शुक्रवार, 7 सितंबर, 2007

इस अंक में

पर्यावरण डाइजेस्ट के इस अंक में खेजड़ली के शहीदों को श्रद्धांजलि और दिल्ली में बढ़ती कारों की समस्या पर विशेष सामग्री दी गयी है। पहले लेख आवश्यकता है , राजनैतिक भूमंडलीकरण की में सुप्रसिद्ध पर्यावरणवेत्ता सुश्री सुनीता नारायण लिख रही हैं कि पर्यारवणीय सुधार और विश्व को बचाये रखने के लिये राजनीतिक एकात्मकता की आवश्यकता है । इंदौर के प्रसिद्ध विज्ञान लेखक डॉ. भोलेश्वर दुबे के लेख जीवाश्म - हमारे काल प्रहरी में जीवाश्म के बारे में विस्तार से जानकारी दी गयी है । म.प्र. के वरिष्ठ वन अधिकारी जगदीश प्रसाद शर्मा के लेख शिक्षक का सम्मान, देश का सम्मान में शिक्षा क्षैत्र के महत्वपूर्ण सवालों को उठाया गया है । पर्यावरण विषयों की लेखिका नंदिता छिब्बर ने अपने लेख म.प्र. : कृषि में घटती उत्पादकता में मध्यप्रदेश में खेतों में पोषक तत्वों की कमी की चर्चा की है । दिल्ली की पत्रकार /लेखक सुश्री रेशमा भारती ने अपने लेख जलवायु बदलाव के खतरे और उपाय में जलवायु बदलाव के विकल्पों से उपजे सवालों पर कलम चलायी है । भोपाल के देवेन्द्र थापक के लेख जीवाश्म इंर्धन का संरक्षण और विकल्प में ऊर्जा के नये स्त्रोत तथा नये विकल्पों पर जोर दिया गया है । कविता में इस बार औद्यौगिक विष विज्ञान केंद्र लखनऊ के वैज्ञानिक डॉ. वी.पी. शर्मा /पंकज प्रसून की कविता तृिप्त् देता जल दी गई है । अमृता बलिदान दिवस के अवसर पर डॉ. खुशालसिंह पुरोहित के लेख अमृता देवी और बिश्नोई समाज में इस घटना की विस्तृत जानकारी दी गई है । इसके अलावा युवा वैैज्ञानिक लेखक सुनील के लेख दिल्ली में निजी कारों पर पाबंदी क्यों न हो ? में दिल्ली में बढ़ती कारों की संख्या और इससे प्रभावित होती परिवहन व्यवस्था पर तथ्यात्मक जानकारी दी गई है । पत्रिका स्थायी स्तंभ पर्यावरण परिक्रमा, ज्ञान विज्ञान एवं पर्यावरण समाचार में आप देश दुनिया में पर्यावरण और विज्ञान के क्षेत्र की हलचलों से अवगत होते है। पत्रिका के बारे में आपकी राय से अवगत करायें।
-कुमार सिद्धार्थ

७ आवरण् कथा


जलवायु बदलाव के खतरे और उपाय
सुश्री रेशमा भारती
ब्राजील के नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर रिसर्च की हाल की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत की ओर से हो रही ग्लोबल वॉर्मिंग में १९ फीसदी बड़े बांधों के कारण है । दुनियाभर के बड़े बांधों से हर साल उत्सर्जित होने वाली मिथेन का लगभग २७.८६ प्रतिशत अकेले भारत के बड़े बांधों से होता है, जो अन्य सभी देशों के मुकाबले सर्वाधिक है । हाल ही में संयुक्त राष्ट्र के खाद्य अधिकारों संबंधी एक विशेषज्ञ ने कुछ प्रमुख खाद्य फसलों के जैविक इंर्धन (बायोफ्यूल) हेतु इस्तेमाल पर चिंता व्यक्त करते हुए चेतावनी दी है कि इससे दुनिया में हजारों की तादाद में भूख से मौतें हो सकती हैं । चाहे वह खाद्य फसल हो या अखाद्य खेती में जैव इंर्धन की निर्माण सामग्री उगाने से जैव विविधता, खाद्य सुरक्षा और पर्यावरण को पहुँचते नुकसानों को लेकर दुनिया के कई भागों में चिंता प्रकट होती रही है । ग्लोबल वार्मिंग की गंभीर चुनौती का सामना करने के लिए भारत ऊर्जा के वैकल्पिक स्त्रोतों की दिशा में अग्रसर है। पर उसे यह भी समझना होगा कि विकल्पों की भी अपनी सीमाएं हैं और उनको बहुत बड़े पैमाने पर अंधाधुंध अपनाने से कई समस्याएं भी उत्पन्न हो सकती हैं । चाहे वह टिहरी बांध हो या सरदार सरोवर बांध या अन्य बड़ी पन बिजली योजनाएं हों बड़े स्तर के विस्थापन, आजीविकाआे के नष्ट होने, मुआवजे या पुनर्वास की आस में दर-दर भटकने की त्रासदी तो सामने है ही साथ ही डूब क्षेत्र की चपेट में आयी अमूल्य प्राकृतिक विरासत-वन, वनस्पति, अन्य जीव भी हम खोते रहे हैं । प्राय: बड़े बांधों की उपयोगिता और कार्य क्षमता समय के साथ तब जाती रहती है, जब जलाशय में गाद भरती जाती है और तब बांध गैर-टिकाऊ व महंगा सौदा साबित होता है । भूकंप व भूस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदाआें की संभावना और विनाशक क्षमता बढ़ाने में भी बड़े बांधो की भूमिका मानी गई है । जैसा कि पिछले कुछ समय में हमारे देश के कई भागों में घटा हैं बड़े बांध विनाशकारी बाढ़ लाने वाले साबित हुए हैं ! बिजली उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए कई बार बांधों के जलाशय में सामान्य से अधिक जल भर लिया जाता है । ऐसे में बारिश आने पर जलाशय में क्षमता से अधिक पानी हो जाता है । बांध को टूटने से बचाने के लिए तब अचानक तेजी से बहुत मात्रा में पानी छोड़ा जाता है, जो विनाशकारी बाढ़ ले आता है । बदलती जलवायु और सिकुड़ते ग्लेशियर नदी और अंतत: बांध के भावी अस्तित्व पर सहज ही प्रश्नचिह्न् लगाते हैं। डूब क्षेत्र की चपेट में आए और जलाशय में बहकर आए जैविक पदार्थ जब सड़ते है, तो जलाशय की सतह से मिथेन, कार्बन डायॉक्साइड जैसी कई ग्रीनहाऊस गैसें उत्सर्जित होती हैं । पनबिजली निर्माण प्रक्रिया में जलाशय का ग्रीन हाऊस गैस युक्त जल जब टरबाइन या स्पिलवे पर गिरता है तो भी ऐसी गैसे वातावरण में छूटती हैं । बड़ी पनबिजली योजनाआे से आम लोगों की अपेक्षा बड़े औद्योगिक लाभ अधिक सिद्ध होते हैं । सरदार सरोवर प्रोजेक्ट की कच्छ (गुजरात) के सूखा प्रभावित क्षेत्र के संदर्भ में भूमिका बताती कैग (दी कन्ट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल ऑफ इण्डिया) की रिपोर्ट कहती है `औद्योगिक इस्तेमाल के लिए पानी की अधिक खपत होगी । घरेलू जरूरतों के लिए पानी की उपलब्धता इससे कम होगी। वर्ष २०२१ तक इससे कच्छ जिले के लोगों की पेयजल उपलब्धता पर प्रतिकूल असर पड़ेगा ।' सौर ऊर्जा और पवन ऊर्जा, ऊर्जा के बेहतरीन विकल्प माने गए हैं । राजस्थान में इन दोनों विकल्पों के अच्छे मानक स्थापित हुए हैं । सोलर लैम्प, सोलर कुकर जैसे कुछ उपकरण प्राय: लोकप्रिय रहे हैं। पर यदि ऊर्जा की बढ़ती असीमित मांगों के लिए इन दोनों विकल्पों का दोहन हो और बहुत बड़े पैमाने के प्लांट लगाए जाएं तो कोई गारंटी नहीं की इनमें भी समस्याएं उत्पन्न न हों । एशियन डेवलपमेंट बैंक के साथ मिलकर टाटा पॉवर कंपनी लिमिटेड देश में (विशेषकर महाराष्ट्र में) कई करोड़ों रूपये के बड़े पवन ऊर्जा प्लांट लगाने की योजना बना रही है । इसी तरह से दिल्ली सरकार भी ऐसी कुछ निजी कंपनियों की ओर ताक रही हैं जो राजस्थान में पैदा होती पवन ऊर्जा दिल्ली पहुंचा सकें । परमाणु ऊर्जा के निमा्रण से पैदा होते परमाणु कचरे में प्लूटोनियम जैसे ऐसे रेडियोएक्टिव तत्वों का यह प्रदूषण पर्यावरण में भी फैल सकता है और भूमिगत जल में भी । परमाणु ऊर्जा संयंत्रों में दुर्घटना व चोरी की संभावना भी मौजूद रहती है । आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के एक प्रमुख अनुसंधान समूह ने कहा है कि विश्वभर में परमाणु ऊर्जा के विस्तार से कार्बन उत्सर्जन में इतनी कमी की संभावना नहीं जितना कि इससे दुनिया में परमाणु हथियारों के बढ़ने का खतरा मौजूद हैं । भारत-अमरीकी परमाणु संधि ने यूरेनियम के खर्चीले आयात का भावी बोझ भारत के कंधों पर लादा है और भविष्य में परमाणु संयंत्र लगाने मे काफी जमीन की खपत की समस्या पैदा की है। इसके अतिरिक्त अमरीका में पहले इस्तेमाल हो चुके परमाणु इंर्धन की भी रिप्रोसैसिंग भारत के लिए कितनी सुरक्षित होगी, यह भी विवादास्पद हैं । पौधों से बने इंर्धन या बायोफ्यूल का स्वच्छ या ग्रीन इंर्धन के रूप में दुनियाभर में प्रचार-प्रसार हो रहा है । विकसित देशों की कई कंपनियाँ विकासशील देशें में उपलब्ध भूमि, सस्ते श्रम व पर्यावरण नियमों में ढिलाई के मद्देनजर बायोइंर्धन के पौधे उगाने में यहां निवेश कर रही हैं । भारत में छत्तीसगढ़, राजस्थान जैसे राज्यों में लाखों हैक्टेयर भूमि रतनजोत (जैट्रोफा) के उत्पादन के लिए कंपनियों को दी जा रही है । प्रमुख खाद्य फसलों जैसे मक्का, सोयाबीन या खाद्य तेलों रेपसीड, पाम ऑयल का उपयोग यदि इंर्धन उगाने के लिए होगा; तो खाद्य उपयोग खाद्य फसलों से अधिक उगाने के लिए होगा तो भी खाद्य संकट पैदा होगा । खाद्य सुरक्षा के लिए यह एक प्रमुख चुनौती माना जा रहा हैं । बायोइंर्धन प्राय: इतनी ऊर्जा देता नहीं जितनी ऊर्जा (जीवाश्म इंर्धन की) इसके निर्माण व ट्रांसपोर्ट में लग जाती है। इस प्रक्रिया में ग्रीन हाऊस गैस उत्सर्जन भी कम नहीं होता । इसके ग्रीन या क्लीन इंर्धन के रूप में औचित्य पर ही सवाल उठ जाता है । इंर्धन की बढ़ती मांग के मद्देनजर बायोफ्यूल की खेती भी सुविधानुसार मोनोलक्चर वाली, रसायनों वाली और जेनेटिकली मॉडिफाइड बीजों की हो रही हैं । इससे स्थानीय फसलों, वनस्पतियों समेत पर्यावरण के लिए गंभीर खतरे पैदा होते हैं । बड़े पैमाने पर वनभूमि का इस्तेमाल भी बायोइंर्धन लगाने के लिए हो रहा है । जैसे इंडोनेशिया, मलेशिया में पाम ऑयल प्लांटेंशन के विस्तार के लिए बड़े पैमाने पर वनों की बलि दी जा रही है । यह जैव विविधता के लिए खतरा तो है ही; साथ ही वनों की ग्लोबल वॉर्मिंग को नियंत्रण में रखने की क्षमता की भी उपेक्षा कर रहा है । वनों पर निर्भर समुदाय अपने परम्परागत अधिकारों से भी वंचित हो रहे हैं, उजड़ रहे हैं । उल्लेखनीय है कि हमारे देश में राजस्थान में कुछ वनभूमि भी जैट्रोफा की खेती के विस्तार हेतु दी जानी तय हुई है ! राजस्थान में लगभग समूची बंजर या परत भूमि रतनजोत की खेती के लिए कंपनियों को लीज पर दी जा रही है । यह बंजर भूमि दरअसल यहां के आम लोगों के लिए कतई बेकार नहीं है। काफी कुछ पशुपालन पर निर्भर ग्रामीण समुदायों के लिए यही भूमि चारे का स्त्रोत है । जलाऊ लकड़ी इसी से मिलती है और गांव की अन्य सामूहिक जरूरतें भी पूरी होती हैं । ऐसी ३०% भूमि पर उगी झाड़ियों पर भेड़, बकरी, ऊंट आदि पशु निर्भर करते हैं । बायोइंर्धन उत्पादन को तेजी से बढ़ाने के उद्देश्य से इसमें जेनेटिकली मॉडिफाइड बीजों की खेती को बढ़ावा मिल रहा है जिसके पर्यावरण, स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभावों संबंधी वैज्ञानिक चेतावनियां भी दी जाती रही हैं । दरअसल जब तक ऊर्जा और इंर्धन की निरंतर बढ़ती मांगों को नियंत्रित नहीं किया जाएगा; तब तक विकल्पों पर भी दबाव पड़कर समस्याएं उपजती ही रहेंगी । स्थानीय स्तर पर सीमित व बुनियादी जरूरतों की पूर्ति में ये वैकल्पिक स्त्रोत अपना कमाल दिखा सकते है; पर इनका अंधाधुंध विस्तार पर्यावरण समाज व अर्थव्यवस्था में अस्थिरता ही अधिक पैदा करता है । ***







संपादकीय

जंतुऔ को परीक्षण से राहत मिलेगी
हम जिन सौंदर्य प्रसाधनों का उपयोग करते है, उनकी जांच के लिए हजारों खरगोश और चूहों को यातनाएं झेलनी पड़ती है । अब उन्हें इससे थोड़ी राहत मिली है। आम तौर पर सौंदर्य प्रसाधन कम्पनियां यह जांचने के लिए इन जंतुआे का उपयोग करती हैं कि उनके द्वारा बनाए गए प्रसाधन कहीं आंखों में जलन या चमड़ी पर एलर्जी तो पैदा नहीं करते हैं । कोई नई सामग्री बाज़ार में उतारने से पहले ऐसी जांच की जाती है । अलबत्ता इसी वर्ष से यूरोप में इनमें से कई परीक्षणों पर प्रतिबंध लगा दिया गया है । वैकल्पिक विधियों के प्रमाणीकरण के लिए इटली मेंएक केंद्र है । इस केंद्र ने पांच परीक्षणों के विकल्प सुझाए हैं और विकल्प उपलब्ध हो जाने पर पूर्व में की जाने वाली जांच पर प्रतिबंध लगा दिया गया है । केंद्र ने जो वैकल्पिक परीक्षण सुझाए हैं उनमें से दो ऐसे हैं जिनके लिए जीवित जंतु की बजाए बूचड़खाने से प्राप्त् ऊतक से काम चल जाएगा । ये परीक्षण उन रसायनों के लिए हैं जिनमें आंखों में जलन पैदा करने वाले रसायनों की जांच की जाती है । दो ऐसे वैकल्पिक परीक्षण सुझाए गए हैं जिनमें प्रयोगशाला में संवर्धित कोशिकाआे से काम चलाया जा सकेगा । ये मूलत: त्वचा को उत्तेजित करने वाले रसायनों के लिए हैं । यूरोप में हर साल २०,००० जंतुआे पर ये परीक्षण किए जाते थे । एक अन्य परीक्षण एलर्जी से संबंधित था । इसका विकल्प मिल जाने से भी हजारों जंतु बच जाएेंगें । वैसे तो उपरोक्त पांचों वैकल्पिक परीक्षण बरसों से उपलब्ध रहे हैं मगर कम्पनियां इनका उपयोग नही करती थीं क्योंकि इनका प्रमाणीकरण नही हुआ था । दरअसल इटली के उक्त केंद्र ने प्रयोग करके प्रमाणित कर दिया है कि ये वैकल्पिक परीक्षण पूर्व के परीक्षणों से बेहतर ही हैं । आम तौर पर वैज्ञानिक समुदाय में जीवित जंतुआे पर प्रयोग करने के मामले में जागरूकता बढ़ रही है और इसी के परिणाम स्वरूप विकल्पों की खोज में तेजी आई है । वैसे अभी भी स्थिति यह है कि कम्पनियों को कुछ ऐसे परीक्षण करने की छूट रहेगी । मगर यूरोपीय संघ ने तय किया है कि विकल्प हों या न हों, वर्ष २००९ तक ऐसे सारे परीक्षण बंद कर दिए जाएेगें ।

प्रसंगवश

सन् २०२५ तक चाँद पर इंसान भेजेगा रूस
रूस २०२५ तक चाँद पर इंसान उतारने की योजना बना रहा है । इसके तुरंत बाद उसका इरादा वहां स्थायी बेस बनाने का भी है । गौरतलब है कि अभी तक एक बार ही इंसान चाँद पर उतरा है , वह था नासा का १९६८ में किया गया अपोलो अभियान। रूसी स्पेस एजेंसी रॉसकॉसमॉस ने आगामी ३ दशकों की अपनी योजनाआे की जानकारी दी । स्पेस एजेंसी के प्रमुख अनातोली परमिनोव ने योजनाआें का जिक्र करतेहुए कहा कि अनुमान है कि हम २०२५ तक चाँद पर इंसान भेजने के लिए तैयार होंगें । इतना ही नहंी २०२७ से २०३२ के बीच हम वहाँ अंतरिक्ष यात्रियों के रहने के लिए स्टेशन भी बना सकेंगें । श्री परमिनोव ने यह भी साफ किया कि अमेरिकी स्पेस प्रोग्राम को होने वाली फंडिंग की तुलना में हमें १० फीसदी से भी कम मिलता है, फिर भी हमारे इरादे बुलंद है । हम अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (आईएसएस) में अपने हिस्से के सेक्शन का काम हर हाल में २०१५ तक पूरा कर लेंगें, जिससे कि स्टेशन पूरी तरह काम कर सके। इसके अलावा स्पेस स्टेशन तक लोगों और सामान को ले जाने में इस्तेमाल होने वाले सोयूज स्पेसक्राप्ट में भी बड़े बदलाव की योजना है । इसे और हाईटेक किया जाएगा । चंद्र अभियान के बाद हमारा जोर मंगल पर होगा । हमें उम्मीद है कि २०३५ के बाद हम वहाँ भी इंसान भेजने में सक्षम होगें । उनके मुताबिक, ग्रहों का बहुत मुश्किल वातावरण भविष्य के अभियानों के लिए सबसे बड़ी चुनौती है । हालिया स्पेसक्रॉप्ट भी अभियानों के बाद धरती की और लौटने के लिए अंतरिक्ष यात्रियों की जरूरत के मुताबिक सुरक्षा में सक्षम नहीं हैं । इन यानों में स्टोरेज स्पेस की कमी और अंतरिक्ष यात्रियों में तनाव जैसी मुश्किलें अलग हैं । इन सभी समस्याआे को ध्यान में रखकर तैयारी की जा रही है । ***

१ सामयिक

आवश्यकता है राजनैतिक भूमण्डलीकरण की
सुश्री सुनीता नारायण
दुनिया एक दूसरे से जुड़ी हुई अवश्य है पर यह 'एक' नहीं है । हम सबके लिए एक सुरक्षित भविष्य को बनाने में पूर्णत: असफल सिद्ध हुए हैं । सरकारों द्वारा मौसम से लेकर जैविक प्रदूषण तक बहुपक्षीय पर्यावरणीय समझौतों पर सहमति बनाने हेतु लाखों-लाख घंटे लगा देने के बावजूद विश्व इस मसले पर आज और भी अधिक विभाजित होने के साथ ही साथ अत्यधिक पर्यावरणीय विनाश के दौर से गुजर रहा है । आज यह अपनी यात्रा के प्रारंभ की बनिस्बत अधिक खतरनाक हो गया है । यहां समय है पीछे मुड़कर अपनी दिश का पुन: निर्धारण करने का, जिससे कि हम वास्तव में परिवर्तन ला सकें । गत १५ वर्षोंा में सरकारों के बीच अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरणीय संधियों के निर्माण से संबंधित संवादों में इजाफा हुआ है । यह पारिस्थितिकीय वैश्वीकरण वर्तमान आर्थिक विकास का नतीजा है । आधुनिक आर्थिक वैश्वीकरण जो न केवल दुनिया के अर्थतंत्र को एक साथ जोड़ता है बल्कि पारिथतिकीय तंत्र को नुकसान पहँुचाने की हद तक उत्पाद और उपभोग को बढ़ावा देता है । यह आर्थिक ढांचा अत्यधिक भौतिकवादी और ऊर्जा दोहक है । इसके अंतर्गत भारी मात्रा में प्राकृतिक संसाधनों का व्यय एवं अपव्यय होता है । जो अपने पीछे बेहद विषैला, अवनत और परिवर्तित पारिस्थितिक तंत्र छोड़ जाता है । उत्पाद और उपभोग की नई ऊँचाईयां इस पारिथतिकीय वैश्वीकरण को जन्म देती है। होता यह है कि लोग अपने देश में जो भी करते हें उसका व्यापक असर उनके पड़ौसी देश या शेष दुनिया पर भी पड़ता है । पहले कभी भी इंसान को 'जीने' के लिए इतना कुछ सीखने की जरूरत नहीं पड़ी, जितनी कि आज है । समस्या यह है कि उपरोक्त वैश्वीकरण की दोनों धाराएं किसी भी तरह से राजनैतिक वैश्वीकरण के साथ नहीं चलती है । इसका अर्थ यह निकलता है कि हमारे पास ऐसी कोई प्रक्रिया उपलब्ध नहीं है जो इस उभरते वैश्विक बाजार और वैश्विक पारिथतिकीय नीतियों को व्यापक जनहित के प्रति अच्छे मूल्यों, समानता व न्याय के आधार पर प्रतिबंधित कर सके । इतना ही नहीं दुनिया में चंद सरकारें ही इन मुद्दों को अपने राजनैतिक एजेण्डे में शामिल करती हैं । हमें भलीभांति पता है कि इस विश्वव्यापी तापक्रम में वृद्धि से पृथ्वी बद से बद्तर स्थिति में पहँुच रही है । इस बात के सबूत मिले हैं कि वातावरण में बदलाव सभी देशों खासकर गरीब देशों के लिए तकलीफदायक होगा । अंतत: पूरी दुनिया को इसकी कीमत तो चुकानी ही पड़ेगी । आज हम उत्सर्जन की दर को कम करने में जितना खर्च करेंगे वह भविष्य में प्रलय की परिस्थिति में चुकाई जाने वाली कीमत की तुलना में काफी कम होगा । दुनिया में बढ़ता तापमान संभवत: अब तक का सबसे बड़ा और जटिल मुद्दा है, जिससे कि पूरी दुनिया को जुझना है । सर्वप्रथम कार्बन डाईऑक्साइड का उत्सर्जन सीधे-सीधे आर्थिक विकास से जुड़ा है । अत: यह तथाकथित विकास भी खतरे में है । हमें पुन: खोजना होगा कि हम क्या करें और कैसे करें ? इसमें लागत तो आएगी पर वह भविष्य में खर्च की जाने वाली पूंजी का नाम मात्र ही होगी । दूसरा मुद्दा है वर्तमान में बढ़ रही समृद्धि की व्यक्तियों और राष्ट्रों के बीच हिस्सेदारी का । विश्वव्यापी आर्थिक समृद्धि काफी असंतुलित है और इसी तरह ग्रीन हाऊस गैसों का उत्सर्जन भी असमान है । अहम सवाल यह है कि विश्व अपने उत्सर्जन (प्रदूषण) के अधिकार का बटवारा किस प्रकार करेगा। क्योंकि इसमें बहुत असमानताएं हैं । सवाल यह है कि अमीर देश जिन्होंने ढेर सारा 'प्राकृतिक कर्ज' समेट लिया है और जो साझा संसाधनों से अपने लिए अत्यधिक बटोर रहे हैं किस प्रकार इसका पुनर्भुगतान कर पाएंगे जिससे कि गरीब देश इस पर्यावरणीय क्षेत्र का उपयोग कर पाएं । तीसरा मुद्दा पर्यावरण में बदलाव के संबंध में अंतर्राष्ट्रीय तालमेल का है। यह कुछ और दर्शाए या न दर्शाए इतना जरूर सिखाता है कि दुनिया एक है। यदि अमीर दुनिया कल आवश्यकता से अधिक कार्बन डाईऑक्साइड का उत्सर्जन करती थी तो आज की उभरती अमीर दुनिया भी वैसा ही करेगी । इतना तो समझ आता है कि इस पर नियंत्रण स्थापित करने का एक रास्ता यह होगा कि इसके लिए बनने वाले अनुबंधों में निष्पक्षता व समानता हो ताकि यह अब तक का विश्व का सबसे बड़ा सरकारी उद्यम साबित हो सके । हमें इस पर्यावरणीय बदलाव को टालने के लिए क्या करना चाहिए ? सर्वप्रथम हमें यह स्वीकारना होगा कि आज विश्व को 'क्योटो संधि' से भी आगे जाने की आवश्यकता है । सभी राष्ट्रों को इस अनुबंध पर पुन: संवाद करना होगा । परन्तु इस बार यह अनुबंध राजनैतिक होना चाहिए । यह कार्य प्राथमिकता से होना आवश्यक है क्योंकि दुनिया आज प्रलय के कगार पर खड़ी है। सीधे-सीधे शब्दों में कहें तो यह वर्तमान क्योटो संधि जैसा कमजोर व कायरतापूर्ण न हो और ना ही उत्सर्जन को कम करने के लिए १५ वर्ष का समय मांगे । यह तो साफ है कि अमीर एवं उभरते सम्पन्न विश्व को कम और किफायत से कार्बन के उपभोग की तरफ अग्रसर करने की आवश्यकता है । इसी के साथ यह भी उतना ही स्पष्ट है कि भविष्य में हमें जिस तरह की तकनीक की आवश्यकता होगी वह आज भी हमारे पास है । यहां नई शोधों को रोकने की बात नहीं है वरन वर्तमान उपलब्ध तकनीक को ही ज्यादा दक्षता और किफायत से इस्तेमाल करने की जरूरत है । हमें उर्जा दोहन और उससे उत्पाद निर्माण में दक्षता बढ़ानी होगी । यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि हम किस तरह का परिवर्तन लाना चाहते हैं । यह हमारे शहरों की परिवहन नीतियों से लेकर वहां के प्रत्येक क्षेत्र पर लागू होना चाहिए। यह भी स्पष्ट है कि उभरते राष्ट्र चीन, भारत व अन्य पहले से ही उपलब्ध सीमित साधनों की सहायता से तुलनात्मक रूप से औद्योगिक विश्व के बजाय प्रति इकाई उत्पादन में किफायत दिखा रहे हैं । अतएव वे अपनी कार्यकुशलता के बदले क्षतिपूर्ति के रूप में कुछ न कुछ मुआवजा तो चाहेंगे ही । अंत में पर्यावरण में बदलाव सचमुच वैश्वीकृत है । यह विश्व को एक साथ आने के लिए दबाव डालता है । यह सिर्फ थोड़े से फायदे के लिए नहीं वरन लंबे समय के लिए सभी पर आर्थिक एवं पारिस्थितिकीय लाभ के लिए दबाव डालता हैं । अब यह हम पर है कि इस चुनौती को स्वीकारते हैं या नहीं ।***

२ हमारा भूमण्डल

जीवाश्म : हमारे काल प्रहरी
डॉ. भोलेश्वर दुबे
हमारा भू-मण्डल कल्पनातीत लम्बा सफर तय करते हुए वर्तमान स्वरूप में पहुंचा है । पृथ्वी पर कई भूगर्भीय और वातावरणीय परिवर्तन हुए । प्राणियों और वनस्पतियों के कई साम्राज्य विकसित और विलुप्त् हुए । पृथ्वी और जीवन की विकास कथा के अनेक पात्र आज भी धरती के गर्भ से पुरातन घटनाआे की कथा बयान कर रहे हैं । समय के ये साक्षी और कोई नहीं, जीवाश्म ही हैं । जीवाश्म के लिए अंग्रेज़ी में फॉसिल शब्द का उपयोग होता है जिसका उद्गम लेटिन शब्द फॉसिलियम से हुआ है। इसका अर्थ ज़मीन की सतह के नीचे से खोदना है । अट्ठारवीं शताब्दी तक जीवाश्म से तात्पर्य अतीत के बड़े जीवों की अस्थियों, कवच, पत्तियों, लकड़ी आदि के रूप में प्राप्त् अवशेष तक सीमित रहा। आगे चलकर सूक्ष्मजीवों के भी जीवाश्म खोज निकाले गए । समय के साथ पृथ्वी पर वनस्पतियों और प्राणियों के अनुक्रमण और विलुप्त् प्रजातियों की जानकारी हमें जीवाश्मों से ही प्राप्त् होती हैं । भौतिक शास्त्र के अनुसार किसी भी वस्तु का अध्ययन चार आयामों - लंबाई, चौड़ाई, ऊंचाई और समय के आधार पर किया जा सकता है । जीवाश्म चारों आयामों को व्यक्त करते हैं । जिस चट्टान में ये उपलब्ध हैं उसकी लम्बाई चौड़ाई, ऊंचाई और उसकी तत्कालीन काल गणना । अध्ययन क्षेत्र के आधार पर समय मापन की सीमाएं घटती बढ़ती रहती हैं । दैनिक जीवन में वर्ष, माह, दिन , मिनट और सेकण्ड के रूप में इसकी गणना करते हैं । यदि हमें पृथ्वी की आयु का आकलन या पृथ्वी पर जीवन के उद्भव काल की गणना करनी हो तो हमें करोड़ों वर्ष पीछे जाना होता है । यह समय न केवल हमारे जीवन काल से वरन कई पीढ़ियों के जीवन काल से भी कई गुना अधिक हैं । अत: इस प्रकार के समय निर्धारण की विधि को जियोलॉजिकल टाइम या भौमिकीय समय कहा जाता है । इतिहासकार जहाँ कुछ हजार वर्षो की घटनाआे का वर्णन करते हैं वहीं पुरावैज्ञानिक भौमिकीय समय सारणी के आधार पर करोड़ों वर्ष पूर्व की जानकारी देते हैं । खगोल वैज्ञानिक तो इनसे भी आगे हैं । वे ब्रह्मांड की उत्पत्ति का समय दस से बीस अरब वर्ष पूर्व बताते हैं ।

अत: समय का मान स्थिति के आधार पर सेकण्ड से लगाकर अरबों वर्ष तक फैला हुआ हैं । पृथ्वी की उम्र लगभग चार अरब वर्ष मानी जाती हैं । उस काल की कोई चट्टान उपलब्ध नहीं है । सबसे पुरातन चट्टान ३.८ अरब वर्ष पुरानी है और जीवाश्म २.५ अरब वर्ष पुराने प्राप्त् हुए है । अत:इस कालावधि में ही पृथ्वी पर जीवन का आरंभ माना जाता हैं । पृथ्वी की उम्र ज्ञात करने के लिए वैज्ञानिक अनेक विधियां अपनाते हैं । इनमें भूमि की विभिन्न गहराइयों के तापमान तथा चालकता में परिवर्तन, नदियों तथा समुद्री जल में घुलित लवणों के आयनों का मापन प्रमुख रही हैं किन्तु इन विधियों से सही उम्र ज्ञात न हो सकी । इस समस्या का सर्वमान्य हल १९९६ में रेडियोधर्मिता की खोज के बाद ही संभव हो सका । इस विधि में कार्बन, यूरेनियम तथा सीसे के आइसोटोप के द्वारा चट्टान व जीवाष्म की उम्र ज्ञात की जाती हैं । जीवाश्म प्राय: तलछटी एवं आग्नेय चट्टानों में पाए जाते हैं । तलछटी चट्टानों की परतों के बीच व ज्वालामुखी के लावा के बहाव में जैविक संरचनाआे के दबने से ये जीवाश्म बनें । चट्टानों के प्रकार व इनके प्रािप्त् स्थल के आधार पर भौमिकीय समय सारिणी में कई नाकरण किए गए हैं । जैसे इंग्लैण्ड व फ्रांस में खड़िया की बड़ी तलछटी चट्टानों को क्रिटेशियस कहा जाता है । कोयले वाली चट्टानें, जिनमें एक मोटाई पर बलुआ पत्थर और चूने की पर्त भी पाई जाती हैं, को कार्बोनिफेरस कहा जाता है । सन् १९६० में भौमिकीय समय सारणी को तीन बड़े काल खण्डों में विभाजित किया गया :-पैलियोजोइक ५७.० करोड़ वर्ष पूर्व प्रारंभमीसोजोइक २२.५ करोड़ वर्ष पूर्व प्रारंभसीनोजोइक ६.५ करोड़ वर्ष पूर्व प्रारंभ वैसे उक्त तीना महाकल्पों के अतिरिक्त एक और महाकल्प माना जाता है जिसे अर्कियोजोइक काल कहते हैं। यह ९०.० करोड़ वर्ष पूर्व माना जाता है जो जीवन विहीन रहा । इन कालखंडों को आगे कल्प और युगों में बांटा गया हैं । जैसे पैलियोजोइक महाकल्प के युग हैं कैम्ब्रियन, ऑरडोविसियन, सिलुरियन, डेवोनिन, कार्बोनिफेरस तथा पर्मियन । प्रत्येक युग में विशेष प्रकार के प्राणी और वनस्पतियों का बाहुल्य रहा जो उस काल की पहचान बनें । मीसोजोइक महाकल्प के जुरासिक युग में वृक्ष फर्न, साइकेड्स, गिन्कगो आदि वनस्पतियों बहुतायत में थी तथा पुष्पीय पौधों का आरंभ हुआ था । इसी काल में प्राणियों में भीमकाय डायनासौर का अस्तित्व रहा जो इस का की पहचान बनें। किसी भी जीवन का जीवाश्मीकरण होना अत्यंत दुर्लभ घटना है । जीवाश्मीकरण के लिए जीव के शरीर में आसानी से विघटित न होने वाले कठोर भाग सहायक होते हैं । रीढ़धारी प्राणियों की अस्थियां और दांत, रीढ़विहीन प्राणियों के बाह्य कवच, पौधों के काष्ठीय भाग व सैलुलोज युक्त पत्तियां आसानी से परिरक्षित हो जाते हैं । कुछ कोमल शरीर वाले रीढ़विहीन प्राणियों, शैवाल, ब्रायोफाइट और जीवाणुआें के भी जीवाश्म उपलब्ध हैं । जीवाश्मीकरण में जीव की शरीर रचना के साथ-साथ वे पर्यावरणीय परिस्थितियां भी महत्वपूर्ण होती हैं जो उस भाग को सड़ने से बचाए और संरक्षित करें । जीवाश्मीकरण के लिए जीव का जमीन में दबना आवश्यक है । इस पर तलछट की परतें क्रमश: जमने लगती हैं। दबने पर मृत शरीर से पानी भी निकल जाता हैं और ऑक्सीजन का भी अभाव हो जाता हैं । ऐसी स्थिति में विघटनकारी जीवाणु और फफूंद सक्रिय नहीं रह पाते। जीव का मृत शरीर जितना जल्दी जमीन में दबता है उतनी ही उसकी जीवाश्म बनने की संभावना अधिक होती हैं । जीवाश्म अक्सर समु्रंद तल, झीलों की गाद, नदियों के मुहानों पर अधिक बनते हैं क्योंकि वहां की परिस्थिति जीवाश्मीकरण के लिए उपयुक्त होती हैं । जीव के प्रकार और पारिस्थितियों के आधार पर कई प्रकार के जीवाश्म पाए जाते हैं । इनमें से प्रमुख हैं: संपीड़क जीवाश्म जो पौधों या अन्य जीवों के तलछट में दबने से बनते हैं । अत: ये चपटे होते हैं । अश्मीभूताश्म या पेट्रिफिकेशन में जीव के भाग की आन्तरिक व ब्राह्य संरचना परिरक्षित रहती हैं । मुद्राश्म में जीवों के अंगों की छाप पाई जाती हैं। जीवाश्म न केवल विगत काल के जीवों से हमारा परिचय कराते हैं अपितु उस समय की पर्यावरणीय स्थितियों का भी लेखा जोखा प्रस्तुत करते हैं । दीर्घकाल से घटित हो रही घटनाआें के विश्वसनीय प्रमाण हैं ये जीवाश्म जो आने वाली पीढ़ियों को आज की स्थिति से अवगत करवाएंगे ।

३ शिक्षक दिवस पर विशेष

शिक्षक का सम्मान, देश का सम्मान
जगदीश प्रसाद शर्मा
देश का हर नागरिक, चाहे वह जनप्रतिनिधि हो या जनसेवक, शहरी हो या देहाती मजदूर हो या मालिक, यह चाहता है कि उसके बच्च्े को अच्छी शिक्षा मिलें। इसके लिए सभी माँ-बाप अपने बच्चें को अपनी क्षमता के अनुसार अच्छे से अच्छे विद्यालय एवं महाविद्यालय में पढ़ाने का प्रयास करते हैं । इस समय देश में लगभग हर गाँव में विद्यालय संचालित हैं । शासकीय पाठशालाआे के अतिरिक्त निजी विद्यालयों एवं महाविद्यालयों की भी भरमार हो गई है । निजी शैक्षणिक संस्थाआे में अधिकतर अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाई होती हैं । निजी शिक्षण संस्थाआे में कुछ तो काफी महंगे हैं । अच्छे शिक्षकों की पदस्थिति एवं उपस्थिति के माध्यम से अच्छी पढ़ाई ही पहले शिक्षण संस्थाआे के अच्छे होने का मापदण्ड होता था, लेकिन आजकल रहन-सहन के तौर-तरीके, पहनावा तथा अन्य गतिविधियों को ज्यादा महत्व दिया जाता है । इस कारण आजकल इन सभी को सम्मिलित करते हुए जो शिक्षण संस्थाएँ संचालित हैं, वे काफी मंहगी हो गई है और ऐसे महंगे विद्यालयों एवं महाविद्यालयों को लोग उत्तम श्रेणी में गिनने लगे हैं, जो आम आदमी की पहुंच से दूर हैं । पुराने जमाने में, यहाँ तक की आज से ४०-५० वर्ष पूर्व तक, पढ़ाना एक सम्मानजनक पेशा माना जाता था । शायद यही कारण है कि पहले अपने विषय के अच्छे ज्ञाता, शिक्षण क्षेत्र में होते थे तथा बच्चें को मन लगाकर पढ़ाते थे । छात्र और अभिभावक भी अध्यापकों का पूरा- पूरा ख्याल रखते थे और उन्हें सर्वाधिक सम्मान देते थे । पाठशालाआें में पढ़ने- पढ़ाने का निर्धारित समय समाप्त् होने के पश्चात अथवा अवकाश के दिनों में जब अध्यापक गाँव अथवा शहर की ओर निकलते थे, तो उनके विद्यार्थी सम्मान की भावना के कारण उनके सामने नहीं आते थे । अगर कोई बच्च खेल रहा हो और अध्यापक को आते देख लेता था, तो वह भागकर कहीं छुप जाता था या फिर घर जाकर पढ़ने लग जाता था । अभिभावक भी अध्यापकों को समय-समय पर अपने घर सम्मान के साथ भोजन के लिए निमंत्रण करते थे तथा उन्हें किसी प्रकार की समस्या नहीं आने देते थे । प्राचीन भारत में गुरूकुल पद्धति के अंतर्गत विद्यार्थीगुरूजनों का पूरा सम्मान करते थे। जैसे-जैसे भौतिकवाद बढ़ता जा रहा है, वैसे-वैसे अध्यापकों और विद्यार्थियों का यह रिश्ता फीका पड़ता जा रहा है तथा आज शिक्षा व्यवसायीकरण की ओर अग्रसर हैं, जिस कारण पाठशालाआें में पठन-पाठन का स्तर गिरता जा रहा है, जिसकी भरपाई के लिए ट्यूशन और कोचिंग संस्थाएं पूरे देश में अहम भूमिका निभा रही हैं । प्रदेश में जब किसी कार्यक्रम का सर्वेक्षण करना होता है अथवा मतदाता सूची का नवीनीकरण करना होता है, या इस तरह का कोई अन्य कार्य करना होता है, तो बच्चें की पढ़ाई पर प्रतिकूल प्रभाव की परवाह किए बिना सर्वप्रथम अध्यापकों को उस कार्य में झोंक दिया जाता है । मध्यप्रदेश के इंदौर जिले के एक अध्यापक ने इस प्रथा को व्यथित होकर आत्महत्या ही कर ली थी । आज किसी भी गाँव शहर में अध्यापक अथवा प्राध्यापक की उतनी पूँछ-परख नहीं है जितनी की एक पटवारी, नायब तहसीलदार, विकास खण्ड अधिकारी, तहसीलदार, अनुविभागीय अधिकारी अथवा कलेक्टर की है, जबकि इन्हें बनाने वाला अध्यापक ही होता हैं । इस तरह आज के युग में अध्यापक का न तो सम्मान रहा और न ही उसे अन्य शासकीय सेवकों की तुलना में अच्छा वेतनमान मिल रहा है । कुछ निजी शिक्षण संस्थाआें में तो शिक्षकों को दी जाने वाली पगार की हालत यह है कि एक मजदूर भी शिक्षक से ज्यादा पगार पाता है । कुछ महाविद्यालयों में तो शिक्षकों को मात्र एक हजार रूपये ही पगार दी जाती है, जबकि एक मजदूर दो हजार रूपये से ज्यादा कमा लेता है । पहले शिक्षा के क्षेत्र में सम्मान अधिक था, इस कारण संतोषी, शांतिप्रिय तथा स्वाभिमानी लोग कम वेतन में भी शिक्षण कार्य को ही पसंद करते थे, लेकिन आज इस क्षेत्र में न तो सम्मान रहा है और न ही अच्छा वेतन । इसलिए आम आदमी के मन में एक अधिकारी की तुलना में एक शिक्षक के प्रति सम्मान में कितनी कमी हैं । राजस्थान का कोटा शहर आज भारत का नालन्दा और तक्षशिला कहा जा सकता है, जहाँ लगभग ५०,००० छात्र प्रति वर्ष पढ़ते है और आई.आई.टी. (भारतीय तकनीकी संस्थाआे) में चयनित छात्रों में से सबसे अधिक संख्या कोटा से ही होती हैं । इसका कारण यह है कि यहाँ की प्रसिद्ध कोचिंग संस्था में पढ़ाने वाले शिक्षकों को एक लाख से डेढ़ लाख रूपये तक मासिक वेतन दिया जाता है । आज मंहगे शिक्षण संस्थाआें को छोड़कर, शेष में उच्च् स्तर के शिक्षकों की कमी है, जो गरीबों के लिए अहितकारी है, क्योंकि गरीब बच्चें की पहुंच महंगे शिक्षण संस्थाआें तक तो है नहीं, जिस कारण होनहार होते हुए भी गरीबों के बच्च्े लोकतांत्रिक देश में पिछड़ रहे हैं । आज के युग में शिक्षकों की जो दुर्गति हो रही है, उसके चलते व्यवसाय चुनते समय शिक्षण क्षेत्र युवकों की आखरी पसंद बन गया है । इस कारण कुशाग्र बुद्धि वाले युवक तो अन्य क्षेत्रों में काम पा लेते है और अवशेष युवक, कुछ योग्य नवयुवक अभी भी शिक्षण कार्य को अपने पसंदीदा व्यवसाय के रूप में अपना लेते हैं । जिस देश के शिक्षक अगर मन्द बुद्धि होंगे, तो उस देश के भविष्य के संबंध में सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है । भारत वर्ष अभी तो ठीक-ठाक चल रहा है, लेकिन जिस गति से शिक्षा का स्तर गिरता जा रहा है और सामान्यत: मन्द बुद्धि लोग शिक्षण क&#