मंगलवार, 30 नवंबर 2010

१० कविता

हाय रे पानी
प्रेमसिंह

कैसे सोवें, सोने नहीं देता, टूटी छत से टपकता पानी
कैसे जले चुल्हा, दो दिन से नहीं आया नल में पानी

ठौर दूर है, तपती दुपहरिया, पास नहीं है पानी
यूँही प्यास से मरन जाउँ, हाय रे पानी हाय रे पानी

घूंघट मुख पे गिराय,घट मुख में गिराय
गाँव की गोरी नदी की ओर, चली है भरने अनमोल पानी
सोचे जाती जाती, इसी आने जाने में
चली न जाए यूँ ही , अनमोल जवानी
हाय रे पानी हाय रे पानी

पानी भरी है काया, या फिर पानी ही है काया
मैं ही तन हूँ, मैं ही मन हूँ , कैसे मुझे बिसराओगे
क्योंकि पानी ही तो जीवन है, तरे दुख दर्द और आप
दूर बहाय पानी, हाय रे हाय रे पानी

निश्चल शरीर के अन्तिम स्पन्दन तक
अधीर बनाता उसकी प्रतिक्षा का धैर्य
दीवाने पन की पराकाष्ठा है यह
या अक्षुण प्रेम की नादानी
लेकिन पपीहे को तो बस चाहिए
स्वाती नक्षत्र की बूँद का पानी
हाय रे पानी हाय रे पानी

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