को महसूस किया जा रहा है । औद्योगीकरण, मशीनीकरण वाली दुनिया में इसे एक गंभीर चुनौती माना गया है ।
तेजी से विकसित होती भारत की अर्थव्यवस्था भी काफी ग्रीन हाऊस गैसों के उत्सर्जन की स्थिति पैदा कर रही है । कार्बन डायॉक्साइड के उत्सर्जन में भारत विश्व के चार-पाँच प्रमुख देशों में से एक है ।
इंटरगर्वंमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आई.पी.सी.सी ) के अध्यक्ष डॉ. आर.के. पचौरी का मानना है कि जलवायु परिवर्तन का सामना करने के संदर्भ में भारत को एशिया में प्रमुख सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए ।
सवाल उठता है कि ग्लोबल वॉर्मिंग का सामना करने के लिए भारत कौन-सा मार्ग अपनाएगा ? क्या वह आकर्षक दिखने वाले उस गैर टिकाऊ व विसंगतिपूर्ण विकास को अंधाधुंध अपनाएगा जिस पर चलकर स्वयं कई विकसित देश आज थके हुए व हताश मालूम होते हैं? तब तो शायद वह भी स्वयं को महज कुछ ग्रीन व ईको फैं्रडली दिखाकर फील गुड करके संतुष्ट हो लेगा ! अथवा क्या भारत कई अन्य देशों की स्थिति व स्वयं अपने अतीत के अनुभवों से ठोस सबक लेता हुआ वैकल्पिक विकास की नई राहें तलाशेगा ? ग्लोबल वॉर्मिंग का सामना करने में कई विकसित देशों की दोहरी नीतियों पर भारत का क्या रूख होगा ?
बेलगाम बढता औद्योगिकरण, मशीनीकरणण, शहरीकरण बिजली की खपत को बेइंतहा बढा रहा है । जहां एक ओर कोयला तेल जैसे जीवाश्म इंर्धनों की खपत को कम करना जरूरी है; वहीं दूसरी ओर यह समझना भी जरूरी है कि ऊर्जा के वैकल्पिक स्त्रोतों की भी अपनी कई सीमाएं हैं ।
बडी पनबिजली योजनाआें से जुडे पर्यावरण संबंधी नुकसानों, विस्थापन, बाढ की बढती समस्या, दुर्घटनाआें की संभावना, अपेक्षित लाभ न मिल पाना, सिकुडते ग्लेशियरों के चलते इनके अनिश्चित भविष्य ने इनपर कई सवाल खडे किए हैं। कई वैज्ञानिकों-पर्यावरणविदों ने बांधों के जलाशय की सतह से व पनबिजली सयंत्र संचालन के दौरान होने वाले ग्रीन हाऊस गैस उत्सर्जन की समस्या पर भी ध्यान दिलाया है ।
परमाणु ऊर्जा में रेडियोएक्टिव कचरे से होने वाले प्रदूषण की गंभीर समस्या है जो भूमिगत जल में भी फैल सकता है और शेष पर्यावरण में भी । परमाणु ऊर्जा सयंत्रों में दुर्घटना व चोरी की संभावना भी मौजूद रहती है । परमाणु इंर्धन की मौजूदगी अधिकाधिक हिंसक होती दुनिया में अपने आप में खतरा तो उपस्थित करती ही हैं ।
ऊर्जा के वैकल्पिक स्त्रोतों के रूप में सौर व पवन ऊर्जा को भी महत्त्वपूर्ण माना गया है । बिजली की बचत करने वाली तकनीकों को भी प्रोत्साहन मिल रहा है ।
हर संभव तरीके से बिजली की बचत करने वाली तकनीकों को भी प्रोत्साहन मिल रहा है ।
हर संभव तरीके से बिजली की बचत करना आज की जरूरत है । अधिक बिजली खींचने वाले उपकरणों जैसे ए.सी., फ्रिज (जो ओजोन परत को भी नुकसान पहुँचाते हैं), कम्प्यूटर आदि का उपयोग यथासंभव सीमित किया जाए । इसके प्रति विशेष सजग रहा जाए कि जब जरूरत न हो तब बिजली के उपकरण अवश्य बंद रहें। बिजली की जरूरतों को कम करना प्राथमिकता होनी चाहिए । विकल्पों को भी अंधाधुंध नहीं अपनाया चाहिए और वैकल्पिक वस्तुआें को अपनाते हुए इस बात का भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि क्या समाज में मेहनतकश गरीबों के लिए वैकल्पिक रोजगार भी पनप रहे हैं या नहीं।