मंगलवार, 27 फ़रवरी, 2007

संपादक परिचय - व्यक्तिगत

व्यक्तिगत

डॉ. खुशालसिंह पुरोहित

जन्म तिथि - १० जून १९५५

शिक्षा - एम.ए.(हिन्दी), पी.एच.डी.(पत्रकारिता),डी.लिट् (पर्यावरण)

पत्रकारिता -

सन् १९७२- साप्ताहिक मालव समाचार में प्रतिनिधि। १९७४ - दैनिक स्वदेश इंदौर में जिला प्रतिनिधि।

१९७५-हिन्दुस्तान समाचार संवाद एजेंसी में जिला संवाददाता।१९७५ - दैनिक इंदौर समाचार में अति.प्रतिनिधि।

१९७७-दैनिक स्वदेश इंदौर में सह-संपादक।

स्वतंत्र पत्रकार के रुप में युगवार्ता, सप्रेस और सी.एन.एफ. फीचर एजेस्यिों के माध्यम से हिन्दी के प्रतिष्ठित पत्रो में सम-सामयिक विषयों पर अनेक लेख प्रकाशित। इंदौर प्रेस क्लब एवं रतलाम प्रेस क्लब के सदस्य। प्रादेशिक मंत्री म.प्र. आंचलिक पत्रकार संघ, भोपाल। १९८४ पहली पुस्तक विश्व युवा वर्ष : संदर्भ चुनौतियां का प्रकाशन। १९८७ पहली हिन्दी पर्यावरण पत्रिका पर्यावरण डाइजेस्ट का प्रकाशन। १९८८पर्यावरण के जनसुलभ सिाहत्य के अन्तर्गत पर्यावरण को बचाईये - स्वयं को बचाईये, हमारे जल संसाधनों का संरक्षण और पर्यावरण और जन सामान्य पुस्तकों का प्रकाशन। १९९१ मालवा के पर्यावरण की पहली नागरिक रिपोर्ट मालवा का पर्यावरण का प्रकाशन।

सम्मान पुरस्कार-

१. १९९४ पर्यावरण सम्मान - रोटरी मंडलाध्यक्ष जगमोहन कटारिया द्वारा प्रदत्त।

२. १९९७ पर्यावरण संरक्षक सम्मान - म.प्र. के कृषिमंत्री महेन्द्रसिंह कालूखेड़ा द्वारा प्रदत्त।

३. १९९७ राष्ट्रीय पर्यावरण सेवा सम्मान - महामहिम डॉ. शंकरदयाल शर्मा द्वारा प्रदत्त।

४. १९९८ राष्ट्रगौरव सम्मान - उ.प्र. के पूर्व राज्यपाल वी. सत्यनारायण रेड्डी द्वारा प्रदत्त।

५. १९९९ समाजहित पत्रकारिता पुरस्कार - प्रो. रामकिशोर पसीने, नागपुर द्वारा प्रदत्त।

६. २००० पर्यावरण मित्र सम्मान - म.प्र. के मत्स्य पालन मंत्री हीरालाल सिलावट द्वारा प्रदत्त।

७. २००० पर्यावरणविद् सम्मान - अध्यक्ष राजपुरोहित समाज, रतलाम द्वारा प्रदत्त।

८. २००० भूमण्डलीय हिन्दी सेवी सहस्राब्दी सम्मान - केन्द्रीय गृह मंत्री लालकृष्ण आडवाणी

द्वारा प्रदत्त।

९. २००१ पर्यावरण रत्न सम्मान - उ.प्र. के मुख्यमंत्री राजनाथसिंह द्वारा प्रदत्त।

१०. २००१ पीस अवार्ड २००१- जगतगुरु शंकराचार्य प्रयागपीठाधीश्वर स्वामी माधवानंद सरस्वती

द्वारा प्रदत्त।

११. २००४ वरिष्ठ पत्रकार सम्मान - मध्यप्रदेश की मुख्यमंत्री सुश्री उमा भारती द्वारा प्रदत्त।

१२. २००६ रामेश्वर गुरु पत्रकारिता पुरस्कार - केन्द्रीय राज्यमंत्री सुरेश पचोरी द्वारा प्रदत्त।

सामाजिक क्षेत्र -

१९७७ आचार्य विनोबाभावे से भेंट बाद समाज सेवा में जीवन की शक्ति लगाने का निश्चय।

१९८१ संयोजक - आंतर-भारती बाल आनंद महोत्सव समिति।

१९८८ अध्यक्ष - उपभोक्ता परिषद्, रतलाम।

१९८९ सदस्य - जिला भारत ज्ञान-विज्ञान समिति, रतलाम।

१९८९ इन्टेक (दि इण्डियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एण्ड कल्चर हेरिटेज) प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य।

२००० सदस्य - प्रबंध समिति, जन शिक्षण संस्थान, रतलाम।

२००२ सदस्य - प्रबंध समिति, केन्द्रीय विद्यालय, रतलाम।

२००६ सदस्य - प्रबंध समिति, जन शिक्षण संस्थान, रतलाम।

पर्यावरण -

१९८१ संस्थापक सचिव पर्यावरण परिषद्, रतलाम।

१९८४ रतलाम शहर के पर्यावरण की पहली नागरिक रिपोर्ट का संयोजन।

१९८६ सदस्य, मालवा पर्यावरण सोसायटी, उज्जैन संभाग।

१९८९ सदस्य, रतलाम जिला पर्यावरण संरक्षण दल, रतलाम ।

१९८९ एक रासायनिक कारखाने के विरुद्ध लंबे संघर्ष के बाद सर्वोच्य न्यायालय में लोकहित याचिका।

१९९० पर्यावरण की गतिविधियों का विस्तार समूचे मालवा-निमाड़ के किया गया।

१९९२ मालवा के पर्यावरण की पहली नागरिक रिपोर्ट का संयोजन-सम्पादन।

१९९३ सदस्य, सरदार सरोवर पुनर्बसाहट एजेन्सी, बड़ोदरा गुजरात।

१९९५ संयोजक, जिला पर्यावरण वाहिनी, रतलाम।

१९९५ कल्पवृक्ष संरक्षण एवं विकास अभियान की शुरुआतका संयोजन।

१९९८ मानसेवी, वन्य प्राणी अभिरक्षक।

डॉ. खुशालसिंह पुरोहित - एक परिचय

डॉ. खुशालसिंह पुरोहित - डी. लिट्.

प्रसिद्ध पर्यावरणविद् डॉ. खुशालसिंह पुरोहित का जन्म १० जून १९५५ को म.प्र. में एक किसान परिवार में हुआ। आप पर्यावरण संरक्षण, पर्यावरण जागरुकता और पर्यावरण शिक्षा के क्षैत्र में पिछले ढाई दशक से कार्यरत है।

महान सर्वोदयी नेता आचार्य विनोबा भावे का आपके जीवन और कार्यो पर गहरा प्रभाव है। आपको युग मनीषी डॉ. शिवमंगलसिंह सुमन का आशीर्वाद मिला है, डॉ. सुमन के निर्देशन में आपने अपनी पी.एच.डी. उपाधि भी ली। तरुणावस्था से ही आपका झुकाव पर्यावरण के प्रति हो गया, समय के साथ-साथ इसी में सक्रियता बढ़ती गयी। डॉ. पुरोहित के लिए पर्यावरण के प्रश्न केवल हवा, पानी, मिट्टी, वन-कटाई या जनसंख्या तक सीमित नहीं है। आप पर्यावरण के प्रश्नों को मनुष्य और उसके सरोकार से जोड़ते हुए मानव और प्रकृति के प्रेमपूर्ण रिश्तों की वापसी पर जोर देते रहे है। पर्यावरण विषय में लिखे शोध प्रबंध पर नीदरलैंड से आपने डी.लिट् की उपाधि प्राप्त की है।

केन्द्रीय सरकार के पर्यावरण जागरुकता अभियान से शुरुआत से ही आप सम्बद्ध रहे है। इस अभियान के विस्तार में विद्यालयीन कार्यक्रमों, पंच-सरपंच शिविरों और संगोष्ठियों के साथ ही पश्चिमी म.प्र. के ग्रामीण शिक्षको के लिए शिक्षक शिविर, जैसे लोकचेतना के बहुआयामी कार्यक्रमों का आपके द्वारा सफल संचालन किया गया। इन कार्यक्रमों में नि:शुल्क साहित्य वितरण के साथ-साथ पौधा भेंट करने की परंपरा ने वानिकी के प्रति प्रेम का नया वातावरण बनाने में योगदान दिया। रतलाम शहर के पेयजल के प्रमुख स्त्रोत धोलावाड़ बांध को प्रदूषित करने वाले उद्योग के खिलाफ अनेक स्तरों पर प्रतिकार करते हुए अन्तत: आपने सर्वोच्य न्यायालय में जनहित याचिका के माध्यम से जनमत को अभिव्यक्ति दी, इसकी राष्ट्रीय स्तर पर सराहना हुई।

हिन्दी में पर्यावरण की पहली पत्रिका पर्यावरण डाइजेस्ट का प्रकाशन कर डॉ. पुरोहित ने लोकचेतना का महत्वपूर्ण कार्य किया है। पर्यावरण पर आपकी पुस्तकें प्रकाशित हुई है, देश के राष्ट्रीय एवं क्षैत्रीय समाचार-पत्रों में प्रकाशित लेखों के माध्यम से आप पर्यावरण संरक्षण, सतत् विकास और वानिकी की महत्ता के बारे में व्यापक जन जागृति पैदा करने में अग्रणी रहे हैं। पर्यावरणीय पत्रकारिता के क्षैत्र में अभूतपूर्व एवं सफल योगदान के लिए आपको महामहिम डॉ. शंकरदयाल शर्मा ने राष्ट्रीय पर्यावरण सेवा सम्मान प्रदान किया। पर्यावरण संरक्षण की लोकचेतना के कार्यो के लिए आपको अब तक पर्यावरण रत्न एवं राष्ट्र गौरव सम्मान सहित राज्य एवं राष्ट्रीय स्तर पर अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है।

डॉ. खुशालसिंह पुरोहित उन बिरले व्यक्तियों में से है, जिन्होंने पर्यावरण संरक्षण के महान उद्देश्य के लिए अपना जीवन समर्पित किया है। पिछले ढाई दशक से आप अपना सम्पूर्ण समय लोक चेतना के विविध आयामी प्रयासों में लगा रहे हैं।

पर्यावरण जनसंचार के क्षेत्र में आपके उपलब्धिपूर्ण कार्यो के लिए महामहिम डॉ. शंकरदयाल शर्मा ने षष्टम पर्यावरण विश्व कांग्रेस के अवसर पर नई दिल्ली में राष्ट्रीय पर्यावरण सेवा सम्मान से सम्मानित किया। पर्यावरण के क्षेत्र में हिन्दी पत्रिका प्रकाशन के लिये गाजियाबाद में अ.भा. हिन्दी साहित्य सम्मेलन में उ.प्र. के पूर्व राज्यपाल डॉ. वी. सत्यनारायण रेड्डी द्वारा राष्ट्र गौरव सम्मान प्रदान किया गया। इसी क्रम में लखनऊ में एक समारोह में मुख्यमंत्री राजनाथसिंह द्वारा पर्यावरण रत्न सम्मान से सम्मानित किया गया। केन्द्रीय गृह मंत्री लालकृष्ण आडवाणी द्वारा नई दिल्ली में प्रदत्त भूमण्डलीय हिन्दी सेवी सहस्राब्दी सम्मान, म.प्र. के कृषि मंत्री महेन्द्रसिंह कालूखेड़ा एवं मत्स्य पालन मंत्री हीरालाल सिलावट द्वारा प्रदत्त पर्यावरण संरक्षक सम्मान एवं पर्यावरण मित्र सम्मान के साथ ही म.प्र. की मुख्यमंत्री सुश्री उमा भारती द्वारा प्रदत्त वरिष्ठ पत्रकार सम्मान एवं केन्द्रीय राज्यमंत्री सुरेश पचोरी द्वारा प्रदत्त रामेश्वर गुरु पुरस्कार आपके विचारो एवं कार्यो की सामाजिक स्वीकृति के परिचायक हैं।

डॉ. पुरोहित पर्यावरण कार्यकर्ता के साथ ही स्वतंत्र पत्रकार भी है। हिन्दी दैनिक नवभारत टाइम्स, हिन्दुस्तान, प्रदीप, आज, सन्मार्ग, विश्वामित्र, वीर अर्जुन, ट्रिब्यून, स्वदेश, नईदुनिया, दैनिक भास्कर और नवभारत आदि पत्रों में आपके लेख प्रकाशित हो चुके हैं। आपको हिन्दी पत्रकारिता विषय पर मूर्धन्य साहित्यकार डॉ. शिवमंगलसिंह सुमन के निर्देशन में लिखे शोध-प्रबंध पर विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन से पी.एच.डी. की उपाधि मिली है। इसके बाद पर्यावरण विषय में आपने नीदरलैंड से डी.लिट् की उपाधि प्राप्त की है।

केन्द्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के राष्ट्रीय जागरुकता अभियान से आप शुरुआत से ही सम्बद्ध रहे हैं, इसी क्रम में आपके द्वारा विद्यालयीन कार्यक्रमों, पंच-सरपंच शिविरों और संगोष्ठियों के साथ ही पश्चिमी म.प्र. के आदिवासी अंचल के ग्रामीण शिक्षकों के लिए शिक्षक प्रशिक्षण शिविरों की श्रृंखला जैसे बहुआयामी कार्यो का सफल संचालन किया गया। शिक्षक शिविर और पर्यावरण पर राष्ट्रीय हिन्दी मासिक पर्यावरण डाइजेस्ट का प्रकाशन तो ऐसे नवाचारी एवं नवोन्मेषकारी प्रकल्प हैं, जिनसे पर्यावरण संरक्षण के विचारों को लोकप्रियता मिली है। पर्यावरण संबंधी अनेक सम्मेलनों, संगोष्ठियों और शिविरों में संबोधन के साथ ही रेडियो और टी.वी. पर आपकी वार्ताएं भी प्रसारित हो चुकी है। इस प्रकार पर्यावरण पर लेख, फोल्डर एवं पुस्तिकाआें के प्रकाशन के माध्यम से जन शिक्षण में आपका महत्वपूर्ण अवदान है।

हिन्दी में पर्यावरण की पहली पत्रिका पर्यावरण डाइजेस्ट का जनवरी १९८७ से नियमित प्रकाशन कर आपने लोकचेतना का एक महत्वपूर्ण कार्य किया है। यहां यह उल्लेख भी अप्रासंगिक नहीं होगा कि पर्यावरण डाइजेस्ट ने कभी किसी सरकार, संस्थान या आंदोलन का मुखपत्र बनने का प्रयास नहीं किया, पत्रिका की प्रतिबद्धता सदैव सामान्य पाठक के प्रति रही है। डॉ. पुरोहित के पर्यावरण क्षेत्र में लोकचेतना के योगदान के लिये महामहिम राष्ट्रपतिजी, उपराष्ट्रपतिजी, राष्ट्रीय एवम् प्रादेशिक सतर पर विभिन्न राजनीतिक व्यक्तियों, प्रशासनिक अधिकारियों एवम् स्वयंसेवी संस्थाआें द्वारा आपके कार्यो की प्रशंसा की गयी। पत्रिका के दशकपूर्ति पर जनसम्पर्क, भोपाल की विज्ञप्ति के निम्न अंश भी उल्लेखनीय है - यह एक अव्यवसायिक प्रकाशन है, जो पर्यावरण संरक्षण की लोक चेतना के लिये पिछले एक दशक से सक्रिय है पत्रिका के सम्पादक डॉ. खुशालसिंह पुरोहित है जो पर्यावरण संरक्षण पर विगत् कई वर्षो से सक्रिय हैतथा इस विषय पर अपनी आक्रामक शैली के लेखन के कारण अपनी अलग पहचान रखते हैं। यही कारण है कि पर्यावरण में जिस विचार को डाइजेस्ट करना मुश्किल समझा जाता है, पत्रिका उसका सरलीकरण करने में सफल हुई हैं। इसमें आलेखों की सारगर्भिता, संक्षिप्तता और भाषा की प्रवाहमयता अपने आप में अनूठी है। पर्यावरण से जुड़े हर पहलू का स्पर्श इसमें शामिल होता है।

मालवा के पर्यावरण की पहली नागरिक रिपोर्ट के सघन सर्वेक्षण हेतु सन् १९९१ में आपने १०,००० कि.मी. की यात्रा की थी, रिपोर्ट के प्रकाशन पर पुस्तक के लोकार्पण समारोह में २८ जन. ९३ को युगमनीषी डॉ. शिवमंगलसिंह सुमन ने अपना आशीर्वाद इन शब्दों में दिया था - रतलाम पर्यावरण के लिए सहज भाव से सारे म.प्र. का केन्द्र हो गया है, इसके लिये मैं खुशालसिंह पुरोहित को बधाई देता हँू, यहां के कार्य से प्रेरणा लेकर प्रदेश के दूसरे क्षेत्रों में भी इस प्रकार का कार्य होगा। मेरी राय में बंकिमचंदजी का जो गान है, सुजलाम्, सुफलाम् अब उसमें रतलाम भी जुड़ गया है।

आपके जीवन और कार्यो पर आचार्य विनोबा भावे के प्रभाव के कारण गैर-राजनीतिक और रचनात्मक गतिविधियों की उपलब्धियों के लिये समाजसेवा के क्षेत्र में अपना अलग स्थान है। आपको पर्यावरण संबंधी अनेक लेखों एवं मासिक पत्रिका के नियमित प्रकाशन तथा पश्चिमी म.प्र. में फैले पर्यावरण कार्यो के साथ ही रतलाम शहर के पेयजल के प्रमुख स्त्रोत धोलावाड़ बांध के जलग्रहण क्षेत्र में एक रासायनिक उद्योग द्वारा प्रदूषण फैलाने के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में लोकहित याचिका लगाने जैसे विशिष्ट प्रयासों के कारण समाज के सभी वर्गो का स्नेह, आदर और सहयोग मिला है। अब तक आपको अनेक संस्थाआें ने पुरस्कृत और सम्मानित किया है, वह अपने मिशन में आपकी निरंतर सक्रियता का परिचायक है।

पर्यावरण समाचार


भारत ब्रह्मांड के रहस्यमय कणों की खोज करेगा

ब्रह्मांड की रचना कैसे और कब हुई है इस विषय पर लगातार खोज होती रही है और शायद आगे भी होती रहेगी। कारण इसका साफ है क्योंकि केवल ब्रह्मांड को जानने की लालसा युग-युगांतर से सबके मन में बनी हुई है।

इसी लालसा में फिर कुछ तथ्य जोड़ने और जानने के लिए ब्रह्मांड की रचना करने वाले कणों के रहस्यों का पता लगाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल करते हुए भारत सरकार ने एक भूमिगत वेधशाला स्थापित करने की योजना बनाई है। इस पर 670 करोड़ रुपए के खर्च का अनुमान है। ब्रह्मांड का निर्माण करने वाले मौलिक कणों में न्यूट्रिनों नामक कण अत्यंत महत्वपूर्ण है। इन्हीं कणों के अध्ययन के लिए मैसूर से करीब 100 किलोमीटर दूर स्थित पठानी सिंगारा गाँव में वेधशाला बनाई जा रही हैं। इस वेधशाला के भूमिगत होने के कारण वहाँ कॉस्मिक किरणों की उपस्थिति काफी घट जाएगी क्योंकि इन किरणों को जमीन के पत्थरों द्वारा अवशोषित कर लिया जाएगा।

न्यूट्रिनो के बारे में अभी वैज्ञानिकों को बहुत कम पता है। इन्हें इलेक्ट्रान के समान माना जाता है। इन दोनों के बीच एक मुख्य अंतर यह ळे कि इलेक्ट्रान पर विद्युत जैसा आवेश होता है जबकि न्यूट्रिनो पर कोई आवेश नहीं होता है। वैज्ञानिकों के अनुसार न्यूट्रिनो के अनावेशित होने के कारण यह वैद्युत चुम्बकीय तरंगों, इलेक्ट्रो मैग्नेटिक, तरंगों से प्रभावित नहीं होता है। यह केवल इलेक्ट्रान की तरह काम करने वाले निर्बल उप परमाण्विक बलों से प्रभावित होता है, इसलिए यह किसी भी पदार्थ के भीतर बहुत गहराई तक आसानी से प्रवेश कर जाता है।

अभी तक ज्ञात बलों की तुलना में इसका गुरुत्वाकार्षण बल सबसे कम होता है। अभी तक तीन तरह के न्यूट्रिनो का पता चला है। इस बात के कोई पक्के प्रमाण नहीं मिले है कि इनके अलावा और भी न्यूट्रिनो का अस्तित्व है। हर किस्म के न्यूटिनो किसी अवेशित कण से संबंधित होते हैं।

भारतीय न्यूटिनो वेधशाला से संबध्द नोवामंडल के अनुसार न्यूटिनो का पता लगाना अत्यंत मुश्किल काम है क्योंकि इनकी किसी भी पदार्थ के साथ किसी तरह की प्रतिक्रिया ही नहीं होती है। इन्हें पता लगाने के लिए वैसे स्थान पर विशाल डिटेक्टर लगाने की जरुरत पड़ती है जहां अन्य कणों की पहुँच नहीं हो सके। यही कारण है कि न्यूट्रिनो डिटेक्टर जमीन के भीतर, दक्षिणी ध्रुव के नीचे या समुद्र की गहराई में लगाए जाते हैं। ***

टेडी बेयर कोआला

प्राणी जगत


डॉ. चंद्रशीला गुप्ता

कोआला को अक्सर ऑस्ट्रेलियाई भालू समझ लिया जाता है। जबकि यह भालू न होकर कंगारु समूह यानी मार्सूपीलिया का सदस्य है।

वैज्ञानिक इसे फेस्कोलेक्टस सिनेरियस कहते हैं। इसका ठिगना, गठीला शरीर स्लेटी रंग के फर से ढंका रहता है। तकरीबन 10-12 किलोग्राम के बिना पूंछ वाले इस जंतु के गोल चेहरे पर हास्यापद नाक व 2 बड़े-बड़े कान होते हैं। यह कोई जीवित प्राणी नहीं बल्कि टेडी बियर ही दिखाई देता है।

एक समय यह पूर्वी ऑस्ट्रेलिया में लाखों की तादाद में पाया जाता था क्योंकि स्थानीय निवासी धार्मिक विश्वासों के चलते कोआला का शिकार नहीं करते थे। लेकिन उन्नीसवीं शताब्दी में जब सभ्य समाज को इसके फर का महत्व पता चला, तो सामूहिक संहार होने लगा। शिकारी कुत्तों द्वारा पहले इन्हें जंगल से मैदानों की तरफ खदेड़ा जाता था, जहां शिकारी इनका काम तमाम कर देते थे। जैसे इतना ही काफी नहीं तो प्राकृतिक प्रकोप भी इन नन्हें प्राणियों पर टूटा और एक महामारी ने इन्हें विलुप्ति की कगार पर ला खड़ा किया।

बाद में विभिन्न संरक्षण योजनाओं व सख्त नियमों की वजह से ये बचे। बीसवीं शताब्दी में इन्हें एक फ्रांसीसी द्वीप पर ले जाया गया। बेरोक वृध्दि से वहां इनकी संख्या इतनी ज्यादा हो गई कि वहा अनेक वृक्ष खत्म होते नज़र आने लगे। तब वहां से इन्हें आस-पास के टापुओं व मुख्य द्वीप पर स्थानांतरित किया गया।

पहले इनका भोजन युकेलिप्टस की पत्तियां एवं कलियां माना गया था लेकिन बाद में ज्ञात हुआ कि इस वंश की अन्य प्रजातियां भी इनके भोज्य वृक्षों में शामिल है। अपने पैने नाखूनों की मदद से ये आसानी से पेड़ों पर चढ़ जाते हैं और मौसम के अनुसार श्रेष्ठ पत्तियां या कलियां चुनकर खाते हैं।

युकेलिप्टस की पत्तियों में एक तीखी गंध वाला तेल होता है जो इनकी आंतों में अवशोषित होकर रक्त द्वारा गंध पैदा होती है। यह गंध परजीवियों को विकर्षित करती है। कोआला मूत्र में ग्लूकोरोनिक अम्ल की काफी मात्रा उत्सर्जित करता है। वैज्ञानिक मानते हैं कि यह युकेलिप्टस के तेल को निर्विष करने के दौरान पैदा होता है।

कोआला एक ऑस्ट्रेलियाई जनजातीय शब्द है जिसका अर्थ जल विहिन होता है जो इसके पानी न पीने की आदत की तरफ इंगित करता है। दरअसल इसकी खाद्य पत्तियों में पर्याप्त मात्रा में पानी होता है। अतः इसे पानी पीने की जरुरत नहीं होती है। वैसे कोआला एक अच्छा तैराक है और पानी में जाता रहता है और पानी से निकलने के बाद यह फर में लगा पानी चाटता है। कभी-कभी यह वर्षा के बाद पोखरों में जमा पानी पीते भी देखा गया है।

मार्सूपीलिया समूह का होने के कारण इसमें भी कंगारु जैसी बच्चे पालने वाली थैली यानी मार्सूपियम पाई जाती है। कोआला का गर्भकाल छोटा (30-35 दिन का) होता है। जन्म के समय शिशु मात्र 5 ग्राम का व कुछ से.मी. लम्बा होता है। यह इतना अपरिपक्व होता है कि यदि इसे थैली में पहुंचने में घण्टा भर देरी हो जाए तो यह जीवित नहीं रह पाता है। लेकिन ऐसा होता नहीं है, यह जन्म स्थान से फर में रेंगता हुआ तुरंत थैली में पहुंच जाता है जो मात्र कुछ से.मी. की दूरी पर स्थित होती हैं।

कोआला की थैली विशिष्ट होती है, कंगारु से ठीक उलट इसका मुंह नीचे की ओर होता है। बच्चा इसमें से गिरता नहीं है क्योंकि मां बहुत सावधान रहती है और पैरों पर झुकते हुए चलती है। करीब 4-5 माह यह इस थैली (प्राकृतिक इन्क्यूबेटर) में रहता है व 450 ग्राम का हो जाता है। इसके बाद भी यह मां का दूध पीने थैली में आता-जाता रहता है। शेष समय मां की पीठ पर लदा रहता है। शिशुओं को मां के मलद्वार से निकलते द्रव को चाटते भी देखा गया है। इस द्रव की संरचना मल से भिन्न होती है, इसमें पत्तियों के पेप्टोन्स पाए गए हैं। एक वर्ष की आयु से पहले यह पेड़ पर नहीं चढ़ते हैं। करीब 4 वर्ष में शिशु प्रजनन के काबिल हो जाते हैं और इनकी औसत आयु लगभग 20 वर्ष है।

***

हुआ सबेरा

बाल गीत


दुर्गाप्रसाद शुक्ल आजाद


लगता जैसे धुऑं सबेरा।

हुआ सबेरा हुआ सबेरा॥

सूरज आया, भोर हुआ,

चिड़ियां फिर से बोली।

अन्धकार को दूर भगा,

दुनिया ने आंखें खोली।

हरा-हरा सा सुआ सबेरा।

हुआ सबेरा, हुआ सबेरा।

नई उमंगे नई तरंगें,

नई रोशनी लायी।

महकी-महकी प्रकृति सुहानी,

ले मधुर अंगड़ाई॥

छुई, मुई ने छुआ सबेरा।

हुआ सबेरा, हुआ सबेरा॥

अपना सपना टूट गया,

धुप्प अंधेरा फूट गया।

चले काम पर सब प्राणी,

ताजापानी कुऑं सबेरा।

हुआ सबेरा, हुआ सबेरा॥

***

बांग्लादेश ः डूबता हुआ एक देश

विदेश


अजंलि कवत्रा

जलवायु परिवर्तन का सर्वाधिक नुकसान उठाने वाले देशों में बांग्लादेश भी एक है। यह छोटा सा एशियाई देश समुद्र की सतह में वृध्दि, लगातार बाढ़ के आने और नदी द्वारा होने वाले भू-सक्षरण के संकट का सामना कर रहा है।

जलवायु परिवर्तन का अध्ययन करने वाली अन्तरराष्ट्रीय समिति इंटरनेशनल पेनल ऑन क्लायमेट चेंज ने आशंका व्यक्त की है कि वर्ष 2100 तक यहां की समुद्री सतह 9 से लेकर 95 सेमी तक बढ़ सकती है। यदि समुद्र सतह इस अनुमान के उच्चतम स्तर तक पहुंचती है तो बांग्लादेश की लगभग 18 प्रतिशत भूमि जलमग्न हो जायेगी। बांग्लादेश में लगभग 3.5 करोड़ लोग समुद्र तट पर रहते हैं। जैसे ही सागर अपनी सीमाओं को लांघ कर जमीन को निगलेगा, तो इतनी बड़ी आबादी को देश के भीतरी भागों में शरण लेनी होगी।

किंतु देश के भीतरी भागों पर भी जलवायु परिवत्रन की मार पड़ेगी और वहां बाढ़ और नदी द्वारा होने वाला भू-क्षरण उनके जीवन को अधिक कठिन बना देगा। इंटरनेशनल पेनल ऑन क्लायमेट चेंज के प्रारुप से संकेत मिलता है वर्ष 2030 तक बांग्लादेश को 10 से 15 प्रतिशत अधिक वर्षा का सामना करना होगा। जैसे-जैसे वायुमंडल में तापमान बढ़ेगा वैसे-वैसे गर्मियों के मौसम में भारत और नेपाल में फैले हिमालय की बर्फ भी पिघलेगी और वह नदियों से बहती हुई बांग्लादेश में तबाही मचायेगी।

बांग्लादेश के प्रमुख पर्यावरण शोध संस्थान, सेंटर फॉर एडवांस स्टडीज के कार्यकारी निदेशक डॉ. आतिक रहमान कहते हैं, पिछले कुछ वर्षो में बरसात और बाढ़ की तरीकों एवं चक्र में भी परिवर्तन हुआ है। पहले 20 सालों में एक बार भारी बाढ़ आती थी मगर अब प्रत्येक 5-7 वर्षो में ही देश को भारी बाढ़ का सामना करना पड़ता है।

सन् 1988 और 1998 में साल भर तक देश का कुल दो-तिहाई हिस्सा जलमग्न रहा। सन् 2004 में आई भीषण बाढ़ से 3 करोड़ निवासी या तो बह गये या बेघर हुए।

बाढ़ और भू-क्षरण ने लोगों को अत्यन्त गरीबी में धकेल दिया है। तीस्ता नदी की बाढ़ में जमीन बह जाने के बाद 35 वर्षीया माजेदा बेगम ने अपना पूरा जीवन उत्तरी बांग्लादेश के गांव बालाशिघाट में बिताता था। परंतु लगातार तीन सालों तक प्रतिवर्ष चौड़ी होती नदी के कारण मजबूरन उन्हें वहां भी अपना मकान कुछ पीछे हटकर ही बनाना पड़ा था।

अन्ततः वर्ष 2000 में नदी उनकी सारी जमीन निगल गई और उन्हें गांव पर सवार होकर भागना पड़ा। अब वे सरकार द्वारा निर्मित ऊँचे बाढ़रोधी तटबंध पर रहती है।

गेहूूं और धान उपजाने वाले अपने खेत गंवा देने के बाद अब उनके पास आमदनी का अन्य कोई स्त्रोत नहीं है, इसलिए माजेदा ने मजबूर होकर अपनी नौ साल की बेटी को राजधानी ढाका में नौकरानी का काम करने के लिए भेज दिया। उसका कहना है, हमारे पास अपने पूरे परिवार का पेट भरने के लिए अब कोई भी साधन नहीं बचा है, इसलिए मेरे पास इसके अलावा और कोई रास्ता नहीं बचा था।

सुश्री माजेदा जलवायु परिवर्तन और वायुमंडल तापमान वृध्दि जैसे शब्दों से अपरिचित है। वह आज तक कार में भी नहीं बैठी है। लेकिन उसके जैसे हाशिये पर पड़े लोग ही जलवायु परिवर्तन का सर्वाधिक आघात झेल रहे हैं।

***

खास खबर


ओजोन परत में क्षति पर्यावरण के लिए संकट

(हमारे विशेष संवाददाता द्वारा)