रविवार, 19 जनवरी 2014

 लघुकथा
नीम का पेड़
राजेश घोटीकर
    सुबह उठते ही नीम के गिरे पत्तों से भरा प्रांगण देखकर उसने अपने दादाजी से कहा - कितना कचरा हो रहा है रोज के रोज । आप ये नीम का पेड़ कटवा क्यों नहीं   देते । दिन भर ये पत्ते झड़ते रहते    हैं । लान खराब कर देते हैं । चाहे कितनी सफाई करों ये पत्ते गिरते ही जाते हैं । अब रोज की भागदौड़ भरी जिन्दगी में ये नया बिना मतलब का काम........ वह आगे कुछ और कहता उसके पहले ७२ वर्षीय दादाजी ने उसे देखा, हौले से मुस्कुराकर पास रखी कुर्सी पर बैठ जाने का इशारा किया । चाय की केतली से चाय पास रखे कप में भरी और पूछा तुम पियोगे ।
    राजेश ने हामी भरी तो दादाजी ने दूसरे कप में भी चाय उड़ेली फिर शक्कर और दूध मिलाकर हिलाते हुए आगे बढ़ा दी । राजेश ने  ट्रे में रखे बिस्किट उठाकर चाय में डुबोए और खाने लगा ।
    दादाजी ने घर के बाहर बड़ा ही सुन्दर बगीचा लगा रखा है, मकान से तीन गुना बड़ा । गलियारा और आग के हिस्सा सुन्दर रंग बिरंगे फूलोंवाले पौधों, गमलों, बेलों से सजा हैं । रोज सवेरे दादाजी चाय पीकर बगीचे में टहलते हुए निरीक्षण करते हैं, साफ सफाई करते कराते हैं । पौधों को पानी लगाने में उन्हें बड़ा ही आनंद मिलता है । अभी बसंत ऋतु के दौर में पिछले दस दिनों से पत्ते झड़ रहे  हैं । पतझड़ का आगाज हुआ है और बड़ी तेजी से नीम के पत्ते झड़नेलगे हैं । राजेश आज जल्दी उठ गया है । बगीचे में लान को पत्तों से ढंका देख दादाजी से यह बात कह रहा है ।
    चाय की चुस्की लेकर दादाजी ने अपने नए डेन्चर में बिस्किट फंसा कर चबाया और कहा - राजेश, देखो नीम का यह पेड़ तब से है जब मकान बनाते वक्त तुम्हारी दादी ने इसे लगाया था । सुन्दरता के लिए तो आज भी कई पौधे है मगर गांव की चौपाल पर लगा नीम का पेड़ जिसके नीचे सारे गांव के लोग इकट्ठे होते थे । अपने सुख दु:ख की बातें किया करते थे । पंचायत के सार्वजनिक फैसले भी उसके नीचे हुआ करते थे । बचपन में झूले बांधकर हम झुला करते । दातुन से लगाकर कई दवाआें में हम उसका इस्तेमाल किया करते । वह पेड़ इस नीम में मुझे नजर आता है । तुम्हारी दादी के माइके के आंगन में लगा पेड़ इसी पेड़ में उनकी यादों में बसा था । नीम के गुणों को ध्यान में रखकर हमने अपने हाथों इसे    सींचा । कालोनी के एक मात्र हेंड  पम्प से पानी लाकर हमने इसकी परवरिश की ।
    तुम्हारी दादी और मोहल्ले की औरते इसके नीचे बैठ सब्जियां साफ करते बतियाती बैठती थी । तुम्हारे पिताजी की शादी के बाद कई रिश्तेदारों ने, हाँ तुम्हारे मामा ने भी गर्मी की छुटि्टयां इसी के नीचे बिताई हैं । नीम का शरबत भी बनाकर अपने स्वास्थ्य के लिए पिया है । नीम के पत्तों को जलाकर रात में हम मच्छर भगाते थे । इसके पत्तों की खाद में कीटनाशक मिलाने की जरूरत नहीं होती थी । अब आज घर में ट्यूबवेल है मोस्कीटो रिपिलेन्ट बिजली के इस्तेमाल से चलता है । घर वातानुकूलित हो गया है । वाटर प्यूरीफायर आ गये है तो आधुनिक जीवन शैली में तुम्हे यह अनुपयोगी जान पड़ता है ।
    अभी पतझड़ की वजह से इसके पत्ते झड़ रहे हैं जो और दस दिन झड़ेगे उसके बाद यह फिर लाल पत्तों से भर जाएगा फिर छांह देने को ये पत्ते हरे भरे ही जायेंगे । फिर फूल खिलेंगे और महक बिखरेंगे जो गर्मी का अहसास घटाने में अपनी भूमिका अदा करेंगे । निम्बोली लगेगी और जब पककर गिरने लगेगी तो वर्षा का दौर प्रारंभ होगा यानी नीम हमें मौसम का अंदाजा लगाने में मदद करेगा । मैं तुम्हारे तर्क से की पत्ते गिर रहे तो इसे काट डाला जाये से सहमत नहीं हॅूं । इस पेड़ के साथ मेरी कई यादे जुड़ी है । किसी को घर के बारे में बताते वक्त नीम का पेड़ वाला घर कह देना काफी होता है ।
    तुम्हारी दादी ने कैसे इसे टूट जाने से बचाने के लिए भरी बरसात में भीगते हुए बांस का सपोर्ट    लगाया । अब वो हमारे बीच नहीं है मगर वो इस नीम में याद बनी हुई  है । गर्मी के दौर में छत पर इसकी छांह ठंडक बनाए रखते है । इसकी मंद गंध भरी शुद्ध वायु शारीरिक स्वस्थता के लिए उपयोगी है । धरती को ठंडा रखने में, जलसंचय में इसका अपना महत्व है । आज लोग दूषित वायुपान कर बीमार है तब हमारे ऑगन में लगा पड़े हमें तो स्वास्थ्य  के लिए भरपूर ऊर्जा भी दे रहा है न ?
    कहते हैं जब कोई चीज हमारे पास नहीं होती तब उसका मोल समझ में आता है । आज यह पेड़ हमारे आँगन में है तो तुम्हारे लिए बिना मोल का है । मगर जब हमने इसे लगाया था तब दूर दूर तक खुले तपते मैदान हुआ करते थे । इस पेड़ ने हमें राहत की कई सौगात दी । जो कुछ इस पेड़ ने हमें अब तक दिया है उसका काफी बड़ा अंश हम वापस लौटा भी नहीं पायेंगे कभी ।
    चाय पीकर दादाजी बगीचे में जाने लगे तो उन्होने राजेश का हाथ थामा और साथ चलने की कवायद की । राजेश को उन्होनें पेड़ की कोटर दिखाई जिसमे तोते घोंसला बनाने के लिए आते जाते दिख रहे थे । गिलहरियों की गतिविधि दिखलाई । पेड़ पर बैठे पक्षियों से परिचित कराते हुए जीवदाय का पाठ पढ़ाया । गिर पत्तों पर चलने की खडखहाट का संगीत समझया । तुम्हारे दादाजी इस पेड़ के नीचे अपने पचास बरस बिता चुके है । यह पेड़ तो घना हो गया मगर दादाजी रिटायर होकर अनुपयोगी से है, जेब में पैसा है इसलिए कोई एतराज नहीं है । वरना मैं खुद भी तो पेड़ से झड़े इन पत्तों की तरह का ही तो हॅू ...... किसी काम का नहीं, हाथ पैर चल रहे तो बागवानी में समय काट लेता हूॅ । सुबह इसकी छांह में बगीचे को पानी पिलाना शान्ति देता है ।
    राजेश की शादी हो गई और उसके बेटे ने स्कूल जाना प्रारंभ कर दिया है । पिताजी आज किसी इंजीनियर के साथ डिस्कस कर रहे हैं । दादाजी को गुजरे आज कोई दो बरस हो गए हैं । इंजीनियर की सलाह है पेड़ हटा देने की । राजेश ने जब सुना तो वह बोला कि आप नक्क्षा बदल डालिए पेड़ नहीं कटेगा । इंजीनियर उसे जगह की कीमत समझाने लगा मगर राजेश टस से मस नहीं हो रहा था । आखिर नक्क्षा बदल कर निर्माण किया जाना तय हुआ ।
    राजेश को पिताजी ने पूछा तु तो कभी इस पेड़ हटवाने के लिए कई बार दादाजी से बातें करते थे आज तुम्हें क्या हो गया ? यह विरोधी रूख क्यों भला ?
    राजेश ने कहा - पिताजी नीम का यह पेड़ पहले मेरे लिए सिर्फ पेड़ था मगर अब यह याद बन गया है दादाजी की जिनकी मेहनत और लगन से यह बड़ा हुआ । उन्होनें मुझे इसका मोल समझाया था । तो पिताजी अनमोल बन चुके इस पेड़ को भला मैं कैसे कट जाने देता ?

कोई टिप्पणी नहीं: