शिक्षक का सम्मान, देश का सम्मान
जगदीश प्रसाद शर्मा
देश का हर नागरिक, चाहे वह जनप्रतिनिधि हो या जनसेवक, शहरी हो या देहाती मजदूर हो या मालिक, यह चाहता है कि उसके बच्च्े को अच्छी शिक्षा मिलें। इसके लिए सभी माँ-बाप अपने बच्चें को अपनी क्षमता के अनुसार अच्छे से अच्छे विद्यालय एवं महाविद्यालय में पढ़ाने का प्रयास करते हैं । इस समय देश में लगभग हर गाँव में विद्यालय संचालित हैं । शासकीय पाठशालाआे के अतिरिक्त निजी विद्यालयों एवं महाविद्यालयों की भी भरमार हो गई है । निजी शैक्षणिक संस्थाआे में अधिकतर अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाई होती हैं । निजी शिक्षण संस्थाआे में कुछ तो काफी महंगे हैं । अच्छे शिक्षकों की पदस्थिति एवं उपस्थिति के माध्यम से अच्छी पढ़ाई ही पहले शिक्षण संस्थाआे के अच्छे होने का मापदण्ड होता था, लेकिन आजकल रहन-सहन के तौर-तरीके, पहनावा तथा अन्य गतिविधियों को ज्यादा महत्व दिया जाता है । इस कारण आजकल इन सभी को सम्मिलित करते हुए जो शिक्षण संस्थाएँ संचालित हैं, वे काफी मंहगी हो गई है और ऐसे महंगे विद्यालयों एवं महाविद्यालयों को लोग उत्तम श्रेणी में गिनने लगे हैं, जो आम आदमी की पहुंच से दूर हैं । पुराने जमाने में, यहाँ तक की आज से ४०-५० वर्ष पूर्व तक, पढ़ाना एक सम्मानजनक पेशा माना जाता था । शायद यही कारण है कि पहले अपने विषय के अच्छे ज्ञाता, शिक्षण क्षेत्र में होते थे तथा बच्चें को मन लगाकर पढ़ाते थे । छात्र और अभिभावक भी अध्यापकों का पूरा- पूरा ख्याल रखते थे और उन्हें सर्वाधिक सम्मान देते थे । पाठशालाआें में पढ़ने- पढ़ाने का निर्धारित समय समाप्त् होने के पश्चात अथवा अवकाश के दिनों में जब अध्यापक गाँव अथवा शहर की ओर निकलते थे, तो उनके विद्यार्थी सम्मान की भावना के कारण उनके सामने नहीं आते थे । अगर कोई बच्च खेल रहा हो और अध्यापक को आते देख लेता था, तो वह भागकर कहीं छुप जाता था या फिर घर जाकर पढ़ने लग जाता था । अभिभावक भी अध्यापकों को समय-समय पर अपने घर सम्मान के साथ भोजन के लिए निमंत्रण करते थे तथा उन्हें किसी प्रकार की समस्या नहीं आने देते थे । प्राचीन भारत में गुरूकुल पद्धति के अंतर्गत विद्यार्थीगुरूजनों का पूरा सम्मान करते थे। जैसे-जैसे भौतिकवाद बढ़ता जा रहा है, वैसे-वैसे अध्यापकों और विद्यार्थियों का यह रिश्ता फीका पड़ता जा रहा है तथा आज शिक्षा व्यवसायीकरण की ओर अग्रसर हैं, जिस कारण पाठशालाआें में पठन-पाठन का स्तर गिरता जा रहा है, जिसकी भरपाई के लिए ट्यूशन और कोचिंग संस्थाएं पूरे देश में अहम भूमिका निभा रही हैं । प्रदेश में जब किसी कार्यक्रम का सर्वेक्षण करना होता है अथवा मतदाता सूची का नवीनीकरण करना होता है, या इस तरह का कोई अन्य कार्य करना होता है, तो बच्चें की पढ़ाई पर प्रतिकूल प्रभाव की परवाह किए बिना सर्वप्रथम अध्यापकों को उस कार्य में झोंक दिया जाता है । मध्यप्रदेश के इंदौर जिले के एक अध्यापक ने इस प्रथा को व्यथित होकर आत्महत्या ही कर ली थी । आज किसी भी गाँव शहर में अध्यापक अथवा प्राध्यापक की उतनी पूँछ-परख नहीं है जितनी की एक पटवारी, नायब तहसीलदार, विकास खण्ड अधिकारी, तहसीलदार, अनुविभागीय अधिकारी अथवा कलेक्टर की है, जबकि इन्हें बनाने वाला अध्यापक ही होता हैं । इस तरह आज के युग में अध्यापक का न तो सम्मान रहा और न ही उसे अन्य शासकीय सेवकों की तुलना में अच्छा वेतनमान मिल रहा है । कुछ निजी शिक्षण संस्थाआें में तो शिक्षकों को दी जाने वाली पगार की हालत यह है कि एक मजदूर भी शिक्षक से ज्यादा पगार पाता है । कुछ महाविद्यालयों में तो शिक्षकों को मात्र एक हजार रूपये ही पगार दी जाती है, जबकि एक मजदूर दो हजार रूपये से ज्यादा कमा लेता है । पहले शिक्षा के क्षेत्र में सम्मान अधिक था, इस कारण संतोषी, शांतिप्रिय तथा स्वाभिमानी लोग कम वेतन में भी शिक्षण कार्य को ही पसंद करते थे, लेकिन आज इस क्षेत्र में न तो सम्मान रहा है और न ही अच्छा वेतन । इसलिए आम आदमी के मन में एक अधिकारी की तुलना में एक शिक्षक के प्रति सम्मान में कितनी कमी हैं । राजस्थान का कोटा शहर आज भारत का नालन्दा और तक्षशिला कहा जा सकता है, जहाँ लगभग ५०,००० छात्र प्रति वर्ष पढ़ते है और आई.आई.टी. (भारतीय तकनीकी संस्थाआे) में चयनित छात्रों में से सबसे अधिक संख्या कोटा से ही होती हैं । इसका कारण यह है कि यहाँ की प्रसिद्ध कोचिंग संस्था में पढ़ाने वाले शिक्षकों को एक लाख से डेढ़ लाख रूपये तक मासिक वेतन दिया जाता है । आज मंहगे शिक्षण संस्थाआें को छोड़कर, शेष में उच्च् स्तर के शिक्षकों की कमी है, जो गरीबों के लिए अहितकारी है, क्योंकि गरीब बच्चें की पहुंच महंगे शिक्षण संस्थाआें तक तो है नहीं, जिस कारण होनहार होते हुए भी गरीबों के बच्च्े लोकतांत्रिक देश में पिछड़ रहे हैं । आज के युग में शिक्षकों की जो दुर्गति हो रही है, उसके चलते व्यवसाय चुनते समय शिक्षण क्षेत्र युवकों की आखरी पसंद बन गया है । इस कारण कुशाग्र बुद्धि वाले युवक तो अन्य क्षेत्रों में काम पा लेते है और अवशेष युवक, कुछ योग्य नवयुवक अभी भी शिक्षण कार्य को अपने पसंदीदा व्यवसाय के रूप में अपना लेते हैं । जिस देश के शिक्षक अगर मन्द बुद्धि होंगे, तो उस देश के भविष्य के संबंध में सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है । भारत वर्ष अभी तो ठीक-ठाक चल रहा है, लेकिन जिस गति से शिक्षा का स्तर गिरता जा रहा है और सामान्यत: मन्द बुद्धि लोग शिक्षण क