बाल गीत
दुर्गाप्रसाद शुक्ल आजाद
लगता जैसे धुऑं सबेरा।
हुआ सबेरा हुआ सबेरा॥
सूरज आया, भोर हुआ,
चिड़ियां फिर से बोली।
अन्धकार को दूर भगा,
दुनिया ने आंखें खोली।
हरा-हरा सा सुआ सबेरा।
हुआ सबेरा, हुआ सबेरा।
नई उमंगे नई तरंगें,
नई रोशनी लायी।
महकी-महकी प्रकृति सुहानी,
ले मधुर अंगड़ाई॥
छुई, मुई ने छुआ सबेरा।
हुआ सबेरा, हुआ सबेरा॥
अपना सपना टूट गया,
धुप्प अंधेरा फूट गया।
चले काम पर सब प्राणी,
ताजापानी कुऑं सबेरा।
हुआ सबेरा, हुआ सबेरा॥
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1 टिप्पणी:
अरे वाह, यह कविता तो सच में सुबह की ताजगी को जिंदा कर देती है! पढ़ते ही मन में वही हरा-भरा सुआ सबेरा सा एहसास होने लगता है। सूरज की किरणों के साथ चिड़ियों की चहचहाहट और प्रकृति की महक कोई भी महसूस कर सकता है आपकी कविता पड़ते हुए।
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