मंगलवार, 27 फ़रवरी 2007

डॉ. खुशालसिंह पुरोहित - एक परिचय

डॉ. खुशालसिंह पुरोहित - डी. लिट्.

प्रसिद्ध पर्यावरणविद् डॉ. खुशालसिंह पुरोहित का जन्म १० जून १९५५ को म.प्र. में एक किसान परिवार में हुआ। आप पर्यावरण संरक्षण, पर्यावरण जागरुकता और पर्यावरण शिक्षा के क्षैत्र में पिछले ढाई दशक से कार्यरत है।

महान सर्वोदयी नेता आचार्य विनोबा भावे का आपके जीवन और कार्यो पर गहरा प्रभाव है। आपको युग मनीषी डॉ. शिवमंगलसिंह सुमन का आशीर्वाद मिला है, डॉ. सुमन के निर्देशन में आपने अपनी पी.एच.डी. उपाधि भी ली। तरुणावस्था से ही आपका झुकाव पर्यावरण के प्रति हो गया, समय के साथ-साथ इसी में सक्रियता बढ़ती गयी। डॉ. पुरोहित के लिए पर्यावरण के प्रश्न केवल हवा, पानी, मिट्टी, वन-कटाई या जनसंख्या तक सीमित नहीं है। आप पर्यावरण के प्रश्नों को मनुष्य और उसके सरोकार से जोड़ते हुए मानव और प्रकृति के प्रेमपूर्ण रिश्तों की वापसी पर जोर देते रहे है। पर्यावरण विषय में लिखे शोध प्रबंध पर नीदरलैंड से आपने डी.लिट् की उपाधि प्राप्त की है।

केन्द्रीय सरकार के पर्यावरण जागरुकता अभियान से शुरुआत से ही आप सम्बद्ध रहे है। इस अभियान के विस्तार में विद्यालयीन कार्यक्रमों, पंच-सरपंच शिविरों और संगोष्ठियों के साथ ही पश्चिमी म.प्र. के ग्रामीण शिक्षको के लिए शिक्षक शिविर, जैसे लोकचेतना के बहुआयामी कार्यक्रमों का आपके द्वारा सफल संचालन किया गया। इन कार्यक्रमों में नि:शुल्क साहित्य वितरण के साथ-साथ पौधा भेंट करने की परंपरा ने वानिकी के प्रति प्रेम का नया वातावरण बनाने में योगदान दिया। रतलाम शहर के पेयजल के प्रमुख स्त्रोत धोलावाड़ बांध को प्रदूषित करने वाले उद्योग के खिलाफ अनेक स्तरों पर प्रतिकार करते हुए अन्तत: आपने सर्वोच्य न्यायालय में जनहित याचिका के माध्यम से जनमत को अभिव्यक्ति दी, इसकी राष्ट्रीय स्तर पर सराहना हुई।

हिन्दी में पर्यावरण की पहली पत्रिका पर्यावरण डाइजेस्ट का प्रकाशन कर डॉ. पुरोहित ने लोकचेतना का महत्वपूर्ण कार्य किया है। पर्यावरण पर आपकी पुस्तकें प्रकाशित हुई है, देश के राष्ट्रीय एवं क्षैत्रीय समाचार-पत्रों में प्रकाशित लेखों के माध्यम से आप पर्यावरण संरक्षण, सतत् विकास और वानिकी की महत्ता के बारे में व्यापक जन जागृति पैदा करने में अग्रणी रहे हैं। पर्यावरणीय पत्रकारिता के क्षैत्र में अभूतपूर्व एवं सफल योगदान के लिए आपको महामहिम डॉ. शंकरदयाल शर्मा ने राष्ट्रीय पर्यावरण सेवा सम्मान प्रदान किया। पर्यावरण संरक्षण की लोकचेतना के कार्यो के लिए आपको अब तक पर्यावरण रत्न एवं राष्ट्र गौरव सम्मान सहित राज्य एवं राष्ट्रीय स्तर पर अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है।

डॉ. खुशालसिंह पुरोहित उन बिरले व्यक्तियों में से है, जिन्होंने पर्यावरण संरक्षण के महान उद्देश्य के लिए अपना जीवन समर्पित किया है। पिछले ढाई दशक से आप अपना सम्पूर्ण समय लोक चेतना के विविध आयामी प्रयासों में लगा रहे हैं।

पर्यावरण जनसंचार के क्षेत्र में आपके उपलब्धिपूर्ण कार्यो के लिए महामहिम डॉ. शंकरदयाल शर्मा ने षष्टम पर्यावरण विश्व कांग्रेस के अवसर पर नई दिल्ली में राष्ट्रीय पर्यावरण सेवा सम्मान से सम्मानित किया। पर्यावरण के क्षेत्र में हिन्दी पत्रिका प्रकाशन के लिये गाजियाबाद में अ.भा. हिन्दी साहित्य सम्मेलन में उ.प्र. के पूर्व राज्यपाल डॉ. वी. सत्यनारायण रेड्डी द्वारा राष्ट्र गौरव सम्मान प्रदान किया गया। इसी क्रम में लखनऊ में एक समारोह में मुख्यमंत्री राजनाथसिंह द्वारा पर्यावरण रत्न सम्मान से सम्मानित किया गया। केन्द्रीय गृह मंत्री लालकृष्ण आडवाणी द्वारा नई दिल्ली में प्रदत्त भूमण्डलीय हिन्दी सेवी सहस्राब्दी सम्मान, म.प्र. के कृषि मंत्री महेन्द्रसिंह कालूखेड़ा एवं मत्स्य पालन मंत्री हीरालाल सिलावट द्वारा प्रदत्त पर्यावरण संरक्षक सम्मान एवं पर्यावरण मित्र सम्मान के साथ ही म.प्र. की मुख्यमंत्री सुश्री उमा भारती द्वारा प्रदत्त वरिष्ठ पत्रकार सम्मान एवं केन्द्रीय राज्यमंत्री सुरेश पचोरी द्वारा प्रदत्त रामेश्वर गुरु पुरस्कार आपके विचारो एवं कार्यो की सामाजिक स्वीकृति के परिचायक हैं।

डॉ. पुरोहित पर्यावरण कार्यकर्ता के साथ ही स्वतंत्र पत्रकार भी है। हिन्दी दैनिक नवभारत टाइम्स, हिन्दुस्तान, प्रदीप, आज, सन्मार्ग, विश्वामित्र, वीर अर्जुन, ट्रिब्यून, स्वदेश, नईदुनिया, दैनिक भास्कर और नवभारत आदि पत्रों में आपके लेख प्रकाशित हो चुके हैं। आपको हिन्दी पत्रकारिता विषय पर मूर्धन्य साहित्यकार डॉ. शिवमंगलसिंह सुमन के निर्देशन में लिखे शोध-प्रबंध पर विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन से पी.एच.डी. की उपाधि मिली है। इसके बाद पर्यावरण विषय में आपने नीदरलैंड से डी.लिट् की उपाधि प्राप्त की है।

केन्द्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के राष्ट्रीय जागरुकता अभियान से आप शुरुआत से ही सम्बद्ध रहे हैं, इसी क्रम में आपके द्वारा विद्यालयीन कार्यक्रमों, पंच-सरपंच शिविरों और संगोष्ठियों के साथ ही पश्चिमी म.प्र. के आदिवासी अंचल के ग्रामीण शिक्षकों के लिए शिक्षक प्रशिक्षण शिविरों की श्रृंखला जैसे बहुआयामी कार्यो का सफल संचालन किया गया। शिक्षक शिविर और पर्यावरण पर राष्ट्रीय हिन्दी मासिक पर्यावरण डाइजेस्ट का प्रकाशन तो ऐसे नवाचारी एवं नवोन्मेषकारी प्रकल्प हैं, जिनसे पर्यावरण संरक्षण के विचारों को लोकप्रियता मिली है। पर्यावरण संबंधी अनेक सम्मेलनों, संगोष्ठियों और शिविरों में संबोधन के साथ ही रेडियो और टी.वी. पर आपकी वार्ताएं भी प्रसारित हो चुकी है। इस प्रकार पर्यावरण पर लेख, फोल्डर एवं पुस्तिकाआें के प्रकाशन के माध्यम से जन शिक्षण में आपका महत्वपूर्ण अवदान है।

हिन्दी में पर्यावरण की पहली पत्रिका पर्यावरण डाइजेस्ट का जनवरी १९८७ से नियमित प्रकाशन कर आपने लोकचेतना का एक महत्वपूर्ण कार्य किया है। यहां यह उल्लेख भी अप्रासंगिक नहीं होगा कि पर्यावरण डाइजेस्ट ने कभी किसी सरकार, संस्थान या आंदोलन का मुखपत्र बनने का प्रयास नहीं किया, पत्रिका की प्रतिबद्धता सदैव सामान्य पाठक के प्रति रही है। डॉ. पुरोहित के पर्यावरण क्षेत्र में लोकचेतना के योगदान के लिये महामहिम राष्ट्रपतिजी, उपराष्ट्रपतिजी, राष्ट्रीय एवम् प्रादेशिक सतर पर विभिन्न राजनीतिक व्यक्तियों, प्रशासनिक अधिकारियों एवम् स्वयंसेवी संस्थाआें द्वारा आपके कार्यो की प्रशंसा की गयी। पत्रिका के दशकपूर्ति पर जनसम्पर्क, भोपाल की विज्ञप्ति के निम्न अंश भी उल्लेखनीय है - यह एक अव्यवसायिक प्रकाशन है, जो पर्यावरण संरक्षण की लोक चेतना के लिये पिछले एक दशक से सक्रिय है पत्रिका के सम्पादक डॉ. खुशालसिंह पुरोहित है जो पर्यावरण संरक्षण पर विगत् कई वर्षो से सक्रिय हैतथा इस विषय पर अपनी आक्रामक शैली के लेखन के कारण अपनी अलग पहचान रखते हैं। यही कारण है कि पर्यावरण में जिस विचार को डाइजेस्ट करना मुश्किल समझा जाता है, पत्रिका उसका सरलीकरण करने में सफल हुई हैं। इसमें आलेखों की सारगर्भिता, संक्षिप्तता और भाषा की प्रवाहमयता अपने आप में अनूठी है। पर्यावरण से जुड़े हर पहलू का स्पर्श इसमें शामिल होता है।

मालवा के पर्यावरण की पहली नागरिक रिपोर्ट के सघन सर्वेक्षण हेतु सन् १९९१ में आपने १०,००० कि.मी. की यात्रा की थी, रिपोर्ट के प्रकाशन पर पुस्तक के लोकार्पण समारोह में २८ जन. ९३ को युगमनीषी डॉ. शिवमंगलसिंह सुमन ने अपना आशीर्वाद इन शब्दों में दिया था - रतलाम पर्यावरण के लिए सहज भाव से सारे म.प्र. का केन्द्र हो गया है, इसके लिये मैं खुशालसिंह पुरोहित को बधाई देता हँू, यहां के कार्य से प्रेरणा लेकर प्रदेश के दूसरे क्षेत्रों में भी इस प्रकार का कार्य होगा। मेरी राय में बंकिमचंदजी का जो गान है, सुजलाम्, सुफलाम् अब उसमें रतलाम भी जुड़ गया है।

आपके जीवन और कार्यो पर आचार्य विनोबा भावे के प्रभाव के कारण गैर-राजनीतिक और रचनात्मक गतिविधियों की उपलब्धियों के लिये समाजसेवा के क्षेत्र में अपना अलग स्थान है। आपको पर्यावरण संबंधी अनेक लेखों एवं मासिक पत्रिका के नियमित प्रकाशन तथा पश्चिमी म.प्र. में फैले पर्यावरण कार्यो के साथ ही रतलाम शहर के पेयजल के प्रमुख स्त्रोत धोलावाड़ बांध के जलग्रहण क्षेत्र में एक रासायनिक उद्योग द्वारा प्रदूषण फैलाने के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में लोकहित याचिका लगाने जैसे विशिष्ट प्रयासों के कारण समाज के सभी वर्गो का स्नेह, आदर और सहयोग मिला है। अब तक आपको अनेक संस्थाआें ने पुरस्कृत और सम्मानित किया है, वह अपने मिशन में आपकी निरंतर सक्रियता का परिचायक है।

1 टिप्पणी:

अतुल शर्मा ने कहा…

आज पर्यावरण बचाने की महती आवश्यकता है।