शुक्रवार, 15 मई 2009

१ सामयिक

हिमालय और कांक्रीट के पहाड़
एन्न. केथरिन शिडलर
जलवायु परिवर्तन के परिणामस्वरूप हिमालय का क्षेत्र दुनिया के सर्वाधिक प्रभावित क्षेत्र में परिवर्तित हो गया है । इसकी वजह है दक्षिण एशिया में पानी की आपूर्ति के संग्रहण खाते हेतु अनिवार्य नदियों के स्त्रोत विशाल हिमखंड (ग्लेशियर) तेजी से पिघल रहे हैं । चीन की समाचार एजेंसी झिन्हुआ ने फरवरी ०९ के आरंभ में बताया था कि चीनी वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि तिब्बत में हिमखंड चिंताजनक तेजी से पिघल रहेहैं । इन नाटकीय घटनाक्रमों के बावजूद भारत, पाकिस्तान, नेपाल और भूटान की सरकारें हिमालय की नदियों को दक्षिण एशिया के बिजलीघर में परिवर्तित करने पर तुली हुई हैं । ये हिमालय के उन्मुक्त जल से विद्युत उत्पादन हेतु बड़े-बड़े बांध बनाने की इच्छुक हैं । इन चारों देशों द्वारा अगले २० वर्षोंा में जलविद्युत के द्वारा १,५०,००० मेगावाट से अधिक विद्युत उत्पादन प्रस्तावित है । इस रफ्तार से हिमालय का क्षेत्र विश्व में सर्वाधिक बांधो वाला क्षेत्र बन जाएगा । यहां प्रस्तावित बांधों में से कुछ हैं, भारत में ३,००० मेगावाट क्षमता वाली डिबांग परियोजना, भूटान में ताला परियोजना और पाकिस्तान में १२.६ अरब डालर की लागत से बनने वाला दुनिया के सबसे बड़े और अधिकतम लागत वाले बांधों में से एक डिमेर भाषा बांध । यह आश्चर्य का विषय है कि बांधों के निर्माण का हमारे समय की सबसे विकराल समस्या जलसंकट, जो कि ग्लोबल वार्मिंग के परिणामस्वरूप सामने आ रहा है की दृष्टि से विश्लेषण नहीं किया गया है । कांक्रीट के पहाड़-हिमालय क्षेत्र में बांध निर्माण (माउंटेन ऑफ कांक्रीट-डेम बिल्डिंग इन हिमालयाज) के लेखक श्रीपाद धर्माधिकारी का कहना है कि, इस क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन प्रभाव आकलन अब तक न तो किसी को किसी बांध विशेष अथवा सामुहिक तौर पर बांधों को लेकर किया है । जलवायु परिवर्तन से प्रभावित हिमालय क्षेत्र में बांधों के निर्माण में करोड़ो डालर का निवेश अत्यधिक जोखिम भरी संपत्ति एवं अकार्यशील पूंजी में निवेश ही कहा जाएगा । तिब्बती पठारों का अध्ययन कर रहे चीनी दल के एक वरिष्ठ इंजीनियर युआन होंग का कहना है कि हिमाल के हिमखंडों के पिघलने से नदियां में अल्प अवधि के लिए तो भरपूर पानी आ जाएगा परंंतु दीर्घकाल में ये नदियां सूख जाएगी । जल विद्युत परियोजनाएं दोनों ही स्थितियों में जब नदियों में भरपूर पानी होगा और बाद में जब पानी कमी होगी, संकटग्रस्त ही रहेंगी । इस विरोधाभास की ओर इशारा करते हुए श्री धर्माधिकारी कहते हैं, अधिकांश बांंधों का डिजाइन नदियों के ऐतिहासिक प्रवाह के आंकड़ों पर आधारित है । इतना ही नहीं यह भी मान लिया गया है कि इन नदियों में जलप्रवाह पूर्ववत बना रहेगा । इस बात की पूरी संभावना है कि भविष्य में या तो इनमें अत्यधिक जलप्रवाह होगा जिससे इनकी सुरक्षा को खतरा हो सकता है । इसके अलावा बाढ़ और डूब के क्षेत्र में भी वृद्धि हो सकती है अथवा न्यूनतम जलप्रवाह के परिणामस्वरूप इतने विशाल निवेश पर प्रतिकूल असर पड़ सकताहै । नेपाल स्थित अंतर्राष्ट्रीय समेकित पर्वत विकास केंद्र (आईसीआईएमओडी) एवं जलवायु परिवर्तन हेतु अंतर्सरकार पेनल ने भी स्वीकार किया है कि जलवायु परिवर्तन से पर्वतीय व ऊष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में अत्यधिक तूफान और बाढ़ की स्थिति निर्मित होगी। हिमालय के हिमखंडो पर अपनी रिपोर्ट में आईसीआईएमओडी ने कहा है कि सन् २१०० तक भारतीय उप महाद्वीप के तापमान में ३.५ सेल्सियस से लेकर ५.५ सल्सियस तक की वृद्धि संभावित है । तिब्बत के पठारोंमें तो तापमान में और भी अधिक वृद्धि की आशंका जताई गई है । जलवायु परिवर्तन न्यूनतम व अधिकतम दोनों ही तापमानों को प्रभावित करेगा जिसके परिणामस्वरूप वर्षा और तूफान दोनों ही अधिक तीव्रता लिए हुए होंगे । इन भारी तूफानों ओर बाढ़ से न केवल इन जलविद्युत परियोजना के आर्थिक लाभ पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा बल्कि कांक्रीट के इन पहाड़ों की सुरक्षा भी खतरे में पड़ा जाएगी । हिमखंडो से बनी हुई इन झीलों का एकाएक फट जाना भी इन प्रस्तावित बांधों और अंतत: हिमालय की नदियों और निवासियों के लिए बड़ा खतरा है । हिमखंड झीलों का फटना एक नई स्थिति है । हिमालय के अत्यधिक ऊँचाई वाले क्षेत्र के हिमखंड पिघलने के बाद बरफ ओर चट्टानों के इन अस्थायी बांधों के पीछे बड़ी झीलों का निर्माण हो जाएगा । बर्फ बने इन बांधों के ढहने से लाखों लिटर पानी एकाएक छूटेगा जिससे बड़े पैमाने पर बाढ़ की संभावनाएं पैदा होंगी । सन् १९८५ में नेपाल के माउंट एवरेस्ट के पास स्थित दि डिग तोशो हिमझील के ढहने से ५ व्यक्तियों की मृत्यु हो गई थी । इसके अलावा एक जलविद्युत केन्द्र, हजारों एकड़ उपजाऊ भूमि और १४ पुल भी नष्ट हो गए थे । भूटान के भू-विज्ञान और खनन विभाग के येशी डोरजी के अनुसार जनवरी २००९ में भूटान सरकार ने २६०० हिम झीलें चिन्हित की हैं । इनमें से २५ खतरनाक रूप से ढहने के कगार पर है । हिमझीलों के जोखिम के प्रति जागरूक भूटान सरकार अपने पूर्व चेतावनी प्रणाली में सुधार भी कर रही है । वहीं दूसरी और यह देश वर्तमान में भरत के साथ मिलकर इस क्षेत्र में सबसे बड़े बांधों मे से एक ९० मीटर ऊँची ताला परियोजना का निर्माण भी वांगचु नदी पर कर रहाहै । दक्षिण एशिया के एक अरब और लाखों चीनी नागरिक इन हिमालय नदियों पर आश्रित हैं । हम वैश्विक तापमान को नियंत्रित करने वाली इन जीवनरेखाआें के प्रति कोई भविष्यवाणी भी नहीं कर सकते। साथ ही हम यहां मानकर भी नहीं चल सकते कि हिमालय क्षेत्र में बर्फ और हिमखंड इसी तरह हमेशा बने रहेंगे । परंतु हिमालय क्षेत्र के देशों की सरकारें इसकी बावजूद यदि बांधों के निर्माण की अपनी योजना पर कायम रहती हैं तो इसका यही निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि वे इस तथ्य को नकार रहीं है कि बढ़ता वैश्विक तापमान इस क्षेत्र और पृथ्वी ग्रह में परिवर्तन ला रहा है । हिमालय क्षेत्र के देशों के लिए समझदारीपूर्ण निर्णय यही होगा कि वे उपलब्ध जलस्त्रोतों का विकास इस तरह से करें जिससे कि जलवायु परिवर्तन के इस दौर में इस क्षेत्र के निवासियों का जोखिम कम हो सके । परंतु बांध निर्माण की योजनाएं तो इसमें विपरीत है । ***
पाठकों से देश में चुनावों के चलते पत्रिका का अप्रेल अंक समय पर नहीं निकल पाया, उसका हमें खेद हैं । अब यह अप्रेल-मई का संयुक्त पाठकों की सेवा में प्रस्तुत है प्र. संपादक

1 टिप्पणी:

बालसुब्रमण्यम ने कहा…

यह चिंता का विषय तो है ही। पर बिजली के बिना काम भी तो न चलेगा। पनबिजली नहीं तो तापबिजली, जिससे बहुत अधिक कार्बन डाइआक्साइड निकलेगा, जिससे पृथ्वी के गरमाने की समस्या आएगी। परमाणु बिजली एक विकल्प है, पर वह अत्यंत खर्चीली है, और हमारे देश में रेडियोधर्मी खनिज भी ज्यादा नहीं हैं। केवल कोयला है।

खैर, यह सब अत्यंत जटिल समस्याएं हैं।

आपका ब्लोग अच्छा है। आपकी पत्रिका पर्यावरण डाइजेस्ट को भी मैं नियमित रूप से पहले पढ़ता था। आपको याद होगा, इसमें मेरे कई लेख भी छपे हैं, सीईई-एनएफएस के मार्फत।

अब मैं स्वतंत्र लेखन कर रहा हूं। पर्यावरण पर मेरा भी एक ब्लोग है। समय मिले तो अवश्य पधारें। यह रहा पता:-

कुदरतनामा