शनिवार, 31 मार्च, 2007

आवरण


इस अंक में

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इस माह 21 मार्च को विश्व वानिकी दिवस मनाया जायेगा। इस अवसर पर प्रकाशित पर्यावरण डाइजेस्ट के इस अंक में पड़त भूमि , वन और वन्य प्राणी पर विशेष सामग्री दी गयी है।

पहले लेख खनन के नाम पर संसाधनों की लूटमार में प्रसिध्द पत्रकार लेखक भारत डोगरा ने प्रस्तावित खनन नीति के मुद्दे पर अपने विचार रखे है। इसी के साथ जयश्री वैंकटेशन ने अपने लेख पड़ती भूमि पर पुनर्विचार की जरुरत में लिखा है कि हमें जमीन के उपयोग व बंदोबस्त की वर्तमान नीतियों में आधुनिक समझ को जगह देनी होगी। पाकिस्तान में पिछले दिनों संपन्न जश्ने-ए-सिंध डेल्टा पर आधारित लेख पाकिस्तान ः विलुप्त होती सिंध घाटी की सभ्यता में आप शाहिद हुसैन के विचार पढ़ेंगे। एक महत्वपूर्ण लेख क्या जंगल का राजा है शेर ? में डॉ. चंद्रशीला गुप्ता ने शेरों के जीवन से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां दी है। कर्नाटक में विज्ञान के प्रधानाध्यापक एम. उन्नीकृष्णन् ने अपने लेख विज्ञान, कांग्रेस और भारतीय वैज्ञानिक में कांग्रेस के सम्मेलन और उससे जुड़ी बातों की चर्चा की है।

वेदों के प्रकाण्ड पंडित लातुर (महाराष्ट्र) के प्राध्यापक डॉ. चन्द्रशेखर लोखण्डे ने वृक्षों की कटाई -आपदाओं को आमंत्रण में वेदो में वर्णित वृक्षों संबंधी तथ्यों की ओर ध्यान आकर्षित किया है। कविता में इस बार लखनऊ (उ.प्र.) के साहित्यकार, गीतकार, गिरधारीलाल मौर्य की कविता प्रदूषण का उपचार एक पौधा आप पढ़ेंगे।

पत्रिका के बारे में आपकी राय से अवगत करायें।

-कुमार सिध्दार्थ

बजट 2007

प्रसंगवश

बजट 2007

आम आदमी का सपना और हकीकत

केन्द्र सरकार पर 25 लाख करोड़ रुपयों का कर्ज है। इस तरह प्रत्येक भारतीय व्यक्ति पर बाईस हजार रु. कर्ज है। सोलह वर्ष पहले 1990-91 में यह कर्ज केवल 3500 रु. था। केंद्र सरकार को विदेशी ऋण के 76716 करोड़ रु. चुकाना हैं। संसद में वर्ष 2007-08 का बजट पेश करने के पूर्व वित्तमंत्री पी. चिदम्बरम् ने वर्ष 2006-07 की आर्थिक समीक्षा को इस तरह पेश किया कि आम आदमी को कुछ भी समझ में नहीं आ सका है।

ताजा आर्थिक समीक्षा से न तो पिछले वर्ष की उपलब्धियों और असफलताओं को जानने का मौका मिला और न यह अनुमान लगाना संभव हुआ है कि अगला वर्ष कैसा बीतेगा। केव यह भरोसा दिलाया जा रहा है कि आर्थिक विकास की 9.2 प्रतिशत दर हासिल कर ली जाएगी। इस आर्थिक विकास का लाभ कितना, कैसा और किसको मिलेगा, इसकी कल्पना करना अभी मुश्किल हो रहा है।

कृषि उत्पादन में वृध्दि की निराशाजनक तस्वीर पर ध्यान दिया जाना जरुरी है। चांवल (8 करोड़ टन), दालें (1.45 करोड़ टन) तिलहन (2.8 करोड़ टन), गेंहँ (7.2 करोड़ टन) की जानकारी बतलाती है कि चालू वर्ष में उत्पादन घटा हैं। कपास (2.1 करोड़ गाँठ) और गन्ना (31 करोड़ टन) के ऑंकड़े जरुर गत वर्ष से बेहतर हैं। मगर खाद्यान्न का उत्पादन 22 करोड़ टन के लक्ष्य से 1.1 करोड़ टन कम रहा है। अनाज, दालों और तेल की बढ़ती कीमतों की जिम्मेदारी इसी कमी पर है।

यह खुशी की बात है कि उच्च शिक्षा हासिल करने वालों की संख्या में 40 प्रतिशत की वृध्दि हुई है और प्रतिवर्ष 1.5 करोड़ विद्यार्थी उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। इनमें एक तिहाई लड़कियाँ हैं। मगर सर्वशिक्षा अभियान और प्राथमिक व माध्यमिक शिक्षा की हालत चिंताजनक है। काफी बड़े अनुपात में बच्चे पढ़ाई अधूरी छोड़ने को मजबूर हैं। इस दिशा में सबसे खास ध्यान दिलाने वाला मुद्दा यह है कि भारत की जनसंख्या 1.6 प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से बढ़ रही हैं और 2045 में जाकर ही बढ़ना रुकेगी। आधे से अधिक जनसंख्या युवा वर्ग की होगी जिनकी शिक्षा और रोजगार की व्यवस्था करना होगी शेयर बाजार में आर्थिक समीक्षा को इसीलिए चिंता की दृष्टि से लिया गया है। समीक्षा में दिए गए संकेतों के अनुसार कार्रवाई होना जरुरी है क्योंकि शेयर बाजार और वायदा बाजारों की तेजी का जो असर आर्थिक विकास की मरीचिका में प्रकट हो रहा था, उसका गुब्बारा फूटने का डर भी लग रहा है। ***

खबरिया चैनलों के लिए कानून जरुरी

सामाजिक संगठनों ने म ुनाफा और व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा की होड़ में समाज में अंधविश्वास, अपराध एवं अन्य नकारात्मक प्रवृत्तियों को बढ़ावा देने वाले निजी टेलीविजन चैनलों पर नियंत्रण रखने के लिए सरकार से तत्काल कड़े कानून बनाने की मांग की है।

सामाजिक संगठन ओपन फोरम एवं ओमेक्स फाउंडेशन की ओर से पिछले दिनों नई दिल्ली में सम्पन्न मीडिया एवं सामाजिक विकास पर राष्ट्रीय संगोष्ठी में वक्ताओं ने देश में मीडिया और खासतौर पर इलेक्ट्रोनिक मीडिया के तेजी से हो रहे विस्तार एवं इनके द्वारा पेश की जा रही आपत्तिजनक सामग्रियों के मद्देनजर कारगर राष्ट्रीय मीडिया नीति भी बनाए जाने की जरुरत महसूस की जा रही है।

देश में फिल्मों के लिए केंद्रीय सेंसर बोर्ड जैसी नियामक संस्था है लेकिन लोगों की मानसिकता एवं सोच को व्यापक पैमाने पर प्रभावित करने वाले टेलीविजन चैनलों के लिए कोई नियामक संस्था अभी तक नहीं बनाई गई है।

आज ज्यादातर पत्रों एवं टेलीविजन चैनलों की सामग्रियों का चयन जनहित एवं सामाजिक सरोकार के आधार पर नहीं बल्कि व्यावसायिक मुनाफे के आधार पर होता है। यही कारण है कि आज मीडिया से जनहित एवं सामाजिक विकास से जुड़ी खबरें एवं सामग्रियां गायब हो रही है और इनकी जगह पर सस्ता मनोरंजन बेचा जा रहा है। यह तर्क दिया जा रहा है कि लोग ऐसा चाहते है जबकि लोगों की रुचियों को जानने के लिए न तो कोई अध्ययन हो रहा है और न ही कोई सर्वेक्षण।

समाज और देश के विकास में मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका है इसलिये मीडिया को केवल व्यावसायिक होड़ में फंस कर अपनी इस महत्वपूर्ण जिम्मेदारी की अनदेखी नहीं करनी चाहिए।

एक समय समाचार पत्र जनहित के मुद्दों को तरजीह देते थे क्योंकि उस समय समाचार पत्रों की आमदनी का 30 से 40 प्रतिशत हिस्सा पाठकों से प्राप्त होता था लेकिन आज समाचार पत्रों एवं टेलीविजन चैनलों की आमदनी का मुख्य स्त्रोत विज्ञापन हो गए हैं। आज खबरिया चैनलों में प्राइम टाइम पर प्रसारित होने वाली खबरों में तीन प्रतिशत से भी कम खबरें सामाजिक विकास के मुद्दों से जुड़ी होती हैं।यही कारण है कि मीडिया सामान्यजन से दूर होता जा रहा है ।

खनन के नाम पर संसाधनों की लूटमार

1 सामयिक

खनन के नाम पर संसाधनों की लूटमार

भारत डोगरा

नई राष्ट्रीय खनन नीति की घोषणा शीघ्र होने वाली है। यदि कुछ मुद्दों पर विवाद बहुत पेचीदा न होते, तो संभवतः यह नीति कब की प्रस्तुत हो चुकी होती।

किसी राष्ट्र के विकास, आजीविका व व्यापार में खनिज संपदा की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। भारत की खनिज संपन्नता को देखते हुए यह भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। पर साथ ही खनन के पर्यावरण पर होने वाले असर को इसलिये भी ध्यान में रखना बहुत जरुरी है जिससे खनन की प्रक्रिया से तबाही न हो। यह भी आकलन करना आवश्यक है कि खनन का आसपास के गांववासियों, खेती और पशुपालन, जल-स्त्रोतों व वनों पर क्या असर पड़ेगा। यह सभी बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न हैं।

यदि किसी स्थान से खनिज इस तरह से निकाला जाए कि वहां के जल-स्त्रोत ही तबाह हो जाएं तो निश्चय ही जीवन के आधार की यह तबाही स्वीकार नहीं की जा सकती है। अतएव इस विषय में समग्र दृष्टिकोण की बहुत आवश्यकता है। जब टिकाऊ व समग्र विकास को ध्यान में न रखकर केवल अल्पकालीन मुनाफे को आधार बनाया जाता है तो इससे खनिज सम्पदा सम्पन्न क्षेत्रों के विकास के स्थान पर उनकी तबाही होने लगती है।

भारत में इन दिनों लौह अयस्क का व्यापार संबंधी विवाद काफी तीखा हो रहा है व इसे राष्ट्रीय आर्थिक नीति की घोषणा में देरी का यह एक मुख्य कारण भी माना जा रहा है। दरअसल भारत के अयस्क भंडार पर विश्व की कई स्टील कंपनियों की नजर गढ़ी है व वे बड़े पैमाने पर लौह अयस्क खरीदने के लिए तैयार हैं। लौह अयस्क को बड़े पैमाने पर निर्यात करने के कई प्रस्ताव हाल ही में चर्चित भी हुए हैं। इस बारे में एक अन्य राय यह है कि देश के सीमित लौह अयस्क भंडार की अगर हम इतनी तेजी से निर्यात कर देंगे तो हमारे अपने स्टील उद्योग को लौह अयस्क कहां से मिलेगा। भविष्य हेतु ठीक से कार्य योजना बननी चाहिए जिससे कि अति महत्वपूर्ण स्टील उद्योग की जरुरतें पूरी हो सकें।

कुछ अध्ययनों में चिंता जाहिर करते हुए बताया गया है कि यदि वर्तमान दर से निर्यात होता रहा तो कुछ ही वर्षो में हमारे लौह अयस्क भंडार समाप्त होने लगेंगे व तब हमारे अपने स्टील उद्योग के लिए कच्चे माल के संकट की स्थिति उत्पन्न हो जाएगी। इसके जवाब में यह कहा जा रहा है कि समय के साथ-साथ लौह अयस्क के नए भंडार पता चलेंगे। अतः अभी विदेशी मुद्रा कमाने के अवसर को हाथ से न जाने दिया जाए,पर यह दृष्टिकोण बहुत भाग्यवादी है। साथ ही यह भी विचारणीय है कि क्या केवल नए भंडार की उम्मीद पर आप अपनी भविष्य की जरुरतों को नजरअंदाज कर दें? कई देशों के पास अपने अच्छे खासे लौह अयस्क भंडार है पर फिर भी वे एक सीमा के बाद इनका जल्दबाजी में दोहन नहीं करते हैं, क्योंकि उन्हें अपनी भविष्य की जरुरतों का भी ख्याल है।

लौह अयस्क के अतिरिक्त कोयले संबंधी विवाद भी पेचीदा हैं। एक बहुत शक्तिशाली लॉबी यह चाहती है कि इस क्षेत्र में बड़ी निजी व विदेशी कम्पनियों का तेजी से आगमन हो। पर कोयले के खनन के निमित्त वर्ष 1973 में बना राष्ट्रीकरण का कानून इसकी इजाजत ही नहीं देता। जब कोयले के खनन का राष्ट्रीकरण हुआ था तो इसे कांग्रेस लोक हितकारी निर्णय के रुप में बहुत प्रचारित किया था। अब कांग्रेस की अग्रणी भूमिका वाली यूपीए सरकार के लिए यह कठिन हो रहा है कि वह अपनी ही प्रचारित एवं प्रसारित नीतियों से पीछे कैसे हटे।

इस स्थिति से निबटने का एक तरीका काफी माथापच्ची के बाद यह ढूंढा गया था कि जिन कम्पनियों या उपक्रमों को कोयले की अधिक जरुरत होती है, (जैसे ताप बिजलीघरों व स्टील उद्योग को) उन्हें कोयले के कुछ कैप्टिव ब्लाक दे दिए जाएं व तत्पश्चात् उन्हें यह इजाजत भी दे दी जाए कि वे किसी निजी या विदेशी खनन कंपनी से संयुक्त प्रयास या संयुक्त उपक्रम का समझौता कर लें। अब इसे और आगे बढ़ाया जा रहा हैव बड़ी निजी व विदेशी खनन कंपनियों को सीधे कोयले के ब्लाक खनन के लिए देने की तैयारी की जा रही है। उन्हें बस यह बताना होगा कि स्टील या सीमेंट उद्योग या ताप बिजली घरों आदि कोयले के बड़े व महत्वपूर्ण उपभोक्ताओं को आपूर्ति करने की स्वीकृति उनके पास है।

जहां ऐसे निर्णयों में भारत के बाहर की अनेक विदेशी खनन कंपनियों में बहुत उत्साह आ गया है, वहां सरकार को अभी तक यह दुविधा है कि कोयला राष्ट्रीकरण अधिनियम सन् 1973 के रहते विदेशी व निजी क्षेत्र की इतनी सारी कंपनियों को बड़े पैमाने को कोयला खनन की अनुमति देकर वह किसी कानूनी संकट में न पड़ जाए। राष्ट्रीयकरण अधिनियम में संशोधन करने का प्रस्ताव भी बहुत समय से सरकार के समक्ष विचाराधीन है, पर इससे राजनीतिक हड़कंप मचेगा, उससे सरकार दाव पेच चलाकर वह फिलहाल अपनी इसी नीति को आगे बढ़ाना चाहती हैं।

बाक्साईट के खनन की योजनाएं भी तीखे विवादों के घेरे में हैं। उड़ीसा के कालाहांडी जिले में व इसके आसपास के क्षेत्र में प्रस्तावित बाक्साईट खनन व एल्यूमिनियम के संयंत्रों को सबसे अधिक आलोचना झेलनी पड़ती है व इसके वाजिब कारण भी हैं। इस क्षेत्र में रोजी-रोटी के गंभीर सकंट व भूख से मौतों के समाचार बार-बार चर्चा में आते रहे हैं। इसलिए यहां पर आजीविका का आधार सुधारने व विशेषकर सिंचाई व पेयजल व्यवस्था पर सरकार ने विशेष ध्यान दिया है। परंतु अब बाक्साईट व एल्यूमिनियम की विशालकाय परियोजनाओं से यहां की नदियों व जल स्त्रोतों पर बहुत प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की संभावना उत्पन्न हो गई है।

गांववासी व पर्यावरणविद् यह सवाल उठा रहे हैं कि बाक्साईट को केवल उद्योग के कच्चे माल के रुप में क्यों देखा जाता है इसे जल-संरक्षण के एक महत्वपूर्ण स्त्रोत के रुप में क्यों नहीं देखा जाता है? विशेषकर कालाहांडी व आसपास के क्षेत्रों में उन पर्वतों में जहां से अनेक महत्वपूर्ण जल स्त्रोत निकल रहे है, वहां तो बक्साईड की इस महत्वपूर्ण जल-संरक्षण भूमिका पर ध्यान देना आवश्यक है।

इसके अतिरिक्त नियमगिरि पर्वतमालाओं में स्थित कालाहांडी के क्षेत्रों में ऐसे आदिवासी समुदाय रहते हैं जिनके लिए एक ओर तो यह पर्वतमाला आवास व आजीविका का क्षेत्र है, वहीं दूसरी ओर स्थानीय परंपरा में इनकी इतनी गहरी आस्था व श्रध्दा है कि उनके लिये यहां से उजड़कर कहीं और बसना एक बड़े आघात की तरह है। कुछ ऐसी ही गहरी श्रध्दा की भावनाएं अधिकांश बहुसंख्यक लोगों की चित्रकूट (उत्तरप्रदेश व मध्यप्रदेश) के उन क्षेत्रों के प्रति हैं जहां अनेक प्राचीन तीर्थ स्थल व उनके आसपास के क्षेत्र खनन के लिए प्रयोग आ रहे डायनामाईट के कारण तबाह हो रहे हैं। राजस्थान के ब्रज क्षेत्र (जिला भरतपुर) में होने वाले खनन के बारे में भी बार-बार कहा गया है कि इससे लाखों तीर्थ यात्रियों की श्रध्दा के स्थान उजड़ चुके हैं व अन्य खतरे में हैं।

दूसरी ओर झरिया (झारखंड) जैसे कुछ क्षेत्रों की स्थिति तो और भी गंभीर है, क्योंकि वहां हुए अनियमित खनन के कारण हजारों लोगों का जीवन ही खतरे में पड़ गया है। यहां जमीन के अंदर के कोयला भंडारों ने जगह-जगह आग पकड़ ली हैजिससे खनन के लिए बनाए गए खंबे क्षतिग्रस्त हो जाते हैं व भूमि घसान का गंभीर खतरा उत्पन्न हो जाता है।

खनन क्षेत्र के लोगों की सुरक्षा के साथ खनन मजदूरों की सुरक्षा व भलाई का मुद्दा बहुत महत्वपूर्ण है। अनेक खनन क्षेत्रों जैसे कोयला खनन में मजदूर काफी असुरक्षा की स्थिति में काम करते हैं। पत्थर गिट्टी जैसे तथाकथित लघु खनिज क्षेत्र में व इससे जुड़े क्रशरों में लगे लाखों मजदूरों की स्वास्थ्य की स्थिति बहुत विकट है व उन्हें सिलकोसिस तथा टीबी जैसी गंभीर बीमारियों में झोंका जा रहा है। अतः मजदूरों की भलाई व स्वास्थ्य की रक्षा को नई खनिज नीति में महत्वपूर्ण स्थान मिलना बहुत जरुरी है।

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पड़ती भूमि पर पुनर्विचार की ज़रुरत

2 हमारा आसपास

पड़ती भूमि पर पुनर्विचार की ज़रुरत

जयश्री वेंकटेशन

पिछले दिनों पड़ती भूमि कई कारणों से खबरों में रही। तमिलनाडु सरकार ने यह कदम उठाया कि राज्य के भूमिहीनों को ढाई-ढाई एकड़ जमीन दी जाएगी। इस निर्णय के चलते यह बहस छिड़ गई कि जमीन आएगीकहां से?

इसी प्रकार से चेन्नै जैसे महानगरों के आसपास सेटेलाइट टाउन निर्मित करने के प्रस्ताव के बाद भी इसी तरह की शंकाएं व्यक्त की गई। इन शंकाओं का समाधान करते हुए तमिलनाडु सरकार ने स्पष्ट किया कि इस काम के लिए भी मात्र पड़ती भूमि या सूखी भूमि का ही अधिग्रहण किया जाएगा। यह भी कहा गया था कि पानी के स्त्रोतों, रिहायशी इलाकों और जंगलों को इस कार्यक्रम के दायरें में नहीं लाया जाएगा।

तमिलनाडु में कुल 17,303.29 वर्ग कि.मी. भूमि को पड़ती भूमि के रुप में चिन्हित किया गया है। यह राज्य के भौगोलिक क्षेत्रफल का 13.3 प्रतिशत है। तर्क यह दिया जा रहा है कि यह जमीन सरकारी जरुरत को आसानी से पूरा कर सकती है। इस तरह के सुझाव भी आए हैं कि पड़ती भूमि का उपयोग प्लांटेशन, खास तौर से रतनजोत के प्लांटेशन हेतु किया जए ताकि जैव ईंधन उद्योग को बढ़ावा मिल सके। यह सही है कि जीवाश्म ईंधन (पेट्रोल, डीजल वगैरह) से हटकर जैव ईंधन की ओर कदम बढ़ाना एक अच्छा कदम होग, मगर पड़ती भूमि को जैव ईंधन प्लांटेशन में तब्दील करने के विचार की छानबीन करने की जरुरत है।

मसलन, यह सुझाया जा रहा है कि पालनी पर्वत की पड़ती भूमि पर रतनजोत उगाया जाए जबकि यह इलाका कुछ ऐसे पौधों का प्राकृत वास है जो सिर्फ यहीं पाए जाते हैं। इसके लिए प्रस्ताव यह है कि रेल्वे के साथ वापिस खरीद की व्यवस्था कर ली जाए।

इसी प्रकार से, हाल के दिनों में तटवर्ती क्षेत्रों को प्रोसोपिस जुलीफेरा उगने के लिए छोड़ दिया गया है, यहां तक कि मैन्ग्रोव वनों के पट्टों को भी। यह प्रजाति ईंधन की जरुरत की पूर्ति करती है। इन जमीनों को भी पड़ती भूमि के रुप में वर्गीकृत किया गया है।

दक्षिण चेन्नै में एक दलदल है जो इकॉलॉजी की दृष्टि के काफी महत्वपूर्ण है। इसके संरक्षण के लिए पांच वर्षो से किए जा रहे प्रयासों में अवरोध पैदा हो गया क्योंकि यह पड़ती भूमि है।

यह चिंता व्यक्त की गई है कि पड़ती भूमि कहीं एक मोहक शब्द में न बदल जाए जो दानदाता संस्थाओं को उसी तरह रिझाने लगे जैसे स्थानीय लोगों व संस्थाओं की भागीदारी और जेंडर जैसे जुमलें रिझाते हैं। मगर इससे भी ज्यादा चिंता की बात यह है कि हम भूमि बंदोबस्त व प्रशासन की औपनिवेशिक विरासत को सीने से चिपकाए बैठे हैं और अभी भी उसका पालन कर रहे हैं।

पड़ती भूमि दरअसल प्राकृतिक संसाधनों को लेकर औपनिवेशिक धारणा की अवशेष है। यह धारणा मूलतः राज्य द्वारा प्राकृतिक संसाधनों पर एकछत्र नियंत्रण स्थापित करने के उद्देश्य से निर्मित की गई थी। इन संसाधनों में भूमि प्रमुख थी। कोशिश यह थी कि दुविधा वाले क्षेत्र कम से कम रहें। नजूल बंदोबस्त प्रणाली के जरिए जंगल व कृषि भूमि के बीच काल्पनिक मगर कारगर विभेद पैदा किया गया। शुध्दतः प्रबंधन के मकसद से ब्रिटिश शासन ने इस तरह के वर्गीकरण किए और जमीनों को वन भूमि व कृषि भूमि में बांट दिया। कृषि भूमि को उत्पादक भूमि व पड़ती भूमि (वेस्टलैण्ड्स) में बांटा गया। इस तरह के वर्गीकरण के उदाहरण हमें कई और मामलों में भी देखने को मिलते हैं। जैसे प्रायद्वीपीय भारत के घाट को पश्चिमी व पूर्वी घाट में बांटना, जंगलों को नम व शुष्क जंगलों में बांटना या यह कहना कि लोग या तो जातियों में शामिल होंगे या जनजातियों में।

मद्रास प्रेसिडेंसी में अपनाई गई भूमि बंदोबस्त प्रक्रिया इसका उम्दा उदाहरण है। ब्रिटिश आगमन से पहले दक्षिण भारत के ग्रामीण समाज विकेंद्रीकृत इकाइयों में संगठित था जिन्हें नाडु कहते थे। अलबत्ता ब्रिटिश शासकों ने दावा किया कि लोगों की हालत अत्यंत शोचनीय है और पूर्ववर्ती सरकारों, और खासकर टीपू सुल्तान के राज, ने गांवों को ऐसी हालत में पहुचा दिया है कि सम्पन्न किसान ढूंढे नहीं मिलेगा। यह भी कहा गया कि किसान ईमानदारी से लगान नहीं चुकाते हैं। इन मान्यताओं के आधार पर ब्रिटिश शासन ने व्यवस्थित ढंग से नियंत्रण की स्थानीय प्रणालियों को कमजोर किया और राजस्व व्यवस्था लागू करके पूरा नियंत्रण अपने हाथों में ले लिया। इन व्यवस्थाओं में रैयतवाड़ी और स्थायी बंदोबस्त प्रमुख थीं। जंगल के बंदोबस्त की प्रक्रिया को मद्रास फॉरेस्ट एक्ट, 1882 पारित करके संभव बनाया गया। इस कानून के जरिए जंगल के एक बड़े हिस्से को आरक्षित जंगल घोषित कर दिया गया था।

मद्रास प्रेसिडेंसी के राजस्व इतिहास को उजागर करते हुए बेडन पॉवेल ने दो अवधियां चिन्हित की हैं - प्रारंभिक व आधुनिक बंदोबस्त। जहां प्रारंभिक बंदोबस्त कमोबेश पूर्व के आकलन पर आधारित थे, और क्षेत्रीय स्वायत्तता को प्रोत्साहित करते थे, वहीं 1858 में बंदोबस्त महकमे की स्थापना के बाद जो दौर शुरु हुआ उसमें कठोर मापदण्ड लागू किए गए और इस काम में बंदोबस्त व सर्वेक्षण अफसरों की मदद ली गई जो जमीनों के नक्शे बनाया करते थे। इस दूसरे दौर में प्रशासन के मकसद से जमीन को आक्यूपाइड और अन-ऑक्यूपाइड भूमियों में बांट दिया गया।

इन्हें इस तरह परिभाषित किया गया कि जिस जमीन पर खेती होती है वह आक्यूपाइड है और जिस जमीन पर खेती नहीं होती वह पड़ती भूमि है। वैसे दिखता तो यह है कि इससे ज्यादा से ज्यादा जमीन को कृषि भूमि में तब्दील करके निजी स्वामित्व में देने को बढ़ावा मिलेगा जगर दरअसल सर्वे की पूरी प्रक्रिया पड़ती भूमि को चिंहित करके राज्य के नियंत्रण में लाने की प्रक्रिया थी।

आरक्षित जंगलों के अलावा जो जमीन थी उसमें निम्नलिखित बारीक वर्गीकरण किए गए ः पट्टा भूमि, आकलित सूखी व नम पड़ती भूमि, अनाकलित पड़ती भूमि और पोरोम्बोके (राजस्व और वन)। आकलित सूखी व नम पड़ती भूमि वह थी जो उस समय तक खेती विहीन रहती थी जब तक कि राजस्व विभाग उसका आवंटन न कर दे। इस श्रेणी में कई किस्म के प्राकृतवास शामिल थे, जैसे दलदल, मौसमी नम भूमियां, पथरीली ढलवां भूमि, परित्यक्त चारागाह, और झूम खेती के अंतर्गत आने वाली जमीनें। पोरोम्बोके जमीनें सामुदायिक उपयोग के लिए निर्धारित थीं।

वास्तविक परिस्थिति में पड़ती भूमि की बेवकूफी स्पष्ट नजर आती है। मसलन तमिलनाडु में अधिकांश अनाकलित नम पड़ती भूमि के रुप में वर्गीकृत नम भूमियां वास्तव में कृषि तंत्र का अभिन्न अंग हैं और यहां मौसमी तौर पर धान की खेती होती है। इसके अलावा स्थानीय लोग इन नम भूमियों से कई लाभ प्राप्त करते है। जैसे चारा, मछली तथा चटाई, टोकरियां वगैरह बनाने के लिए कच्चा माल आदि। इस तरह की नम भूमियां शहरी क्षेत्र में हों, तो उन्हें कचरा व मलबा फेंकने का स्थान बना दिया जाता है। पहाड़ी इलाकों की नमभूमियों का उपयोग मोटा अनाज और फलियां वगैरह उगाने के लिए किया जाता है और कहीं-कहीं तो इनमें व्यापारिक फलोद्यान (बाड़ियां) भी लगाए जाते हैं। ऐसे क्षेत्रों में खेती-बाड़ी के जो तौर-तरीके अपनाए जाते हैं वे जांच-परखे हैं और इनमें बाहरी इनपुट्स की जरुरत बहुत कम होती है। यह भी जानी-मानी बात है कि कई पड़ती जमीनें पशु पालक समुदायों के लिए चारागाह हैं।

इस तरह के अवलोकनों से सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह सामने आता है कि पारंपरिक रुप से जमीन को मात्र सेवा प्रदाता के रुप में नहीं देखा जाता था। काफी प्राचीन समय में ही समझ लिया गया था कि ये जमीनें कई सारी इकॉलॉजिकल भूमिकाएं अदा करती हैं।

भूमि का जो प्रारंभिक वर्गीकरण चरक, कौटिल्स और कश्यप ने किया था वह मिट्टी की गुणवत्ता और उर्वरता, स्थानीय जलवायु की परिस्थितियों, और अनोखेपन जैसी कसौटियों पर आधारित था। भूमि वर्गीकरण की एक राजस्व प्रणाली भी अस्तित्व में थीं जो मिट्टी की गुणवत्ता पर आधारित थी। इसका विवरण हमें अर्थशास्त्र और अग्निपुराण में मिलता है। इसी प्रकार से संगम साहित्य (300ई.पू. से 300 ई.) के एक ग्रंथ तोल्काप्पियम में भूमि ह्रास और मरुस्थलीकरण को वर्गीकरण का एक आधार जरुर बताया गया है मगर किसी भी प्राकृतिक संसाधन के बारे में उपयोगहीनता की बात बिलकुल नहीं कही गई है। इस बात को सहजता से स्वीकार किया गया था कि प्राकृतिक संसाधन एकाधिक सेवाएं प्रदान करते हैं। वनवासी समुदाय जिस ढंग से भूमि का वर्गीकरण करते हैं उसमें यह मान्यता स्पष्ट झलकती है। मसलन नीलगिरी के कुरुम्ब समुदाय में जमीन का परिसीमन परिपाटियों के अनुसार किया जाता है और अपने दायरे में आने वाली जमीन का विवरण उसके कार्य के आधार पर होता है। इसी प्रकार का वर्गीकरण कोली पर्वत के मलई अली में भी मिलता है। ये लोग जमीन का वर्गीकरण वहां पाए जाने वाले पानी की गुणवत्ता और गहराई के आधार पर करते हैं।

इन वैकल्पिक प्रणालियों के उल्लेख का आशय प्राचीन व पारंपरिक ज्ञान को महिमामंडित करना नहीं है बल्कि यह रेखांकित करना है कि हमें जमीन के उपयोग व बंदोबस्त की वर्तमान नीतियों में आधुनिक समझ को जगह देनी चाहिए। ***

अनाज भरे गोदामों के भूखे चौकीदार

3 हमारा भूमण्डल

अनाज भरे गोदामों के भूखे चौकीदार

हीरा झमतानी

विश्व के 180 राष्ट्रों की सरकारों ने सन् 1996 में आयोजित विश्व खाद्य सम्मेलन में संकल्प लिया था कि सन् 2015 तक वे अपर्याप्त पोषण पाने वाले लोगों की संख्या आधी करेंगे।

संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (एफ.ए.ओ.) की रपट विश्व में खाद्य असुरक्षा की स्थिति 2006 के अनुसार भूखे लोगों की तादाद घटाने के लिये कोई परिणामकारी कदम नहीं उठाया गया है। साथ ही इसके आंकड़े चौंकाने वाले हैं। रपट के अनुसार पूरी दुनिया में 85.40करोड़ व्यक्ति, अर्थात् प्रत्येक 7व्यक्तियों में से एक व्यक्ति को भरपेट भोजन नहीं मिलता है। विकासशील देशों में स्थिति और भी ज्यादा खराब है, वहां प्रति 6 में से 1 व्यक्ति भूखा या कुपोषित है। अफ्रीका के उप सहारा क्षेत्र में तो यह अनुपात 3 और 1 का है।

दरअसल पिछले वर्षो में दुनिया के अधिकांश इलाकों में भूखे लोगों की संख्या बढ़ी है, कुछ क्षेत्रों में तो यह 50 प्रतिशत तक बढ़ी है। विश्व में भूखे लोगों की कुल संख्या में वर्ष 2001-03 के दौरान 2.30 करोड़ की वृध्दि दर्ज की गई थी। सहस्त्राब्दी विकास लक्ष्य से तुलना करने पर ये आंकड़े भ्रमित करने वाले प्रतीत होते हैं। सहस्त्राब्दी विकास लक्ष्य में सन् 2015 तक भूखे लोगों के अनुपात में 50 प्रतिशत कमी की सम्भावना प्रकट की गई है। इसमें भूखे लोगों की कुल संख्या को आधा करने की बात नहीं है।

जनसंख्या के वर्तमान स्वरुप के अंतर्गत अनुमान के अनुसार यदि विकासशील देश सामूहिक रुप से भूखे लोगों की संख्या को आधा करने का सहस्त्राब्दी विकास लक्ष्य प्राप्त भी कर लें, तब भी 58.5 करोड़ लोग ऐसे बचेंगे जिन्हें भरपेट भोजन उपलब्ध नहीं होगा। विश्व खाद्य सम्मेलन द्वारा निर्धारित लक्ष्य 4.12 करोड़ की संख्या से यह 1.73 करोड़ अधिक है। यह स्थिति उस दुनिया की है, जहां खाद्य एवं कृषि संगठन के अनुसार विश्व में सभी का पेट भरने के लिये पर्याप्त खाद्यान्न उपलब्ध है। खाद्य एवं कृषि संगठन के प्रमुख जैकोस डायोफ ने खाद्य सुरक्षा पर उद्घाटन सत्र में कहा था, संसाधनों एवं उन्नत तकनीक से सम्पन्न विश्व में लोगों का भूखे रहना एक प्रकार का षड़यंत्र है।

खाद्य एवं कृषि संगठन की खाद्य सुरक्षा पर 32वां सत्र सम्पन्न हुआ। विश्व में भुखमरी की स्थिति भयानक होने के बावजूद दसवां विश्व खाद्य सम्मेलन सरकारों के इस वादे के साथ समाप्त हुआ कि गरीबों के लिए विशेष आहार सुरक्षा सुनिश्चित की जायेगी। विश्व खाद्य सम्मेलन प्लस 10 का स्तर घटाकर उसे केवल विशेष सत्र का रुप देकर वस्तुतः सरकारों ने कुपोषण एवं भूख की समस्या के प्रति गंभीर न होने का संकेत दे दिया है। विशेष सत्र में निम्न तीन पेनल गठित हुए - सहायता और निवेश, कृषि सुधार एवं ग्रामीण विकास तथा व्यापार एवं वैश्वीकरण।

इस विशेष सत्र के निष्कर्षो का संकलन सत्र के अध्यक्ष फ्रांस के प्रो.