बुधवार, 2 जुलाई 2008

सम्पादकीय

नदियों के अस्तित्व पर मंडराता खतरा
नदियां हमारे देश में प्राचीन सभ्यता और लोक संस्कृतियों के विकास की वाहक रही है । यह प्रकृति की अनमोल रचना होने से कई विशिष्टताआें के साथ जनजीवन में रची बसी हुई है । लेकिन अब ये नदियां अपने संघर्ष के दौर से गुजर रही हैं, आज बढ़ते उपभोक्तावाद के कारण नदियों का स्वास्थ्य लगातार गिरता जा रहा है । हमारी भारतीय संस्कृति में गंगा, यमुना, कावेरी, गोदावरी, ब्रह्मपुत्र और नर्मदा आज भी धार्मिक आस्था की केन्द्र हैं, जहां बड़े तपस्वी, ऋषि मुनि, योगी, धर्मात्मा और श्रृद्धालुआें को इनके तटों पर आसानी से देखा जा सकता है । किन्तु पिछली एक शताब्दी से मानव ने प्रकृति की इस सुरम्य रचना का अविवेकपूर्ण ढंग से दोहन कर लालची प्रवृत्ति के चलते वह इसे अपनी स्वार्थसिद्धी का माध्यम मानता आ रहा है, उसने नदियों के जल को रोका है, जिसमें चाहे बड़े-बड़े बांध बनाना हो, नदियों की धाराएं मोड़ना और विद्युत उत्पादन करना आदि कृत्यों से इन पवित्र नदियों के स्वरूप पर ग्रहण लगता दिखाई दे रहा है । कहा जाता है कि मानवीय दखल से नदियों का ८३ प्रतिशत बहाव प्रभावित होता है । प्रकृति और नदियों के साथ छेड़खानी के कारण मछलियों और जलीय जीवों के जीवन पर भी असर पड़ रहा हैं । तेजी से बढ़ते उद्योग, रासायनिक खेती, शहरी गंदगी, अतिक्रमण और जलग्रहण क्षेत्रों में जंगलों के कटने से नदियां सिकुड़ती जा रही है । इसी का परिणाम है कि नदियों का जल अब मनुष्य और जलीयजीवों के लिए रोगजन्य साबित हो रहा है । जिससे पर्यावरण अब विनाश के मुहाने पर पहुंचता जा रहा है । विश्व प्रकृति निधि द्वारा दुनियाभर की २२५ नदियों पर लगभग २००० शोधकर्ताआें की रिपोर्ट में नदियों पर मंडराते गंभीरत खतरों की चेतावनी दी गई हैं । भारत में नदी संरक्षण के नाम पर ५१६६ करोड़ की योजना को मंजूरी मिलने के बाद भी परिणाम संतोषजनक नहीं है । नदियों को लेकर बना केन्द्रीय प्राधिकरण भी पिछले बीस वर्षो से दो ही बैठकें कर पाया है । तापमान की बढ़ोत्तरी, हिमखंडो के पिघलने व अवर्षा के चलते सूखे की स्थिति ने अपना प्रभाव दिखाना शुरू कर दिया है । शहरीकरण और औद्योगिकरण के चलते अतिक्रमण नदियों की गोद में पसरता जा रहा है, जिससे नदियां सिकुड़ती लगी है । वर्तमान समय में जिस तरह भू-जल स्तर में गिरावट आ रही है, उससे आने वाले समय में जलसंकट के साथ खाद्यान्न संकट भी गहरा सकता है । क्योंकि जब पानी का संकट होगा तो खेतों की सिंचाई कैसे होगी, लोग पानी के अभाव में क्या करेंगे, इस पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है । अगर समय रहते नदियों के संरक्षण पर ध्यान नहीं दिया गया तो वह दिन दूर नहीं जब हमें इस स्थिति का सामना करना पड़ सकता है । मानवीय प्रवृत्तियों और स्वार्थ के वशीभूत हमने नदियों को बीमार, अपाहिज और लाचार बना दिया है । अब ऐसी स्थिति में नदियों के किनारे जमीन और जलग्रहण क्षेत्रों को कैसे बचाया जाए ? कैसे अकाल मौत का शिकार हो रही नदियों को पुर्नजीवित किया जाए ? नदियों का घटता जलस्तर कैसे बढ़ाया जाए ऐसे कई प्रश्न है जिन पर आज गंभीरता से विचार करने की जरूरत है ।

1 टिप्पणी:

महेंद्र मिश्रा ने कहा…

badhate jal pradooshan ke liye ham sabhi khud jimmedar hai . apka chintan is disha me sahi hai . sarakari fund ki khuleaam holi kheli jati hai or yojanaao ko moort rup nahi diya jata hai . dhanyawaad.