शनिवार, 20 जनवरी, 2007
इस अंक में
पर्यावरण डाइजेस्ट के इस अंक में सामाजिक पर्यावरण की लोक चेतना पर विशेष सामग्री दी गयी है ।
भारत में पत्रकारिता की शुरुआत २९ जनवरी १७८० को हुई जब जे.ए.हिक्की ने बंगाल गजट नामक अखबार निकाला था। भारतीय पत्रकारिता के स्थापना दिवस के अवसर पर पहले लेख मीडिया का नैतिक दायित्व में आप डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के विचार पढ़ेगें । प्रसिद्ध गांधीवादी विचारक डॉ. रामजी सिंह के लेख शांति ही संस्कृति है में विश्व शांति की आवश्यकता प्रतिपादित की गयी है। थर्ड वर्ल्ड नेटवर्क की प्रस्तुति निरंकुशता के शिकार बच्चे में बच्चों की वैश्विक स्थिति पर यूनिसेफ की रिपोर्ट की चर्चा है । वर्ष २००६ की मानव विकास रिपोर्ट पर आधारित महीन का लेख सत्ता, गरीबी और वैश्विक जल संकट में इस रिपोर्ट की जानकारी दी गयी है । दिल्ली स्थित विज्ञान एवं पर्यावरण केन्द्र से जुड़े सौरव मिश्रा के लेख जी.एम. फसलों में नये मापदण्डों की जरुरत में जीन संवर्धित फसलों की विस्तार से चर्चा की गयी है ।
इस अंक से हम नये स्तंभ की शुरुआत कर रहे हैं, बीस साल पहले में इस बार जनवरी १९८७ अंक (पर्यावरण डाइजेस्ट के प्रवेशांक) में प्रकाशित तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के विचार पर्यावरण संरक्षण की जागरुकता पर पढ़ेंगें । इसके साथ ही डॉ. जेकब पुलियन का लेख पोलियो अभियान के सबक में पोलियो अभियान के भारतीय संदर्भोंा में समीक्षात्मक जानकारी दी गयी है । इसी प्रकार आशुतोष मिश्रा, राधिकासिंह और सुजीतकुमार सिंह के लेख उड़ीसा: गैर कानूनी खनन की परम्परा में शोध अध्ययनपूर्ण जानकारी है । कविता में इस बार इन्दौर के साहित्यकार गिरेन्द्र सिंह भदौरिया प्राण की कविता जीवन एक शाप भी आप पढ़ेंगें ।
इसके अलावा पत्रिका के स्थायी स्तम्भों ज्ञान विज्ञान, पर्यावरण परिक्रमा और पर्यावरण समाचार में पर्यावरण से संबंधित नवीनतम जानकारियों से आप रुबरु होते हैं।नूतन वर्षाभिनन्दन के साथ ..आपका
- कुमार सिद्धार्थ
प्रकाशन यात्रा के दो दशक
इस अंक से पर्यावरण डाइजेस्ट अपने प्रकाशन के २१ वें वर्ष में प्रवेश कर रही है। प्रकाशन यात्रा के दो दशक में पत्रिका को अपने पाठकों, लेखकों एवं सहयोगियों का निरंतर स्नेह मिला। इसी स्नेह की ऊर्जा से इस छोटे से संकल्प का सातत्य बना रहा।
पिछले दो दशकों का समय हिन्दी पत्रिकाआें के लिए सर्वाधिक दुर्भाग्यपूर्ण और चुनौती भरा रहा है। इसी काल खण्ड में हिन्दी की प्रतिष्ठित और बड़ी-बड़ी पत्रिकायें एक-एक कर बंद हो गयी। देश में स्वतंत्रता के बाद से साठ बरसों में ऐसा समय कभी नहीं आया, जब इतनी संख्या में हिन्दी पत्रिकाआें का प्रकाशन बंद हुआ हो।
पिछले बीस वर्षो में हमने देखा कि व्यवसायिक पत्रिकाआें की बढ़ती भीड़ में रचनात्मक सरोकारों की पत्रिका को जिंदा रखना संकटपूर्ण तो है, लेकिन असंभव नहींं। पर्यावरण डाइजेस्ट का यह छोटा सा दीप अनेक झंझावातों के बावजूद शिशु मृत्यु के कठिन समय को पार कर यहां तक पहुंच पाया है तो इसके पीछे हमारे पाठको की पर्यावरण प्रेमी शक्ति का संबल था। यह सबल ही वर्तमान और भविष्य की हमारी यात्रा की गति एवं शक्ति का आधार है।
पिछले दो दशकों में पर्यावरण डाइजेस्ट ने कभी किसी सरकार, संस्थान या आंदोलन का मुखपत्र बनने का प्रयास नहीं किया, पत्रिका की प्रतिबद्धता सदैव सामान्य पाठक के प्रति रही है। इसी प्रतिबद्धता के संकल्प को आज हम फिर एक बार दोहराना चाहते हैं।
पत्रिका के प्रकाशन और निरंतरता में जिन मित्रों का सहयोग और समर्थन मिला उन सभी के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए आशा करते है कि भविष्य में भी इसी प्रकार का स्नेह और सहयोग मिलता रहेगा।
प्रसंगवश
मालवा में नदी जोड़ योजना से जुड़ी बातें
भारत सरकार की नदी जोड़ने की योजना के अन्तर्गत मालवा क्षेत्र की प्रमुख नदियों पार्वती व कालीसिंध को चम्बल से जोड़ने की योजना है। इस योजना का मुख्य आधार है, जल अतिरेक वाली नदी से जलाभाव नदी में पानी पहुंचाना। इस क्षेत्र में चम्बल की सहायक व छोटी नदियों पर बांध बनाकर उनके पानी को चम्बल नदी में ऊपर की ओर बनें बांधों, गांधीसागर व राणा प्रताप नगर में मिलाया जाना प्रस्तावित है। सवाल यह उठता है कि चम्बल नदी घाटी के निचले व ऊपरी क्षेत्र में जब वर्षा का औसत समान है तो पानी एक जगह से दूसरी जगह ले जाने की क्या वजह है? इस परियोजना के अन्तर्गत पार्वती, नेवज एवं कालीसिंध नदियों पर तीन बांधों के अलावा गांधीसागर के जलग्रहण क्षेत्र में सात बांध बनाए जाने का प्रस्ताव हैं। इन बांधों से डूब में आने वाले १२४ गांवों में से सिर्फ ६५ गांवों के डूब के आंकड़े मौजूद हैं। अन्य ५९ गांव, जो कि गांधीसागर क्षेत्र में प्रस्तावित ७ बांधों एवं नहर क्षेत्र से प्रभावित होंगे, उनके बारे में कोई आंकड़ें मौजूद नहीं हैं। जिन ६५ गाँवों के आंकड़ें मौजूद है, उनके अनुसार ५४११ परिवारों के २७०५५ लोगों की आबादी विस्थापित होंगी। इन गांवों की १७३०८ हेक्टेयर जमीन डूब में आएगी। महत्वपूर्ण बात यह है कि ये आंकड़े सन् २००२-०३ में प्रकाशित किए गए हैं, जबकि जनसंख्या के आंकड़ें १९९१ की जनगणना पर आधारित हैं, प्रस्तावित योजना के अन्तर्गत पाटनपुर, मोहनपुरा एवं कुंडलिया में कुल मिलाकर २००० एमसीए पानी स्थानांतरण के लिए अतिरेक बताया जा रहा है जबकि इस अनुमान में स्थानीय आवश्यकता पर ध्यान नहीं दिया गया है। परियोजना के मूल प्रस्ताव के अलावा शिप्रा नदी को भी उस योजना में शामिल किए जाने की बात की जा रही है। इसके अन्तर्गत इन्दौर, देवास एवं उज्जैन में पेयजल उपलब्ध कराने की बात है। यदि ऐसा किया जाता है तो पानी की मात्रा १००० एमसीएम से काफी कम हो जाएगी और जल अतिरेक नहीं के बराबर होगा। इस क्षेत्र में एक साथ इतने सारे बांध बनाने के लिए जलाशयों के कारण स्थानीय पर्यावरण में काफी बदलाव आने की आशंका है। पर्यावरणीय प्रभावों के अलावा लोगों के विस्थापन के कारण स्थानीय सामाजिक परिस्थिति में भी काफी बदलाव आएंगे। इसके अलावा भूमि के उपयोग में बदलाव आने एवं रोजगार के साधन में बदलाव के कारण सामाजिक स्थिति पर विपरीत प्रभाव पड़ने की आशंका है। मालवा क्षेत्र में स्थानीय आवश्यकता को पूरा किए बगैर पानी के स्थानांतरण से क्षेत्रीय विषमता काफी बढ़ेगी। इसलिए आवश्यकता है कि गांधी सागर के न भर पाने की विकृतियों को पूरा किया जाए एवं चम्बल में नीचे मिलने वाली नदियों के पानी को ऊपरी चम्बल में मिलाने की कोई जरुरत नहीं है। यदि सदियों पुरानी परम्परागत जल व्यवस्था को पुन: विकसित किया जाए तो ऐसी महाकाय योजनाआें की जरुरत ही नहीं पड़ेगी, साथ ही पूरे इलाके को भावी पर्यावरणीय व सामाजिक संकट से बचाया जा सकेगा।
मीडिया का नैतिक दायित्व
भारतीय पत्रकारिता के स्थापना दिवस पर विशेष
-डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम
अब से लेकर सन् २०२० तक का कालखंड हमारे राष्ट्र के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। राष्ट्रीय प्रेस को एक अरब लोगों के प्रसार माध्यम के रुप में उभरना होगा। इससे भी बढ़कर, मीडिया को भारत के आर्थिक विकास में सहभागी के रुप में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करना है। आर्थिक विकास तथा हमारी सामाजिक-सांस्कृतिक विरासत का मेल भारत को एक खुशहाल, संपन्न राष्ट्र बना देगा।
मीडिया को चाहिए कि वह किसानों, मछुआरों, श्रमिकों, शिक्षकों, ज्ञानकर्मिकों, स्वास्थ्यकर्मियों आदि का हमेशा स्मरण करें। राजनीति के दो घटक होते है : राजनीतिक राजनीति और विकास की राजनीति। अधिकांश मीडिया राजनीतिक राजनीति को ही अधिक महत्व देता है। जबकि देश को जरुरत है विकास की राजनीति की। इस क्षेत्र में मीडिया की रिपोर्टिंग महत्वपूर्ण है।
एमएस स्वामीनाथन रिसर्च फाउंडेशन ग्रामीण युवाआें के माध्यम से ग्रामीण विकास हेतु क्षमता निर्माण गतिविधियों में रत है। कुछ समय पूर्व इस फाउंडेशन ने अपने राष्ट्रीय फैलो का सम्मेलन आयोजित किया था। आमतौर पर फैलो की उपाधि वैज्ञानिकों, इतिहासकारकों तथा अर्थशास्त्रीयों को दी जाती है। यहाँ जिन फैलो का जिक्र हो रहा है, वे किसान, मछुआरे और शिल्पकार हैं। विभिन्न क्षेत्रों से आए ये लोग देहात में रह रहे लोगों के जीवन में बदलाव ला सकते हैं। पत्रकारों को इन जमीन से जुड़े समाज सुधारकों से मिलकर इनकी योग्यता, समर्पण तथा अनुभवों को जनता के सामने लाना चाहिए ताकि ये हमारे युवाआें के लिए आदर्श के रुप में उभरें।
मैं अब तक १२ राज्यों के विधान मंडलों को संबोधित कर चुका हँू। मेरा मुख्य संदेश यहीं रहता है कि संबंधित राज्य को कैसे उच्च मानव विकास सूचकांक के साथ और प्रति व्यक्ति आय बढ़ाई जा सकती है। इसके लिए मैं ८-१० मिशन भी बताता हँू। मेरा सुझाव है कि मीडिया इन मिशनों का अध्ययन करें, शोध एवं विश्लेषण करें तथा राज्यों के विकास हेतु नेताआें के समक्ष अपने सुझाव रखे। केरल विधानसभा में मेरे संबोधन के बाद वहाँ के मीडिया ने इस दिशा में प्रशंसनीय पहल की।
मीडिया को विकसित भारत २०२० पूरा (ग्रामीण क्षेत्रों में शहरी सुविधाएँ उपलब्ध कराना), भारत निर्माण आदि जैसे कार्यक्रमों एवं राष्ट्रीय मिशनों में सहभागी होना चाहिए। मीडिया को इनके सकारात्मक पहलुआें को प्रमुखता से उभारना चाहिए।
यह जरुरी है कि मीडियाकर्मी तैयार करने वाले अकादमिक संस्थानो में अनुसंधान शाखाएँ हों। इससे हमारे पत्रकार राष्ट्रीय महत्व के विषयों पर मौलिक अनुसंधान कर मध्यम व दीर्घकालिक समस्याआें के समाधान उपलब्ध करा सकेंगे। अखबार मालिकों को चाहिए कि वे युवा रिपोर्टरों द्वारा स्नातकोत्तर अर्हता पाने हेतु किए जाने वाले शोधकार्य को प्रोत्साहित करें। इससे प्रिंट मीडिया की सामग्री की गुणवत्ता में भी सुधार आएगा।एक अनुसंधानपरक वातावरण में लगातार ज्ञान अर्जित करते रहना सभी मीडियाकर्मियों के लिए जरुरी है।
एक उदाहरण देखिए। विदेशी अखबारों में किसी विषय पर चर्चा करने से पहले उसे एक आंतरिक शोध समूह के पास भेजा जाता है यहाँ तमाम तथ्यों व आँकड़ों का अध्ययन किया जाता है, उनका प्रमाणीकरण किया जाता है और फिर प्रमाणिक समाचार तैयार कर प्रकाशन के लिए भेजा जाता है। जब भारत में आउटसोर्सिंग करने को लेकर एक आलोचनात्मक टिप्पणी की गई थी, तो एक अमेरिकी पत्रकार कुछ दिन भारत में रहा और पूरे मुद्दे का अध्ययन किया। उसने पाया कि जो कंपनियाँ बिजनेस प्रोसेस आउटसोर्सिंग कर रही थीं, वे अमेरिका तथा योरप से आयातित उपकरणों का प्रयोग कर रही थीं। इस प्रकार यह तथ्य सामने आया कि बीपीओ उद्योग अमेरिका व योरप के हार्डवेयर उद्योग के लिए परोक्ष बाजार उपलब्ध कराते हैं।
इसी प्रकार डिस्कवरी चैनल का एक व्यक्ति सूचना प्रौद्योगिकी में भारत की प्रगति का अध्ययन करना चाहता था। थॉमस फ्राइडमैन भारत आकर एक माह तक रहे और बंगलोर तथा अन्य जगहों पर गए। अपने समाचार विश्लेषण के आधार पर उन्होंने एक पुस्तक लिखी : द वर्ल्ड इज फ्लैट । यह है अनुसांधन की ताकत। ***
(भारतीय प्रेस परिषद के एक समारोह में दिए गए भाषण से संक्षिप्त)
शांति ही संस्कृति है
सामाजिक पर्यावरण
डॉ. रामजी सिंह
महाश्वेता देवी ने अपने एक लेख में एक ऐसे विश्व का सपना देखा है जो हिंसामुक्त, अभाव, अन्याय और अशिक्षा से मुक्त तो होगा ही साथ ही अशांति और आतंकवाद से भी दूर होगा।
बहुत दिन पहले विन्डेल विल्की ने अपनी पुस्तक वन वर्ल्ड में ऐसे विश्व का स्वप्न देखा था जिसमें राष्ट्र की सीमाएं न हों। एच.जी. वेल्स, बर्टेण्ड रसेल आदि कुछ और चिन्तकों ने भी विश्व राज्य की कल्पना की हैं महापंडित राहुल सांस्कृत्यायन ने २२ वीं सदी नामक अपने उपन्यास में एक भावी विश्व राज्य के चित्र को निरुपित किया था। आज दो विश्व युद्धों के बाद और खासकर परमाणु बम का हिरोशिमा और नागासाकी में हाहाकार सुनकर एक विश्व राज्य की कल्पना पहले से अधिक व्यावहारिक दिख रही है।
हमने अपने समय में ही देखा कि किस प्रकार दो वियतनाम और दो जर्मनी एक हो गये और पूर्वी यूरोप के पच्चीस राष्ट्रों की एक ही संयुक्त संसद, मुद्रा, बाजार ओर पारपत्र भी हो गया है। इसके अतिरिक्त दक्षिण पूर्वी एशिया में सार्क और एशियन राष्ट्रों के क्षेत्रीय संगठनों के बावजूद भी संयुक्त राष्ट्र संघ और उससे संबंधित वैश्विक अभिकरण काम कर रहे हैं। इससे लगता है कि स्वप्न अब सत्य और साकार हो सकता है।
आज सिद्धांतवाद के दिन लदते जा रहे हैं इसलिए चाहे पूंजीवाद हो या समाजवाद, दोनों वर्तमान अस्तित्व को स्वीकार करने पर विवश हैं। शायद यह इस युग की अनिवार्यता भी है। हमें अणु बम और अहिंसा के बीच अहिंसा को चुनना ही होगा। क्योंकि आणविक युद्ध का गति पथ समाप्त हो गया है। यह अच्छा है कि अणु बम पर किसी राष्ट्र विशेष का एकाधिकार नहीं है, इसलिए अमेरिका के पास लगभग ३० हजार परमाणु बम के रहते हुए भी और हजार परेशानियों के बावजूद भी उसने वियतनाम, अफगानिस्तान या युगोस्लाविया के युद्धों में अणु बम के प्रयोग करने का साहस नहीं किया। संक्षेप में कह सकते हैं कि आज इक्कीसवीं शताब्दी में युद्ध का गतितत्व ही समाप्त हो गया है। युद्ध का प्रारंभ मानव ने अपने नाखून और दांतो के उपयोग से शुरु किया था और आज लगता है इतिहास अपनी पुनरावृत्ति करना चाहता है। वैज्ञानिक आइंस्टीन से जब पूछा गया कि तीसरा विश्व युद्ध किन अस्त्रों से लड़ा जाएगा तो उन्होंने उत्तर दिया कि तीसरा विश्व युद्ध किससे लड़ा जाएगा यही नहीं कह सकता लेकिन यह निश्चित है कि जब चौथा विश्वयुद्ध छिड़ेगा तो हम आदि मानव की भांति अपने नाखूनों एवं दांतो का ही लड़ने में उपयोग करेंगे। स्पष्ट है कि अणु बम का अर्थ ही है मानव और मानवोत्तर प्रजातियां, समस्त कला और संस्कृति, ज्ञान और विज्ञान का सर्वनाश। यही कारण है कि साम्यवाद अपने युद्ध की अनिवार्यता के सिद्धांत का परित्याग कर पूंजीवाद के साथ सह-अस्तित्व को स्वीकार कर चुका है और अब तो विश्व व्यापार संगठन में साम्यवादी चीन भी सदस्य बनकर पूंजीवादी भूमंडलीकरण का एक उपकरण बन गया है। आज शांति की संस्कृति ही मानवता का एक मात्र विकल्प बच रही है।
गोस्वामी तुलसीदास जी ने मानव प्रवृत्ति का चित्रण करते हुए कहा है सुमति कुमति सबसे लिए रहिहीं- तो क्या हम यह मान लें कि मानव स्वभाव से दुष्ट स्वार्थी और कलह वृत्ति का ही है, लेकिन मानव को स्वभाव से दुष्ट मान लेने में अखिल मानव जाति का अपमान तो है ही निराशावाद का भी चरम है। यदि मानव मूलत: दुष्ट और बुरा है तो फिर शिक्षण, प्रशिक्षण, संस्कार, परिष्कार, नीति और धर्म के उपदेश सब व्यर्थ है। जिस प्रकार बालू से तेल नहीं निकल सकता उसी प्रकार दुष्ट मानव से साधुता की अपेक्षा नहीं की जा सकती। असत् से सत् का उद्भव नहीं हो सकता, इसलिए यदि हम मनुष्य को स्वभाव से बुरा मान लेंगे तो फिर अच्छाई और अच्छे विश्व की कल्पना नहीं हो सकती। मानव सभ्यता बर्बर से सभ्य समाज की ओर अग्रसर होती रही हैंऔर आज वह पृथ्वी से भी उपर उठकर मंगल और चंाद की और बढ़ रही है।
प्रश्न है कि मानव की ही नहीं सृष्टि के समस्त प्राणियों की एक ही अभीप्सा है, सुख या आनंद। इसी को फ्रायड ने प्लेजर इंसटिंक्ट या सुख की प्राप्ति की प्रवृत्ति कहा है। महाभारत का वचन है कि सब कोई सुख चाहते है। लेकिन सुख, शांति के बिना असंभव है। गीता में कहा गया है कि अगर शांति नहीं है तो सुख कहां से मिलेगा। सुख की आकांक्षा भी तभी परिपूर्ण होगी जब हम शांति प्राप्त करें और हमारे पड़ोस, समाज और विश्व में शाति का साम्राज्य हो।
आध्यात्मिक दृष्टि से यह कहा जाता है कि बाहर शांति तभी संभव है जब हमारे मन में शाति हो इसलिए मानसिक शांति के लिए निर्वाण और मोक्ष आदि की अवधारणा आई हैं योगशास्त्र के अनुसार भी मानसिक शांति के लिए अष्टांगिक योग की योजना है। चाहे भगवान बुद्ध का अष्टांगिक मार्ग हो या भगवान महावीर के त्रिरत्न की कल्पना हो या योग, सांख्य, वेदांत आदि शास्त्र हों प्रत्येक जगह मानसिक शांति के लिए ज्ञान और समाधि पर जोर दिया जाता है।
शांति के लिए आध्यात्मिक एवं धार्मिक दृष्टि से प्रयासों के बावजूद जी जगत में अशांति और कलह की कमी नहीं हो रही हैं । पिछले पांच हजार वर्षो का इतिहास साक्षी है कि शांति के लिए धर्म की ओर से किये गये प्रयास भी सफल नहीं हो पाये है। हिन्दुआें के विभिन्न संप्रदायों के बीच जिस प्रकार हिंसा और प्रतिहिंसा चलती रही उसी प्रकार ईसाई समाज में प्रोटेस्टेंट और कैथोलिक आदि सम्प्रदायों के बीच कलह का अंत दिखाई नहीं पड़ रहा है। एक अल्लाह एवं एक बिरादरी को मानने वाले इस्लाम में शिया सुन्नी आज भी लड़ ही रहे हैं।
शायद इसलिए मार्क्स ने धर्म को अफीम का नशा कहा था। जो धर्म शांति का संदेश वाहक माना जाता है, वह आज अशांति का सबसे बड़ा उपकरण बन गया है। मध्य युग में संतो ने धर्म और मत समन्वय की चेष्टा की थी। कबीर ने हिन्दु और मुसलमान दोनों की खबर ली थी और कहा था कि - इन दोनों राह न पाई । स्वामी रामानन्द ने तो स्पष्ट कहा था जाति पांति पूछे नहीं कोई, हरि को भजै से हरि का होई। इसी प्रकार संत परम्परा के प्राय: सभी संत कवियों ने धर्म समन्वय का प्रयास किया था। आधुनिक युग में भारतीय नव जागरण के पुरोधा राजा राममोहन राय ने - विश्व धर्म नामक पुस्तक लिखी और रामकृष्ण परमहंस की प्रेरणा से स्वामी विवेकानंद ने शिकागो में आयोजित विश्व धर्म संसद में व्यक्तिगत और साम्प्रदायिक धर्म को नकारते हुए विश्व धर्म का संदेश दिया। गांधी और विनोबा ने सर्व धर्म समभाव के सिद्धांत को अपने भीतर उतारने की पूरी कोशिश की थी।
विश्व शांति के लिए मानव मस्तिष्क की शांति और हृदय को निश्कलुष किया जाए इससे किसको विरोध होगा, लेकिन मानव शून्य में नहीं रहता वह तो समाज में ही रहता है जिस प्रकार उसकी सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक परिस्थितियां होगी उसी प्रकार उसका चिंतन और जीवन भी होगा। इस दृष्टि से शांति की संस्कृति के लिए समाज की व्यवस्था और संरचना पर सर्वाधिक ध्यान देना होगा। भरी सभा में द्रोपदी का चीरहरण सम्पूर्ण पुरुष समाज और सभ्यता के लिए कलंक है। उसी प्रकार लड़के-लड़की में विभेद, बाल विवाह, अनिवार्य वैधव्य, वैश्यावृत्ति और देवदासी प्रथा, बढ़ते हुए बलात्कार और अल्ट्रासाउण्ड परीक्षण के पश्चात् स्त्री भ्रूण को ही नष्ट करना पाशविकता की सीमा को पार करना है।
इन सभी का मूल कारण है कि हमारा समाज सदियों से पुरुष सत्तात्मक है और स्त्रियों का शोषण और उत्पीड़न पुरुषों का जन्म सिद्ध अधिकार माना जाता है।शांति की संस्कृति के विकास की सबससे बड़ी बाधा है हमारी आकांक्षा तो शांति की रहती है लेकिन आयोजन युद्ध और कलह का होता है। हमारे शास्त्र उपकरण भी युद्ध और विनाश के होते हैं। हमें शांति की संस्कृति के लिए अपने मन में शांति की भावना को स्थापित करना होगा। जिस प्रकार युद्ध का प्रारंभ मानव मस्तिष्क से होता है उसी प्रकार शांति का दुर्ग भी मानव मन में ही निर्मित होगा। इसलिए शांति की संस्कृति के निर्माण के लिए शिक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी।
आज शिक्षण संस्थाआें में सैनिक शिक्षा के लिए प्रावधान तो है लेकिन शांति की शिक्षा की कल्पना भी नहीं की जाती। जहां महावीर, बुद्ध और गांधी का अभिर्भाव हुआ और जहां शाति की संस्कृति का विस्तार हुआ वहीं आज पुरे भारत में लगभग दो सौ पचहत्तर विश्वविद्यालयों में मात्र नौ स्थानों पर गांधी विचार और शांति की शिक्षा का प्रावधान है। एक असमान विश्व में शस्त्रीकरण और युद्ध के नाम पर लगभग २० खरब डॉलर खर्च करना एक प्रकार की असभ्यतम हिंसा ही तो है। शंाति की संस्कृति के लिए न केवल हमें शिक्षा पर ध्यान देना होगा बल्कि कला-संगीत तथा क्रीड़ा का सहारा लेकर इसे शांति उन्मुख बनाना होगा। ***
निरंकुशता के शिकार बच्चे
बाल जगत
थर्ड वर्ल्ड नेटवर्क
संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा विश्व में बच्चों की स्थिति नामक रिपोर्ट में बताया गया है कि बच्चों के अवैध व्यापार अथवा उन्हें बलपूर्वक घरेलू नौकर बनाने के कारण लाखों बच्चे ओझल हो चुके हैं। इसके अलावा गलियों में आवारा धूमने वाले बच्चे दिखाई तो देते हैं, मगर वे भी मूलभूत सेवाआें और सुरक्षा के दायरे से कमोवेश बहिष्कृत हो चुके हैं।
इन बच्चों को न सिर्फ अत्याचार भोगना पड़ता है, बल्कि वे उनकी वृद्धि एवं विकास के लिए आवश्यक शिक्षा, स्वास्थ्य एवं अन्य मुख्य सेवाआें से भी वंचित हो गये हैं। इन बच्चों के स्वास्थ्य एवं सुरक्षित बचपन के अधिकार की रक्षा करना अत्यन्त कठिन है, क्योंकि वर्तमान में ये बच्चे सार्वजनिक चर्चा तथा कानूनी प्रावधानों से लेकर आंकड़ों और खबरों तक से बाहर हकाल दिये गये हैं।
यह रपट इस बात पर बल देती है कि विशेष ध्यान दिये बगैर उपेक्षा और शोषण के चक्र में उलझे और समाज द्वारा भुला दिये गये इन लाखों बच्चों के साथ-साथ स्वयं समाज को भी भविष्य में इसके घातक परिणाम भुगतने होंगे। रिपोर्ट का तर्क है कि अपने बच्चों के कल्याण और स्वयं अपने भविष्य के प्रति जिस समाज को रुचि होगी, वह ऐसा कदापि नहीं होने देगा।
यूनिसेफ के कार्यकारी निदेशक एन.एम.विनमेन कहते हैं, समूचे विकासशील जगत में इन संकटग्रस्त बच्चों तक पहुंचे बगैर सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्य की प्राप्ति नहीं की जा सकती है। अगर सर्वाधिक अभावग्रस्त, गरीब, संकटग्रस्त, शोषित एवं पीड़ित बच्चों की उपेक्षा जारी रही तो टिकाऊ विकास सम्भव ही नहीं हैं।
इसके पूर्व यूनिसेफ अपनी एक अन्य विशेष रिपोर्ट में बता चुका है कि गरीबी, एच.आय.वी/एड्स एवं शस्त्र संघर्ष बचपन को कैसे खोखला बना देते हैं। इसने अपनी हाल की रपट बहिष्कृत और उपेक्षित में बताया है कि कैेसे ये कारण और इनके साथ-साथ कमजोर शासन एवं भेदभाव, बच्चों को शोषण और दमन से बचाने में नाकाम होते हैं।
साथ ही जो बच्चे मूलभूत सुविधाआें से वंचित और गरीबी से त्रस्त होते हैं, वे सहज ही शोषण का शिकार बन जाते हैं। इसकी वजह है कि उन्हें अपनी सुरक्षा के विषय में बहुत कम जानकारी होती है। सशस्त्र संघर्ष में फंसे बच्चे आमतौर पर बलात्कार एवं अन्य प्रकार की लैंगिक हिंसा का शिकार बनते हैं। ऐसा ही कुछ-कुछ अकेले, असुरक्षित एवं उपेक्षित बच्चों के साथ भी होता है।
इस रिपोर्ट के अनुसार निम्न चार स्थितियों में बच्चों के बहिष्कृत और उपेक्षित होने की संभावना होती है।
औपचारिक पहचान विहीन बच्चे
विकासशील विश्व (चीन के अलावा) में प्रतिवर्ष जन्म लेने वाले बच्चों में से आधे बच्चों का जन्म-पंजीकरण ही नहीं होता, अर्थात् प्रतिवर्ष ५ करोड़ बच्चे नागरिक के रुप में औपचारिक स्वीकृति मिलने के अपने प्राथमिक जन्मसिद्ध अधिकार से वंचित रहते हैं।
पंजीकृत पहचान के अभाव में बच्चों को शिक्षा, अच्छी स्वास्थ्य सेवाएं तथा उनके बचपन तथा भविष्य को बेहतर बनाने वाली अन्य बुनियादी सुविधाएं मिलने की कोई निश्चितता नहीं होती। सीधे शब्दों में कहा जाए तो जिन बच्चों के पास औपचारिक पहचान नहीं है, वे किसी गिनती मे नहीं हैं, इसलिए उनकी और किसी प्रकार का ध्यान भी नहीं दिया जाता है।
अभिभावकों के प्यार से वंचित बच्चे
सड़कों पर आवारा फिरने वाले और जेलों (सुधार गृह) में बंद लाखों बच्चे अभिभावको और परिवार की स्नेह भरी देखभाल के अभाव जी रहे हैं। इन विपरीत परिस्थितियों में फंसे बच्चों को अक्सर बच्चा नहीं माना जाता। विकासशील देशों में लगभग १.४३ करोड़ बच्चे, अर्थात् प्रत्येक १३ में से १ बच्चा, अपने माता या पिता में से किसी एक की मौत का दुख झेल रहा होता है। अत्यधिक गरीबी में गुजर-बसर कर रहे बच्चों के अभिभावकों में से यदि किसी एक, विशेष रुप से यदि माता की मृत्यु हो जाए तो उनकी शिक्षा और स्वास्थ्य खतरे में पड़ जाता है।
दुनिया में ऐसे करोड़ों बच्चे अपने बचपन का एक बड़ा हिस्सा सड़क किनारे फुटपाथ पर बिताते हैं, जहां उनका हर तरह से शोषण और दमन किया जाता है।
इस लाख से अधिक बच्चे छोटे-मोटे अपराध में पकड़े जाकर मुकदमों की प्रतीक्षा में हिरासत में रहते हैं। इनमें से अधिकांश बच्चे उपेक्षा, हिंसा और मानसिक कष्ट का शिकार होते हैं।
वयस्कों की भूमिका में बच्चे
रिपोर्ट में बताया गया है कि बचपन के स्वाभाविक विकास के महत्वपूर्ण चरण को दरकिनार करके बच्चों को वयस्कों की भूमिका निभाने के लिए बाध्य किया जाता है। सशस्त्र संघर्ष में शसस्त्र समूहों के लिए लाखों बच्चों को सैनिक, संदेश वाहक, भार वाहक, रसोईया और वैश्यावृत्ति जैसे काम करने के लिए बाध्य किया जाता है। अधिकांश मामले में इन बच्चों का बलपूर्वक अपहरण कर उन्हें ऐसे कामों में लगा दिया जाता है।
अनेक देशों में बाल विवाह के खिलाफ कानून होने के बावजूद कई विकासशील देशों में ८ करोड़ के अधिक बालिकाएं १८ वर्ष की उम्र से पहले ही ब्याह दी जाती है।
एक अनुमान के अनुसार १.७१ करोड़ बच्चे कारखानों, खदानों और खेती से जुड़े खतरनाक कामों से जुड़े हैं।
शोषित बच्चे :-
ऐसे बच्चे भी बहुत अधिक संख्या में हैं जिन्हें स्कूल और अन्य सेवाआें से वंचित कर दिया जाता है और वे अदृश्य शोषण का शिकार हैं। इनकी संख्या का पता लगाना और उनका जीवन बचाना अत्यन्त कठिन है।
इनमें से लगभग ८४ लाख बच्चे वैश्यावृत्ति से लेकर कर्ज की एवज में बंधुआ रखे जाने तक के सर्वाधिक बुरे किस्म के बाल मजदूर हैं, जहां उनका गुलामों की तरह शोषण होता है। लगभग २० लाख बच्चे जबरदस्ती वैश्यावृत्ति में लगे हुए हैं, जहां उन पर रोजाना यौन व शारीरिक अत्याचार होते हैं।
एक अनुमान के मुताबिक प्रतिवर्ष लाखों बच्चे तस्करी के माध्यम से भूमिगत और अनेक गैर-कानूनी गतिविधियों जिनमें वैश्यावृत्ति एवं अन्य अनैतिक कार्य शामिल हैं, में लगा दिये जाते हैं। घरेलू नौकर के रुप में काम कर रहे असंख्य बच्चों की संख्या और स्थिति का पता लगाना तो और भी दुष्कर कार्य है। अनेक बच्चों को स्कूल से निकाल दिया जाता है, उन्हें शारीरिक प्रताड़ना दी जाती है और साथ ही कम भोजन देकर उनसे अधिक काम कराया जाता है।
रिपोर्ट जोर देकर कहती है कि बच्चों को मूलभूत सेवाएं नही दे सकने वाले या ऐसा करने के अनिच्छुक देशों में रहने वाले लाखों-लाख बच्चे तो वास्तव में अदृश्य ही हैं। लिंग, जातीयता अथवा अपंगता के आधार पर विभेद भी बच्चों की उपेक्षा का एक प्रमुख कारण है।
अनेक देशों में लड़कियों को स्कूल नहीं भेजा जाता। जातीय अल्पसंख्यकों और आदिवासियों के बच्चो को भी मूलभूत सेवाआें से वंचित किया जाता है। रिपोर्ट का दावा है रोजमर्रा किये जाने वाले भेदभाव के कारण विश्व में आज की स्थिति में १५ करोड़ विकलांग बच्चों को शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्याप्त पोषण नहीं मिल पा रहा है।
विश्व में बच्चों की स्थिति २००६ के अनुसार नाजुक स्थिति में फंसे बच्चों का विकास सुनिश्चित करने के लिए संपूर्ण विश्व को विकास के वर्तमान प्रयासों के अतिरिक्त भी बहुत कुछ करना होगा। इन बच्चों तक पहुंचने के लिए सर्वप्रथम संबंधित सरकारों को ही कदम उठाने होंगे वे निम्नलिखित चार दिशाआें में काम कर सकती हैं।
अनुसंधान निगरानी और रिपोर्टिंग :-
उपेक्षित और अदृश्य बच्चों तक पहुंचने और उन पर हो रहे अत्याचार रोकने के लिए उनकी जानकारी एकत्रित करने और रिपोर्टिंग की व्यवस्था बनाना जरुरी है।
कानून :-
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बच्चों के मान्य अधिकारों के अनुरुप राष्ट्रीय कानून होना आवश्यक है। कानून के माध्यम से भेदभाव को पूर्णत: समाप्त किया जाना चाहिए। बच्चों को नुकसान पहुंचाने वालों के प्रति कानून लागू करने में सख्ती बरतनी चाहिए।
वित्तीय सहायता और क्षमता विकास :-
बाल केन्द्रित बजट बनने चाहिए एवं बच्चों की सेवा में लगी संस्थाआें को कानून और अनुसंधान में सहयोग करना चाहिए।
कार्यक्रम :-
अनेक देशों और समाजों में बच्चों को मूलभूत सेवाआें की प्राप्ति में बाधा बनने वाली व्यवस्थाआें में तत्काल सुधार की आवश्यकता है। जन्म प्रमाण-पत्र की अनिवार्यता समाप्त किये जाने से ज्यादा संख्या में बच्चे स्कूल पहुँचे सकेंगें। ***
